उत्तर प्रदेश में योगी-राज: अभी तक तो असफल होता दिख रहा है

मेरी कुमाउंनी बोली (उत्तराखंड) में एक कहावत है: “सासुलि ब्वारि थैं कै, ब्वारिलि कुकुर थैं कै, और कुकुरैलि पुछड़ हिलै दे।”

मतलब बताने से पहले सोचता हूं कि इसमें एक कड़ी और जोड़ दूं: “सासुलि ब्वारि थैं कै, ब्वारिलि चेलि थैं कै, चेलिलि कुकुर थैं कै, और कुकुरैलि पुछड़ हिलै दे।”

मतलब कुछ यों समझ सकते हैं: किसी कार्य को निबटाने के लिए सास ने बहू (पुत्रवधु) से कहा; बहू ने उसे करने के लिए बेटी को कहा; अल्पवयस्क बेटी ने कार्य की गंभीरता समझे बिना कुत्ते से कहा; और कुत्ते ने स्वभाव के अनुकूल पूंछ हिला दिया। कार्य जैसा का तैसा रह गया।

शासन – अंतर नहीं दिखता

ऊपर्युक्त कहावत हमारे शासकीय तंत्र के चरित्र पर काफी हद तक लागू होती है।

उत्तर प्रदेश की सत्ता सम्हाले योगी आदित्यनाथ को अब तीन माह होने को हैं। इस अल्पावधि में वे जनता की तमाम उम्मीदों को पूरा करते हुए दिखने लगें ऐसी अपेक्षा मैं नहीं रखता। फिर भी कुछ बातें हैं जिनकी झलक नये शासकीय तंत्र में दिखनी ही चाहिए थीं। मैं यह उम्मीद करता था कि जो भाजपा चुनावों के दौरान जोरशोर से कहती थी कि प्रदेश में जंगलराज चल रहा है और अपराधी खुले घूम रहे हैं उसी दल के नेता और कार्यकर्ता अब अपनी अराजकता दिखा रहे हैं। अगर आप समाचार माध्यमों पर विश्वास करें तो ऐसी वारदातें सुनने-देखने में आई हैं जिनमें किसी न किसी बहाने भाजपा के नेता-कार्यकर्ता कानून व्यवस्था अपने हाथ में लिए हों। बसपा एवं सपा की पूर्ववर्ती सरकारों में आपराधिक छवि वाले उनके कार्यकर्ता असामाजिक कृत्यों में लिप्त रहते थे। अब वैसा ही कुछ भाजपा के कार्यकर्ता कर रहे हैं। नयी शासकीय व्यवस्था में भाजपा के लोगों को अनुशासित होकर आम जन के समक्ष दल की अच्छी छवि पेश करनी चाहिए थी। ऐसा हुआ क्या?

योगी जी ने जब सत्ता सम्हाली तो उन्होंने गरजते हुए घोषणा की कि अपराधी तत्व प्रदेश छोड़कर चले जायें अन्यथा वे सींखचों के पीछे जाने के लिए तैयार रहें। इस संदेश से अपराधियों के बीच भय की भावना जगनी चाहिए थी। ऐसा हुआ नहीं। आपराधिक घटनाएं कमोबेश वैसी ही हो रही हैं जैसी बीते समय में हो रही थीं। जो सपा शासन आपराधिक वारदातों के लिए बदनाम रही है वह भी अब कह रही है, “कहां हुए अपराध कम?”

मेरी जानकारी में योगी जी का कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं रहा है। पूर्णतः अनुभवहीन व्यक्ति को समुचित निर्णय लेने में दिक्कत हो सकती है। हमारे लोकतंत्र में यह अघोषित परंपरा रही है कि जिम्मेदार पद पर बैठे अनुभवहीन व्यक्ति के लिए पर्दे के पीछे से मार्गदर्शन करने वाला कोई न कोई रहता है। सुना ही होगा कि कैसे महिला ग्रामप्रधानों के कार्य संपादन उनके पतिवृंद करते आए हैं। बिहार में श्रीमती रावड़ी मुख्यमंत्री बनीं (बनाई गयीं) तो उनके पति लालू जी ही दरअसल राजकाज में मदद कर रहे थे। जब अखिलेश को उत्तर प्रदेश की गद्दी पर बिठाया गया था तो उनके पीछे पिता मुलायम जी का मार्गदर्शन था। लेकिन ऐसा कुछ योगी जी के साथ नहीं है यही मैं समझ रहा हूं। ऐसा नहीं कि इतिहास में सदैव अनुभवी ही सफल होते आये हों। कई बार एकदम नया व्यक्ति भी सफल शासक सिद्ध होते हैं। योगी जी उस श्रेणी में हैं ऐसा नहीं लगता।

प्रशासनिक तंत्र

योगी जी ने सत्ता पर काबिज होते ही अनेकानेक निर्देश अपने प्रशासनिक अधिकारियों को दिए। उन निर्देशों का पालन क्यों नहीं हो रहा है इसे वे क्या समझ पाये हैं? और जो अधिकारी निर्देशों के अनुसार नहीं चल रहा हो उसके विरुद्ध क्या कार्यवाही की गयी? लेख के आरंभ में जो मैंने सुनाया, “सास ने बहू से …” वह प्रशासनिक तंत्र पर लागू होता  है। मुख्यमंत्री शीर्षस्थ अधिकारियों को निर्देश देते हैं, वे कनिष्ठ अधिकारियों को, वे अपने मातहतों को, …।” ये सिलसिला चल निकलता है, और सबसे नीचले पायदान पर का व्यक्ति, “अरे ऐसे आदेश तो आते ही रहते हैं” की भावना से पुराने ढर्रे पर ही चलता रहता है। मेरी समझ में यही कारण होगा कि योगी-राज में अभी कोई खास अंतर दिखाई नहीं देता है।  

निर्देशों की बात पर मुझे अपने वरिष्ठ सहकर्मी शिक्षक के रवैये का स्मरण हो आता है। बात सालों पहले की है जब मैं विश्वविद्यालय में कार्यरत था। मेरे विषय भौतिकी (फिज़िक्स) की प्रायोगिक कक्षा में वे अक्सर विलंब से पहुंचते थे। तब कहते थे, “अरे यार, भूल गये कि क्लास है।” कभी-कभी प्रयोगशाला-परिचर (लैब अटॆंडेंट) उन्हें बुलाने भी चला जाता था। मैं शिष्टता के नाते कुछ कहता नहीं था, लेकिन उनके भूलने को मैं “सुविधानुसार विस्मृति” (फ़गेटफ़ुलनेस ऑव्‍ कन्वीनिअंस) मानता था। मैं समझ नहीं पाता था कि जिस दायित्व के लिए व्यक्ति ने नियुक्ति स्वीकारी हो उसे उस दायित्व की याद दिलाने की जरूरत क्यों पड़ती है?

योगीजी को यह क्यों कहना पड़ता है कि शिक्षक समय पर कक्षा में जायें, चिकित्सक परामर्श कक्ष में समय पर पहुंचें, पुलिस चौकी प्रभारी वारदात की एफ़आईआर दर्ज करें, आदि-आदि। यह तो संबधित अधिकारियों-कर्मियों के दायित्वों में निहित है। यह सब तो उन्हें करना ही करना है अपनी सेवा-शर्तों के अनुरूप। योगी जी को निर्देश निर्गत करने के बजाय यह पूछना चाहिए कि वे दायित्वों के अनुसार कार्य क्यों नहीं कर रहे हैं। अगर उन्हें अपने दायित्वों का ही ज्ञान न हो और उसमें रुचि ही न लें तो फिर शासकीय सेवा में क्यों हैं?

सरकारी ‘सेवा’ बल्लेबल्ले

उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था क्यों घटिया दर्जे की है इसे समझना जरूरी है। सरकारी नौकरी में आर्थिक सुरक्षा उच्चतम श्रेणी की रहती है। ठीकठाक वेतन के अलावा कई प्रकार के लाभ और रियायतें, सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन, आदि इस नौकरी की खासियतें हैं। जब इतना सब किसी को मिल रहा हो तो दायित्व-निर्वाह में ईमानदारी तो बरतनी ही चाहिए। परंतु दुर्भाग्य है कि नौकरी के लाभ तो सभी चाहते हैं किंतु बदले में निष्ठा से काम भी करें यह भावना प्रायः गायब रहती है।

निजी क्षेत्रों में व्यक्ति की अक्षमता माफ नहीं होती, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। लेकिन सरकारे नौकरी में निर्देश पर निर्देश दिए जाते हैं, या तबादला कर दिया जाता है, अथवा कुछ काल के लिए निलंबन। तबादला का मतलब यह है कि निकम्मेपन की जरूरत ‘यहां’ नहीं लेकिन ‘वहां’ है। वाह! लोगों को यह एहसास नहीं है कि निलंबन दंड नहीं होता है। यह तो महज एक प्रक्रिया है तथ्यों की छानबीन के लिए, ताकि दंडित करने न करने का निर्णय लिया जा सके। आम तौर पर 90 दिनों के अंतराल पर निलंबन वापस हो जाता है, और मुलाजिम बाइज्जत अपनी कुर्सी पर!

आजकल सरकारी नौकरियों के लिए मारामारी देखी जाती है। इच्छुक जन हर प्रकार के हथकंडे अपनाते देखे जाते हैं। सत्ता पर बैठे लोग और प्रशासनिक अधिकारी जन अपने-अपने चहेतों को नियुक्ति देते/दिलाते है। जातिवाद, भाई-भतीजाबाद, क्षेत्रवाद आदि की भूमिका अहम रहती है। जब नियुक्तियां ऐसी हों तो अच्छे की उम्मीद क्षीण हो जाती है।

सरकारी नियुक्तियां

नियुक्तियों में शैक्षिक एवं शारीरिक योग्यता (जहां और जैसी उसकी अहमियत हो) तो देखी जाती है, लेकिन किसी भी सरकारी विभाग में नियुक्तियों में आवेदक के बौद्धिक स्तर (इंटेलिजेंस कोशंट) एवं भावात्मक स्तर (इमोशनल कोशंट) का आकलन नहीं किया जाता है। मेरा मानना है कि इन दोनों का गंभीर आकलन नियुक्तियों में होना चाहिए। पुलिस बल में तो इनकी आवश्यकता कुछ अधिक ही है। ऐसे पुलिसकर्मियों की खबरें सुनने को मिलती हैं जिनकी हिरासत से अपराधी चकमा देकर भाग जाते हैं। साफ जाहिर है उनका बौद्धिक स्तर कम ही रहता है। इसी प्रकार वे कभी-कभी एफ़आइआर तक नहीं दर्ज करते हैं, खास तौर पर रसूखदार व्यक्ति के विरुद्ध, क्योंकि वे संवेदनशील नहीं होते हैं। हमें आम जनों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए यह भावना उनके मन में होनी चाहिए कि नहीं? अक्सर देखा गया है कि वे भुक्तभोगी का शोषण करने से परहेज नहीं करते हैं।

जब संवेदेनाहीन व्यक्ति सरकारी तंत्र में हो तो वह आम जन के प्रति ही नहीं अपितु अपने आधिकारिक कर्तव्यों के प्रति भी लापरवाह होता है। और यही इस उत्तर प्रदेश में हो रहा है। यह धारणा सरकारी मुलाजिमों के दिलों में गहरे बैठ चुकी है कि उन्हें उनके निकम्मेपन के लिए दंडित नहीं किया जायेगा। वस्तुतः प्रशासनिक तंत्र के संदर्भ में लापरवाही, कामचोरी, नकारापन, आदि सभी कुछ जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता है। एक बार नौकरी में घुस जाओ और जिन्दगी मजे में गुजार लो। बस अपने ऊपर के अधिकारियों को खुश रखो; काम करो या न, बस काम करते हुए-से दिखो।

पिछले 25-30 वर्षों में प्रदेश प्रशासनिक गिरावट के दौर से गुजर चुका है। उसे पटरी पर लाना आसान काम नहीं है। महज निर्देश पर निर्देश देने से कुछ नही होने का यह योगी जी अभी तक समझ नहीं पाये हैं। उन्हें देखना चाहिए कि काम क्यों नहीं हो रहा है। यदि हो रहा है तो घटिया स्तर का क्यों हो रहा है। कुछ को दंडित करके दिखाएं; निलंबन से कुछ नहीं होने वाला।

निर्देश पर निर्देश देने से कुछ नहीं होगा। निर्देश देना यानी “सास ने बहू से कहा, बाहू ने …”।

तंत्र वही है। उसका चरित्र अभी तो अपरिवर्तित ही है। इसलिए योगीराज की सफलता संदिग्ध है। – योगेन्द्र जोशी

नोटों का विमुद्रीकरण (demonetization): सार्थक एवं निरर्थक टिप्पणियां और वह जो केंद्र सरकार ने किया होता।

 

विमुद्रीकरण की खबर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी जी ने मंगलवार 8 नवंबर की संध्या, यानी रात्रि प्रथम प्रहर, उस दिन तक प्रचलित 500 एवं 1000 के नोटों के विमुद्रीकरण की जो अप्रत्याशित घोषणा की उसके लिए देशवासी तैयार नहीं थे। इसमें दो राय नहीं कि जिस उद्देश्य से यह निर्णय सरकार ने लिया उस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। यह जरूर है कि बहुत से लोगों को इस निर्णय से परेशानी हुई है। बहुतों के लिए विमुद्रीकरण की खबर निराशा/हताशा का संदेश बनकर भी आई। खबर की ठीक-ठीक जानकारी का अभाव जनलेवा भी साबित हुई यह भी सुनने में आ रहा है। अगर ऐसा कुछ हुआ तो वह निःसंदेह खेदजनक था। मैं ऐसी स्थिति के पीछे उन लोगों की गलती कहूंगा जिन्होंने नोटों के बंद होने की आधी-अधूरी जानकारी अन्य जनों को देकर भ्रम की स्थिति पैदा की।

कुछ लोगों का कहना है कि नोटों के प्रचलन को बंद करने की सूचना समय पर दी गयी होती तो उन्हें संभलने का अवसर मिला होता। उन लोगों को समझना चाहिए कि पूरी प्रक्रिया को बेहद गोपनीय रखा गया था जिससे उन लोगों को संभलने का अवसर ही न मिले जिन्होंने अघोषित धनराशि घरों में जमा कर रखी हो। यह अवश्य है कि ऐसा करने पर उन लोगों को भी परेशानी हो गयी जिनका पैसा उस श्रेणी का नहीं था और जिन्होंने किसी न किसी आवश्यकता के अंतर्गत उसे घर में रखा था।

सरकार ने यह किया होता

     सरकार योजना को पूर्णतः गोपनीय रख सकी यह सराहनीय था। पूरी तैयारी करीब छः महीने पहले से चल रही थी फिर भी वह इस क़दर गोपनीय बनी रही इसके लिए संबधित अधिकारी-गण बधाई के पात्र हैं। तैयारी में कहीं कुछ कमी रह जाना आश्चर्य की बात नहीं है। मेरी समझ में निम्नलिखित बातें ध्यान में रखी गयी होतीं तो बेहतर होता:

(1) अगर उक्त घोषणा मंगल की रात्रि न करके गुरुवार की रात्रि की गयी होती तो शायद लोगों को कम असुविधा होती। दूसरे दिन शुक्रवार बैंक शेष तैयारी करने के लिए लेनदेन के लिए बंद रहते जैसा कि बुधवार को हुआ था। कई कार्यालयों में सप्ताहांत (शनिवार, रविवार) पर छुट्टी रहती हैं और कुछ के लिए शनिवार के दिन द्वितीय शनिवार (सेकंड सैटरडे) की छुट्टी रहती है, अतः लोगों को काम पर जाने की अफरातफ़री झेलते हुए तुरंत नोट बदलने की जल्दीबाजी न होती। लोगों को आश्वस्त होकर वस्तुस्थिति समझने और उसके साथ सामंजस्य बिठाने का समय मिल गया होता। बैंक खोले ही गये हैं तब भी खोले गये होते।

(2) अच्छा होता कि बैंकों के एटीएम से एक-दो दिन पहले से ही केवल सौ के नोट दिए जाते ताकि सौ के नोटों का मुद्राचलन अधिक हो गया होता। पूरी तरह गुप्त रखे अभियान की भनक इतने से न लगती। अफवाह या अनुमानबाजी का दौर चलता तो भी बैंकों का कारोबार बंद रहने से उनके माध्यम से पुराने नोटों को ठिकाने लगाना संभव न होता। कालाधन और जगह खपाना भी इतनी जल्दी संभव न होता। आजकल बहुत से लोगों की आदत छोटे नोट रखने की कम हो गयी है। वे लेनदेन में तुरंत 5 सौ का नोट पेश कर देते हैं। टोलप्लाज़ाओं पर यही तो हुआ था। देना 40-50 रुपये और पेश किये जा रहे थे 5 सौ के नोट। हर व्यक्ति को 4-4 सौ के नोट लौटाना टोलप्लाज़ा के लिए संभव न था। बाद में यह चुंगी बंद की गयी। वही आदेश आरंभ में ही आ गया होता तो लोग आतंकित न होते और जाम की स्थिति न बनती।

(3) 5 सौ, 2 हजार के नोटों के साथ 1 हजार के नोट को भी बैंको को मिले होते तो अच्छा होता। 1 हजार का नोट तो सरकार लाने वाली ही है। पहले ही ले आती तो जहां 2 हजार को छुट्टा करने के लिए 4 पांच-पांच सौ के नोट चाहिए वहीं केवल 2 एक-एक हजार के नोटों की जरूरत होती।

(4) निजी अस्पतालों जैसी संस्थाओं को भी पुराने नोट स्वीकारने की अनुमति दी गयी होती तो लोगों को राहत रहती। बहुत से लोग अस्पतालों के खर्चे को लेकर परेशान रहे।

आलोचनाओं का दौर

अस्तु जो होना था हो चुका है। किसी योजना के कार्यान्वयन में भूल-चूक हो ही सकती है। उतने भर से योजना को निरर्थक नहीं कहा जा सकता।

टीवी चैनलों पर जो देखने-सुनने को मुझे मिला उससे यही लगा कि अधिकांश आम जनों ने सरकार के इस कदम को अच्छा कदम बताया। यह भी सभी ने स्वीकारा कि दो-चार दिनों की परेशानी अवश्य सबको हो रही है। कुछ की परेशानी अवश्य ही गंभीर रही और अभी है। अस्पतालों में भर्ती मरीजों के लिए और शादी-व्याह की तैयारी में जुटे लोगों को बेहद परेशानी हो रही है यह भुक्तभोगी कहते हुए सुने जा रहे हैं। योजना की सही जानकारी न होने के कारण किसी ने दम तोड़ दिया या आत्महत्या कर ली ऐसी पीड़ाप्रद खबरें भी सुनने को मिल रही हैं।

जनसामान्य से हटकर जिस प्रकार की आलोचनाएं विपक्षी राजनेताओं की हैं वह मुझे हैरान करती है:

माननीय मुलायम जी चाहते थे कि नोटों का प्रचलन बंद होने की बात हफ़्ता भर पहले बता देना चाहिए था ताकि लोग अपना इंतजाम कर सके होते। इंतजाम ही न कर पाते इसी के लिए तो 6 माह से चल रही कवायद को गुप्त रखा गया था यह बात उनकी समझ में नहीं आ रही।

बहन मायावती जी क्या बोल रहीं है यह शायद वह स्वयं नहीं जानतीं। कहती हैं भाजपा ने सौ सालों का इंतिजाम कर लेने के बाद दूसरों को परेशानी में डालने के लिए ऐसा कदम उठाया है। वह क्या यह भी समझती हैं कि सौ साल के इंतिजाम का मतलब क्या है? क्या कोई ऐसी व्यवस्था कर सकता है? क्या वह बता सकती हैं उन्हें यह बात कब और कैसे पता चलीं? क्यों नहीं उन्हेंने समय पर भंडाफोड़ किया योजना का और भाजपा के इरादों का? राष्ट्रीय स्तर की राजनेत्री होते हुए उन्हें अनर्गल प्रलाप नहीं करना चाहिए।

केजरीवाल जी के कहने ही क्या! वे सोचते हैं कि मोदी न होते तो वही देश के प्रधानमंत्री होते। बस मोदी जी ही उनकी राह के रोड़ा हैं। उनकी लड़ाई बस मोदी और केवल मोदी से है। इसलिए उन्हें रात-दिन सोते-जागते केवल मोदी की ही बातें सूझती हैं। वे कहते कि तीन माह पहले भाजपा के लोगों का कालाधन ठिकाने लगा दिया गया और उसके बाद दूसरों की परेशानी बना यह योजना सामने लाई गयी। सितंबर तक बैंकों में करोड़ों जमा इसीलिए हुए। वे यह भूल गये कि पैसा जमा करने की योजना तो सरकार सबके लिए थी केवल भाजपा के लोगों के लिए नहीं थी। आगे क्या होगा यह केजरी जी भी नहीं जानते होंगे। लगता है मायावती जी की तरह क्या हो रहा है यह उन्हें भी मालूम था, फिर भी वे इस दौरान चुप्पी साधे रहे। आश्चर्य है।

श्री राहुल गांधी को “पप्पू” की उपाधि ऐसे ही नहीं मिली है। पुराने नोट बदलवाने में कितनी परेशानी “गरीब” लोगों को हो रही है इसका वे बखान नहीं कर पा रहे। लोगों की इस परेशानी में शरीक होने के लिए वे भी बैंक पहुंच गये। वे यह भूल गये कि उनकी सुरक्षा में लगे कर्मी जनता की परेशानी में इजाफा ही कर रहे होंगे। गरीबों को परेशानी तो पग-पग पर होती है, वे कहां-कहां पहुंचते हैं पता नहीं।

इधर सुश्री ममता बनर्जी ने भी अपनी भड़ास निकाली है। वे कहती हैं कि यह योजना गरीबों के विरुद्ध है। लोगों की रोजी-रोटी खत्म हो गयी है, कामधंधे चौपट हो रहे हैं, इत्यादि-इत्यादि।

     उक्त राजनेता तथा अन्य नेता सब मुहिम को गरीब विरोधी मान रहे है। गरीबॊ को होने वाली अड़चन के लिए सब चिंतित है। इस देश में है कोई राजनेता जो गरीबों की चिंता न करता हो। गरीबों की चिंता में वे कितने दुबला रहे हैं यह तो इन लोगों की काया से स्पष्ट जाता है। ये गरीब ही तो हैं जिन पर इनके और इनके दलों का अस्तित्व टिका है। गरीब न हों तो यह किसकी सेवा करेंगे? इसलिए जय गरीब, जय गरीबी। गरीबी, तू कभी छोड़ के न जाना।

     गरीबों की चिंता करने वाले ये नेता बता सकते हैं कि गरेबओं के बच्चों के लिए बने सरकारी स्कूलों की दशा क्या है? अस्पतालों में उनका इलाज डाक्टर करता है या अन्य कर्मी? गरीबों के साथ इन नेताओं के अधीन पुलिस का क्या व्यवहार होता है यह इनको पता है क्या? रेलगाड़ियों के जनरल डिब्बी में वे कैसे ठुंसे रहते हैं इस बात सुध ली कभी इन्होंने? ऐसे तमाम सवालों का इनके पास है कोई जवाब?

इस बार परेशानी इन नेताओं को हो रही है और बहाना कर रहे हैं गरीबों की दिक्कतों का। वाह!

अपने देश में विपक्ष एक ही बात पर जोर देता है: “हम विपक्षी हैं। हमारा कर्तव्य है कि पक्ष जो कहे-करे उसे कोसते फिरें। हम विकल्पों की बात नहीं करेंगे।”

     अपने-अपने दल के शीर्षस्थ ये नेता स्वयं कालेधन के विरुद्ध क्या कदम उठाते अगर उनको यह मौका मिलता इस सवाल का जवाब कोई नहीं देना चाहेगा, क्योंकि उनकी कोई योजना ही नहीं। लगता है वे यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं।

     राहुल जी को इस विषय में कुछ नहीं कहना चाहिए, क्योंकि आजतक उन्हीं की पार्टी सरकार चला रही थी। – योगेन्द्र जोशी