इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के साथ छेड़छाड़। क्या वाकई छेड़छाड़ हो सकती है?

 

 

 

फ़रवरी-मार्च, 2017, के राज्यस्तरीय चुनाव

विगत फरवरी-मार्च में संपन्न हुए पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा को अच्छी कामयाबी मिली थी खास तौर पर उत्तर प्रदेश में। इस राज्य में उसे उम्मीद से कहीं अधिक विधानसभा सीटें मिलीं और सपा-कांग्रेस गठबंधन तथा बसपा को बहुत कम। बसपा तो उम्मीद लगाये बैठी थी कि इस बार वही सत्ता पर काबिज होगी। अपनी करारी हार से तिलमिलाई बसपा ने तुरंत ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को अपनी हार के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। मायावतीजी ने दावा किया कि भाजपा ने ईवीएम के साथ छेड़खानी करके/करवाके सीटें पाई हैं।

उधर पंजाब में “आआपा” (आप) के संयोजक केजरीवालजी आश्वस्त थे कि सत्ता तो उन्हीं के हाथ में आनी है। दुर्भाग्य से कांग्रेस के मुकाबिले वे कहीं के नहीं रहे। कांग्रेस अच्छे-खासे बहुमत के साथ सरकार बना गयी। केजरीवालजी ने भी ईवीएम के साथ छेड़खानी की बात कह दी और भाजपा को जिम्मेदार ठहराया। उनका तर्क या कुतर्क सुनिए: “भाजपा ने कांग्रेस को जिताया, क्योंकि वे स्वयं जीतते तो उनकी पोल खुल जाती। उन्होंने हमको हराने के लिए कांग्रेस को जिताया। वे हमको राजनीति से खत्म करना चाहते हैं, क्योंकि उनको असली खतरा हम से है।”

उत्तर प्रदेश की सपा ने भी अच्छा मौका देखा और “काम बोलता है के नारे से जनता को मूर्ख बना रहे” अखिलेश भैया ने भी बेचारी ईवीएम पर सारा दोष मढ़ दिया।

बेचारी ईवीएम! – छेड़खानी की शिकार?

ध्यान दें कि भाजपा (गठबंधन) की जीत उत्तर प्रदेश में ही अप्रत्याशित थी। उत्तराखंड में जीतना अप्रत्याशित नहीं था। पंजाब में तो उसका गठबंधन आआपा (आप) से भी पीछे रहा। गोवा तथा मणिपुर में तो वह कांग्रेस से पीछे रही: यह अलग बात है कि इन जगहों पर वह सरकार बनाने में सफल रही।

छेड़खानी की बात केवल उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, एवं पंजाब के संदर्भ में की गई है। भाजपा ने कथित ईवीएम-छेड़खानी वहां क्यों नहीं की इसका उत्तर देने की विपक्षियों ने चिंता नहीं की ! छेड़खानी के विषय पर अधिक जानकारी इंटरनेट स्रोतों से मिल सकती है। उदाहरार्थ मायावतीजी के आरोपकेजरीवालजी की बातेंअखिलेश भैया की शंका और निर्वाचन आयोग की सफाई संबधित लिंकों से यहां प्राप्य हैं।

अब जो बहस मीडिया में, राजनीतिक दलों के बीच, उच्चतम न्यायालय में, और राष्ट्रपति महोद्य तक पहुंची है वह है कि ईवीएम भरोसेमंद नहीं हैं और हमें कागजी मतपत्रों पर लौट आना चाहिए। खैर, वर्षों पहले सकारण छोड़े जा चुके मतपत्रों के प्रयोग पर क्या लौट जाना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर निर्वाचन के विभिन्न पहलुओं पर निर्भर करता है। इस विषय पर मैं कोई राय व्यक्त नहीं कर रहा हूं। मैं तो यहां मशीनों के साथ संभव छेड़खानी के विषय में कुछ कहना चाहता हूं।

आरंभिक टिप्पणी

मैं फिजिक्स एवं कंप्यूटर-विज्ञान का विश्वविद्यालयीय शिक्षक रह चुका हूं और आधुनिक अंकीय तकनीकी (digital technology) से वाकिफ़ हूं। इसलिए वस्तुनिष्ठ संभावनाओं की बात कर सकता हूं। कौन जीत रहा है और कौन नहीं से मेरा कोई सरोकार नहीं। दरअसल मैं तो नोटा (NOTA) का पक्षधर हूं, और पिछले 15-20 वर्षों से किसी भी दल को मत नहीं दे रहा; वोट डालता जरूर हूं।

आरंभ में ही यह बता देना आवश्यक है कि मनुष्य की बनाई ऐसी कोई मशीन/युक्ति नहीं है जिसके साथ छेड़छाड़ न हो सके। उसके लिए बस कुछ शर्तें हैं:

(1) छेड़छाड़ करने या उससे मन-माफ़िक काम लेने का इरादा हो।

(2) इच्छुक व्यक्ति या उसके मददगार को मशीन की कार्यप्रणाली की समुचित जानकारी हो।

(3) व्यक्ति/मददगार को वांछित अवसर तथा संसाधन उपलब्ध हों।

(1) छेड़छाड़ का इरादा

जहां तक इरादे का सवाल है ऐसा इरादा भारतीय राजनेता रखते हों तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा। जिस देश में येनकेन प्रकारेण सत्ता हथियाने की होड़ मची हो, राजनेता बरसाती मेढकों की भांति दलों के बीच फुदकते हों, सिद्धांतहीन एवं बेमेल गठबंधनों से परहेज न हो, धर्म-जाति आदि की भावनाएं भड़काकर वोट बटोरें जायें, चुनाव में सफलता पाने हेतु मतदाताओं को पैसा, साड़ी आदि बांटने से परहेज न हो, वहां नेताओं का क्या भरोसा?

किंतु निर्वाचन आयोग (इलेक्शन कमिशन) भी किसी दल/विशेष के पक्ष में ऐसा इरादा रखता होगा इस बात में मुझे यक़ीन नहीं होता है। मेरा मानना है कि पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त शेषन के कार्यकाल के बाद आयोग अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहा है। वह भाजपा या अन्य दल के दबाव में आकर ऐसा अनर्थ करेगा मैं नहीं मानता, भले ही मायावतीजी तथा केजरीवालजी ऐसा कहते हों।

मेरी जानकारी में ये मशीनें (ईवीएम) निर्वाचन आयोग की संपदा हैं। इनकी खरीद-फरोख्त, उपयोग, रखरखाव तथा सुरक्षा आदि की जिम्मेदारी पूरी तरह से आयोग की होती है। सरकारें उसके द्वारा मांगी गई मदद तो पूरी करती हैं, किंतु आयोग से बाहर के तकनीकी जानकार की पंहुच मशीनों तक नहीं हो सकती जब तक आयोग न चाहे। मतलब यह है कि मशीनों से छेड़छाड़ बिना आयोग की सांठगांठ के संभव नहीं।

तो क्या आयोग ने बीते मार्च के चुनाओं में दल-विशेष (उत्तर प्रदेश एवं उत्तरखंड में भाजपा एवं पंजाब में कांग्रेस) के पक्ष में इन मशीनों के साथ छेड़छाड़ की थी? समाचार माध्यमों के अनुसार केजरीवालजी तो यही दावा करते हैं और मायावतीजी तथा अन्य नेता अप्रत्यक्ष रूप में आयोग पर यही आरोप लगा रहे हैं। यदि आयोग स्वयं इतना गिर चुका है तो किसी भी चुनाव क्या भरोसा?

कितने देशवासी होंगे जो आयोग को कटघरे में खड़ा करना चाहेंगे? व्यक्तिगत तौर पर मैं किसी भी नेता की तुलना में आयोग पर भरोसा करूंगा !

वोटिंग मशीनों की सुरक्षा आयोग की जिम्मेदारी है, लेकिन उसे स्थानीय प्रशासन के सहयोग की आवश्यकता होती है, जो चुनाओं के दौरान उसी के नियंत्रण में रहता है। फिर भी हो सकता है कि कहीं-कहीं प्रशासन मशीनों के साथ खिलवाड़ करे। लेकिन ऐसा लगभग हर निर्वाचन क्षेत्र में हुआ होगा और जानकार लोगों से तकनीकी मदद मिली होगी ऐसा मुझे नहीं लगता। अगर ऐसा है तो प्रादेशिक प्रशासन पूर्णतः भ्रष्ट माना जाएगा। क्या ऐसा हुआ होगा?

(2) डिजिटल डिवाइसेज़ (अंकीय युक्तियां)

किसी अंकीय (digital) युक्ति या मशीन को खराब करने लिए विशेषज्ञता की जरूरत नहीं। परंतु उससे जोड़तोड़ करके मनमाफिक काम लेना उसी व्यक्ति के लिए संभव है जो उसकी कार्यप्रणाली और उसके कलपुर्जों की भूमिका से भलीभांति परिचित हो। अतः ईवीएम से छेड़खानी किसी सिद्धहस्त व्यक्ति के बिना संभव नहीं।

किसी घटना के होने की सैद्धांतिक संभावना एक बात है और उसका वास्तविकता के धरातल पर घटित हो ही जाना नितांत दूसरी बात है।

इस विषय पर मैंने एक लेख 20 मार्च के अपने अन्य ब्लॉग में प्रस्तुत किया है।

(3) ईवीएम के साथ कैसे होगी छेड़छाड़?

अब आइए मुद्दे के तीसरे और असली पह्लू पर। अर्थात् ईवीएम के साथ छेड़खानी करने के अवसर और उसके लिए आवश्यक सामग्री/संसाधन।

मैंने ईवीएम के तकनीकी पक्ष की संक्षिप्त जानकारी पाने के लिए इंटरनेट स्रोतों को खंगाला। उदाहरण के तौर पर दो स्रोतों का उल्लेख कर रहा हूं: (1) विकीपीडिया (wikipedia) एवं (2) गिज़मोडो (gizmodo), जिनसे मिली जानकारी मुझे भरोसेमंद लगती है।

निम्नलिखित बिंदुओं पर गौर करें:

(क) ईवीएम मशीन

संक्षेप में यह बता दूं कि ईवीएम के दो घटक या इकाइयां होती हैं: (1) नियंत्रण इकाई (control unit), और (2) मतदान इकाई (balloting unit)। पहली इकाई मतदान अधिकारी के नियंत्रण में होती है और दूसरी इकाई से 15-20 फ़ुट लंबे केबल (तार) द्वारा जुड़ी होती है। इसी केबल के माध्यम से दोनों इकाइयों के बीच संकेतों का आदान-प्रदान होता है। मतदाता द्वारा दूसरी इकाई पर चुने गए बटन के अनुसार समुचित संकेत पहली इकाई को प्राप्त होता है और वह डाले गये मतों को अंकीय आंकड़ों के रूप में नियंत्रण इकाई की स्मृति (memory) में सुरक्षित (संचित, saved) रखता है। मतदान की समाप्ति पर अधिकारी उसे “स्विच-ऑफ़” करके मुहरबंद यानी सील कर देता है।

(ख) EPROM (ईप्रॉम) एवं EEPROM (ईईप्रॉम)

मेरी जानकारी के अनुसार इन मशीनों में सूचना-भंडारण (information storage) के लिए (1) ईप्रॉम (EPROM = Erasable Programmable Read-Only Memory), या (2)  ईईप्रॉम (EEPROM = Electrically Erasable Programmable Read-Only Memory) स्मृति-चिपों का प्रयोग होता है। इन चिपों में भंडारित जानकारी तब तक सुरक्षित रहती है जब तक कि उसे (1) पराबैंगनी विकिरण (ultraviolet radiation) द्वारा मिटाया न जाए (EPROM); या (2) उसके साथ संगति रखने वाले किसी डिजिटल युक्ति (digital device compatible with the memory chip) के द्वारा उसे मिटाया न जाए (EEPROM)। यह कार्य केवल जानकार व्यक्ति ही कर सकता है और वह भी तब जब उसे अवसर मिले। स्मृति-चिपों में भंडारित सूचना में मनमाफिक परिवर्तन करना संभव तो है किंतु आसान नहीं। इन तक पहुंच होनी चाहिए, वह कैसे होगी? चूंकि मतदान के बाद ईवीएम को “स्विच-ऑफ” कर दिया जाता है और उसे केवल मत-गणना के समय ही “स्विच-ऑन” किया जाता है, अत: ऐसा अवसर मिल नहीं सकता। हां, सुरक्षाकर्मी ही लापरवाही बरतें तो बात अलग है।

(ग) रिमोट कंट्रोल

किसी मशीन में संचित सूचना को दूरस्थ संकेतन (remote signalling) द्वारा भी मनमाफिक बदला जा सकता है। लेकिन ऐसा करने के लिए उसे सक्रिय (active) अथवा तैयारी-अवस्था (standby mode) में होना चाहिए। इन अवस्थाओं में वह बाहर से रेडियोवेव (radio wave), माइक्रोवेव (microwave), अथवा प्रकाश-विद्युत (electro-optical) आदि सकेतन विधियों (signalling methods) के द्वारा सूचना-विनिमय (information exchange) के लिए तैयार हो सकता है। किंतु तब उसकी “पावर सप्लाइ ऑन” रहनी चाहिए। मेरी जानकारी में ईवीएम में दूरस्थ संकेतन की कोई व्यवस्था नहीं होती है। यानी ब्ल्यूटूथ  तकनीकी (bluetooth technique) अथवा इंटरनेट संकेतों (internet signals) सरीखे माध्यमों से उसमें संचित सूचना के साथ छेड़छाड़ संभव नहीं। अगर ऐसी संकेतन विधि होती तो भी वह निरुपयोगी हो जाती, क्योंकि मतदान के बाद इन मशीनों को “स्विच-ऑफ” कर दिया जाता है। मोबाइल फोन इस्तेमाल करने और    टीवी देखने वाले भी इस बात को समझते हैं कि टेलिविज़न स्विच-ऑफ करने के बाद रिमोट कंट्रोल निष्प्रभावी हो जाता है।

(घ) एलेक्ट्रॉनिक चिप पर गुप्त कूट

“आप” संयोजक केजरीवालजी का कहना है कि वे इंजीनियरिंग डिग्री-धारक हैं (आईआईटी, खड़कपुर)। इसीलिए वे वोटिंग मशीनों के साथ छेड़छाड का दावा बेझिझक करते हैं। सभी डिजिटल मशीनों के साथ छेड़छाड़ की जा सक्ती है यह मैं भी मानता हूं, किंतु कैसे, कब, किसके द्वारा, आदि प्रश्नों के उत्तर इतने आसान नहीं। इंजीनियरिंग डिग्री होना पर्याप्त नहीं, संबंधित मशीन (ईवीएम) की कार्यप्रणाली का व्यावहारिक ज्ञान/अनुभव होना जरूरी है, जो उन्हें होगा नहीं, क्योंकि वे इंजीनियरिंग व्यवसाय में शायद कभी नहीं रहे । उनकी शंका का समाधान जरूरी है।

केजरीवालजी कहते हैं कि वोटिंग मशीन बनाने में इस्तेमाल किए गए डिजिटल चिप्स (digital chips) में दल-विशेष के पक्ष में मतों की संख्या बढ़ाने हेतु गुप्त कूट (secret codes) इरादातन डाले गये हैं। उनके अनुसार वोटिंग मशीनों की प्रचालन तंत्र (प्रणाली, operating system) इन कूट-संकेतों का प्रयोग करते हुए किसी एक प्रत्याशी के पक्ष में डाले गए मत को पहले से चुने गए किसी अन्य के खाते में स्थानांतरित कर सकती हैं। इसे उदाहरण से समझिए: 8वें क्रम का बटन दबाने पर वोट 8वें प्रत्याशी को मिले वोटों में जोड़ने के बजाय मशीन का सॉफ्टवेयर 5वें प्रत्याशी के मतों में जोड़ रहा हो। यह भी संभव है कि बीच-बीच में कुछ वोट 8वें के नाम पर ही सही दर्ज हो रहे हों। कदाचित ऐसा ही किसी अन्य – जैसे तीसरे क्रम वाले प्रत्याशी – के मामले में भी हो रहा हो। संभावनाएं कई तरीके की हो सकती हैं। कुल मिलाकर उक्त उदाहरण में 5वें को मिले वोट अधिक दर्ज हो रहे हों और दूसरों को उतने का घाटा हो रहा हो। मशीन के साथ ऐसी छेड़छाड़ गुप्त कूटों के प्रयोग से हो रही होगी।

पाठकों का ध्यान मैं इस बात की ओर खींचता हूं कि चिप-निर्माता कंपनियां अकेली एक अनूठी चिप नहीं बनाते। दरअसल एक जैसी चिपें हजारों/लाखों की संख्या में बाजार में उतारी जाती हैं। मतलब यह है कि सभी वोटिंग मशीनों में एक जैसी चिपें प्रयुक्त होती हैं, और यदि उनमें कोई गुप्त कूट हो तो वह सभी मशीनों पर एक ही प्रकार से कार्य करेगा। यह अवश्य संभव है कि मशीनों पर सक्रिय प्रचालन तंत्र (operating system/software) अलग-अलग मशीनों पर अलग-अलग हेराफेरी के लिए ढाला गया हो। अर्थात कोई ईवीएम 8वें बटन के वोट को 5वें में दर्ज करे तो कोई दूसरी मशीन उसे 9वीं पर दर्ज करे। साफ जाहिर है कि किसी दल विशेष के पक्ष में धांधली करनी हो तो यह पहले से मालूम होना चाहिए कि उसके प्रत्याशी के लिए निर्धारित बटन ईवीएम पर कौन-सा है। तब छेड़खानी करने वाला मशीन के प्रचालन तंत्र को उसी के अनुरूप निर्देश देकर चाहा गया मकसद पूरा कर सकता है।

यहां एक गंभीर शंका उठाई जा सकती है, जिसका संतोषप्रद समाधान केजरीवालजी के पास नहीं होगा। हर निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों की सूची एक जैसी नहीं होती है। दरअसल सूची के शीर्ष पर राष्ट्रीय दलों (AITC, BJP, BSP, CPI, CPI-M, INC, NCP) के प्रत्याशियों के नाम होते हैं, तत्पश्चात् प्रादेशिक (क्षेत्रीय) दलों के, फिर अन्य दलों के और अंत में स्वतंत्र प्रत्याशीगण। इन चारों में से प्रत्येक श्रेणी में प्रत्याशियों के नाम वर्णक्रमानुसार (alphabetically) सूचीबद्ध रहते हैं। चूंकि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में प्रत्याशियों के नाम अलग-अलग होते हैं इसलिए किसी खास दल के सभी प्रत्याशी पूरे देश/प्रदेश में एक ही सुनिश्चित क्रम पर हों ऐसा विरल संयोग संभव नहीं। तात्पर्य यह है कि कांग्रेसी (INC) प्रत्याशी (उदाहरणार्थ) यदि एक क्षेत्र में छठे क्रम पर हो तो दूसरे क्षेत्र में तीसरे या चौथे आदि पर हो सकता है। इसलिए कांग्रेस प्रत्याशी के वोट किसी और को मिलें, अथवा दूसरों के वोट काग्रेस को मिलें ऐसी छेड़खानी ईवीएम के साथ तब तक संभव नहीं जब तक प्रत्याशियों की सूची को अंतिम रूप न दे दिया गया हो। यह सब कहने का तात्पर्य है कि विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों की मशीनों के साथ अलग-अलग हेराफेरी करना होगी और वह भी जानकार व्यक्ति द्वारा।

निष्कर्ष यह है कि चिप पर संचित एक ही गुप्त कूट अथवा एक ही ऑपरेटिंग सिस्टम वाले मशीनों से अलग-अलग परिणाम मिलें ऐसी छेड़खानी संभव नहीं।

ईवीएम या मतपत्र (ballot paper) पर प्रत्याशियों के नामों के क्रम के बारे में जानकारी इंडियन एक्सप्रेस के लेख अथवा “कोरा” (quora.com) वेब-साइट पर से मिल सकती है।

(ङ) वीवीपीएटी (Voter Verified Paper Audit Trail) मशीन

पिछले चुनावों मे चुनाव आयोग ने कुछ मतदान केंद्रों पर वीवीपीएटी (VVPAT) मशीनों का भी प्रयोग किया था जिसका मुझे भी अनुभव हुआ। चूंकि मैंने नोटा (NOTA, ईवीएम पर अंतिम) बटन दबाया था, इसलिए मुझे मशीन पर संबंधित पर्ची 2-3 सेकंड के लिए देखने को मिली जो तुरंत ही एक संग्रह-डिब्बे में चली गई।

वीवीपीएटी के प्रयोग से मतदाता को तसल्ली हो जाती है कि उसका मत चुने हुए प्रत्याशी के पक्ष में ही पड़ा है। इनका असल सार्थक उपयोग तभी हो सकता है जब ईवीएम द्वारा प्रदर्शित वोटों और वीवीपीएटी की पर्चियों का मिलान वोटों की गिनती के समय किया जाये। लेकिन इनके इस्तेमाल से यह सिद्ध नहीं होता कि ईवीएम के साथ छेड़खानी नहीं हुई है। मेरा यह कथन इस संभावना पर आधारित है कि ईवीएम का ऑपरेटिंग सिस्टम बैलटिंग इकाई से प्राप्त जानकारी वीवीपीएटी तक तो सही-सही पहुंचाए, और उसके बाद वोटों में हेराफ़ेरी करे। ऐसा प्रोग्राम जानकार व्यक्ति लिख ही सकता है।

अंत में – कुंठाजनित  तर्क

दुनिया के अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस आदि सरीखे तकनीकी तौर पर विकसित देशों में ईवीएम इस्तेमाल नहीं होते हैं तो हमारे यहां क्यों इस्तेमाल हो रहे हैं यह सवाल आप पार्टी का निहायत बचकाना, तर्कहीन और हीनभावना का द्योतक है। क्या वे देश हमारे लिए मानक तय करेंगे? हमें अपने विचारों एवं जरूरतों के अनुसार चलना चाहिए या उनकी नकल आंख मूंद के करनी चाहिए? क्या हमारे देश में परमाणु विस्फोट, मिसाइल विकास, उपग्रह-प्रक्षेपण, चंद्रयान आदि उनके अनुसार हुए हैं? जो भी हमने किया है, कर रहे हैं और करेंगे वह हमारी आवश्यकता एवं हमारे संसाधन तय करेंगे।

चुनावों में वोटिंग मशीनों का प्रयोग हमारी आवश्यकता थी और मेरी जानकारी में उसकी तकनीकी भी देश में ही विकसित हुई है; हम उसे क्यों न इस्तेमाल करें? अमेरिका उसे इस्तेमाल नहीं करता इसलिए हमें भी उससे परहेज करना चाहिए क्या? हमारे अपने स्वतंत्र निर्णय नहीं होने चाहिए क्या? वस्तुतः विदेश, विदेशी वस्तुएं, विदेशी विचार आज भी हमें श्रेष्ठतर लगते हैं। अवश्य ही हमें उन देशों से बहुत कुछ सीखना चाहिए किंतु सब कुछ नहीं। हम भी किसी क्षेत्र में प्रथम हो सकते हैं यह विचार मन में क्यों नही आने देते हैं? – योगेन्द्र जोशी

निर्वाचन आयोग की दोषपूर्ण कार्यशैली और दोहरे मतदान की संभावना

[इस आलेख में उल्लिखित चुनाव संबंधी अनुभव का कथा रूपांतर अन्यत्र प्रस्तुत किया गया है ।]

हाल में संपन्न लोकसभा चुनावों में वाराणसी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का विशेष महत्व रहा है, क्योंकि यहां से भाजपा के बहुचर्चित प्रत्याशी और देश के भावी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनाव लड़ रहे थे और उनको चुनौती दे रहे थे आप पार्टी के नवोदित राजनेता अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस के अजय राय, सपा के कैलाश चौरसिया, तथा बसपा के विजय जायसवाल । वैसे मैदान में कुल 42प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे थे जिनमें अधिकतर वे थे जिनका नाम पहले कभी न सुना गया था और न चुनाव के बाद ही सुना गया । अज्ञात श्रेणी के ऐसे प्रत्याशी चुनाव क्यों लड़ते होंगे यह मेरी समझ मैं कभी नहीं आया । ऐसे प्रत्याशियों का योगदान चुनाव प्रक्रिया को पेचीदा बनाने के अलावा कुछ भी रचनात्मक रहता होगा यह मैं नहीं सोच सकता । वाराणसी में प्रत्याशियों की इतनी बड़ी संख्या के लिए हर निर्वाचन स्थल पर तीन-तीन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की व्यवस्था करनी पड़ी थी । ज्ञातव्य है कि एक वोटिंग मशीन में केवल 16बटनों का प्रावधान रहता है । मैं समझता हूं कि  मतदाताओं को मशीन पर अपने मनपसंद प्रत्याशी का नाम/चुनाव-चिह्न खोजने में अवश्य दिक्कत हुई होगी ।

सुना जाता है कि चेन्नै में भी 42प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे । अवश्य ही ऐसे “फिजूल”के प्रत्याशी चुनाव की गंभीरता का सम्मान नहीं करते और संविधान द्वारा प्रदत्त चुनाव लड़ने की आजादी का मखौल उड़ाते हैं । आयोग और देश की विधायिका को चाहिए कि ऐसे प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने से रोके जाने का रास्ता खोजें, अथवा उन्हें गंभीरता बरतने के लिए प्रेरित करें ।

इस बार “वीआईपी”चुनाव क्षेत्र का रुतवा हासिल कर चुके वाराणसी का मैं तथा मेरी पत्नी दशकों से मतदाता हैं । हम दोनों लंबे अर्से से अपने मतदान का प्रयोग करते आ रहे हैं । पिछले बारह-तेरह वर्षों से मैंने किसी के भी पक्ष में मतदान न करने की नीति अपना रखी है । (पत्नी अपना निर्णय स्वतंत्र रूप से लेती हैं !) मेरा मानना है कि अपने लोकतंत्र में छा चुके तमाम दोषों के लिए अपनी मौजूदा राजनैतिक जमात ही जिम्मेदार है । आप कभी एक को तो कभी दूसरे को मत देकर चुने गए जनप्रतिनिधि तो बदल सकते हैं, किंतु राजनैतिक बिरादरी का स्वरूप नहीं बदल सकते हैं । इसलिए चाहे मोदी आवें, या राहुल अथवा केजरीवाल, वस्तुस्थिति उल्लेखनीय तरीके से बदलने वाली नहीं है । मैं आमूलचूल बदलाव का हिमायती हूं । मुझे “नोटा”बटन में ही उम्मीद दिखती है, इसलिए उसी को इस्तेमाल करता हूं । अब तो नोटा बटन है, पहले उसके बदले एक फार्म (फॉर्म 17ए आयोग के नियम 49-ओ के अंतर्गत) भरना होता था ।

दो-दो मतदाता सूचियां

चुनाव में भाग लेने के लिए मतदान केंद्र पर पहुंचने पर पता चला कि वहां दो परस्पर भिन्न मतदाता सूचियों के अनुसार मतदान हो रहा है । हमें यह देख हैरानी हुई कि एक तरफ इन सूचियों से कुछ मतदाताओं के नाम गायब थे तो दूसरी तरफ कुछ के नाम दोनों में ही मौजूद थे । मतदान की प्रक्रिया दो कमरों संपन्न की जा रही थी – पहले कमरे में एक सूची तो दूसरे में  अगली सूची के अनुसार । साफ जाहिर में कि कुछ मतदाता दो बार मत दे सकते थे, बशर्ते कि वे उंगली पर लगाए गये निशान को मिटा सकें । हम दोनों का ही नाम सही फोटो के साथ दोनों सूचियों में मौजूद थे ।

मैंने तो पहली सूची के अनुसार मत दे दिया, लेकिन मेरी पत्नी को यह कहकर संबंधित मतकर्मियों ने लौटा दिया कि वे कालोनी की मतदाता होती थीं लेकिन स्थान छोड़ देने के कारण अब वह मतदाता नहीं रहीं । इसके लिए उन्होंने “विलोपित”श्रेणी का जिक्र किया । खैर पत्नी महोदया लाइन में लगकर दूसरे कमरे में मतदान कर आईं जहां मैं भी जा सकता था ।

यह हमारी समझ से परे था कि क्यों मेरी पत्नी “विलोपित”हो गईं जब कि मैं “विलोपित”नहीं हुआ । इससे अधिक अहम सवाल यह है कि हूबहू एक ही विवरण के साथ दो सूचियां कैसे बनाई गई थीं और क्यों इस्तेमाल हो रही थीं । मैं स्वयं देख चुका था कि मुझसे संबंधित विवरण दोनों में एकसमान था ।

दोहरा मतदान

मैं कह चुका हूं कि एक ही मतदाता का नाम दो-दो सूचियों में मौजूद होने पर दोहरे मतदान की गुंजाइश बनती है । इस बात का एहसास मुझे दूसरे दिन एक युवक से भेंट होने पर हुआ । उसने मुझे बताया कि वह एक बार पहली सूची के अनुसार वोट डालकर घर लौटा; पपीते की चेप से उसने उंगली पर लगा निशान मिटाया; और फिर दूसरी सूची के अनुसार वोट डाल आया । यह भी बता दूं कि वह किसी और मतदान केंद्र का मतदाता था । इसका मतलब यह हुआ कि दो-दो (या अधिक?) सूचियों का प्रयोग कई मतदान केंद्रों पर हो रहा था ।

मुझे शंका है कि चुनाव उतने साफ-सुथरे नहीं होते है जितना दावा किया जाता है । कहीं मतदाताओं के नाम ही गायब रहते हैं तो कहीं दोहरा मतदान भी कुछ लोग कर लेते हैं । निर्वाचन आयोग को इस संदर्भ में गंभीर कदम उठाने की जरूरत है । – योगेन्द्र जोशी

चुनाव आयोग का राहुल गांधी से सवाल – क्या हो राहुल का जवाब

राहुल का इंदौर भाषण २०१३

 

 

बेचारे राहुल गांधी, कांग्रेस के स्टार प्रचारक और लगभग सर्वेसर्वा । बुलंदशहर के हालिया दंगों को लेकर उन्होंने जो उल्टासीधा बोल दिया वह अब उनके गले की हड्डी बन गया है । (देखें 29 अक्टूबर की पोस्टसमझ में नहीं आता कि उन्होंने जो कुछ कहा वह निहायत नादानी में कह दिया या सोचसमझकर । इस बात को शायद वह भी खुद ठीक से नहीं जानते होंगे । बस जोशोखरोश में मन में कुछ आया और बोल गए, आगा-पीछा देखे बिना ।

राहुल गांधी अभी राजनीति में कच्चे खिलाड़ी हैं । कांग्रेसजन तो उन्हीं को आगे करने में उतावले हैं, और उनकी नजर में वे ही प्रधानमंत्री पद के योग्यतम व्यक्ति हैं, क्योंकि वे जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के वंशज हैं और राजनीति में निपुणता उनको उनसे विरासत में मिली हैं । वे भूल जाते हैं धनसंपदा-जमीन-जायदाद तो कानूनन विरासत में मिलती है, लेकिन किसी विषय में महारत या नैपुण्य नहीं । खैर, होगी क्रांग्रेसजनों की भी कोई मजबूरी !

इन बातों पर लंबी बहस संभव है । मुझे अभी उसमें पड़ने की जरूरत नहीं है । मेरी चिंता तो इस बात को लेकर है कि चुनाव आयोग ने उनसे उनके उपरिकथित दंगों के संदर्भ में स्पष्टीकरण मांग डाला है, जिसका उत्तर वे अभी तक नहीं दे पाए और जिसके लिए उन्होंने हफ्ते भर की मोहलत और मांगी है । जो कहा उसके लिए वे कुछ ऐसी सफाई देना चाहेंगे कि उन्हें शर्मसार न होना पड़े । क्रांग्रेसजन तो अभी तक उनका बचाव करते ही आ रहे हैं । उनकी भी कुछ किरकिरी होनी लाजिमी है । इस मौके पर मेरे दिमाग में एक स्पष्टीकरण सूझ रहा है । काश! कि यह उन तक पहुंच जाए । यों उनके पास तो एक से एक धुरंधर कानूनी सलाहकार होंगे । उन्हीं की पार्टी में अनेकों हैं । फिर भी विधिवेत्ता कभी-कभी चूक कर जाते हैं, जैसे जेठमलानी आत्मविश्वास की अतिशयता में बापू आसाराम को बचाने के चक्कर में बिना किसी प्रमाण के उस नाबालिग को ही दिमागी तौर पर असंयत बता बैठे, जिसने आसाराम पर आरोप लगाए हैं । हां, तो मेरी सफाई कुछ यों है:

“मेरे पास एक आदमी आया था जिसका कहना था कि वह अमुक खुफिया एजेंसी में कार्यरत है । मैं झूठ नहीं बोलूगा; मैंने उस पर भरोसा कर लिया । मुझे लगा कि यह व्यक्ति मुझ तक यों ही नहीं पहुंच गया होगा । उस आदमी को मेरी उच्चतम श्रेणी की सुरक्षा व्यवस्था से गुजरना ही पड़ा होगा । सुरक्षाकर्मियों ने अवश्य ही उसके बारे में पूरी जांच की होगी और उसके दावे को सही पाया होगा । मैं खुद अपने से मिलने वालों की जांच कभी नहीं करता, सो इस बार भी वैसा करने की जरूरत नहीं थी । उस व्यक्ति ने मुझे जो बताया वह सब जगजाहिर है । उसने वह सब मुझे बताना चाहिए था या नहीं इसका ख्याल तो उसे रहा ही होगा । उसे तो अपने खुफिया तंत्र के सर्विस-रूल्स मालूम ही होंगे । उसने जो कुछ बताया वह क्यों बताया, जब इस सवाल पर मैंने गंभीरता से विचार किया तो यही समझ में आया कि दंगों के दुष्परिणामों की हकीकत देश की जनता के सामने आनी चाहिए । लोगों को जानने का हक है इसीलिए तो हम आर.टी.आई. कानून लाए थे । जब देश में कोई आंतकी घटना होती है तो उसे छिपाते नहीं हैं । उसकी चर्चा करते हैं और पाकिस्तानी आई.एस.आई. की भूमिका की बात करते हैं । ठीक उसी तर्ज पर मैंने वे बातें कहीं जिनकी सफाई मुझसे मांगी जा रही है । इसे यदि मेरी गलती मानी जाती है तो मैं इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं । अगर गलती उस खुफिया-कर्मी की है तो उसकी सफाई वही दे सकता है । और यदि वह व्यक्ति खुफियाकर्मी ही नहीं था तो गलती मेरे सुरक्षकर्मियों की है और वे ही उसकी सफाई दे सकते है ।”

जाहिर में कि पूरा मामला लंबीचौढ़ी जांच का बन जाता है । उसके लिए एक जांच कमिशन होना चाहिए जिसके नतीजे सालों में आएं । अंततः मामला रफादफा हो जाए । मेरी दिली तमन्ना है कि ऐसा ही हो ! – योगेन्द्र जोशी