2 अक्तूबर – महात्मा गांधी जयन्ती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस

गांधी एवं शास्त्री जयंती

आज गांधी जयन्ती है – 1969 में जन्मे महात्मा गांधी यानी बापू का 150वां जन्मदिन। इस दिन के साथ ही उनके जन्म का 150वां वर्ष आरंभ हो रहा है। संयोग से यही दिन देश के दूसरे प्रधान मंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन रहा है (जन्मवर्ष 1904)। किंतु २ अक्टूबर का सार्वजनिक अवकाश एवं उस दिन के तमाम कार्यक्रम बापू को ही केन्द्र में रखकर आयोजित होते रहे हैं। लगे हाथ शास्त्रीजी का भी जिक्र कर लिया जाता है और उनको श्रद्धांजली अर्पित की जाती है। गांधी जी के सम्मान में इस दिन को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया हुआ है।

केन्द्र सरकार ने इस 150वें वर्ष को सोद्देश्य तरीके से मनाने का कार्यक्रम बनाया है और इस कार्य हेतु एक कार्यकारिणी समिति का गठन किया है। देश के विभिन्न राज्यों की सरकारें और केन्द्र सरकार के विभिन्न महकमे इस वर्ष को अपने-अपने तरीके से मनाने के कार्यक्रम बना रहे हैं। उदाहरणार्थ रेलवे मंत्रालय इस मौके पर अपनी रेलगाड़ियों के डिब्बों में “स्वच्छ भारत” का प्रतीक (लोगो) प्रदर्शित करेगा। इसके अतिरिक्त मंत्रालय साफ-सफाई, अहिंसा, सामुदायिक सेवा, सांप्रदायिक सौहार्द्र, अस्पृश्यता-निवारण, तथा महिला-सशक्तिकरण का व्यापक स्तर पर संदेश अपनी गाड़ियों के माध्यम से देने की योजना बना रहा है। (देखें इकनॉमिक टाइम्ज़ की खबर)

गांधी जन्मदिन एवं जन्मवर्ष सरकारी स्तर पर कैसे बनाए जाएंगे इसकी विस्तृत जानकारी न मुझे है और न ही उसकी चर्चा करने का मेरा इरादा है। जन्मदिवस की सार्थकता क्या है और आम नागरिक उसको कितनी गंभीरता से लेते हैं मैं इस पर अपनी टिप्पणी पेश करना चाहता हूं।

दिवसों की बढ़ती संख्या

अगर आप 40-50 वर्ष पूर्व की बात करें तो पाएंगे कि विभिन्न प्रकार के दिवसों की संख्या तब इतनी नहीं थी जितनी आज है। समय के साथ नये-नये दिवस घोषित होते रहे हैं कुछ हमारे राष्ट्रीय दिवस जिनमें से कई तो “महापुरुषों” के जयंतियों के नाम पर हैं, और कुछ राष्ट्र संघ के द्वारा घोषित किए गए हैं। अपने देश से जुड़े दो अंतरराष्ट्रीय दिवस तो पिछले 11 वर्षों में अस्तित्व में आए हैं। ये हैं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस, 2 अक्टूबर, और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस, 21 जून, जो राष्ट्र संघ द्वारा क्रमशः 2007 तथा 2015 में घोषित किए गए।

मैं जब इन तमाम दिवसों के बारे में सोचता हूं तो मुझे हर किसी दिवस की सार्थकता नजर नहीं आती। वे सार्थक होंगे इस विचार से घोषित किए गए होंगे, लेकिन व्यवहार में वे सार्थक हो पाए हैं इसमें मुझे शंका है। कुछ दिवस तो पारंपरिक रूप से सदियों से मनाए जाते रहे हैं जो समाज के विभिन्न समुदायों (विशेषत: धर्म-आधारित) की आस्थाओं से जुड़े हैं और त्योहारों का रूप ले चुके हैं जैसे अपने देश में राम-नवमी, कृष्ण-जन्माष्टमी, महावीर जयंती एवं नानक जयंती आदि मनाए जाते हैं। ये दिवस कोई खास संदेश देने के लिए मनाए जाते हों ऐसा मैं नहीं समझता।

अपने देश में स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त), गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) एवं गांधी जयंती (2 अक्टूबर) राष्ट्रीय अवकाश एवं पर्व के तौर पर घोषित हैं। सैद्धांतिक तौर यह माना जाएगा कि ये दिवस मात्र छुट्टी मनाने और कुछएक रस्मी कार्यक्रमों के आयोजन तक सीमित नहीं हैं बल्कि ये नागरिकों को उनके कर्तव्य-निर्वाह का स्मरण कराते हैं। लेकिन क्या नागरिकवृंद उस संदेश पर ध्यान देते हैं और क्या उस संदेश के अनुसार चलने का प्रयास करते हैं। अवश्य ही इन अवसरों पर विभिन्न सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं में अनेकानेक आदर्शों की बात की जाती है और जनसमुदाय को अपने जीवन में उन्हें अपनाने का उपदेश दिया जाता है। मुझे लगता है कि आदर्शों की बात करना इन मौकों पर वक्ताओं के लिए विवशता होती है। वे स्वयं उन आदर्शों को – आंशिक तौर पर ही सही – अपनाने की इच्छा नहीं रखते इस बात को श्रोता भली भांति समझते हैं, और श्रोताओं की इस समझ को वक्ता भी जान रहा होता है। किंतु रस्मअदायगी चलती रहती है।

बतौर अहिंसा दिवस के गांधी जयंती की सार्थकता

यों तो गांधी दिवस इस देश में एक राष्ट्रीय अवकाश के तौर पर दशकों से मनाया जा रहा है और साथ में इस दिन की रस्मअदायगी भी चलती आ रही है। किंतु महात्मा गांधी के अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता वाले व्यक्तित्व के चलते इसका महत्व देश तक सीमित नहीं रह गया है। जब से इस दिन को राष्ट्र संघ द्वारा अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया गया है इसका महत्व इस देश के बाशिंदों के लिए खास तौर पर बढ़ गया है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जिस देश से गांधी जुड़े रहे यदि वहीं के लोग गांधी के विचारों को भुला दें तो बाहरियों के लिए हम कितने सम्माननीय रह सकते हैं?

मेरे मन में एक सवाल उठता है कि क्या गांधी दिवस के अहिंसा दिवस बन जाने से लोग अहिंसा-भाव के प्रति प्रेरित हो रहे हैं? यहां पर याद दिलाना चाहता हूं कि अहिंसा एवं सहिष्णुता एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं किंतु दोनों में घनिष्ठ संबंध है। जहां सहिष्णुता होगी, क्षमाशीलता होगी, दूसरों के प्रति संवेदना होगी, वहीं अहिंसा की भावना प्रबल होगी। किंतु जीवन के 70 वसंत पार करते-करते मैं यही अनुभव कर रहा हूं कि समय के साथ देश में असहिष्णुता बढ़ती गई है। दूसरों के प्रति अपराध करने के विचार प्रबल होते जा रहे हैं। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण तो संसद तथा विधानसभाओं में आपराधिक छवि के जन-प्रतिनिधियों की दिनबदिन बढ़ती संख्या है, जिस तथ्य को उच्चतम न्यायालय एवं निर्वाचन आयोग, दोनों, संज्ञान में ले चुके हैं, परंतु लोकतंत्र के पहरेदार हमारे नेता इसे महत्वहीन मानते आ रहे हैं। क्या यह सब गांधी के विचारों के अनुरूप है? तो कैसे मान लें कि लोकतंत्र के शासकीय पक्ष को चलाने वाले गांधी के विचारों के प्रति श्रद्धा रखते हैं।

क्या ऐसा नहीं लगता कि गांधी जयंती अपनी अहिंसा संबंधी अर्थवत्ता खोती जा रही है? क्या अहिंसा का विचार केवल मुख से बोले जाने वाले कथनों तक ही सीमित नहीं होता जा रहा है? मेरा मानना है देश में अहिंसा की भावना को महत्व न देने वाले नागरिकों की संख्या कम नहीं है। इसका जीता-जागता प्रमाण है आजकल अक्सर सुनने में आने वाली “मॉब-लिंचिंग” (भीड़-कृत हत्या) की घटनाएं। किसी बात पर किसी मनुष्य पर किसी ने छोटे-बड़े अपराध का शक जताया नहीं कि भीड़ इकट्ठी हो जाती है और “मारो-मारो” के नारे के साथ उस असहाय को मौत की सजा दे देती है। शक के घेरे में आया व्यक्ति अपराधी हो सकता है तो भी भीड़ अपना निर्णय सुना दे यह सर्वथा निंद्य और अन्यायपूर्ण माना जाएगा। ऐसे मौकों पर कोई एक या दो व्यक्ति विवेक खो बैठें तो समझ में आता है। लेकिन जब दो-चार नहीं बल्कि दर्जनों लोग उस कुकृत्य में जुट जाएं तो मैं यही कहूंगा कि पूरी भीड़ न अहिंसा को मानती है और न ही न्याय की व्यवस्था को सम्मान देती है। ऐसा हिंसक व्यवहार मॉब-लिंचिंग तक ही सीमित नहीं रहता है बल्कि पग-पग पर देखने को मिलता है। जब किसी महिला के साथ दुष्कर्म होता है तो वहां भी अन्य जन घटना को रोकने का प्रयास करने के बजाय उस कुकृत्य में भागीदार बन जाते हैं। कुकृत्यों के उदाहरण आपको देखने-सुनने को मिल जायेंगे। लगता है करुणा भाव एवं उदात्त वृत्ति कहीं तिरोहित हो चुके हैं।

गांधी जयंती और स्वच्छता अभियान

पिछले तीनएक सालों से प्रधानमंत्री मोदी ने एक और आयाम गांधी जयंती से जोड़ा है, और वह है स्वच्छता संदेश। उनकी स्वच्छता की बातें लोगों को भा गई हैं। । “स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत” का नारा भी प्रचलन में आ चुका है। फिर भी देखने में आ रहा है कि अनेक लोगों का स्वच्छता के प्रति रवैया कमोबेश अपरिवर्तित है। यह मैं अपने शहर वाराणसी (मोदी का निर्वाचन क्षेत्र) में महसूस कर रहा हूं। सड़क के किनारे मूत्रत्याग की लोगों की आदत जा नहीं रही है। कूड़ादान पांच कदम की दूरी पर हो तो वहां तक जाकर कूड़ा-कचरा फैंकने की जहमत कई लोग उठाना नहीं चाहते। सड़कों पर छुट्टा जानवर जहां-तहां घूमते दिख जाएंगे और उनके गोबर से सड़कें गंदी हो रही हैं। ये जानवर सड़क के किनारे रखे कूड़े के डिब्बों से कचरा सड़क पर आज भी यथावत फैलाते मिल जाते हैं। इस तथ्य के प्रति प्रशासन बेखबर बना रहता है। दरअसल स्थानीय प्रशासन “काम चल जा रहा है” की उदासीन भावना से कार्य करता है। उसमें समस्याओं को हल करने का उत्साह एवं संकल्प ही नहीं दिखता है। सफाई का भाव नागरिकों में भी आधा-अधूरा ही है। अपने घर-आंगन को वे साफ भले ही रखते हों, लेकिन आम सड़क को साफ-सुथरा रखने में अपना योगदान देने में दिलचस्पी नहीं रखते हैं।  – योगेन्द्र जोशी

 

 

वैश्विक तापन (ग्लोबल वॉर्मिंग) बनाम हवाई परिवहन को बढ़ा

दो-चार दिन पूर्व मुझे अपने हिन्दी अखबार में एक समाचार पढ़ने को मिला। उसकी कतरन (क्लिप) की आंकिक प्रति यहां प्रस्तुत है।

ऊपरी तौर पर इस खबर पर खुश हुआ जा सकता है। अब आप उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों के बीच हवाई सफ़र कर सकते हैं। बसों या (लेट-लतीफ) ट्रेनों से घंटों की यात्रा के बदले घंटे भर में यात्रा संपन्न कर सकते हैं (बशर्ते आप संपन्न व्यक्ति हों)। इस समाचार पर भला क्या टिप्पणी कि जा सकती है? यह जरूर ध्यान में रखें कि हवाई यात्रा के लिए हवाई अड्डे तक आने-जाने का वक्त अक्सर कई घंटे का होता है। बसों/रेलगाड़ियों को दौड़ते-भागते भी पकड़ सकते हैं किंतु जहाजों के लिए समयसाध्य औपचारिकताएं भी निभानी पड़ती हैं।

लेकिन मैं इस स्थल पर हवाई यात्रा के अन्य पहलू पर बात करना चाहता हूं। दरअसल मामला जलवायु परिवर्तन या उसके जुड़े वैश्विक तापन (ग्लोबल वॉर्मिंग) से संबंधित है। आजकल इस विषय पर मीडिया में बहुत-कुछ पढ़ने-सुनने को मिल रहा है। वैज्ञानिकगण, स्वयंसेवी संस्थाएं और दुनिया की कुछ सरकारें पिछले तीन-एक दशकों से इस विषय पर अपनी चिंताएं व्यक्त करती आ रही हैं। वैश्विक तापन को कैसे रोका जाए इस पर सभी देश समय-समय पर बैठकें करते आ रहे हैं। इस समस्या के लिए कोई व्यक्ति खास कुछ नहीं कर सकता। कायदे-कानून बनाना और उनका क्रियान्वयन करना अंततोगत्वा सरकारों का ही काम  होता है। अस्तु।

हवाई परिवहन को बढ़ावा देना वैश्विक तापन को नियंत्रित करने के उपायों के विरुद्ध जाता है। इसलिए मेरा मत है कि इसे प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। यह बात जरूर है इस तथ्य के बावजूद हवाई परिवहन दुनिया भर में बढ़ता जा रहा है। खुद अपने देश में हवाई सफर आम होता जा रहा है। एक समय था जब हवाई यात्रा की मात्र कामना ही लोग कर पाते थे और दो-दो तीन-तीन दिन ट्रेनों में बिता के अपने गंतव्य पर पहुंचते थे। तब हवाई सफ़र लोगों की आमदनी के हिसाब से बहुत महंगी होती थी। हवाए सेवाएं भी तब कम ही थीं। परंतु आजकल यह अपेक्षया सस्ती हो चुकी है। अब वाराणसी से बेंगलूरु ट्रेन से जाने के बदले हवाई जहाज से जाना बहुतों के लिए आम बात हो चुकी है।

परिवहन के अन्य साधनों की तुलना में हवाई परिवहन वैश्विक तापन बढ़ाने में कहीं अधिक प्रभावी है इस बात समझने के लिए वैश्विक तापन से मतलब क्या है यह जानना आवश्यक है। इस धरती पर मौजूद जीव-जंतुओं, वनस्पतियों, छोटे-बड़े प्राणियों के लिए पृथ्वी की सतह के ऊपर के वायुमंडल की करीब दसएक कि.मी. मोटी तह ही सीधे तौर पर अहमियत रखती है। इस तह का तापमान जीवधारियों को प्रत्यक्षतः प्रभावित करता है, जो किसी जगह दिन भर बदलता रहता है। एक दिन से दूसरे दिन, एक माह से दूसरे माह, भिन्न-भिन्न रहता है। हर वर्ष वस्तुस्थिति फिर-फिर से कमोवेश वैसी ही देखने को मिलती है। किसी स्थान के लिए वर्ष भर का औसत उस स्थान के जलवायु का एक परिचायक होता है। इस औसत वार्षिक तापमान में थोड़े-बहुत उतार चढ़ाव हम सदा से देखते आए हैं। लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि कुलमिलाकर दो-ढाई सदियों पूर्व यूरोपीय औद्योगिक क्रांति के बाद से यह औसत तापमान बढ़ता जा रहा है। कहा जा रहा है कि तब से अब तब करीब 1.8° सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है और यह बढ़ते जा रहा है।

मौसम विज्ञानियों के अनुसार बढ़ रहे इस तापमान का कारण वायुमंडल में वायुमंडल में विद्यमान कार्बन-डाईऑक्साइड गैस है। ग्रीनहाउस गैसों के नाम से पुकारी जाने वाली अन्य गैसें (मुख्यतः मीथेन, नाइट्रस-ऑक्साइड, ओजोन तथा जलवास्प) और ऐरोसोल भी वायुमंडल को गर्माने की क्षमता रखती हैं। (ऐरोसोल किसी पदार्थ के हवा में तैरते हुए अतिसूक्ष्म कणों – माइक्रोमीटर से छोटे आकार के – बने होते हैं, जिसके उदाहरण कोहरा, धुंआ, और अति महीन धूलकण हैं।) ये गैसें कैसे वायुमंडल को गर्म रखती हैं इस विषय की विवेचना यहां पर संभव नहीं। यहां बस इतना ही कहना काफी है कि इन सब की जितनी अधिक मात्रा वायुमंडल में बढ़ेगी तापमान बढ़ाने में वे उतने ही कारगर होंगे। अध्ययनों से पता चलता है कि कार्बन-डाईऑक्साइड गैस की वृद्धि जिस तेजी से हो रही है उसकी तुलना में अन्य सभी की नगण्य है। इसलिए इस गैस को ही वैश्विक तापन के लिए जिम्मेदार माना गया है।

सवाल पूछा जा सकता है कि वायुमंडल में उपर्युक्त कार्बन-डाईऑक्साइड प्रदूषण – संक्षेप में कार्बन प्रदूषण – बढ़ क्यों रहा है। इसका उत्तर सरल है: खनिज इंधनों के प्रयोग से। खनिज कोयला, पेट्रोल-डीजल आदि (पेट्रोलिअम इंधन), और भूगर्भ से प्राप्य गैस खनिज अथवा जीवाश्म इंधन कहे जाते हैं। इन इंधनों के जलने से हमें वह ऊर्जा प्राप्त होती है जिससे मोटर-वाहन, डीज़ल इंजन, हवाई जहाज, बिजली घर, इत्यादि चला करते हैं। जलने की इस प्रक्रिया में कार्बन-डाईऑक्साइड पैदा होती है जो वायुमंडल में घुल जाती है। जाहिर है जिस कार्य में अधिक इंधन जलेगा उससे उतना ही अधिक कार्बन प्रदूषण होगा।

अब लौटिए हवाई परिवहन की बात पर। विभिन्न माध्यमों द्वारा परिवहन पर प्रति यात्री प्रति कि.मी. कितना कार्बन-डाईऑक्साइड प्रदूषण (संक्षेप में कार्बन प्रदूषण) पैदा होता है इसका मोटा-माटी अंदाजा यूरोपीय देशों के लिए उपलब्ध अधोलिखित आंकड़ों के आधार पर लगाया जा सकता है:

माध्यम यात्री संख्या औसतन कार्बन प्रदूषण/यात्री/कि.मी.
रेलगाड़ी          156           14 ग्राम
छोटी कार            4           42 ग्राम
बड़ी कार            4           55 ग्राम
बस           12.7           68 ग्राम
मोटरबाइक            1.2           72 ग्राम
हवाई जहाज           88          285 ग्राम
समुद्री जहाज            –          245 ग्राम

इन सांख्यिक आंकड़ों को शब्दश: नहीं लिया जाना चाहिए। और भारत जैसे देश पर तो ये लागू भी नहीं हो सकते। हम जानते हैं कि अपने देश में रेलगाड़ियां हों या बसें, यात्री प्रायः ठूंसे ही रहते हैं। इसलिए प्रति व्यक्ति प्रदूषण यूरोप की तुलना में 5-10 गुना कम ही होगा। दूसरी ओर कारों से प्रदूषण कुछ अधिक ही होगा क्योंकि यहां सड़कें सपाट और गड्ढामुक्त नहीं होतीं। यह भी ध्यान दें कि यदि कार में अकेला व्यक्ति सवार हो तब प्रति व्यक्ति प्रदूषण की मात्रा 2-3 गुना अधिक होगी।

हवाई जहाज का मामला कुछ भिन्न है। आम तौर पर ये 90% तक यात्रियों से भरे ही रहते हैं चाहे भारत हो या यूरोप-अमेरिका। इसलिए भारत पर भी ये कमोबेश लागू होंगे। एक बात स्पष्ट कर दूं कि उक्त तालिका छोटे हवाई जहाजों और कम दूरी की उड़ान के लिए हैं। बड़े जहाजों की कार्यकुशलता अपेक्षया बेहतर होती है। यह भी ज्ञातव्य है कि लंबी उड़ानों पर खर्चा कम आता है। इसलिए लंबी दूरी के लिए संबंधित आंकड़ा 100 तक नीचे जा सकता है।

उक्त तालिका से स्पष्ट है कि अपने देश में रेलगाड़ी की तुलना में कम दूरी की हवाई यात्रा पर प्रति व्यक्ति प्रति कि.मी. प्रदूषण 20-30 गुना या उससे अधिक होता है। यह बात तो सुस्पष्ट है कि हवाई यात्रा किसी अन्य साधन की तुलना में काफी अधिक प्रदूषण पैदा करता है इसलिए यह जलवायु के लिए अधिक हानिकर है। अकेले व्यक्ति का कार से आवागमन भी हानिकर ही है। इसलिए इन्हें प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए।

इस समय सारे विश्व में बढ़ते वैश्विक तापन पर चिंता व्यक्त की जा रही है और उन उपायों की खोज की जा रही है जिससे प्रदूषण नहीं भी घटे तो कम से कम बढ़े तो नहीं। ऐसी दशा में हवाई परिवहन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए क्या, विशेषतः छोटी दूरियों के लिए? -योगेन्द्र जोशी

 

जाने कहां गये साइकिल के वो दिन … बनाम पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमत

जाने कहां गये वे दिन

सड़कों पर जब साइकिलें चलती थीं।

बच्चा हो या बूढ़ा या जवान

सबको साइकिलें प्यारी लगती थीं।

ठीक हाल में रहती थी हरदम

तभी स्कूल-कालेज पहुंचाती थीं।

अस्पताल जाना हो या ऑफिस

साइकिलें सबकी सवारी होती थीं।

पेट्रोल पंप पर लगे अब भीड़

तब हवा भराकर ही वो चलती थीं।

आयेंगे क्या लौट के वो दिन 

साइकिलें जब सड़क पर दिखती थीं।

पेट्रोल-डीज़ल – बढ़ती कीमतें

पिछले कुछ दिनों से पेट्रोल-डीज़ल के दाम प्रायः हर रोज बढ़ रहे हैं और देश की आम जनता बढ़ती कीमत से त्रस्त है। जिसको देखो वह इस मुद्दे पर मोदी सरकार की आलोचना कर रहा है। सरकार कहती कि अंताराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और देश की तेल कंपनियां उसी से मेल खाती कीमतें तय कर रही है। अब खबर यह है कि दाम कुछ घट रहे हैं  कहा यह भी जा रहा है कि यदि पेट्रोल-डीज़ल को भी जीएसटी (GST) के दायरे लाया जाए तो कीमत घट सकती हैं। किंतु इन पर जीएसटी लगाए जाने के पक्ष में कई राज्य नहीं, कारण कि वे इस पर लगे टैक्स से राज्य की कमाई करती हैं। कहा जाता है कि अपने देश में इन पर भांति-भांति के टैक्स भी बहुत हैं जिससे उनके दाम पहले से ही काफी रहे हैं।

जिस भी कारण से पेट्रोल-डीज़ल के मूल्य बढ़ रहे हों, उससे होनी वाली दिक्कत सभी महसूस कर रहे हैं। आज भौतिक प्रगति के उस मुक़ाम पर हम (मानव समाज) पहुंच चुके हैं जहां इन जीवास्म इंधनों के बिना जीवन सुचारु रूप से जीने की सोची नहीं जा सकती है। इन इंधनों पर हमारी निर्भरता समय के साथ कैसे बढ़ती गई है इस बात को समझने के लिए मैं पिछले करीब  46 वर्षों के  अपने निजी अनुभवों का जिक्र करता हूं।

निजी अनुभव

मैंने सन् 1972 में वाराणसी नगर के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) में बतौर एक शिक्षक के कार्य करना शुरू किया था। वे दिन थे जब इस नगर में पेट्रोल/डीज़ल-चालित वाहन आज की तुलना में नगण्य थे। जैसा मुझे अब याद है कि मेरे भौतिकी (फिज़िक्स) विभाग में कुल दो कारें (एक अंबेसेडर और दूसरी फ़िएट) करीब 40 शिक्षकों में से 2 के पास थीं। और शायद तीन या चार स्कूटर भी कुछ के पास थीं। विभाग में एक लेंब्रेटा, एक वेस्पा और एक फैंटाबुलस देखे की याद है मुझे। फैंटाबुलस स्कूटर का नाम कम ही लोगों ने सुना होगा और उसे कभी शायद देखा भी न हो। वह बाज़ार से बहुत पहले ही गायब हो गयी थी। अब तो स्कूटरों की जगह बाइकों ने ले ली है।

उस काल में स्कूटर खरीदना भी आसान नहीं था; कारण दो थे:

(1) पहला कारण यह कि उनकी कीमतें सामान्य संपन्नता वाले व्यक्ति के लिए भी हैसियत के बाहर होती थीं। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि तब मेरा मासिक वेतन लगभग 650 रुपये था जब कि स्कूटर की कीमत करीब 3000 रुपये होती थी। मतलब यह कि 5-6 महीने की कुल तनख्वाह बचाने पर ही मैं स्कूटर खरीद सकता था। आज विश्वविद्यालय का समकक्ष शिक्षक एक महीने के वेतन से ही बाइक/स्कूटी खरीद सकता है।

(2) दूसरा कारण वास्तव में अधिक गंभीर था। कारण यह था कि स्कूटरों-बाइकों-कारों का उत्पादन देश में बहुत कम था, शायद डेड़-दो लाख से अधिक नहीं। पैसा पास होने और शौक होने के वाबजूद लोगों को स्कूटर की उपलब्धता नहीं थी, कारों की तो बात ही छोड़िए।

वह काल था जब मेरे शहर वाराणसी में साइकिल अथवा रिक्शा से आवागमन होता था। शहर में सरकारी बस-सेवा भी उपलब्ध थी लेकिन ऑटोरिक्शा नहीं थे। जनसंख्या भी तब आज की तुलना में एक-तिहाई/एक-चौथाई रही होगी। वह समय था जब वाहनों द्वारा पैदा धूल-धुएं का प्रदूषण खास न था, न उनका शोर-शराबा था, और सड़कों पर न ही आज के जैसा जाम।

1970 के बाद माहौल बदला जिसके तहत कई प्रांतों में स्कूटरों का उत्पादन आरंभ हुआ, नीजी कंपनियों या सरकारी उद्यमों के द्वारा, जैसे उत्तर प्रदेश में तब ‘स्कूटर्ज़ इंडिया’ स्थापना हुई थी जो अब थ्री-व्हीलर वाहन बनाती है। मुझे याद आता है कि उसी दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी ने ‘मारुति’ कार का उद्योग स्थापित किया जो उनकी असामयिक मृत्यु के बाद ‘मारुति-सुजुकी’ उद्योग बना। सीमित संख्या में कारें, जैसे ‘अंबेसडर’, ‘फ़िएट, एवं शायद ‘स्टैंडर्ड’ देश में बन रही थीं, लेकिन उनकी संख्या इस विशाल देश के लिए ’अपर्याप्त’ थीं।

मेरा ख्याल है कि 1990 का दशक आते-आते देश में कार-निर्माण एवं बाइक-निर्माण उद्योग को बढ़ावा मिला। और सड़कों पर कारों-बाइकों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी।

सड़कों पर वाहनों की बढ़ती भीड़

आज स्थिति यह है कि मध्यम वर्ग के अधिकांश लोगों की आमदनी इतनी है कि वे कारें खरीद सकते हैं। इस हेतु बैंकों से भी आमदनी के अनुरूप आसान किस्तों में ऋण या कर्ज मिल जाता है। आज से 45-50 साल पहले तक कर्ज का जुगाड़ करना आसान नहीं था। लोगों की प्राथमिकताएं भी भिन्न थीं। लोग निजी मकान, बाल-बच्चों की पढ़ाई, उनकी शादी-ब्याह के लिए पैसे की बचत की अधिक सोचते थे। आजकल मध्यम वर्ग में परिवार छोटे हो गये हैं और शादी-ब्याह भी विलंब से होते हैं। प्राथमिकताएं भी बदल चुकी हैं। परिणाम यह है कि नयी पीढ़ी के युवा कार-बाइक की व्यवस्था की पहले सोचने लगे हैं और अन्य बातों की चिंता बाद करते हैं।

जहां तक बाइकों का सवाल है इसने साइकिलों की जगह ले ली है। अब समाज के अपेक्षया कमजोर तबके के लोगों के पास भी बाइक दिखने लगी है।

अमेरिका जैसे विकसित देशों में निजी वाहन एक आवश्यकता बन चुकी है। और हमारा देश भी उसी संस्कृति की ओर बढ़ रहा है। गौर करें कि अपने यहां प्रति व्यक्ति औसत आय अमेरिका की तुलना में 4-6 गुना कम है और पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें वहां से अधिक। फिर भी निजी वाहनों पर जोर अधिक है और सरकारें आर्थिक विकास पाने के चक्कर में लोगों को इस दिशा में ही प्रेरित कर रही हैं। वे साइकिलों के प्रयोग को बढ़ावा देने के बजाय बाइकों-कारों को प्रोत्साहित कर रही हैं। निजी वाहन यहां ‘झूठी’ सामाजिक प्रतिष्ठा के द्योतक बन चुके हैं।

आरंभ में मैंने अपने विश्वविद्यालयीय विभाग में कारों/स्कूटरों की नगण्य संख्या की बात कही थी। आज उस विभाग में प्रायः हर शिक्षक के पास कार है। शहर में भी धनाड्यों/नवधनाड्यों की संख्या बहुत बढ़ गई है। अतः सर्वत्र कारों की भीड़ नजर आती है। साइकिलों की जगह बाइकों ने ले ली है। जो लोग पहले साइकिलों से चलते थे वे अब साइकिल चलाना भी भूल चुके हैं और उनके घरों से साइकिलें ग़ायब हो चुकी हैं। पहले 10-15 किमी की दूरी साइकिल से तय करना आम बात थी। लेकिन अब स्कूली बच्चे साइकिल से कम ही जाते हैं और स्कूटर-बाइक-कारों से अधिक!

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि आज के लोग सुविधाभोगी तथा आरामतलब हो चुके हैं। साइकिल एवं रिक्शा आर्थिक रूप से अपेक्षया कमजोर लोगों की चीजें रह गई हैं। अपेक्षया संपन्न वर्ग के लिए आवागमन हेतु पेट्रोल-डीज़ल निहायत जरूरी उपभोक्ता वस्तुएं बन चुके हैं। इनकी कीमतों में तनिक भी उछाल आने पर या इनकी उपलब्धता कम हो जाने पर हाहाकार मच जाता है।

कोई विकल्प नहीं क्या?

हाल के दिनों में जो मूल्यवृद्धि हुई वह परोक्ष रूप से सभी को प्रभावित करती है इसे औरों की तरह मैं भी स्वीकार करता हूं। यातायात, मालढुलाई, कृषिकार्य आदि जैसे सामुदायिक महत्व के कामों की पेट्रोल-डीज़ल पर निर्भरता को नकारा नहीं जा सकता। व्यक्तिगत तौर पर शायद ही कुछ किया जा सकता है। किंतु यह सवाल तो पूछा ही जा सकता है कि हम न्यूनाधिक शारीरिक श्रम करके अपने बजट को नियंत्रित नहीं कर सकते क्या? एक-डेड़ किलोमीटर दूर जाना हो तो कार-बाइकों का सहारा न लेकर पैदल नहीं जा सकते? साइकिल का यथासंभव उपयोग क्या नहीं किया जा सकता? बच्चों को पैदल या साइकिल से स्कूल-कालेज जाने को प्रेरित नहीं कर सकते?

साइकिल चलाने के अपने लाभ हैं: (1) साइकिल खुद में सस्ता वाहन है; (2) शारीरिक श्रम का अवसर प्रदान कर स्वास्थ्य-लाभ देती है; (3) न पेट्रोल का  खर्चा और न ही रखरखाव में कठिनाई; (4) पार्किंग में कम जगह घेरती है; और (4) प्रदूषक न होने के कारण पर्यावरण के लिए हितकर।

निजी वाहनों का एक विकल्प भी है। सरकारें सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था करके भी लोगों के पेट्रोल खर्च को घटा सकती हैं। इस संदर्भ में सिंगापुर का उदाहरण दिया जा सकता है। वहां सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था उत्कृष्ट श्रेणी की बताई जाती है और खर्चीले निजी वाहन रखने की तुलना में सुविधाजनक भी है। दुर्भाग्य से हमारे यहां की व्यवस्था घटिया दर्जे की और अपर्याप्त है। यह व्यवस्था अपेक्षया कम संपन्न लोगों तक सीमित देखी गयी है। इसके प्रयोग में मिथ्या प्रतिष्ठा भी आड़े आती है।

कुल मिलाकर यह कहना चाहूंगा कि हमें सुविधाभोगी न बनकर शारीरिक श्रम की आदत डालनी चाहिए। – योगेन्द्र जोशी

 

गांधी जयंती के अवसर पर जननेता मोदी का स्वच्छता आह्वान (2)

मोदी तथा स्वच्छता अभियान

इस विषय पर एक आलेख मैंने गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर को लिखा था ।

उसमें मैंने गांधी-चिंतन की कुछ बातों पर टिप्पणी करते हुए मोदी के स्वच्छता अभियान का जिक्र किया था और इस अभियान की सफलता पर शंका जताई थी । मैं अपनी शंका के कारण स्पष्ट करता हूं ।

मैं मोदी या अन्य किसी राजनेता का समर्थक नहीं रहा हूं, किंतु मोदी का फिलहाल प्रशंसक अवश्य हूं । कारण सीधा-सा यह है कि मोदी के कथनों तथा कार्यप्रणाली में मौलिकता है ओर वह घिसे-पिटे ढर्रे पर चलने वाले राजनेता एवं प्रधानमंत्री नहीं लगते हैं । मुझे लगता है कि वे सिंगापुर के पूर्व प्रधानमंत्री ली कुआन यू (Lee Kuan Yew) और फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति चार्ल्स द गॉल (Charles de Gaulle) की जैसी भूमिका निभाना चाहते हैं, जिन्होंने कुछ हद तक डिक्टेटरों सदृश व्यवहार करते हुए अपने-अपने देशों की आरंभिक प्रगति में महती भूमिका निभाई थी । मोदी स्पष्टतः दिखाई देने वाले नयेपन के साथ देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं और देश का स्वरूप बदलना चाहते हैं । उनकी विभिन्न योजनाएं और चंद रोज पहले घोषित स्वच्छता अभियान कितने सफल होंगे यह अभी कोई नहीं बता सकता । मैं इतना जरूर कहूंगा कि यदि सफलता मिली तो श्रेय मोदी को देना ही होगा, और यदि विफलता मिली तो दोष हमारी शासकीय व्यवस्था, प्रशासनिक तंत्र एवं आम जनों का कहा जाएगा, जो वांछित दायित्व न निभा पाए हों और जिन पर प्रधानमंत्री होने के बावजूद मोदी का अतिसीमित नियंत्रण है ।

स्वच्छता अभियानः चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात

मामला स्वच्छता का हो या किसी और बात का, अभियान स्वयं में उद्येश्य की प्राप्ति नहीं करते । अभियानों का मुख्य मकसद लोगों को मुद्दे के प्रति सचेत करना और उन्हें समुचित दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना है । यदि मकसद पूरा हो सका और समस्या को लेकर कुछ कर पाने की संभावना लोगों में निहित हो जाए तो अभियान की सार्थकता सिद्ध हो जाती है । अन्यथा अभियान अभियान मात्र बन कर रह जाता है । आप प्रतिदिन अभियान नहीं चला सकते और न ही आम जन उसमें रोज-रोज भागीदारी निभा सकते हैं । चूंकि इस अभियान में सामान्य लोगों के अलावा कई गण्यमान्य जन भी जुड़ते नजर आ रहे हैं, इसलिए थोड़ी उम्मीद बनती जरूर है कि कुछ सार्थक परिणाम निकलेंगे । लेकिन कुछ समय पश्चात मौजूदा आरंभिक जोश ठंडा पड़ जाये तो आश्चर्य नहीं होगा । ऐसा प्रायः सभी अभियानों एवं आंदोलनों के साथ देखने को मिलता है । तब “चार दिनों की…”

जहां तक स्वच्छता का मामला है मैं समझ नहीं पाता कि अपनी तरफ से सफाई बरतने के लिए लोगों से अनुरोध क्यों करना पड़ता है । यह बात उनके जेहन में खुद-ब-खुद क्यों नहीं आती ? अपने परिवेश को स्वच्छ रखें इस आशय के संदेश कई स्थलों पर लिखे दिखते हैं, जैसे रेलवे प्लेटफार्मों पर और रेल के डिब्बे के भीतर, अथवा चौराहों पर अपने शहर को स्वच्छ रखें के संदेश । फिर भी गंदगी फैलाने वाले गंदगी फैलाते रहते हैं । संदेशों का कोई असर क्यों नहीं पड़ता ? सड़क के किनारे दीवारों पर अक्सर लिखा रहता है “यहां मूत्रत्याग या पेशाब न करें” फिर भी पेशाब करने वालों की कमी नहीं रहती । क्या अभियानों का असर वास्तव में पड़ता है ? शायद नहीं; कइयों को ये नौटंकियों सदृश लगते हैं, तमाशे के माफिक ! मैं इस समय मुम्बई, पश्चिम भांडुप, में हूं । मुझे तो यहां इस अभियान के संकेत तक नहीं दिखे । पता नहीं देश के किस-किस कोने में कुछ हुआ हो, मीडिया में छपी तस्वीरों से अधिक ।

फिर भी मैं मान लेता हूं कि मौजूदा जिस अभियान की शुरुआत मोदी ने की है, और जिसे जनसमर्थन मिल रहा है, वह लोगों को प्रेरित करेगा । तब सवाल है कि उसके अनुसार आम आदमी से क्या अपेक्षा की जाती है ? यही न कि लोग सड़कों, सार्वजनिक स्थलों, आदि पर गंदगी न फैलाएं । वे सड़कों पर पान की पीक नहीं थूकें, उनके किनारे खड़े होकर पेशाब नहीं करें, जहां-तहां कूड़ा नहीं फैंकें, नालियों में प्लास्टिक की थैलियां नहीं डालें, रेलगाड़ी के डिब्बों के फर्श पर मूंगफली के छिलके, बिस्कुट के रैपर नहीं गिराएं, इत्यादि । ऐसे तमाम कार्य करने के लिए आम जन, विशेषकर नौजवान, किशोरवय,  बालक-बालिकाएं प्रेरित की जा सकती हैं, किंतु नागरिकों का व्यक्तिगत योगदान पर्याप्त है क्या ?

प्रशासन की भूमिका

वस्तुतः सफाई कार्यक्रम में प्रमुखतया दो पक्षों की भागीदारी रहती हैः (1) पहले में जन-सामान्य हैं जिनके व्यक्तिगत योगदान की बात ऊपर की गई है, और (2) दूसरा संस्थाएं हैं जिनका दायित्व सार्वजनिक क्षेत्रों की साफ-सफाई की व्यवस्था करना है । घरों और व्यावसायिक कार्य-स्थलों से निकलने वाले कूड़े-कचरे के निस्तारण का दायित्व इन्हीं संस्थाओं का होता है । सड़कों, नालों, एवं पार्क जैसे सार्वजनिक स्थलों को समय-समय पर साफ करना संस्थाओं की जिम्मेदारी होती है । आम जन के उपयोग के लिए सार्वजनिक सुविधाओं का निर्माण भी संस्थाओं का ही कार्य होता है, न कि निजी तौर पर किसी व्यक्ति का ।

हमारे देश में ये संस्थाएं सामान्यतः प्रशासनिक तंत्र का हिस्सा होती हैं । लेकिन वे गैरसरकारी स्वैच्छिक संस्थाएं भी हो सकती है जिन्हें शासकीय नियमों के अनुरूप कार्य करने की अनुमति रहती है । “सुलभ इंटरनैशनल” ऐसी ही एक प्रतिष्ठित संस्था है जो सार्वजनिक उपयोग हेतु शौचालयों का निर्माण कराती आ रही है । जब कोई व्यक्ति जनहित में ऐसा ही कोई कार्य करे तो वह भी एक गैरसरकारी संस्था की तरह कार्य कर रहा होता है । उसका कार्य समाज के प्रति उदारता का परिचायक कहा जाएगा । किंतु यह स्वीकारा जाना चाहिए कि मूलतः सार्वजनिक सफाई प्रशासन की ही जिम्मेदारी होती है, भले ही वह अपने दम पर यह करे अथवा गैरसरकारी संस्थाओं से सहयोग लेकर चले ।

मैं देश के कई हिस्सों में बतौर पर्यटक के घूम-फिर चुका हूं । यह सभी जानते हैं कि हमारा देश विधिधताओं से भरा है । खानपान, पहनावा, स्थानीय रीतिरिवाज, भाषा-बोली, आदि में विविधता पाई जाती है । फिर भी मुझे यह देखना बेहद दिलचस्प लगा कि एक माने में सभी देशवासियों में समानता है, वह है स्वच्छता के प्रति उदासीनता या बेपरवाही । इस माने में संस्थाओं में भी काफी हद तक एकरूपता देखने को मिलती है । अवश्य ही कुछ जगहों पर मैंने पर्याप्त प्रशासनिक चुस्ती देखी है तो अन्यत्र उसकी सुस्ती ही सुस्ती । तदनुसार सड़कों, सार्वजनिक स्थलों में प्राप्य गंदगी की मात्रा में थोड़ा-बहुत अंतर जरूर रहता है, फिर भी गंदगी तो रहती ही है । उदाहरणार्थ देश में प्रायः सभी शहरों में जहां-तहां प्लास्टिक थैलियों का बिखरा होना, सड़कों के किनारे कूड़े के ढेर लगे रहना, दुर्गंध फैलाती बदबदाती नालियों की मौजूदगी, आदि आम बातें हैं । ये बातें प्रशासनिक उदासीनता के प्रमाण होते हैं । इसी प्रकार आम जनता का सफाई के प्रति रवैया भी कमोबेश एक जैसा ही है । यह है भारत की विविधता में एकता

वाराणसी का उदाहरण

मैं पिछले करीब 42 सालों से वाराणसी मैं रह रहा हूं । मैंने इस शहर को शनैः-शनैः दुर्व्यवस्था का शिकार होते देखा है । पहले सड़कें अधिक चौढ़ी नहीं थीं, फिर भी जाम की स्थिति नहीं पैदा होती थी । आज सड़कें दोहरी या अधिक चौढ़ी हैं, किंतु हर समय जाम की स्थिति बनी रहती है । पहले कारें नहीं के बराबर थीं, आज इतनी हैं कि सर्वत्र धुआं-ध्वनि प्रदूषण फैल रहा है । पहले सड़कें 5-7 साल चल जाती थीं, अब 2-4 माह में ही उखड़ने लगती हैं । पहले कागज के थैले इस्तेमाल होते थे, अब उनकी जगह गंदगी के कारक प्लास्टिक की थैलियों ने ले ली है ।

मेरा मानना है कि वाराणसी में प्रशासन वस्तुस्थिति के प्रति उदासीन, निष्क्रिय, या बेपरवाह रहता है । संसाधनों तथा कार्यबल का अभाव उसे और पंगु बना देता है । अतः मुझे उससे उम्मीद नहीं है । न ही मैं आम जनता से कोई उम्मीद रखता हूं, जो “बनारस की मस्ती” के नाम पर अनुशासनहीनता बरतती है और नागरिक दायित्वों से बेखबर रहती है । ऐसे में अहम स्थलों में स्वच्छता के विभिन्न टापू उभर सकते हैं जहां निजी संस्थाएं अथवा प्रशासनिक तंत्र विशेष तौर पर प्रयासरत हों, किंतु वृहत्तर स्तर पर स्थिति दयनीय ही रहनी है ।

कुल मिलाकर मुझे लगता नहीं कि वाराणसी में प्रशासन और आम जनता से स्वच्छता की आशा की जा सकती है । देश में अन्यत्र भी स्थिति विशेष आशाप्रद होगी यह मैं नहीं सोच पाता । मैं ऐसा क्यों सोचता हूं इसे अपने निजी अनुभवों पर आधारित दो-एक उदाहरणों से स्पष्ट करूंगा अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी

 

2 अक्टूबरः गांधी जयंती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस और जननेता मोदी का स्वच्छता आह्वान (1)

स्वच्छता अभियान

 

 

 

 

गांधी-शास्त्री जयंती

2 अक्टूबर गांधी जयंती है । प्रायः सभी देशवासी इस दिन से सुपरिचित रहे हैं, क्योंकि प्रथमतः इस दिन सार्वजनिक अवकाश रहता है और द्वितीयतः गांधी के नाम को दुनिया में अहिंसक आंदोलन से जोड़कर देखा जाता है, जिसके कारण इस दिन को विश्व अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया गया है । कदाचित कम ही लोगों को यह याद रहता होगा कि “जय जवान जय किसान” का नारा देने वाले तथा सोमवार को सामूहिक उपवास रखने की अपील करने वाले देश के दूसरे प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री जी का जन्म भी इसी दिन हुआ था ।

मैं देश की स्वाधीनता का श्रेय गांधी को उतना नहीं देता जितना आम तौर पर दिया जाता है । अवश्य ही उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी, किंतु स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लेने वाले अनेकों स्मरणीय जननेताओं का योगदान कम नहीं रहा । वस्तुतः द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश सामाज्य की स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी थी कि उन्हें अपना सामाज्य संभालना कठिन लगने लगा था और एक-एक करके उन्हें तमाम बड़े देशों को स्वतंत्रता प्रदान करनी पड़ी थी । यह मेरा मत है जिसे लोग शायद स्वीकार न करें । मेरा यह आलेख स्वाधीनता के मुद्दे पर केंद्रित न होकर गांधी से जुड़े अन्य बातों पर केंद्रित है ।

गांधी और अहिंसा

निःसंदेह गांधी अहिंसा के पक्षधर थे, लेकिन कदाचित कायरता के पक्षधर नहीं थे । वे कठिन परिस्थिति में अपनी सुरक्षा के लिए हिंसक मार्ग अपनाने से हिचकने की सलाह देते रहे हों मैं ऐसा नहीं समझता । अस्तु, अहिंसा को केवल गांधी से जोड़कर ही क्यों देखा जाता है ? अनेक ऐसे महापुरुष हो चुके हैं जिन्होंने हिंसा का मार्ग त्यागने की सलाह दी है । यह ठीक है कि सभी समान रूप से सुविख्यात नहीं रहे हैं, पर उनको भुलाया नहीं जा सकता । भगवान महावीर, महात्मा बुद्ध, एवं प्रभु यीशु को तो दुनिया जानती ही है । वे सभी तो अहिंसा का उपदेश देते रहे । अवश्य ही उन्हें अहिंसक आदोलन चलाने की आवश्यकता नहीं रही, क्योंकि उनके काल में राजनैतिक परिस्थियां आधुनिक काल की सी नहीं रहीं । वस्तुतः गांधी स्वयं इन महापुरुषों से प्रेरित रहे हैं ।

सवाल है कि गांधी की चर्चा अहिंसा के संदर्भ में ही सर्वाधिक क्यों की जाती है । उन्होंने तमाम अन्य बातों पर भी जोर डाला था जिनको अपनाने की सलाह उन्होंने लोगों को दी थी । किंतु उन बातों की चर्चा आम तौर पर जोरशोर से नहीं की जाती है । मैं समझता हूं कि गांधी के अहिंसा की बात को सारी दुनिया इसलिए महत्व देती है क्योंकि हिंसा से प्रायः हर मनुष्य डरता है । हो सकता है कि आंतकवादी और उनके विरुद्ध लड़ने का दायित्व निभाने वाले सुरक्षकर्मी न डरते हों । अथवा स्वीकारे गए दायित्य के कारण उन्हें कदाचित निडरता बरतनी पड़ती हो । अतः अधिकांशतः सभी चाहेंगे हि मानव समाज हिंसामुक्त हो । मैं इस भावना को मनुष्य के स्वार्थ की प्रवृत्ति से जोड़कर देखता हूं, अर्थात उसकी इस अपेक्षा से कि अन्य जन उसको हानि न पहुंचाएं । गांधी की अन्य बातें मनुष्य के स्वार्थ के अनुरूप नहीं हैं, अतः उन बातों का पक्ष लेने और उन्हें जीवन में अपनाने में उन्हें असुविधा अधिक और व्यक्तिगत लाभ कम दिखता है ऐसा मैं मानता हूं । इसलिए लोग उन बातों को तवज्जू नहीं देते हैं । मैं अपने उक्त मत को सप्ष्ट करता हूं:

गांधी के विषय में व्यापक एवं शोधपरक अध्ययन मैंने नहीं किया है । अतः उनके बारे में बहुत कुछ तथा वह भी सही-सही जानता हूं यह दावा नहीं कर सकता । जितना मैं समझ पाया हूं उसके अनुसार वे अहिंसा के अतिरिक्त अधोलिखित बातों को महत्व देते थे और उन पर स्वयं अमल करते थे, न कि दूसरों को महज उपदेश भर देते थे:

गांधी – अहिंसा से आगे कुछ और भी

(1) स्वच्छता – गांधी का स्वच्छता पर विशेष ध्यान था । वे मानते थे कि हर व्यक्ति को स्वयं अपने हाथ से साफ-सफाई करनी चाहिए । यदि दूसरों का शौच आदि उठाने की जरूरत पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए । स्वच्छता से उनका ताप्तर्य दूसरों से सफाई करवाना नहीं था, बल्कि उसमें स्वयं भागीदारी निभाना था ।

(2) शारीरिक श्रम – गांधी शारीरिक श्रम के पक्षधर थे और यह विचार रखते थे कि मनुष्य को अपना कार्ययथासंभव अपने शारीरिक श्रम के संपन्न करना चाहिए । मशीनों पर निर्भरता कम से कम होना चाहिए । उन्हें किस स्थिति में इस्तेमाल करना चाहिए इस पर विवेकपूर्ण विचार होना चाहिए । मात्र आलस्य अथवा सुविधाभोग के लिए हमें अपने शारीरिक श्रम से नहीं बचना चाहिए । श्रम करने के लाभ क्या-क्या हैं यह तो लोग समझते हैं, किंतु उससे फिर भी बचते हैं । गांधी की नजर में व्यावसायिक तौर पर शारीरिक श्रम करने वालांे को हेय दर्जा देना अक्षम्य माना जाना चाहिए ।

(3) सादा जीवन – वे सादगी भरे जीवन के पक्षधर थे । शानो-शौकत और दिखावे का जीवन उनके विचारों के प्रतिकूल था । उनके मतानुसार व्यक्ति की श्रेष्ठता उसके विचारों से आंकी जानी चाहिए न कि उसकी भौतिक सपन्नता से । आज के युग में गांधी के कितने प्रशंसक होंगे जो अपनी आर्थिक संपन्नता के बावजूद सादा जीवन जीते हों । आज तो व्यक्ति ही संपन्नता ही उसकी सामाजिक श्रेष्ठता का आधार बन चुका है ।

(4) सामाजिक समानता – गांधी का मत था कि सभी मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए, सबको सम्मान दिया जाना चाहिए । यह सच है कि प्रकृति ने सबको समान नहीं बनाया है । परंतु  सभ्य समाज वही कहला सकता है जिसमें इस अंतर को भेदभाव का आधार न बनाया जाता हो । शारीरिक अथवा बौद्धिक स्तर पर कोई अधिक समर्थ होता है तो कोई कम । तदनुसार लोग अपना-अपना व्यावसायिक क्षेत्र चुनते हैं, परंतु उस क्षेत्र के आधार पर उन्हें ऊंचनीच की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए । धर्म, नस्ल, जाति, क्षेत्रीयता के आधार पर तो भेदभाव किया ही नहीं जा सकता, क्योंकि ये कृत्रिम आधार हैं – समाज में घर कर गईं विकृतियां । छुआछूत गांधी की दृष्टि में हिंदू समाज पर एक कलंक है ।

(5) कमजोर का शोषण न हो – अपेक्षया कमजोर व्यक्ति का शोषण विश्व के हर समाज में सदा से ही होता रहा है । गांधी चाहते थे कि हमें शोषण की प्रवृत्ति से स्वयं को मुक्त करना चाहिए । किंतु देखने में आता है कि समाज में कमजोर व्यक्ति से तरह-तरह से लाभ उटाये जाते हैं । कमजोर व्यक्ति से कम से कम पारिश्रमिक देकर अधिक से अधिक कार्य लेना आम बात है । दूसरों का हक छीनने में भी बहुतों को कोई संकोच नहीं होता है । वास्तव में देखा जाय तो समाज में फैले कदाचार का संबंध शोषण की प्रवृत्ति से ही है । वस्तुस्थिति का अपने हक में लाभ उठाना और दूसरों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में हानि पहुंचाना आम प्रवृत्ति है ।

(6) आर्थिक विषमता कम हो

कहा जा चुका है कि प्रकृति ने सबको समान नहीं बनाया है । अतः अर्थोपार्जन की क्षमताएं असमान है । अपने बौद्धिक कौशल से कोई असीमित संपन्नता अर्जित कर लेता है तो कोई अपनी सीमित क्षमताओं के कारण जीवन-यापन के लिए पर्याप्त साधन तक नहीं जुटा पाता है । फलतः समाज में आर्थिक विषमता स्वाभाविक तौर पर बढ़ती जाती है । गांधी का मत था कि सब असमान जन्म लेेते हैं के तर्क के साथ इस असमानता का औचित्य नहीं ठहराया जाना चाहिए । वे चाहते थे कि हमें ऐसी सामाजिक एवं शासकीय व्यवस्था अपनानी चाहिए जिससे यह अंतर कम से कम हो । इसका सीधा तात्पर्य यह है कि समाज में यह प्रवृत्ति पैदा की जानी चाहिए कि संपन्न वर्ग किंचित त्याग के लिए प्रस्तुत हो और कमजोर वर्ग को ऊठाने में योगदान दे ।

ये वे कुछ बातें हैं जो इस समय मेरे विचार में आ रही हैं । ऐसी अन्य बातें भी होंगी जो गांधी के चिंतन में रही हों । गौर करें तो देखेंगे कि ये बातें मनुष्य के विविध स्वार्थों के प्रतिकूल हैं – स्वार्थ जिनमें सुविधा भोगना, संपन्नता अर्जित करना, दूसरों पर वर्चस्व पाना, दायित्वों से बचना, आदि शामिल हैं ।

स्वच्छता अभियान

गांधी-चिंतन में जिस स्वच्छता को महत्व दिया गया है उसे आज मौजूदा प्रधानमंत्री मोंदी ने अपने स्वच्छता व्भियान का आधार बना लिया है । मोदी ने भविष्य में सतत चलने वाले इस अभियान के लिए गांधी जयंती को चुना है । देखने पर मोदी के इरादे सराहनीय लगते हैं । साथ में मेरे मन में ये सवाल भी उठते हैं:

(1) वे और उनके दल के लोग इस विषय पर कितने गंभीर होंगे ?

(2) उनकी खुद की सरकार तथा राज्यों की सरकारों की प्रतिवद्धता किस स्तर की होगी ?

(3) इस कार्य के लिए कैसे पर्याप्त संसाधन जुटाए जाएंगे ?

और (4) आम जन का कितना सहयोग उन्हें मिलेगा ?

ऐसे और भी प्रश्न हैं । इन प्रश्नों के उत्तर स्वयं मोदी के पास होंगे इसमें मुझे शंका है । उम्मीद पर दुनिया टिकी है, सो हमें सफलता की आशा करनी चाहिए । इस बारे में कुछ अधिक कहने से पहले मैं कांग्रेस पार्टी पर संक्षिप्त टिप्पणी करना चाहता हूं ।

कांग्रेस पार्टी गांधी पर अपना “कॉपीराइट” जताती है, जब कि गांधी स्वातंत्र्योत्तर भारत के किसी दल के नेता नहीं थे । वे पूर्व में एक जननायक थे और वही अंत तक रहे । कांग्रेस यह भूल जाती है कि वे उस कांग्रेस के नेता थे जो देश के स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत थी । और उन्होंने स्वतंत्र भारत में चुनाव लड़ने के लिए बने राजनैतिक दल के तौर पर कांग्रेस को नहीं स्वीकारा । वे उससे नाता तोड़ चुके थे । ऐसे में कांग्रेसियों का उन्हें अपने दल से जुड़ा होना कहना नितांत गलत है । वैसे भी कितने कांग्रेसी हैं जिन्होंने गांधी की जीवन शैली अपनाई हो ?  गांधी को अपना कहने वाले कांग्रेस के किसी नेता ने ऐसा अभियान क्यों नहीं चलाया ? क्यों नहीं स्वयं मनमोहन सिंह के दिमाग में स्वच्छता अभियान का खयाल आया ? अस्तु, गांधी के नाम पर किए जाने वाले मोदी के अभियान को कांग्रेस तथा अन्य दलों ने सहयोग देना चाहिए, न कि उस पर कोई टिप्पणी करनी चाहिए ।

शंकाएं

मैंने इस अभियान के संदर्भ में ऊपर कुछ सवाल उठाऐ हैं । अभियान किस हद तक सफल होगा और क्या अड़चनें मोदी के समक्ष होंगी इस पर मैं अपनी टिप्पणियां इस ब्लॉग की अगली पोस्ट में करूंगा । – योगेन्द्र जोशी

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‘पिकनिक स्पाट’ बन चुके तीर्थस्थल और उत्तराखंड की आपदा

उत्तराखंड में अतिवृष्टि ने पिछले कुछ दिनों से जो तबाही मचा रखी है उससे चारधाम-यात्रियों को बचाने एवं स्थानीय नागरिकों को उबारने में कितना समय अभी लगेगा कहना मुश्किल है । वहां जो कुछ घटा उसके लिए कौन जिम्मेदार है यह सवाल जोरशोर से पूछा जा रहा है । क्या दुर्घटना रोकी जा सकती थी ? क्या जानमाल की जो हानि हुई उससे बचा जा सकता था ? ऐसे सवालों के उत्तर में कहने को मेरे पास बहुत कुछ है । अभी मैं इस बात पर ध्यान खींचना चाहता हूं कि हमारे तीर्थस्थल अब तीर्थस्थल नहीं रह गए हैं, बल्कि वे पिकनिक स्पाट बन चुके हैं । जानमाल के मौजूदा नुकसान का एक कारण उनका पिकनिक स्पाट बनना भी है ।

उत्तराखंड मेरा पुस्तैनी राज्य है, जिसके बागेश्वर जिले में मेरा गांव है जो अब निर्जन-सा हो चुका है, क्योंकि सभी रोजीरोटी के लिए बाहर निकल चुके हैं । मेरे आरंभिक कुछ वर्ष वहीं बीते हैं । वहां के जनजीवन, पहाड़ों-नदियों की प्रकृति, धूप-वर्षा-बर्फबारी, ऊबड़-खाबड़ रास्ते, आदि से मेरा बचपन से ही परिचय रहा है । मुझे वे दिन याद हैं जब वहां सड़कों का जाल नहीं बिछा था और मीलों पैदल चलकर गंतव्य तक पहुंचना होता था । बिजली कैसी होती है, टेलीफोन क्या होता है, रेडियो से क्या करते हैं, जैसे सवाल मन में उठा करते थे । उनके प्रति जिज्ञासा रहती थी परंतु उन्हें देखने का मौका अपने पास न था । परंतु देखते ही देखते वहां बहुत कुछ बदल गया, और मैं खुद उस गांव से कहीं दूर पैंसठ-वर्षीय वरिष्ठ नागरिक बन गया । जो बदलाव हुए उसकी कीमत कम नहीं रही, जिसे अब हम सभी को चुकाना है, आपदाओं को झेलकर ।

उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) में रहने के बावजूद मेरे और आसपास के गांवों के लोगों में इक्कादुक्का ही उस समय (देश की स्वतंत्रता के पहले तथा बाद के दिनों) ऐसे रहे होंगे, जिन्होंने बदरीनाथ-केदारनाथ की तीर्थयात्रा करने का साहस जुटाया होगा । मैं इतना जानता हूं कि मेरे ताऊजी ऐसे बिरले लोगों में से एक थे । तब इस यात्रा को दुर्गम माना जाता था । यात्रा के लिए हफ्ता नहीं महीना लगता था । पुण्यार्जन के प्रति उत्सुक व्यक्ति बाल-बच्चों को साथ नहीं ले जाता था, बल्कि 45-50 की आयु पा लेने और गृहस्थ जीवन के दायित्वों से कुछ हद तक मुक्त होने के बाद ही तीर्थयात्रा की सोचता था । उत्साही व्यक्ति यह मानकर चलता था कि मार्ग में उसकी सहायता कर सकने वाला शायद ही कोई मिले, बावजूद इस तथ्य के कि स्थानीय लोगों के बीच बटोहियों के आतिथ्य की परंपरा रही । लूटपाट-धोखाधड़ी की बातें अपवाद थीं; लोग धर्मभीरु होते थे । व्यक्ति इस भावना के साथ यात्रा पर निकलता था कि न लौट पाने को परिवार के सदस्य उसकी जीवन-मुक्ति के तौर पर देखेंगे ।

धार्मिक प्रवृत्ति के वही मेरे ताऊजी उससे पहले कैलास-मानसरोवर की यात्रा भी कर चुके थे; कब यह मुझे ठीक-से नहीं मालूम, शायद सन् 1949-50  की बात रही होगी, जब मैं एक-दो साल का रहा हूंगा । उन दिनों तिब्बत पर आधुनिक चीन का आधिपत्य नहीं था । उसकी सीमाएं हम लोगों के लिए खुली थीं; पासपोर्ट-वीजा जैसे दस्तावेजों को कोई जानता न था; तिब्बत के लामाओं का व्यवसाय स्थानीय लोगों के साथ चलता था । उस यात्रा पर ताऊजी धोती-स्वेटर-कोट पहने, खाने-पीने का कुछ सामान दो-एक कंबल के साथ लादे, और पांव में उन दिनों प्रचलित भूरे रंग के कैनवास के जूते पहने निकले थे, जैसा मैंने सुना है । आसपास का कोई परिचित व्यक्ति साथ था भी कि नहीं यह मुझे नहीं मालूम । न लौट पाना कदाचित् अपनी नियति हो सकती है इस भावना से वे चल दिए थे । पता नहीं कितने दिन उन्हें लगे होंगे; महीना भर तो लगा ही होगा । वह भी एक समय था जब कष्ट सहकर पुण्य कमाने की प्रबल इच्छा के साथ तीर्थयात्रा पर निकलते थे लोग ।

लेकिन अब ? तीर्थयात्रा की तत्कालीन अवधारणा आज विलुप्त हो चुकी है । आज तो सुविधाप्रद साधनों से तीर्थस्थलों तक पहुंचा जाता है । खानेपीने एवं ठहरने के पूरे इंतिजाम देखने को मिलते हैं । लोग तो सपरिवार निजी वाहन से मंदिरों के प्रवेशद्वार तक पहुंच जाते हैं । तीर्थयात्राओं के नाम पर पर्यटन उद्योग आगे बढ़ रहा है । परिणाम ? मंदिरों के इर्दगिर्द की जमीन होटल-धर्मशाला-सड़कों आदि से पट चुके हैं । दुर्गम स्थल के मंदिर-देवालय दुर्गम नहीं रहे । जहां पहुंचने की हिम्मत पहले इक्कादुक्का लोग जुटा पाते थे, वहां अब भीड़ पहुंच रही है । बरसात में उफनाती जिन नदियों को बहा ले जाने के लिए कभी केवल मिट्टी और पत्थर भर मिलते थे उनके सामने अब यात्रिकों की भीड़ और नदी के एकदम किनारे के मकान मिलते हैं । पर्वतीय क्षेत्रों में मकान एकदम नदी किनारे नहीं होते थे । जो होते भी थे उनसे नदी के बहाव में रुकावट नहीं होती थी । इतना अधिक अतिक्रमण भी तो नहीं था ! हिमालय की कमजोर पहाड़ियों पर बने राजमार्गों ने बचीखुची कसर दूर कर दी ।

जब तीर्थस्थल पिकनिक स्पाट बन चुके हों तो बेचारी नदियां करें भी क्या ? – योगेन्द्र जोशी

सोमेश्वर (उत्तराखंड) के निकट कोशी नदी किनारे पहाड़ी ढलान पर एक गांव। दोनों ओर झाड़ियों और उसके बाद खेतों के बीच नदी स्पष्ट नहीं दिख रही।

सोमेश्वर (उत्तराखंड) के निकट कोशी नदी किनारे पहाड़ी ढलान पर एक गांव। दोनों ओर झाड़ियों और उसके बाद खेतों के बीच नदी स्पष्ट नहीं दिख रही।

23 मार्च, ‘दि अर्थ ऑवर, यानी पृथ्वी के नाम एक घंटा: है इसकी कोई अहमियत?

आज के दिन (अंताराष्ट्रीय मौसम दिवस – International Meteorological Day) संध्याकाल विश्व में ‘अर्थ ऑवर’ मनाया जाता है । अर्थात् दुनिया के प्रायः सभी देशों में रात्रि प्रथम प्रहर 8:30 बजे से घंटे भर के लिए रोशनियां बंद कर दी जाती हैं । यह दिवस अब 9 वर्ष पुराना हो चला है ।

          क्या है इस दिवस की अहमियत? यों दावा तो यही किया जाता है कि इसके माध्यम से इस धरती के बाशिंदों को ऊर्जा की अधिकाधिक बचत करने और जीवाश्म इंधनों (कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस) पर अपनी निर्भरता घटाने का संदेश जाता है । और यह भी कि ऊर्जा के अपारंपरिक स्रोतों को व्यवहार में लिया जाना चाहिए । जहां तक नये ऊर्जा स्रोतों का प्रश्न है, इस प्रकार के प्रयास तो विभिन्न देशों में चल ही रहे हैं और उसमें सामान्यतः आम आदमी का हाथ कम ही रहता है, क्योंकि इस प्रकार के प्रयास सरकारें अथवा संस्थाएं ही सामान्यतः कर पाती हैं ।

          आम आदमी तो ऊर्जा की बचत ही कर सकता है । दूसरे शब्दों में यह दिवस आम जनों को ऊर्जा की मितव्ययिता का संदेश देता है । मेरे मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या ऐसा कोई संदेश लोगों तक वास्तव में पहुंचता भी है ? और क्या वे इस संदेश को ग्रहण करते हैं ? यह ठीक है कि आज के दिन घंटे भर के लिए घर-बाहर की रोशनी बंद कर देंगे, लेकिन क्या उसके एवज में मोमबत्ती सरीखे प्रकाश-स्रोतों का इस्तेमाल नहीं करेंगे ? क्या उतने समय फ्रिज, ए.सी., टी.वी. जैसे विद्युच्चालित उपकरण भी बंद रखेंगे ? मामला केवल रोशनी बंद रखने तक सीमित नहीं है । आपको बिजली की खपत यथासंभव कम करनी है । क्या लोग तैयार हैं ? संदेश का असल मकसद क्या वे समझ पाते हैं, उसे ग्रहण करते हैं और तदनुरूप व्यवहार करते हैं ? मुझे संदेह है कि मुद्दे के प्रति समर्पण भाव से अपनी भूमिका स्वीकारते हुए ऐसा करने का विचार कम ही लोगों के मन में उपजता होगा ।

          और असल बात तो यह है कि यह दिन केवल प्रतीकात्मक है ऊर्जा की खपत घटाने के पक्ष में । वस्तुतः यह कार्य तो चौबीसों घंटे, 365 दिन चलना चाहिए । कितने लोग हैं जो जीवन में मितव्ययिता बरतते होंगे ? घरों में अनावश्यक बिजली-बल्ब न जलें इसका खयाल कितनों को रहता है ? ए.सी. जैसे सुविधा-भोग के साधन कितने लोग नहीं चाहते हैं ? कितने लोग निजी वाहनों के प्रयोग से बचते हैं ? कितनों के मन में यह विचार आता है कि जहां तक संभव हो साइकिल जैसे साधन प्रयोग में लेने चाहिए ? कितने लोग यह जानकारी रखते हैं कि ‘स्टैंड-बाई की अवस्था में छोड़े गये उपकरणों के साथ भी बिजली की खपत होती है जिसे रोका जा सकता है ? कितनों को मालूम है कि कैसे भोजन बनाते समय गैस की खपत घटाई जा सकती है ?

और मैं तो यह सवाल पूछता हूं कि आदमी धनोपार्जन करता ही क्यों है ? क्या समाजसेवा के लिए ? नहीं, भौतिक सुख-सुविधा के साधन जुटाने के लिए । और यदि वह मितव्ययिता ही बरतने लगे तो अपने धन का उपभोग करेगा कैसे ? उसे ढेर-सी धन-दौलत की जरूरत ही क्या रह जाएगी यदि वह कम से कम खर्चापानी चलाने का इच्छुक हो । स्मरण रहे कि आदमी के प्रायः सभी क्रियाकलाप प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऊर्जा पर निर्भर होते हैं, जिसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा आज भी जीवाश्म इंधनों से मिल रहा है । यह भी अनुमान है कि अपारंपरिक ऊर्जा स्रोतों में जो वृद्धि हो रही है वह ऊर्जा की बढ़ती मांग पूरा करने भर के लिए भी पर्याप्त नहीं है ।

मेरा कहने का आशय यह है कि अर्थ ऑवर का संदेश यह समझा जाना चाहिए कि हमें मितव्ययिता अपनाते हुए सादगी भरी जीवनशैली अपनानी चाहिए, न कि एक-दूसरे की नकल करते हुए प्राकृतिक संसाधनों को अधिक से अधिक प्रयोग में लेना चाहिए । मनुष्य और अन्य जीवधारियों की आने वाली पीढ़ियों के लिए इस धरती को रहने योग्य यदि छोड़ना हो तो हमें भोगवाद से बचना होगा । कितने लोग हैं जो इस विचार से सहमत होंगे ? शायद गिनेचुने ही, बस !! – योगेन्द्र जोशी

पानी से इंजन चलेंगे; पाकिस्तानी इंजीनियर का चमत्कार, या झूठा दावा?

[Hindi version of 30 July  post in English]

पिछली 28 तारीख के समाचारपत्र में मुझे दिलचस्प एवं अविश्वसनीय खबर पढने को मिली । एक पाकिस्तानी इंजीनियर, वकार अहमद, ने अनेकों लोगों के सामने पानी से चलने वाला इंजन दिखाया ।

मेरी जिज्ञासा जगी और इंटरनेट से अधिक जानकारी जुटाने का विचार बना । मुझे समाचार से जुड़े ये वेब-पृष्ट मिले:

timesofindia.indiatimes.com

cssforum.com.pk

godlikeproductions.com

pesn.com

newsworldwide.wordpress.com

पाक सरकार बहुत खुश है । पानी से चलने वाला इंजन ! बहुत खूब, समझो ऊर्जा की समस्या सुलझ गई अब । पानी की कमी तो है नहीं; फिर क्या, मनुष्यों के खर्चने के लिए ऊर्जा की कमी नहीं रहेगी ! सरकार इंजिनियर को योजना पर आगे बढ़ने में मदद करने वाली है ।

मजे ही मजे ! अब ऊर्जा कोई समस्या नहीं रह जाएगी !!

लेकिन मेरे जैसे भौतिकीविद (फिजिसिस्ट) के लिए यह झूठ के अलावा कुछ नहीं । अंतर्दहन इंजन (internal combustion engine) के लिए पानी बतौर इंधन के ? 100 फीसद असंभव, क्योंकि प्रकृति (भौतिकी) के नियम इसकी इजाजत नहीं देते ।

अज्वलनशील पानी से ऊर्जा पाने की यांत्रिकी या विधि क्या है ? समाचार इस बात को स्पष्ट नहीं करता । मेरी समझ में जो आया वह यह हैः पानी का विद्युत्-अपघटन (इलेक्ट्रोलिसिस) करके हाइड्रोजन प्राप्त किया जाएगा, जो पेट्रोल/डीजल के बदले इंधन का कार्य करेगा । ठीक; इसमें कुछ भी गलत नहीं ।

लेकिन यह तो बताया नहीं गया है कि इलेक्ट्रोलिसिस स्वयं में कैसे संपन्न होगा, जिसके लिए बिजली की आवश्यकता अनिवार्य होती है । वह इंजीनियर क्या एक बैटरी का प्रयोग कर रहा है निर्बाध विद्युत्-धारा हेतु, जिससे पानी अपने रासायनिक घटकों, जिसमें हाइड्रोजन (इंधन) एक है, में विघटित हो सके ? इंजन चलाने के लिए आपको हाइड्रोजन की सतत पूर्ति जरूरी है, जिसका मतलब है इलेक्ट्रोलिसिस की सतत प्रक्रिया, और उसके लिए बिजली की निरंतर आपूर्ति ।

बिजली की यही आपूर्ति ऊर्जा का वास्तविक स्रोत है । मैं पुनः कह रहा हूं समाचार स्पष्ट नहीं करता है कि कथित इंजन के लिए बिजली आपूर्ति कहां से हो रही है ? अगर बिजली आपूर्ति नहीं तो फिर इलेक्ट्रोलिसिस कैसे हो रही है ?

अगर ये बातें सही हैं तो इसका मतलब है कि आप असल में ये कर रहे हैं:

विद्युत् स्रोत (बिजली) → रासायनिक ऊर्जा (इलेक्ट्रोलिसिस) → हाइड्रोजन (रासायनिक ऊर्जा स्रोत) → ऊष्मा ऊर्जा (हाइड्रोजन बतौर इंधन) → यांत्रिक ऊर्जा (धूर्णन गति) → वाहन चलाने में प्रयुक्त

विद्युत् ऊर्जा आपूर्ति का खुलासा न करते हुए यदि उक्त युक्ति अपनाई जा रही हो, तब इस सवाल का जवाब मिलना चाहिएः उस बिजली को सीधे विद्युत्-मोटर चलाने में इस्तेमाल क्यों न किया जाए, जिससे मशीन चलाई जाए ?

विद्युत् स्रोत (बिजली) → यांत्रिक ऊर्जा (धूर्णन गति देने वाली मोटर चले) → वाहन चलाने में प्रयुक्त

बैटरी-चालित कारों/बाइकों का यही सिद्धांत है । ऊष्मागतिकी (थर्मोडाइनेमिक्स) का छात्र इसे भली भांति समझ सकता है कि पहली विधि दूसरी से अनिवार्यतः कम दक्ष (इफिसेंट) होगी, क्योंकि ऊर्जा के एक प्रकार से दूसरे में परिवर्तन के प्रत्येक चरण में उसकी अपरिहार्य हानि होती है ।

इस प्रकार बेहद अहम सवाल उठता है कि कैसे पानी बतौर इंधन के कार्य करता है । मैं रासायनिक इंधन की बात कर रहा हूं, नाभिकीय इंधन की नहीं । – योगेन्द्र जोशी

Water to fuel car engine. Pak engineer’s miraculous feat, or hoax?

My Hindi newspaper of 28th had an amusing and amazing story. A Pak engineer, Waqar Ahmad, recently demonstrated his Water-Fuelled engine before a gathering of politicians, government officials, scientists (?) and students, etc.

I got curious and searched the internet for more about the news. I got some links to the said item, which I give here:

timesofindia.indiatimes.com

cssforum.com.pk

godlikeproductions.com

pesn.com

newsworldwide.wordpress.com

The Pak Government is very happy. An engine running on Water as fuel! All energy problems will get solved! Water being available in abundance, humanity shall have unlimited energy to consume. The engineer is now to go ahead with govt. support.

Rejoicing! Hurrah!! Energy problem no more!!!

For a physicist like me, that is a pure HOAX, unfortunately. Water as fuel in place of petrol/diesel in an internal combustion engine? 100 per cent impossible. Why? Simply because the known laws of nature (physics) do not permit that.

What is the mechanism of getting energy out of noncombustible water? The news items does not make things clear. What I could understand is this: water would be subjected to electrolysis to produce hydrogen, which would act as fuel in place of petrol/diesel. That is fine; nothing wrong.

But it is not explained how that electrolysis would be effected. Electrolysis necessarily means use of electricity! Is the engineer using a storage battery to have continuous supply thereof to decompose water into its chemical constituents, one of them being hydrogen to be used as fuel? To run an engine, you would need a continuous supply of hydrogen. And that would demand a continuous process of electrolysis, which in itself implies a continuous supply of electricity.

This electric power supply is the ultimate source of energy. I reiterate that the news does not clarify if an electric supply is being used for the said engine. What else is the mechanism of electrolysis?

If this much is true then what you are actually doing is this:

electric source (electricity) →convert to chemical energy (electrolysis) → hydrogen (source of chemical energy) → convert to heat energy (hydrogen as fuel) → convert to mechanical energy (rotational motion produced) → use

this to drive a vehicle etc.

Now if this is the trick being followed, without disclosing the hidden use of an electric power supply, then a question deserves to be answered: Why not use that electricity to run an electric motor directly, which would drive the desired machinery.

electric source (electricity) → convert to mechanical energy (drive an electric motor to get rotational motion) → use this to drive a vehicle etc.

This is the principle of battery-driven cars/bikes available in the market.

Any student of thermodynamics can understand well that the first approach would be necessarily less efficient than the second, because at every step of converting one form of energy into another involved unavoidable loss of energy.

So a million dollar question is how water can act as a fuel? (I am talking of chemical fuel and not nuclear fuel!)

मध्यम वर्ग की बढ़ती संपन्नता का अभिशाप – बीजिंग में कारें और यातायात एवं प्रदूषण समस्या

चंद रोज पहले मेरी नजर बीबीसी की एक खबर पर पड़ी, जिसका विवरण इस वेब-पेज पर उपलब्ध  है: http://www.bbc.co.uk/hindi/business/2010/12/101224_beijing_car_pp.shtml चीन की राजधानी बीजिंग में कारों की बढ़ती आबादी और तज्जन्य यातायात की गंभीर होती जा रही समस्या के बारे में थी वह खबर । मेरी नजर में खबर रोचक ही नहीं बल्कि चिंतनीय  भी थी, क्योंकि उसके निहितार्थ गंभीर हैं । महानगरीय यातायात (ट्रैफिक) की समस्या तो विकसित हो रहे सभी देशों में देखने को मिल रही है, और यह बात कोई नयी खबर अब रह नहीं गयी है । संदर्भगत खबर मेरे लिए इसलिए अहम थी, क्योंकि बीजिंग के राजमार्ग की तस्वीर कुछ हद तक मेरी कल्पना से परे की थी । मैं अभी तक चीन को विकास के संदर्भ में अमेरिका के नजदीक नहीं समझता था और नहीं सोचता था कि सड़क के फ्लाइओवरों के इतने लंबे-चौढ़े जाल वहां भी विकसित हो चुके होंगे और यह भी कि रात के प्रथम प्रहर – समय यही रहा होगा – उन पर कारों की इतनी जबर्दस्त भीड़ दौड़ रही होगी, जैसा खबर के साथ की तस्वीर में दिख रहा था ।
खबर का असल मुद्दा बीजिंग की गंभीर होती यातायात समस्या थी । यह बताया गया है कि बीजिंग की सड़कों पर कारों का बोझ तेजी से न बढ़े इसके उपाय खोजे जा रहे हैं । इस दिशा में अपनाया गया पहला और कारगर उपाय है कारों की विक्री पर आंशिक रोक । नगर प्रशासन ने घोषित किया है कि बीजिंग के बाशिंदों को 2011 में केवल 2 लाख 40 कारें खरीदने की अनुमति होगी । यह संख्या पिछले साल खरीदी गयीं तकरीबन 7 लाख कारों के मुकाबले लगभग एक-तिहाई है । उक्त सरकारी निर्णय से जनता और निवेशक, दोनों, नाखुश हैं – जनता इसलिए कि उसकी निजी कार रखने की ख्वाहिश पर अड़ंगा लगता है, और निवेशक इसलिए कि उनके लाभ कमाने के अवसर घटते हैं । इस समय कार-डीलरों के पास भीड़ लगी हुई है, ताकि लोग प्रतिबंध के प्रभावी होने से पहले ही अपने अरमान पूरे कर सकें ।

संप्रति बीजिंग यातायात एवं प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है । सड़कें तेजी से बढ़ती कारों की संख्या को किस हद तक बरदास्त कर सकेंगी यह एक कठिन सवाल उठ चुका है । सड़कों का चौड़ीकरण और फ्लाईओवरों का जाल भी एक सीमा से अधिक संभव नहीं है । इसलिए कारों की संख्या अंधाधुंध न बढ़ने पाए इसके लिए प्रयास तो होने ही चाहिए । यही वहां का नगर प्रशासन करने जा रहा है । यह तो गनीमत है कि चीन में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली नहीं है, अन्यथा इस प्रकार का कथित प्रतिबंध संभव न होता । अपने देश में तो ऐसे प्रतिबंध का स्वागत धरना, प्रदर्शन, तोड़फोड़ तथा आगजनी के द्वारा होता, लेकिन बीजिंग में यह सब संभव नहीं है ।

इस संदर्भ में यह ज्ञातव्य है कि बीते दो-ढाई शताब्दियों में परवान चढ़ी औद्योगिक प्रगति का सीधा-सा परिणाम यह रहा कि पूरी दुनिया में एक नई वैश्विक संस्कृति ने जन्म लिया । वे जीवन मूल्य जो सदियों से अलग-अलग क्षेत्रों एवं समाजों में आदर पा रहे थे एक-एककर धराशायी हो गये । उसके साथ ही विश्व में सर्वत्र भोगवादी जीवनशैली ने अपने पांव पसारे । आज सर्वत्र अधिकाधिक तेजी से आर्थिक विकास की होड़ लगी है जिसके केंद्र में है उत्तरोत्तर आगे बढ़ता उपभोक्तावाद । आर्थिक प्रगति का मतलब ही है कि उपभोग्य वस्तुओं का अधिकाधिक उत्पादन हो । उनका उत्पादन बढ़े इसके लिए आवश्यक है कि उनकी खपत बढ़े और विशाल से विशालतर आकार लेता एक ऐसा संपन्न वर्ग समाज में पैदा होवे जो उन वस्तुओं का उपभोग करे । आज के युग में इस उद्येश्य से औद्योगिक संस्थाएं लगातार इस प्रयास में लगी हुई हैं कि नित नये आकर्षक उत्पाद बाजार में उतारे जाएं । इतना ही नहीं, कारों की भांति जो वस्तुएं टिकाऊ प्रकृति की हों उनके नये-नये मॉडल उपभोक्ता के समक्ष ‘परोसे’ जाएं । संस्थाओं द्वारा खपत बढ़ाने के लिए मति ‘मूड़’ सकने वाले विज्ञापनों को सहारा लिया जाता है और लोगों को उधार या कर्ज जैसी तात्कालिक मदद उपलब्ध कराते हुए भोगवाद को आगे बढ़ाया जा रहा है । इस दिशा में किए जा रहे सभी प्रयत्न सफल हो रहे हैं । लोगों की संपन्नता बढ़ रही है और उसके साथ वे सुविधाभोग के आदी होते जा रहे हैं । कुल मिलाकर उपभोक्तावाद सफल हो चला है । यह बात अलग है कि जहां एक ओर संपन्न वर्ग का आकार बढ़ रहा है तो वहीं विपन्न लोगों की संख्या भी कम नहीं हो रही है । कम से कम भारत जैसे देश के तो यही हालात हैं । शायद चीन में भी गरीबों की संख्या बहुत नहीं घट रही होगी । असल बात तो यह है कि वहां के असली हालातों की सटीक खबर कम ही मिल पाती है ।

अस्तु, इस समय सभी विकासशील देशों में निजी कारों की ललक तेजी से बढ़ रही है । इन देशों की ऊंची विकास दर के फलस्वरूप आर्थिक रूप से जो संपन्न मध्यम वर्ग उभर कर आ रहा है वह सुखसुविधाओं के तमाम साधन जुटाने में लगा है और उन साधनों में कारें प्रमुख हैं । दिलचस्प बात यह है कि कार जैसे तमाम आधुनिक साधन सुखसुविधा के लिए ही नहीं जुटाये जाते हैं, बल्कि ये सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रबल आधार भी बन चुके हैं । लोग कारें केवल इसलिए नहीं खरीदते हैं कि ये उनके दैनिक जीवन में सुविधाजनक सिद्ध होते हैं । वे तो इस बात से भी पे्ररित होते हैं कि उनके पड़ोसी, सहयोगी अथवा नाते-रिश्तेदार के पास कार है । हर कोई बराबरी ही नहीं बल्कि इन तमाम लोगों के आगे निकलना चाहता है संपन्नता में और फिर उसके प्रदर्शन में । शायद ही कोई तुलना किए बिना स्वयं में संतुष्ट रहने की कला सीखना चाहता होगा । सर्वत्र आगे निकल जाने की होड़ मची है और कारें उसका एक परिणाम है ।

वैसे भी संपन्नता खुद में एक सामाजिक समस्या है । जी हां, क्योंकि आप यदि संपन्न है तो करेंगे क्या अपनी संपन्नता का ? कोई भी दान करने के लिए धन नहीं कमाता है । हां अपने अर्जित धन का एक छोटा हिस्सा दान में दे जरूर सकता है, किंतु ऐसे मामले नियम नहीं, अपवाद होते हैं । संपन्नता है तो धन का उपभोग व्यक्ति करेगा ही, सुविधाएं जुटाएगा ही, कार खरीदेगा ही । और तब पैदा होती हैं तरह-तरह की समस्याएं । जहां व्यक्ति श्रमहीनता के जीवन के कारण रोगी बन जाता है, वहीं वह प्रदूषण जैसी समस्याएं पैदा करता है, कार का उपभोग करते हुए ट्रैफिक-जाम के प्रति योगदान करता है । याद रहे अपने लिए सुख-साधन जुटाते वक्त शायद ही कोई व्यक्ति इस बात पर विचार करता होगा कि कहीं इस सबसे अन्य लोगों को असुविधा तो नहीं होगी । “समस्या पैदा हों तो हों मुझसे क्या मतलब” यह आम जीवन दर्शन है । इस संदर्भ में मेरी प्रार्थना है, “सर्वे भद्राणि पश्यन्तु” । – योगेन्द्र जोशी