विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day): क्या कुछ अहमियत है भी इसकी?

विश्व पर्यावरण दिवस

आज विश्व पर्यावरण दिवस है – ऐसा दिवस जो दुनिया वालों को याद दिलाए कि उन्हें इस धरती के पर्यावरण को सुरक्षित रखना है, उसे अधिक बिगड़ने से रोकना है, उसे इस रूप में बनाए रखना है कि आने वाली पीढ़ियां उसमें जी सकें । लेकिन यह दिवस अपने उद्येश्यों में सफल हो भी सकेगा इसमें मुझे शंका है । काश कि मेरी शंका निर्मूल सिद्ध होती ! कुछ भी हो, मैं पर्यावरण के प्रति समर्पित विश्व नागरिकों की सफलता की कामना करता हूं । और यह भी कामना करता हूं कि भविष्य की अभी अजन्मी पीढ़ियों को पर्यावरणजनित कष्ट न भुगतने पड़ें ।

अभी तक वैश्विक स्तर पर अनेकों ‘दिवस’ घोषित हो चुके हैं, यथा ‘इंटरनैशनल वाटर डे’ (22 मार्च), ‘इंटरनैशनल अर्थ डे’ (22 अप्रैल), ‘वर्ल्ड नो टोबैको डे’ (31 मई), ‘इंटरनैशनल पाप्युलेशन डे’ (11 जुलाई), ‘वर्ल्ड पॉवर्टी इरैडिकेशन डे’ (17 दिसंबर), ‘इंटरनैशनल एंटीकरप्शन डे’ (9 दिसंबर), आदि । इन सभी दिवसों का मूल उद्येश्य विभिन्न छोटी-बड़ी समस्याओं के प्रति मानव जाति का ध्यान खींचना हैं, उनके बीच जागरूकता फैलाना है, समस्याओं के समाधान के प्रति उनके योगदान की मांग करना है, इत्यादि । परंतु यह साफ-साफ नहीं बताया जाता है कि लोग क्या करें और कैसे करें ।

पर्यावरण शब्द के अर्थ बहुत व्यापक हैं । सड़कों और खुले भूखंडों पर आम जनों के द्वारा फैंके जाने वाले प्लास्टिक थैलियों की समस्या पर्यावरण से ही संबंधित है । शहरों में ही नहीं गांवों में भी कांक्रीट जंगलों के रूप में विकसित हो रहे रिहायशी इलाके पर्यावरण को प्रदूषित ही करते हैं । भूगर्भ जल का अमर्यादित दोहन अब पेय जल की गंभीर समस्या को जन्म दे रहा है । हमारे शहरों एवं गांवों में फैली गंदगी का कोई कारगर इंतजाम नहीं है । ध्वनि प्रदूषण भी यदाकदा चर्चा में आता रहता है । जलवायु परिवर्तन को अब इस युग की गंभीरतम समस्या के तौर पर देखा जा रहा है । ऐसी तमाम समस्याओं के प्रति जागरूकता फैलाने की कोशिश की जा रही है एक दिवस मनाकर । क्या जागरूकता (awareness) की बात सतत चलने वाली प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए ? एक दिन विभिन्न कार्यक्रमों के जरिये पर्यावरण दिवस मनाना क्या कुछ ऐसा ही नहीं जैसे हम किसी का जन्मदिन मनाते हैं, या कोई तीज-त्योहार ? एक दिन जोरशोर से मुद्दे की चर्चा करो और फिर 364 दिन के लिए उसे भूल जाओ ?

जागरूकता के आगे

और मात्र जागरूकता से क्या होगा ? यह तो बतायें कि किसी को (1) वैयक्तिक एवं (2) सामुदायिक स्तर पर करना क्या है ? समस्या से लोगों को परिचित कराने के बाद आप उसका समाधान भी सुझायेंगे, लेकिन उसके बाद की निहायत जरूरी चीजें, प्रतिबद्धता (commitment) एवं समर्पण (dedication), कहां से लाएंगे ? क्या लोग वह सब करने को तैयार हांेगे जिसे वे कर सकते हैं, और जिसे उन्हें करके दिखाना चाहिए ? उत्तर है नहीं । यह मैं अपने अनुभवों के आधार पर कहता हूं । मैं पर्यावरण की गंभीरतम समस्या जलवायु परिवर्तन का मामला एक उदाहरण के तौर पर ले रहा हूं । जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण पाने के लिए हम में से हर किसी को कार्बन उत्सर्जन घटाने में योगदान करना पड़ेगा, जिसका मतलब है कि जीवास्म इंधनों का प्रत्यक्ष तथा परोक्ष उपयोग कम से कम किया जाए । क्या आप कार चलाना बंद करेंगे, अपने घर का एअर-कंडिशनर को बंद करेंगे, कपड़ा धोने की मशीन का इस्तेमाल बंदकर हाथ से कपड़े धोएंगे, अपने विशाल घर में केवल दो-तीन ‘सीएफएल’ विजली बल्ब जलाकर गुजारा करेंगे, और हवाई सफर करना बंद करेंगे, इत्यादि-इत्यादि ? ये सब साधन जलवायु परिवर्तन की भयावहता को बढ़ाने वाले हैं । जिनके पास सुख-सुविधा के ये साधन हैं वे उन्हें छोड़ने नहीं जा रहे हैं । इसके विपरीत जिनके पास ये नहीं हैं, वे भी कैसे उन्हें जुटायें इस चिंता में पड़े हैं । कितने होंगे जो सामर्थ्य हो फिर भी इन साधनों को स्वेच्छया ‘न’ कहने को तैयार हों ? क्या पर्यावरण दिवस सादगी की यह भावना पैदा कर सकती है ?

वास्तव में पर्यावरण को बचाने का मतलब वैयक्तिक स्तर पर सादगी से जीने की आदत डालना है, जो आधुनिक काल में उपेक्षा की दृष्टि से देखी जाने वाली चीज है । यह युग तड़क-भड़क (ग्लैमर) का है । दिखावे का युग है यह । हर व्यक्ति की कोशिश रहती है कि उसके पास अपने परिचित, रिश्तेदार, सहयोगी अथवा पड़ोसी से अधिक सुख-साधन हों । यह मानसिकता स्वयं में स्वस्थ पर्यावरण के विपरीत जाती है ।

भोगवाद आधारित अर्थतंत्र

जरा गौर करिए इस तथ्य पर कि पूरे विश्व का आर्थिक तंत्र इस समय भोगवाद पर टिका है । अधिक से अधिक उपभोक्ता सामग्री बाजार में उतारो, लोगों को उत्पादों के प्रति विज्ञापनों द्वारा आकर्षित करो, उन्हें उन उत्पादों का आदी बना डालो, उन उत्पादों को खरीदने के लिए ऋण की व्यवस्था तक कर डालो, कल की संभावित आमदनी भी आज ही खर्च करवा डालो, आदि आधुनिक आर्थिक प्रगति का मुत्र है । हर हाल में जीवन सुखमय बनाना है, भले ही ऐसा करना पर्यावरण को घुन की तरह खा जाए ।भोगवाद आधारित अर्थतंत्र

कुछ कार्य लोग अपने स्तर पर अवश्य कर सकते हैं, यदि वे संकल्प लें तो, और कुछ वे मिलकर सामुदायिक स्तर पर कर सकते हैं । किंतु कई कार्य केवल सरकारों के हाथ में होते हैं । वे कितने गंभीर हैं मुद्दे पर ? उनके लिए आर्थिक विकास पहले कि पर्यावरण ? एक तरफ पर्यावरण बचाने का संदेश फैलाया जा रहा है, और दूसरी ओर लोगों को अधिकाधिक कारें खरीदने के लिए प्रेरित किया जा रहा है । मैं ‘कार’ को आज के युग के उपभोक्ता साधनों के प्रतिनिधि के रूप में ले रहा हूं । कार से मेरा मतलब उन तमाम चीजों से है जो लोगों को दैहिक सुख प्रदान करती हैं और उन्हें शारीरिक श्रम से मुक्त कर देती हैं । क्यों नहीं लोगों को साइकिलें प्रयोग में लेने को प्रेरित किया जाता है ? कारों के इतने विज्ञापन देखने को मिलते हैं, साइकिलों के कितने नजर आते हैं ? क्यों नहीं सरकारें साइकिल उद्योग को बढ़ावा देती हैं ? क्यों नहीं सरकारें सामुदायिक परिवहन व्यवस्था पर जोर डालती है ? क्या यह सच नहीं है कि बेतहासा बढ़ती हुई कारों की संख्या के कारण सड़कों का चौढ़ीकरण किया जाता है, फ्लाई-ओवरों का निर्माण किया जाता है, भले ही ऐसा करने का मतलब पेड़-पौधों का काटा जाना हो और फलतः पर्यावरण को हानि पहुचाना हो ?

ऐसे अनेकों सवाल मेरे जेहन में उठते हैं । मुझे ऐसा लगता है कि पर्यावरण दिवस मनाना एक औपचारिकता भर है । मुद्दे के प्रति गंभीरता सतही भर है, चाहे बात आम लोगों की हो अथवा सरकारों की; कुछएक स्वयंसेवी संस्थाओं तथा समर्पित व्यक्तियों के अपवाद छोड़ दें । – योगेन्द्र जोशी

जलवायु परिवर्तन की समस्या – रोचक एवं चिंतनीय तथ्य विज्ञान पत्रिका ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ से

दिसंबर 17 की पोस्ट में मैंने वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संबंध में संपन्न कोपनहेगन बैठक का जिक्र करते हुए अपनी कुछ टिप्पणियां प्रस्तुत की थीं । उसके बाद दिनांक 23-12-2009 की पोस्ट में उस मुद्दे से घनिष्ठ रूप से जुड़े अमेरिका-प्रेरित आधुनिक जीवन शैली का संक्षिप्त खाका पेश किया था । जलवायु परिवर्तन की समस्या के समाधान हेतु जिन प्रयासों की चर्चा जल रही है उनके बारे में भी कुछ कहने का मेरे मन में तब से विचार है । लेकिन इस बीच अमेरिकी विज्ञान पत्रिका ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ में छपा एक लेख मेरे देखने में आ गया, जिसमें जलवायु परिवर्तन के मूल कारण, यानी विकसित देशों में ऊर्जा की बेतहासा खपत, से संबंधित कुछ रोचक एवं चिंतनीय आंकड़े प्रस्तुत किये गये हैं । मैं इस आलेख में उनकी चर्चा करता हूं; अपनी बातें आगामी पोस्ट में । (स्रोतः साइंटिफिक अमेरिकन में डेविड बियलो, David Biello, का लेख ‘Environmental ills? It’s consumerism, stupid’ शीर्षक पर क्लिक करें ।)

(1) एक औसत बांग्लादेशी नागरिक के सालाना खर्चे से अधिक खर्चा यूरोप एवं अमेरिका में ‘जर्मन शेफर्ड’ प्रजाति के दो पालतू कुत्तों पर किया जाता है ।

(2) विश्व की प्रदूषण समस्या की गंभीरता के पीछे के कारणों में से एक अहम कारण है दुनिया की निरंतर बढ़ती जा रही जनसंख्या, जो इस सदी के मध्य (2050) तक अनुमानतः 9 अरब, यानी 900 करोड़, पार कर जायेगी । (अभी जनसंख्या करीब 675 करोड़ है, और उसमें चीन तथा भारत का सम्मिलित ‘योगदान’? – लगभग 250 करोड़ – एक तिहाई से भी अधिक है !) पिछले 50 वर्षों में वैश्विक जनसंख्या दुगुना हुई है, किंतु प्राकृतिक संसाधनों की खपत चौगुनी हो गयी ।

(3) हिसाब लगाया गया है कि कोपनहेगन की पिछली बैठक (विगत दिसंबर) में 40000 (चालीस हजार) से अधिक प्रतिभागियों के कारण मात्र दो सप्ताह के भीतर उत्सर्जित ‘ग्रीनहाउस गैसों’ की मात्रा 600000 (छः लाख) इथिओपियावासियों के साल भर के कुल उत्सर्जन से अधिक थी ।

(4) दुनिया के 50 करोड़ संपन्नतम लोगों (कुल आबादी का 7.5%) के द्वारा समस्त कार्बन प्रदूषण (कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन) का 50% फैलाया जाता है, जब कि 300 करोड़ (कुल आबादी के आधी से थोड़ा कम) सबसे गरीब लोगों के कारण मात्र 6% प्रदूषण होता है ।

(5) संयुक्त राष्ट्र संघ की 2005 की एक रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों का दोहन इतना अधिक हो रहा है कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए कुछ बच पायेगा यह संदेहास्पद है ।

(6) ‘वर्डवॉच इंस्टिट्यूट’ नामक संस्था के अध्यक्ष क्रिस्टोफर फ्लाविन (Christopher Flavin) के अनुसार “उपभोगवाद की आधुनिक संस्कृति ने पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित किया है, लेकिन बदले में उससे मानव जीवन सुखी हुआ ही हो ऐसा नहीं माना जा सकता है ।” (टिप्पणीः स्थाई संतोष और सुख का भ्रम अलग-अलग बातें हैं । सीमित भौतिक साधनों वाला व्यक्ति संपन्न व्यक्ति से अधिक आत्मसंतुष्ट हो सकता है ! किंतु आधुनिक युग में मनुष्य में बाह्य प्रदर्शन तथा भौतिक साधनों के द्वारा सुखानुभूति पाने में ही जीवन व्यतीत कर रहा है । उदाहरणार्थ, कभी लोग परोपकार करने में सुख पाते थे, तो अब येनकेन प्रकारेण धनोपार्जन ही लक्ष्य रह गया है ।)

(7) उक्त संस्था की एक रिपोर्ट के प्रमुख लेखक एरिक एसडूरिन (Erik Assadourian) के कथनानुसार हमें पिछले दो शतकों में विकसित भोगवाद की संस्कृति को बदलना होगा, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण सच तो यह है कि भोगवाद विकसित देशों तक सीमित न रहकर विकसित हो रहे देशों तक को अपने चपेटे में तेजी से ले रहा है ।

(8) “पहले अमेरिका प्रदूषण का उत्सर्जन करता था, लेकिन अब चीन उससे आगे निकल चुका है । चीन तो अब कारों की खपत में विश्व का सबसे बड़ा बाजार बन चुका है ।” — एसडूरिन का कथन ।

(9) वर्डवाच ने Ecuador देश का भी हवाला दिया है, जहां के बाशिंदों ने धरती माता (Mother Earth) की पूजा का व्रत ले रखा है और वे इस बात पर जोर दे रहे हैं कि उपभोग के जो तत्त्व मां धरती बारबार नहीं दे सकती उन पर आधारित भोगवाद को हम बढ़ावा नहीं दे सकते । हमें चिरस्थायित्च की दिशा में बढ़ना है, अर्थात् उन वस्तुओं को उपभोग में लेना है जिनको प्रकृति दुबार-तिबारा हमें दे सकती है । (इस प्रकार के चिरस्थायी भोगवाद में, उदाहरणार्थ, पारंपरिक विधि की कृषि शामिल है ।)

(10) और अंत में, वर्डवाच की उक्त बातों की चर्चा के बाद ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ पत्रिका की अपनी टिप्पणी देखिएः
“Of course, at the same time, Worldwatch would like you to spend $19.95 for a paperback version of its report, or $9.95 for a PDF or electronic document for your (yet another gadget) Kindle. Switching away from a capitalist ethic of consumerism continues to be easier said than done.” (अवश्य ही इतने सब के बाद वर्डवाच आपसे अपेक्षा करता है कि आप 19.95 डालर देकर उसकी रिपोर्ट का पेपरबैक संस्करण खरीदें, अथवा अपने ‘किंडल’ (एक उपकरण यह भी) के लिए 9.97 डालर से उसकी पीडीएफ या इलेक्ट्रॉनिक प्रति खरीदें । दरअसल पूंजीवाद की भोगवादिता से हटने की बात करना जितना आसान है उससे कहीं अधिक कठिन उस पर अमल करता है ! कथनी और करनी में फर्क तो मानव स्वभाव का स्थाई अंग है; पर्यावरण की बात करने वालों ने खुद कौन सी ऊर्जा-खाऊ सुविधाएं त्याग दी हैं ?)
– योगेन्द्र जोशी

भौतिक भोगवाद की अमेरिकी जीवनशैली, जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में

भौतिक सुविधा से लैस आधुनिक अमेरिकी जीवन पद्धति को मेरी दृष्टि में कार-क्रेडिटकार्ड संस्कृति कहा जाना चाहिए ।

क्रेडिटकार्ड संस्कृति

पहले क्रेडिटकार्ड की बात । कहा जाता है कि आधुनिक क्रेडिटकार्ड का जन्म अमेरिकी धरती पर ही सन् 1920 में हुआ था, जब व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा अपने ग्राहकों को सामान एवं ‘सेवा’ उधार बेचे जाने लगे (क्लिक करें http://inventors…) । उन्होंने ग्राहकों के साथ लेनदेन हेतु अपने-अपने कार्ड (क्रेडिटकार्ड अर्थात् उधारी के लिए कार्ड) वितरित किये । बाद में दो दशक के भीतर उन्होंने एक-दूसरे के कार्डों को भी मान्यता देना शुरु कर दिया । इस विनिमय व्यवस्था के तहत ‘क्रेडिटकार्ड-कंपनियां’ अपने कार्ड-धारक के द्वारा की गयी खरीद-फरोख्त के पैसे की जिम्मेदारी स्वयं उठाती हैं, जिसका भुगतान धारक बाद में निर्धारित नियम-शर्तों के अनुसार उन्हें बाद में करता है । आपकी जेब में किसी पल खर्चे के लिए पैसा न हो तो कोई बात नहीं, कार्ड आपकी मदद करेगा । उधार चुकता होता रहेगा । आज क्रेडिटकार्ड अमेरिकी जीवन का अभिन्न हिस्सा है, जिसके बिना वहां जीना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल अवश्य है । यह व्यवस्था अब विश्व के विकसित-अर्धविकसित क्षेत्रों में अपने पांव पसार चुकी है । इस क्रेडिटकार्ड संस्कृति के पीछे मुझे एक संदेश छिपा दिखता हैः “पैसा पास नहीं तो क्या, कल की आमदनी आज खर्च कर डाल”, जिसे “ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्‌” की चार्वाक-सम्मत धारणा का आधुनिक अमेरिकी संस्करण कह सकते हैं । मुझे लगता है कि ‘ऋणं कृत्वा’ की यह नीति प्राकृतिक संसाधनों के मामले में भी अपनाई जा रही है

कार संस्कृति

और अब कार संस्कृति की बात । इस ‘कार’ शब्द को मैं भौतिक सुख-सुविधा के लिए प्रयोग में लिए जा रहे आधुनिक मशीनी व्यवस्था के प्रतीक के रूप में प्रयोग में ले रहा हूं । इंग्लैंड में जन्मी और पिछले दो-ढाई सौ वर्षों से निरंतर प्रगतिशील औद्योगिकी ने वैश्विक स्तर पर चामत्कारिक सांस्कृतिक परिवर्तन कर डाले हैं । सर्वप्रथम एवं सर्वाधिक बदलाव यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका में देखने को मिले हैं, जहां औद्योगिक क्रांति और उससे अर्जित संपन्नता के फलस्वरूप लोगों का दैनिक जीवन मशीनों पर निर्भर हो चुका है । मैं उन मशीनों की बात कर रहा हूं जो ऊर्जा के किसी न किसी स्रोत की मांग करते हैं और जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव का कारण बने हैं । वस्तुतः विभिन्न मशीनों का आविष्कार इसी उद्येश्य से किया गया कि मानव जीवन को हर प्रकार के शारीरिक श्रम से मुक्त किया जा सके और उसे भौतिक कष्टों से छुटकारा दिलाया जा सके । अमेरिका मशीनों पर निर्भरता के मामले में कदाचित् सबसे आगे रहा है । वास्तव में वह अन्य सभी देशों के लिए एक मानक बन चुका है । फलतः हर देश अमेरिका की तरह भौतिक सुख-सुविधा के साधनों से संपन्न होने की चाहत के साथ विकसित होने में लगा है । विकास का मतलब ही है अमेरिका जैसा बनना । मैं अमेरिका का नाम सबसे पहले ले रहा हूं क्योंकि यह रोजमर्रा की जिंदगी में आधुनिक मशीनों के प्रयोग में कदाचित् सबसे आगे है । अन्यथा सभी संपन्न देश कमोबेश समान हैं और विकसित हो रहे देशों के लिए ‘आदर्श’ बने हुए हैं ।

अगर आप आज के अमेरिका पर नजर डालें तो पायेंगे कि वहां लगभग हर कार्य बिजली या पेट्रॉल/गैस जैसे इंधन से चलने वाली मशीनों से किया जाता है । स्वयं बिजली भी अधिकांशतः कोयला/पेट्रॉलियम/गैस से प्राप्त की जा रही है (80 फीसदी से अधिक) । अतः कहा जाना चाहिए कि ये मशीनें प्रत्यक्षतः अथवा परोक्षतः जीवाश्म इंधन पर निर्भर करती हैं और तदनुसार वायुमंडलीय कार्बन प्रदूषण का कारण हैं

मशीनों की बातें करने पर मेरे ध्यान में सबसे पहले कारें आती हैं, जो अमेरिका के लोगों के जीवन का अनिवार्य अंग बन चुकी हैं । बिना कार के वहां जीवन नामुमकिन नहीं तो मुश्किल अवश्य है, क्योंकि अमेरिका में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था कारगर नहीं है । न्यू-यार्क जैसे घने बसे शहरों को अपवाद रूप में देखा जाना चाहिए । अनुमान है कि अमेरिका में इस समय 10 करोड़ से अधिक कारें हैं, जब कि उसकी आबादी करीब 31 करोड़ है । (क्लिक करें http://www.census…) कैलिफोर्निया, जो अमेरिका का सर्वाधिक संपन्न राज्य है, में प्रति परिवार औसतन डेड़-दो कारें आंकी जाती हैं । अमेरिका में कारें परिवहन का सबसे सस्ता माध्यम बन चुकी हैं । इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं । सान-होजे से सान-फ्रांसिस्को (दोनों बड़े शहर) तक रेलगाड़ी से आने-जाने में जो खर्च आता है उससे कम में कार से वह सफर तय हो सकता है । ऐसा क्यों न हो भला, जब वहां तीन-सवातीन डालर में एक गैलन पेट्रॉल मिल जाता है (और उसे भी महंगा बताया जाता है), अर्थात् करीब 40 रुपये में एक लीटर, अपने हिंदुस्तान से सस्ता ! (बता दूं कि 1 अमेरिकी गैलन = 3.8 लीटर और 1 डालर = 46-47 रुपये) यह कीमत वाकई कितनी कम है इसे समझने के लिए यह जानना काफी होगा कि एक अमेरिकी की औसत सालाना आमदनी एक भारतीय से करीब 13 गुना अधिक है, अर्थात् वह भारतीय से 13 गुना अधिक धन व्यय कर सकता है । यह भी देखें कि कार के साथ एक अतिरिक्त लाभ यह कि उसके प्रयोग में लचीलापन है – अपनी सुविधा से जब चाहें जहां चाहें जा सकते हैं ।

इस सब का मतलब है हर अमेरिकी परिवार में कम से कम एक कार का होना । यदि कार नहीं है तो माली हैसियत जरूर कमजोर होगी, किंतु ऐसे कमजोर लोगों की तादाद मेरे अंदाज से कुल जनसंख्या के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी । आप सड़कों पर सर्वत्र कारों को दौड़ते पायेंगे, शायद अर्धरात्रि से सुबह तक कुछ सन्नाटा रहता होगा । फुटपाथों पर कभी इक्का-दुक्का आदमी पैदल दिखेंगे, संभव है टहलने निकले हों । कभी-कभी साइकिल के दर्शन भी हो सकते हैं । शाम के वक्त ऊंची जगह से किसी ‘फ्री वे’ पर नजर डालेंगे तो आपको पेट्रॉल-डीजल चालित वाहनों की रोशनी का सैलाब सड़क पर बहते हुए दिखेगा । इतना ही नहीं, आप देखते हैं सड़क किनारे की रात्रिकालीन जगमग रोशनी, केवल निर्जन क्षेत्रों को छोड़कर सर्वत्र ।

इतनी बड़ी संख्या में कारों और अन्य वाहनों के लिए शहरी इलाकों में लंबी-चीैड़ी सड़कों का जाल बिछा हुआ है, तो छोटे-बड़े शहरों को जोड़ने के लिए अधिकतर जगहों में 6-6 या 8-8 लेनों वाली ‘फ्री-वे’ का जाल है, ताकि वाहन निर्धारित गति (जो अधिकतर क्षेत्रों में 70 मील करीब यानी 113 किलोमीटर प्रति घंटा रहती है) से चल सकें । कहीं कोई रुकावट न झेलनी पड़े इस उद्येश्य से वे क्रासिंग-मुक्त होते हैं । फ्लाई-ओवरों का जाल सर्वत्र बिछा हुआ है ताकि हर मार्ग की कोई ‘लेन’ दूसरे के बगल से समांतर जुड़ जाये ।

मैं कह चुका हूं कि अमेरिका में ‘पब्लिक ट्रांसपोर्ट’ (सार्वजनिक परिवहन) की स्थिति उत्साहवर्धक नहीं है, क्योंकि निजी कारें सस्ती तथा सुविधाजनक सिद्ध होती हैं । इस ‘कार-कल्चर’ के अनुरूप किराये के कारों का चलन वहां काफी है, या फिर जरूरी हुआ तो निजी कार का वैकल्पिक अवतार, टैक्सी । जो लंबी दूरी कार से न तय करना चाहते हैं, वे रेल या हवाई सफर से गंतव्य को जाते हैं और वहां किराये के कार का प्रयोग करते हैं । क्षेत्रफल की दृष्टि से अमेरिका अपने देश से करीब 3 गुना बड़ा है । वहां पूर्वी तट से पश्चिमी तट तक की हवाई यात्रा 5-6 घंटे ले लेती है – दिल्ली से सिंगापुर तक का हवाई समय समझिए । ऐसे में रेल-यात्रा लोकप्रिय नहीं है । यह बात विचारणीय है कि जापान-फ्रांस की भांति अमेरिका में तेज रफ्तार ट्रेनें विकसित नहीं हुई हैं । अतः दूरस्थ स्थानों के लिए हवाई यात्रा ही प्रचलन में है । किसी बड़े हवाई अड्डे पर प्रति मिनट दो-एक वायुयानों को उड़ना-उतरना आम बात है । इस सब का अर्थ है पेट्रॉल की खपत ।

मशीनें, सर्वत्र मशीनें

ऊर्जा की खपत मुख्यतः कारों-वायुयानों तक ही सीमित हो ऐसा नहीं है । आज के अमेरिका में प्रायः हर कार्य मशीनों द्वारा होता है । शारीरिक श्रम इन मशीनों को चलाने/नियंत्रित करने तक सीमित है, या उन कार्यों में प्रयुक्त होती हैं जिनके लिए उपयुक्त साधन अभी विकसित नहीं हुए हैं, जैसे ग्रॉसरी-स्टोर से सामान खरीदकर कार तक लाना, किचन में भोजन तैयार कर परोसना और खाना, अथवा डाक्टरी सलाह पर व्यायाम करना, इत्यादि । अन्यथा श्रम-आधारित अधिकांश कार्य बिजली की खपत वाले उपस्कर करते हैं । कपड़े धोने-निचोड़ने-सुखाने के लिए ‘वाशिंग-कम-ड्राइंग’ मशीन, खाने-पीने की वस्तुओं को दिनों-दिनों संरक्षित रखने के लिए बड़े-सा फ्रिज, ‘कार्पेट-क्लीनिंग’ के लिए ‘वैक्यूम-क्लीनर’, बर्तनों के लिए ‘डिश-वॉशर’ इत्यादि । इतना ही नहीं, घर भर को पानी की आपूर्ति के लिए पानी गर्म करने का उपस्कर । घरों के तापमान को अपने अनुकूल रखने के लिए ‘एसी’ तथा ‘हीटर’ । कंप्यूटर ओर इंटरनेट सुविधा भी करीब-करीब सबके पास । इन सबके साथ-साथ प्रायः हर उपकरण को नियंत्रित करने के लिए ‘स्टैंड-बाई’ विधा से लैस ‘रिमोट कंट्रोल’ सुविधा । बिजली-पानी की आपूर्ति तो चौबीसों घंटे रहनी ही है ।

यह तो हुई घरों की बात । घर के बाहर की दुनिया भी उतनी ही आकर्षक । बाजार का मतलब भी अपने यहां से कुछ अलग ही । मेरा अनुमान है कि अमेरिका में अब छोटे-मोटे उद्योग-धंधे भी नहीं रह गये हैं, क्योंकि छोटी-मोटी रोजमर्रा की चीजें आयातित की गईं नजर आती हैं, अधिकतर चीन से । मुझे लगता है कि सभी उद्योग ‘कॉर्पोरेट हाउसेज’ के हाथ में जा चुके हैं, और बाजार भी उनमें से एक है । उपभोक्ता वस्तुएं के लिए ‘डिपार्टमेंटल स्टोरों’ की शृंखलाएं नजर आती हैं या बड़े-बड़े ‘मॉल’ जहां या तो व्यक्तिगत छोटी-मोटी दुकानें सजी रहती हैं, या फिर खास उपभोक्ता वस्तुओं के लिए चेन-स्टोर । ये सभी स्थान पूर्णतः वातानुकूलित । जमाना ‘फ्रोजन-फूड’ का है और उनके लिए इन स्थानों पर अलग से अधिक ठंडे भंडारण कक्ष । मॉल तथा स्टोर बिजली से जगमग, रात-दिन, जैसा मेरा अनुभव रहा है । मेरा अनुमान है कि इन स्टोरों की बत्तियां कभी बुझाई नहीं जाती हैं । इन सभी जगहों पर एक मंजिल से दूसरे पर जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ने की जरूरत नहीं रहती, ‘इस्केलेटर’ जो रहते हैं इस काम के लिए, या फिर ‘एलिवेटर’ (ब्रिटिश अंग्रेजी में ‘लिफ्ट’) । इतना ही नहीं, अधिकांश स्टोरों के प्रवेश-द्वारों के कपाट तक प्रायः स्वचालित रहते हैं; आप निकट पहुंचे नहीं कि वे स्वयं ही खुल जाते हैं ।

मैंने कहा कि करीब-करीब सभी घरों में आधुनिक सुविधा के साधन उपलब्ध रहते हैं । इनमें से एक, वैक्यूम क्लीनर, ने घरों/स्टोरों से निकलकर सड़कों एवं आवासीय परिसरों में भी जगह पा ली है । इन स्थलों की सफाई हाथ के झाड़ू से नहीं बल्कि इन्हीं वैक्यूम क्लीनरों से की जाती है, जो सफाई वाली गाड़ियों/ट्रॉलियों में लगे रहते हैं, या फिर हाथ के छोटे क्लीनरों को पेट्रॉल-इंजन/बैटरी से चलाते हुए इस्तेमाल किया जाता है । हर हाल में थोड़ा शारीरिक श्रम तो है, किंतु न्यूनतम संभव । जिंदगी आरामदेह है अमेरिका में । जिसके पास पर्याप्त धन नहीं उसे तो वहां भी कष्ट रहते हैं । किंतु इतनी निर्धनता वाले लोगों की संख्या 10 प्रतिशत से कम ही होगी ऐसा मेरा विश्वास है ।

संक्षिप्त कामचलाउ शब्दों में खींची तस्वीर है यह मशीनों पर निर्भर अमेरिका की । वस्तुतः कमोबेश यही तस्वीर है सभी विकसित देशों की और इसी सब का ख्वाब देख रहे हैं विकासशील देश । लेकिन जिस सुख-सुविधा की बात कही है वह ऐसे ही नहीं मिलती है; उसके लिए ऊर्जा चाहिए, जो घूम-फिर कर जीवाश्म इंधन से ही मुख्यतया प्राप्त की जा रही है (80 फीसदी से अधिक), और बदले में पैदा होती है वायुमंडल में घुल रही कार्बन डाई-ऑक्साइड (कार्बन उत्सर्जन) । प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन में अमेरिका अग्रणी है, आस्ट्रेलिया के ठीक पीछे, यहां बताई गयी जीवनशैली के कारण । (क्लिक करें http://www.ucsusa…)

आजकल जिस जलवायु परिवर्तन की बात की जा रही है उसके मूल में है जीवाश्म इंधनों का अतिशय प्रयोग, जो स्वयं में उपर्युल्लिखित अमेरिकी में विकसित आधुनिक जीवन शैली के कारण हो रहा है । तब क्या यह समझना कठिन है कि समस्या के निराकरण के लिए इस जीवनशैली से कम से कम अंशतः मुक्त हुआ जाए ? लेकिन यह हो नहीं सकता; कौन भला अधिकाधिक सुख-सुविधाएं नहीं चाहता ? धन से समर्थ हो फिर भी उन पर कम निर्भर हो ? – योगेन्द्र जोशी