पुनर्मूषको भव – किन्तु न शक्यं तत्कर्तुम् (विवशता अपराधी के मुठभेड़ की)

देश में अनेक मौकों पर दुर्दांत अपराधियों का मुठभेड़ (इंकाउन्टर) में मारा जाना कोई नई बात है। पुलिसबलों द्वारा ऐसी घटनाओं को अंजाम देना एक प्रकार की विवशता का द्योतक है। अभी हाल में मुठभेड़ की ऐसी ही एक घटना कानपुर के अपराधी विकास दुबे के साथ घटी। उस घटना पर मुझे एक शिक्षाप्रद कथा की याद हो आई जिसे मैंने छात्र-जीवन में अपनी किसी संस्कृत पुस्तक में पढ़ी थी। कथा का शीर्षक थाः “पुनर्मूषको भव”, अर्थात् फिर से मूस (mouse) हो जाओ।

कुख्यात अपराधियों को लेकर अपनी टिप्पणी करने से पहले मैं उक्त कथा का संक्षेप में उल्लेख कर देता हूं।

किसी वन में एक महात्माजी (संन्यासीजी) कुटिया बनाकर रहते थे। वे किसी वनीय प्राणी को भगाते-दौड़ाते नहीं थे। विपरीत उसके वे अपने भिक्षार्जित भोज्य पदार्थ उनको भी खिलाते थे। समय वीतते-वीतते वहां के सभी प्राणी उनके सापेक्ष निर्भिक हो चुके थे। पास के गांव से कुत्ते-बिल्ली भी उनके पास आते-जाते थे।

उनकी कुटिया के निकट एक मूस/चूहा भी बिल बनाकर रहता था। वह भी उनके समीप निडर होकर खेलता-कूदता था। एक बार चूहे ने महात्माजी को अपनी व्यथा सुनाई, “महाराज, आप तो अपने तप के बल पर बहुत-से कार्य सिद्ध कर सकते हैं। मुझे भी एक कष्ट से मुक्ति दिलाइये।”

उदारमना महात्माजी ने जब उसके कष्ट के बारे में जानना चाहा तो चूहे ने कहा, “महाराज, एक बिल्ली अक्सर यहां आती है। वह मुझे मारकर खाना चाहती है। उससे मुझे डर लगता है। क्यों नहीं आप मुझे बिल्ली बना देते हैं ताकि मैं उसका मुकाबला कर सकूं।”

महात्माजी ने उसकी बात मानकर उस पर अभिमंत्रित का सिंचन किया और ‘तथास्तु’ कहते हुए उसे बिल्ली बना दिया। अब बिल्ली बना चूहा खुश था और निर्भीक होकर कुटिया के आसपास घूमने लगा। दिन बीतते गये। एक दिन कोई कुत्ता आकर उस बिल्ली के पीछे दौड़ पड़ा। जब भी कोई कुत्ता आता वह बिल्ली को काटने दौड़ पड़ता। बिल्ली ने महात्माजी से शिकायत करके उसे भी कुत्ता बना देने की प्रार्थना की। महात्माजी ने दया-भाव से उसे कुत्ता बना दिया। उस वन में जंगली जानवर भी रहते थे जो अक्सर कुटिया के आसपास आ जाते थे। महात्माजी उन्हें भी प्यार से पास आने देते। उन्हें देख कुत्ता डर जाता था। एक बाघ उस कुत्ते को शिकार बनाने की फिराक में था। तब उस कुत्ते ने महात्माजी को अपनी परेशानी बताई और उसे भी बाघ बना देने का अनुरोध किया। दयालु महात्माजी ने तथास्तु कहते हुए उसकी यह मुराद भी पूरी कर दी। बाघ की हिंसक प्रकृति के अनुरूप व्यवहार करते हुए वह महात्माजी पर झपटने की सोचने लगा। महात्माजी उसका इरादा भांप गये और “पुनर्मूषको भव” कहते हुए मंत्रों से उसे फिर से चूहा बना दिया।

उक्त कथा प्रतीकात्मक है नीति की बात स्पष्ट करने के लिए। प्राचीन संस्कृत साहित्य में पशु चरित्रों के माध्यम से बहुत ही बातें समझाने की परंपरा रही है। उक्त कथा में चूहे ने कोई अपराध नही किया उसे कोई सजा नहीं दी महात्माजी ने, लेकिन जब बाघ बने उसकी आपराधिक वृत्ति उजागर हुई तो उन्होंने उसे फिर से निर्बल चूहा बना दिया। उसकी औकात उसे दिखा दी।

अब मैं अपराधियों के मुठभेड़ की बात पर लौटता हूं। उपरिलिखित कथा बताती है कि अयोग्य व्यक्ति पर उपकार करना घातक सिद्ध हो सकता है। यानी आपराधिक वारदातों में लिप्त व्यक्ति पर रहम नहीं किया जा सकता है; उसके बचाव में उतरना कालांतर में घातक होता है। जब चीजें बहुत आगे बढ़ जाती हैं तो लौटकर भूल-सुधार की संभावना नहीं रहती। उक्त कथा में महात्माजी चूहे को बाघ योनि तक बढ़ा सके थे और उसको खतरनाक पाने पर पूर्ववर्ती योनि में लौटा सके थे। अपराधों की दुनिया में ऐसी वापसी संभव नहीं। जो अपराध किया जा चुका हो उसे “न हुआ” जैसा नहीं कर सकते। वस्तुस्थिति गंभीर हो इससे पहले ही कारगर कदम उठाना जरूरी होता है।

दुर्भाग्य से हमारी शासकीय व्यवस्था अपराधों को गंभीरता से नहीं लेती और समय रहते समुचित कारगर कदम नहीं उठाती। पुलिस बल अपराधों को रोकने और अपराधियों पर नकेल कसने के लिए बनी है। आम जनता की नुमायंदगी करने वाले राजनेताओं से उम्मीद की जाती है कि वे देखें कि शासकीय व्यवस्था उनके घोषित उद्येश्यों के अनुरूप चल रहा है। ये बातें हो रही हैं क्या? हरगिज नही!

विपरीत उसके अपराधियों के साथ साठगांठ रचने उनको बढ़ावा देने में हमारा पुलिसबल, प्रशासनिक तंत्र और शासकीय व्यवस्था चलाने वाले राजनेता, सभी एकसमान भूमिका निभाते हैं।

एक नागरिक के तौर पर मैं मौजूदा राजनैतिक जमात को सम्मान की दृष्टि से नहीं देख पाता। चाहे, मोदी हों, या योगी, या मुलायम सिंह, मायावती, और अन्य, लोग सभी के दलों में आपराधिक मानसिकता के नेता भरे पड़े हैं। कहा जाता है कि तकरीबन ३०% जनप्रतिनिधि आपराधिक बारदातों में लिप्त लोग हैं। मैं आपसे सवाल पूछता हूं। आप अपने आसपास, चारों तरफ नजर दौड़ाइये, यारदोस्तों-परिचितों से पूछिये कि आम लोगों के बीच किस अनुपात में अपराधी होंगे। १% भी नहीं, या १%, २%, ३%, … मुझे पूरा विश्वास है कोई भी अधिक नही बतायेगा। तो फिर राजनीति में इतने अधिक क्यों हैं? स्पष्ट है कि राजनीति उनकी शरणस्थली बन चुकी है।

सवाल उठता है कि राजनीति में ही इतने अधिक अपराधी क्यों हैं?

उनके बचाव में राजनेताओं की बेहूदी दलील सुनिएः उनके विरुद्ध झूठे मुकदमे दर्ज होते हैं। क्यों होते हैं झूठे मुकदमे? आमजन पर तो ऐसे झूठे मुकदमें सामान्यतः दर्ज नहीं होते तो इनके विरुद्ध ही क्यों? क्यों इनके इतने दुश्मन होते है? इलजाम छोटे-मोटे नहीं। कोई कत्ल का तो कोई बलात्कार का, कोई जमीन-जायदाद हड़पने का। एक औसत आदमी पर तो ऐसे  मुकदमें दर्ज नहीं होते। फिर इन्हीं राजनेताओं पर एक-दो नहीं दर्जनों मुकदमें क्यों दर्ज होते हैं, वह भी हत्या, बलात्कार, लूटपाट, अपहरण जैसे संगीन बारदातों के? आखिर इन ताकतबर लोगों ने इतने दुश्मन क्यों पाले हैं जो उनके विरुद्ध मुकदमे ठोकते हैं। जाहिर है कि मौजूदा राजनीति में अपराधियों का बोलबाला है और हर दल उन्हें संरक्षण देता है, मानें या न मानें।

हर राजनैतिक दल कहता है कि जब तक इन लोगों को अदालत दोषी घोषित नहीं करती इन्हें अपराधी कैसे मान लें? बहुत खूब! यह है “न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी” का सटीक उदाहरण अदालत में अपराध सिद्ध करेगा कौन? आपराधिक छवि ये लोग पुलिस में, राजनेताओं के बीच, अपनी पैठ बना लेते हैं। किसकी मजाल है कि जान पर खेलते हुए उनके विरुद्ध गवाही दे। पुलिस तो इतनी ईमानदार है कि परिस्थितिजन्य सभी साक्ष्य मिटा देती है। “कोढ़ में खाज” की स्थिति। न्यायिक व्यवस्था इतनी लचर है कि सालों लग जाते हैं निर्णय आने में। तारीख पर तारीख पर तारीख … यह अदालतों की कार्य-प्रणाली बन चुकी है। हमारी न्यायिक व्यवस्था अपराधी को कैसे बचाया जाये इस बात को महत्व देती हैं न कि भुक्तभोगी को कैसे न्याय दिलाया जाये उसको। कुल मिलाकर किसी का अपराधी सिद्ध होना आसान नहीं होता है।

सवाल उठता है कि किसी की छवि का भी महत्व होना चाहिए कि नहीं? अपने व्यक्तिगत जीवन में हम इसे महत्व देते है। फिर राजनीति में क्यों इसकी अनदेखी होती है? किसी राजनेता को अपने साथ आपराधिक छवि वाले को देख शर्म क्यों नही आती?

इन सवालों को उन राजनेताओं के सामने उठाना बेमानी है जो खुद इसके लिए जिम्मेदार हैं।

पुलिसकर्मी भी राजनेताओं के चहेते अपराधियों के बचाव में आ जाते हैं। कुछ तो उनसे दोस्ती ही कर लेते हैं, तो कुछ मजबूरी में चुप रहते हैं, क्योंकि नेताओं की बात न मानना घाटे का सौदा होता है।

कुल मिलाकर अपराधियों को रोकने वाला कोई नहीं।

लेकिन जब उनकी हरकतें इतनी बढ़ जाती हैं कि उनके संरक्षक या उनको प्रश्रय देने वाले ही खतरा महसूस करने लगें तो वे उनको ठिकाने लगाने की सोचते हैं। कानपुर के विकास दुबे ने जब ८ पुलिसकर्मियों को मार डाला तब सबकी नींद खुली। उसको मृत्युदंड जैसी न्यायसंगत सजा दिलाना संभव नहीं उस पुलिस बल के लिए जो तब तक उसे बचाती आ रही थी। अतः मुठभेड़ के नाम पर उसे यमलोक पहुंचाना उनकी विवशता थी।

इस घटना पर मैंने एक ब्लॉगलेख लिखा है (दिनांक १५ जुलाई २०२०) ।  घटना का वीडियो देख मुझे लगा कि वह तो एक घटिया और बनावटी तरीके से नियोजित इंकाउंटर का खेल था।

जब किसी अपराधी के हौसले इतने बुलंद हो जायें कि वह पुलिसबल के सिर पर चढ़ बैठे तो पुलिस असहाय हो जाती है। इसी बात को रेखांकित करने के लिए मैंने कथा के शीर्षक में यह शब्द जोड़े हैंः “किन्तु न शक्यं तत्कर्तुम्” अर्थात् वैसा करना संभव नहीं जैसा महात्माजी ने किया था कथा में। – योगेन्द्र जोशी

चीनी मोबाइल-ऐपों पर प्रतिबंध – गनीमत कि मेरे पास एक भी नहीं

साम्यवादी (Communist) देश चीन के साथ हाल में पैदा हुई कड़ुवाहट और सीमा पर अतिक्रमण के साथ उसकी युद्ध के लिए गंभीर तैयारी को देखते हुए केन्द्र सरकार ने उस देश से आर्थिक संबंधों को यथासंभव सीमित करने का निर्णय लिया है। उस दिशा में चीनी कंपनियों की देश में आर्थिक क्रियाकलापों में भागीदारी घटाने का सिलसिला शुरु हो चुका है। उसी दिशा में एक कदम हें चीन में बने आधुनिक मोबाइल फोनों के “ऐपों” (अप्लिकेशन प्रोग्राम, application software) पर प्रतिबंध लगा दिया जाना। ऐसे ऐपों की कुल संख्या उनसठ (५९) है। यह सूची यहां प्रदर्शित है।

प्रतिबंधित चीनी मोबाइल ऐप (Apps)

जब यह समाचार मैंने पढ़ा तो स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा जगी कि देख लूं कि मेरे स्मार्टफोन में कौन-कौन से मौजूद हैं। संलग्न हैं ऐपों को प्रदर्शित करने वाले “स्क्रीन-शॉट” की तस्वीरः

मेरे सक्रिय मोबाइल ऐप

My MobileApps

गिनने पर मेरे स्मार्ट्फोन के ऐपों की संख्या ६२ निकली। और मुझे आश्चर्य हुआ कि प्रतिबंधित ऐपों में से एक भी मेरे फोन पर मौजूद नहीं। इसका मतलब यह हुआ कि कोई भी ऐप मेरे काम का नहीं। या यों कहिए कि मेरी निगाह में वे कभी आये नहीं। मैं आवश्यकता पड़ने में इंटरनेट पर उपयुक्त ऐप की तलाश करता हूं, परंतु डाउनलोड करने में सावधानी बरतता हूं। मैं छानबीन कर लेता हूं कि ऐप सुरक्षित तो है। अधिकतर कार्य में लैपटॉप पर करता हूं खास तौर पर ऑनलाइन लेनदेन के काम में।

उक्त प्रतिबंधित ऐपों में से अधिकांश का तो नाम मैंने कभी सुना भी नहीं। कोई काम का होता तो कभी न कभी उसे इंटरनेट पर खोजकर “डाउनलोड” कर चुका होता। इन ऐपों की कुछ न कुछ उपयोगिता होगी ही कि उन पर प्रतिबंध से चीनी आईटी कंपनियों को भारी भरकम घाटा उठाना पड़ रहा है।

ऐसी क्या खूबी है इनमें कि दुनिया दीवानी है और मैं उनसे अनजान पड़ा हूं। मेरे पास अधिक छानबीन करने का न तो समय है न सामर्थ्य। फिर भी सोचा कि दो-तीन ऐप के बारे में देख तो लूं कि वे किस काम के हैं, क्या खूबी है उनमें। सबसे पहले मैंने टिकटॉक (TikTok) को चुना क्योंकि इसका नाम मैं सुनते आ रहा था और प्रतिबंध लगने पर कदाचित सर्वाधिक चर्चित ऐप यही रहा। टिकटॉक को लेकर अपना दुःख व्यक्त करते एक युवती का वीडियो मैंने देखा। युवती सचमुच में दुःखी थी या वह अभिनय कर रही थी इसमें मुझे शंका है।

टिकटॉक (TikTok)

Tik Tok को चीनी कंपनी बाइटडांस (ByteDance) ने विकसित किया है। मोटे तौर पर तो यही कहा जा सकता है कि यह कमोबेश वही कार्य करता है जो आपका स्मार्टफोन कैमरा कर लेता है यानी “वीडियो क्लिप” (video clip) बनाना। फर्क यह है कि टिकटॉक की तस्वीरें कहीं अधिक स्पष्ट और जीवंत होती हैं। यह छोटे-छोटे वीडियो-क्लिप बनाने में काम आता है, आम तौर पर तीन-चार सेकंड और अधिकतम साठ सेकंड। इसके लिए ऐप में आरंभ में ही समय-अंतराल चुनने का विकल्प रहता होगा। इतना ही नहीं टिकटॉक में वीडियो के साथ पृष्ठभूमि का संगीत भी मिश्रित कर सकते हैं। इस कार्य के किए विविध म्यूज़िक-क्लिपों में से चुनने का विकल्प टिकटॉक प्रदान करता है। स्पष्ट है कि इतने सब की व्यवस्था आपके फोन पर हो नहीं सकती। इसके लिए टिकटॉक का सर्वर ही आपके काम आता है। यहीं पर उससे खतरे की संभावना रहती है। आप के फोन के कौन से आंकड़े (data) उस सर्वर तक पहुंचते हैं कहना मुश्किल है। बहुत कुछ ऑनलाइन करना होता है। खैर, यह ऐप विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में उपलब्ध है। मुझे जो जानकारी मिली उसके अनुसार खुद चीन में टिकटॉक नहीं चलता है। इसका मौलिक चीनी संस्करण डॉयिन (Douyin) चीन की जनता पहले से इस्तेमाल कर रही है।

बायडू मैप्स (Baidu maps)

दूसरा ऐप जिसके बारे में मैंने जानकारी जुटाई वह है बायडू मैप्स। यह चीन की बायडू (Baidu) कंपनी का उत्पाद है। इसे मैं गूगल मैप का चीनी संस्करण कहूंगा। अर्थात् यह वांछित स्थानों का नक्शा और सेटेलाइट तस्वीरें प्रदान करता है। गुणवत्ता की दृष्टि से इसकी तस्वीरें कहीं अधिक बेहतर कही जायेंगी। दूसरे शब्दों में नक्शे एवं तस्वीरें उच्चस्तरीय स्पष्टता (high definition) की रहती हैं। कहा जाता है कि इसके द्वारा मिली तस्वीरों का निरीक्षण बारीकी से किया जा सकता हैं। दावा किया जाता है कि मैप में सड़कें ही नहीं बल्कि उनके किनारे के मकानों, पेड़-पौधों आदि की तस्वीरें पूरी भी बारीकी से प्रदर्शित होती हैं। पढा तो मैंने यह भी कि कुछ भवनों की भीतरी तस्वीरें भी देखने को मिल सकती हैं। बायडू मैप में चीन की अपनी जीपीएस (GPS) प्रणाली भी एकीकृत है। इसलिए यह वाहन-चालकों को यात्रा-संबंधी सुविधा भी प्रदान करता है। अन्य प्रणालियां पहले से प्रचलन में हैं किंतु यह चीनी ऐप स्पष्टता के नजरिये से अधिक आकर्षक एवं उपयोगी कहा जा सकता है। चूंक़ि मैपों की विस्तृत जानकारी अर्थात् तत्संबंधित आंकड़े किसी स्मार्टफोन की सीमित स्मृति (memory) पर भंडारित रखना संभव नहीं, अतः केंद्रीय सर्वर उपयोक्ता के फोन की मदद करता है। इस कारण से सर्वर की पहुंच उपयोक्ता के फोन की गोपनीय सामग्री तक रहती है।

यूसी ब्राउज़र (UC browser)

मैंने जिन तीन इंटरनेट ऐप्स को जांचने के लिए चुना उनमें अंतिम है यूसी ब्राउज़र (UC browser)| इंटरनेट सर्फिंग के लिए ब्राउजरों की कोई कमी आईटी क्षेत्र में नहीं है। माइक्रोसॉफ्ट अपने विंडोज़ प्रचालन प्रणाली (operating system) के अभिन्न घटक के तौर पर आईई (इंटरनेट एक्सप्लोरर internet explorer) जोड़कर देता है। किंतु बहुत से लोग गूगल क्रोम (Google chrome) अथवा (Mozilla firefox) या इन जैसे ही किसी अन्य निःशुल्क ब्रौउज़र का इस्तेमाल करते हैं। ऐप्पल आइइओएस) (Apple iOS) के साथ सफारी (safari) का प्रयोग सामान्य बात है। हरएक की अपने खूबियां एवं कमियां हैं। इसी कड़ी में चीनी आईटी कंपनी यूसीवेब (UCWeb) का यूसी ब्राउज़र (UC browser) उपयोक्ताओं को निःशुल्क उपलब्ध है।

यूसी ब्राउज़र के बारे में कहा जाता है कि यह काफी तेज है अन्य ब्राउज़रों की तुलना में। डाउनलोड एवं उपलोड करने की गति अधिक बताई जाती है। ऐसा यह डेटा-कंप्रेशन (data compression) तकनीकी के इस्तेमाल से करता है। इस तकनीक का अर्थ है किसी फाइल का बाइटों में आकार उसमें निहित जानकारी को प्रभावित किए बिना छोटा करना ताकि डाउनलोड/उपलोड कम समय में हो जाये। कई उपयोक्ता अपनी भारी-भरकम फाइलों को किसी को भेजने या उपलोड करने में इस तकनीक का प्रयोग करते हैं। इस कार्य के लिए फाइल “ज़िप” (zip) करने हेतु अप्लिकेशन प्रोग्राम अर्थात् ऐप उप्लब्ध है। इसके विपरीत जिप की गई फाइल की प्राप्ति को उसके मूल (original) रूप में वापस पाने के लिए उसे “अनज़िप” (anzip) किया जाता। प्रचलित ब्राउज़र आम तौर पर यह सब नहीं करते। लेकिन यूसी ब्राउज़र करता है। चूंकि प्रचलित स्मार्टफोन इतने समर्थ नहीं होते इसलिए यह कार्य यह ब्राउज़र यूसी-वेब के केंद्रीय सर्वर के साथ मिलकर करता है। यही इसके खतरे का कारण बन सकता है, क्योंकि सर्वर उपयोक्ता के मोबाइल के गोपनीय आंकड़े चुरा सकता है।

यूसी ब्राउज़र चीन, भारत, एवं इंडोनेशिया में अधिक प्रचलित है, न कि अन्य देशों में। कई देशों में अपनी भाषा में अप्लिकेशन प्रोग्राम उपलब्ध रहते हैं शायद अन्य देशों की दिलचस्पी कम हो।

भारतीय आईटी पेशेवर

भारत के आईटी (information technology) के पेशेवर दुनिया भर में छाए हुए हैं और उनकी सभी जगह अच्छी साख है, चीन के पेशेवरों से कम नहीं शायद उनसे भी अधिक। लेकिन उनकी यह कमजोरी रही है कि वे पहले से स्थापित राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी सेवा देते रहे हैं। भारत के कंप्यूटर युग के शुरुआती दौर में इन्फोसिस, एचसीएल, टीसीएस, विप्रो आदि जैसी दिग्गज कंपनियां स्थापित हुईं, लेकिन मेरे ध्यान में कोई कंपनी नहीं जो हाल के वर्षॉं में स्थापित हुई हो शीर्ष की कंपनियों में स्थान पा सकी हो। यहां के पेशेवरों ने विभिन्न संगठनों के कार्य-निष्पादन (working) के लिए प्रोग्राम विकसित किए हैं, जैसे भारतीय रेलवे, बैंक आदि। किंतु दुर्भाग्य की बात यह है कि इन पेशेवरों ने आम आदमी के रोजमर्रा उपयोग के लिए आईटी प्रोग्राम विकसित करने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई है और वे भारतीय भाषाओं के प्रति पूरी तरह उदासीन रहे हैं। आपको शायद ही किसी संस्था की वेबसाइट भारतीय भाषाओं में मिले। राज्य सरकारों के राजकाज की भाषाएं क्षेत्रीय घोषित हैं, लेकिन उनका “ऑनलाइन” कार्य प्रायः अंग्रेजी में ही दिखाई देता है। इसके विपरीत चीनी पेशेवरों ने चीनी जनता के लिए चीनी (मेंडरिन) भाषा में अप्लिकेशन प्रोग्राम विकसित किए हैं। चीन के लोग यथासंभव चीनी भाषा का प्रयोग करते हैं अतः ऐसे प्रोग्राम लोकप्रिय होते रहे हैं। दुनिया वाले इन प्रोग्रामों के (अंग्रेजी संस्करण) अधिक न भी इस्तेमाल करें तब भी करोड़ों में उनके यहां उपयोगकर्ता मिल ही जायेंगे। भारतीय जन समुदाय देशज प्रोग्रामों के बदले अंग्रेजी में प्राप्य प्रोग्रामों में रुचि रखता है भले ही वे चीन में विकसित हों। इस मामले में हम कभी भी चीन की बराबरी नहीं कर सकते।

मुझे यह देख कोफ़्त होती है कि भारतीय युवा नये-नये ऐपों का आकर्षण झेल नहीं पाते है। आईटी आधारित नये-नये शौक पालने में उन्हें देर नहीं लगती। नयी चीजों के प्रति अति उत्साह हानिकर भी हो सकता है इसे नजरअंदाज करना उचित नहीं। – योगेन्द्र जोशी

 

लॉकडाउन काल में मन में उपजे छिटपुट छितराए विचार (२)

इस समय बेंगलूरु में हूं गृहनगर वाराणसी से दूरलॉकडाउन में कुछ ढील मिल चुकी है। कहने को रेलयात्रा एवं हवाईयात्रा की सुविधा आरंभ हो चुकी है। लेकिन भ्रम इतना फैला है कि वापसी यात्रा की तिथि तय नहीं हो पा रही है। मैं २४ घंटे व्यस्तता से बिता सकता हूं, परंतु दो-अढाई मास के इस अनियोजित प्रवास में अपनी आम दैनिक चर्या से वंचित हूं, जिसका एहसास रह-रह के बेचैन करता है। अन्यथा इंटरनेट से प्राप्य विविध जानकारी, लैपटॉप पर भंडारित पाठ्यसामग्री, और मन में उठते विचारों को लेकर ब्लॉग-लेखन यहां भी चल ही रहा है। यहां बहुमंजिली २३ इमारतों वाले विस्तृत परिसर के चारों ओर टहलने में सुबह-शाम आधा-आधा घंटा लग जाता है। टहलते समय परिसर के पर्यावरण, परिसर-निवासियों भाषा-जीवनशैली, कोरोना महामारी, लॉकडाउन एवं समाचारों को लेकर तरह-तरह के विचार मन में उठते हैं। परस्पर असंबद्ध, संक्षिप्त, तथा बिखरे हुए विचार पूर्ववर्ती आलेख तथा इस स्थल पर कलमबद्ध हैं।

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छिद्रेषु अनर्था बहुलीभवन्ति

यह संस्कृत साहित्य की एक उक्ति है जिसका सीधा अर्थ यह है कि विपत्तियां अकेले नहीं आती हैं। अंग्रेजी में इसके लिए “Misfortunes never come single.” अथवा “Misfortunes seldom come alone.” लोकोक्ति उपलब्ध है। इस कहावत को लेकर मैंने एक लेख अपने ब्लॉग में ११ वर्ष पहले लिखा था।

इस वर्ष की शुरुआत से ही पूरी दुनिया कोरोना से पैदा हुई महामारी से जूझ रही है। यह लोगों को रोगी बना रहा है जिसका कोई इलाज अभी उपलब्ध नहीं है जिससे अनेक जन दिवंगत हो रहे हैं। समाचार माध्यम पिछले ३-४ माह से प्रायः सिर्फ कोरोना से जुड़ी खबरें परोस रहे हैं, गोया कि जानने योग्य और कुछ इस संसार में नहीं घट रहा हो। निःसंदेह कोरोना का महाप्रकोप सामुदायिक समस्या बनकर उपस्थित हुआ है लगभग हर राष्ट्र के समक्ष। परंतु मेरी नजर में अधिक दुःखद बात यह है कि इसने तमाम तरह की समस्याएं लोगों के सामने व्यक्तिगत स्तर पर पैदा कर दी हैं। अर्थात् उन समस्याओं का हल खोजना और उनके दुष्परिणाम भुगतना हरएक की व्यक्तिगत नियति बन चुकी है।

इस कोरोना संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए अन्य देशों की भांति अपने देश ने भी लॉकडाउन का रास्ता अपनाया है। इससे अनेक परेशानियां पैदा हुई है। देखिए क्या-क्या भुगतना पड़ रहा है संसाधन-विहीन आम आदमी को –

(१) उद्योगधंधों का बंद हो जाना जिससे रोज कमा-खाने वालों के समक्ष रोजी रोटी के लाले पड़ने लगे।

(२) जमा-पूंजी जब चुकने लगी और पर्याप्त मदद नहीं मिली तो अपने पैतृक गांव-घरों को लौटने लगे।

(३) आवागमन के साधन ट्रेन/बस उपलब्ध न होने के कारण उन्हें सामान ढोने वाले ट्रकों में भेड़-बकरियों की तरह ठुंसकर निकलना पड़ा।

(४) जिनको वह भी न मिला पाया वे १०००-१५०० किलोमीटर पैदल नापने को विवश हो गए।

(५) मार्ग में कइयों को जान से हाथ धोना पड़ा बिमारी से या दुर्घटना के शिकार बनकर। दुर्घटनाओं का हृदय-विदारक पक्ष यह रहा कि कहीं कमाने वाला मुखिया चल बसा, तो कहीं मांबाप खोकर बच्चे अनाथ हो गये और किसी को प्रसव-पीड़ा सहनी पड़ी, और किसी नवजात को त्यागना पड़ा। इत्यादि।

ये सब बातें विवश करती हैं कहने को “छिद्रेषु …

[२]

कोरोना काल में लिफ्ट का परित्याग

मैं सदा से ही शारीरिक श्रम का पक्षधर रहा हूं। घर-गृहस्थी के छोटेमोटे काम अपने हाथ से करना पसंद करता हूं। जहां तक संभव हो एक-डेड़ किलोमीटर की दूरी पैदल चलना मेरी रुचि के अनुकूल है। उससे अधिक दो-चार किमी तक साइकिल से जाना ठीक समझता हूं। कभी स्कूटर का भी प्रयोग कर लेता था लेकिन अब बढ़ती उम्र और नगर की बेतरतीब यातायात व्यवस्था के चलते उसका प्रयोग बंद हो चुका है। कार का शौक न पहले था और न अब हैसीड़ियां चढ़ने-उतरने में अभी कोई दिक्कत महसूस नहीं करता।

इधर बेंगलूरु में बहुमंजिली इमारत के सातवें तल पर रह रहा हूं। लॉकडाउन घोषित होने से पहले मैं भूतल से उस तल तक चढ़ने-उतरने के लिए सामान्यतः लिफ्ट का प्रयोग कर रहा था। किंतु जब कोरोना महामारी के दायरा बढ़्ने की खबरें जोरशोर से आने लगीं तो उसे गंभीरता से लेने में ही मुझे बुद्धिमत्ता नजर आई। तब से हम पति-पत्नी सीढ़ियों का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। दिन भर में पत्नी महोदया को एक बार ही ऊपर-नीचे आना-जाना होता है, लेकिन मैं चूंकि दो बार टहलने निकलता हूं अतः मुझे यही कार्य दो बार करना पड़ता है।

बाहर खुले में प्रातःसायं टहलना स्वास्थ्य बनाये के लिए उपयोगी होता है ऐसी राय व्यक्त करते हैं डॉक्टरवृंद। मेरा ख्याल है कि दिन भर में कुछ सीढ़ियां चढ़ना-उतरना भी खुद में शरीर के अस्थि-जोड़ों के लिए लाभप्रद होना चाहिए। जिनके घुटने अभी ठीकठाक चल रहे है उनको दिन भर में सीढ़ियों का भी व्यायाम कर लेना चाहिए।

[३]

कोरोना का संदेश – जनसंख्या नियंत्रण

मेरा मत है कि मौजूदा कोरोना संक्रमण ने एक गंभीर संदेश दिया है। वह है जनसंख्या पर नियंत्रण। हो सकता है देशवासियों को वह नजर न आ रहा हो।

सन् १९६० के दशक में (कदाचित् १९६५ के आसपास) तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण की योजना बनाई और उसका कार्यान्वयन भी सुचारु होने लगा। “हम दो हमारे दो” का नारा दिया गया। बसों तथा अन्य साधनों पर “लाल त्रिकोण” के प्रतीक के साथ यह नारा सर्वत्र प्रचरित होने लगा। लोगों में जागरूकता फैलने लगी और वे स्वेच्छया परिवार नियोजन के विविध साधन अपनाने लगे। शनैःशनैः ही सही नीति सही दिशा में चल रही थी।

दुर्भाग्य से १९७० के दशक में इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी ने एक “असंवैधानिक” शक्ति के तौर पर उभर कर इस कार्य योजना के लिए जोर-जबर्दस्ती का मार्ग अपनाना शुरू किया। लोगों में असंतोष पनपने लगा, और तथा अन्य कारणों से भी वे आंदोलित होने लगे, आपातकाल घोषित हुआ, यह योजना उसका शिकार बनी।

उसके बाद किसी राजनैतिक दल ने हिम्मत नहीं जुटाई योजना को आगे बढ़ाने की। बाद में खुद कांग्रेस लंबे अरसे तक सत्ता में रही लेकिन उसने भी योजना को भुला दिया।

परिणाम? १९६५ के आसपास देश की आबादी करीब ५० करोड़ थी। आज वह करीब १३५ करोड़ आंकी जाती है, २.७ गुना !! परंतु देश है कि चुप्पी साधे है।

गौर करें आगे प्रस्तुत नक्शे पर जो दिखाता है कि कुछ राज्य हैं जिनकी आबादी बढ़ने की दर अन्य इतनी अधिक है उनके नागरिकों को पेट पालने के लिए दूसरे राज्यों की शरण लेनी पड़ती है। लेकिन इन राज्यों को लज्जा फिर भी नहीं आती। जब कोरोना ने विकट स्थिति पैदा कर दी इन नागरिकों को डेढ़—डेढ़ हजार किमी पैदल चलकर तथाकथित घर लौटना पड़ता है तब भी इन राज्यों को लज्जा नहीं आती। (स्रोतः censusindia.gov.in पर उपलब्ध है।)

राज्यों के पास अपने बाशिंदों के पेट भरने के संसाधन न हों तो भी आबादी बढ़ने देनी चाहिए क्या? आंख खुलेगी कब? – योगेन्द्र जोशी

लॉकडाउन काल में मन में उपजे छिटपुट छितराए विचार

इस समय हम बेंगलूरु में हैं अपने बेटे के पास। एक मास के नियोजित बेंगलूरु-प्रवास के बाद तारीख २२ मार्च को लौटना था अपने गृहनगर वाराणसी को, किंतु पहले “जनता” कर्फ्यू फिर लॉकडाउन घोषित हो जाने पर यात्रा स्थगित कर दी। इस समय उसका चौथा चरण चल रहा है। बीते २१ ता. को हमारे अनियोजित प्रवास के दो माह हो गये। हवाई सेवा प्रारंभ होने की खबर है लेकिन सर्वत्र भ्रम फैला है।

अब ऊब होने लगी है। वैसे मेरे लिए २४ घंटे व्यस्तता से बिताना कोई कठिन काम नहीं है। परंतु इस अनियोजित प्रवास में मेरी जो आम दैनिक चर्या होती थी उससे वंचित हूं, जिसका एहसास रह-रह के बेचैन करता है। अन्यथा इंटरनेट से प्राप्य विविध जानकारी, लैपटॉप पर भंडारित पाठ्यसामग्री, और मन में उठते विचारों को लेकर ब्लॉग-लेखन यहां भी चल ही रहा है।

हम बहुमंजिली इमारतों और उनके बहु-अपार्टमेंटों के विस्तृत परिसर में रह रहे हैं। बाउंडरी से घिरे परिसर के चारों ओर टहलने में आधे घंटे से अधिक समय लग जाता है। टहलना मेरी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा रहा है। टहलते समय परिसर के परिवेश, परिसर-निवासियों के तौरतरीके, मौजूदा महामारी, संबंधित लॉकडाउन, वैश्विक खबरों आदि को देख तरह-तरह के विचार मन में उठते रहते हैं। उनसे जुड़े परस्पर असंबद्ध, संक्षिप्त, तथा बिखरे विचार इस स्थल पर कलमबद्ध हैं।

 

[१] कष्टकर लॉकडाउन

सोशल मीडिया अर्थात् सामाजिक माध्यम पर ऐसे कई किस्से-कहानियां देखने-सुनने को मिल जा रहे हैं जो दिखाते हैं कि लॉकडाउन काल में लोगों को चौबीसों घंटे घर में रुके रहना कितना बेचैन कर रहा है। मनोवैज्ञानिक यह चिंता व्यक्त करते हैं ऐसी स्थिति में कई-कई दिनों तक पड़े रहना कइयों के लिए मानसिक तनाव एवं तज्जन्य मनोरोग का कारण बन सकता है। कुछ लोग टेलीफोन एवं टीवी पर अवश्य समय गुजारते होंगे। आज के युग में शेष दुनिया से संपर्क साधे रहने के कई अन्य साधन भी उपलब्ध हैं।

मेरे मन में यह सवाल रह-रहकर उठता है कि वे लोग जो किसी न किसी ध्येय की प्राप्ति के लिए जिंदगी को दांव पर लगाते हों, जेल की काल-कोठरी में रहने को भी तैयार हो जाते हों, उनकी सहना शक्ति कितनी अधिक होती होगी? जिस हालात में औसत आदमी पागल हो जाए उसमें भी वे बिना मानसिक संतुलन खोये हफ्तों, महीनों या सालों बिता देते हों यह अविश्वसनीय-सा लगता है। देश के स्वाधीनता संघर्ष में देश के अनेक सुपुत्र इस सामर्थ्य के धनी थे। मुझे वीर सावरकर का नाम याद आता है जिनको अंडमान-नीकोबार – अंग्रेजी-काल में कालापानी – में वर्षों कालकोठरी में गुजारने पड़े। कालापानी अर्थात् देश की मुख्यभूमि से हजारों कि.मी. दूर समुद्रस्थ निर्जन द्वीपीय स्थान। वैसी सामर्थ्य एवं इच्छाशक्ति विरलों को ही मिली रहती है। धन्य हैं वे।

[२] मित्रोँ-परिचितों के निधन का दुर्योग

इसे संयोग, वस्तुतः दुर्योग, ही कहा जाएगा कि लॉकडाउन काल में मुझे नजदीकी मित्रों, सहयोगियों एवं रिश्तेदारों से संबंधित शोकसमाचार सुनने को मिले। हादसे तो होते ही रहते हैं लेकिन जिनकी बात मैं कर रहा हूं उनमें एक मेरी पूर्व-सहयोगी, दो पड़ोसी, और दो निकट संबंधी रहे। गौर करने योग्य बात यह थी वे सभी पहले से ही गंभीर रूप से रुग्ण थे और उनकी लंबे जीवन की आशा नहीं थी। दो तो कैंसर-पीड़ित थे, एक हृदयरोगी, और दो जटिल मिश्रित रोगों से ग्रस्त थे। वे महीनों पूर्व भी दिवंगत हो चुके होते, किंतु संयोग यह रहा कि इसी लॉकडाउन काल में उक्त हादसे हुए।

इन लोगों के दिवंगत होने का जो दुःख उनके पारिवारिक सदस्यों को हुआ उससे अधिक कष्ट इस बात का रहा होगा कि वे उनके अंतिम दर्शन भी नहीं कर सके, क्योंकि दूरस्थ होने और आवागमन के साधन बंद होने के कारण वे मन मसोस कर रह गये। मैं दिवंगत आत्माओं की शांति की प्रार्थना करता हूं, और उनके भाई-बहनों, बेटे-बेटियों आदि निकट संबंधियों के प्रति कष्ट सहने की सामर्थ्य की कामना के साथ सहानुभूति व्यक्त करता हूं। प्रार्थना है कि भविष्य में कोई अनिष्ट समाचार सुनने को न मिले।

[३] भविष्यवाणी के प्रति अविश्वास

मैं ज्योतिष में विश्वास नहीं करता, यद्यपि मेरे खानदान की पूर्ववर्ती पीढ़ियों की जीवनचर्या में पौरोहित्य एवं ज्योतिष शामिल थे। भौतिकी (फिजिक्स) का छात्र, अध्येता और अंततः शोधकर्ता-शिक्षक के तौर पर जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ता गया वैसे-वैसे मेरा विश्वास भविष्यवाचन की सभी विधाओँ-कलाओं से उठता चला गया। भौतिकी में प्रकृति के जिन नियमों का अध्ययन किया जाता है और जिन पर आधुनिक टेक्नॉलॉजी (प्रोद्योगिकी, तकनीकी) आधारित है उनके मद्देनजर मेरे मत में भविष्यवाणी संभव नहीं। किंतु परम आस्था जिसको हो वह तो विश्वास करता रहेगा भले ही विफल भविष्यवाणियों की गठरी ही उसके सामने खोल दी जाए।

इधर वैश्विक कोरोना महामारी को देखकर मेरे मन में भविष्यवाणी के प्रति शंका की बात ताजा हो उठी। जो लोग भविष्यवाणी की किसी भी विधा या कला में विश्वास करते हैं उनको इस प्रश्न का उत्तर देना चाहिए कि किसी भी भविष्यवेत्ता ने इस महामारी की भयावहता की बात विगत समय में – महीनों, सालों पहले – क्यों नहीं की? अब यदि घटना घट चुकने के बाद कोई यह दावा करे कि उसे इसका अंदाजा पहले ही लग चुका था तो उसकी अहमियत नहीं है।

सोचने की बात है कि इस सदी की, और मैं तो कहूंगा सन् १९०० के बाद, वैश्विक स्तर की ऐसी कोई महामारी मानवजाति को नहीं झेलनी पड़ी है। विश्व में आधुनिकतम चिकित्सकीय व्यवस्था के उपलब्ध होने और लॉकडाउन का रास्ता अपनाने के बावजूद संक्रमण के मामले बढ़ते जा रहे हैं और मृतकों की संख्या लाखों में पहुंच चुकी है। क्या यह कोई छोटी-मोटी दुर्घटना है जिसे भविष्यवक्ता जान ही न पाये हों?

दरअसल भावी घटनाओं का ज्ञान संभव नहीं है केवल उनका अनुमान लग सकता है यदि पर्याप्त आधार उपलब्ध हों। ऐसे सुविचारित तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं जिनसे उक्त मत सिद्ध होता हो। मैं वह सब यहां पेश नहीं कर सकता क्योंकि यह विषय विशद तर्क-वितर्क का है। -योगेन्द्र जोशी

कोरोना ने लगाई लगाम शराब पै – बेचैन हुए शौकीन

पिछले करीब दो माह से देश लॉकडाउन झेल रहा है। देश भर में कुछ जिले है जहां महामारी का प्रकोप गंभीर है। उन जिलों को रेड ज़ोन यानी लाल क्षेत्र नाम दिया गया है। ये वे क्षेत्र हैं जहां तमाम गतिविधियां थम-सी गई है। अत्यावश्यक कार्य के लिए ही किसी व्यक्ति को घर से बाहर निकलने की अनुमति है। खाद्य पदार्थों की आपूर्ति होम-डिलीवरी से की जा रही है। लेकिन शराब जैसी खूबसूरत चीज की आपूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं की गयी। लॉकडाउन जैसी दशा में घरों में कैद रहने से कोई शख्स जहां उबिया रहा हो वहां गम गलत करने का साधन शराब भी नसीब न हो तो सोचिए बंदे की हालत क्या होगी?

वाह! खुल गयी दुकान

शराब की दुकानों को खोलने की सरकार ने चंद रोज पहले इजाजत क्या दी कि मदिरापान के शौकीनों की जैसे लॉटरी ही खुल गयी। न लॉकडाउन के नियमों का ख्याल किसी को रहा और न ही अपनी तथा अगल-बगल के अन्य जनों के कोरोना से बचाव की चिंता। समाचार माध्यमों ने देश के प्रायः सभी इलाकों के मदिरा विक्रय केन्द्रों के सामने की जिस भीड़ की तस्वीरें पेश कीं उनको शब्दों में बयाँ करना मेरे लिए मुश्किल है।

शराब को लेकर जान तक दाँव पर लगाने वालों को देख मुझे बीते जमाने के अपने अनुभवों की याद हो आई। किसी को गलतफहमी न हो सो इस बाबत बता दूं कि मैं शराब का शौकीन नहीं हूं और न कभी पहले रहा। लेकिन उसे छुआ है और पिया भी है, नियमतः तो नहीं बस यदा-कदा। इसे सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य – आप जो ठीक समझें – अपने को जो अड़ोसी-पड़ोसी, यार-दोस्त, सहकर्मी, नाते-रिश्तेदार, मिले वे भी इस खूबसूरत पेय का शौक नहीं अपना सके। इतने सब के बावजूद मैं इसका अंदाजा लगा ही सकता हूं कि शराब के बिना क्या गत होती होगी किसी शौकीन की, शायद “जल बिन मीन” की सी।

जैसा कह चुका हूं मैंने शराब का आस्वादन किया है। शराब का ही नहीं और व्यसनों का भी अनुभव लिया है। बीड़ी-सिगरेट पी रखी है; पान गुटके का सेवन भी कर रखा है, बहुत कुछ जिज्ञासावश, कुछ तो बचपन में ही। कब कौन-सा व्यसन दिमाग में आया और फिर ग़ायब हुआ इसे बताने से पहले यह बता दूं कि सब कुछ अनुभव करने के बाद वयस्क होते-होते इसी निष्कर्ष पर पहुंचा कि नशे की किसी चीज का कोई गंभीर मकसद नहीं, कोई आकर्षण नहीं, फिजूलखर्ची से आगे सब निरुपयोगी ही हैं, सभी मनुष्य की कमजोरी को प्रबिंबित करते हैं, आदि-आदि। जब कभी कोई कहता है कि फलां आदत छूट नहीं रही है तो मेरी टिप्पणी यही होती है कि जब आप छोड़ना ही न चाहें तो छूटेगी कैसे। कोई दूसरा तो आदत के लिए मजबूर कर नहीं रहा होगा। नशा आप शुरू करें तो आप ही को छोड़ना होगा। इत्यादि।

जैसा कह चुका हूं बीड़ी-सिगरेट, गुटखा, शराब-बियर का आस्वादन मैंने भी किया है, लेकिन जिंदगी के अलग-अलग वर्षों में और अल्प अंतरालों के लिए। लेकिन इन नशों का गुलाम बनने से बचता रहा। मौजूदा कोरोना-काल की उपर्युल्लिखित घटना को लेकर मन हुआ कि अपना अनुभव साझा करूं।

आरंभ इस खुलासे से करता हूं कि मेरा जन्म उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल कुमाऊं के एक छोटे-से गांव में हुआ था, आठ-नौ परिवारों का गांव। सभी एक ही पूर्वजों की संतानें थे और आपस में ताऊ-ताई, चाचा-बुआ, भाई-भतीजे जैसे घनिष्ठ रिश्तों से जुड़े थे। गांव में लगभग १०-१२ बच्चे रहे होंगे और उनमें से हम-उम्रों की आपस में दोस्ती सहज तौर पर हुई रहती थी। मैं सन् १९५५ के आसपास की बात कर रहा हूं जब मैं प्राथमिक पाठशाला में पढ़ता था।

बीड़ी का चस्का

मेरा एक दोस्त था। हमें एक बार विचार आया कि क्यों न बीड़ी पी जाए। बड़े लोगों को पीते देखते थे तो अपने को भी इच्छा हो जाती थी। लेकिन बीड़ी मिले कहां से। सो बड़ों को ताके रहते थे और उनके बुझाए हुए बीड़ी के टुकड़े उठा लाते थे और उन्हें सुलगा के पीते थे। पीते क्या थे मुंह में धुआं भरकर हवा में महज फूंक मारते थे। इतना ही हमारे लिए काफी था। यह सब चोरीछिपे होता था। फिर भी पता नहीं कैसे एक दिन मेरी बड़ी बहिनजी तक बीड़ी की गंध पहुंच गयी और वह हमारे सामने अवतरित हो गईं। मेरा मुंह खुलवाकर सूंघा और लगाई डांट। भागे हम वहां से।

इतने से कोई असर हम पर पड़ने वाला नहीं था। हमने किसी प्रकार दोएक रुपये का इंतिजाम किया और ले आये दुकान से ताजा “घोड़ा छाप” बीड़ी का बंडल और “विम्को की एक्का छाप” दियासलाई की डिब्बी। इन्हें हमने अपने घर के निकट सीड़ीनुमा एक खेत की दीवाल के कोटर में छिपा दिया था। (पर्वतीय क्षेत्र में आम तौर पर सीड़ीनुमा खेत ही मिलते हैं।) रोज शाम को हम बीड़ी का आनंद लेने चुपचाप आते थे। लेकिन एक दिन मेरे दोस्त की माताजी को पता चल गया। वे कहीं आसपास काम कर रही थीं और कमवक्त बीड़ी की गंध उन तक पहुंच गयी। वे पहुंची पास और ऐसी डांट लगाई हमें कि बीड़ी-सिगरेट का भूत सर से उतर गया।

समय बीतता गया और मैं प्राथमिक (प्राइमरी) शिक्षा पार कर माध्यमिक (जूनियर) शिक्षा के लिए गांव से बाहर चला गया। उसके बाद मेरी विश्वविद्यालय तक की शिक्षा बाहर ही हुई। समय के उस अंतराल में मुझे किसी प्रकार के व्यसन का न तो ध्यान आया और न ही कोई मौका मिला।

सिगरेट का मजा

स्नातकोत्तर (एम.एससी.) उपाधि पा लेने के बाद मैंने अपने एक सहपाठी एवं मित्र के साथ शोध-पाठ्यक्रम में दाखिला लिया। इसी दौरान हमें दो चीजों का शौक चर्रायाः पहला था दाढ़ी रखना और दूसरा था सिगरेट पीना। दाढ़ी तो तब से बरकरार है; लेकिन सिगरेट साल भर से कम ही चल पाई। मैं दिन भर में ५-१० सिगरेट से अधिक नहीं पीता था। एक बार मैं एक-डेढ़ माह के लिए बेंगलूरु गया था। तभी एक दिन रात में मुझे बेचैन करने वाला सपना दिखा सिगरेट से जुड़ा हुआ। बस उसके बाद मैंने सिगरेट छोड़ दी। मैंने इस घटना पर आधारित लघुकथा अन्य ब्लॉग में लिखी थी।

ब्रैंडी-अंडे का पेय

शोध पाठ्यक्रम से अर्जित डाक्टरेट की उपाधि पाकर मैं वाराणसी आ गया और वहीं बी.एच.यू. में बतौर शिक्षक मैंने नियुक्ति ले ली। वह मेरी युवावस्था का काल था। मेरी उम्र पच्चीस-छब्बीस वर्ष की रही होगी। मै शरीर से सदा ही दुबला-पतला रहा हूं। एक बार मेरे मन में थोड़ा-बहुत मोटा होने का विचार आया। एक वरिष्ठ साथी ने सलाह दी कि मैं अंडे की जर्दी-अलब्युमिन का ब्रैंडी (brandy) के साथ मिलाकर सेवन करूं। क्या स्वाद रहा होगा इसका अनुमान लगा सकते हैं। करीब महीना भर सेवन किया होगा। शरीर या मस्तिष्क कहीं पर भी उसका असर नहीं पड़ा। छोड़ दिया। किसी अल्कोहॉलीय पेय का यह प्रथम अनुभव था मेरा।

वाराणसी में पान का चलन बहुत अधिक है। मैंने भी इसका आनंद उठाने की कोशिश की। लेकिन पान-सुपाड़ी मुझे रास नहीं आई। जब भी खाऊं गला सूख-सा जाता था, थूक निगलने में परेशानी होने लगती, कान की लौ गरम हो उठतीं। मैंने पान खाना ही बंद कर दिया पूरी तरह। बनारस में रहने के बावजूद पान से दूर ही रहा।

अल्कोहॉलीय पेय

अल्कोहॉलीय पेय का दूसरा अनुभव मेरा शेरी (sherry) आस्वादन का है। एक बार मैं शिलांग (मेघालय) किसी गोष्ठी में भाग लेने गया था। वहां स्थानीय स्तर पर निर्मित शेरी के मुझे दर्शन हुए। एक बोतल खरीद ले आया। वाराणसी लौटकर उसका भी सेवन किया दो-चार दिन थोड़ा-थोड़ा करके।

इसके बाद का अनुभव मेरा इंग्लैंड का है जहां मैं दो वर्ष के लिए शोधवृत्ति पर गया था (१९८३-१९८५)। शुरुआत के कुछएक माह मैंने पाकिस्तानी मूल के किसी पंजाबी खान साहब के मकान में किराये पर रहकर बिताए। वे खुद सड़क के पार अपने दूसरे मकान में रहते थे। वे यदाकदा गपशप मारने मेरे पास चले आते थे। उस इलाके में हिंदी-उर्दू बोलने वाला उनको शायद अकेला मैं ही मिला था। वे कभी-कभी “पब” (मयखाना) में बियर पीने की पेशकश करते थे और अपनी वैन से ले चलते थे। मैं एकदम-से मना नहीं करता था और उनकी पेश की हुई एक बियर-गिलास पी लेता था। वे स्वयं दो-तीन गिलास पी जाते थे। सच कहूं तो मुझे कोई मजा नहीं आता था। लेकिन उनका साथ दे देता था। मुझसे एक प्रकार की दोस्ती हो गई थी उनकी।

यह था बियर पीने का मेरा अनुभव। छः-सात माह महीने बाद जब मेरा परिवार भारत से पहुंचा तो मुझे बड़ा आवास किराये पर लेना पड़ा। तब खान साहब का साथ छूट गया और उसी के साथ बियर पीने के मौके भी छूटे।

यूरोपीय समाज तथा वाइन

यूरोपीय देशों में भोजन के समय वाइन (अंगूर से बनी मदिरा) का सेवन आम बात है। मैंने सुना था कि पहले कभी इंग्लैंड जैसे देशों में पानी पीने का चलन नहीं था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। जब विश्वविद्यालय के मेरे शैक्षिक विभाग में भोज का कार्यक्रम होता था जैसे क्रिसमस के मौके पर तो उसमें शराब (वाइन),  कृत्रिम-पेय (सॉफ्ट-ड्रिंक), फलों का रस (फ्रूट-जूस), तथा सादा पानी, सभी उपलब्ध रहते थे। मैं वाइन न लेकर फल-रस पीता था। मुझे याद नहीं कि इंग्लैंड में अपने शेष प्रवास के दौरान मैंने वाइन कभी पी थी या नहीं। भारत लौटने पर शराब जैसी हर चीज से मैंने तौबा कर ली। बस अब चाय-काफी की आदत रह गई।

मैंने लंबे अरसे तक कोई व्यसन नहीं पाला सिवाय सिगरेट के और वह भी साल भर से कम। मैंने किसी में भी वह आकर्षण नहीं पाया जो मुझे उससे जोड़े रखता। जब कोई कहता है कि वह अपनी लत नहीं छोड़ सकता तो मेरा कहना होता कि वह कमजोर आत्मसंयम का व्यक्ति है और सार्थक संकल्प नहीं ले सकता है। – योगेंद्र जोशी

कोरोना वाइरस (विषाणु) – मेरे कार्यक्रम निरस्त, दैनिक चर्या बदल गई

कोरोना संक्रमण

पूरी दुनिया इस समय ऐसी विपदा झेल रही है जिसकी दूर-दूर तक किसी को आशंका नहीं थी। चीन से चले कोरोना (COVID-19) नामक विषाणु ने अनेक विश्व-नागरिकों को तेजी से रोगग्रस्त कर दिया है और उनमें से कई काल के गाल में भी समा गए हैं। यह विषाणु कहां से आया, कैसे पैदा हुआ, जैसे प्रश्न फिलहाल अनुत्तरित हैं। विश्वसमुदाय में कई जन मिल जाएंगे जो इसे चीनियों के उस खानपान से जोड़कर देखते हैं जिसमें कुछ भी अखाद्य नहीं होता यदि वह विषैला न हो तो। कहते हैं कि वहां कुत्ते-बिल्ली, मेढक-सांप, चूहे-चमगादड़, आदि सभी का मांस भक्षणीय माना जाता है। कदाचित इस विषाणु का स्रोत चमगादड़ है। कदाचित!

लेकिन लोग इस संभावना से आगे चलकर भी देखते हैं। कइयों को शंका है कि यह चीन की किसी चूक का दुष्परिणाम है; अथवा चीन ने यह विषाणु जैविक हथियार के तौर पर ईजाद किया है और जानबूझ कर अनेक देशों के लोगों को संक्रमित कर दिया है। अपनी बात सिद्ध करने को किसी के पास पुख्ता प्रमाण नहीं हैं; बस चीन पर अविश्वास ही उनकी सोच का आधार है।

इसमें दो राय नहीं कि इस विषाणु का फैलाव बड़ी तेजी से हुआ और हो रहा है। यह माना जा रहा है कि यह रोगियों के छींकने पर, सांस की प्रक्रिया में और बोलते वक्त नाक-मुंह से निकले अत्यंत सूक्ष्म जलबिंदुओं (ड्रॉपलेट) में स्थित विषाणुओं से एकदूसरे में फैलता है।

अभी उपचार का कोई कारगर तरीका खोजा नहीं जा सका है। दुनिया के सभी कोनों में भांति-भांति के तरीके अपनाए जा रहे हैं, शायद कोई कारगर सिद्ध हो जाए। प्रभावी दवा के अभाव में एकदूसरे के संपर्क से बचना ही वांछित तरीका है। इसके लिए कई देशों ने “लॉकडाउन” का रास्ता अपना लिया है जिसके तहत लोगों को घरों में सीमित रहने की सलाह दी गई है और कई उद्यमों और कार्यालयों को फिलवक्त अस्थाई बंदी झेलनी पड़ रही है। अपने देश में भी प्रधानमंत्री ने २४ तारीख की अर्धरात्रि से त्रिसाप्ताहिक लॉकडाउन घोषित किया है।

आर्थिक हानि

दैनिक मजदूर इस बंदी के कारण अपने मूल स्थान गांवघरों को लौटने को मजबूर हो चुके हैं। वे लोग बेहद परेशानी झेल रहे हैं। लोगों को सभंलने के लिए २४ घंटे का समय तो मोदीजी को देना ही चाहिए था। निर्णय के कार्यान्वयन में उतावलापन न दिखाते तो रोग के प्रसार में खास फर्क न पड़ता। मैं घर से दूर कुछ करने में असमर्थ हूं। घर पर भी होता तो वृद्धावस्था आड़े आती। चंदे के रूप थोड़ी-बहुत आर्थिक मदद की जा सकती वह मैं कर रहा हूं।

पूरे विश्व के भयावह आर्थिक हानि और मंदी के दौर से गुजरने के आसार प्रबल होते जा रहे हैं। आने वाले समय में उक्त विषाणु मानव समाज को किस हालात में छोड़ेगा यह पूर्णतः अनिश्चित है।

मैं स्वयं कैसे इस मौजूदा हालात से तालमेल बिठा रहा हूं इसे बताने का मन हुआ सो लिख रहा हूं।

लॉकडाउन – आवागमन बंद

हम, (पत्नी तथा मैं) इस समय महानगर बेंगलूरु में हैं, अपने बेटे-बहू-पोते के पास अपने स्थाई निवास वाले शहर वाराणसी से करीब २००० किलोमीटर दूर। आये तो थे केवल महीने भर के लिए और बीते माह (मार्च) की २२ तारीख हवाई टिकट से लौटना था। लेकिन अब यहीं फंसकर रह गये हैं। असल में उस दिन (२२ ता.) के लिए अपने प्रधान मंत्री मोदीजी ने एक-दिवसीय “जनता कर्फ्यू” की घोषणा कर दी। वाराणसी के मेरे मित्रों की सलाह थी कि वहां हवाई अड्डे से घर आने के लिए टैक्सी वगैरह की उपलब्धता की समस्या हो सकती है, अतः उस दिन की यात्रा टाल देना ही उचित होगा। हवाई सेवा वाली कंपनी भी बिना अतिरिक्त शुल्क के यात्रा निरस्त करने के या यात्रा की तिथि आगे बढ़ाने की सुविधा दे ही रही थी।

हमने भी सोचा कि अगले २३, २४, या २५ ता. निकलना बेहतर होगा। दरअसल हम वाराणसी यथाशीघ्र पहुंचना चाहते थे ताकि २५ ता. से आरंभ हो रहे नवरात्र पर्व पर वहां रहें और नौ-दिवसीय फलाहारी उपवास पर रह सकें जिसकी समुचित व्यवस्था यहां पर नहीं हो पा रही थी। वाराणसी के स्थायी बाशिंदा होने के कारण हमारे लिए वहां वांछित व्यवस्था करना आसान था। उपवास तो अभी भी चल रहा है किंतु रात्रि भोजन में अन्नाहार अपना लिया है। संयोग से २४ ता. की अर्धरात्रि से लॉकडाउन हो गया और यात्रा की संभावना फिलवक्त समाप्त हो गई।

हम बेंगलूरु के जिस बहु-आवासीय परिसर में रह रहे हैं वह काफी बड़ा है। २३ बहुमंजीले इमारतों में अनुमानतः २००० फ्लैट होंगे और निवासियों की संख्या ६००० से अधिक ही होगी।  परिसर के चारों ओर टहलने में करीब आधा घंटा लग जाता है। आजकल बमुश्किल चार-छः लोग टहलते दिखते हैं जब मैं बाहर निकलता हूं। अधिकांश लोग अपने-अपने घरों में दुबके रह रहे हैं।

अभी लॉकडाउन की शुरुआत है, इसलिए लोग ऊब नहीं रहे होंगे। लेकिन सोशल मीडिया में कुछ लोगों की बेचैनी के वीडियो देखने को मिल रहे हैं। इन पर विश्वास नहीं होता, पर यदि ऐसा हो तो आश्चर्य भी नहीं होगा। कुछ लोगों को घर पर समय बिताना (या समय काटना!) वास्तव में कठिन होता है। इसका कारण है रोजमर्रा के कामधंधे से जुड़े कार्यों से मुक्त होने पर कुछ नया करने के उत्साह का अभाव। जब कामधंधे से भिन्न रुचियों का अभाव हो तो क्या करूं, क्या करूं की बेचैनी स्वाभाविक होती है।

दिनचर्या बदल-सी गई है

सौभाग्य से मेरे साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है। मेरी रुचियों में पर्याप्त विविधता है। इसलिए मेरे लिए २४ घंटे का समय व्यतीत करना कठिन काम नहीं रहता। यहां घर से दूर भी मेरी सुनियोजित दिनचर्या है।

प्रातःकाल थोड़ा विलंब से उठना हो पाता है, छः-पौनेछः बजे। वाराणसी में होता तो पांचः-पौनेपांच बजे तक उठ जाता। उसके बाद शौच-स्नानादि का कार्य संपन्न करता हूं। पश्चात थोड़ा-बहुत्त प्राणायाम एवं यौगिक व्यायाम भी संपादित कर लेता हूं। इस बीच पत्नी महोदया भी स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर नित्यपूजा (संप्रति संक्षिप्त) में लग जाती हैं और मैं नहाने का कार्य पूरा करने स्नानागार चला जाता हूं। चूंकि रोजमर्रा के कपड़े अपने-अपने हाथ से धोने की हम दोनों की आदत है, अतः नहाने में थोड़ा अधिक समय लग जाता है। मेरे नहाने-धोने के दौरान परिवार का कोई एक सदस्य चाय तैयार कर लेता है।

यहां हिंदी समाचार-पत्र मुश्किल से मिलते हैं और आजकल तो वह भी संभव नहीं। कागज पर छपा समाचार-पत्र पढ़ना मुझे आसान एवं आरामदेह लगता है। मेरी आदत वर्षों से ‘दैनिक जागरण’ के वाराणसी संस्करण पढ़ने की बन चुकी है और उसकी ई-प्रतिलिपि (ई-पेपर) से मेरा काम चल जाता है। चाय की चुस्कियों के साथ तथा उसके कुछ समय बाद तक मेरा ई-पेपर पढ़ना जारी रहता है।

घड़ी की सुइयां अपनी रफ्तार से चलती रहती हैं और इतना सब करते-करते साड़ेदस-ग्यारह बज जाते हैं। तब मैं बाहर निकलता हूं आधा-पौनघंटे के लिए  टहलने। मैं वाराणसी में होता तो यह कार्य प्रातः-काल ही कर चुकता, किंतु यहां यह दोपहर तक हो पाता है। टहलना मेरे नित्यकर्मों का एक अनिवार्य हिस्सा रहता है जिसकी सलाह मुझे अपने डाक्टर से मिली है। आजकल यहां आसमान साफ है लॉकडाउन की मेहरबानी से जिसने प्रदूषण स्तर बहुत घटा दिया है। इसलिए धूप एकदम चटक रहती है, परंतु उससे मुझे कोई परेशानी नहीं होती। दिन का शेष समय लैपटॉप पर लेखन-पठन, टेलीविज़्-समाचार सुनने, अथवा पोते के साथ खेलने आदि में गुजर जाता है। इनके अतिरिक्त घर के भीतर छिटपुट कामों में अन्य सदस्यों को सहयोग देने में भी बीतता है।

कुल मिलाकर लॉकडाउन के इस काल में २४ घंटे का समय व्यतीत करना मेरे लिए कोई समस्या नहीं रहती। मेरा कष्ट इस बात को लेकर है कि यदि में अपने स्थाई निवास वाराणसी में होता तो घर-बाहर के विविध कार्य निबटा रहा होता, जैसे अपने अहाते के छोटेबड़े पौधों या गमलों में लगे पौधों की काटछांट, करने, उन्हें खादपानी देने का काम कर लेता। या घर के भीतर भी घर-गृहस्थी से जुड़े काम निकल ही जाते हैं; उनका भी समाधान निकालता। या किसी पुस्तक अथवा पत्रिका का अध्ययन कर लेता। यहां पर वह सब न पा सकने की विवशता तो है ही। देखिए कब तक यह सब चलता है। – योगेंद्र जोशी

वंदे मातरम् बोलना क्या देशप्रेम या राष्ट्रभक्ति का प्रमाण है? नहीं!

“वंदे मातरम्”

पिछले कुछ समय से कुछएक स्वघोषित राष्ट्रभक्त “वंदे मातरम्” बोलने-बुलवाने पर जोर दे रहे हैं। जो यह वचन (नारा) नहीं बोलता उसे राष्ट्रभक्ति-विहीन या उससे आगे देशद्रोही तक वे कहने से नहीं हिचकिचाते। इस श्रेणी के कुछ जन मारपीट पर भी उतर जाते हैं। कोई-कोई तो अति उत्साह में यहां तक कह बैठता है कि जो यह वचन नहीं बोलता उसे पाकिस्तान चला जाना चाहिए, गोया कि पाकिस्तान ऐसे लोगों के स्वागत के लिए बैठा हो। वे भूल जाते हैं कि कोई भी देश अपने नागरिक को अन्य देश को जबरन नहीं भेज सकता भले ही बड़े से बड़ा अपराध कर बैठा हो। और सजा भी दी जानी हो तो उसका निर्णय अदालत ही कर सकती है।

मुझे इस कथन या नारे से कोई शिकायत नहीं। किंतु कोई मुझसे कहे कि बोलो “वंदे मातरम्”  तो मैं कदाचित नहीं बोलूंगा। मेरा मानना है कि ऐसे शब्द समुचित अवसर पर सप्रयोजन ही बोले जाने चाहिए। जहां कहीं भी जब कभी बिना मकसद के ऐसे शब्द के बोले या बुलवाये जा रहे हों उसे मेरे मत में मूर्खता समझा जाना चाहिए। ऐसा क्यों यह बात उसे नहीं समझा सकते जो तार्किक तरीके से सोचना ही नहीं चाहता है तथा दुराग्रह से ग्रस्त है।

“वंदे मातरम्” शब्द तो एक प्रशिक्षित तोते से भी बुलवाए जा सकते हैं। 3-4 साल का बच्चा भी इसे स्पष्ट उच्चारित करके बोल देगा। परंतु तोते या बच्चे का ऐसा बोलना किसी गंभीर भाव के साथ हो सकता है क्या? वे शब्द जानते हैं लेकिन उसमें निहित अर्थ नहीं। बच्चे को भी इस कथन के भावार्थ वर्षों बाद ही समझ में आने लगता है।

राष्ट्रभक्ति/देशप्रेम दर्शाता है क्या “वंदे मातरम्”?

यह उक्ति हमको संदेश देती है कि देश की यह भूमि हमें जीवन-धारण के साधन एवं सुविधा प्रदान करती है। इस अर्थ में यह हमारी पालनकर्ता कही जाएगी। जन्मदाता माता जन्म तो देती है किंतु जिन संसाधनों से हमें पालती है वह देश की इसी भूमि से पाती है। अतः देश की भूमि स्वयं एक मां की भूमिका निभाती है। जैसे हम मां का सम्मान करते हैं, उसे प्रणाम करते हैं, उसकी वंदना करते हैं, ठीक वैसी ही भावना हम इस भूमि के प्रति रखें यह संदेश उक्त कथन में निहित हैं। यदि इस वचन को कहते हुए किसी के मन में उक्त भावना न उपजे, मन में देशहित की भावना न जन्म ले, तो इसे कहना निरुद्देश्य हो जाएगा।

किसी व्यक्ति के मुंख से निकले शब्दों से वास्तविकता के धरातल पर कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। हां वे शब्द किसी की भावनाओं को उत्तेजित या उत्प्रेरित जरूर कर सकते हैं। असल महत्व तो व्यक्ति के कृतित्व का रहता है। कहने का मतलब यह है कि व्यक्ति का आचरण यदि आपत्तिजनक हो तो “वंदे मातरम्” कहना सार्थक रह जाएगा क्या? यदि कोई इस वचन को बोलने के लिए दूसरे को मजबूर करे और मारपीट-गालीगलौंज पर उतर जाए तो उसका कृत्य वचन के अनुरूप काहा जाएगा, उसका आचरण जनहित में माना जाएगा? उसका कृत्य वस्तुतः कानून के विरुद्ध दंडनीय नहीं समझा जाएगा क्या? दुर्भाग्य से “वंदे मातरम्” पर जोर डालने वालों का आचरण इसी प्रकार का आपत्तिजनक देखने को मिलता है।

मेरा मंतव्य स्पष्ट है। यदि उक्त वचन बोलने वाले के मन में देश के लिए सम्मान भाव न हो, उसके हित यानी देश के नागरिकों के हित की भावना न हो तो “वंदे मातरम्” एक खोखला, अर्थहीन, मूर्खतापूर्ण वक्तव्य भर रह जाता है। आप ही सोचिए कोई इसे बोलने में तो देर न करे, किंतु घूसखोरी करे, सौंपी गई जिम्मेदारी न निभाए, या लापरवाही वरते या जनविरोधी या देशहित के प्रतिकूल आचरण करे तो उसके “वंदे मतरम्” बोल देने का महत्व ही क्या रह जाता है? इसीलिए मैं इस नारे को जबरन मुंह में ठूंसने का घोर वितोधी हूं।

संसद में चिढ़ाने वाले नारे

मेरी गंभीर शंका यह है कि “वंदे मातरम्”, “भारत माता की जय”, “जयहिंद” जैसे नारे राष्ट्रभक्ति के द्योतक नहीं हो सकते। किसी देश के लिए वचनों से अधिक कर्म माने रखते हैं। यदि संबंधित व्यक्ति का आचरण जनहित या देशहित में न हो तो ये नारे खोखले, आडंबरपूर्ण और निन्द्य माने जाएंगे। विगत 17-18 जून को, जब नवनिर्वाचित सदस्यगण शपथ ग्रहण की प्रक्रिया से गुजर रहे थे तब हमारी संसद में ऐसे नारे लग रहे थे।

नारे लगाने वाले कौन थे? मेरे अनुमान से वे प्रमुखतया सरकार चला रही भाजपा के दूसरी-तीसरी श्रेणी के नेता थे, जो अति उत्साह में भारतमाता से संबंधित नारे ही नहीं उसके भी आगे बढ़कर अपनी धार्मिक आस्था के अनुरूप “जै श्रीराम”, “जै बजरंगबली” जैसे नारे लगाने से बाज नहीं आ रहे थे। (अन्य दलों के सदस्यों ने भी कुछ भिन्न नारे लगाए।) सुनते हैं कि पीठासीन सभापति ने उन्हें नारों से बचने का अनुरोध किया था। लेकिन वह नेता ही क्या जो दूसरों की सुनता हो? गौर करें कि दल के शीर्ष श्रेणी के नेता स्वयं ऐसी हरकतें नहीं करते हैं, किंतु वे अपने दल के दोयम दर्जे के ऐसे नेताओं को नारों से बचने की हिदायत भी नहीं देते। भाजपा अध्यक्ष और प्रधानमंत्री ने उन्हें रोकना नहीं चाहिए था क्या?

संसद में विद्यमान अन्य धार्मिक आस्थाओं वाले सदस्य इन नारों को सुनना पसंद तो नहीं करते होंगे, लेकिन वे विरोध में कुछ कहना भी ठीक नहीं समझते होंगे। वे कदाचित संसद में शालीनता बरतना ठीक मानते होंगे और इन नारों को नजरअंदाज करते होंगे। वे वस्तुतः ठीक करते हैं, क्योंकि नारे लगाने वाले अपनी बचकानी हरकतों से देश का कोई हित नहीं साधते हैं, बस उन्हें संतुष्टि मिलती है “देखा मैंने नारे लगा दिए”, गोया कि किसी शेर से लड़ने की बहादुरी दिखाई हो।

स्वयं को “सेक्युलर” (धर्मनिरपेक्ष) कहने वाले देश की संसद जैसी जगह पर ऐसे नारों का लगना मेरी नजर में आपत्तिजनक लगता है। जो शासकीय व्यवस्था लोगों को संसद में ऐसी निरर्थक और आस्थाबोधक नारेबाजी की छूट देता है उसे मैं “स्यूडोसेक्युलर” मानना हूं।

संयोगवश किसी सोशल मीडिया चैनल पर मुझे पढ़ने को मिला: “ये नारे मुस्लिम समुदाय को चिढ़ाने के लिए लगाए जाते हैं।” मैं इस बात से सहमत हूं। मुझे मुस्लिम समुदाय के कुछ सदस्यों में यह चिन्ताजनक कमजोरी दिखती है कि वे नारों की अनदेखी करने के बजाय उन्हें अपने सामने पेश चुनौती के रूप में लेने लगते हैं। ऐसी कमजोरी अन्य समुदायों में मुझे नहीं दिखाई देती। गौर करें कि उसी शपथ कार्यक्रम में हैदरबाद के नवनिर्वाचित सांसद ने प्रतिक्रिया-स्वरूप “जै भीम”, “जै हिन्द” और “अल्लाहू अकबर” के नारे लगा दिये। उनके अलावा उ.प्र. के संभल क्षेत्र के सांसद ने तो साफ घोषित कर दिया कि “वंदे मातरम्” का नारा इस्लाम-विरोधी है।

शपथ-ग्रहण आयोजन की अधिक जानकारी उदाहरणार्थ द हिन्दू और टाइम्ज़ ऑफ़ इंडिया में मिल सकती है।

क्या है और क्या नहीं है इस्लामविरोधी

मुझे मुस्लिम समुदाय पर कभी-कभी तरस आता है। उनके धर्मगुरु कहते हैं “वंदे मातरम्” इस्लाम के विरुद्ध है, वह वर्जित है, इत्यादि। हजरत साहब के समय में जो चीजें थीं ही नहीं उनका इस्लाम के विरुद्ध होना किस आधार पर तय किया जा सकता है? असल में मुस्लिम धर्मगुरु सुविधा के हिसाब से चलते हैं। जिन बातों में उन्हें सुविधा होती है उसे वे स्वीकार्य मान लेते हैं और जिसके बिना काम बखूबी चल जाता है उसे वे इस्लाम-विरोधी कह देते हैं।

मैं मुस्लिम समुदाय के सामने अपनी कुछ शंकाएं रखता हूं;

(1) उन्हें अपने बच्चों को आधिनुक विज्ञान पढ़ाना चाहिए कि नहीं?

(2) यदि पढ़ाते हैं तो उन्हें यह सिखाया जाएगा कि इस संसार और उसके जीवों की सृष्टि 7 दिन में नहीं हुई, बल्कि वह सब अरबों-करोड़ों वर्षों के विकास का परिणाम है। ऐसा करना इस्लामी दर्शन के विरुद्ध नहीं होगा क्या?

(3) यदि बच्चे आधुनिक विज्ञान पढ़ते और स्वीकरते हैं और कालांतर में उसी विज्ञान के आधार पर नौकरी-पेशे में जाते हैं तो ऐसा करना गैरइस्लामी नहीं होगा क्या? क्या ऐसी धर्मविरुद्ध शिक्षा स्वीकारनी चाहिए मुस्लिमों को?

(4) इतना ही नहीं इसी विज्ञान पर आधारित चिकित्सा और उससे जुड़ी दवाइयों का सेवन इस्लाम विरुद्ध नहीं होगा क्या?

(5) क्या आधुनिक टेक्नॉलॉजी पर आधारित सुविधाएं इस्लाम-विरुद्ध नहीं हैं, क्योंकि ये उस आधुनिक विज्ञान की देन हैं जो इस्लाम्मिक दर्शन से मेल नहीं खाता है।

इतने सब गैर-इस्लामिक बातों को स्वीकारने वाले यदि “वंदे मातरम्” बोल देंगे तो कौन-सा अनर्थ हो जाएगा? यह नारा इस्लामी दर्शन को तो नहीं नकारता है न? यह अल्लाह के वजूद को तो नकारता है क्या? मोहम्मद हजरत का निरादर करता है क्या? पांच बार की नमाज की मनाही करता है क्या?  इसाईयत एवं इस्लाम के आध्यात्मिक दर्शन के मूल में तो वही यहूदी दर्शन है, थोड़ा हेर-फेर के साथ! इसाई एवं यहूदी भी क्या इतना विरोध करते हैं?– योगेन्द्र जोशी

क्या नेरेन्द्र मोदी फिर से प्रधान मंत्री बनेंगे? लगता तो ऐसा ही है!  

आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट कर दूं —

मैं वाराणसी का वरिष्ठ (उम्र 70+) मतदाता हूं। मतदान छोड़ता नहीं किंतु किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करता, मोदीजी के पक्ष में भी नहीं। दरअसल मैं नोटा का प्रबल पक्षधर हूं और उसकी वकालत करता हूं। मैंने एक वयस्क नागरिक के रूप में 1969 और उसके बाद के चुनाव देखे हैं और पिछले दो-तीन दशकों से लोकतांत्रिक प्रणाली में गंभीर और तेजी से गिरावट महसूस करने लगा हूं। फलतः लोकतंत्र के मौजूदा मॉडल से मेरा मोहभंग हो चुका है। किस-किस तरीके की गिरावट देख रहा हूं इसका विवरण मैं यहां नहीं दे सकता, क्योंकि इस आलेख का विषय वह नहीं है।

मैंने पिछले कुछ दिनों जिज्ञासावश यह जानने-समझने की कोशिश की कि मोदीजी के सत्ता में लौटने की संभावना कितनी है। मेरा अनुमान या आकलन अलग-अलग मौकों तथा स्थानों पर आम लोगों से हुई बातों पर आधारित है। मेरी बात बमुश्किल 10-15 लोगों से हुई होगी, जो सांख्यिकीय (statistical) दृष्टि से अपर्याप्त है। फिर भी मुझे जो लगा वह कुछ हद तक माने तो रखता ही है।

मैं अपने अनुभवों को कालक्रमबद्ध (chronological order) तरीके से पेश कर रहा हूं —

(1)

दो-ढाई महीने पहले मेरे पड़ोस में एक सज्जन ने अपने नये मकान में प्रवेश किया। उस अवसर पर उन्होंने गृह-प्रवेश के पारंपरिक पूजा-सह-भोज का आयोजन किया था, जिसमें मुझे भी आमंत्रित किया गया था। उस मौके पर उनके परिवारी जनों के अलावा गांव से भी कुछ लोग आये हुए थे। उनके यहां बैठे हुए कुछ लोगों के बीच राजनीति और आगामी लोकसभा चुनावों की चर्चा हो रही थी। मैं उन लोगों की बातों को ध्यान से सुन रहा था। सभी एक बात पर सहमत दिखे, वह यह कि लोग (यानी विपक्ष के लोग) बिलावजह मोदीजी के पीछे पड़े हैं। मोदीजी को चुनाव जीतना चाहिए। मैंने सुनिश्चित करने के लिए किसी एक से पूछ लिया, “लगता है आप लोग मोदीजी को वोट देने की सोच रहे हैं। आपके गांव में क्या मोदीजी के पक्ष में माहौल है?”

उत्तर था, “हां लगभग सभी इसी मत के हैं”। उन लोगों से बातें तो काफी विस्तार से हुईं किंतु उतना सब मुझे न याद है और न उतना सब प्रस्तुत करने की जरूरत है।

(2)

विगत जनवरी के अंतिम सप्ताह में मेरी पत्नी एवं मैं लखनऊ गए थे एक वैवाहिक समारोह में सम्मिलित होने के लिए। पहले दिन वैवाहिक कार्यक्रम-स्थल पर रेलवे स्टेशन से जाने और दूसरे दिन वापस स्टेशन आने के लिए हमने ऊबर (Uber) टैक्सी-सेवा का प्रयोग किया था। रास्ते की एकरसता से बचने के लिए दोनों बार हमने संबंधित टैक्सी-चालक से बातचीत की और स्वाभाविक तौर पर प्रासंगिक विषय – चुनावों – की चर्चा की। चर्चा मोदीजी के दुबारा प्रधानमंत्री बनने परकेंद्रित थी। वे दोनों मोदीजी के प्रबल समर्थक निकले। वे कह रहे थे “मोदीजी जो कर रहे ठीक कर रहे हैं। उनकी योजनाओं का लाभ तुरंत लोगों को मिले यह हो नहीं सकता, कुछ समय लगेगा ही। लोगों को धैर्य रखना चाहिए।”

वे मोदीजी की ईमानदारी एवं नीयत के क़ायल थे। इस बात पर दोनों का ही जोर था कि मोदीजी अपने घर-परिवार के लिए तो वह सब नहीं कर रहे हैं जो कि आजकल सभी दलों के मुखिया कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह रही कि रात्रि द्वीतीय प्रहर में जब हम वाराणसी वापस पहुंचे और ऑटो-रिक्शा से अपने घर वापस आने लगे तो ऑटो-चालक की मोदीजी के बारे में कमोबेश वही राय थी जो लखनऊ के टैक्सी चालकों की थी। उनके विचार रखने और शब्दों के चयन में फर्क स्वाभाविक था। कुल मिलाकर हमें लगा कि वे मोदीजी की कार्यप्रणाली ठीक बता रहे थे और उनकी सत्ता में वापसी के प्रति आश्वस्त थे।

(3)

(वाराणसी) उक्त घटना के दो-तीन रोज के बाद मैं अपने दर्जी के पास से कपड़े लेने गया। दर्जी महोदय उस समय खास व्यस्त नहीं थे और कोई अन्य ग्राहक उस समय वहां नहीं था। ऐसे मौकों पर मैं दुकानदार से थोड़ी-बहुत गपशप भी कर लेता हूं। उसी रौ में मैंने दर्जी से चुनाव की बात छेड़ी और पूछा, “इस बार किसको जिता रहे हैं वाराणसी से?” (मोदीजी का निर्वाचन क्षेत्र था 2014 में; और इस बार भी रहेगा ऐसी उम्मीद है।)

जवाब सीधा एवं सपाट था, “मोदीजी जीतेंगे और फिर से प्रधान मंत्री बनेंगे।”

“लेकिन मोदीजी पर विपक्ष बुरी तरह हमलावर है जो कहता है कि नोटबंदी तथा जीएसटी (GST) ने व्यापार चौपट कर दिया और श्रमिक बेरोजगार हो गए, इत्यादि-इत्यादि।” मैंने विपक्ष का तर्क सामने रखा।

“देखिए आरोप लगाना तो विपक्ष की मजबूरी है। लेकिन नोटबंदी एवं जीएसटी से कुछ समय परेशानी अवश्य हुई होगी। परंतु यह भी समझिए कि दीर्घकालिक देशहित के लिए कष्ट तो सहना ही पड़ेगा। … सबसे बड़ी बात यह है कि मोदीजी यह सब अपने परिवार के लिए, भाई-बंधुओं के लिए नहीं कर रहे न? उनके परिवारीजन अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं और मोदीजी से किसी प्रकार का लाभ लेने की नहीं सोचते हैं। ये राजनेता तो सबसे पहले अपना घर भरते हैं। देखिए कुछ तो विधानसभा, लोकसभा में सबसे पहले अपने भाई-बहनों, चाचा-भतीजों को ही पहुंचाते हैं। ठीक है क्या? मोदी ऐसा तो नहीं करते न?”

दर्जी महोदय राजनीतिक तौर पर काफी सजग थे और वस्तुस्थिति का ठीक-ठीक आकलन करने की कोशिश कर रहे थे।

(4)

फ़रवरी माह के अंतिम और मार्च के प्रथम सप्ताह हम राजस्थान भ्रमण पर निकले थे। हम दोनों को मिलाकर कुल छ: जने थे, सब के सब वरिष्ठ नागरिक। चुनाव की बात करना हम वहां भी नहीं भूले। जैसलमेर में मेरी पत्नी और मैं मिठाई की एक दुकान में गये। जैसा मुझे याद है दुकान के बोर्ड पर लिखा था “पालीवाल मिष्ठान्न”. खरीद-फरोख्त के साथ थोड़ी-बहुत बात भी हो गई। “इस बार केन्द्र में किसकी सरकार बनवा रहे हैं?” हमने सवाल पूछा।

दुकान के मालिक का त्वरित उत्तर था, “मोदीजी वापस आएंगे। और भला है ही कौन? ये लोग मिलकर सरकार चला पाएंगे?”

“लगता है आप मोदी के प्रबल समर्थक हैं।” हमने टिप्पणी की।

उन सज्जन का सीधा उत्तर था “हम तो भाजपा वाले हैं, वोट उसी को देंगे।”

बातचीत के बाद हम आगे बढ़ गए। एक फल वाले के ठेले पर हम रुक गए कुछ फल खरीदने के लिए। फल वाले से यों ही पूछ लिया, “कुछ ही दिनों में देश में चुनाव होने हैं। चुनाव में दिलचस्पी लेते हैं कि नहीं?”

फल वाले ने कहा, “दिलचस्पी क्यों नहीं लेंगे भला? वोट भी डालेंगे; देश के भविष्य से जुड़ा है चुनाव तो।”

“आप लोगों ने तो पिछले प्रादेशिक चुनावों में कांग्रेस के पक्ष में वोट डाला था। इस बार भी कांग्रेस के प्रत्याशी को वोट देंगे न?” हमने टिप्पणी की।

“तब वसुंधराजी से नाखुशी थी प्रदेशवासियों को, किंतु मोदीजी से नहीं। इस बार उन्हीं के पक्ष में वोट पड़ेंगे।

(5)

राजस्थान पर्यटन के दौरान हम जोधपुर भी गये थे। वहां मैं इस विषय पर अधिक लोगों से बातचीत नहीं कर पाया। परंतु एक व्यक्ति, जो कपड़ों की सिलाई की दुकान चला रहे थे, और उनके साथी से बातें अवश्य हुईं। उनकी दुकान स्टेशन के सामने की सड़क पर 300-400 मीटर की दूरी पर थी। वहां मुझे ऐसे सज्जन मिले जो मोदीजी के घोर विरोधी थे। नोटबंदी एवं जीएसटी (GST) को लेकर वे गुस्से में थे और कह रहे थे कि मोदी ने गरीबों की रोजी-रोटी छीन दी। ऐसा इलजाम विपक्ष लगाता ही रहा है।

उन सज्जन ने मुझसे मेरा परिचय जानना चाहा । बदले में मैंने भी उनसे उनका परिचय ले लिया। संयोग की रही कि उनका जातिनाम भी मोदी ही था। मेरी आम धारणा यह रही है कि अधिकतर भारतीय अपनी जाति के लोगों के प्रति कोमल भाव रखते हैं। लेकिन यहां पर उल्टा ही हो रहा था।

जैसलमेर एवं जोधपुर में हम लोगों को मरुभूमि के रेतीले टीलों (sand dunes) पर जीप से घूमने का मौका मिला (वहां का प्रमुख आकर्षण)। दोनों ही बार हमें मोदी-विरोध सुनने को मिला। उन जीप-चालकों से अधिक बातें करने पर पता चला कि वे मुस्लिम समुदाय से हैं। हमने महसूस किया कि धार्मिक पृष्ठ्भूमि मोदीजी के संदर्भ में अहमियत रखती है। ऐसा अनुभव अन्यत्र भी हमें हुआ।

(6)

हम लोग जयपुर भी घूमने गए थे। वहां मुझे चुनावों के बारे में किसी से बातें करने का मौका नहीं मिला। जयपुर के दर्शनीय स्थलों को दिखाने वाले टैक्सी-चालक से अवश्य बातें हुईं। उसने बताया कि मिर्जापुर (या सोनभद्र, याद नहीं) में उसकी ससुराल है और वाराणसी से खास लगाव रखता है। उसने मोदीजी के पक्ष में ही अपनी राय रखी। संयोग से वह हिन्दू निकला।

(7)

(वापस वाराणसी) एक दिन मैं वाराणसी में अपने घर से बमुश्किल तीन-चार सौ मीटर दूर  प्रातः से दोपहर तक लगने वाली सट्टी में फल-सब्जी खरीदने गया। (सट्टी = थोक एवं फुटकर फलों एवं सब्जियों का बाजार।) मैं वर्षों से हफ़्ते में दो-तीन बार इस कार्य के लिए जाया करता हूं। कुछ फुटकर विक्रेताओं से मेरा अच्छा-खासा परिचय है और मैं उनसे आम ग्राहकों की तरह पेश नहीं आता, बल्कि उनसे थोड़ी-बहुत गुफ्तगू भी कर लेता हूं। उन्हीं में से एक से मैंने पूछ लिया, “कहिए, आपके ’मोदीजी’ के क्या हाल हैं? इस बार भी सरकार बना पाएंगे क्या?”

प्रत्युत्तर में उसने मुझसे ही सवाल कर दिया, ” आप ही बताइए किसको वोट दें? विकल्प कहां है? विपक्ष के नेता मिलकर सरकार बना पाएंगे क्या? बना भी लें तो चला पाएंगे? कितनी टिकाऊ होगी उनकी सरकार? सबके आपने-अपने स्वार्थ हैं।”

सब्जी विक्रेता की बातों में स्पष्ट संकेत था। मोदीजी को वोट न दें तो किसे दें?

निष्कर्ष –

अब चुनाव घोषित हो चुके हैं, दलों की घोषणाएं मतदाताओं को सुनने को मिल रही हैं। कांग्रेस गरीबों को 72 हजार रुपये सालाना देने का वादा कर रही है। ऐसे वादे मरदाताओं के विचार बदल सकते हैं। परिस्थितियां बदलने पर चुनाव के परिणाम भी बदलेंगे ही।

फिर भी मुझे लगता है कि कांग्रेस पार्टी पर्याप्त सीटें नहीं जीत पाएगी। कोई चमत्कार हो जाए तो बात अलग है। अन्य दलों का देशव्यापी जनाधार है नहीं। प्रायः सभी क्षेत्रीय (या एक प्रकार से क्षेत्रीय) दल हैं। उनमें परस्पर स्थायी सहमति एवं एकता दिखाई नहीं देती। भविष्य में सहमति बन पाएगी क्या? मुझे लगता है मोदीजी सत्ता में लौटेंगे। हो सकता है रा.लो.ग. (NDA) को बहुमत न मिले, फिर भी जोड़तोड़ करके सरकार बना ली जाएगी।

अवश्य ही मोदीजी की सत्ता में वापसी को कुछ लोग देश का दुर्भाग्य कहेंगे। – योगेन्द्र जोशी

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अगस्त 15, 72वां स्वतंत्रता दिवस – बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिए

बर्फ़ की तिरंगी सिल्ली

स्वाधीनता दिवस – एक पर्व

आज 15 अगस्त है देश की स्वातंत्र्य-प्राप्ति का दिन, जिसे पिछले एकहत्तर वर्षों से हम एक उत्सव के तौर पर मनाते आ रहे हैं। इस उपलक्ष्य पर मैं देशवासियों को बधाई देना चाहता हूं और कामना करता हूं कि हर व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने का संकल्प ले, उसे निभाने का प्रयास करे।

     ऊपरी तौर पर देखें तो हर भारतीय इस दिन स्वयं को एक स्वाधीन देश का नागरिक होने का गर्व अनुभव करेगा। किंतु हम स्वाधीन हैं इतना काफी है क्या? या इसके आगे भी कुछ और है? जिन लोगों ने इस स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए संघर्ष किया उन्होंने क्या स्वाधीनता की अर्थवत्ता के बारे में भी कुछ सोचा नहीं होगा? उन्होंने सोचा होगा न कि कैसे हम अपने देशवासियों को ऐसी शासकीय व्यवस्था दे पायेंगे जो उनके बहु-आयामी हितों को साधने का कार्य करेगा? क्या वह कर पाए हैं हम? या उस दिशा में ईमानदारी से बढ़ भी पाए हैं? या सही दिशा में बढ़ने का इरादा भी कर पाए हैं?

हम स्वाधीन हैं और उस स्वाधीनता का “उपभोक्ता” मैं भी हूं। मेरे लिए यह काफी महत्वपूर्ण है, किंतु पर्याप्त नहीं। इसके आगे भी मुझे बहुत कुछ और देखने की इच्छा है। मुझे खुद के लिए कुछ पाने की लालसा नहीं, क्योंकि मेरे पास अपने लिए पर्याप्त है। जितना एक आम आदमी के लिए वांछित हो उतना मुझे मिला ही है, उसके आगे बहुत और मैं पाना नहीं चाहूंगा। उसके विपरीत किसी को अपनी सामर्थ्य से कुछ दे सकूं तो वह अधिक संतोष देगा।

स्वाधीन भारत – उपलब्धियां

अब मैं असली मुद्दे पर आता हूं। मेरा जन्म देश की स्वातंत्र्य प्राप्ति के चंद महीनों पहले उत्तराखंड (तब उ.प्र.) के सुदूर गांव में हुआ था। अर्थात्‍ मैं परतंत्र देश में जन्मा, लेकिन उस काल का कोई अनुभव नहीं मिला। जब से होश संभाला स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस मनते हुए देखता आ रहा हूं। क्या अहमियत है इन दिवसों की? यह सवाल पिछले कुछ वर्षों से समझने की कोशिश कर रहा हूं।

इस में दो राय नहीं है कि एक स्वतंत्र और स्वशासित देश के रूप में हमने भौतिक स्तर पर काफी प्रगति की है। विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में से एक बनने की दिशा में देश अग्रसर है। लोगों की संपन्नता एवं आर्थिक समृद्धि में इजाफा हुआ है। देश अंकीय (डिजिटल) तकनीकी उपयोग करते हुए नई शासकीय व्यवस्था स्थापित कर रहा है। लोगों के हाथ में मोबाइल/ स्मार्टफोन पहुंच चुके हैं। जिन घरों में बिजली का पंखा मुश्किल से दिखता था उनमें “एसी” लग चुके हैं। सुख-सुविधा की तमाम युक्तियां लोगों की पहुंच में आ चुकी हैं। सड़कों पर मोटर बाइकें और कारें दौड़ रही हैं। साइकिल का प्रयोग जो करते थे वे उसे चलाना भी भूल चुके हैं। यह सच है कि इतना सब अभी भी समाज के एक बड़े तबके को मुहैया नही हो पाया है। फिर भी उस दिशा में देश बढ़ रहा है यह स्वीकारा ही जाएगा।

वैज्ञानिकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी काफी हद तक प्रगति हुई ही है। उपग्रह प्रक्षेपण में देश अग्रणी बन चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु देशज मिसाइलें बन चुकी हैं और नाभिकीय आयुधों का भी विकास हो चुका है। राकेट तकनीकी का भी उल्लेखनीय विकास हमारे वैज्ञानिक-अभियंता कर चुके हैं। चंद्रयान की बात पुरानी पड़ चुकी है; अब तो मंगल-यान की बात हो रही है।

यह सब उपलब्धियां कम हैं क्या एकहत्तर वर्ष पहले स्वतंत्र हुए देश के लिए? क्या इन सब पर गर्व नहीं होना चाहिए किसी भारतीय को? अवश्य गर्व होना चाहिए।

निजी अनुभव

इतना सब होते देखने के बाद भी मैं संतोष नहीं कर पाता। मुझे लगता है हमने जितना पाया है उससे अधिक खोया है। वैसे जो पाया और जो खोया उनके मूल्यों की तुलना करना आसान नहीं। हर व्यक्ति अपनी समझ और नजर से वस्तुस्थिति को देखेगा। क्या खोया इसका उल्लेख करने और अपनी निराशा व्यक्त करने से पहले मैं अपने दो-तीन अनुभवों की बात करता हूं:

(1) मैंने सन् 1962 में हाई-स्कूल परीक्षा पास की थी अपने गांव से 7-8 कि.मी. दूर के विद्यालय से। मुझे एक घटना की याद है जब जिले के किसी परीक्षा केन्द्र से खबर आई कि कोई छात्र वहां नकल करते पकड़ा गया। नकल का एक वाकया इलाके में खबर बन गई। नकल करने की कोई हिम्मत कर सकता है यह हम लोग तब सोचते भी नहीं थे। अब क्या है?

(2) अपने बचपन के दिनों में मैं मां-चाची आदि के वार्तालाप में इस प्रकार की बातें सुना करता था: “सुना है फलां आदमी घूस लेने लगा है।” कोई सरकारी कर्मी घूस भी लेता है यह तब खबर बन जाती थी। अब क्या है?

(3) 1972-73 की बात है जब रेल-यात्रा में मेरा बैग गुम हो गया था। उसमें हाई-स्कूल से एम.एससी. तक के प्रमाणपत्र थे। मैंने संबंधित संस्थाओं को प्रमाणपत्रों की द्वितीय प्रतियों हेतु निवेदन किया। मुझे बिना भाग-दौड़ और लेन-देन किए कुछ दिनों के अंतराल पर दस्तावेज मिल गए। मैं सोचता हूं आज वही कार्य इतना आसान न होता।

देश की वर्तमान दशा

मैं कल दोपहर एक टीवी समाचार सुन रहा था। उसमें इधर-उधर की आपराधिक घटनाओं का जिक्र था। दो-चार की बानगी पेश करता हूं:

(1) आगरा (उ.प्र.) में हिन्दू अतिवादियों ने किसी बात पर एक युवक की पिटाई कर दी थाने में ही पुलिस की मौजूदगी में।

(2) मेरठ (उ.प्र.) में किसी एसयूवी कार से आल्टो कार टकराई और एसयूवी के सशस्त्र सवारों ने दूसरी कार के दोनों सवारों की तबियत से पिटाई तो की ही, फिर अपनी कार में बिठाकर अज्ञात जगह ले भागे।

(3) मुरादाबाद (उ.प्र.) में उपद्रवी कांवड़ियों द्वारा सड़क पर किसी बात पर उत्पात मचाने की घटना का भी समाचार टीवी पर सुना।

(4) उन्नाव (उ.प्र.) में एक-तरफा प्यार में पागल शादीशुदा एक युवक ने युवती की मौजूदगी में ही उसके ब्यूटी पार्लर में तोड़फोड़ कर दी।

(5) ग्रेटर नॉयडा (उ.प्र.) में गुंडे-बदमाशों की गोली का शिकार हुआ एक व्यक्ति।

(6) नवी मुम्बई (महा.) में रंगदारी वसूलने के लिए दुकान में घुसे बदमाश दुकानदार पर ताबड़तोड गोली दागकर फरार हो गये।

(7) वैशाली (बिहार) से भी ऐसी ही एक घटना सुनने को मिली।

(यह विवरण याददास्त पर आधारित है; स्थान एवं घटना के स्वरूप बताने में उलटफेर हो गया होगा।)

ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की घटनाएं पहले नहीं होती थीं। तब कभी-कभार देखने-सुनने में आती थीं, लेकिन आजकल घटनाओं की बाढ़-सी आ चुकी है।

सरकारें अपराधियों को सजा देने का दावा करती हैं; कुछ मामलों में सजा भी हो जाती है। किंतु वे यह जानने के प्रयास नहीं करती हैं कि अपराध होते ही क्यों हैं? न सरकारें न ही देश के बुद्धिजीवी ऐसे किसी अध्ययन में रुचि ले रहे हैं। लोगों में आपराधिक प्रवृत्ति न पनपे इसके प्रयास होने चाहिए कि नहीं?

इन सब बातों को देखकर मुझे निराशा होती है। मेरा मत है कि देश विकट चारित्रिक पतन के दौर से गुजर रहा है। विकास एवं आर्थिक प्रगति इस पतन की भरपाई नहीं कर सकते है। एक सभ्य, सुसंस्कृत समाज की रचना महान्‍ देश की पहचान होनी चाहिए।

     मुझे यह देख हैरानी एवं क्षोभ होता है कि देश में अनेक लोग हैं जिनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ है, अनुशासनहीनता, स्वच्छंद आचरण, कायदे-कानूनों का उल्लंघन, इत्यादि। मैंने आरंभ में बताया कि 1962 में नकल को किस नजरिए से देखा जाता था। आज सरकारी स्कूल-कालेजों के छात्र नकल को अपना अधिकार समझते हैं। इतना ही नहीं उनका साथ शिक्षक, अभिभावक, और पुलिस भी दे रही है। सरकारी शिक्षा का स्तर गिर रहा है। यही आज के डाक्टरी पेशे का है जहां अनेक डाक्टर संपन्न होने के बावजूद मरीज के प्रति सहानुभूति नहीं रखते। पुलिस बल को देखकर कई जन घबराते हैं। कोई महिला शिकायत लेकर थाने जाने में डरती है कि वहां कहीं उसी का दुष्कर्म न हो जाए। दुष्कर्म की घटानाएं दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं। राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है ऐसा क्यों कहा जा रहा है? कुछ तो सच्चाई होगी। बिहार के मुजफ़्फ़रपुर और उ.प्र. के बालिका संरक्षण गृहों की घटनाएं आज के आपराधिक मानसिकता के लोगों की देन है जिन्हें राजनेताओं एवं प्रशासन से प्रशय मिल रहा होता है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। उ.प्र. के वाराणसी एवं बस्ती और पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी के निर्माणाधीन फ़्लाई-ओवरों का गिरना इसी भ्रष्टाचार के परिणाम हैं।

     यह विषय लंबी विवेचना चाहता है जिसे इस आलेख में शामिल करना कठिन है। कुल मिलाकर मैं यही मानता हूं कि देश चारित्रिक पतन की राह पर है। – योगेन्द्र जोशी

वैश्विक तापन (ग्लोबल वॉर्मिंग) बनाम हवाई परिवहन को बढ़ा

दो-चार दिन पूर्व मुझे अपने हिन्दी अखबार में एक समाचार पढ़ने को मिला। उसकी कतरन (क्लिप) की आंकिक प्रति यहां प्रस्तुत है।

ऊपरी तौर पर इस खबर पर खुश हुआ जा सकता है। अब आप उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों के बीच हवाई सफ़र कर सकते हैं। बसों या (लेट-लतीफ) ट्रेनों से घंटों की यात्रा के बदले घंटे भर में यात्रा संपन्न कर सकते हैं (बशर्ते आप संपन्न व्यक्ति हों)। इस समाचार पर भला क्या टिप्पणी कि जा सकती है? यह जरूर ध्यान में रखें कि हवाई यात्रा के लिए हवाई अड्डे तक आने-जाने का वक्त अक्सर कई घंटे का होता है। बसों/रेलगाड़ियों को दौड़ते-भागते भी पकड़ सकते हैं किंतु जहाजों के लिए समयसाध्य औपचारिकताएं भी निभानी पड़ती हैं।

लेकिन मैं इस स्थल पर हवाई यात्रा के अन्य पहलू पर बात करना चाहता हूं। दरअसल मामला जलवायु परिवर्तन या उसके जुड़े वैश्विक तापन (ग्लोबल वॉर्मिंग) से संबंधित है। आजकल इस विषय पर मीडिया में बहुत-कुछ पढ़ने-सुनने को मिल रहा है। वैज्ञानिकगण, स्वयंसेवी संस्थाएं और दुनिया की कुछ सरकारें पिछले तीन-एक दशकों से इस विषय पर अपनी चिंताएं व्यक्त करती आ रही हैं। वैश्विक तापन को कैसे रोका जाए इस पर सभी देश समय-समय पर बैठकें करते आ रहे हैं। इस समस्या के लिए कोई व्यक्ति खास कुछ नहीं कर सकता। कायदे-कानून बनाना और उनका क्रियान्वयन करना अंततोगत्वा सरकारों का ही काम  होता है। अस्तु।

हवाई परिवहन को बढ़ावा देना वैश्विक तापन को नियंत्रित करने के उपायों के विरुद्ध जाता है। इसलिए मेरा मत है कि इसे प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। यह बात जरूर है इस तथ्य के बावजूद हवाई परिवहन दुनिया भर में बढ़ता जा रहा है। खुद अपने देश में हवाई सफर आम होता जा रहा है। एक समय था जब हवाई यात्रा की मात्र कामना ही लोग कर पाते थे और दो-दो तीन-तीन दिन ट्रेनों में बिता के अपने गंतव्य पर पहुंचते थे। तब हवाई सफ़र लोगों की आमदनी के हिसाब से बहुत महंगी होती थी। हवाए सेवाएं भी तब कम ही थीं। परंतु आजकल यह अपेक्षया सस्ती हो चुकी है। अब वाराणसी से बेंगलूरु ट्रेन से जाने के बदले हवाई जहाज से जाना बहुतों के लिए आम बात हो चुकी है।

परिवहन के अन्य साधनों की तुलना में हवाई परिवहन वैश्विक तापन बढ़ाने में कहीं अधिक प्रभावी है इस बात समझने के लिए वैश्विक तापन से मतलब क्या है यह जानना आवश्यक है। इस धरती पर मौजूद जीव-जंतुओं, वनस्पतियों, छोटे-बड़े प्राणियों के लिए पृथ्वी की सतह के ऊपर के वायुमंडल की करीब दसएक कि.मी. मोटी तह ही सीधे तौर पर अहमियत रखती है। इस तह का तापमान जीवधारियों को प्रत्यक्षतः प्रभावित करता है, जो किसी जगह दिन भर बदलता रहता है। एक दिन से दूसरे दिन, एक माह से दूसरे माह, भिन्न-भिन्न रहता है। हर वर्ष वस्तुस्थिति फिर-फिर से कमोवेश वैसी ही देखने को मिलती है। किसी स्थान के लिए वर्ष भर का औसत उस स्थान के जलवायु का एक परिचायक होता है। इस औसत वार्षिक तापमान में थोड़े-बहुत उतार चढ़ाव हम सदा से देखते आए हैं। लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि कुलमिलाकर दो-ढाई सदियों पूर्व यूरोपीय औद्योगिक क्रांति के बाद से यह औसत तापमान बढ़ता जा रहा है। कहा जा रहा है कि तब से अब तब करीब 1.8° सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है और यह बढ़ते जा रहा है।

मौसम विज्ञानियों के अनुसार बढ़ रहे इस तापमान का कारण वायुमंडल में वायुमंडल में विद्यमान कार्बन-डाईऑक्साइड गैस है। ग्रीनहाउस गैसों के नाम से पुकारी जाने वाली अन्य गैसें (मुख्यतः मीथेन, नाइट्रस-ऑक्साइड, ओजोन तथा जलवास्प) और ऐरोसोल भी वायुमंडल को गर्माने की क्षमता रखती हैं। (ऐरोसोल किसी पदार्थ के हवा में तैरते हुए अतिसूक्ष्म कणों – माइक्रोमीटर से छोटे आकार के – बने होते हैं, जिसके उदाहरण कोहरा, धुंआ, और अति महीन धूलकण हैं।) ये गैसें कैसे वायुमंडल को गर्म रखती हैं इस विषय की विवेचना यहां पर संभव नहीं। यहां बस इतना ही कहना काफी है कि इन सब की जितनी अधिक मात्रा वायुमंडल में बढ़ेगी तापमान बढ़ाने में वे उतने ही कारगर होंगे। अध्ययनों से पता चलता है कि कार्बन-डाईऑक्साइड गैस की वृद्धि जिस तेजी से हो रही है उसकी तुलना में अन्य सभी की नगण्य है। इसलिए इस गैस को ही वैश्विक तापन के लिए जिम्मेदार माना गया है।

सवाल पूछा जा सकता है कि वायुमंडल में उपर्युक्त कार्बन-डाईऑक्साइड प्रदूषण – संक्षेप में कार्बन प्रदूषण – बढ़ क्यों रहा है। इसका उत्तर सरल है: खनिज इंधनों के प्रयोग से। खनिज कोयला, पेट्रोल-डीजल आदि (पेट्रोलिअम इंधन), और भूगर्भ से प्राप्य गैस खनिज अथवा जीवाश्म इंधन कहे जाते हैं। इन इंधनों के जलने से हमें वह ऊर्जा प्राप्त होती है जिससे मोटर-वाहन, डीज़ल इंजन, हवाई जहाज, बिजली घर, इत्यादि चला करते हैं। जलने की इस प्रक्रिया में कार्बन-डाईऑक्साइड पैदा होती है जो वायुमंडल में घुल जाती है। जाहिर है जिस कार्य में अधिक इंधन जलेगा उससे उतना ही अधिक कार्बन प्रदूषण होगा।

अब लौटिए हवाई परिवहन की बात पर। विभिन्न माध्यमों द्वारा परिवहन पर प्रति यात्री प्रति कि.मी. कितना कार्बन-डाईऑक्साइड प्रदूषण (संक्षेप में कार्बन प्रदूषण) पैदा होता है इसका मोटा-माटी अंदाजा यूरोपीय देशों के लिए उपलब्ध अधोलिखित आंकड़ों के आधार पर लगाया जा सकता है:

माध्यम यात्री संख्या औसतन कार्बन प्रदूषण/यात्री/कि.मी.
रेलगाड़ी          156           14 ग्राम
छोटी कार            4           42 ग्राम
बड़ी कार            4           55 ग्राम
बस           12.7           68 ग्राम
मोटरबाइक            1.2           72 ग्राम
हवाई जहाज           88          285 ग्राम
समुद्री जहाज            –          245 ग्राम

इन सांख्यिक आंकड़ों को शब्दश: नहीं लिया जाना चाहिए। और भारत जैसे देश पर तो ये लागू भी नहीं हो सकते। हम जानते हैं कि अपने देश में रेलगाड़ियां हों या बसें, यात्री प्रायः ठूंसे ही रहते हैं। इसलिए प्रति व्यक्ति प्रदूषण यूरोप की तुलना में 5-10 गुना कम ही होगा। दूसरी ओर कारों से प्रदूषण कुछ अधिक ही होगा क्योंकि यहां सड़कें सपाट और गड्ढामुक्त नहीं होतीं। यह भी ध्यान दें कि यदि कार में अकेला व्यक्ति सवार हो तब प्रति व्यक्ति प्रदूषण की मात्रा 2-3 गुना अधिक होगी।

हवाई जहाज का मामला कुछ भिन्न है। आम तौर पर ये 90% तक यात्रियों से भरे ही रहते हैं चाहे भारत हो या यूरोप-अमेरिका। इसलिए भारत पर भी ये कमोबेश लागू होंगे। एक बात स्पष्ट कर दूं कि उक्त तालिका छोटे हवाई जहाजों और कम दूरी की उड़ान के लिए हैं। बड़े जहाजों की कार्यकुशलता अपेक्षया बेहतर होती है। यह भी ज्ञातव्य है कि लंबी उड़ानों पर खर्चा कम आता है। इसलिए लंबी दूरी के लिए संबंधित आंकड़ा 100 तक नीचे जा सकता है।

उक्त तालिका से स्पष्ट है कि अपने देश में रेलगाड़ी की तुलना में कम दूरी की हवाई यात्रा पर प्रति व्यक्ति प्रति कि.मी. प्रदूषण 20-30 गुना या उससे अधिक होता है। यह बात तो सुस्पष्ट है कि हवाई यात्रा किसी अन्य साधन की तुलना में काफी अधिक प्रदूषण पैदा करता है इसलिए यह जलवायु के लिए अधिक हानिकर है। अकेले व्यक्ति का कार से आवागमन भी हानिकर ही है। इसलिए इन्हें प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए।

इस समय सारे विश्व में बढ़ते वैश्विक तापन पर चिंता व्यक्त की जा रही है और उन उपायों की खोज की जा रही है जिससे प्रदूषण नहीं भी घटे तो कम से कम बढ़े तो नहीं। ऐसी दशा में हवाई परिवहन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए क्या, विशेषतः छोटी दूरियों के लिए? -योगेन्द्र जोशी