पुनर्मूषको भव – किन्तु न शक्यं तत्कर्तुम् (विवशता अपराधी के मुठभेड़ की)

देश में अनेक मौकों पर दुर्दांत अपराधियों का मुठभेड़ (इंकाउन्टर) में मारा जाना कोई नई बात है। पुलिसबलों द्वारा ऐसी घटनाओं को अंजाम देना एक प्रकार की विवशता का द्योतक है। अभी हाल में मुठभेड़ की ऐसी ही एक घटना कानपुर के अपराधी विकास दुबे के साथ घटी। उस घटना पर मुझे एक शिक्षाप्रद कथा की याद हो आई जिसे मैंने छात्र-जीवन में अपनी किसी संस्कृत पुस्तक में पढ़ी थी। कथा का शीर्षक थाः “पुनर्मूषको भव”, अर्थात् फिर से मूस (mouse) हो जाओ।

कुख्यात अपराधियों को लेकर अपनी टिप्पणी करने से पहले मैं उक्त कथा का संक्षेप में उल्लेख कर देता हूं।

किसी वन में एक महात्माजी (संन्यासीजी) कुटिया बनाकर रहते थे। वे किसी वनीय प्राणी को भगाते-दौड़ाते नहीं थे। विपरीत उसके वे अपने भिक्षार्जित भोज्य पदार्थ उनको भी खिलाते थे। समय वीतते-वीतते वहां के सभी प्राणी उनके सापेक्ष निर्भिक हो चुके थे। पास के गांव से कुत्ते-बिल्ली भी उनके पास आते-जाते थे।

उनकी कुटिया के निकट एक मूस/चूहा भी बिल बनाकर रहता था। वह भी उनके समीप निडर होकर खेलता-कूदता था। एक बार चूहे ने महात्माजी को अपनी व्यथा सुनाई, “महाराज, आप तो अपने तप के बल पर बहुत-से कार्य सिद्ध कर सकते हैं। मुझे भी एक कष्ट से मुक्ति दिलाइये।”

उदारमना महात्माजी ने जब उसके कष्ट के बारे में जानना चाहा तो चूहे ने कहा, “महाराज, एक बिल्ली अक्सर यहां आती है। वह मुझे मारकर खाना चाहती है। उससे मुझे डर लगता है। क्यों नहीं आप मुझे बिल्ली बना देते हैं ताकि मैं उसका मुकाबला कर सकूं।”

महात्माजी ने उसकी बात मानकर उस पर अभिमंत्रित का सिंचन किया और ‘तथास्तु’ कहते हुए उसे बिल्ली बना दिया। अब बिल्ली बना चूहा खुश था और निर्भीक होकर कुटिया के आसपास घूमने लगा। दिन बीतते गये। एक दिन कोई कुत्ता आकर उस बिल्ली के पीछे दौड़ पड़ा। जब भी कोई कुत्ता आता वह बिल्ली को काटने दौड़ पड़ता। बिल्ली ने महात्माजी से शिकायत करके उसे भी कुत्ता बना देने की प्रार्थना की। महात्माजी ने दया-भाव से उसे कुत्ता बना दिया। उस वन में जंगली जानवर भी रहते थे जो अक्सर कुटिया के आसपास आ जाते थे। महात्माजी उन्हें भी प्यार से पास आने देते। उन्हें देख कुत्ता डर जाता था। एक बाघ उस कुत्ते को शिकार बनाने की फिराक में था। तब उस कुत्ते ने महात्माजी को अपनी परेशानी बताई और उसे भी बाघ बना देने का अनुरोध किया। दयालु महात्माजी ने तथास्तु कहते हुए उसकी यह मुराद भी पूरी कर दी। बाघ की हिंसक प्रकृति के अनुरूप व्यवहार करते हुए वह महात्माजी पर झपटने की सोचने लगा। महात्माजी उसका इरादा भांप गये और “पुनर्मूषको भव” कहते हुए मंत्रों से उसे फिर से चूहा बना दिया।

उक्त कथा प्रतीकात्मक है नीति की बात स्पष्ट करने के लिए। प्राचीन संस्कृत साहित्य में पशु चरित्रों के माध्यम से बहुत ही बातें समझाने की परंपरा रही है। उक्त कथा में चूहे ने कोई अपराध नही किया उसे कोई सजा नहीं दी महात्माजी ने, लेकिन जब बाघ बने उसकी आपराधिक वृत्ति उजागर हुई तो उन्होंने उसे फिर से निर्बल चूहा बना दिया। उसकी औकात उसे दिखा दी।

अब मैं अपराधियों के मुठभेड़ की बात पर लौटता हूं। उपरिलिखित कथा बताती है कि अयोग्य व्यक्ति पर उपकार करना घातक सिद्ध हो सकता है। यानी आपराधिक वारदातों में लिप्त व्यक्ति पर रहम नहीं किया जा सकता है; उसके बचाव में उतरना कालांतर में घातक होता है। जब चीजें बहुत आगे बढ़ जाती हैं तो लौटकर भूल-सुधार की संभावना नहीं रहती। उक्त कथा में महात्माजी चूहे को बाघ योनि तक बढ़ा सके थे और उसको खतरनाक पाने पर पूर्ववर्ती योनि में लौटा सके थे। अपराधों की दुनिया में ऐसी वापसी संभव नहीं। जो अपराध किया जा चुका हो उसे “न हुआ” जैसा नहीं कर सकते। वस्तुस्थिति गंभीर हो इससे पहले ही कारगर कदम उठाना जरूरी होता है।

दुर्भाग्य से हमारी शासकीय व्यवस्था अपराधों को गंभीरता से नहीं लेती और समय रहते समुचित कारगर कदम नहीं उठाती। पुलिस बल अपराधों को रोकने और अपराधियों पर नकेल कसने के लिए बनी है। आम जनता की नुमायंदगी करने वाले राजनेताओं से उम्मीद की जाती है कि वे देखें कि शासकीय व्यवस्था उनके घोषित उद्येश्यों के अनुरूप चल रहा है। ये बातें हो रही हैं क्या? हरगिज नही!

विपरीत उसके अपराधियों के साथ साठगांठ रचने उनको बढ़ावा देने में हमारा पुलिसबल, प्रशासनिक तंत्र और शासकीय व्यवस्था चलाने वाले राजनेता, सभी एकसमान भूमिका निभाते हैं।

एक नागरिक के तौर पर मैं मौजूदा राजनैतिक जमात को सम्मान की दृष्टि से नहीं देख पाता। चाहे, मोदी हों, या योगी, या मुलायम सिंह, मायावती, और अन्य, लोग सभी के दलों में आपराधिक मानसिकता के नेता भरे पड़े हैं। कहा जाता है कि तकरीबन ३०% जनप्रतिनिधि आपराधिक बारदातों में लिप्त लोग हैं। मैं आपसे सवाल पूछता हूं। आप अपने आसपास, चारों तरफ नजर दौड़ाइये, यारदोस्तों-परिचितों से पूछिये कि आम लोगों के बीच किस अनुपात में अपराधी होंगे। १% भी नहीं, या १%, २%, ३%, … मुझे पूरा विश्वास है कोई भी अधिक नही बतायेगा। तो फिर राजनीति में इतने अधिक क्यों हैं? स्पष्ट है कि राजनीति उनकी शरणस्थली बन चुकी है।

सवाल उठता है कि राजनीति में ही इतने अधिक अपराधी क्यों हैं?

उनके बचाव में राजनेताओं की बेहूदी दलील सुनिएः उनके विरुद्ध झूठे मुकदमे दर्ज होते हैं। क्यों होते हैं झूठे मुकदमे? आमजन पर तो ऐसे झूठे मुकदमें सामान्यतः दर्ज नहीं होते तो इनके विरुद्ध ही क्यों? क्यों इनके इतने दुश्मन होते है? इलजाम छोटे-मोटे नहीं। कोई कत्ल का तो कोई बलात्कार का, कोई जमीन-जायदाद हड़पने का। एक औसत आदमी पर तो ऐसे  मुकदमें दर्ज नहीं होते। फिर इन्हीं राजनेताओं पर एक-दो नहीं दर्जनों मुकदमें क्यों दर्ज होते हैं, वह भी हत्या, बलात्कार, लूटपाट, अपहरण जैसे संगीन बारदातों के? आखिर इन ताकतबर लोगों ने इतने दुश्मन क्यों पाले हैं जो उनके विरुद्ध मुकदमे ठोकते हैं। जाहिर है कि मौजूदा राजनीति में अपराधियों का बोलबाला है और हर दल उन्हें संरक्षण देता है, मानें या न मानें।

हर राजनैतिक दल कहता है कि जब तक इन लोगों को अदालत दोषी घोषित नहीं करती इन्हें अपराधी कैसे मान लें? बहुत खूब! यह है “न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी” का सटीक उदाहरण अदालत में अपराध सिद्ध करेगा कौन? आपराधिक छवि ये लोग पुलिस में, राजनेताओं के बीच, अपनी पैठ बना लेते हैं। किसकी मजाल है कि जान पर खेलते हुए उनके विरुद्ध गवाही दे। पुलिस तो इतनी ईमानदार है कि परिस्थितिजन्य सभी साक्ष्य मिटा देती है। “कोढ़ में खाज” की स्थिति। न्यायिक व्यवस्था इतनी लचर है कि सालों लग जाते हैं निर्णय आने में। तारीख पर तारीख पर तारीख … यह अदालतों की कार्य-प्रणाली बन चुकी है। हमारी न्यायिक व्यवस्था अपराधी को कैसे बचाया जाये इस बात को महत्व देती हैं न कि भुक्तभोगी को कैसे न्याय दिलाया जाये उसको। कुल मिलाकर किसी का अपराधी सिद्ध होना आसान नहीं होता है।

सवाल उठता है कि किसी की छवि का भी महत्व होना चाहिए कि नहीं? अपने व्यक्तिगत जीवन में हम इसे महत्व देते है। फिर राजनीति में क्यों इसकी अनदेखी होती है? किसी राजनेता को अपने साथ आपराधिक छवि वाले को देख शर्म क्यों नही आती?

इन सवालों को उन राजनेताओं के सामने उठाना बेमानी है जो खुद इसके लिए जिम्मेदार हैं।

पुलिसकर्मी भी राजनेताओं के चहेते अपराधियों के बचाव में आ जाते हैं। कुछ तो उनसे दोस्ती ही कर लेते हैं, तो कुछ मजबूरी में चुप रहते हैं, क्योंकि नेताओं की बात न मानना घाटे का सौदा होता है।

कुल मिलाकर अपराधियों को रोकने वाला कोई नहीं।

लेकिन जब उनकी हरकतें इतनी बढ़ जाती हैं कि उनके संरक्षक या उनको प्रश्रय देने वाले ही खतरा महसूस करने लगें तो वे उनको ठिकाने लगाने की सोचते हैं। कानपुर के विकास दुबे ने जब ८ पुलिसकर्मियों को मार डाला तब सबकी नींद खुली। उसको मृत्युदंड जैसी न्यायसंगत सजा दिलाना संभव नहीं उस पुलिस बल के लिए जो तब तक उसे बचाती आ रही थी। अतः मुठभेड़ के नाम पर उसे यमलोक पहुंचाना उनकी विवशता थी।

इस घटना पर मैंने एक ब्लॉगलेख लिखा है (दिनांक १५ जुलाई २०२०) ।  घटना का वीडियो देख मुझे लगा कि वह तो एक घटिया और बनावटी तरीके से नियोजित इंकाउंटर का खेल था।

जब किसी अपराधी के हौसले इतने बुलंद हो जायें कि वह पुलिसबल के सिर पर चढ़ बैठे तो पुलिस असहाय हो जाती है। इसी बात को रेखांकित करने के लिए मैंने कथा के शीर्षक में यह शब्द जोड़े हैंः “किन्तु न शक्यं तत्कर्तुम्” अर्थात् वैसा करना संभव नहीं जैसा महात्माजी ने किया था कथा में। – योगेन्द्र जोशी

निष्प्रभावी न्यायिक तंत्र बनाम नियोजित मुठभेड़ – किस्सा विकास दुबे का

कानपुर की दिल दहलाने वाली घटना

पिछले कुछ दिनों से विकास दुबे समाचार-माध्यमों (मीडिया) पर चर्चा का विषय रहा है। उसके बारे में पहले कभी मैंने नहीं सुना था। शायद कम ही लोग (कानपुर से बाहर) उसके बारे में सुनते रहे होंगे। मेरे ख्याल से उससे कहीं अधिक चर्चा में उत्तर प्रदेश के अन्य अपराधी-माफिया रहे हैं। उसका अनायास चर्चा में आना उस दिल दहलाने की घट्ना के बाद हुआ जब २-३ जुलाई की अर्धरात्रि में हुए पुलिस छापे (raid) में उसने अपने गुर्गों की फौज की मदद से ८ पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार दिया। इस घटना में उसके मदद्गार खुद दो पुलिसकर्मी भी थे जिन्होंने छापे की गोपनीय जानकारी समय से पूर्व उस तक पहुंचाई। क्या विडंबना है कि पुलिस वालों को मरवाने में खुद अन्य पुलिसकर्मियों का हाथ था। घटना के बाद उसके कई साथी मारे गये और वह भागते-फिरते उज्जैन महाकालेश्वर मंदिर तक दर्शनार्थ पहुंच गया।

समाचार के अनुसार उज्जैन में एक पुष्पविक्रेता (माली) और मंदिर के सुरक्षाकर्मी ने उसे पहचान लिया और उसे पुलिस के हत्थे चढ़वा दिया। पुलिस जब उसे पकड़कर ले जा रही थी तो वह चीखकर बोला “मैं विकास दुबे कानपुर वाला”। ऐसा कहकर वह शायद लोगों को बताना चहता था कि उसके साथ कोई मुठभेड़ की घटना तो नहीं होगी। उसने भागने की कोशिश नहीं की है और पुलिस ने उसे निर्विरोध पकड़ लिया है। खुद को उज्जैन की पुलिस के हवाले करके वह मुठभेड़ से बच जाने की उम्मीद कर रहा था।

नियोजित घातक मुठभेड़ यानी इन्काउंटर

जुलाई ११ (शनिवार) के दैनिक जागरण (वाराणसी संस्करण, पृ. ८) में छपे समाचार के अनुसार गुरुवार को विकास दुबे को उज्जैन पुलिस ने महाकालेश्वर में पकड़ा और उसे पहले महाकाल थाने और फिर भैरवगढ़ थाने ले गई। पूछताछ के बाद उसे उ.प्र. से पहुंची एसटीएफ (STF) टीम को सौंप दियाउज्जैन पुलिस का दावा है की उसको हथकड़ी पहनाई थी और साथ में सुरक्षा हेतु बुलेट-प्रूफ जैकेट भी। विचार ठीक था क्योंकि उसका कोई दुश्मन कहीं घातक हमला न कर दे इससे बचना था। सुरक्षा के कदम तो उठाने ही चाहिए भले ही वे गैरजरूरी लगें। ऐन मौके पर धोखा तो हो ही सकता है, खास तौर पर शातिर अपराधी के मामले में। मध्य प्रदेश पुलिस शिवपुरी थाने तक एसटीएफ टीम के साथ रही जहां उ.प्र. का पुलिस बल पहुंच गया था। म.प्र. पुलिस ने वहां पर उसकी सुपुर्दगी (रात्रि करीब ८:०० बजे) की और एसटीएफ टीम कानपुर की ओर लौट आई।

कानपुर लौटते समय झांसी बॉर्डर पार करने के बाद सभी ने एक ढाबे पर भोजन किया और फिर आगे बढ़ गये। यहां तक तो सब ठीक रहा, किन्तु पुलिस के अनुसार कनपुर से करीब १०-१२ किमी पहले (भौंती गांव के आसपास) पानी बरसने के कारण फिसलनदार हो चुकी सड़क पर पुलिस की वैन जिसमें दुबे और कुछ पुलिसकर्मी थे पलट गयी। पुलिस कहती है कि गाय-भैंसों के झुंड के सामने आ जाने से यह हादसा हुआ। इसमें कुछ पुलिसकर्मीं जख्मी हुए। विकास दुबे को मौका मिला, उसने एक पुलिसमैन की पिस्टल छीनी और गोली चलाते हुए वह खेतों की तरफ भागने लगा। पुलिस ने उसे चेतावनी दी, वह माना नहीं। अंततः पुलिस को आत्मरक्षा एवं उसे रोकने के लिए गोलियां चलानी पड़ी। परिणाम उसके जीवन का अंत।

मुठभेड़ की विवशता

दुर्दांत अपराधियों के मामले में उ.प्र. की पुलिस आमतौर पर निष्क्रिय बनी रहती है जब तक कि कोई गंभीर घटना न घट जाये, जैसे कानपुर में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या। ऐसे अपराधियों को कानूनसम्मत तरीके से सजा दिलाना पुलिस के लिए बेहद कठिन होता है। तब एक ही रास्ता रह जाता है – घातक मुठभेड़ यानी इन्काउंटर। इन्काउंटर का रास्ता विवादास्पद होता है यह सरकार और पुलिसबल, दोनों, जानते हैं। जनता भी इसे समझती है। लेकिन पुलिस की मजबूरी होती है इसे समझते हुए कई लोग इसे स्वीकार्य मानते हैं। लेकिन आलोचना के शौकीन लोगों को कुछ कहने-लिखने का मसाला मिल जाता है। वे भी समुचित सजा दिलाने का विकल्प क्या है यह नहीं बता पाते। सिद्धांतों से दुनिया चलती नहीं, किसी विकल्प को व्यावहारिक होना चाहिए!

अपराधों के अनुरूप सजा दिलाना क्यों असंभव-सा होता है इसे समझना कठिन नहीं है। कोई इंसान रातोँ-रात दुर्दांत अपराधी नहीं बनता और न ही वह राजनेताओं और प्रशासनिक/पुलिस अधिकारियों के संरक्षण के बिना चर्चित अपराधी की श्रेणी में आता है। अपराधी मूर्ख नहीं होते लेकिन उनकी सोच असामान्य और आपराधिक मनोवृत्ति की होती है। अपने काम में समय के साथ महारत हासिल कर लेते हैं। राजनेताओं और अधिकारियों से संबंध कैसे स्थापित करें इस कला को वे बखूबी सीख जाते हैं। दोनों पक्षों के बीच एक प्रकार के लेनदेन (give and take) का रिश्ता स्थापित हो जाता है। “मुझे तुम संरक्षण दो और मैं मौके पर तुम्हारे काम आऊंगा।” की नीति अपना लेते हैं। उदाहरणार्थ वह संरक्षक राजनेता के लिए येनकेन प्रकारेण वोट का बंदोबस्त करता है और बदले में राजनेता पुलिस और न्याय-तंत्र उसे बचाने की कोशिश करते है।

साफ है कि जब किसी को बचाने वाले मौजूद हों तो सजा कौन दिलायेगा? कोई पुलिस वाला करे क्या जब उस पर दवाब पड़ रहा हो। फोन पर उस तक पहुंचने वाले “आदेश” वह न माने तो अपराधी का कुछ बिगड़ता नहीं उल्टे पुलिस वाले को तबादले या निलंबन का दंड भुगतना पड़ता है। संबंधित राजनेता या उच्चाधिकारी का भी कुछ नहीं बिगड़ता है। राजनेता तो यह कहकर पल्ला झाड़ लेता है, “सार्वजनिक व्यक्ति होने के कारण तमाम लोग उससे मिलने आते हैं, जिनको पहचानने न पहचानने की जिम्मेदारी वह नहीं ले सकता। इसलिए किसी के साथ तस्वीर छप गयी तो इसमें गुनाह क्या है?“

अपराधियों से सभी आम लोग डरते हैं, खास तौर पर भुक्तभोगी जो कहीं से भी संरक्षण नही पाते और पुलिस भी अपराधी का नाम सुन मामला रफा-दफा करने में जुट जाती है (कौन दुश्मनी मोल ले?)। इसलिए अपराधी के विरुद्ध गवाही देने की हिम्मत आम आदमी नहीं दिखा पाता। फलतः अदालतों में जघन्य अपराध सिद्ध नहीं हो पाता और जब अपराधी बरी हो जाता है तब वह उन साक्ष्य देने वालों से चुन-चुन कर बदला लेता है। वह पहले से अधिक ताकतबर होकर उभरता है।

यदि पुलिसबल यह महसूस करे कि अपराधी को मृत्युदंड से कम सजा नहीं मिलनी चाहिए  जो  लचर न्यायिक  व्यवस्था के चलते  होगा नहीं तो वह घातक मुठभेड़ का रास्ता अपनाता है।

ध्वस्त न्यायिक व्यवस्था

यह सचमुच दुर्भाग्य का विषय है कि हमारी न्यायिक व्यवस्था भरोसेमंद नहीं रह गयी है। अंग्रेजी में एक उक्ति हैः “Justice delayed is justice denied”। अर्थात् बिलंब से दिया गया अदालती निर्णय असल में न्याय नहीं रह जाता है। यह कथन आप न्यायाधीशों, राजनेताओं, जनप्रतिनिधियों और बुद्धिजीवियों, सभी, के मुख से सुनते आये होंगे। तो फिर त्वरित न्याय की दिशा में कोई कदम क्यों नहीं उठाये जाते?

न्यायिक व्यवस्था की गंभीर खामियों का शिकार भुक्तभोगियों को होना पड़ता है। समस्याएं अनेक हैं जैसेः

(१) न्यायालयों में न्यायाधीशों की कमी

(२) अपराधियों की पैरवी को कानूनी दांवपेंच के ज्ञाता अधिवक्ता

(३) किसी मामले की सुनवाई की तारीख पर तारीख

(४) गंभीर पाये गये अपराधियों को भी जमानत

(५) पुलिसबल का मामले के प्रति उदासीनता

(६) सुरक्षा के अभाव में गवाहों का मुकरना

(७) नयायालयों का परिस्थिति-जन्य साक्ष्यों को गंभीरता से न लेना

(७) न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार

इनके अतिरिक्त भी अन्य कारण हो सकते हैं।

मुठभेड़ का अविश्वसनीय नाटकीय खेल

मेरी धारणा है कि मुठभेड़ के बहुत कम मामले होते हैं जिसमें पूरा घटनाचक्र इस तरह घटित होता है कि उसकी वास्तविकता पर शक न किया जाये। उसमें दोनों पक्षों के कुछ सदस्य जख्मी होते हैं और एक या अधिक अपराधी मारे भी जाते हैं। इसके विपरीत अधिकांश बनावटी होते हैं, अर्थात् वे पूर्वनिर्धारित रहते हैं और उनको कैसे अंजाम दिया जायेगा इसकी योजना पहले से तय हो चुकती है। मेरा मानना है कि विकास दुबे की मुठभेड़ इसी श्रेणी की थी। मुझे कई बातें ऐसी लगी जो उसे एक घटिया दर्जे के फिल्मांकन की तरह लगता है जिसमें निर्देशक साफ नजर माने वाली गलतियां करता है।

(१ )     मुठभेड़ की घटना प्रातः ७:००-७:३० बजे की बताई जाती है। कहा जाता है कि सड़क पर गाय-भैंसो के आ जाने और पुलिस-वैन का अचानक ब्रेक लगने से वह एक ओर पलट गयी। मेरा ख्याल है कि पशुपालक सुबह के टाइम अपने नित्य कर्म करके उन्हें दुहते हैं और चारागहों को ८-९ बजे से पहले नहीं ले जा पाते हैं। (घटना के वीडियो में मैंने तो किसी को कहते भी सुना कि रात भर वैन चला रहे चालक को  झपकी  आ गयी होगी।)

(२ )     क्या वैन पलटने का कथित दावा सही है? यदि हां तो सवाल उठता है कि तेज गति का वाहन पलटने के बाद भी कुछ दूर तक घिसटेगी ही। लेकिन घटनस्थल पर ऐसे कोई संकेत नहीं दिख रहे थे। वाहन एक तरफ पलटी हुई थी लेकिन क्षतिग्रस्त नजर नही आ रही थी। उसके पहिए तो सही सलामत दिख रहे थे। यह भी मेरी समझ से परे है क्यों क्रेन से उस वाहन को कुछ दूर तक घसीट कर ले जाया गया? क्या इसलिए की वाहन का एक पार्श्व (कदाचित बाई साइड) सड़क से रगड खाये ताकि बाद में कोई देखे तो दावे को सही मान ले। अन्यथा कोई भी सामान्य समझ वाला यही मानेगा कि वाहन को पहले पहियों पर खड़ा किया जाना चाहिए, फिर आगे खींचकर ले जाना चाहिए। “टो” (tow) करने का आम तरीका यही होता है।

(३)     विकास दुबे दुर्दांत अपराधी माना गया। खुद उज्जैन पुलिस ने उसे हथकड़ी पहनाकर उ.प्र. पुलिस को सोंपा था। तब क्यों एसटीएफ टीम ने उसे हथकड़ी नहीं पहनाई? हथकड़ी किस श्रेणी के अपराधी को पहनाई जाती है। पुलिस का तर्क मनमानी का था। हथकड़ी न सही, अपराधी के हाथ तो कमर के पीछे ही बांधा होता!!

(४)     कहते है उसे दो पुलिसकर्मियों ने बीच में बिठाकर पकड़ रखा था। वाहन पलटने पर पुलिसकर्मियों को चोटें आईं, अपराधी को नहीं। वह उनके बीच से वाहन के बाहर निकलने में कैसे सफल हुआ? हल्की-फुल्की चोट खाये (?) दो पुलिसजन उसे नियंत्रित नहीं कर सके। इतने कमजोर थे वे दोनों? अन्य कर्मी क्या थे ही नही? पूरा काफिला चल रहा था।

(५ )     ताज्जुब कि वह किसी की पिस्टल भी छीनकर भागने में समर्थ हुआ। उसकी एक टांग कमजोर थी और वह ठीक-से चल भी चल भी नहीं पाता था और वह ऐसा दौड़ा कि कोई जवान उसे पकड़ भी नहीं पाया।

(६)     खैर भागा, फायरिंग करते हुए। पुलिस ने जो गोलिया चलाईं इतनी नजदीक से चलाईं कि उसका हृदय, गुर्दा (किडनी), जिगर (लिवर) को छेदते हुए पार हो गयीं। क्या निशाना था जवानों का! वैसे कम ही पुलिसमैन निशानेबाज हो पाते हैं। मुठभेड़ में आम तौर पर कमर के नीचे गोली चलाई जाती है। लेकिन जब इरादा ही मुठभेड़ में मारने का हो तो ऐसा ही होता है।

अंतिम बात

मुठभेड़ में विकास दुबे को मारा जाना था इरादतन। यह बात प्रायः हर कोई मान कर चल रहा था। जैसा पहले कह चुका हूं मैं भी यही मान रहा था। पुलिस की यह मजबूरी थी और यह न्यायसम्मत नहीं था। मेरा कहना है कि इस नाटक को गटिया तरीके से नहीं पेश करना चाहिए था। उसे विश्वसनीय लगना चाइए था।

नौबत मुठभेड़ की आई। इसके लिए जनता की सेवा करने का राग अलापने वाले राजनेता और खुद पुलिस महकमा जिम्मेदार रहा था। अन्य अप्रराधियों को भी संरक्षण ये ही दिये हुए हैं।

इस घटना पर मुझे एक पौराणिक कथा ध्यान में आती है।स्मासुर नामक एक असुर ने महादेव शिव की घोर तपस्या की। आशुतोष कहे जाने वाले भगवान शिव वरदान देते समय भावी परिणामों के बारे में सोच नहीं पाते थे। असुर ने वर मांगा कि जिसके सिर पर हाथ रखूं वह भस्म हो जाए। शिवजी ने वर दे दिया। असुर ने उसका प्रयोग उन्हीं पर करना चाहा। वे भागे-भागे भगवान् विष्णु के पास पहुंचे। श्रीविष्णु ने मोहिनी रूप धारण करके असुर को अपने साथ नृत्य का प्रलोभन दिया। नृत्य की एक भंगिमा में मोहिनी ने अपने सिर पर हाथ रखा। असुर ने उस भंगिमा की नकल की और स्वयं को भस्म कर डाला। हमारे शासकीय तंत्र में अपराधी को इसी प्रकार पहले संरक्षण दिया जाता है, फिर अति होने पर उसका इंकाउंटर कर दिया जाता है।योगेंद्र जोशी

आवश्यक नहीं कि न्यायिक व्यवस्था निर्दोष हो – निरपराध को मृत्युदंड का एक मामला

बीबीसी वेबसाइट पर प्रकाशित एक समाचार पढ़ने को मिला मुझे; शीर्षक था ।  “अमरीका में ‘एक निर्दोष’ को हुई मौत की सजा” ।

समाचार अमेरिका के टेक्सस राज्य में घटित एक पुराने न्यायिक मामले से जुड़ा है । सन् 1989 में कारलोस दे लूना नामक व्यक्ति को मृत्युदंड की सजा दी गई थी, जिसे वांदा लोपेज नाम की एक महिला की 1983 में की गई हत्या का दोषी ठहराया गया था । समाचार `द गार्जियन’ में भी पढ़ सकते हैं ।

मामले का अहम पहलू यह है कि लूना मौत की सजा दिए जाने तक यह कहता रहा कि वह निर्दोष है और असल हत्यारा कारलोस हैर्नादेज नामक व्यक्ति है । लेकिन उसके कथन को नजरअंदाज कर दिया गया ।

कारलोस दे लूना वस्तुतः निर्दोष रहा होगा इस बात का संकेत अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय के विधि विभाग के एक अध्ययन से मिलता है । उक्त मामले का शैक्षिक शोध के तौर पर बारीकी से गवेषणात्मक अध्ययन प्रोफेसर जेम्स लीबमैन के मार्गदर्शन में पिछले पांच वर्षों तक बारह छात्रों ने किया गया था । पेट्रोल पंप पर कार्य करने वाली उक्त महिला की चाकू घोंपकर हत्या की गई थी । छात्रों ने पुलिस की मामले से संबंधित फाइलों को खंगाला, उपलब्ध चस्मदीदों के साक्षात्कार लिए, और मामले से जुड़े जासूसों से बात की । हत्या के बाद के 40 मिनटों के दौरान क्या-क्या घटित हुआ इस पर विशेष ध्यान दिया गया । पुलिस अधिकारियों ने कारलोस दे लूना को पास के एक ट्रक के नीचे छिपा पाया । अपने बचाव में उसके द्वारा दिए गये बयानों को दरकिनार करते हुए उसी को हत्यारा ठहरा दिया गया ।

छात्रों ने पाया कि पूरी पड़ताल में तमाम खामियां थीं । एक खामी यह थी कि चस्मदीदों के अनुसार हत्यारा घटना-स्थल से उत्तर दिशा की ओर भागा था, जब कि दे लूना पूर्व की ओर खड़े केट्र के नीचे छिपा मिला । उसके कपड़ों पर खून के निशान भी नहीं थे । छात्रों के अनुसार पुलिस ने प्रयुक्त हथियार, और मृतक के शरीर के ऊतकों (नाखून, बाल आदि) के नमूने लेने में भी चूक की थी । न ही इस बात की पर्याप्त छानबीन की कि हत्या कहीं कार्लोस हैर्नादेज ने तो नहीं की थी, जैसा कि दे लूना ने बारबार कहा । लूना के अनुसार उसने हैर्नादेज को पंप परिसर में घुसते देखा था । (वह कदाचित् हैर्नादेज को पहचानता था ।) मुकदमे के दौरान हैर्नादेज को दे लूना द्वारा हत्यारा बताए जाने को अभियोजकों ने उसकी कोरी कल्पना कहा था ।

उपर्युक्त अध्ययन में हैर्नादेज को एक खतरनाक अपराधी बताया गया है, जिसे पड़ोसी पर हमले के लिए जेल की सजा भी हो चुकी थी ।

हैर्नादेज का देहांत 1999 में एक जेल में हुआ था । दे लूना को पहले ही 1989 में मौत की सजा मिल चुकी थी । वे दोनों अब इस दुनिया में नहीं रहे ताकि वे अपनी बात रख सकें । कुल मिलाकर लगता यही है कि दे लूना को निर्दोष होने के बावजूद मौत दी गयी ।

वास्तव में न्यायप्रणाली जटिल होती है और उसमें कदम-कदम पर त्रुटियों की संभावनाएं रहती हैं । न्यायिक प्रक्रिया में अपनी-अपनी भूमिका निभाने वाले लोगों की अपनी कमजोरियां भी उसमें दोष पैदा कर सकती हैं । इसलिए अंतिम न्यायिक निर्णय सही ही होगा यह दावा करना कठिन है ।

बीबीसी के इस समाचार के साथ ही मुझे न्यू साइंटिस्ट पत्रिका में भी न्यायप्रणाली संबंधी कुछ बातें पढ़ने को मिलीं । उनमें
कुछएक कारकों की चर्चा की गयी है, जिनका निर्णय-प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ता है । इनमें कुछ यों हैं:

आरोपी की सही-सही पहचान करने में साक्षियों की विफलता ।
आरोपी के प्रति नस्ल, जाति आदि संबंधी पूर्वाग्रह ।
आरोपी के चरित्र, सामाजिक स्थिति, आदि के आधार पर कथित अपराध को आंकना ।
इत्यादि । – योगेन्द्र जोशी

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प्रधानमंत्रीः “इंडिया अमेरिका नहीं है”, बेशक! और सरकारः “आतंकवाद पर हम गंभीर हैं”, क्या वाकई?

इंडिया अमेरिका नहीं है

अपनी हालिया अफगानिस्तान यात्रा के दौरान देश के माननीय प्रधानमंत्री डा. मनमोहनजी ने आतंकवाद के संदर्भ में है कहा था कि इंडिया अमेरिका नहीं है (ऐसी ही खबर सुनने को मिली थी) । ये बात प्रधानमंत्री ने कुछ ऐसे लहजे में कहा जैसे कि अपने देशवासियों को यह गलतफहमी हो कि अब हम विश्व महाशक्ति बन चुके हैं और अमेरिका की बराबरी पर पहुंच चुके हैं । मुझे पूरा विश्वास है कि किसी को भी ऐसी गलतफहमी नहीं रही होगी, न अपने देशवासियों को न ही विदेशियों को । जो कोई भी अमेरिका के बारे में थोड़ा-बहुत जानता है वह भली भांति समझता है कि अपना ‘इंडिया दैट इज भारत’ अभी अमेरिका से कोसों दूर है । अमेरिका की बराबरी पर यह देश कभी आ भी सकेगा यह संदेहास्पद है । फिलहाल अभी आगामी 2-3 पीढ़ियों तक तो कोई उम्मीद नहीं है । हो सकता है कि 8-10 फीसदी की आर्थिक विकासदर की वजह से कुछ लोग गलतफहमी के शिकार हों ।

निःसंदेह प्रधानमंत्रीजी के उद्गार व्यापक संदर्भ में नहीं थे । दुनिया के तथाकथित सबसे बड़े आतंकी ओसामा को अमेरिका द्वारा मौत के घाट उतारे जाने पर पत्रकारों की जिज्ञासा पर उन्होंने यह बात कही थी । लोग शायद यह जानना चाहते थे कि क्या पाकिस्तान स्थित आतंकियों पर अपना देश भी कुछ वैसे ही कदम उठाने की सोच सकता है जैसे अमेरिका ने उठाए । उनका दो टूक उत्तर “इंडिया अमेरिका नहीं है” इस बात को स्पष्ट करता है कि हमारे पास अमेरिका की भांति संसाधन नहीं हैं । यह भी सच है कि अमेरिका मित्र देशों तथा समुद्र से घिरा है, जब यह देश शत्रु देशों अथवा उन देशों से घिरा है जिनकी मित्रता संदिग्ध है । लेकिन सबसे बड़ी बात जो प्रधानमंत्रीजी के मंतव्य में निहित रही है वह है कि हमारे पास अमेरिका की भांति दृढ़ इच्छाशक्ति तो है ही नहीं । हमारी सोच जब वैसी है ही नहीं तो किसी भी प्रकार की कार्यवाही का सवाल ही नहीं उठता । हम बंदरघुड़की दे सकते हैं, लेकिन उसके आगे कुछ नहीं कर सकते हैं ।

सरकार आतंकवाद पर गंभीर?

मैं आगे कुछ और कहूं इसके पहले इस बात का भी जिक्र कर दूं कि दो-चार दिन पहले सरकार का यह वक्तव्य सुनने को मिला थाः “आतंकवाद पर हम गंभीर हैं ।” क्या वाकई में? गंभीरता का मतलब क्या है? देश के मुखिया, डा. मनमोहन सिंह, सदा ही गंभीर नजर आते हैं । उनके मुख पर आम तौर पर न खुशी के भाव नजर आते हैं और न ही चिंता के । वे किसी भी अवसर पर बोलने से कतराते हैं; चुप्पी साधे रहना उनकी आदत है । गंभीरता के अर्थ क्या उनके इसी रवैये से है?  गंभीर बने रहो, न कुछ बोलो और न कुछ सुनो, न ही कुछ देखो । रोजमर्रा की जिंदगी में लोग ऐसे व्यक्ति को गंभीर कहते हैं, जो खुशी में न खिलखिलाकर हंस सके और न ही तकलीफ होने पर आह भर सके । देश तमाम तरह की घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन वे चुप बैठे रहते हैं । अधिक से अधिक मुझे खेद है का वक्तव्य दे दो, बस ।

लेकिन जब सरकार कहती है “आतंकवाद पर हम गंभीर हैं ।” तो अवश्य ही उसके अर्थ मात्र शाब्दिक नहीं होंगे । सरकार यह जताना चाहती होगी कि वह आतंकवाद को लेकर मात्र चिंतित ही नहीं है, बल्कि उससे निबटने के लिए कारगर कदम उठाने का संकल्प ले रही है । लेकिन कारगर उपाय क्या हो सकते हैं इस बात का कहीं कोई संकेत नहीं मिलते हैं । अभी तक का जो अनुभव रहा है उसके आधार पर यही कहा जा सकता है कि सरकार का दावा कोरे आश्वासन के अधिक कुछ नहीं हो सकता है । जो कुछ अभी तक होता आया है वही आगे भी होगा । आतंकियों को जहां मौका मिलेगा वे वारदात को अंजाम देंगे ही । वे पक्के इरादे लेकर चलते हैं । उनकी अपनी जान निकल भी जाए तो कोई बात नहीं, बस घटना को अंजाम देना है यह विचार उनके नियंताओं द्वारा उनकी सोच में गहरे बिठा दी जाती है । तब आप कर क्या सकते हैं?

शायद सरकार अपने खुफिया तंत्रों को अधिक सुदृढ़ करने का विचार कर रही है । ऐसा करने से कहां आतंकी घटना होने जा रही है इसकी पूर्व सूचना मिल जाएगी और घटना को रोका जा सकेगा । अवश्य ही ऐसा करना वांछित होगा, पर इतना क्या पर्याप्त होगा? क्या यह आवश्यक है कि किसी संभव वारदात की जानकारी सदैव जुटाई जा सके? क्या खुफिया विभागों में सुयोग्य लोग भरे पड़े हैं, और वह भी पर्याप्त संख्या में? जिस देश में सर्वत्र भ्रष्टाचार फैला हो वहां क्या साफ-सुथरे खुफिया तंत्र की उम्मीद की जानी चाहिए? उनकी ईमानदारी पर भरोसा भी कर लें तो भी क्या आम जनता से पर्याप्त सहयोग मिल सकता है? आम जनता तो रोजमर्रा की जिंदगी में भी लापरवाही से होने वाली दुर्घटनाओं को नहीं रोक पाती है; उससे भला कितनी उम्मीद करें? सरकारी रवैया यह है कि जब वारदात हो जाती है तो संबंधित सरकारी मुलाजिम हरकत में आ जाते है और सर्वत्र चेतावनी जारी कर दी जाती है, गोया कि अब किस क्षण, कहां पर अगली वारदात होने जा रही है यह पता चल गया हो । लेकिन दो-चार दिनों में ही सब ढीले पड़ जाते हैं, और तब तक आतंकी अगली वारदात के लिए तैयार हो जाते हैं । यही सिलसिला बदस्तूर चलता आ रहा है ।

आक्रामकता का अभाव

आतंकी वारदातों में मोबाइल फोनों की अहम भूमिका पायी गयी है । लेकिन सरकारी तंत्र की गंभीरता का अंदाजा इसी से लग जाता है कि हमारे यहां मोबाइल नंबरों का कोई सत्यापन नहीं होता है । कागजों में शायद बहुत कुछ हो रहा होगा, परंतु वास्तविकता में नहीं । नकली दस्तावेजों के आधार पर मोबाइल पा लेना बहुत मुश्किल काम नहीं है । आतंकियों के पास मोबाइल पहुंचते कैसे हैं? इतना ही नहीं, दुपहिया-चौपहिया वाहनों के मालिकों तक का पता पुलिस नहीं लगा पाती है । चंद्रमा में उतरने के ख्वाब देख रहे देश में आज भी यह व्यवस्था नहीं है कि एक क्लिक पर वाहन-स्वामी का नाम-पता-ठिकाना मालूम हो जाए, या उसके चोरी हो चुकने की जानकारी मिल जाए । क्या सरकार की गंभीरता में वांछित ‘डाटा-बेस’ की कोई अहमियत है? केवल कागजी योजनाएं बनाकर बैठ जाना बेमानी है ।

लगता है कि सरकार आतंकी वारदातों के संदर्भ में रोकथाम के तरीके ईजाद कर रही है । ऐसा करना ‘बचाव मार्ग या डिफेंसिव अप्रोच’ है, जो उपयोगी तो है, किंतु पर्याप्त नहीं । अमेरिका भी बचाव के सभी रास्ते अपना रहा है । लेकिन वह साथ में ‘आक्रामक या ऑफेंसिव’ तरीका भी अपनाते आ रहा है । जब भी उसे लगता है कि फलां-फलां खतरे बन सकते हैं तो वह उन्हें ठिकाने लगाने से भी पीछे नहीं रहता है । ओसामा के मामले में उसने बड़ी बारीकी से ऐसा किया और उसका काम तमाम कर दिया । अमेरिका ओसामा का नाम तो नहीं मिटा सकता, लेकिन उसकी कोई निशानी बचने न पाए इसकी पूरी कोशिश की । उसके शव समुद्र में कहां ठिकाने लगाया इसका पता तक नहीं ।

निश्चय ही इंडिया अमेरिका नहीं है । मुझे पूरा विश्वास है कि अमेरिका ने ओसामा को जिंदा न पकड़ने का प्रयास जानबूझ कर किया । ओसामा को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया, ताकि कानूनी लड़ाई का अवसर देकर कोई नयी आफत न मोल लेनी पड़े । ऐसे आतंकी के शव को ज्ञात स्थान पर दफनाना तक अमेरिका को गवारा नहीं था । आतंकियों को कड़ा संदेश देना अमेरिका जरूरी मानता है, भले ही आतंकियों पर उसका असर न पड़े । किंतु रियायत किसी भी हाल में नहीं ।

कड़ा संदेश नहीं

लेकिन ‘इंडिया’ ने आतंकियों को यह संदेश कभी नहीं दिया कि उनके साथ कड़ाई से पेश आया जाएगा । हम केवल उनकी सही-गलत लिस्ट बनाते हैं और पाकिस्तान को पेश करके इंतिजार करते हैं कि वे इस देश को सौंपे जाएंगे । कानूनी प्रक्रिया के समय और उसके बाद भी वे हमारे जेलों में मेहमान की तरह रखे जाएंगे । उनकी सुरक्षा पर लाखों-करोड़ों खर्च किया जाएंगे; उच्चतम न्यायालय फांसी की सजा सुना दे, फिर भी उन्हें फांसी नहीं दी जाएगी ।

क्या वजह है कि यह देश कसाब और अफजल को फांसी देने तक की हिम्मत नहीं कर पाता? जब कोई आतंकी घोषित हो चुका हो, उसे फांसी की सजा सुना दी जा चुकी हो, तो फिर उस पर कैसा रहम? यदि हम सजा का कार्यान्वयन नहीं कर सकते तो आतंकियों को क्या संदेश जाता है? उन्हें क्या हम यह बताना चाहते हैं कि हम तुम्हें क्षमा कर सकते हैं? आतंकवाद के प्रति यह किस गंभीरता का द्योतक है? वारदात को रोकना सही है, लेकिन घट चुकी वारदात के लिए जिम्मेदार लोगों को त्वरित सजा निहायत जरूरी है, यदि आप सच में गंभीर हैं तो । क्या यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि कल ऐसे आतंकियों को छुड़ाने के लिए अपहरण जैसी घटना घटे और देश को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़े?

सरकार के ऐसे नरम रवैये के पीछे मुझे एक कारण नजर आता है । आप उसे नहीं मानेंगे; शायद ही कोई मेरी ‘थ्यौरी’ पर भरोसा करेगा । मेरा सोचना कि भारत का हर राजनैतिक दल मुस्लिम समुदाय से डरा सहमा रहता है । अफजल-कसाब मुस्लिम समाज से आते हैं और प्रायः हर दल सोचता है कि इनको फांसी देने पर उक्त समुदाय दंगे-फसाद पर उतर आएगा । न भी दंगा करे तो भी चुनावों में वोट नहीं देगा । सत्ता पर टिके रहने के लिए उनकी अनुकंपा आवश्यक है, अतः उन्हें नाखुश नहीं किया जाना चाहिए । बेचारा मुस्लिम समुदाय वास्तव में क्या सोचता है यह कोई जानने की कोशिश नहीं करता । उन्हें अफजल-कसाब से कुछ लेना-देना नहीं होगा, किंतु हमारे सियासी दल आश्वस्त नहीं रहते हैं । अन्यथा उच्चतम न्यायालय फांसी की सजा सुनाए फिर भी वर्षों उस पर अमल न हो यह समझ से परे है, खासकर जब मामला आतंकी वारदात से जुड़ा  हो । क्या कोई आतंकी रहम के काबिल हो सकता है? हमारी सरकारें टालमटोल की नीति पर चलती है, त्वरित निर्णय लेकर जोखिम उठाने का माद्दा किसी भी दल में नहीं है ।

सरकार ऐसा कुछ भी करने में सफल नहीं है जिससे आतंकी संगठन भयभीत हो सकें । इसके विपरीत देश उनसे भयभीत है और बचाव के रास्ते खोजता रहता है । यही सब तो आतंकियों का मकसद है । वे सफल हैं! – योगेन्द्र जोशी

भोपाल त्रासदी, अर्जुन सिंह, और विदेशी मेहमान एंडर्सन

पहले पढ़िए यह खबर:
अर्जुन सिंह को गिरफ्तार करने की मांग (क्लिक करें)
(http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_6488322.html)
और फिर मेरे खयालात:

यह देश चमत्कारी पुरुषों का है, देवी-देवताओं का है, समर्थ जनों का है, जिन पर कोई नियम-कानून लागू नहीं होते हैं । आज से करीब 26 साल पहले मध्यप्रदेश राज्य के भोपाल नगरी में एक घटना घटी थी – घटना जिसे कुछ अज्ञानी दुर्घटना भी कहते हैं – जिसमें 15 हजार (या 25 हजार?) लोग काल के गाल में समा गये थे, और जिसके बाद सहस्रों जनों को रोगग्रस्त जीवन जीना पड़ा था । इसमें किसी की भी कोई गलती नहीं थीं । कर्मफलों में घोर आस्था वाले इस देश में यह तो उनकी नियति थी, उनके पूर्व जन्मों का फल था, जिसे उन्हें देर-सबेर भोगना ही था । संयोग से तब भोगने को मिला । और वे यमलोक सिधार भी गये तो क्या हुआ ? उनकी अहमियत देश के चमत्कारी देवता-तुल्य प्रबंधकों के लिए थी भी क्या ? वे उनके लिए कीड़े-कमौड़ों से कुछ अधिक माने रखते थे क्या ?

फिर भी कुछ उतावले अधिकारियों ने यूनियन कार्बइड के तब के मुख्य कार्याधिकारी (सी.ई.ओ.) वारेन एंडर्सन नाम के व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया । घोर अनर्थ ! इस देश के देवता-तुल्य एक पूज्य अतिथि को गिरफ्तार करने की हिम्मत की गयी ? कोई बात नहीं । भूल-सुधार का प्राविधान तो अपने यहां है ही । हर पाप से मुक्ति का मार्ग भी हमें मालूम है । तत्कालीन मुख्यमंत्री, श्रीसम्पन्न अर्जुन सिंह नाम के माननीय महापुरुष, ने पता नहीं किस देवता की प्रेरणा से सुधार का मार्ग खोजा और माननीय अतिथि को अपने प्रशासनिक गणों की सुरक्षा प्रदान करते हुए राज्य के पुष्पक विमान से दिल्ली भेज दिया । अतिथि देवता वहां से अपने लोक, वैकुण्ठ-तुल्य अमेरिका, पहुंच गये । स्मरण करें कि महाकाव्य महाभारत की एक कथा के अनुसार अपनी धनुर्विद्या का प्रदर्शन करते वक्त अर्जुन को केवल चिड़िया की आंख नजर आयी थी । उसी प्रकार आधुनिक अर्जुन को भी केवल अपना अतिथि नजर आया था, न कि सड़कों पर पड़ी हजारों लाशें ।

इस देश के वासियों के लिए एक विदेशी देवता के तुल्य होता है । और वह अगर अमेरिकी हो तो कहने ही क्या । और यदि देश के विकास में पूंजी लगाकर योगदान करने वाला हो तो फिर तो उसके सामने नतमस्तक हुए बिना कैसे रहा जा सकता है । आर्थिक प्रगति के लिए त्याग करना तो हमारा परम कर्तव्य है । उसके लिए हजारों जानें चली भी जाएं तो क्या हर्ज । जिस देश की सबसे सस्ती चीज जनसंख्या हो वहां कुछ हजार की मौत कोई माने रखती है क्या ? एक बात और कह दूं । देवताओं को अधिकार है कि वे मनुष्य के प्रति जैसा चाहें वैसा व्यवहार करें । वे नियमों से ऊपर होते हैं । तुमने ऐसा क्यों किया यह सवाल नहीं पूछा जा सकता । जरा इस बात पर गौर कि शनि देवता जब चाहें जहां चाहें किसी पर भी अकारण नाराज हो जाते हैं । आपने कोई अनुचित कार्य न किया हो तो भी उनकी कुदृष्टि आपका चैन छीन सकती है । आप हजार अपराध कर लें कोई बात नहीं, बस उन्हें खुश रखकर अनुकंपा प्राप्त कर लें । देवताओं से यह नहीं पूछा जाता कि आप मुझे किस बात की सजा दे रहे हैं । आप चुपचाप सह लीजिए, लेकिन शिकायत मत करिए । और धरती पर विचरने वाले हमारे आधुनिक देवताओं पर भी यही बात लागू होती है । मत कहिए कि भोपाल-घटना के लिए कोई दोषी था । मत कहिए कि पूज्य एंडर्सन को छोड़ने वाले ने अपराध किया ।

लेकिन फिर भी कुछ जन यह सब कहने पर अड़े हैं । जानते हैं कि कब्र में जिनका एक पैर लटक रहा हो वैसे अर्जुन सिंह और एंडर्सन का आप कुछ नहीं बिगाड़ सकेंगे । विधाता ने उन्हें अमृतत्व से नहीं नवाजा है, और आपकी अदालत कुछ कर सके इसके पहले ही यमराज उन्हें अपने पास बुला लेंगे । नाटक के शेष भाग के मंचन को देखते रहिए! – योगेन्द्र जोशी

अमेरिकी नागरिक अल-औलकी की राष्ट्रविरोधी गतिविधि और सी.आइ.ए. की ‘किल लिस्ट’ – एक विचारणीय मुद्दा

न्यू यॉर्क टाइम्स समाचारपत्र में छपी एक खबर के अनुसार अमेरिका में एक बहस छिड़ी है कि अगर कोई नागरिक अपने ही देश के विरुद्ध युद्ध छेड़ दे तो क्या उसे वैसे ही मौत के घाट उतार दिया जाना चाहिए जैसे आप सीमा पर लड़ने आए शत्रु देश के सैनिक को गोली से उड़ा देते हैं । इस बहस का संबंध अमेरिकी नागरिक अनवर अल-औलकी (Anwar al-Awlaki) से है, जिसको किसी कानूनी प्रक्रिया अपनाए बिना मौत के घाट उतारने का अधिकार अमेरिकी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा समिति (National Security Council) की सलाह पर सुविख्यात जांच एजेंसी सी.आई.ए. (C.I.A.) को दिया है । मौका मिलते ही जिन्हें मौत दे दी जाए ऐसे लोगों की एक लिस्ट ‘किल लिस्ट’ (Kill List) के नाम से सी.आई.ए. के पास रहती है ।

कौन है यह अल-औलकी ? अनवर अल-औलकी न्यू मेक्सिको में सन् 1971 में जन्मा एक अमेरिकी नागरिक है, जिसने इंजिनियरिंग की औपचारिक शिक्षा के साथ इस्लाम धर्म का ज्ञान अर्जित करके कैलिफोर्निया एवं वर्जीनिया राज्यों में इस्लामी धर्मगुरु (मौलवी) का कार्य किया । अंग्रेजी तथा अरबी भाषाओं पर समान अधिकार रखने वाले अल-औलकी के धार्मिक भाषण प्रभावोत्पादक बताए जाते हैं । अमेरिकी मुस्लिम घरों में उसके भाषणों की सीडी लोकप्रिय रही हैं । कहा जाता है कि किसी समय वह हंसमुख, मिलनसार और धार्मिक मामलों को लेकर उदार दृष्टिकोण रखते वाला इंसान था । न्यू यॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर की सन् 2001 की घटना पर उसने तब एक धार्मिक प्रवचन में यह प्रतिक्रिया व्यक्त की थी:
“हम यहां निर्माण के लिए आये हैं, न कि विध्वंश करने । हम अमेरिका और विश्व के एक अरब इस्लामधर्मी लोगों को जोड़ने वाले पुल के माफिक काम करने आये हैं ।”

उस समय वह इस बात का हिमायती था कि अमेरिकी मुस्लिम समुदाय को चाहिए कि वह विश्व मुस्लिम समाज को अमेरिका के प्रति सहयोगात्मक एवं सकारात्मक रवैया अपनाने के लिए प्रेरित करे; उन्हें अमेरिका में रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए; इत्यादि इत्यादि । लेकिन विगत करीब 9 वर्षों में ही उसकी विचारधारा उलट गयी और वह अब अमेरिका के विनाश के लिए समर्पित एक आतंकी बन चुका है । अतिवादी वेब साइटों पर कथित तौर पर प्रकाशित उसके वर्तमान् विचार कुछ यों हैं:
“समूचा अमेरिका एक दुष्ट राष्ट्र बन चुका है । अब मैं इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका हूं कि मेरे लिए अमेरिका के विरुद्ध जिहाद छेड़ना निहायत ज्रूरी है, ठीक वैसे ही जैसे हर सक्षम मुस्लिम का यह कर्तव्य है ।”

कहा जाता है अल-औलकी के अतिवाद के पीछे अमेरिका की वह नीति है जिसके तहत उसने इराक तथा अफगानिस्तान के मुस्लिमों पर खुलेआम हमला किया । पाकिस्तान तथा यमन के मुसलमानों को भी उसने छिपे तौर पर ‘परेशान’ किया हुआ है ।

अल-औलकी पर तब से नजर रखी जा रही थी जब से सेना के मनःचिकित्सक मेजर निडाल मलिक हसन से उसके संबंध प्रकाश में आये । हसन पर नवंबर 2009 में 13 लोगों की जान लेने का आरोप है । तदनंतर उसके संबंध उमर फारूक अब्दुल-मुतल्लब से भी पाये गये, जिस पर विगत दिसंबर में डेट्रॉयट के लिए तैयार एक हवाई जहाज को उड़ानें की साजिश का आरोप है । अभी हाल में टाइम्स स्क्वायर (Times Square) को विस्फोटकों से उड़ाने के प्रयास में फैजल शहजाद नामक पाकिस्तानी मूल का अमेरिकी पकड़ा गया था; उसने भी स्वीकारा है कि अल-औलकी के उग्रवादी विचारों से प्रेरित होकर ही उसने जिहाद की दिशा में कदम बढ़ाये हैं ।

संप्रति अल-औलकी अरब मुल्क यमन में रह रहा है । आतंकवाद के खात्मे में प्रयत्नशील अधिकारियों को कहना है कि वह अरब देशों में अल कायदा की ओर से सक्रिय है । वह अमेरिका के तथा विदेशों में रह रहे उसके नागरिकों के विरुद्ध आतंकियों का जाल बिछाने में लगा हुआ है । उसका व्यक्तिव्य वाकई करिश्माई है । वह इंटरनेट के माध्यम से विश्व के अनेकों युवाओं को आतंकी गतिविधियों की ओर खींच रहा है ।

ओबामा शासन ने सी.आई.ए. को उसे मार गिराने की छूट देकर यह स्पष्ट कर दिया है कि आम नागरिकों को उपलब्ध अमेरिकी कानूनों की मदद लेने का अल-औलकी को कोई अधिकार नहीं रह गया है । यानी वह किसी अदालत का दरवाजा नहीं खटखटा सकता है । अधिकारी कहते है कि जो व्यक्ति कहे, “… it is a religious duty to attack the United States, … ” (… अमेरिका पर हमला करना धार्मिक कर्तव्य है, …) और जो हिंसा फैलाने में लगा हुआ हो उसके न्यायिक राहत कैसे दी जा सकती है ? वे कहते हैं “American citizenship doesn’t give you carte blanche to wage war against your own country,… If you cast your lot with its enemies, you may well share their fate.” (अमेरिकी नागरिकता आपको अपने ही देश विरुद्ध युद्ध छेड़ने की खुली छूट नहीं देती है ।… अगर आप शत्रुओं से जा मिलते हैं तो आपको उनके जैसे ही फल भुगतने होंगे ।)

अल-ऑलकी के मामले ने बहस छेड दी है कि एक नागरिक के क्या अधिकार होने चाहिए और उसे सजा देने से पहले अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए या नहीं ? मुद्दा गंभीर है और हर देश के लिए प्रासंगिक है । कुछ लोगों का मत है कि यमन सरकार के समक्ष अल-औलकी को पकड़ने और उसे अमेरिका के सुपुर्द करने का आग्रह किया जाना चाहिए और उस पर एक दुश्मन की भांति मुकदमा चलाकर कठोर दंड दिया जाना चाहिए । आखिर स्थापित कानूनों का सम्मान तो होना ही चाहिए । मामला घूम-फिरकर मानवाधिकार (Human Rights) से भी जुड़्ता है । कई स्वयंसेवी अमेरिका समेत तमाम सरकारों पर मानवाधिकार हनन के आरोप लगाती आ रही हैं ।

लेकिन अधिकारी कहते हैं कि यह सब इतना सरल नहीं है । पता नहीं ऐसे लोगों को पकड़ने और केस चलाने में कितना समय लगे । न्यायिक प्रक्रिया के नाम पर उन्हें जिंदा रहने का अवसर मिला तो वे अपने उद्येश्य में सफल हो सकते हैं । अगर हम चाहते हैं कि विश्व के विभिन्न कोनों में छिपे आतंकी दुश्मनों का यथाशीघ्र सफाया हो तो उन्हें ‘किल लिस्ट’ में रखना ही होगा । अन्यथा बारबार की आतंकी वारदातों को भुगतने के लिए तैयार रहना होगा । परंतु कई नागरिक उक्त मत से असहमत हैं । वे कहते हैं कि इस प्रकार का ‘न्याय’ आतंकवाद की उग्रता को बढ़ाएगा ही ।

दरअसल हर किसी देश में कानूनी काररवाही धीमी गति से चलने वाली प्रक्रिया होती है । चूंकि मामले के प्रति न्यायालयों का दृष्टिकोण वही नहीं रहता है जो शासन का, इसलिए अक्सर आरोपी को वह दंड नहीं मिलता है जिसे शासन सही समझकर चलता है । आतंकी घटनाओं के आरोपियों में आनन-फानन में काररवाही हो और कठोरतम दंड दिया जाय कम से कम अमेरिकी शासन तो यही चाहता है । और परंपरागत न्यायिक विधि से यह उम्मींद नहीं की जा सकती है । ऐसे में सी.आई.ए. को विशेष अधिकार देकर अमेरिकी सरकार एक संदेश आतंकवादियों को देना चाहती है । और यह काम वह चोरीछिपे नहीं बल्कि खुलकर करती है ।

हमारे देश में भी जनभावना आतंकवादियों के साथ सख्ती बरतने के पक्ष में रहती है । किंतु ऐसा प्रतीत होता है कि हमारी सरकारें और न्यायालय जरूरत से अधिक उदार रवैया अपनाती हैं । यहां भी जब कभी प्रशासन कानूनी तरीके से बचना चाहता है और आरोपी को रास्ते से हटाना चाहता है तो वह भी अपना तरीका ईजाद करता है । यह रास्ता है ‘एन्काउन्टर’ का । “आरोपी तो हमला करके भाग रहा था … ” का सीधा सा वक्तव्य देकर उसको मार डालने के एकमात्र विकल्प का दावा करते हैं । वे खुलकर यह नहीं कहते कि “आरोपी को छोड़ना घातक होता, अतः उसे गोली मार दी ।”

जो काम अमेरिका में खुले सरकारी आदेश के माध्यम से किया जाता वही हमारे यहां चोरीछिपे तरीके से होता है और इस तरीके का ‘नाजायज’ प्रयोग खूब होता है । भारतीय संदर्भ में यह विचारणीय प्रश्न है कि अमेरिकी में सी.आई.ए. को दिए जाने वाले अधिकार के सदृश यहां भी क्या कुछ होना चाहिए ? या अमेरिका में जो किया जा रहा है वह वास्तव में नितांत आलोच्य, निन्द्य, तथा त्याज्य विचार है ? – योगेन्द्र जोशी

26/11 की घटना के आरोपी कसाब को फांसी की सजा; …लेकिन फांसी दी भी जाएगी क्या !

और (आज की ताजा खबर) अंततः अजमल कसाब को न्यायालय ने फांसी की सजा सुना ही दी ।

26/11 की आतंकी घटना

मुंबई में हुई 26 नवंबर 2008 की आतंकी घटना में 166 लोग मारे गए थे । पाकिस्तान में सक्रिय ‘लश्कर-ए-तैय्यबा’ से प्रशिक्षित 10 आतंकियों ने घटना को अंजाम दिया था, जिनमें से 9 तो मारे गए थे । उनमें से अजमल कसाब अकेला था, जिसे जिंदा पकड़ लिया गया था । और तब चल पड़ा उस पर त्वरित गति से अदालती मामला, निरपराध लोगों की नृशंस हत्या एवं भारत राष्ट्र के विरुद्ध ‘हमले’ के नाम पर ।
पिछले तीन-चार दिनों से समाचार माध्यमों पर उसके मामले की चर्चा छाई रही । लोग उत्सुक तथा चिंतित थे कि उसे सजा-ए-मौत मिलती है कि नहीं । माना जाता है कि सरकारी वकील, उज्ज्वल निकम, ने सजा दिलाने में अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी । जिन लोगों को टेलीविजन चैनलों ने इस मामले में अपनी राय व्यक्त करने का अवसर दिया, उनमें से प्रायः सभी ने उसके लिए किसी प्रकार की रियायत न देने की बात की । सभी अधीर थे और मौत की सजा तो सभी चाहते थे । टीवी पर कुछ लोगों को तो मैंने यह मांग करते हुए भी सुना कि उसे तिल-तिल कर मरने की सजा देनी चाहिए । खैर, ऐसी सजा का विधान तो अपनी न्यायिक व्यवस्था में शायद नहीं है । न्यायाधीश एम.मल. तहलियानी ने तो उसे तीन दिन पहले ही दोषी घोषित कर दिया था; उसे बस आज सजा सुना दी । उसे कुल 86 आरोपों के संदर्भ में सजा दी गयी, पांच मामलों में मौत की, तो शेष में उम्रकैद अथवा कुछ सालों की सजा ।
कसाब का मामला कई मामलों में रोचक और कुछ माने में नए किस्म का था । कसाब को अदालती लड़ाई लड़ने के लिए पूरी मदद की । उसको सरकारी खर्चे पर वकील दिये गये । पहले सुश्री अंजलि वाघमारे । किंचित् तकनीकी कारणों से उन्हें दायित्व से हटाया गया । उनके स्थान पर श्री अब्बास काजमी कसाब के वकील नियुक्त हुए । उन्हें भी कालांतर में दायित्वमुक्त होना पड़ा । और फिर उनके स्थान पर आए श्री के.पी. पवार, जो अपनी जिरह से कसाब को बचा नहीं पाए ।

खर्चीला कैदी कसाब

सुनते हैं कि कसाब की सुरक्षा को लेकर उस पर कोई 30-32 करोड़ रुपये (आठ-साड़े-आठ लाख रुपये प्रतिदिन) खर्च हो चुके हैं । उसके लिए पुणें की आर्थर रोड जेल एवं जे जे अस्पताल में विशेष ‘बुलेट-प्रूफ’ कोठरियां तक बनवाई गईं । कसाब के द्वारा किए गए अपराध से देश को जो नुकसान होना था वह तो हुआ ही, उसके अतिरिक्त वह बाद में भी एक ‘खर्चीला’ कैदी साबित हुआ है । (यहां क्लिक करें)

फांसी का इंतजार

कसाब को मौत की सजा सुना दी गयी है । यह सजा अधिसंख्य देशवासियों को भावनात्मक स्तर पर तसल्ली अवश्य देगी । लेकिन कुछ वकीलों के मतानुसार अपराधियों के मन में मौत की सजा ताउम्र कैद की सजा से अधिक भय पैदा करता हो ऐसा शायद होता नहीं है । उससे भी अधिक महत्त्व की बात तो यह है कि यह सजा कसाब को फिलहाल नहीं मिलने वाली है । लोग चाहते हैं कि सजा का कार्यान्वयन तुरंत हो, परंतु आवश्यक कानूनी प्रक्रिया तो अपना वक्त लेगी ही, क्योंकि भारतीय ‘उदार’ कानूनी व्यवस्था उसे प्रथमतः मुंबई उच्च न्यायालय और फिर देश के उच्चतम न्यायालय में मौजूदा निर्णय के विरुद्ध अपील का अवसर देगी । इतना ही नहीं, अंत में वह राष्ट्रपति से ‘क्षमादान’ की प्रार्थना भी कर सकता है (आइबीएन समाचार)। इतने सब में कितने वर्ष गुजरेंगे कोई ठीक से बता नहीं सकता ।
कसाब के मामले पर टीवी चैनलों पर चल रही बहस से मुझे यही लगा कि देशवासी अपनी केंद्र सरकार के रवैये से नाखुश और निराश है । मौत की सजा पाये लोगों की सजा पर अंतिम मुहर लगाने के कई मामले सरकार के पास पड़े हैं (बीबीसी समाचार) । देश में ऐसी सजा अंतिम वार 2004 में दी गयी थी, धनंजय चटर्जी नामक व्यक्ति को ।
लोगों के बीच एक गंभीर धारणा बनी हुई है कि अपनी सरकारें इस मामले में ढुलमुल और टालू नीति अपनाती आ रही हैं । वे मामलों को फटाफट निबटाने से बचती आ रही है, और उन मामलों में भी टालमटोल कर रही हैं जो राष्ट्र पर ही हमला से संबंधित हों । इसी कारण कसाब के मामले में भी लोग सरकारी रवैये के प्रति सशंकित हैं ।
नैशनल कॉंफडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइजेशन्स’ की वेब-साइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार मौत की सजा पाये 44 कैदियों में से 23 के ‘दया-याचिकाएं’ पत्र विचाराधीन हैं । इनमें से 22 को विचार करके राष्ट्रपति के पास भेजा जा चुका है, एक पर सक्रिय कार्य मंत्रालय में हो रहा है । अब विलंब किस बात पर हो रहा है यह स्पष्ट नहीं है ।
कई लोगों के मत में मौत की सजा का प्रावधान ही गलत है । कुछ लोग इसे सभ्य समाज के अनुकूल नहीं मानते हैं । उनके अनुसार यह सजा व्यक्ति को सुधरने का मौका नहीं देता है । यह भी कहा जाता है कि किसी आदमी की जान लेने का अधिकार किसी और को कैसे हो सकता है । ठीक है, लेकिन तर्क तो यह भी दिया जा सकता है कि किसी को सींखचों के पीछे बंद करने का भी तो अधिकार किसी और को क्यों हो । किंतु एक सवाल यह भी उठता है कि सामाजिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए सजा तो होनी ही चाहिए । क्या सजा हो, कितनी हो, और कौन सजा दे, जैसे सवालों पर बहस की ही जा सकती है । अगर मृत्युदंड ठीक नहीं तो उसे समाप्त कर देना चाहिए । किंतु अपनी सरकारें उस दिशा में भी तो कदम नहीं उठा रही हैं ।

बहरहाल देशवासियों की चिंता सकारण है । न जाने कसाब की सुरक्षा पर अभी देश को कितने करोड़ रुपये खर्च करने पड़ेंगे । चिंता तो यह भी जताई जाती है कि कहीं कसाब के आका उसको छुड़ाने के लिए किसी हवाई जहाज का अपहरण न कर बैठें । चिंता इस बात पर भी व्यक्त की जाती है कि उसे सजा न दे पाना इस देश के कमजोर होने का संदेश विश्व को देता है । आतंकवाद जैसे मुद्दे पर सरकार को कठोर दिखना चाहिए, किंतु ऐसा होता हुआ लगता नहीं । यह इस देश की विफल राजनीति को द्योतक है ।  – योगेन्द्र जोशी