गांधी जयन्ती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस – क्या है अहिंसा?

गांधी जयंती

आज गांधी जयंती है, दो अक्टूबर। गांधी-जन्म के १५० वर्ष पूरे हुए। मैं इस समय गेन्ज़विल (फ़्लोरिडा, अमेरिका) में हूं, कुछ हफ़्तों के प्रवास पर। भारत के राष्ट्रीय समय से यहां की घड़ी ९:३० घंटे विलंबित रहती हैं। यहां इस समय २ अक्टूबर का दिन है और तदनुसार अपने देश में रात्रि है।

जैसा कि परंपरा है गांधीजी के गुणगान करने और उनके विचारों की महत्ता का बखान करने का दिन रहता है यह। देश की खबरें जानने को इंटर्नेट के माध्यम से समाचार पत्रों पर नजर दौड़ाने पर मुझे गांधीजी के विचारों को प्रस्तुत करने, उन्हें प्रसारित करने वाली विज्ञप्तियां दिखती हैं। देश में राजनेताओं, सामाजिक संगठनों, एवं अन्य लोगों ने कैसे यह दिन गांधीजी को समर्पित किया होगा यह तो मुझे कल के समाचारपत्रों से ही पता चलेगा। हमें उनके सुझाए मार्ग पर चलना चाहिए आदि कहकर रस्मादयगी की परंपरा सदैव की भांति निभाई ही गई होगी। जैसा होता आया है विचार व्यक्त करने वाले और सुनने वाले दोनों ही फिर अपने रोजमर्रा की चर्या में लौट जाते हैं। जिसे जैसे जीना है वह इस दिवस के बाद भी अपनी-अपनी सुविधानुसार वैसे ही जीता है, कहीं कोई फर्क पड़ता है ऐसा मुझे नहीं लगता है।

गांधी जी का अहिंसावाद

जिस बात को लेकर गांधीजी की सर्वाधिक चर्चा होती रही है वह है उनका अहिंसावाद। उनके इसी अहिंसावाद को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस विशेष दिन (२ अक्टूबर) को “अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस” घोषित किया था। दुनिया के लिए गांधी का महत्व इसी अहिंसा के विचार तक सीमित है ऐसा मुझे लगता है। इसके आगे भी गांधी की प्रासंगिकता है यह पूरे विश्व के लिए शायद माने नहीं रखता है। किंतु भारत के लिए उनके अन्य विचार अधिक माने रखते हैं जिनकी सार्थकता पर विवाद नहीं हो सकता है। अहिंसा का विचार अच्छा तो है किंतु व्यावहारिक नहीं है ऐसा मैं सोचता हूं। क्यों? इसे स्पष्ट करना मेरे इस आलेख का विषय है। उस विषय पर आऊं इससे पहले उन कुछएक बातों की चर्चा करना समीचीन होगा जो गांधी जी के विचारों में शामिल रहे हैं।

क्या कहते थे गांधी जी?

(१)   वे कहते थे सामाजिक भेदभाव नहीं होना चाहिए जिसका एक पहलू छुआछूत की परंपरा के रूप में समाज में सदियों से रहा है और आज भी कुछ अंश तक बचा है।

(२)   मनुष्य को अपने निजी कार्य यथासंभव खुद ही करना चाहिए, जैसे अपने लत्ते-कपड़े धोना, शौचालय-स्नानगृह साफ रखना आदि। 

(३)   हमें अपने शारीरिक श्रम का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए, जैसे छोटी-मोटी दूरी के लिए पैदल चलना या साइकिल का प्रयोग करना।

(४)   हमें अपने परिवेश को स्वच्छ रखना चाहिए। गांधीजी के इसी विचार से प्रेरित होकर देश में (मात्र आंशिक रूप से सफल) ’स्वच्छ भारत अभियान’ चल रहा है।

(५)   गांधीजी सादे जीवन के पक्षधर थे। मितव्ययिता अमल में लाना और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से बचना उनके विचारों में निहित रहे हैं।

(६)   गांधीजी इस बात के प्रबल पक्षधर थे कि समाज में आर्थिक विषमता एक सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए। अर्थात् अतिसंपन्न लोग अपनी संपदा से विपन्न लोगों की सहायता करें। इस विचार में परोपकारिता की भावना निहित है।

(७)   गांधीजी देश को कृषिप्रधान मानते थे और गांवों के उत्थान के हिमायती रहे। छोटे-मोटे उद्योगों विशेषतः घरेलों उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करते थे।

(८)   कहा जाता है कि गांधीजी अहिंसावादी के साथ सत्यवादी एवं निष्ठावादी भी थे। अर्थात् अपने जिम्मे के कार्य के प्रति दुराव-छिपाव से मुक्त समर्पण भाव लोगों में होना चाहिए।

(9)    गांधीजी भारतीय भाषाओं को अधिकाधिक प्रयोग में लेने एवं अंग्रेजी पर निर्भरता को कम से कम करने के प्रबल पक्षधर थे।

इस प्रकार की अन्य बातें भी उनके विचारों में रही होंगी। गांधीजी को लेकर मेरे ध्यान में जो आया उसका उल्लेख मैंने किया है।

उनके देहावसान को आज ७२ वर्ष बीतने को हैं। उनकी प्रशंसा तो प्रायः सभी करते रहते हैं किंतु सवाल उठता है कि उनके विचारों को अमल में लाने का प्रयास कितने लोग करते हैं? उदाहरण के तौर पर देशज भाषाओं को लीजिए। जिस अंग्रेजी से देश को मुक्तप्राय करने की बात वे करते हैं वह अब देश पर पूरी तरह हावी हो चुकी है। गांधीजी का गुणगान करना एक बात है, उनके विचार स्वीकारना नितांत अलग बात।

मैं गांधीजी के सतही एवं अगंभीर गुणगान का विरोधी हूं। व्यक्तिगत तौर पर मैं यह मानता हूं कि उनके विचार आदर्शों से प्रेरित थे, जिनको व्यावहारिक जीवन में उतारना इस विविधताओं से भरे वास्तविक संसार में संभव नहीं। अगर कुछ हो सकता है तो वह यह कि जब तक गंभीर परेशानी पैदा न हो इन बातों पर टिकने का प्रयास किया जा सकता है।

अस्तु, मैं गांधीजी के अहिंसावाद पर लौटता हूं।

क्या है अहिंसा

अहिंसा की परिभाषा क्या है? प्राचीन भारतीय चिंतक अहिंसा के प्रति व्यापक दृष्टिकोण रखते थे। उनके अनुसार अहिंसा के निहितार्थ आधुनिक पाश्चात्य नॉन-वायलेंस (non-violence) से कहीं अधिक व्यापक रहे हैं। मेरी दृष्टि में इस विषय पर दो बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए:

[१]     भारतीय चिंतन में अहिंसा मनसा-वाचा-कर्मणा तीनों प्रकार का माना गया है। कर्मणा अहिंसा का अर्थ है शारीरिक या भौतिक रूप से किसी को कष्ट न पहुंचाना। विश्व के प्रायः सभी समाजों में अहिंसा की “नॉन-वायलेंस  के तुल्य” यही परिभाषा प्रचलन में है। वाचा एवं मनसा हिंसा की बात शायद ही कहीं कोई करता हो। वाचा का अर्थ है बोले गये शब्दों से किसी को दुःख पहुंचाना। इस हिंसा को हम देख-सुन सकते हैं। मनसा का अर्थ है किसी के अहित का विचार मन में लाना। दूसरा कोई इसे नहीं जान सकता है। प्राचीन चिंतक किसी के प्रति अहितकर या अनिष्ट विचारों को मन में लाना भी हिंसा मानते थे, यानी पूर्णतः कल्याणकारी विचारों को ही मन में स्थान देना व्यक्ति का कर्तव्य है।

[२]     प्राचीन मान्यता में अहिंसा की अवधारणा बहुत व्यापक है और मानव समाज से आगे अन्य प्राणियों तक फैली है। जैन मुनियों के लिए यह बात बहुत माने रखती है। बौद्धमतावलंबी और वैष्ण्वों के लिए भी अहिंसा की ऐसी अवधारणा महत्व रखती है। “अहिंसा” परमो धर्म:” कथन का उल्लेख महाकाव्य महाभारत में यत्रतत्र मिलता है। इस बारे में मैने दो आलेख अपने ब्लॉग में लिखे हैं। (देखें आलेख दिनांक 2017-07-07 एवं दिनांक 2017-07-28)

जिस महाभारत में अहिंसा की वकालत की गई है उसी में तमाम कथाएं भी हैं जिनमें हिंसा का बोलबाला है और स्वयं महाभारत की घटना हिंसक युद्ध का लेखाजोखा है। ऐसा विरोधाभास क्यों है? प्रचीन संस्कृत ग्रंथों में हिंसा की व्यापकता की कथाएं बहुतायत से मिलती हैं। इस विरोधाभास की व्याख्या वस्तुतः कठिन नहीं है।

दरअसल भारतीय धार्मिक मतों के दो स्पष्ट पहलू रहे हैं:

(१)     एक है आध्यात्मिक जिसके अनुसार मनुष्य को जीवन-मरण से मुक्त होने का प्रयास उसका कर्तव्य है और उसके लिए व्यक्ति को ऐहिक सुखों-हितों का मोह त्यागकर खुद को सत्य, अहिंसा, प्रेम, आदि के सन्मार्ग पर ले जाना होता है जिससे वह अंततः निर्वाण (बौद्धमत), मुक्त जीवात्मा (जैन मत) अथवा मोक्ष (वैदिक मत) की परम अवस्था को पा सके। अहिंसा उसी संदर्भ में सार्थक है।

(२)     दूसरा है ऐहिक सामाजिक जीवन से संबंधित जो आदर्शों की दिशा में बढ़ तो सकता है किंतु आदर्शों पर चल नहीं सकता। यह वह क्षेत्र है जिसमें अहिंसा की प्रवृत्ति सभी मनुष्यों में नहीं होती है। असल में सत्य-असत्य, प्रेम-द्वेष, हिंसा-अहिंसा, परोपकार-अपकार आदि परस्पर विपरीत प्रवृत्तियां इस संसार में एक साथ अस्तित्व में रहते हैं।

अहिंसा की व्यावहारिकता

मेरा प्रश्न है क्या गांधीजी ने उपर्युक्त तथ्यों पर मनन करने के बाद अहिंसा की बात की थी? मेरे मत में वे इस तथ्य की अनदेखी करते थे कि उनके अहिंसा के सिद्धांत को सभी आत्मसात नहीं कर सकते हैं। अवश्य ही अहिंसा समाज के लिए वांछित है, किंतु हिंसा से समाज मुक्त नहीं हो सकता। हिंसा केवल आत्मरक्षा के लिए ही नहीं बल्कि समाज को सुव्यवस्थित रखने के लिए, आपराधिक प्रवृत्ति के जनों को नियंत्रित रखने के लिए, भी आवश्यक है। इस बात को गांधीजी समझते थे क्या?

मनुस्मृति में अधोलिखित उक्तियां पढ़ने को मिलती हैं:

“सर्वो दण्डजितो लोको …”,

“उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति …”

“दण्डात् प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते …”

(मनुस्मृति, अध्याय ७, श्लोक २२, २७, २८, क्रमशः)

इन कथनों में यह संदेश दिया गया है कि यह जगत् (मानव समाज) दंड द्वारा ही नियंत्रण में रह पाता है। क्या दंडित करने की व्यवस्था हिंसात्मक नहीं है? अवश्य ही शासन दंडित करने का कार्य अपने हाथ में रखता है न कि उसका अधिकार किसी अन्य देता है। किंतु किसी को जैसे भी दंडित किया जाए उसे कहा तो हिंसा ही जाएगा !

यह भी कहा जाता है कि गांधीजी एक प्रकार से जिद्दी थे। वे दूसरों की कम सुनते थे बल्कि “मेरी बात सही है” यह धारणा उनसे मनवाते थे। उनके अहिंसावाद पर लोग जब तक टिप्पण्णी करते वे महात्मा मान लिए गए थे। तब उनका खुलकर विरोध करने का साहस कम ही लोग जुटा पाए। और जो असहमति व्यक्त करते थे उनकी कोई सुनता नहीं था।

एक धारणा यह भी लोगों के मन में बैठ गई थी कि देश की आज़ादी गांधीजी के अहिंसक आंदोलन का फल था। मैं इस धारणा को स्वीकार नहीं करता। मेरे मत में उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण ऐसे हालात बन चुके थे कि ब्रितानी हुकूमत को अपना वैश्विक साम्राज्य संभालना मुश्किल हो गया था। उसके अधीनस्थ लगभग सभी देश एक-एक कर स्वतंत्र होते चले गये।

इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि गांधीजी पहले व्यक्ति नहीं थे जिन्होंने अहिंसा की बातें की हों। महात्मा बुद्ध, तीर्थंकर महावीर एवं यीशु मसीह सुविख्यात हैं जिन्होंने अहिंसा का उपदेश दिया। किंतु उनके स्वयं के अनुयायी तक सदैव अहिंसक नहीं रह सके। स्पष्ट है कि अहिंसा वांछित है लेकिन सुलभ नहीं है। हिंसा समाज में सदा से रही है और आगे भी रहेगी।

भारतीय समाज व्यक्ति-पूजक है। यदि कोई असामान्य तौर पर प्रतिष्ठित हो जाए तो जन समुदाय उसमें दोष देखना बंद कर देता है। गांधीजी उसी स्तर पर पहुंचा दिए गये थे। – योगेन्द्र जोशी

“मेरा भारत महान्” – तथाकथित संत-महात्माओं के लिए उपजाऊ भूक्षेत्र

२५ अप्रैल २०१८. जोधपुर की एक निचली अदालत ने स्वघोषित “संत” आसाराम को उम्रकैद की सजा सुना दी।

आसाराम के हजारों अनुयायियों के लिए यह समाचार बेहद तकलीफदेह एवं अविश्वसनीय रहा है। उन्होंने आसाराम को दोषी मानने से ही इंकार कर दिया।

मेरा मन इस विषय पर बहुत कुछ कहने को हो रहा है। लेकिन बहुत कुछ नहीं लिख सकता। मन में आने वाले विचार स्वतःस्फूर्त एवं तीव्रगति के होते हैं, किंतु उन्हें शब्दों में बांधकर दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करना एक धीमी प्रक्रिया होती है खासकर मुझ जैसे अकुशल लेखक के लिए।

अपने इस आलेख का आरंभ में महाभारत में वर्णित एक प्रकरण से करता हूं: उक्त ग्रंथ के शान्तिपर्व में कौरव-पांडव युद्ध की समाप्ति के बाद की स्थितियों का वर्णन है। युद्ध के दुःखद परिणामों से विचलित होकर राजा युधिष्ठिर राजकाज छोड़कर संन्यास ग्रहण करने का विचार अपने भाइयों के समक्ष रखते हैं । द्रौपदी समेत सभी भाई उन्हें सलाह देते हैं कि उन्हें जनता के हित में राजकाज चलाना चाहिए। वार्तालाप के सिलसिले में अर्जुन गेरुआवस्त्रधारी तथाकथित साधुओं की कटु आलोचना भी कर डालते हैं । वे कहते हैं कि ऐसे कई लोग ढोंगी होते हैं और आम जन को मूर्ख बनाकर अपनी जीविका चलाते हैं । तत्संबंधित दो कथन आगे प्रस्तुत हैं:

परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः ।

सिता बहुविधैः पाशैः सञ्चिन्वन्तो वृथामिषम् ॥32

(महाभारत, शान्तिपर्व, राजधर्मानुशासनपर्व, अध्याय 18)

अनिष्कषाये काषायमीहार्थमिति विद्धि तम् ।

धर्मध्वजानां मुण्डानां वृत्त्यर्थमिति मे मतम् ॥34

(यथोपर्युक्त)

पहले श्लोक के अनुसार अनेक जन गेरुआ वस्त्र धारण करके घूमते रहते हैं। वे लोग अनेक बंधनों से बंधे हुए मिथ्या ही दूसरों से दान पाकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर रहे होते हैं।

यहां स्पष्ट कर दूं कि गेरुआ वस्त्र प्रतीक है उन तौर-तरीकों का जो ये लोग अपनाते हैं। वे तरह-तरह से पहन-ओढ़ कर और स्वांग रचते हुए असामान्य दिखने का प्रयास करते हैं ताकि आम जन उन्हें अलौकिक ज्ञान एवं सामर्थ्य के साधु-महात्मा-संत के तौर पर स्वीकारने लगें। अगले श्लोक में वस्तुस्थिति अधिक स्पष्ट है:

दूसरा श्लोक बताता है कि दूषित (काषाय) मन के साथ गेरुआ/केसरिया चोला पहनना स्वार्थसिद्धि का साधन समझा जाना चाहिए । ऐसे नरमुंडों का मिथ्या  धर्म के नाम का झंडा उठाकर चलना वस्तुतः जीविका चलाने का धंधा है।

दूषित मन यानी जिस में मैल हो, खोट हो, दूसरों को मूर्ख बनाने की लालसा हो।

मैंने संन्यास धर्म को लेकर चार लेखों की एक शृंखला २०१६ में लिखी थी अपने अन्य ब्लॉग में। उनमें ये बातें विस्तार से स्पष्ट की गई हैं।

ये बातें महाभारत काल की हैं। कदाचित् तब झूठ और फरेब का इतना बोलबाला नहीं रहा होगा। अधिकांश जन धर्म के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाने से डरते होंगे। परंतु आज कलियुग है कलियुग ! धर्म के नाम पर ठगी आम बात हो चली है। लोगों के मन में पाप छिपा रहता है, लेकिन वे इस प्रकार व्यवहार करते है कि जैसे उन जैसा संत पुरुष मिलना मुश्किल है। और यही पर आज की कहानी शुरू होती है। अनेक प्रश्न मेरे मन में उठते हैं।

संत कहलाने का अधिकारी कौन?

प्रथम प्रश्न जो मेरे मन में उठता है वह है कि संत-महात्मा कौन होते हैं। क्या वह व्यक्ति संत-महात्मा कहलाने का अधिकारी हो सकता है जो आम जनों की कमजोरी का लाभ उठाते हुए अपना “आध्यात्मिक” साम्राज्य खड़ा कर लेते हैं और भौतिक संसार के आधुनिकतम सुख-सुविधाओं का भोग करते हैं? जरा याद करिए ४००-६०० वर्ष पूर्व के उन उपदेशकों को जिन्हें आज भी लोग संत-महात्मा के नाम पर स्मरण करते हैं और पूजते हैं। गुरु नानकजी, संत रविदासजी, संत कबीर आदि क्या थे? क्या उन्होंने आज के इन आध्यात्मिक “गुरुओं” की भांति अपनी जागीरें खड़ी की थीं? रविदासजी/रैदासजी जूते बनाते/मरम्मत करते थे। संत कबीरदासजी जुलाहे का कार्य करते थे। अपना कार्य वे सामान्य आदमी की तरह करते रहते थे और साथ ही ईश्वर-भक्ति एवं ज्ञान की बातें करते थे जो लोगों को प्रभावित करती थीं। उनका जीवन सरल एवं सादगी से भरा रहता था।

लेकिन आज के इन अध्यात्म के ठेकेदारों को देखिए कि कैसे ऐशोआराम की जिन्दगी जीते हैं, एकदम बेशर्मी के साथ।

विवेकशून्य लोगों का “बाबा-प्रेम”

दूसरा प्रश्न है कि वे क्या बातें हैं जिनके लिए लोग इन “बाबाओं” की शरण में पहुंचते हैं और खुद की सोचने-समझने की बुद्धि खो बैठते है। इसमें बिल्कुल भी संशय नहीं है कि इन बाबाओं को सम्मोहित करने की कला आती है। वे अपने हावभाव एवं भांति-भाति के नाटकीय व्यवहार से कइयों को आकर्षित करने में सफल होते हैं। लेकिन जनता यह क्यों नहीं समझ पाती जो व्यक्ति इस संसार के भोगविलास में लिप्त हो और स्वयं आध्यात्मिक मार्ग से भटक चुका हो दूसरों को कैसे आध्यात्मिक मार्ग दिखा सकता है? जो व्यक्ति पूरी बेशर्मी से स्वयं को भगवत्‍-अवतार घोषित किए बैठा हो कितना पुण्यात्मा होगा वह?

मुझे अक्सर आम लोगों की नादानी पर दुःख होता है और उन पर तरस भी आता है कि परमात्मा ने उनको इतनी सामान्य बुद्धि भी नहीं दे रखी है वे समझ सकें ऐसे ढोंगी बाबा स्वयं सुख भोगने के लिए उनकी मूर्खता का लाभ उठा रहे हैं। यों अपने समाज में दूसरों को तरह-तरह से मूर्ख बनाने वालों की कमी नहीं है। राजनेता सब्जबाग दिखाकर लोकतंत्र के नाम पर सत्तासुख भोगता है। कुछ लोग जनता के धन को माह-दोमाह में ही दूना-तिगुना करने का दावा करके लूटते हैं। प्रशासनिक तंत्र में जनता को लूटने का भ्रष्टाचार का खेल चलता ही है। बहुत से मौकों पर हम असहाय हो सकते हैं और कुछ कर न पायें। किंतु इन बाबाओं के चंगुल में फंसने की विवशता क्योंकर होती है?

स्त्रीजाति के प्रति विशेष लगाव?

तीसरी बात जो सर्वाधिक महत्व की है और जिस पर स्त्रीजाति को विशेष ध्यान देना चाहिए वह है कि अनेक मौकों पर स्त्री पुरुष के पतन का कारण बनती है। जासूसी क्षेत्र में यह सुविख्यात है कि पुरुषों को कर्तव्यच्युत करने के लिए स्त्रियों का भरपूर सहारा लिया जाता है। प्राचीन चिंतकों ने धर्मभ्रष्ट न हों इसके लिए पुरुषों को स्त्रियों के सान्निध्य से बचने की सलाह दी है। अनेक पौराणिक कथाएं पढ़ने को मिलती हैं जिसमें पुरुषों का तप भंग करने के लिए स्त्रियों की मदद ली गई हो। मेरे कहने का तात्पर्य बहुत स्पष्ट है। ये बाबा इन तथ्यों को क्या जानते नहीं हैं? तो फिर क्यों स्त्री-अनुयायियों की फौज खड़ी करते हैं? और स्त्रियां स्वयं इन बातों को क्यों नहीं समझ पातीं? साफ जाहिर है कि इन बाबाओं के असल उद्येश्य ही यौन-सुख भोगना होता है और उनकी पूरी योजना ही उसी के लिए ढली रहती है। लेकिन दुःख तब होता है जब in अनुयायी-स्त्रियों में कुछएक स्वयं को अपने “भगवान्” बाबा भोगने के लिए समर्पित कर देती हैं और शेष बाबा को  निर्दोष कहने में देर नहीं करतीं। क्या यह नहीं समझ में आता है कि कोई भी व्यक्ति दूसरे के २४ घंटों की चर्या पर नजर नहीं रख सकता? परोक्ष में कोई क्या कर रहा है कोई बता ही नहीं सकता। मां-बाप अपनी संतान के क्रियाकलापों के बारे में आश्वस्त नहीं हो सकते। पति-पत्नी भी एक दूसरे के चरित्र की गारंटी नही ले सकते। किसी के अपराधों का लेखा-जोखा रखना सामान्य व्यक्ति के लिए संभव ही नहीं। इसलिए किसी बाबा के निर्दोष होने का आश्वासन कोई अनुयायी भला कैसे दे सकता है? इस बात को याद रखना चाहिए।

राजनेताओं एवं प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका

चौथी बात जिसका उल्लेख करना आवश्यक है वह है कि जब बाबा लोग अनुयायियों की ऐसी फौज खड़ी करते हैं जिसकी अपनी कोई स्वतंत्र सोच रह ही नहीं जाती है तब चुनावों में इन बाबाओं की भूमिका अहम हो जाती है। यह गौर करने की बात है कि चुनावों के मौसम में राजनेता अथवा उनके दल के मुखिया का इन बाबाओं की शरण में पहुंचने लगते हैं ताकि उनके समर्थकों के वोट पाए जा सकें। बाबाओं के प्रति राजनैतिक दलों का इस प्रकार का रवैया उनको स्थापित करने में मदद करता है। बाबाओं और राजनेता का ऐसा गठजोड़ दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन भारतीय लोकतंत्र में सत्ता कैसे हथियाई जाए यही सबसे महत्व की चीज बन चुकी है। यह देशहित में होगा क्या यह प्रश्न कोई भी स्वयं से नही पूछता।

जब बाबाओं से राजनेता उपकृत होते हैं तो बदले में बाबा भी उनसे बहुत कुछ पाने की अपेक्षा करते हैं। उनको सस्ते में जमीन दी जा सकती है ताकि आश्रम स्थापित हो सकें। उनके कुकर्मों पर शासन पर्दा डाल सके यह भी एक दुष्परिणाम होता है। इतना ही नहीं प्रशासनिक अधिकारी भी उनकी शरण में पहुंचने लगते हैं ताकि वे बाबाओं के माध्यम से शासकों से प्रोन्नति में लाभ ले सकें अथवा मुंहमांगा कार्यस्थल पा सकें। इस प्रकार बाबाओं, राजनेताओं, एवं प्रशसनिक अधिकारियों का ऐसा गठजोड़ तैयार होता है जो देश के लिए घातक होता है। इस गठजोड़ के सभी घटक परस्पर एक-दूसरे को बचाते हैं। यही इस देश में होता आ रहा है।

मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं कि धर्म एवं अध्यात्म के नाम पर इतने बाबाओं का अवतरण इसी देश में क्यों हुआ है। अन्य देशों की स्थिति इतनी दयनीय नहीं है। आस्था के नाम पर अंधविश्वास हमारे समाज में जड़े जमा चुका है।

अंत में एक वाकये का जिक्र भी लगे हाथ कर लेता हूं।

अपने विश्वविद्यालय में मेरे एक सहकर्मी शिक्षक हुआ करते थे, लगभग मेरे हमउम्र। कुछ वर्षों पूर्व वे सेवानिवृत्त हो गये। (मैंने पहले ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले थी।) वे जब कार्यरत थे तभी ओशो (आरंभ में भगवान्‍?) रजनीश के अनुयायी बन गए और कत्थई (maroon) रंग के वस्त्र पहनने लगे थे। वि.वि. में ये परिधान शायद नहीं पहनते होंगे। वे अपने “अध्यात्मिक” कार्यक्रमों में मुझे भी अक्सर आमंत्रित करते थे। बिल्कुल दिलचस्पी न होते हुए भी मैं कभी-कभार शिष्टाचार या सदाशयता के नाते उनके कार्यक्रमों में चला जाता था।

जब ओशो रजनीश का देहावसान हो गया और उनका सामाज्य विवादों में घिर गया तो वे हरियाणा के यमुनानगर के किसी “गुरु” की शरण में पहुंच गये। मुझे भी अनुयायी बनने के लिए प्रेरित करते रहते थे। मेरे घर पर अपने गुरु के गुणगान की पत्रिकाएं देते रहते थे। मैं पत्रिकाएं स्वीकार तो कर लेता था लेकिन पढ़ता नहीं था। (मैं किसी भी बाबा/गुरु को सम्मान की दृष्टि से नहीं देख पाता !) पिछले कुछ समय से उनसे मेरी मुलाकात नहीं हुई है। पता चला कि सेवानिवृत्ति के बाद वे अपने गुरु के “पूर्णकालिक” भक्त हो गए। यह भी पता चला कि अपनी पेंशन भी गुरु को समर्पित कर दिए हैं। सुनने में आया कि उनकी पत्नी बेटे की शादी करने का अनुरोध करती रहीं, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें अब कोई दिलचस्पी नहीं। जिस पत्नी के साथ उन्होंने जीवन के ४०-४५ वर्ष बिताए उसकी भी उन्हें परवाह नहीं रही; बच्चों की बात छोड़िए।

यह घटना है वि.वि. स्तर के एक उच्चशिक्षित व्यक्ति के गुरु-शरण में जाने की, उस गुरु की जो स्वयं गार्हस्थ्य जीवन जी रहे हैं, दूसरों की कमाई के बल पर। जब ऐसा व्यक्ति भ्रमित हो सकता है तो आम आदमी कैसे बच सकता है? – योगेन्द्र जोशी

 

 

 

क्या यीशु मसीह (Jesus Christ) का जन्म २५ दिसंबर को हुआ था? शायद नहीं!

आज क्रिसमस का पर्व है, 25 दिसंबर, जिसे ईसाई समुदाय के लोग यीशु मसीह के जन्मदिन के तौर पर मनाते हैं।

     इस अवसर पर मैं सर्वप्रथम देशवासियों को, विशेष तौर पर अपने ईसाई बंधुओं को, बधाई एवं शुभेच्छाएं देना चाहता हूं।

विषय का आरंभ करने से पहले मैं यह बाताना चाहूंगा कि ईसाई धर्म जिस व्यक्ति के विचारधारा पर आधारित है उसका असल नाम यीशु (Jesus)  है। मेरा खयाल है कि यह नाम हेब्रू (Hebrew, इज़्राइलवासियों की भाषा, जिसमें यहूदियों के धर्मग्रंथ उपलब्ध हैं) के उच्चारण के अनुरूप है। ध्यान दें कि यूरोप की भाषाओं में लैटिन (Latin) अल्फाबेट J का उच्चारण अंग्रेजी के अनुरूप (यानी ) हो यह आवश्यक नहीं, जैसे जर्मन भाषा में)। ग्रीक (यूनानी) मूल के शब्द क्राइस्ट (Christ) का शब्दिक अर्थ होता है मसीह/मसीहा। यह विशेष उपाधि के तौर पर उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है जो सामन्य से कहीं ऊपर उठ चुका हो और जिसे “बचाने वाला” कहा जाये। यीशू को लोगों ने मानवता को बचाने वाले के तौर पर देखा और उन्हें मसीह का दर्जा दे दिया।

मैं सुनता आया हूं कि यीशु मसीह का असली जन्मदिन वस्तुतः किसी को भी ठीक-ठीक नहीं मालूम है। इस विषय पर विस्तार से बहुत कुछ लिखा-कहा गया है। मुझे इस बारे में “Live Science” नाम की ई-पत्रिका का एक लेख पढ़ने को मिला है –

 http://www.livescience.com/42976-when-was-jesus-born.html

मैं उसी के आधार पर अधोलिखित बातें लिख रहा हूं।

लेख कहता है कि रोमन कैथोलिक चर्च ने काफी सोच-विचार के बाद 25 दिसंबर को यीशु मसीह के जन्मदिन के तौर पर चुना था। दरअसल प्राचीन काल में जब ईसाई धर्म रोम तक पहुंचा तो धर्मप्रवर्तकों ने संघर्ष का रास्ता न चुन कर रोमन जनता को मिलमिलाप से अपने धर्म की ओर खींचना ठीक समझ। रोमन लोग (तथाकथित पैगन Pagans)  उस काल में अपने शनि देवता (Deity Saturn) के नाम पर सैटर्नालिया (Saturnalia) नाम के त्योहार को उत्तरायण (winter solstice) के मौके पर मनाते थे। धर्मप्रवर्तकों ने इसे यीशु के जन्मदिन के नाम पर मनाना आरंभ कर दिया ताकि वहां की परंपरा और ईसाई मान्यता में तालमेल बैठ सके। (अन्यथा ईसाई धर्म में शनि देवता की कोई मान्यता नहीं।) 25 दिसंबर चुनने के अन्य कारण भी कदाचित रहे होंगे।

कोई नहीं जानता कि यीशु क जन्म किस शताब्दी और तारीख पर हुआ था। विषय के जानकारों के अपने-अपने मत हैं। कुछ का मानना है कि उनका जन्म 6 से 4 बीसी (BC = before Christ) में हुआ होगा। बाइबिल की एक कथानुसार तब यूडिया (Judea ) के शासक हैरॉड (Herod) को यीशु के बेथलेहम (Bethlehem) में अपने शत्रु के रूप में पैदा होने का अंदेशा था, इसलिए उसने उस स्थान के आसपास के उस काल में पैदा हुए सभी बच्चों को मरवा डाला। (बेथलेहम यूडिया के अंदर स्थित था।) चूंकि हैरॉड स्वयं 4 बीसी में दिवंगत हो गया, अतः कथानुसार ईशु का जन्म 4 बीसी या पहले हुआ होगा, न कि शून्य बीसी में।

लेकिन इतिहासज्ञ उक्त कथा को सही नहीं मानते।

यीशु के जन्म के संदर्भ में कथा प्रचलित है कि उस समय एक नक्षत्र (बेथलेहम नक्षत्र Star of Bethlehem) आकाश मे दिखाई दिया था। लंदन की रॉयल एस्ट्रॉनॉमिकल सोशाइटी (Royal Astronomical Society) के खगोलविद कॉलिन हम्फ़्रीज़ (Colin Humphreys) का दावा है कि उक्त तारा वस्तुतः अतिमंद गति से चल रहा एक धूमकेतु रहा होगा जिसका उल्लेख चीनी खगोलविदों ने 5 बीसी में देखा था। अतः जन्मवर्ष 5 बीसी हो सकता है।

अन्य खगोलविद डेव रेनके (Dave Reneke) के अनुसार यीशु का जन्म 2 बीसी (जून 17) में हुआ होगा शुक्र तथा वृहस्पति ग्रह साथ आ गये होंगे और दोनों ने मिलकर तेज रोशनी के तारे का भ्रम पैदा किया होगा। रेनके ने कंप्यूटर माडल के आधार पर यह बात कही है।

दूसरे खगोलविदों के अनुसार इस प्रकार की घटना 7 बीसी (अक्टूबर माह) में हुई थी जब वृहस्पति एवं शनि ग्रह ने साथ-साथ आकर तेज प्रकाश के तारे का भ्रम पैदा किया।

धर्मवेत्तओं के अनुसार यीशु का जन्म वसंत ऋतु में हुआ था। बाइबिल की कथा के अनुसार यीशु के जन्म के समय गड़रिये अपनी भेड़ों को घास के मैदानों में चरा रहे थे। यह घटना जाड़ों में नहीं हो सकती है। – योगेन्द्र जोशी

गोरक्षा का सच: सड़कों पर आवारा गायें और सांड़ गोरक्षकों को नजर क्यों नहीं आते?

मुझे अपनी किशोरावस्था के दिन याद हैं जब मेरे पिताजी ने गांव में गाय पाल रखी थी। चूंकि मेरी मां की पहले ही इहलोकलीला समाप्त हो चुकी थी, अतः गाय की देखभाल, दाना-पानी और दूध दुहने आदि के प्रायः सभी कार्य वे अकेले स्वयं ही करते थे। घर पर हम बच्चे यथासंभव उनका हाथ बंटा देते थे। उत्तराखंड के मेरे उस पहाड़ी गांव में गाय-बैलों की उस काल में काफी अहमियत थी, क्योंकि वे दूध के स्त्रोत के अतिरिक्त कृषि-कार्यों के लिए भी आवश्यक होते थे। उनके गोबर-मूत्र से बने खाद का प्रयोग खेतों में होता था। उस काल में हम रासायनिक खाद से अनभिज्ञ थे। हां, तो मैं बता रहा था कि मेरे पिताजी गाय दुहने का कार्य स्वयं करते थे। उन्होंने नियम बना रखा था कि गाय के थन से उतरने वाला आधा दूध उसके बच्चे – बछिया हो या बछड़ा – को मिले। प्रचलित परंपरा के अनुसार हम लोग बच्चा जनने के २२ दिनों तक गाय का दूध प्रयोग में नहीं लेते थे। उस अंतराल में गाय का बच्चा भरपूर दूध पा जाता था। बाद में आधा दूध उसका और आधा हमारा। उसको घास तथा खाद्य वनस्पति की मुलायम पत्तियां खाना सिखाया जाता था। वह भी एक समय था जब गायें या बैल बूढ़े होने पर भी पलते रहते थे। वे तब भी पूरी तरह निरुपयोगी नहीं होते थे क्योंकि उनका गोबर-मूत्र खाद के काम आता था। उन्हें छोड़ना चाहे कोई तो कहां छोड़ा जाता? छुट्टा छोड़ने का मतलब खेत चरने की छूट। (आवारा छोड़े गये पालतू पशुओं को वाराणसी में छुट्टा कहा जाता है।) मेरे पिताजी तो धार्मिक प्रवृत्ति के थे इसलिए गाय की सेवा कर्तव्य मानते थे। वे तो कुछएक शारीरिक व्याधियों के निराकरण हेतु भी पंचगव्य के सेवन में आस्था रखते थे।

     यह बात कोई पचास-पचपन वर्ष पहले की है। अब न मेरे पिताजी इस लोक में  रह गये हैं और न वे गायें और न ही मैं अब गांव में हूं। किंतु गाय-बैलों की उपयोगिता तो वहां अभी भी है, क्योंकि पर्वतीय क्षेत्र के सीड़ीनुमा खेतों के लिए ट्रक्टर जैसे साधनों की व्यवस्था एवं उपयोग सामान्यतः संभव नहीं।

गोपालकों की गली सुन्दरपुर वाराणसी

 

 

 

 

 

 

वाराणसी में छुट्टा/आवारा गायें 

अब मैं आज के शहरों के गोवंश की बाबत अपने अनुभव की बात करता हूं। मेरा अनुभव मुख्यतया अपनी तथाकथित धार्मिक नगरी (वस्तुत: धर्म के नाम पर पाखंड में अनुरक्त) वाराणसी से जुड़ा है। फिर भी यह कह सकता हूं आवारा या छुट्टा गायों और सांड़ों को मैंने कई शहरों में देखा है और उन शहरों की स्थिति वाराणसी से परिमाणात्मक स्तर पर बेहतर हो सकती है किंतु गुणात्मक स्तर पर नहीं। निश्चय ही वाराणसी की स्थिति अत्यंत दयनीय है।

जहां तक आवारा जानवरों का सवाल है उसमें गायें एवं साड़ों के अतिरिक्त अन्य पालतू पशु भी देखने को मिल जाते हैं, जैसे सुअर, बकरे, गधे तथा खच्चर। आवारा कुत्तों को भी उसमें शामिल कर सकते हैं। इसके अलावा वाराणसी के कई मोहल्लों में और मंदिरों के आसपास बंदरों की फौज़ के दर्शन भी आपको हो जायेंगे। इन सबका कोई इलाज मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में होने से रहा; किसी को भी इस दुर्व्यवस्था से परहेज नहीं।

भारतीयों की खासियत यही है कि अवांछित वस्तुस्थिति से कैसे सामंजस्य बिठाएं इसे वे जन्म के तुरंत बाद ही सीख जाते हैं। जिंदगी ऐसे ही चलते रहनी है।

     जहां तक गायों और साड़ों की बात है मैं बताता हूं वे कहां से आ टपकते हैं। दरअसल इस शहर के गली-कूचों में कई लोग गायें पालते हैं। कुछ ने ताजा एवं “शुद्ध” दूध के लिए निजी तौर पर एक या कभी दो गायें पाल रखी हैं। इसके अलावा कुछ का गोपालन करके दूध का कारोबार करना रोजी-रोटी का साधन है। ऐसे अधिकांश जनों ने अपने पुस्तैनी मकान को और उससे लगे गली-कूचे को ही इस कार्य हेतु प्रयोग में लिया है। इसके लिए कोई पक्का ढांचा गली में खड़ा नहीं करना पड़ता है। इसे आप अतिक्रमण कहेंगे या नहीं मैं नहीं जानता। किंतु प्रशासनिक तंत्र इस व्यवस्था को निर्लिप्त भाव से देखता है। यह भी सच है कि इन लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की कल्पना भी प्रशासन नहीं कर सकता। यों पिछले बीस-बाइस सालों से मैं वाराणसी में नये-नये आने वाले सक्षम (कानूनन सक्षम लेकिन व्यवहार में अक्षम!) अधिकारियों को सुनते आ रहा हूं कि शहर के किसी कोने में गोशालाएं स्थापित की जायेंगी। आज तक उस दिशा में कभी कोई प्रयास किया गया होगा ऐसा मैं नहीं समझता। अधिकारी दो-तीन वर्ष यहां की हवा में घुल चुके भांग के प्रभाव में रहते हैं, फिर चले जाते हैं।

इन गोपालकों में कुछ ऐसे होते हैं जो प्रातःकाल गाय दुहने के बाद उसे दिन भर के लिए छोड़ देते हैं। वह गाय सड़कों के किनारे की घास चरती है और सड़क के किनारे खुले में पड़े कूड़े-कचरे में कहीं कोई खाद्य सामग्री मिल जाये तो उसे भी खा जाती है। ऐसा खाद्य अक्सर पोलिथीन की थैलियों में रखकर लोग कूड़े में डाल देते हैं। खाद्य को खाते-खाते वह कभी-कभार पोलिथीन ही को निगल जाती है। मैं समझता हूं पोलिथीन खाने के मामले बहुत नहीं होते होंगे। अगर होते तो गायें और सांड़ आये दिन मर रहे होते। मैंने तो २-४ वर्षों तक इन जानवरों को सड़कों पर जीवित देखा है। सड़क पर विचरण करने वाली गाय संध्याकाल को अपने मालिक के पास लौट आती हैं। स्पष्ट है उसे पालने में गोपालक को कम मेहनत पड़ती है।

समस्या तब गंभीर हो जाती है जब ये गायें बच्चे जनने की उम्र पार कर जाती हैं और दुधारू नहीं रह जाती हैं। गोपालक गोसेवक तो होते नहीं कि वे बूढ़े माता-पिता की भांति इन्हें पालें। उनका उद्देश्य तो उनसे दूध पाना होता है जिसे एक प्रकार से गोशोषण कहा जा सकता है। क्यों, यह भी मैं बताऊंगा। अशक्त तथा निरुपयोगी हो चुकीं इन गायों को छोड़ दिया जाता। बेघरबार इंसान की तरह इनका ठिकाना सड़कें हो जाती हैं। दुधारु अवस्था में इन्हें चारा भी मिल जाता था; वह अब कहां से इन्हें नसीब हो? ये हैं गायें जो सड़कों पर इधर-उधर घूमती फ़िरती हैं। जो कुछ भी सड़क में मिल जाये उसे खा लेती हैं। इनके गोबर को देखकर पता चलता है कि उसमें घास का अंश नाममात्र ही होता है। मेरे घर के प्रवेशद्वार (गेट) पर कभी-कभी कोई गाय गोबर कर जाती है। जब मैं उसे साफ करता हूं तो देखता हूं कि वह इंसान के मल के समान बदबू करता है। जिस गोबर से मैं बचपन से वाकिफ़ रहा हूं उस जैसा तो वह हरगिज नहीं होता है। पहले ही उम्र खा चुकी ऐसी गायें अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहतीं। मैंने ऐसी ही एक गाय की व्यथा लघुकथा के रूप में अपने अन्य चिट्ठा-आलेख में लिखी है। (देखें: कभी दुधारू रह चुकी उस बूढ़ी गाय की व्यथा)

http://jindageebasyaheehai.wordpress.com/2014/09/06/

वाराणसी में आवारा सांड़

अब आइये अपनी नगरी की गलियों-सड़कों पर विचरण करते सांड़ों की बात पर। हिन्दी में एक कहावत है: “रांड़, सांड़, सीढ़ी औ’ सन्यासी, इनसे बचे सो सेवे काशी।” अर्थात्  सांड़ों की उपस्थिति इस नगरी में कोई नई बात नहीं। पहले वे कहां से आते थे मैं नहीं कह सकता, किंतु आजकल तो वे इन्हीं गोपालकों की देन हैं। होता यह है कि जब गाय बछिया जनती है तो उसे पाल लिया जाता है, क्योंकि वह दो-तीन सालों बाद दुधारू गाय बन सकती है। परंतु जब वह बछड़ा जनती है तो उसका क्या किया जाये? वह बैल बन सकता है। शहरों में किसे जरूरत है बैलों की? अब तो उनकी जरूरत गांवों में भी नहीं रह गयी; उनकी जगह ट्रैक्टर ले चुके हैं। इसलिए नवजात बछड़ा अवांछित होता है। फिर भी कुछ दिनों तक उसे भी पाला ही जाता है ताकि उसकी मौजूदगी से गाय दुहने में आसानी हो। गोपालक उसे यथासंभव कम दूध पीने देते हैं और जैसे ही गाय के थन से दूध उतरने लगता है उसे हटा दिया जाता है। गोपालक गाय को उससे दूर करना शुरू करते हैं और कालान्तर में वह बिना बछड़े के दूध देने लगती है। अपर्याप्त भोजन पाने वाला ऐसा बछड़ा अक्सर कुछ दिनों में मौत का शिकार हो जाता है। यदि वह नहीं मरता है तो उसे सड़क पर छोड़ दिया जाता है। उसकी किस्मत ठीक हुई तो सड़क किनारे की घास तथा अन्य चीजें खाकर जिन्दा रह जाता है और बाद के काल में सांड़ के तौर पर जीवित रहता है। अन्यथा वह भूख अथवा दुर्घटना का शिकार होकर परलोक सिधार जाता है।

तो यह है हमारे गोपालकों/गोसेवकों/गोशोषकों का सच।

     मेरे देशवासी, विशेषतः हिन्दू जन, इस तथ्य को स्वीकारने से कतराते हैं कि हम आडंबरों के साथ जीने के आदी हैं।  हमारी कथनी में आदर्श की खूब बातें होती हैं परन्तु करनी में हम वस्तुस्थिति का भरपूर शोषण करते हैं। गोसेवा एक ढकोसले से भिन्न नहीं है। कुछ ही लोग अपवाद होंगे जो इस कार्य को ईमानदारी से करते हों। – योगेन्द्र जोशी