त्रिजन्मद शिशु  यानी  थ्री-पेरेंट  चाइल्ड (3-parent child) संबंधी समाचार

“त्रिजन्मद” मेरा अपना सुझाया शब्द है। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से यह कितना सही होगा इसके बारे में आश्वस्त नहीं हूं। इसके अर्थ स्पष्ट कर दूं: यह उस शिशु के लिए विशेषण है जिसके जन्म में तीन व्यक्तियों की भूमिका रही हो।

इधर दो-चार दिनों से वैज्ञानिक खोजों/आविष्कारों संबंधी समाचारों में एक यह भी है कि जॉर्डन (युर्दान) देश के एक दम्पती की संतानें जिवित नहीं रह पा रही थीं, क्योंकि महिला (मां) की “जीन-संरचना” में एक दोष प्रवेश कर चुका था। पहले चार गर्भधारणों की नियति गर्भपात में हो गयी। पांचवें मौके पर बच्ची पैदा हुई जो मस्तिष्क एवं मांसपेशियों के गंभीर “लाइ” लक्षण (Leigh Syndrome) से पीड़ित थी और छ: वर्ष तक ही जीवित रह सकी। उसके बाद बेटे का जन्म हुआ और वह भी उसी रोग से पीड़ित होकर शैशवावस्था में ही चल बसा। जांच से पता चला कि महिला के डिम्बों में मौजूद “माइटोकॉंड्रिया” नामक जैविक इकाइयां दूषित हो चुकी हैं।

उक्त दम्पती ने समस्या के निराकरण के लिए अमेरिकी शहर न्यूयॉर्क के न्यू होप फ़र्टिलिटी सेंटर के चिकित्सक जॉन झांग (John Zhang) से संपर्क किया। डा. झांग ने एक विधि अपनाई जिससे वह एक स्वस्थ बच्चे की मां बन सकी। उसी से जुड़ी जानकारी यहां प्रस्तुत है। अधिक विवरण ब्रितानी विज्ञान पत्रिका “न्यू साइंटिस्ट”  में छपे लेख से अथवा अन्य स्रोतों से मिल सकती है।

जीवधारियों का शरीर जैविक कोशिकाओं (सेल) से बना होता है जिसका ढांचा और जिसमें घटित होने वाली प्रक्रियाएं काफी जटिल होती हैं। मोटे तौर पर कहा जाये तो सेल का बाहरी आवरण एक झिल्ली (मेम्ब्रेन) से बना होता है जिसके भीतर अपेक्षया छोटा नाभिक (न्यूक्लियस) रहता है जो द्रव पदार्थ (साइटोप्लाज़्म – पानी और उसमें मौजूद प्रोटीन तथा अन्य जैविक तत्व) में तैरता रहता है। इसी द्रव में माइटोकोंड्रिया नामक इकाइयां होती हैं जिन्हें सेल का पॉवर हाउस कहा जाता है। सेल के कार्य और विकास के लिए वांछित ऊर्जा का नियंत्रण यही इकाइयां करती हैं। (देखें साथ का चित्र।)

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जीवों की भ्रूण रचना में मादा के डिम्ब और नर के शुक्राणु की भूमिका रहती है। डिम्ब स्वयं में एक मादा के जैविक सेल के माफिक होता है किंतु जिसका नाभिक सामान्य सेल का एक प्रकार से आधा होता है। इसी प्रकार नर का शुक्राणु उसके सेल का नाभिक भर होता है किंतु एक प्रकार से मात्र उसका आधा। निषेचन (फ़र्टिलाइज़ेशन) की प्रक्रिया में शुक्राणु डिम्ब में प्रवेश करके उसके नाभिक के साथ मिल कर उसे पूर्ण बना देता है। यही नाभिक है जिसमें मादा और नर के गुण मिश्रित रहते हैं। इस प्रकार बने नये जैविक सेल की प्रक्रियाएं उन्हीं माइटोकॉंड्रिया से नियंत्रित होती हैं जो मादा के डिम्ब से आये हुए होते हैं। ऐसा जैविक सेल जब भ्रूण की शेष प्रक्रिया से गुजरता है तो उसमें मादा (मां) और नर (पिता) के गुण नाभिक के माध्यम से मिलते हैं किन्तु उसके विकास की प्रक्रिया उस माइटोकॉंड्रिया से नियंत्रित होती है जो शुद्ध रूप से मादा से प्राप्त होता है। इस इकाई में अगर दोष हो तो उसके परिणाम संतान में दिखाई देंगे। इस प्रकार मां ऐसे दोषों की वाहक होती है।

न्यू साइंटिस्ट के जिस लेख का ऊपर उल्लेख किया गया है उसमें जॉर्डन के एक दंपति के नवजात बच्चे के जनमने के लिए अपनाई गयी विधि का व्योरा है जिसके मां के माइटोकॉंड्रिया में अज्ञात कारणों से दोष आ चुका था और उसकी पहले की संतानें जीवित नहीं रह सकीं। इसकी प्रबल संभावना थी कि आगे की संतानें भी जीवित नहीं रहेंगी। अमेरिकी चिकित्सक जॉन झांग ने मेक्सिको देश में जाकर संबंधित प्रयोग किया, क्योंकि अमेरिका में उस विधि का प्रयोग वर्जित है। मेक्सिको के तत्संबंधित नियम शिथिल हैं। भावी मां के डिम्ब से उसका नाभिक निकाला गया (अनुसंधान प्रयोगशाला में)। उसे किसी अन्य महिला के डिम्ब के नाभिक के स्थान पर स्थापित कर दिया गया। डिम्ब में विद्यमान अन्य पदार्थ यथावत बने रहे। इस प्रकार ऐसा डिम्ब तैयार किया गया जिसका नाभिक मां का था लेकिन दोषहीन माइटोकॉंड्रिया अन्य महिला का था। फिर इसका निषेचन पिता के शुक्राणु से किया गया और निषेचित कोशिका, जिसे अब भ्रूण कहा जायेगा, को मां के गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया। प्रयोगशाला में डिम्ब के निषेचन प्रक्रिया को संपन्न करना वैज्ञानिक भाषा में “इन-वीट्रो” निषेचन (in vitro fertilization) कहा जाता है।

समुचित अंतराल के बाद मां ने स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया जो अब पांच माह का है।

चूंकि उस बच्चे की उत्पत्ति के लिए आवश्यक भ्रूण के लिये शुक्राणु पिता से लिए गये, डिम्ब-नाभिक मां से तथा माइटोकॉंड्रिया अन्य महिला से अतः उसके तीन जनक माने गये। तदनुसार उसे “थ्री-पेरेंट चाइल्ड” कहा गया है। – योगेन्द्र जोशी

पानी से इंजन चलेंगे; पाकिस्तानी इंजीनियर का चमत्कार, या झूठा दावा?

[Hindi version of 30 July  post in English]

पिछली 28 तारीख के समाचारपत्र में मुझे दिलचस्प एवं अविश्वसनीय खबर पढने को मिली । एक पाकिस्तानी इंजीनियर, वकार अहमद, ने अनेकों लोगों के सामने पानी से चलने वाला इंजन दिखाया ।

मेरी जिज्ञासा जगी और इंटरनेट से अधिक जानकारी जुटाने का विचार बना । मुझे समाचार से जुड़े ये वेब-पृष्ट मिले:

timesofindia.indiatimes.com

cssforum.com.pk

godlikeproductions.com

pesn.com

newsworldwide.wordpress.com

पाक सरकार बहुत खुश है । पानी से चलने वाला इंजन ! बहुत खूब, समझो ऊर्जा की समस्या सुलझ गई अब । पानी की कमी तो है नहीं; फिर क्या, मनुष्यों के खर्चने के लिए ऊर्जा की कमी नहीं रहेगी ! सरकार इंजिनियर को योजना पर आगे बढ़ने में मदद करने वाली है ।

मजे ही मजे ! अब ऊर्जा कोई समस्या नहीं रह जाएगी !!

लेकिन मेरे जैसे भौतिकीविद (फिजिसिस्ट) के लिए यह झूठ के अलावा कुछ नहीं । अंतर्दहन इंजन (internal combustion engine) के लिए पानी बतौर इंधन के ? 100 फीसद असंभव, क्योंकि प्रकृति (भौतिकी) के नियम इसकी इजाजत नहीं देते ।

अज्वलनशील पानी से ऊर्जा पाने की यांत्रिकी या विधि क्या है ? समाचार इस बात को स्पष्ट नहीं करता । मेरी समझ में जो आया वह यह हैः पानी का विद्युत्-अपघटन (इलेक्ट्रोलिसिस) करके हाइड्रोजन प्राप्त किया जाएगा, जो पेट्रोल/डीजल के बदले इंधन का कार्य करेगा । ठीक; इसमें कुछ भी गलत नहीं ।

लेकिन यह तो बताया नहीं गया है कि इलेक्ट्रोलिसिस स्वयं में कैसे संपन्न होगा, जिसके लिए बिजली की आवश्यकता अनिवार्य होती है । वह इंजीनियर क्या एक बैटरी का प्रयोग कर रहा है निर्बाध विद्युत्-धारा हेतु, जिससे पानी अपने रासायनिक घटकों, जिसमें हाइड्रोजन (इंधन) एक है, में विघटित हो सके ? इंजन चलाने के लिए आपको हाइड्रोजन की सतत पूर्ति जरूरी है, जिसका मतलब है इलेक्ट्रोलिसिस की सतत प्रक्रिया, और उसके लिए बिजली की निरंतर आपूर्ति ।

बिजली की यही आपूर्ति ऊर्जा का वास्तविक स्रोत है । मैं पुनः कह रहा हूं समाचार स्पष्ट नहीं करता है कि कथित इंजन के लिए बिजली आपूर्ति कहां से हो रही है ? अगर बिजली आपूर्ति नहीं तो फिर इलेक्ट्रोलिसिस कैसे हो रही है ?

अगर ये बातें सही हैं तो इसका मतलब है कि आप असल में ये कर रहे हैं:

विद्युत् स्रोत (बिजली) → रासायनिक ऊर्जा (इलेक्ट्रोलिसिस) → हाइड्रोजन (रासायनिक ऊर्जा स्रोत) → ऊष्मा ऊर्जा (हाइड्रोजन बतौर इंधन) → यांत्रिक ऊर्जा (धूर्णन गति) → वाहन चलाने में प्रयुक्त

विद्युत् ऊर्जा आपूर्ति का खुलासा न करते हुए यदि उक्त युक्ति अपनाई जा रही हो, तब इस सवाल का जवाब मिलना चाहिएः उस बिजली को सीधे विद्युत्-मोटर चलाने में इस्तेमाल क्यों न किया जाए, जिससे मशीन चलाई जाए ?

विद्युत् स्रोत (बिजली) → यांत्रिक ऊर्जा (धूर्णन गति देने वाली मोटर चले) → वाहन चलाने में प्रयुक्त

बैटरी-चालित कारों/बाइकों का यही सिद्धांत है । ऊष्मागतिकी (थर्मोडाइनेमिक्स) का छात्र इसे भली भांति समझ सकता है कि पहली विधि दूसरी से अनिवार्यतः कम दक्ष (इफिसेंट) होगी, क्योंकि ऊर्जा के एक प्रकार से दूसरे में परिवर्तन के प्रत्येक चरण में उसकी अपरिहार्य हानि होती है ।

इस प्रकार बेहद अहम सवाल उठता है कि कैसे पानी बतौर इंधन के कार्य करता है । मैं रासायनिक इंधन की बात कर रहा हूं, नाभिकीय इंधन की नहीं । – योगेन्द्र जोशी

Water to fuel car engine. Pak engineer’s miraculous feat, or hoax?

My Hindi newspaper of 28th had an amusing and amazing story. A Pak engineer, Waqar Ahmad, recently demonstrated his Water-Fuelled engine before a gathering of politicians, government officials, scientists (?) and students, etc.

I got curious and searched the internet for more about the news. I got some links to the said item, which I give here:

timesofindia.indiatimes.com

cssforum.com.pk

godlikeproductions.com

pesn.com

newsworldwide.wordpress.com

The Pak Government is very happy. An engine running on Water as fuel! All energy problems will get solved! Water being available in abundance, humanity shall have unlimited energy to consume. The engineer is now to go ahead with govt. support.

Rejoicing! Hurrah!! Energy problem no more!!!

For a physicist like me, that is a pure HOAX, unfortunately. Water as fuel in place of petrol/diesel in an internal combustion engine? 100 per cent impossible. Why? Simply because the known laws of nature (physics) do not permit that.

What is the mechanism of getting energy out of noncombustible water? The news items does not make things clear. What I could understand is this: water would be subjected to electrolysis to produce hydrogen, which would act as fuel in place of petrol/diesel. That is fine; nothing wrong.

But it is not explained how that electrolysis would be effected. Electrolysis necessarily means use of electricity! Is the engineer using a storage battery to have continuous supply thereof to decompose water into its chemical constituents, one of them being hydrogen to be used as fuel? To run an engine, you would need a continuous supply of hydrogen. And that would demand a continuous process of electrolysis, which in itself implies a continuous supply of electricity.

This electric power supply is the ultimate source of energy. I reiterate that the news does not clarify if an electric supply is being used for the said engine. What else is the mechanism of electrolysis?

If this much is true then what you are actually doing is this:

electric source (electricity) →convert to chemical energy (electrolysis) → hydrogen (source of chemical energy) → convert to heat energy (hydrogen as fuel) → convert to mechanical energy (rotational motion produced) → use

this to drive a vehicle etc.

Now if this is the trick being followed, without disclosing the hidden use of an electric power supply, then a question deserves to be answered: Why not use that electricity to run an electric motor directly, which would drive the desired machinery.

electric source (electricity) → convert to mechanical energy (drive an electric motor to get rotational motion) → use this to drive a vehicle etc.

This is the principle of battery-driven cars/bikes available in the market.

Any student of thermodynamics can understand well that the first approach would be necessarily less efficient than the second, because at every step of converting one form of energy into another involved unavoidable loss of energy.

So a million dollar question is how water can act as a fuel? (I am talking of chemical fuel and not nuclear fuel!)

लाइलाज जलवायु परिवर्तन, कोपनहेगन शिखर सम्मेलन, तथा विस्तार अमेरिकी जीवनशैली का

संप्रति सारा विश्व तरह-तरह की समस्याओं से जूझ रहा है, किंतु जो समस्या सर्वाधिक महत्त्व की मानी जा रही है, और जिसे हर देश के लिए चिंता का विषय बताया जा रहा है वह है जलवायु परिवर्तन की बात । पिछले दो-तीन दशकों से वैज्ञानिक दावा करते आ रहे हैं कि मानव-सक्रियता के कारण धरती की सतह पर आवरण रूप में स्थिर वायुमंडल शनैःशनैः गरमाता जा रहा है और उसके फलस्वरूप जलवायु का वैश्विक प्रतिमान (पैटर्न) बदल रहा है । उनके अनुसार आने वाले समय में कई समस्याओं से मानव जाति को जूझना पड़ेगा, और यदि समय रहते समुचित कदम न उठाए गये तो स्थिति बेकाबू हो सकती है । और तब संभव है कि मानव जाति के लिए अपना अस्तित्व ही बचा पाना कठिन हो जाए ।

अपनी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि का उपयोग करते हुए मैं स्वयं पिछले तीन-चार सालों से इस विषय का अध्ययन कर रहा हूं । विज्ञानियों के द्वारा दिए जा रहे तर्क, उपलब्ध आंकड़ों की उनके द्वारा की जा रही समीक्षा और प्रस्तुत किये जा रहे निष्कर्षों को समझ पाना मेरे लिए स्वाभाविक रूप से सरल है । मैं उनकी समीक्षा-विधि में विश्वास करता हूं और मानता हूं कि जानबूझ कर विषय के साथ छेड़छाड़ करके भ्रम फैलाने का वे प्रयास नहीं कर रहे हैं । मुझे यह भी ज्ञात है कि विज्ञानियों और आम लोगों में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इस जलवायु परिवर्तन की बात को सिरे से खारिज करते हैं । काश, उनका मानना सच हो जाता और मानव जाति सुख से विकास की राह पर चलती रहती । विषय की जो समझ मैंने इस बीच हासिल की है उसके आधर पर मैं यही महसूस करता हूं कि मुद्दा गंभीर है, वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, और जलवायु प्रतिमान (पैटर्न) वाकई बदल रहा है, जो कालांतर में पूरे प्राणिजगत् के लिए घातक सिद्ध हो सकता है ।

जलवायु परिवर्तनः ग्रीन-हाउस गैसें

मेरा इरादा इस स्थल पर जलवायु परिवर्तन के कारणों तथा उस पर नियत्रण पाने के तरीकों की व्यापक चर्चा करने का नहीं है । मुझे उन कुछ ज्ञातव्य तथ्यों का जिक्र करना है जिनकी ओर सामान्यतः ध्यान नहीं जाता है, या जिन्हें हल्के-फुल्के में लेकर भुला दिया जाता है । वांछित समाधान खोजते वक्त इन तथ्यों पर भी नजर डालनी चाहिए ऐसा मेरा मत है । अपनी बातें मैं यह कहते हुए आरंभ करता हूं कि कथित जलवायु परिवर्तन के लिए ‘ग्रीन-हाउस गैसें’ जिम्मेदार हैं, जिनमें ‘कार्बन डाई-ऑक्साइड’ प्रमुख है । दरअसल अभी पूरी जिम्मेदारी इसी पर थोपी जा रही है । वस्तुतः इस गैस से कहीं अधिक प्रभाविता वाली गैसें हैं ‘मीथेन’, ‘नाइट्रस ऑक्साइड’, ‘क्लोरोफ्लोरोकार्बन या संक्षेप में सीएफसी’, एवं ‘ओजोन’ । किंतु इनकी मात्रा वायुमंडल में अपेक्षया काफी कम है, उस मात्रा में बीतते समय के साथ कोई विशेष वृद्धि नहीं देखी जा रही है, और ये काफी हद तक वायुमंडल में एक प्रकार से संतुलन की अवस्था में हैं । इसके विपरीत करीब 200 वर्ष पहले आरंभ हुई औद्योगिक क्रांति के बाद से वायुमंडलीय कार्बन डाई-ऑक्साइड की मात्रा में लगातार वृद्धि देखी गयी है । इसकी मात्रा प्राग्-औद्योगिक काल से अब तक तीस-पैंतीस प्रतिशत बढ़ चुकी है (पहले के 280 पीपीएम से इस समय के 387 पीपीएम तक; पीपीएम माने पार्ट्स पर मिलियन, अर्थात् समस्त वायुमंडलीय गैसों के 10 लाख हिस्सों में कितने हिस्से इस बात की माप) । इस वृद्धि के मूल में है जीवाश्म इंधनों (कोयला, पेट्रोलियम, एवं ‘नैचतल गैस’) का मनमाना प्रयोग, जिन पर मानव जाति अपनी प्रायः संपूर्ण ऊर्जा जरूरतों के लिए आश्रित है और जो इस्तेमाल किये जाने पर वायुमंडल में कार्बन डाई-ऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं । अन्य ऊर्जा-स्रोतों का उपयोग वैश्विक स्तर पर बमुश्किल करीब पंद्रह प्रतिशत है । कार्बन डाई-ऑक्साइड के उत्सर्जन को संक्षेप में ‘कार्बन उत्सर्जन’ (carbon emission) नाम भी दिया गया है ।

इतना और बता दूं कि वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार यदि इस शताब्दि के अंत तक ‘कार्बन प्रदूषण’ यानी कार्बन डाई-ऑक्साइड प्रदूषण की वृद्धि 480 पीपीएम तक सीमित रहे तो भी कथित तापमान में करीब 2 डिग्री का इजाफा होगा । बढ़ रहे इस तापमान से जुड़े हैं सागरों के जलस्तर का ऊपर उठना, जिसका मतलब है तटीय क्षेत्रों की भूमि का जलप्लावित होना तथा छोटे द्वीपों का सागरों में समा जाना । बढ़ते तापमान के साथ नदियों के स्रोत ग्लेशियरों का पिघलकर सिमटना या लुप्त हो जाना । तब विश्व की कई नदियां करीब-करीब सूख जायेंगी । इसके अतिरिक्त जलवर्षा का स्वरूप भी बदलना, कहीं अतिवर्षण तो कहीं सूखे की स्थिति, आंधी-तूफानों की संख्या एवं उनकी तीव्रता में भी इजाफा । इसी प्रकार के कई प्रभाव देखने को मिलेंगे । उम्मीद की जाती है कि दो डिग्री की तापमान वृद्धि तक हालात संभल सकते हैं, किंतु उसके आगे संभव है कि स्थिति नियंत्रण से बाहर ही हो जाए ।

कोपनहेगन शिखर बैठक

इस कार्बन प्रदूषण की समस्या का समाधान खोजने में अब विश्व के वैज्ञानिक तथा राजनेता जुट गये हैं, किंतु राजनेताओं की एकजुटता संदेहास्पद है । समाधान खोजने का औपचारिक प्रयास 1997 के ‘क्योटो नयाचार या प्रोटोकॉल’ से आरंभ हुआ और बीच में समय-समय पर आयोजित विभिन्न बैठकों/सम्मेलनों के पश्चात् ‘कोपनहेगन शिखर सम्मेलन’ (COP 15, Dec 7-18) के रूप में आजकल देखने को मिल रहा है ।

विश्व के विभिन्न देश कार्बन प्रदूषण कम करने के लिए सार्थक जिम्मेदारी उठाने के लिए राजी होवें इस आशय से उक्त शिखर-सम्मेलन आयोजित किया गया है । कौन कितना प्रदूषण कम करे इस पर बहस चल रही है । अलग-अलग गुटों में बंटे ये देश अलग-अलग कार्यसूची यानी एजेंडा पेश कर रहे हैं । प्रदूषण की अधिकतम सीमा क्या हो इस पर भी मतभेद है । जहां विकासशील देश 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल के मद्देनजर इस बात पर जोर दे रहे हैं कि विकसित देश प्रदूषण में सर्वाधिक कटौती की जिम्मेदारी लें, क्योंकि वे ही आज के चिंताजनक हालात के लिए उत्तरदायी हैं, वहीं विकसित देश, खासकर अमेरिका, सभी के लिए लगभग समान जिम्मेदारी की बात कर रहे हैं । कई जानकार लोगों को शंका है कि यह सम्मेलन अपने उद्येश्य में सफल नहीं हो पायेगा । अंततोगत्वा क्या होने जा रहा है इसके लिए कल यानी 18 तारीख तक इंतजार करना पड़ेगा ।

जब मुझसे कोई पूछता है कि यह समस्या सुलझ पायेगी कि नहीं, तब मेरा उत्तर साफ ‘नहीं’ रहता है । बहुत कुछ किया जा सकता है, किंतु करेगा कौन ? सिद्धांततः जो हो सकता है मैं उसकी बात करना बेमानी समझता हूं । जिन तरीकों को दुनिया अमल में लाने को तैयार ही न हो उन तरीकों की बात ही क्यों की जाये ? जलवायु परिवर्तन की समस्या को सुलझाना उतना ही कठिन है जितना अपने देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को मिटाना । यह समस्या उतनी ही लाइलाज है जितना किसी रुग्ण शराबी का इलाज करना जो शराब छोड़ने को ही राजी न हो पर जिसे बारबार शराब छोड़ने की सलाह दी जा रही हो । मैं पूछता हूं कि क्या आप अपनी कार/बाइक कबाड़खाने में पटककर पैदल या बाइसिकिल से चलने-फिरने को राजी हैं ? यदि नहीं, तो समस्या या कोई हल नहीं है । मेरी बात आपकी समझ में आ जाएगी जब आप अधोलिखित बात पर गौर करें ।

विसंगतिः कोसना अमेरिका को और अपनाना उसकी जीवन शैली

वायुमंडल में व्याप्त कार्बन प्रदूषण के लिए सबसे अधिक अमेरिका, यानी दुनिया का सर्वाधिक ताकतवर देश यू.एस.ए., को ठहराया जाता है । बात भी सही है । तीन-चार साल पहले तक अमेरिका कार्बन उत्सर्जन के मामले में पहले स्थान पर था और उसके विश्व भर के उत्सर्जन का एक-तिहाई के लिए वही जिम्मेदार था । एक वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार अब चीन ने ‘बाजी’ मार ली है और दोनों देश मिलकर विश्व के कुल उत्सर्जन का करीब पचास प्रतिशत उत्सर्जन कर रहे हैं (देखें अलग-अलग देशों के कार्बन उत्सर्जन के आंकड़े) । प्रति व्यक्ति उत्सर्जन की अगर बात करें तो अमेरिका अभी भी आस्ट्रेलिया के बाद शीर्ष पर है और चीन की तुलना में उसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन करीब 4 गुना अधिक है और भारत से करीब 17 गुना अधिक । धान दें कि चीन की जनसंख्या अमेरिका से करीब 4.5 गुना अधिक है, अतः उसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन कम ठहरता है । दरअसल मौजूदा कार्बन प्रदूषण के लिए अमेरिका तथा उसके साथ-साथ अन्य विकसित राष्ट्र जिम्मेदार रहे हैं, जिन्होंने ऐसी जीवन शैली अपना डाली जो जीवाश्म इंधनों की अंधाधुंध खपत पर आधारित रही है । अमेरिका ने विकास का एक ऐसा मॉडल दुनिया के सामने रख दिया जिसकी चकाचौंध सबको अंधा कर गई और सभी उस माडल को अपनाकर ‘अमेरिका जैसा’ बनने निकल पड़े । अब जब उस विकास के कुप्रभाव नजर आने लगे हैं तो सभी किंकर्तव्यविमूढ़-से हो चले हैं ।

विडंबना यह है कि जिस अमेरिका की भोगवादी संस्कृति की आलोचना की जाती है और जिस अमेरिका में रोजमर्रा की जिंदगी में ऊर्जाखाऊ मशीनों का ही बोलबाला है, उसी अमेरिका के जैसा बनने की चाहत में सभी देश प्रयत्नशील हैं । विकासशील देश चाहते हैं कि उनके यहां भी आठ-आठ लेन की सड़कें हों, उन सड़कों पर दौड़ाने के लिए हर व्यक्ति के पास अपनी निजी कार हो, सभी के लिए हवाई यात्रा करना सुलभ हो, हर व्यक्ति वातानुकूलित घर में रहे, हर घर में कपड़े धोने-सुखाने तथा बर्तन मांजने की मशीनें लगी हों, हर घर में हफ्ते-हफ्ते भर के लिए ‘फ्रोजन-फूड’ एवं अन्य भोज्य पदार्थ भंडारित करने के लिए भारी-भरकम फ्रिज हो, असीमित खर्चें के लिए बिजली की चौबीसों घंटे की निर्बाध आपूर्ति हो, इत्यादि-इत्यादि । ‘लिस्ट’ लंबी है । अमेरिकी जीवन-शैली का सार्थक वर्णन दो-चार वाक्यों में संभव नहीं है । इस बारे में अलग से फिर लिखूंगा । इतना सब कहना आवश्यक है यह बताने के लिए जिस अमेरिकी जीवन-शैली को विकासशील देश अपनाना चाहते हैं वह सब बिना जीवाश्म इंधनों के अभी संभव नहीं है । ऊर्जा के अन्य स्रोत अभी पर्याप्त मात्रा में जुटा पाना आसान नहीं है । इस बारे में अतिआशावाद दिखाना मूर्खता होगी । अतः अगर विकसित देश अपनी जीवन-शैली बदलने को तैयार नहीं और विकासशील देश उसी जीवन-शैली के पीछे भाग रहे हों, तो कार्बन उत्सर्जन तो होते ही रहना है । विकसित होना हो, और वह भी तेजी से, तो उत्सर्जन की चिंता छोड़नी पड़ेगी । तब भला समाधान कहां है ?

जीवन-शैली बदलने की बात खुलकर और पूरे जोर से कोई नहीं कर रहा है । सर्वत्र वैकल्पिक विधियों और अधिक उन्नत दर्जे की तकनीकी विकसित करने की बातें की जा रही हैं । क्या वाकई में वह सब कर पाना सरल और फलदायी होगा ? इस विषय पर अधिक चर्चा अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी