अगस्त 15, 72वां स्वतंत्रता दिवस – बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिए

बर्फ़ की तिरंगी सिल्ली

स्वाधीनता दिवस – एक पर्व

आज 15 अगस्त है देश की स्वातंत्र्य-प्राप्ति का दिन, जिसे पिछले एकहत्तर वर्षों से हम एक उत्सव के तौर पर मनाते आ रहे हैं। इस उपलक्ष्य पर मैं देशवासियों को बधाई देना चाहता हूं और कामना करता हूं कि हर व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने का संकल्प ले, उसे निभाने का प्रयास करे।

     ऊपरी तौर पर देखें तो हर भारतीय इस दिन स्वयं को एक स्वाधीन देश का नागरिक होने का गर्व अनुभव करेगा। किंतु हम स्वाधीन हैं इतना काफी है क्या? या इसके आगे भी कुछ और है? जिन लोगों ने इस स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए संघर्ष किया उन्होंने क्या स्वाधीनता की अर्थवत्ता के बारे में भी कुछ सोचा नहीं होगा? उन्होंने सोचा होगा न कि कैसे हम अपने देशवासियों को ऐसी शासकीय व्यवस्था दे पायेंगे जो उनके बहु-आयामी हितों को साधने का कार्य करेगा? क्या वह कर पाए हैं हम? या उस दिशा में ईमानदारी से बढ़ भी पाए हैं? या सही दिशा में बढ़ने का इरादा भी कर पाए हैं?

हम स्वाधीन हैं और उस स्वाधीनता का “उपभोक्ता” मैं भी हूं। मेरे लिए यह काफी महत्वपूर्ण है, किंतु पर्याप्त नहीं। इसके आगे भी मुझे बहुत कुछ और देखने की इच्छा है। मुझे खुद के लिए कुछ पाने की लालसा नहीं, क्योंकि मेरे पास अपने लिए पर्याप्त है। जितना एक आम आदमी के लिए वांछित हो उतना मुझे मिला ही है, उसके आगे बहुत और मैं पाना नहीं चाहूंगा। उसके विपरीत किसी को अपनी सामर्थ्य से कुछ दे सकूं तो वह अधिक संतोष देगा।

स्वाधीन भारत – उपलब्धियां

अब मैं असली मुद्दे पर आता हूं। मेरा जन्म देश की स्वातंत्र्य प्राप्ति के चंद महीनों पहले उत्तराखंड (तब उ.प्र.) के सुदूर गांव में हुआ था। अर्थात्‍ मैं परतंत्र देश में जन्मा, लेकिन उस काल का कोई अनुभव नहीं मिला। जब से होश संभाला स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस मनते हुए देखता आ रहा हूं। क्या अहमियत है इन दिवसों की? यह सवाल पिछले कुछ वर्षों से समझने की कोशिश कर रहा हूं।

इस में दो राय नहीं है कि एक स्वतंत्र और स्वशासित देश के रूप में हमने भौतिक स्तर पर काफी प्रगति की है। विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में से एक बनने की दिशा में देश अग्रसर है। लोगों की संपन्नता एवं आर्थिक समृद्धि में इजाफा हुआ है। देश अंकीय (डिजिटल) तकनीकी उपयोग करते हुए नई शासकीय व्यवस्था स्थापित कर रहा है। लोगों के हाथ में मोबाइल/ स्मार्टफोन पहुंच चुके हैं। जिन घरों में बिजली का पंखा मुश्किल से दिखता था उनमें “एसी” लग चुके हैं। सुख-सुविधा की तमाम युक्तियां लोगों की पहुंच में आ चुकी हैं। सड़कों पर मोटर बाइकें और कारें दौड़ रही हैं। साइकिल का प्रयोग जो करते थे वे उसे चलाना भी भूल चुके हैं। यह सच है कि इतना सब अभी भी समाज के एक बड़े तबके को मुहैया नही हो पाया है। फिर भी उस दिशा में देश बढ़ रहा है यह स्वीकारा ही जाएगा।

वैज्ञानिकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी काफी हद तक प्रगति हुई ही है। उपग्रह प्रक्षेपण में देश अग्रणी बन चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु देशज मिसाइलें बन चुकी हैं और नाभिकीय आयुधों का भी विकास हो चुका है। राकेट तकनीकी का भी उल्लेखनीय विकास हमारे वैज्ञानिक-अभियंता कर चुके हैं। चंद्रयान की बात पुरानी पड़ चुकी है; अब तो मंगल-यान की बात हो रही है।

यह सब उपलब्धियां कम हैं क्या एकहत्तर वर्ष पहले स्वतंत्र हुए देश के लिए? क्या इन सब पर गर्व नहीं होना चाहिए किसी भारतीय को? अवश्य गर्व होना चाहिए।

निजी अनुभव

इतना सब होते देखने के बाद भी मैं संतोष नहीं कर पाता। मुझे लगता है हमने जितना पाया है उससे अधिक खोया है। वैसे जो पाया और जो खोया उनके मूल्यों की तुलना करना आसान नहीं। हर व्यक्ति अपनी समझ और नजर से वस्तुस्थिति को देखेगा। क्या खोया इसका उल्लेख करने और अपनी निराशा व्यक्त करने से पहले मैं अपने दो-तीन अनुभवों की बात करता हूं:

(1) मैंने सन् 1962 में हाई-स्कूल परीक्षा पास की थी अपने गांव से 7-8 कि.मी. दूर के विद्यालय से। मुझे एक घटना की याद है जब जिले के किसी परीक्षा केन्द्र से खबर आई कि कोई छात्र वहां नकल करते पकड़ा गया। नकल का एक वाकया इलाके में खबर बन गई। नकल करने की कोई हिम्मत कर सकता है यह हम लोग तब सोचते भी नहीं थे। अब क्या है?

(2) अपने बचपन के दिनों में मैं मां-चाची आदि के वार्तालाप में इस प्रकार की बातें सुना करता था: “सुना है फलां आदमी घूस लेने लगा है।” कोई सरकारी कर्मी घूस भी लेता है यह तब खबर बन जाती थी। अब क्या है?

(3) 1972-73 की बात है जब रेल-यात्रा में मेरा बैग गुम हो गया था। उसमें हाई-स्कूल से एम.एससी. तक के प्रमाणपत्र थे। मैंने संबंधित संस्थाओं को प्रमाणपत्रों की द्वितीय प्रतियों हेतु निवेदन किया। मुझे बिना भाग-दौड़ और लेन-देन किए कुछ दिनों के अंतराल पर दस्तावेज मिल गए। मैं सोचता हूं आज वही कार्य इतना आसान न होता।

देश की वर्तमान दशा

मैं कल दोपहर एक टीवी समाचार सुन रहा था। उसमें इधर-उधर की आपराधिक घटनाओं का जिक्र था। दो-चार की बानगी पेश करता हूं:

(1) आगरा (उ.प्र.) में हिन्दू अतिवादियों ने किसी बात पर एक युवक की पिटाई कर दी थाने में ही पुलिस की मौजूदगी में।

(2) मेरठ (उ.प्र.) में किसी एसयूवी कार से आल्टो कार टकराई और एसयूवी के सशस्त्र सवारों ने दूसरी कार के दोनों सवारों की तबियत से पिटाई तो की ही, फिर अपनी कार में बिठाकर अज्ञात जगह ले भागे।

(3) मुरादाबाद (उ.प्र.) में उपद्रवी कांवड़ियों द्वारा सड़क पर किसी बात पर उत्पात मचाने की घटना का भी समाचार टीवी पर सुना।

(4) उन्नाव (उ.प्र.) में एक-तरफा प्यार में पागल शादीशुदा एक युवक ने युवती की मौजूदगी में ही उसके ब्यूटी पार्लर में तोड़फोड़ कर दी।

(5) ग्रेटर नॉयडा (उ.प्र.) में गुंडे-बदमाशों की गोली का शिकार हुआ एक व्यक्ति।

(6) नवी मुम्बई (महा.) में रंगदारी वसूलने के लिए दुकान में घुसे बदमाश दुकानदार पर ताबड़तोड गोली दागकर फरार हो गये।

(7) वैशाली (बिहार) से भी ऐसी ही एक घटना सुनने को मिली।

(यह विवरण याददास्त पर आधारित है; स्थान एवं घटना के स्वरूप बताने में उलटफेर हो गया होगा।)

ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की घटनाएं पहले नहीं होती थीं। तब कभी-कभार देखने-सुनने में आती थीं, लेकिन आजकल घटनाओं की बाढ़-सी आ चुकी है।

सरकारें अपराधियों को सजा देने का दावा करती हैं; कुछ मामलों में सजा भी हो जाती है। किंतु वे यह जानने के प्रयास नहीं करती हैं कि अपराध होते ही क्यों हैं? न सरकारें न ही देश के बुद्धिजीवी ऐसे किसी अध्ययन में रुचि ले रहे हैं। लोगों में आपराधिक प्रवृत्ति न पनपे इसके प्रयास होने चाहिए कि नहीं?

इन सब बातों को देखकर मुझे निराशा होती है। मेरा मत है कि देश विकट चारित्रिक पतन के दौर से गुजर रहा है। विकास एवं आर्थिक प्रगति इस पतन की भरपाई नहीं कर सकते है। एक सभ्य, सुसंस्कृत समाज की रचना महान्‍ देश की पहचान होनी चाहिए।

     मुझे यह देख हैरानी एवं क्षोभ होता है कि देश में अनेक लोग हैं जिनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ है, अनुशासनहीनता, स्वच्छंद आचरण, कायदे-कानूनों का उल्लंघन, इत्यादि। मैंने आरंभ में बताया कि 1962 में नकल को किस नजरिए से देखा जाता था। आज सरकारी स्कूल-कालेजों के छात्र नकल को अपना अधिकार समझते हैं। इतना ही नहीं उनका साथ शिक्षक, अभिभावक, और पुलिस भी दे रही है। सरकारी शिक्षा का स्तर गिर रहा है। यही आज के डाक्टरी पेशे का है जहां अनेक डाक्टर संपन्न होने के बावजूद मरीज के प्रति सहानुभूति नहीं रखते। पुलिस बल को देखकर कई जन घबराते हैं। कोई महिला शिकायत लेकर थाने जाने में डरती है कि वहां कहीं उसी का दुष्कर्म न हो जाए। दुष्कर्म की घटानाएं दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं। राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है ऐसा क्यों कहा जा रहा है? कुछ तो सच्चाई होगी। बिहार के मुजफ़्फ़रपुर और उ.प्र. के बालिका संरक्षण गृहों की घटनाएं आज के आपराधिक मानसिकता के लोगों की देन है जिन्हें राजनेताओं एवं प्रशासन से प्रशय मिल रहा होता है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। उ.प्र. के वाराणसी एवं बस्ती और पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी के निर्माणाधीन फ़्लाई-ओवरों का गिरना इसी भ्रष्टाचार के परिणाम हैं।

     यह विषय लंबी विवेचना चाहता है जिसे इस आलेख में शामिल करना कठिन है। कुल मिलाकर मैं यही मानता हूं कि देश चारित्रिक पतन की राह पर है। – योगेन्द्र जोशी

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जाने कहां गये साइकिल के वो दिन … बनाम पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमत

जाने कहां गये वे दिन

सड़कों पर जब साइकिलें चलती थीं।

बच्चा हो या बूढ़ा या जवान

सबको साइकिलें प्यारी लगती थीं।

ठीक हाल में रहती थी हरदम

तभी स्कूल-कालेज पहुंचाती थीं।

अस्पताल जाना हो या ऑफिस

साइकिलें सबकी सवारी होती थीं।

पेट्रोल पंप पर लगे अब भीड़

तब हवा भराकर ही वो चलती थीं।

आयेंगे क्या लौट के वो दिन 

साइकिलें जब सड़क पर दिखती थीं।

पेट्रोल-डीज़ल – बढ़ती कीमतें

पिछले कुछ दिनों से पेट्रोल-डीज़ल के दाम प्रायः हर रोज बढ़ रहे हैं और देश की आम जनता बढ़ती कीमत से त्रस्त है। जिसको देखो वह इस मुद्दे पर मोदी सरकार की आलोचना कर रहा है। सरकार कहती कि अंताराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और देश की तेल कंपनियां उसी से मेल खाती कीमतें तय कर रही है। अब खबर यह है कि दाम कुछ घट रहे हैं  कहा यह भी जा रहा है कि यदि पेट्रोल-डीज़ल को भी जीएसटी (GST) के दायरे लाया जाए तो कीमत घट सकती हैं। किंतु इन पर जीएसटी लगाए जाने के पक्ष में कई राज्य नहीं, कारण कि वे इस पर लगे टैक्स से राज्य की कमाई करती हैं। कहा जाता है कि अपने देश में इन पर भांति-भांति के टैक्स भी बहुत हैं जिससे उनके दाम पहले से ही काफी रहे हैं।

जिस भी कारण से पेट्रोल-डीज़ल के मूल्य बढ़ रहे हों, उससे होनी वाली दिक्कत सभी महसूस कर रहे हैं। आज भौतिक प्रगति के उस मुक़ाम पर हम (मानव समाज) पहुंच चुके हैं जहां इन जीवास्म इंधनों के बिना जीवन सुचारु रूप से जीने की सोची नहीं जा सकती है। इन इंधनों पर हमारी निर्भरता समय के साथ कैसे बढ़ती गई है इस बात को समझने के लिए मैं पिछले करीब  46 वर्षों के  अपने निजी अनुभवों का जिक्र करता हूं।

निजी अनुभव

मैंने सन् 1972 में वाराणसी नगर के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) में बतौर एक शिक्षक के कार्य करना शुरू किया था। वे दिन थे जब इस नगर में पेट्रोल/डीज़ल-चालित वाहन आज की तुलना में नगण्य थे। जैसा मुझे अब याद है कि मेरे भौतिकी (फिज़िक्स) विभाग में कुल दो कारें (एक अंबेसेडर और दूसरी फ़िएट) करीब 40 शिक्षकों में से 2 के पास थीं। और शायद तीन या चार स्कूटर भी कुछ के पास थीं। विभाग में एक लेंब्रेटा, एक वेस्पा और एक फैंटाबुलस देखे की याद है मुझे। फैंटाबुलस स्कूटर का नाम कम ही लोगों ने सुना होगा और उसे कभी शायद देखा भी न हो। वह बाज़ार से बहुत पहले ही गायब हो गयी थी। अब तो स्कूटरों की जगह बाइकों ने ले ली है।

उस काल में स्कूटर खरीदना भी आसान नहीं था; कारण दो थे:

(1) पहला कारण यह कि उनकी कीमतें सामान्य संपन्नता वाले व्यक्ति के लिए भी हैसियत के बाहर होती थीं। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि तब मेरा मासिक वेतन लगभग 650 रुपये था जब कि स्कूटर की कीमत करीब 3000 रुपये होती थी। मतलब यह कि 5-6 महीने की कुल तनख्वाह बचाने पर ही मैं स्कूटर खरीद सकता था। आज विश्वविद्यालय का समकक्ष शिक्षक एक महीने के वेतन से ही बाइक/स्कूटी खरीद सकता है।

(2) दूसरा कारण वास्तव में अधिक गंभीर था। कारण यह था कि स्कूटरों-बाइकों-कारों का उत्पादन देश में बहुत कम था, शायद डेड़-दो लाख से अधिक नहीं। पैसा पास होने और शौक होने के वाबजूद लोगों को स्कूटर की उपलब्धता नहीं थी, कारों की तो बात ही छोड़िए।

वह काल था जब मेरे शहर वाराणसी में साइकिल अथवा रिक्शा से आवागमन होता था। शहर में सरकारी बस-सेवा भी उपलब्ध थी लेकिन ऑटोरिक्शा नहीं थे। जनसंख्या भी तब आज की तुलना में एक-तिहाई/एक-चौथाई रही होगी। वह समय था जब वाहनों द्वारा पैदा धूल-धुएं का प्रदूषण खास न था, न उनका शोर-शराबा था, और सड़कों पर न ही आज के जैसा जाम।

1970 के बाद माहौल बदला जिसके तहत कई प्रांतों में स्कूटरों का उत्पादन आरंभ हुआ, नीजी कंपनियों या सरकारी उद्यमों के द्वारा, जैसे उत्तर प्रदेश में तब ‘स्कूटर्ज़ इंडिया’ स्थापना हुई थी जो अब थ्री-व्हीलर वाहन बनाती है। मुझे याद आता है कि उसी दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी ने ‘मारुति’ कार का उद्योग स्थापित किया जो उनकी असामयिक मृत्यु के बाद ‘मारुति-सुजुकी’ उद्योग बना। सीमित संख्या में कारें, जैसे ‘अंबेसडर’, ‘फ़िएट, एवं शायद ‘स्टैंडर्ड’ देश में बन रही थीं, लेकिन उनकी संख्या इस विशाल देश के लिए ’अपर्याप्त’ थीं।

मेरा ख्याल है कि 1990 का दशक आते-आते देश में कार-निर्माण एवं बाइक-निर्माण उद्योग को बढ़ावा मिला। और सड़कों पर कारों-बाइकों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी।

सड़कों पर वाहनों की बढ़ती भीड़

आज स्थिति यह है कि मध्यम वर्ग के अधिकांश लोगों की आमदनी इतनी है कि वे कारें खरीद सकते हैं। इस हेतु बैंकों से भी आमदनी के अनुरूप आसान किस्तों में ऋण या कर्ज मिल जाता है। आज से 45-50 साल पहले तक कर्ज का जुगाड़ करना आसान नहीं था। लोगों की प्राथमिकताएं भी भिन्न थीं। लोग निजी मकान, बाल-बच्चों की पढ़ाई, उनकी शादी-ब्याह के लिए पैसे की बचत की अधिक सोचते थे। आजकल मध्यम वर्ग में परिवार छोटे हो गये हैं और शादी-ब्याह भी विलंब से होते हैं। प्राथमिकताएं भी बदल चुकी हैं। परिणाम यह है कि नयी पीढ़ी के युवा कार-बाइक की व्यवस्था की पहले सोचने लगे हैं और अन्य बातों की चिंता बाद करते हैं।

जहां तक बाइकों का सवाल है इसने साइकिलों की जगह ले ली है। अब समाज के अपेक्षया कमजोर तबके के लोगों के पास भी बाइक दिखने लगी है।

अमेरिका जैसे विकसित देशों में निजी वाहन एक आवश्यकता बन चुकी है। और हमारा देश भी उसी संस्कृति की ओर बढ़ रहा है। गौर करें कि अपने यहां प्रति व्यक्ति औसत आय अमेरिका की तुलना में 4-6 गुना कम है और पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें वहां से अधिक। फिर भी निजी वाहनों पर जोर अधिक है और सरकारें आर्थिक विकास पाने के चक्कर में लोगों को इस दिशा में ही प्रेरित कर रही हैं। वे साइकिलों के प्रयोग को बढ़ावा देने के बजाय बाइकों-कारों को प्रोत्साहित कर रही हैं। निजी वाहन यहां ‘झूठी’ सामाजिक प्रतिष्ठा के द्योतक बन चुके हैं।

आरंभ में मैंने अपने विश्वविद्यालयीय विभाग में कारों/स्कूटरों की नगण्य संख्या की बात कही थी। आज उस विभाग में प्रायः हर शिक्षक के पास कार है। शहर में भी धनाड्यों/नवधनाड्यों की संख्या बहुत बढ़ गई है। अतः सर्वत्र कारों की भीड़ नजर आती है। साइकिलों की जगह बाइकों ने ले ली है। जो लोग पहले साइकिलों से चलते थे वे अब साइकिल चलाना भी भूल चुके हैं और उनके घरों से साइकिलें ग़ायब हो चुकी हैं। पहले 10-15 किमी की दूरी साइकिल से तय करना आम बात थी। लेकिन अब स्कूली बच्चे साइकिल से कम ही जाते हैं और स्कूटर-बाइक-कारों से अधिक!

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि आज के लोग सुविधाभोगी तथा आरामतलब हो चुके हैं। साइकिल एवं रिक्शा आर्थिक रूप से अपेक्षया कमजोर लोगों की चीजें रह गई हैं। अपेक्षया संपन्न वर्ग के लिए आवागमन हेतु पेट्रोल-डीज़ल निहायत जरूरी उपभोक्ता वस्तुएं बन चुके हैं। इनकी कीमतों में तनिक भी उछाल आने पर या इनकी उपलब्धता कम हो जाने पर हाहाकार मच जाता है।

कोई विकल्प नहीं क्या?

हाल के दिनों में जो मूल्यवृद्धि हुई वह परोक्ष रूप से सभी को प्रभावित करती है इसे औरों की तरह मैं भी स्वीकार करता हूं। यातायात, मालढुलाई, कृषिकार्य आदि जैसे सामुदायिक महत्व के कामों की पेट्रोल-डीज़ल पर निर्भरता को नकारा नहीं जा सकता। व्यक्तिगत तौर पर शायद ही कुछ किया जा सकता है। किंतु यह सवाल तो पूछा ही जा सकता है कि हम न्यूनाधिक शारीरिक श्रम करके अपने बजट को नियंत्रित नहीं कर सकते क्या? एक-डेड़ किलोमीटर दूर जाना हो तो कार-बाइकों का सहारा न लेकर पैदल नहीं जा सकते? साइकिल का यथासंभव उपयोग क्या नहीं किया जा सकता? बच्चों को पैदल या साइकिल से स्कूल-कालेज जाने को प्रेरित नहीं कर सकते?

साइकिल चलाने के अपने लाभ हैं: (1) साइकिल खुद में सस्ता वाहन है; (2) शारीरिक श्रम का अवसर प्रदान कर स्वास्थ्य-लाभ देती है; (3) न पेट्रोल का  खर्चा और न ही रखरखाव में कठिनाई; (4) पार्किंग में कम जगह घेरती है; और (4) प्रदूषक न होने के कारण पर्यावरण के लिए हितकर।

निजी वाहनों का एक विकल्प भी है। सरकारें सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था करके भी लोगों के पेट्रोल खर्च को घटा सकती हैं। इस संदर्भ में सिंगापुर का उदाहरण दिया जा सकता है। वहां सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था उत्कृष्ट श्रेणी की बताई जाती है और खर्चीले निजी वाहन रखने की तुलना में सुविधाजनक भी है। दुर्भाग्य से हमारे यहां की व्यवस्था घटिया दर्जे की और अपर्याप्त है। यह व्यवस्था अपेक्षया कम संपन्न लोगों तक सीमित देखी गयी है। इसके प्रयोग में मिथ्या प्रतिष्ठा भी आड़े आती है।

कुल मिलाकर यह कहना चाहूंगा कि हमें सुविधाभोगी न बनकर शारीरिक श्रम की आदत डालनी चाहिए। – योगेन्द्र जोशी

 

गांधी जयन्ती (2016-10-02, शास्त्री जयन्ती भी): स्वच्छता दिवस राष्ट्र के स्तर पर

गांधी एवं शास्त्री जयंती

आज गांधी जयन्ती है, 1869 में जन्मे महात्मा यानी मोहनदास करमचंद गांधी जी का जन्म-दिवस। संयोग से आज ही का दिन पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी (जन्म 1904) का जन्मदिवस है। इस दिन का महत्व मुख्यतः गांधी जी के कारण ही है और लोग उनका किसी न किसी बहाने स्मरण कर लेते हैं। लगे हाथ शास्त्री जी को भी याद कर लेते हैं। शास्त्री जी का जन्मदिन यदि किसी और दिन होता तो शायद कम ही लोगों को उनका ध्यान आता।

गांधी जी सौभाग्यशाली थे कि उन्हें भारत की स्वतंत्रता का श्रेय पूरा-पूरा नहीं तो काफी हद तक दिया जाता है। उन्हें अहिंसा का पुजारी माना जाता है, और लोग यह धारणा कई लोगों के बीच है कि उन्होंने “खड्ग बिना ढाल” के देश को आजादी दिला दी। व्यक्तिगत स्तर पर मैं आजादी के लिए उन्हें अत्यधिक श्रेय नहीं देता। मेरा मानना है कि द्वितीय विश्वयुद्ध (सितंबर 1, 1939 से सितंबर 2, 1945 तक) के बाद ब्रिटेन (यूरोप के साथ) के हालात बिगड़ चुके थे और उसके लिए अपने सामाज्य को संभालना कठिन पड़ गया था। विगत 19वीं शताब्दी के मध्य के आगे-पीछे ही ब्रितानी शासन के अधीन के प्रायः सभी देश एक-एक कर स्वतंत्र होते गये। भारत तो वैसे ही बड़ा देश था जिसको संभालना ब्रितानी हुकूमत के लिए मुश्किल हो चुका था, विशेषतः जब देश में सर्वत्र आज़ादी-आज़ादी के नारे लग रहे थे। आज़ादी की उस मांग के माहौल के लिए अकेले गांधी जी उत्तरदायी नहीं, बल्कि अनेक जनों का उसमें योग दान था।

स्वतंत्रता के संदर्भ में गांधी जी के योगदान का आकलन भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न करेंगे ही। कुछ भी हो, गांधी जी को विश्व समुदाय ने आधुनिक काल के एक अतिविशिष्ट वक्तिव्य के धनी मानव के रूप में देखा। उनके विचारों का सर्वत्र प्रसार-प्रचार भी हुआ। कई देशों ने तो अपने खास-खास स्थानों पर उनकी प्रतिमाएं भी स्थापित कर दीं, और राष्ट्र संघ ने 2014 में तो उस दिन को विश्व अहिंसा दिवस घोषित भी कर दिया।

शास्त्री जी कदाचित देश के कुशल प्रधानमंत्री सिद्ध हुए होते, किंतु वे अपनी असामयिक मृत्यु के कारण केवल डेड़ साल (9 जून, 1964 से 11 जनवरी, 1966 तक) ही उस पद पर रह सके। पाकिस्तान के साथ 1965 में छिड़ी जंग के बाद ताशकंद में भारत-पाक शान्ति समझौते के बाद संदिग्ध हालत में उनकी मृत्यु हुई थी। उनकी मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी यह बहुतों का मानना है। अस्तु, अगर वे जीवित रहते तो शायद अधिक चर्चित रहे होते। सन् 1965 के युद्धकाल में उन्होंने “जय जवान जय किसान” का नारा दिया था। मुझे याद है जब उन्होंने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने को प्रेरित किया था। वे दिन थे जब देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था और अमेरिका से “पीएल 480 योजना” के अंतर्गत जीरानुमा गेहूं देश में आयात हो रहा था।

कहने का तात्पर्य है कि 2 अक्टूबर का दिन गांधी जी के कारण ही चर्चा का विषय रहा है। विगत गांधी जयंतियों पर मैंने अपने ब्लॉग में उनके विचारों को लेकर अपनी धारणाओं पर लेख लिखे हैं। (देखें 08-10-02, 09-10-02, 10-10-01, 13-10-0214-10-02, एवं 14-10-08 के ब्लॉग-पोस्ट।)

स्वच्छ्ता के विचार का अभाव

इस बार गांधी जयन्ती अहिंसा दिवस के तौर पर चर्चा में नहीं है, बल्कि स्वच्छता दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी ने 2014 में इसी दिन पर स्वच्छता की बात देश के सामने रखी। और इस बार इस दिन को राष्ट्र के स्तर पर स्वच्छता दिवस भी घोषित कर दिया (मैं शायद भूल नहीं कर रहा हूं)। यही इस बार मेरे लिए भी चर्चा का विषय है। तब से दो वर्ष बीत चुके हैं। उस दिशा में कुछ प्रगति जरूर हुई है, किंतु उतनी नहीं जितनी उम्मेद की जाती थी। मीडिया के माध्यम से लोगों को इस बारे में जागरूक करने की कोशशें काफी हुई, परंतु जन समुदाय प्रेरित हुआ इसमें मुझे शंका है।

मैं स्वयं से अक्सर पूछता हूं कि क्या सामाजिक सरोकार की बातों पर किसी व्यक्ति के मन में स्वयं विचार नहीं आने चाहिए? मेरे मन में स्वच्छता की बात किसी के कहने से नहीं आई बल्कि बचपन से वह मौजूद रही है। और तदनुसार मैं अपने परिवेश को यथासंभव साफ़-सुथरा रखने की कोशिश करता हूं। जब हम (मैं एवं मेरी पत्नी) जहां-तहां गंदगी देखते हैं तो बड़ी कोफ़्त होती है। हम राह चलते कुछ खाते-पीते हैं तो उसका कचरा जेब में या झोली में डाल लेते हैं, या खाना-पीना करते ही नहीं। रेल-यात्रा के दौरान फ़र्श पर कचरा न गिरे इसका ध्यान रखते हैं। कचरा इकट्ठा करके कागज आदि में लपेट कर पास में रख लेते हैं, या कूड़ेदान में डाल आते हैं। परंतु हमने देखा है कि कई लोग मूंगफली ठूंगते है तो छिलके फ़र्श पर गिराते जाते हैं। बिस्कुट का रैपर फ़र्श पर डाल देते हैं। वाश-बेसिन पर हाथ-मुंह धोते हैं तो बेसिन में ठीक-से पानी बहाकर उसे साफ नहीं रखते। टायलेट में शौच के बाद फ़्लश करके एक बार भी मुड़कर नहीं देखते कि फ़्लश हुआ भी कि नहीं। इस प्रकार के तमाम अनुभव देखने को मिलते हैं।

समझ में नहीं आता कि सफाई का खयाल क्यों नहीं आता? क्या सफाई की बात के लिए किसी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है? क्या यह ऐसा विषय है कि उच्च शिक्षा हासिल करना पड़े। मुझे सबसे बड़ा आश्चर्य तब होता है जब कोई व्यक्ति घर से गंतव्य के लिए निकलता है, और रास्ते में सड़क किनारे पेशाब करने से नहीं हिचकता है। ऐसा करते मैंने संभांत-से लगने वाले लोगों को भी देखा है। मेरे शहर वाराणसी में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने में डेड़-दो घटे से अधिक का समय नहीं लगता। ऐसे में यदि आप घर से शौच करके निकलें तो गंतव्य तक आपको पेशाब की कोई परेशानी नहीं हो सकती। तब भी वांछित अपनाकर क्यों नहीं चलता कूई? सड़क किनारे पेशाब न करनी पड़े ऐसा क्यों नहीं आता मन में? राह चलते सड़क पर जहां-तहां थूक देना आम बात है। विदेशों में लोग पेपर नैपकिन लेकर चलते है, ताकि जरूरत पड़ने पर उसमें थूककर पास के कूड़ेदान में फेंका जा सके, या जेब में रखा जा सके। क्यों ऐसा ही कोई तरीका देशवासियों को क्यों नहीं सूझता? कम से कम यह तो किया ही जा सकता है कि सड़क के किनारे घास-फूस या मिट्टी में थूका जाये। ध्यान रहे कि सड़क पर थूका गया साफ-साफ नजर आता है।

स्वच्छता-भाव बनाम सौन्दर्यबोध

मेरी धारणा है कि साफ-सफाई वास्तव में सौन्दर्य-बोध का अनन्य हिस्सा है, और आम भारतीयों में वह शायद बहुत कम है। यदि किसी को गंदगी देख बेचैनी नहीं होती, उस स्थल से भाग निकलने की उसकी इच्छा नहीं होती, अथवा तत्सदृश नकारात्मक प्रतिक्रिया उसके मन में नहीं जगती, तो उससे सफाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। चारों ओर गंदगी फैली हो ऐसे वातावरण से सांमजस्य बिठाने में बहुत से लोगों को दिक्कत नहीं होती। वे उसी वातावरण में जमीन में बैठ सकते हैं, गंदगी देखते हुए नाश्ता-पानी कर सकते हैं, इत्यादि। जब इन जनों को गंदगी खले ही नहीं तो उनसे सफाई की  उम्मीद कैसे की जा सकती है?

मेरा रोजमर्रा का अनुभव प्रमुखतया अपने शहर वाराणसी की दुर्व्यवस्था पर आधारित है। मैंने जितने भी शहर देखे हैं उनमें वाराणसी सबसे गंदा और प्रशासनिक उदासीनता का शिकार पाया है। (मैं अक्सर देश के विविध स्थलों की यात्रा कर लेता हूं।) दो वर्ष पहले जब स्वच्छता अभियान चला था तो लगा कि शहर के दिन बहुरेंगे। लेकिन कोई खास अंतर शहर में नहीं आया है। घरों से कूड़ा-उठान की व्यवस्था अवश्य है, लेकिन वह कूड़ा अक्सर सड़कों के किनारे गिरा दिया जाता है। यहां की व्यवस्था का वर्णन कर पाना मेरे लिए सरल नहीं है। शब्दों में वह बात नहीं होती जो प्रत्यक्ष दर्शन में है।

वाराणसी की गंदगी में कुछ योगदान तो आवारा गाय-सांड़ों का रहता है। यहां की गली-कूचों में कुछ लोग अपने निजी दूध के लिए अथवा उसके व्यवसाय के लिए गाय-भेंसे पालते हैं। मेरे घर के सामने की सड़क पर एक सज्जन (?) भी यह कार्य करते हैं। मेरी जानकारी के अनुसार शहर में पशु-पालन पर कोई प्रतिबंध नहीं है और न ही गंदगी फैलाने के विरुद्ध कोई कानून है। अतः यह कार्य धड़ल्ले से चलता आ रहा है। इस कार्य में सड़क पर अतिक्रमण भी होता है। अवश्य ही अतिक्रमण के विरुद्ध कानून हैं, परंतु प्रशासन में कोई देखने वाला हो तब न? साल-छः महीने में अतिक्रमण दस्ता आ भी जाये तो पशुओं को सड़क से हटा लिया जाता है और फिर बाद में स्थिति पूर्ववत। ये पशु हैं जो गोबर की गंदगी तो फैलाते ही हैं, उसके अलावा सड़क के किनारे का कूड़ा भी इधर-उधर बिखेर देते हैं।

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बीते मार्च माह में उच्च न्यायालय ने राज्य (उत्तर प्रदेश) में पॉलिथीन की थैलियों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। आरंभ में लगा था कि अब खुली जगहों पर प्लास्टिक नहीं बिखरा दिखेगा। साग-सब्जी, किराना आदि की दुकानों पर पॉलिथीन थैली का मिलना बंद हो गया। लेकिन महीना बीतते-बीतते पॉलिथीन वापस। अब पूरी तरह पहले की स्थिति है। क्या अदालत ने प्रतिबंध हटा दिया? शायद नहीं, क्योंकि अखबारों मे तद्विषयक कोई समाचार कभी नहीं छपा। मेरा ख्याल है कि प्रशासन की उदासीनता इसका कारण रहा है।

मेरे ही घर के नजदीक मुख्य मार्ग के किनारे सब्जी-सट्टी भी लगती है उसके साथ फुटकर सब्जी की दुकानें। ये लोग अपनी सड़ी-गली सब्जी सड़क पर बिखेर देते हैं न कि उसको एकत्रित रखने की व्यवस्था अपनाते हैं। यह सड़ी-गली सागसब्जी ऊपर बताये आवारा पशुओं का आहार होता है, किंतु गंदगी तो हो ही जाती है। साग-सब्जी की दुकानें शहर में सड़क पर यत्र-तत्र अतिक्रमण करके लगी रहती हैं और गंदगी के स्रोत बने रहते हैं। वाराणसी में तम्बाकूदार पान का बहुत चलन है। लोग पान खाकर कहीं भी पीक थूक देते है। वाहनों में बैठे हुए भी थूकते हैं। और तो और, कार में बैठे जन भी चलते हुए उसका द्वार खोलकर पीक थूकते हैं, किसी की परवाह किए बगैर। कहने का मतलब यह है कि किसी को सद्विचार नहीं सूझते; बस जिसको जो सुविधा हो वह करता है।

वाराणसी की जैसी विकट स्थिति और नगरों की नहीं होगी, लेकिन गंदगी सभी जगह देखने को मिलती है। हाल ही में मैं मुम्बई के पश्चिम भांडूप इलाके में 3 सप्ताह के प्रवास पर गया था। छुट्टा पशु न होने के बावजूद वहां भी खूब गंदगी देखने को मिली, खासकर जंगल-मंगल नामक सड़क पर। दिल्ली के कई इलाकों में भी मैंने गंदगी देखी है। चार साल पहले मैंने पुद्दुचेरी की यात्रा की थी। तब एक नाले के पास से गुजरने पर बदबू के साक्षात्कार हुए थे और गंदगी के भी।

दरअसल अपने देश में संसाधन आबादी के हिसाब से बहुत कम हैं। बहुत-से लोगों को शहरों में सड़क किनारे झुग्गी-झोंपड़ी में जीवन बिताना होता है। उनकी सबसे बड़ी समस्या येनकेन प्रकारेण जीवित रहने की होती है। सुबह से शाम तक जीवन-धारण के साधन जुटाने में ही जिंदगी गुजर जाती है। किसे फ़ुर्सत है कि सफाई की सोचे?

मोदी जी गांधी जी के स्वच्छता के विचार से प्रभावित रहे हैं और स्वच्छता अभियान के सिलसिले में उनका नाम लेते रहते हैं। किंतु वे भी यह भूल जाते हैं कि गांधी जी के हर विषय पर अपने स्पष्ट एवं लीक से हटकर विचार रहे हैं। गांधी जी 

(1) शारीरिक परिश्रम पर जोर देते थे, न कि मशीनों पर अधिकाधिक निर्भरता,

(2) समाज में जाति, धर्म, क्षेत्र आदि पर आधारित भेदभाव के विरुद्ध थे, किंतु स्वतंत्र भारत में ऐसा भेदभाव बढ़ रहा है,

(3) आर्थिक विषमता न्यूनतम रहे यह चाहते थे, किंतु यह विषमता दिनों-दिन बढ़ रही है,

(4) आत्मसंयम के पक्षधर थे और सत्य तथा निष्ठा पर जोर देते थे, जो आज के नेताओं और आम जनों से गायब हो रहे हैं,

(5) इसी प्रकार की अनेक बातें करते थे, लेकिन उन पर कम ही लोग ध्यान देते हैं। – योगेन्द्र जोशी

त्रिजन्मद शिशु  यानी  थ्री-पेरेंट  चाइल्ड (3-parent child) संबंधी समाचार

“त्रिजन्मद” मेरा अपना सुझाया शब्द है। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से यह कितना सही होगा इसके बारे में आश्वस्त नहीं हूं। इसके अर्थ स्पष्ट कर दूं: यह उस शिशु के लिए विशेषण है जिसके जन्म में तीन व्यक्तियों की भूमिका रही हो।

इधर दो-चार दिनों से वैज्ञानिक खोजों/आविष्कारों संबंधी समाचारों में एक यह भी है कि जॉर्डन (युर्दान) देश के एक दम्पती की संतानें जिवित नहीं रह पा रही थीं, क्योंकि महिला (मां) की “जीन-संरचना” में एक दोष प्रवेश कर चुका था। पहले चार गर्भधारणों की नियति गर्भपात में हो गयी। पांचवें मौके पर बच्ची पैदा हुई जो मस्तिष्क एवं मांसपेशियों के गंभीर “लाइ” लक्षण (Leigh Syndrome) से पीड़ित थी और छ: वर्ष तक ही जीवित रह सकी। उसके बाद बेटे का जन्म हुआ और वह भी उसी रोग से पीड़ित होकर शैशवावस्था में ही चल बसा। जांच से पता चला कि महिला के डिम्बों में मौजूद “माइटोकॉंड्रिया” नामक जैविक इकाइयां दूषित हो चुकी हैं।

उक्त दम्पती ने समस्या के निराकरण के लिए अमेरिकी शहर न्यूयॉर्क के न्यू होप फ़र्टिलिटी सेंटर के चिकित्सक जॉन झांग (John Zhang) से संपर्क किया। डा. झांग ने एक विधि अपनाई जिससे वह एक स्वस्थ बच्चे की मां बन सकी। उसी से जुड़ी जानकारी यहां प्रस्तुत है। अधिक विवरण ब्रितानी विज्ञान पत्रिका “न्यू साइंटिस्ट”  में छपे लेख से अथवा अन्य स्रोतों से मिल सकती है।

जीवधारियों का शरीर जैविक कोशिकाओं (सेल) से बना होता है जिसका ढांचा और जिसमें घटित होने वाली प्रक्रियाएं काफी जटिल होती हैं। मोटे तौर पर कहा जाये तो सेल का बाहरी आवरण एक झिल्ली (मेम्ब्रेन) से बना होता है जिसके भीतर अपेक्षया छोटा नाभिक (न्यूक्लियस) रहता है जो द्रव पदार्थ (साइटोप्लाज़्म – पानी और उसमें मौजूद प्रोटीन तथा अन्य जैविक तत्व) में तैरता रहता है। इसी द्रव में माइटोकोंड्रिया नामक इकाइयां होती हैं जिन्हें सेल का पॉवर हाउस कहा जाता है। सेल के कार्य और विकास के लिए वांछित ऊर्जा का नियंत्रण यही इकाइयां करती हैं। (देखें साथ का चित्र।)

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जीवों की भ्रूण रचना में मादा के डिम्ब और नर के शुक्राणु की भूमिका रहती है। डिम्ब स्वयं में एक मादा के जैविक सेल के माफिक होता है किंतु जिसका नाभिक सामान्य सेल का एक प्रकार से आधा होता है। इसी प्रकार नर का शुक्राणु उसके सेल का नाभिक भर होता है किंतु एक प्रकार से मात्र उसका आधा। निषेचन (फ़र्टिलाइज़ेशन) की प्रक्रिया में शुक्राणु डिम्ब में प्रवेश करके उसके नाभिक के साथ मिल कर उसे पूर्ण बना देता है। यही नाभिक है जिसमें मादा और नर के गुण मिश्रित रहते हैं। इस प्रकार बने नये जैविक सेल की प्रक्रियाएं उन्हीं माइटोकॉंड्रिया से नियंत्रित होती हैं जो मादा के डिम्ब से आये हुए होते हैं। ऐसा जैविक सेल जब भ्रूण की शेष प्रक्रिया से गुजरता है तो उसमें मादा (मां) और नर (पिता) के गुण नाभिक के माध्यम से मिलते हैं किन्तु उसके विकास की प्रक्रिया उस माइटोकॉंड्रिया से नियंत्रित होती है जो शुद्ध रूप से मादा से प्राप्त होता है। इस इकाई में अगर दोष हो तो उसके परिणाम संतान में दिखाई देंगे। इस प्रकार मां ऐसे दोषों की वाहक होती है।

न्यू साइंटिस्ट के जिस लेख का ऊपर उल्लेख किया गया है उसमें जॉर्डन के एक दंपति के नवजात बच्चे के जनमने के लिए अपनाई गयी विधि का व्योरा है जिसके मां के माइटोकॉंड्रिया में अज्ञात कारणों से दोष आ चुका था और उसकी पहले की संतानें जीवित नहीं रह सकीं। इसकी प्रबल संभावना थी कि आगे की संतानें भी जीवित नहीं रहेंगी। अमेरिकी चिकित्सक जॉन झांग ने मेक्सिको देश में जाकर संबंधित प्रयोग किया, क्योंकि अमेरिका में उस विधि का प्रयोग वर्जित है। मेक्सिको के तत्संबंधित नियम शिथिल हैं। भावी मां के डिम्ब से उसका नाभिक निकाला गया (अनुसंधान प्रयोगशाला में)। उसे किसी अन्य महिला के डिम्ब के नाभिक के स्थान पर स्थापित कर दिया गया। डिम्ब में विद्यमान अन्य पदार्थ यथावत बने रहे। इस प्रकार ऐसा डिम्ब तैयार किया गया जिसका नाभिक मां का था लेकिन दोषहीन माइटोकॉंड्रिया अन्य महिला का था। फिर इसका निषेचन पिता के शुक्राणु से किया गया और निषेचित कोशिका, जिसे अब भ्रूण कहा जायेगा, को मां के गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया। प्रयोगशाला में डिम्ब के निषेचन प्रक्रिया को संपन्न करना वैज्ञानिक भाषा में “इन-वीट्रो” निषेचन (in vitro fertilization) कहा जाता है।

समुचित अंतराल के बाद मां ने स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया जो अब पांच माह का है।

चूंकि उस बच्चे की उत्पत्ति के लिए आवश्यक भ्रूण के लिये शुक्राणु पिता से लिए गये, डिम्ब-नाभिक मां से तथा माइटोकॉंड्रिया अन्य महिला से अतः उसके तीन जनक माने गये। तदनुसार उसे “थ्री-पेरेंट चाइल्ड” कहा गया है। – योगेन्द्र जोशी

गोरक्षा का सच: सड़कों पर आवारा गायें और सांड़ गोरक्षकों को नजर क्यों नहीं आते?

मुझे अपनी किशोरावस्था के दिन याद हैं जब मेरे पिताजी ने गांव में गाय पाल रखी थी। चूंकि मेरी मां की पहले ही इहलोकलीला समाप्त हो चुकी थी, अतः गाय की देखभाल, दाना-पानी और दूध दुहने आदि के प्रायः सभी कार्य वे अकेले स्वयं ही करते थे। घर पर हम बच्चे यथासंभव उनका हाथ बंटा देते थे। उत्तराखंड के मेरे उस पहाड़ी गांव में गाय-बैलों की उस काल में काफी अहमियत थी, क्योंकि वे दूध के स्त्रोत के अतिरिक्त कृषि-कार्यों के लिए भी आवश्यक होते थे। उनके गोबर-मूत्र से बने खाद का प्रयोग खेतों में होता था। उस काल में हम रासायनिक खाद से अनभिज्ञ थे। हां, तो मैं बता रहा था कि मेरे पिताजी गाय दुहने का कार्य स्वयं करते थे। उन्होंने नियम बना रखा था कि गाय के थन से उतरने वाला आधा दूध उसके बच्चे – बछिया हो या बछड़ा – को मिले। प्रचलित परंपरा के अनुसार हम लोग बच्चा जनने के २२ दिनों तक गाय का दूध प्रयोग में नहीं लेते थे। उस अंतराल में गाय का बच्चा भरपूर दूध पा जाता था। बाद में आधा दूध उसका और आधा हमारा। उसको घास तथा खाद्य वनस्पति की मुलायम पत्तियां खाना सिखाया जाता था। वह भी एक समय था जब गायें या बैल बूढ़े होने पर भी पलते रहते थे। वे तब भी पूरी तरह निरुपयोगी नहीं होते थे क्योंकि उनका गोबर-मूत्र खाद के काम आता था। उन्हें छोड़ना चाहे कोई तो कहां छोड़ा जाता? छुट्टा छोड़ने का मतलब खेत चरने की छूट। (आवारा छोड़े गये पालतू पशुओं को वाराणसी में छुट्टा कहा जाता है।) मेरे पिताजी तो धार्मिक प्रवृत्ति के थे इसलिए गाय की सेवा कर्तव्य मानते थे। वे तो कुछएक शारीरिक व्याधियों के निराकरण हेतु भी पंचगव्य के सेवन में आस्था रखते थे।

     यह बात कोई पचास-पचपन वर्ष पहले की है। अब न मेरे पिताजी इस लोक में  रह गये हैं और न वे गायें और न ही मैं अब गांव में हूं। किंतु गाय-बैलों की उपयोगिता तो वहां अभी भी है, क्योंकि पर्वतीय क्षेत्र के सीड़ीनुमा खेतों के लिए ट्रक्टर जैसे साधनों की व्यवस्था एवं उपयोग सामान्यतः संभव नहीं।

गोपालकों की गली सुन्दरपुर वाराणसी

 

 

 

 

 

 

वाराणसी में छुट्टा/आवारा गायें 

अब मैं आज के शहरों के गोवंश की बाबत अपने अनुभव की बात करता हूं। मेरा अनुभव मुख्यतया अपनी तथाकथित धार्मिक नगरी (वस्तुत: धर्म के नाम पर पाखंड में अनुरक्त) वाराणसी से जुड़ा है। फिर भी यह कह सकता हूं आवारा या छुट्टा गायों और सांड़ों को मैंने कई शहरों में देखा है और उन शहरों की स्थिति वाराणसी से परिमाणात्मक स्तर पर बेहतर हो सकती है किंतु गुणात्मक स्तर पर नहीं। निश्चय ही वाराणसी की स्थिति अत्यंत दयनीय है।

जहां तक आवारा जानवरों का सवाल है उसमें गायें एवं साड़ों के अतिरिक्त अन्य पालतू पशु भी देखने को मिल जाते हैं, जैसे सुअर, बकरे, गधे तथा खच्चर। आवारा कुत्तों को भी उसमें शामिल कर सकते हैं। इसके अलावा वाराणसी के कई मोहल्लों में और मंदिरों के आसपास बंदरों की फौज़ के दर्शन भी आपको हो जायेंगे। इन सबका कोई इलाज मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में होने से रहा; किसी को भी इस दुर्व्यवस्था से परहेज नहीं।

भारतीयों की खासियत यही है कि अवांछित वस्तुस्थिति से कैसे सामंजस्य बिठाएं इसे वे जन्म के तुरंत बाद ही सीख जाते हैं। जिंदगी ऐसे ही चलते रहनी है।

     जहां तक गायों और साड़ों की बात है मैं बताता हूं वे कहां से आ टपकते हैं। दरअसल इस शहर के गली-कूचों में कई लोग गायें पालते हैं। कुछ ने ताजा एवं “शुद्ध” दूध के लिए निजी तौर पर एक या कभी दो गायें पाल रखी हैं। इसके अलावा कुछ का गोपालन करके दूध का कारोबार करना रोजी-रोटी का साधन है। ऐसे अधिकांश जनों ने अपने पुस्तैनी मकान को और उससे लगे गली-कूचे को ही इस कार्य हेतु प्रयोग में लिया है। इसके लिए कोई पक्का ढांचा गली में खड़ा नहीं करना पड़ता है। इसे आप अतिक्रमण कहेंगे या नहीं मैं नहीं जानता। किंतु प्रशासनिक तंत्र इस व्यवस्था को निर्लिप्त भाव से देखता है। यह भी सच है कि इन लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की कल्पना भी प्रशासन नहीं कर सकता। यों पिछले बीस-बाइस सालों से मैं वाराणसी में नये-नये आने वाले सक्षम (कानूनन सक्षम लेकिन व्यवहार में अक्षम!) अधिकारियों को सुनते आ रहा हूं कि शहर के किसी कोने में गोशालाएं स्थापित की जायेंगी। आज तक उस दिशा में कभी कोई प्रयास किया गया होगा ऐसा मैं नहीं समझता। अधिकारी दो-तीन वर्ष यहां की हवा में घुल चुके भांग के प्रभाव में रहते हैं, फिर चले जाते हैं।

इन गोपालकों में कुछ ऐसे होते हैं जो प्रातःकाल गाय दुहने के बाद उसे दिन भर के लिए छोड़ देते हैं। वह गाय सड़कों के किनारे की घास चरती है और सड़क के किनारे खुले में पड़े कूड़े-कचरे में कहीं कोई खाद्य सामग्री मिल जाये तो उसे भी खा जाती है। ऐसा खाद्य अक्सर पोलिथीन की थैलियों में रखकर लोग कूड़े में डाल देते हैं। खाद्य को खाते-खाते वह कभी-कभार पोलिथीन ही को निगल जाती है। मैं समझता हूं पोलिथीन खाने के मामले बहुत नहीं होते होंगे। अगर होते तो गायें और सांड़ आये दिन मर रहे होते। मैंने तो २-४ वर्षों तक इन जानवरों को सड़कों पर जीवित देखा है। सड़क पर विचरण करने वाली गाय संध्याकाल को अपने मालिक के पास लौट आती हैं। स्पष्ट है उसे पालने में गोपालक को कम मेहनत पड़ती है।

समस्या तब गंभीर हो जाती है जब ये गायें बच्चे जनने की उम्र पार कर जाती हैं और दुधारू नहीं रह जाती हैं। गोपालक गोसेवक तो होते नहीं कि वे बूढ़े माता-पिता की भांति इन्हें पालें। उनका उद्देश्य तो उनसे दूध पाना होता है जिसे एक प्रकार से गोशोषण कहा जा सकता है। क्यों, यह भी मैं बताऊंगा। अशक्त तथा निरुपयोगी हो चुकीं इन गायों को छोड़ दिया जाता। बेघरबार इंसान की तरह इनका ठिकाना सड़कें हो जाती हैं। दुधारु अवस्था में इन्हें चारा भी मिल जाता था; वह अब कहां से इन्हें नसीब हो? ये हैं गायें जो सड़कों पर इधर-उधर घूमती फ़िरती हैं। जो कुछ भी सड़क में मिल जाये उसे खा लेती हैं। इनके गोबर को देखकर पता चलता है कि उसमें घास का अंश नाममात्र ही होता है। मेरे घर के प्रवेशद्वार (गेट) पर कभी-कभी कोई गाय गोबर कर जाती है। जब मैं उसे साफ करता हूं तो देखता हूं कि वह इंसान के मल के समान बदबू करता है। जिस गोबर से मैं बचपन से वाकिफ़ रहा हूं उस जैसा तो वह हरगिज नहीं होता है। पहले ही उम्र खा चुकी ऐसी गायें अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहतीं। मैंने ऐसी ही एक गाय की व्यथा लघुकथा के रूप में अपने अन्य चिट्ठा-आलेख में लिखी है। (देखें: कभी दुधारू रह चुकी उस बूढ़ी गाय की व्यथा)

http://jindageebasyaheehai.wordpress.com/2014/09/06/

वाराणसी में आवारा सांड़

अब आइये अपनी नगरी की गलियों-सड़कों पर विचरण करते सांड़ों की बात पर। हिन्दी में एक कहावत है: “रांड़, सांड़, सीढ़ी औ’ सन्यासी, इनसे बचे सो सेवे काशी।” अर्थात्  सांड़ों की उपस्थिति इस नगरी में कोई नई बात नहीं। पहले वे कहां से आते थे मैं नहीं कह सकता, किंतु आजकल तो वे इन्हीं गोपालकों की देन हैं। होता यह है कि जब गाय बछिया जनती है तो उसे पाल लिया जाता है, क्योंकि वह दो-तीन सालों बाद दुधारू गाय बन सकती है। परंतु जब वह बछड़ा जनती है तो उसका क्या किया जाये? वह बैल बन सकता है। शहरों में किसे जरूरत है बैलों की? अब तो उनकी जरूरत गांवों में भी नहीं रह गयी; उनकी जगह ट्रैक्टर ले चुके हैं। इसलिए नवजात बछड़ा अवांछित होता है। फिर भी कुछ दिनों तक उसे भी पाला ही जाता है ताकि उसकी मौजूदगी से गाय दुहने में आसानी हो। गोपालक उसे यथासंभव कम दूध पीने देते हैं और जैसे ही गाय के थन से दूध उतरने लगता है उसे हटा दिया जाता है। गोपालक गाय को उससे दूर करना शुरू करते हैं और कालान्तर में वह बिना बछड़े के दूध देने लगती है। अपर्याप्त भोजन पाने वाला ऐसा बछड़ा अक्सर कुछ दिनों में मौत का शिकार हो जाता है। यदि वह नहीं मरता है तो उसे सड़क पर छोड़ दिया जाता है। उसकी किस्मत ठीक हुई तो सड़क किनारे की घास तथा अन्य चीजें खाकर जिन्दा रह जाता है और बाद के काल में सांड़ के तौर पर जीवित रहता है। अन्यथा वह भूख अथवा दुर्घटना का शिकार होकर परलोक सिधार जाता है।

तो यह है हमारे गोपालकों/गोसेवकों/गोशोषकों का सच।

     मेरे देशवासी, विशेषतः हिन्दू जन, इस तथ्य को स्वीकारने से कतराते हैं कि हम आडंबरों के साथ जीने के आदी हैं।  हमारी कथनी में आदर्श की खूब बातें होती हैं परन्तु करनी में हम वस्तुस्थिति का भरपूर शोषण करते हैं। गोसेवा एक ढकोसले से भिन्न नहीं है। कुछ ही लोग अपवाद होंगे जो इस कार्य को ईमानदारी से करते हों। – योगेन्द्र जोशी

असहिष्णुता पर निरर्थक बहस

अहिष्णुता मानव समाज के लिए कोई नयी बात नहीं है। यह तो मानव स्वभाव का अपरिहार्य हिस्सा रही है। कोई समाज और कोई काल नहीं रहा जब असहिष्णूता नहीं रही है। उसके स्वरूप और मात्रा में अवश्य ही उतार-चढ़ाव होते रहे हैं। हमारे पौराणिक ग्रंथों में राक्षसों का जिक्र मिलता है जो उसी असहिष्णुता का द्योतक है। सभ्य समाज में इस पर काफी हद तक आत्मनियंत्रण रखते आये हैं लोग। फिर भी कुछ अपवाद बने गिने-चुने लोगों की दूसरे लोगों के प्रति घृणा असहिष्णुता के रूप में यदा-कदा प्रदर्शित हो ही जाती है। जिस देश में 120-25 करोड़ लोग रहते हों वहां ऐसे सिरफिरे हजारों में हों तो आश्चर्य नहीं।

इधर अहिष्णुता की बात जिस तरह की जा रही है वह हैरान करने वाली है, गोया कि उसमें अप्रत्याशित तौर पर इजाफा हो गया हो। कितनी नयी घटनाएं हो गयी हैं कि कहा जाये कि ऐसा अनर्थ पहले से नहीं होता आया है? बेमतलब की इस बहस में लोगों को कूदते देख मुझे समझ नहीं आता कि ये बुद्धिजीवी हैं या उधमी जन।

मुझे अब, इन दो-चार दिनों में, लगने लगा है कि मोदी – मेरी दृष्टि में बेचारे मोदी – को निशाना बना रहे हैं ये सब, मानो कि सब मोदी ही करवा रहा है। दोष देना ही है तो राज्य सरकारों को भी दोष क्यों नहीं देते जहां वारदातें होती हैं? गुजरात में हुई 2002 की घटना ने बेचारे मोदी को ऐसा बदनाम कर दिया कि अब वे ही हर असामाजिक घटना के लिए जिम्मेदार माने जा रहे हैं।

ठीक है; पर मोदी से क्या उम्मीद कर रहे हैं ये लोग? साफ-साफ बतायें कि मोदी ऐसी बातों पर नियंत्रण कैसे करें? क्या वे रोज चीखते हुए कहें कि बस अब ये सब बंद करो? क्या आपराधिक सोच वाले को उपदेश देकर रोका जा सकता है? इस देश में तो ऐसे उपदेशकों की सदा से भरमार रही है, फिर भी क्या लोग सुधर पाये हैं?

आप अपराध कर चुके व्यक्ति को सजा दे सकते है, किंतु उस व्यक्ति को कैसे रोक सकते हैं जो मन में अपराध का इरादा पाले बैठा हो – मंशा जो उजागर न हुई हो? क्या आप मानव-बम बनने को तैयार व्यक्ति को अपना इरादा छोड़ने को कह सकते हैं? इस देश से आईएसआईएस में शामिल होने गये युवाओं को अग्रिम तौर पर पहचान सके आप?

मुझे लगने लगा है कि कुछ बुद्धिजीवी मोदीफोबिया से ग्रस्त हैं और उन्हें केवल मोदी और उनकी टीम के लोगों में ही दोष दिखते हैं। मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले एक लेखक ने कह दिया था कि मोदी प्र.मं. बने तो वे देश छोड़ देंगे। दुराग्रह से पीड़ित व्यक्ति के बोल सहिष्णुता के द्योतक हैं क्या? क्या यह माना जाये कि वे सब विकृत सोच के लोग थे जिन्होंने मोदी को कुर्सी पर पहुंचाया, और यह कि केवल उक्त लेखक महोदय ऐसी विद्वता रखते थे कि किसी की योग्यता का आकलन केवल वही सही-सही कर सक्ते हैं? बाद में वे बोले कि वे भावुकतावश वह सब कह बैठे। क्या असहिष्णुता की जोर-शोर से की जा रही बात भी उसी भावुकता का द्योतक नहीं हो सकता? क्या जो बातें कही जा रही  हैं वे वस्तुनिष्ठ है या महज वैयक्तिक भावुकताजनित?

इन लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि आये दिन देश में तमाम असामाजिक घटनाएं होती आ रही हैं। कही कोई किसी का कत्ल कर दे रहा है शत्रुतावश या लूटपाट या रंगदारी में, कहीं अपहरण की घटनाएं हो रही हैं, आये दिन स्त्रीजाति का दुष्कर्म हो रहा है, कहीं पुलिस ज्यादती में लोग प्राण खो रहे हैं, कहीं कोई दबंग कमजोर को दबा रहा है, राह चलते छोटी-मोटी बात पर ही लोगों की जान ले ली जा रही है, आदि-आदि। लेकिन ये सब घटनाएं उनको सह्य नजर आती हैं; किंतु दो-तीन अन्य अप्रिय घटनाएं हो गयीं तो देश असहिष्णु हो गया। कमाल करते हैं ये बुद्धिजीवी।

और समाचार माध्यमों का रवैया देखिए कि किसी घटना की चर्चा घंटों या दिनों तक होती है और किसी घटना का जिक्र तक नहीं होता है। लगता है कि वे चुन-चुन कर जनता के सामने पेश करते हैं घटनाओं को। ऐसी पत्रकारिता को निष्पक्ष कहें क्या? पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर तो पेड-न्यूज़ का आरोप भी लगता आया है। देश के सामने जो गंभीर समस्याएं हैं उन पर चर्चा क्यों नहीं करते हैं ये लोग? पेरिस में जलवायु परिवर्तन पर बहस हो रही है। यह विश्व के समक्ष गंभीर समस्या है। इस मुद्दे पर अच्छी-खासी कारगर बहस क्यों नहीं हो रही है? मुद्दे एक नहीं अनेक मिलेंगे, पर सनसनीखेज समाचार नहीं बनेंगे। मीडिया उनमें दिलचस्पी नहीं लेता है।

जब कोई बात हिन्दुओं की मान्यताओं के विरुद्ध की जाये तो उसे चुपचाप सुन लिया जाना चाहिए ऐसा सहिष्णुता के पक्षधर मानते हैं; किंतु जब अन्य धर्मावलंबियों के मान्यताओं के विरुद्ध हो तो उसे बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए।

देश के सामने अनेकों गंभीर समस्याएं मुंह बांये खड़ी हैं, यथा अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि, करोड़ों लोगों की गरीबी, 45-50% बच्चों का कुपोषण, बदहाल सरकारी स्कूल, अस्पताल जहां गरीबों को इलाज नसीब नहीं होता, आदि-आदि। बुद्धिजीवियों को इन पर बहस करनी चाहिए और उसके लिए अभियान छेड़ना चाहिए। किंतु उनका पेट तो भरा रहता है। उन्हें इन समस्याओं से नहीं जूझना पड़ता है, उनके काम तो हो ही जाते हैं। उनकी समस्या केवल असुरक्षा है जिसका सामना उन्हें करना पड़ सकता है। लगता है कि मामला निहित स्वार्थ से प्रेरित है।

कुछ भी हो वे बतायें कि अगर वे मोदी की जगह होते तो कौन-सा जादुई डंडा घुमाते कि सर्वत्र सहिष्णुता का राज हो जाता? अच्छा होगा कि वे उस रास्ते की सलाह मोदी को दें जिसे वे खुद अपनाते। सुस्पष्ट कार्ययोजना की प्रस्तुति होनी चाहिए। कोई अपराध न कर सके यह कैसे हो यह स्पष्ट बताया जाना चाहिए । महज ये नहीं होना चाहिए, वह होना चाहिए जैसी बातों से काम नहीं चलेगा। – योगेन्द्र जोशी

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शिक्षक दिवस (5 सितंबर): शिक्षा के गिरते स्तर और समाज में व्याप्त दायित्वहीनता पर टिप्पणी

आज शिक्षक दिवस है, 5 सितंबर, भारत के दूसरे राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन । देश के शिक्षकों के प्रति अभिनंदन एवं शुभाकांक्षाएं।

डा. राधाकृष्णन  मूलतः एक शिक्षक थे, ‘बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी’ के दर्शन विभाग में कार्यरत प्रोफेसर, जो बाद में उस संस्था के कुलपति (वाइस-चांसलर) भी रहे । इस दिवस को शिक्षक दिवस कहे जाने का यही औचित्य रहा है ।

‘बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी’ को लोग संक्षेप में बी.एच.यू. के नाम से जानते हैं । कम ही लोगों को मालूम होगा कि हिन्दी में इसे ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय’ नाम दिया गया है ।

संयोग से मैं उक्त विश्वविद्यालय के भौतिकी (फिजिक्स) विभाग में शिक्षक (संप्रति सेवानिवृत्त) रह चुका हूं ।

आज ही मेरी नजर पूर्वाह्न में शिक्षक दिवस के उपलक्ष पर आयोजित और दूरदर्शन टेलीविजन चैनल पर प्रसारित हो रहे एक कार्यक्रम पर पड़ी । प्रसंग में संकेत देश के मौजूदा प्रधानमंत्री के छात्र-छात्राओं के साथ हो रहे वार्तालाप भी था । उसी प्रसारण ने मुझे अपने ब्लाग पर इस दिवस की अर्थवत्ता पर अपने विचार लिखने को प्रेरित किया ।

जब भी शिक्षा पर बहस होती है तो जानकार लोग ऊंची-ऊंची आदर्शमूलक बातें कहने में देरी नहीं करते हैं । अधिकांश विशेषज्ञ मानते है कि प्राथमिक शिक्षा बच्चों की क्षेत्रीय भाषा (जो प्रायः राज्य की भाषा और बहुधा मातृभाषा होती है) में होनी चाहिए । इस विषय पर सर्वाधिक विस्तृत अध्ययन 1964-66 के ‘कोठारी कमिशन’  ने किया जिसमें अंताराट्रीय विशेषज्ञ भी शामिल थे । आयोग (कमिशन) की प्रमुख अनुशंसाओं में से एक थी कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दी जानी चाहिए । उसके बाद शिक्षा में जितने भी आयोग बिठाए गये उन सभी ने मातृभाषा के महत्व को रेखांकित किया है । लेकिन आज तक हुआ क्या है ?

स्तरीय शिक्षा तो अंगरेजी में ही संभव है यह धारणा दिनबदिन बलवती होती जा रही है । जिस अंगरेजी से मुक्त होने का संकल्प देश ने आरंभ में लिया था आज वही अपरिहार्य माने जानी लगी है । देश की सार्वजनिक तथा नागरिकों की वेयक्तिक प्रगति का माध्यम अब अंगरेजी को ही मान लिया गया है । देश में लगभग समस्त कार्य-व्यापार अंगरेजी में ही हो रहा है, भले ही अंगरेजी अभी तक जनभाषा नहीं बन पाई हो । भारतीय भाषाएं अंगरेजी के सापेक्ष हासिए पर खिसकती जा रही हैं और उनकी अहमियत बोलचाल तक सिमट रही है । क्यों है ऐसा ?

ऐसा नहीं कि क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा नहीं दी जा रही है । सभी राज्य सरकारों की शिक्षा व्यवस्था राज्य की भाषा को माध्यम चुनती आई है । किंतु क्या है हाल राज्य सरकारों द्वारा व्यवस्थित शिक्षा के स्तर का ? सामाजिक संस्थाओं द्वारा किए गए अध्ययन बताते हैं कि प्राइमरी पास बच्चों में से कई तो अपना नाम तक ठीक से नहीं लिख सकते । करीब 30 फीसदी बच्चे जोड़-घटाना भी नहीं जानते । सामान्य ज्ञान का हाल यह है कि छात्र देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का नाम भी नहीं बता सकते । राष्ट्रगान एवं राष्ट्रगीत की जानकारी तो कई शिक्षकों तक में नहीं पाई गई है ।

इन विद्यालयों की हालत हर दृष्टि से खस्ता है । मीडिया ऐसे विद्यालयों का उल्लेख करता है जहां कोई भवन ही नहीं; खुले में पढ़ाई होती है । तब शौचालयों का तो सवाल ही नहीं उठता । ऐसे विद्यालयों की कमी नहीं है जहां एक ही अध्यापक पांचों (पहली से पांचवीं तक) कक्षाओं को पढ़ाता है । कैसी पढ़ाई होती होगी यह सोच पाना भी मुश्किल है । जहां एकाधिक शिक्षक हैं भी तो उनमें से कुछ गायब ही रहते हैं । यह भी सुनने में आता है कि कई शिक्षक अपने वेतन का एक अंश किसी बेरोजगार को देकर उससे कक्षाकार्य करवाते हैं और स्वयं किसी और धंधे में लगे रहते हैं ।

इस शिक्षक दिवस की अहमियत क्या है ? इसे समझने के लिए मैं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) की बात करता हूं जिससे डा. राधाकृष्णन का घनिष्ट संबंध रहा हैं जैसा आरंभ में कहा गया है । वि.वि. में इस दिन प्रतिवर्ष सेवानिवृत्त होने वाले शिक्षकों का सम्मान किया जाता है । उन्हें वि.वि. के प्रेक्षागृह ‘स्वतंत्रता भवन’ में आमंत्रित किया जाता है, जहां वि.वि. के प्रति उनके योगदान की प्रशंसात्मक प्रस्तुति सेवारत शिक्षकों की उपस्थिति में किया जाता है । इसके अतिरिक्त उन्हें उत्तरीय (शाल) भेंट करके सम्मानित किया जाता है । कुछ और भी भेंट किया जाता हो तो उसकी जानकारी मुझे नहीं है । (संयोग से मुझे यह आमंत्रण पाने का सौभाग्य सेवानिवृत्ति के बाद आज तक नहीं मिला; कारण वि.वि. ही जानता होगा !) ।

इस दिन वि.वि. में कोई अन्य सार्थक कार्यक्रम शायद नहीं होते हैं । वि.वि. की शैक्षिक स्थिति, उसके उन्नयन की प्रयासों, शोध के स्तर को सुधारने के उपायों, आदि पर चर्चा होती हो यह मेरे देखने में कभी नहीं आया । चर्चा हो भी तो दूसरे दिन से वि.वि. का कामकाज पूर्ववत चलता रहता है ।

जब डा. राधाकृष्णन से जुड़े उक्त शैक्षणिक संस्था में कुछ विशेष नहीं होता है तो अन्य संस्थाओं में कितना कुछ होता होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है । प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में कुछ कार्यक्रम अवश्य होते हैं, जिनमें शिक्षक एवं छात्र सम्मिलित तौर पर भाग लेते है । इन सबसे शिक्षा की दशा-दिशा पर कोई फर्क नहीं पड़ता ।

इस बार देश के राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री ने छात्र समुदाय से रूबरू होकर अपनी बातें कहीं । मैंने पहले कभी ऐसा होते नहीं देखा । बस देश के शिक्षकों को बधाई दी जाती है और कुछ को पुरस्कृत किया जाता है । किंतु क्या राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री के कुछ कह देने से कोई फर्क पड़ सकता है ?

अपने देश में (और दुनिया में) तमाम दिवस मनाए जाते हैं । हर मौके पर भाषणबाजी के अलावा क्या होता है ? देश और विश्व में अहिंसा दिवस (2 अक्टूबर) मनाया जाता है; क्या लोगों में व्याप्त हिंसा की प्रवृत्ति घटी है ? 11 जुलाई को जनसंख्या दिवस मनाया जाता है; कितने लोग इस दिवस के नाम से जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रेरित हुए होंगे ? और कितने राजनेताओं की नींद देश की निरंतर बढ़ रही आबादी से खराब हुई होगी ? किसी के मुख पर चिंता की लकीर नहीं दिखती । इसी प्रकार पर्यावरण दिवस (5 जून) कितना सार्थक सिद्ध हुआ है ?

दिवस मनाएं या न, जो गंभीर होता है वह समाज के और स्वयं के हितों के बीच संतुलन बिठाता है, केवल इसी चिन्ता में नहीं रहता है कि कैसे अपने को मिले अवसर का वह भरपूर लाभ उठाए, वह अपना कार्य यथासंभव निष्ठापूर्वक करता रहता है ।  जिसको केवल अपने हितों से मतलब रहता है, वह स्वेच्छया दायित्व स्वीकरने के बाद भी उन्हें निभाने के छोटे रास्ते खोजता है । दुर्भाग्य से वर्तमान समाज में दूसरी श्रेणी के लोग अधिक हैं । इसी कारण शिक्षा व्यवस्था की गिरावट जिम्मेदार लोगों को खिन्न एवं उद्वेलित नहीं करती । अपने दायित्व को न निभा पाने पर उन्हें आत्मग्लानि नहीं होती ।

मेरी दृष्टि में शिक्षक दिवस उपदेश देने का दिन मात्र बनकर रह गया है । कौन नहीं जानता कि देश में शिक्षा की क्या स्थिति है ? कौन नहीं जानता है क्या किया जाना चाहिए ? क्या शिक्षकों को नहीं मालूम उनके क्या कर्तव्य हैं ? क्या शिक्षा की व्यवस्था से जुड़े प्रशासनिक अधिकारियों को नहीं मालूम कि उनके क्या दायित्व हैं ? क्या शासन चला रहे राजनेताओं को अपने राज्य की शिक्षा की दयनीय स्थिति की जानकारी नहीं रहती ? यदि नहीं तो कैसे शासक हैं वे जिनको वस्तुस्थिति का ज्ञान ही न हो ? और जानते हुए भी वह स्थिति को यथावत छोड़ देते हैं तो किससे क्या कहा जाए ? किसको दोष दिया जाये ?

इस समय अपना देश चारित्रिक संकट के दौर से गुजर रहा है । स्थिति कितनी गंभीर है इसका अंदाजा उत्तर प्रदेश एवं बिहार की शैक्षणिक हालात से लग सकता है । परीक्षाकाल में कई शैक्षणिक संस्थाओं में नकल का खेल खेला जाता है जिनकी खबर मीडिया में आती हैं । खबरें यदि सच न होतीं तो राज्य सरकारें उनका खंडन करतीं; वे ऐसा न करके जांच की बात कहकर बात टाल जाती हैं । नकल के ‘पुनीत’ कार्य में छात्र, अभिभावक, शिक्षक और पुलिस दल, सभी शामिल पाए जाते हैं । क्या ये सब इतने निरीह हैं कि उनको सही-गलत का ज्ञान ही न हो । नहीं, ऐसा नहीं होता; स्वार्थलिप्सा इस कदर छाई हुई है कि उचितानुचित का कोई अर्थ उनके लिए नहीं रह जाता है ।

जहां स्थिति इतनी तयनीय हो वहां शिक्षक दिवस का अर्थ ही क्या रह जाता है ? – योगेन्द्र जोशी

 

https://indiaversusbharat.wordpress.com/2015/09/05/