वैश्विक तापन (ग्लोबल वॉर्मिंग) बनाम हवाई परिवहन को बढ़ा

दो-चार दिन पूर्व मुझे अपने हिन्दी अखबार में एक समाचार पढ़ने को मिला। उसकी कतरन (क्लिप) की आंकिक प्रति यहां प्रस्तुत है।

ऊपरी तौर पर इस खबर पर खुश हुआ जा सकता है। अब आप उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों के बीच हवाई सफ़र कर सकते हैं। बसों या (लेट-लतीफ) ट्रेनों से घंटों की यात्रा के बदले घंटे भर में यात्रा संपन्न कर सकते हैं (बशर्ते आप संपन्न व्यक्ति हों)। इस समाचार पर भला क्या टिप्पणी कि जा सकती है? यह जरूर ध्यान में रखें कि हवाई यात्रा के लिए हवाई अड्डे तक आने-जाने का वक्त अक्सर कई घंटे का होता है। बसों/रेलगाड़ियों को दौड़ते-भागते भी पकड़ सकते हैं किंतु जहाजों के लिए समयसाध्य औपचारिकताएं भी निभानी पड़ती हैं।

लेकिन मैं इस स्थल पर हवाई यात्रा के अन्य पहलू पर बात करना चाहता हूं। दरअसल मामला जलवायु परिवर्तन या उसके जुड़े वैश्विक तापन (ग्लोबल वॉर्मिंग) से संबंधित है। आजकल इस विषय पर मीडिया में बहुत-कुछ पढ़ने-सुनने को मिल रहा है। वैज्ञानिकगण, स्वयंसेवी संस्थाएं और दुनिया की कुछ सरकारें पिछले तीन-एक दशकों से इस विषय पर अपनी चिंताएं व्यक्त करती आ रही हैं। वैश्विक तापन को कैसे रोका जाए इस पर सभी देश समय-समय पर बैठकें करते आ रहे हैं। इस समस्या के लिए कोई व्यक्ति खास कुछ नहीं कर सकता। कायदे-कानून बनाना और उनका क्रियान्वयन करना अंततोगत्वा सरकारों का ही काम  होता है। अस्तु।

हवाई परिवहन को बढ़ावा देना वैश्विक तापन को नियंत्रित करने के उपायों के विरुद्ध जाता है। इसलिए मेरा मत है कि इसे प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए। यह बात जरूर है इस तथ्य के बावजूद हवाई परिवहन दुनिया भर में बढ़ता जा रहा है। खुद अपने देश में हवाई सफर आम होता जा रहा है। एक समय था जब हवाई यात्रा की मात्र कामना ही लोग कर पाते थे और दो-दो तीन-तीन दिन ट्रेनों में बिता के अपने गंतव्य पर पहुंचते थे। तब हवाई सफ़र लोगों की आमदनी के हिसाब से बहुत महंगी होती थी। हवाए सेवाएं भी तब कम ही थीं। परंतु आजकल यह अपेक्षया सस्ती हो चुकी है। अब वाराणसी से बेंगलूरु ट्रेन से जाने के बदले हवाई जहाज से जाना बहुतों के लिए आम बात हो चुकी है।

परिवहन के अन्य साधनों की तुलना में हवाई परिवहन वैश्विक तापन बढ़ाने में कहीं अधिक प्रभावी है इस बात समझने के लिए वैश्विक तापन से मतलब क्या है यह जानना आवश्यक है। इस धरती पर मौजूद जीव-जंतुओं, वनस्पतियों, छोटे-बड़े प्राणियों के लिए पृथ्वी की सतह के ऊपर के वायुमंडल की करीब दसएक कि.मी. मोटी तह ही सीधे तौर पर अहमियत रखती है। इस तह का तापमान जीवधारियों को प्रत्यक्षतः प्रभावित करता है, जो किसी जगह दिन भर बदलता रहता है। एक दिन से दूसरे दिन, एक माह से दूसरे माह, भिन्न-भिन्न रहता है। हर वर्ष वस्तुस्थिति फिर-फिर से कमोवेश वैसी ही देखने को मिलती है। किसी स्थान के लिए वर्ष भर का औसत उस स्थान के जलवायु का एक परिचायक होता है। इस औसत वार्षिक तापमान में थोड़े-बहुत उतार चढ़ाव हम सदा से देखते आए हैं। लेकिन वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि कुलमिलाकर दो-ढाई सदियों पूर्व यूरोपीय औद्योगिक क्रांति के बाद से यह औसत तापमान बढ़ता जा रहा है। कहा जा रहा है कि तब से अब तब करीब 1.8° सेल्सियस की वृद्धि हो चुकी है और यह बढ़ते जा रहा है।

मौसम विज्ञानियों के अनुसार बढ़ रहे इस तापमान का कारण वायुमंडल में वायुमंडल में विद्यमान कार्बन-डाईऑक्साइड गैस है। ग्रीनहाउस गैसों के नाम से पुकारी जाने वाली अन्य गैसें (मुख्यतः मीथेन, नाइट्रस-ऑक्साइड, ओजोन तथा जलवास्प) और ऐरोसोल भी वायुमंडल को गर्माने की क्षमता रखती हैं। (ऐरोसोल किसी पदार्थ के हवा में तैरते हुए अतिसूक्ष्म कणों – माइक्रोमीटर से छोटे आकार के – बने होते हैं, जिसके उदाहरण कोहरा, धुंआ, और अति महीन धूलकण हैं।) ये गैसें कैसे वायुमंडल को गर्म रखती हैं इस विषय की विवेचना यहां पर संभव नहीं। यहां बस इतना ही कहना काफी है कि इन सब की जितनी अधिक मात्रा वायुमंडल में बढ़ेगी तापमान बढ़ाने में वे उतने ही कारगर होंगे। अध्ययनों से पता चलता है कि कार्बन-डाईऑक्साइड गैस की वृद्धि जिस तेजी से हो रही है उसकी तुलना में अन्य सभी की नगण्य है। इसलिए इस गैस को ही वैश्विक तापन के लिए जिम्मेदार माना गया है।

सवाल पूछा जा सकता है कि वायुमंडल में उपर्युक्त कार्बन-डाईऑक्साइड प्रदूषण – संक्षेप में कार्बन प्रदूषण – बढ़ क्यों रहा है। इसका उत्तर सरल है: खनिज इंधनों के प्रयोग से। खनिज कोयला, पेट्रोल-डीजल आदि (पेट्रोलिअम इंधन), और भूगर्भ से प्राप्य गैस खनिज अथवा जीवाश्म इंधन कहे जाते हैं। इन इंधनों के जलने से हमें वह ऊर्जा प्राप्त होती है जिससे मोटर-वाहन, डीज़ल इंजन, हवाई जहाज, बिजली घर, इत्यादि चला करते हैं। जलने की इस प्रक्रिया में कार्बन-डाईऑक्साइड पैदा होती है जो वायुमंडल में घुल जाती है। जाहिर है जिस कार्य में अधिक इंधन जलेगा उससे उतना ही अधिक कार्बन प्रदूषण होगा।

अब लौटिए हवाई परिवहन की बात पर। विभिन्न माध्यमों द्वारा परिवहन पर प्रति यात्री प्रति कि.मी. कितना कार्बन-डाईऑक्साइड प्रदूषण (संक्षेप में कार्बन प्रदूषण) पैदा होता है इसका मोटा-माटी अंदाजा यूरोपीय देशों के लिए उपलब्ध अधोलिखित आंकड़ों के आधार पर लगाया जा सकता है:

माध्यम यात्री संख्या औसतन कार्बन प्रदूषण/यात्री/कि.मी.
रेलगाड़ी          156           14 ग्राम
छोटी कार            4           42 ग्राम
बड़ी कार            4           55 ग्राम
बस           12.7           68 ग्राम
मोटरबाइक            1.2           72 ग्राम
हवाई जहाज           88          285 ग्राम
समुद्री जहाज            –          245 ग्राम

इन सांख्यिक आंकड़ों को शब्दश: नहीं लिया जाना चाहिए। और भारत जैसे देश पर तो ये लागू भी नहीं हो सकते। हम जानते हैं कि अपने देश में रेलगाड़ियां हों या बसें, यात्री प्रायः ठूंसे ही रहते हैं। इसलिए प्रति व्यक्ति प्रदूषण यूरोप की तुलना में 5-10 गुना कम ही होगा। दूसरी ओर कारों से प्रदूषण कुछ अधिक ही होगा क्योंकि यहां सड़कें सपाट और गड्ढामुक्त नहीं होतीं। यह भी ध्यान दें कि यदि कार में अकेला व्यक्ति सवार हो तब प्रति व्यक्ति प्रदूषण की मात्रा 2-3 गुना अधिक होगी।

हवाई जहाज का मामला कुछ भिन्न है। आम तौर पर ये 90% तक यात्रियों से भरे ही रहते हैं चाहे भारत हो या यूरोप-अमेरिका। इसलिए भारत पर भी ये कमोबेश लागू होंगे। एक बात स्पष्ट कर दूं कि उक्त तालिका छोटे हवाई जहाजों और कम दूरी की उड़ान के लिए हैं। बड़े जहाजों की कार्यकुशलता अपेक्षया बेहतर होती है। यह भी ज्ञातव्य है कि लंबी उड़ानों पर खर्चा कम आता है। इसलिए लंबी दूरी के लिए संबंधित आंकड़ा 100 तक नीचे जा सकता है।

उक्त तालिका से स्पष्ट है कि अपने देश में रेलगाड़ी की तुलना में कम दूरी की हवाई यात्रा पर प्रति व्यक्ति प्रति कि.मी. प्रदूषण 20-30 गुना या उससे अधिक होता है। यह बात तो सुस्पष्ट है कि हवाई यात्रा किसी अन्य साधन की तुलना में काफी अधिक प्रदूषण पैदा करता है इसलिए यह जलवायु के लिए अधिक हानिकर है। अकेले व्यक्ति का कार से आवागमन भी हानिकर ही है। इसलिए इन्हें प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए।

इस समय सारे विश्व में बढ़ते वैश्विक तापन पर चिंता व्यक्त की जा रही है और उन उपायों की खोज की जा रही है जिससे प्रदूषण नहीं भी घटे तो कम से कम बढ़े तो नहीं। ऐसी दशा में हवाई परिवहन को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए क्या, विशेषतः छोटी दूरियों के लिए? -योगेन्द्र जोशी

 

‘पिकनिक स्पाट’ बन चुके तीर्थस्थल और उत्तराखंड की आपदा

उत्तराखंड में अतिवृष्टि ने पिछले कुछ दिनों से जो तबाही मचा रखी है उससे चारधाम-यात्रियों को बचाने एवं स्थानीय नागरिकों को उबारने में कितना समय अभी लगेगा कहना मुश्किल है । वहां जो कुछ घटा उसके लिए कौन जिम्मेदार है यह सवाल जोरशोर से पूछा जा रहा है । क्या दुर्घटना रोकी जा सकती थी ? क्या जानमाल की जो हानि हुई उससे बचा जा सकता था ? ऐसे सवालों के उत्तर में कहने को मेरे पास बहुत कुछ है । अभी मैं इस बात पर ध्यान खींचना चाहता हूं कि हमारे तीर्थस्थल अब तीर्थस्थल नहीं रह गए हैं, बल्कि वे पिकनिक स्पाट बन चुके हैं । जानमाल के मौजूदा नुकसान का एक कारण उनका पिकनिक स्पाट बनना भी है ।

उत्तराखंड मेरा पुस्तैनी राज्य है, जिसके बागेश्वर जिले में मेरा गांव है जो अब निर्जन-सा हो चुका है, क्योंकि सभी रोजीरोटी के लिए बाहर निकल चुके हैं । मेरे आरंभिक कुछ वर्ष वहीं बीते हैं । वहां के जनजीवन, पहाड़ों-नदियों की प्रकृति, धूप-वर्षा-बर्फबारी, ऊबड़-खाबड़ रास्ते, आदि से मेरा बचपन से ही परिचय रहा है । मुझे वे दिन याद हैं जब वहां सड़कों का जाल नहीं बिछा था और मीलों पैदल चलकर गंतव्य तक पहुंचना होता था । बिजली कैसी होती है, टेलीफोन क्या होता है, रेडियो से क्या करते हैं, जैसे सवाल मन में उठा करते थे । उनके प्रति जिज्ञासा रहती थी परंतु उन्हें देखने का मौका अपने पास न था । परंतु देखते ही देखते वहां बहुत कुछ बदल गया, और मैं खुद उस गांव से कहीं दूर पैंसठ-वर्षीय वरिष्ठ नागरिक बन गया । जो बदलाव हुए उसकी कीमत कम नहीं रही, जिसे अब हम सभी को चुकाना है, आपदाओं को झेलकर ।

उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) में रहने के बावजूद मेरे और आसपास के गांवों के लोगों में इक्कादुक्का ही उस समय (देश की स्वतंत्रता के पहले तथा बाद के दिनों) ऐसे रहे होंगे, जिन्होंने बदरीनाथ-केदारनाथ की तीर्थयात्रा करने का साहस जुटाया होगा । मैं इतना जानता हूं कि मेरे ताऊजी ऐसे बिरले लोगों में से एक थे । तब इस यात्रा को दुर्गम माना जाता था । यात्रा के लिए हफ्ता नहीं महीना लगता था । पुण्यार्जन के प्रति उत्सुक व्यक्ति बाल-बच्चों को साथ नहीं ले जाता था, बल्कि 45-50 की आयु पा लेने और गृहस्थ जीवन के दायित्वों से कुछ हद तक मुक्त होने के बाद ही तीर्थयात्रा की सोचता था । उत्साही व्यक्ति यह मानकर चलता था कि मार्ग में उसकी सहायता कर सकने वाला शायद ही कोई मिले, बावजूद इस तथ्य के कि स्थानीय लोगों के बीच बटोहियों के आतिथ्य की परंपरा रही । लूटपाट-धोखाधड़ी की बातें अपवाद थीं; लोग धर्मभीरु होते थे । व्यक्ति इस भावना के साथ यात्रा पर निकलता था कि न लौट पाने को परिवार के सदस्य उसकी जीवन-मुक्ति के तौर पर देखेंगे ।

धार्मिक प्रवृत्ति के वही मेरे ताऊजी उससे पहले कैलास-मानसरोवर की यात्रा भी कर चुके थे; कब यह मुझे ठीक-से नहीं मालूम, शायद सन् 1949-50  की बात रही होगी, जब मैं एक-दो साल का रहा हूंगा । उन दिनों तिब्बत पर आधुनिक चीन का आधिपत्य नहीं था । उसकी सीमाएं हम लोगों के लिए खुली थीं; पासपोर्ट-वीजा जैसे दस्तावेजों को कोई जानता न था; तिब्बत के लामाओं का व्यवसाय स्थानीय लोगों के साथ चलता था । उस यात्रा पर ताऊजी धोती-स्वेटर-कोट पहने, खाने-पीने का कुछ सामान दो-एक कंबल के साथ लादे, और पांव में उन दिनों प्रचलित भूरे रंग के कैनवास के जूते पहने निकले थे, जैसा मैंने सुना है । आसपास का कोई परिचित व्यक्ति साथ था भी कि नहीं यह मुझे नहीं मालूम । न लौट पाना कदाचित् अपनी नियति हो सकती है इस भावना से वे चल दिए थे । पता नहीं कितने दिन उन्हें लगे होंगे; महीना भर तो लगा ही होगा । वह भी एक समय था जब कष्ट सहकर पुण्य कमाने की प्रबल इच्छा के साथ तीर्थयात्रा पर निकलते थे लोग ।

लेकिन अब ? तीर्थयात्रा की तत्कालीन अवधारणा आज विलुप्त हो चुकी है । आज तो सुविधाप्रद साधनों से तीर्थस्थलों तक पहुंचा जाता है । खानेपीने एवं ठहरने के पूरे इंतिजाम देखने को मिलते हैं । लोग तो सपरिवार निजी वाहन से मंदिरों के प्रवेशद्वार तक पहुंच जाते हैं । तीर्थयात्राओं के नाम पर पर्यटन उद्योग आगे बढ़ रहा है । परिणाम ? मंदिरों के इर्दगिर्द की जमीन होटल-धर्मशाला-सड़कों आदि से पट चुके हैं । दुर्गम स्थल के मंदिर-देवालय दुर्गम नहीं रहे । जहां पहुंचने की हिम्मत पहले इक्कादुक्का लोग जुटा पाते थे, वहां अब भीड़ पहुंच रही है । बरसात में उफनाती जिन नदियों को बहा ले जाने के लिए कभी केवल मिट्टी और पत्थर भर मिलते थे उनके सामने अब यात्रिकों की भीड़ और नदी के एकदम किनारे के मकान मिलते हैं । पर्वतीय क्षेत्रों में मकान एकदम नदी किनारे नहीं होते थे । जो होते भी थे उनसे नदी के बहाव में रुकावट नहीं होती थी । इतना अधिक अतिक्रमण भी तो नहीं था ! हिमालय की कमजोर पहाड़ियों पर बने राजमार्गों ने बचीखुची कसर दूर कर दी ।

जब तीर्थस्थल पिकनिक स्पाट बन चुके हों तो बेचारी नदियां करें भी क्या ? – योगेन्द्र जोशी

सोमेश्वर (उत्तराखंड) के निकट कोशी नदी किनारे पहाड़ी ढलान पर एक गांव। दोनों ओर झाड़ियों और उसके बाद खेतों के बीच नदी स्पष्ट नहीं दिख रही।

सोमेश्वर (उत्तराखंड) के निकट कोशी नदी किनारे पहाड़ी ढलान पर एक गांव। दोनों ओर झाड़ियों और उसके बाद खेतों के बीच नदी स्पष्ट नहीं दिख रही।