क्या यीशु मसीह (Jesus Christ) का जन्म २५ दिसंबर को हुआ था? शायद नहीं!

आज क्रिसमस का पर्व है, 25 दिसंबर, जिसे ईसाई समुदाय के लोग यीशु मसीह के जन्मदिन के तौर पर मनाते हैं।

     इस अवसर पर मैं सर्वप्रथम देशवासियों को, विशेष तौर पर अपने ईसाई बंधुओं को, बधाई एवं शुभेच्छाएं देना चाहता हूं।

विषय का आरंभ करने से पहले मैं यह बाताना चाहूंगा कि ईसाई धर्म जिस व्यक्ति के विचारधारा पर आधारित है उसका असल नाम यीशु (Jesus)  है। मेरा खयाल है कि यह नाम हेब्रू (Hebrew, इज़्राइलवासियों की भाषा, जिसमें यहूदियों के धर्मग्रंथ उपलब्ध हैं) के उच्चारण के अनुरूप है। ध्यान दें कि यूरोप की भाषाओं में लैटिन (Latin) अल्फाबेट J का उच्चारण अंग्रेजी के अनुरूप (यानी ) हो यह आवश्यक नहीं, जैसे जर्मन भाषा में)। ग्रीक (यूनानी) मूल के शब्द क्राइस्ट (Christ) का शब्दिक अर्थ होता है मसीह/मसीहा। यह विशेष उपाधि के तौर पर उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है जो सामन्य से कहीं ऊपर उठ चुका हो और जिसे “बचाने वाला” कहा जाये। यीशू को लोगों ने मानवता को बचाने वाले के तौर पर देखा और उन्हें मसीह का दर्जा दे दिया।

मैं सुनता आया हूं कि यीशु मसीह का असली जन्मदिन वस्तुतः किसी को भी ठीक-ठीक नहीं मालूम है। इस विषय पर विस्तार से बहुत कुछ लिखा-कहा गया है। मुझे इस बारे में “Live Science” नाम की ई-पत्रिका का एक लेख पढ़ने को मिला है –

 http://www.livescience.com/42976-when-was-jesus-born.html

मैं उसी के आधार पर अधोलिखित बातें लिख रहा हूं।

लेख कहता है कि रोमन कैथोलिक चर्च ने काफी सोच-विचार के बाद 25 दिसंबर को यीशु मसीह के जन्मदिन के तौर पर चुना था। दरअसल प्राचीन काल में जब ईसाई धर्म रोम तक पहुंचा तो धर्मप्रवर्तकों ने संघर्ष का रास्ता न चुन कर रोमन जनता को मिलमिलाप से अपने धर्म की ओर खींचना ठीक समझ। रोमन लोग (तथाकथित पैगन Pagans)  उस काल में अपने शनि देवता (Deity Saturn) के नाम पर सैटर्नालिया (Saturnalia) नाम के त्योहार को उत्तरायण (winter solstice) के मौके पर मनाते थे। धर्मप्रवर्तकों ने इसे यीशु के जन्मदिन के नाम पर मनाना आरंभ कर दिया ताकि वहां की परंपरा और ईसाई मान्यता में तालमेल बैठ सके। (अन्यथा ईसाई धर्म में शनि देवता की कोई मान्यता नहीं।) 25 दिसंबर चुनने के अन्य कारण भी कदाचित रहे होंगे।

कोई नहीं जानता कि यीशु क जन्म किस शताब्दी और तारीख पर हुआ था। विषय के जानकारों के अपने-अपने मत हैं। कुछ का मानना है कि उनका जन्म 6 से 4 बीसी (BC = before Christ) में हुआ होगा। बाइबिल की एक कथानुसार तब यूडिया (Judea ) के शासक हैरॉड (Herod) को यीशु के बेथलेहम (Bethlehem) में अपने शत्रु के रूप में पैदा होने का अंदेशा था, इसलिए उसने उस स्थान के आसपास के उस काल में पैदा हुए सभी बच्चों को मरवा डाला। (बेथलेहम यूडिया के अंदर स्थित था।) चूंकि हैरॉड स्वयं 4 बीसी में दिवंगत हो गया, अतः कथानुसार ईशु का जन्म 4 बीसी या पहले हुआ होगा, न कि शून्य बीसी में।

लेकिन इतिहासज्ञ उक्त कथा को सही नहीं मानते।

यीशु के जन्म के संदर्भ में कथा प्रचलित है कि उस समय एक नक्षत्र (बेथलेहम नक्षत्र Star of Bethlehem) आकाश मे दिखाई दिया था। लंदन की रॉयल एस्ट्रॉनॉमिकल सोशाइटी (Royal Astronomical Society) के खगोलविद कॉलिन हम्फ़्रीज़ (Colin Humphreys) का दावा है कि उक्त तारा वस्तुतः अतिमंद गति से चल रहा एक धूमकेतु रहा होगा जिसका उल्लेख चीनी खगोलविदों ने 5 बीसी में देखा था। अतः जन्मवर्ष 5 बीसी हो सकता है।

अन्य खगोलविद डेव रेनके (Dave Reneke) के अनुसार यीशु का जन्म 2 बीसी (जून 17) में हुआ होगा शुक्र तथा वृहस्पति ग्रह साथ आ गये होंगे और दोनों ने मिलकर तेज रोशनी के तारे का भ्रम पैदा किया होगा। रेनके ने कंप्यूटर माडल के आधार पर यह बात कही है।

दूसरे खगोलविदों के अनुसार इस प्रकार की घटना 7 बीसी (अक्टूबर माह) में हुई थी जब वृहस्पति एवं शनि ग्रह ने साथ-साथ आकर तेज प्रकाश के तारे का भ्रम पैदा किया।

धर्मवेत्तओं के अनुसार यीशु का जन्म वसंत ऋतु में हुआ था। बाइबिल की कथा के अनुसार यीशु के जन्म के समय गड़रिये अपनी भेड़ों को घास के मैदानों में चरा रहे थे। यह घटना जाड़ों में नहीं हो सकती है। – योगेन्द्र जोशी

शौचालय पहले या देवालय? बात-बात पर धर्म/संस्कृति के नाम पर आाहत होना

          अभी चंद रोज पहले भारत के भावी प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने एक बयान देकर हिन्दुओं को धार्मिक रूप से “आहत” कर दियाइससे पहले कांग्रेसी नेता एवं मंत्री जयराम रमेश ने भी ऐसा ही बयान दिया था । बहुत से लोग तब भी नाखुश हुए थे । लेकिन इस बार मामला कुछ लोगों को अधिक गंभीर लगा, क्योंकि मोदी कथित तौर पर कट्टर हिन्दूवादी नेता की छवि रखते हैं, अतः उनसे ऐसे बयान की उम्मीद नहीं थी । लोग भूल जाते हैं कि तरह-तरह के कभी शिष्ट तो कभी अशिष्ट बयान तो राजनेता देते ही रहते हैं । उनकी जबान पर इस स्वतंत्र “इंडिया दैट इज भारत” राष्ट्र में कोई रोक नहीं है । दरअसल कुछ और चीजें देश की जनता को मिले या न जो मुख में जो आया उसे बक देने की स्वतंत्रता तो सबको मिली ही है । क्यों न कोई इसका फायदा उठाए ? आम आदमी – मेरा मतलब “आप” पार्टी के सदस्य से नहीं है – कुछ कहे तो मीडिया उसे जनजन तक नहीं पहुंचाएगा, परंतु मोदी सरीखा व्यक्ति कुछ कहे और उसकी चर्चा न हो यह असंभव ही है ।

मोदी का बयान ठीक था या अनुचित यह कह पाना कठिन है, क्योंकि हम सब इन चीजों को अपने-अपने नजरिये से देखते हैं और “मेरे विचार ही सही हैं” का भाव रखते हैं । व्यक्तिगत तौर पर मुझे आपत्ति की कोई बात नहीं लगती, जिसके कारण हैं । लेकिन मोदी के कथित धुरविरोधी तोगड़िया बेहद नाखुश हैं । देखें बीबीसी समाचार

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131005_indiabol_ss.shtml

खबर है कि इस सिलसिले में “मानवाधिकार पार्टी” के प्रवक्ता चंद्रशेखर सिंह ने अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम, वाराणसी, की अदालत में याचिका दाखिल कर रखी है, जिसकी सुनवाई 21 अक्टूबर को होगी।

(देखें http://khabar.ibnlive.in.com/news/109403/12)

मेरी समझ में नहीं आता कि अपने देशवासी (हिंदू हों या मुस्लिम, सिख, इसाई, आदि) बात-बात पर “हमारी धार्मिक भावना आहत हुई है” का हल्ला मचाना क्यों शुरू कर देते हैं । अदालतें भी ऐसे वाद को बहस के लिए कैसे स्वीकार लेती हैं, यह जानते हुए कि अंततः कुछ निकलना नहीं है, सिवाय न्यायाधीश के समय की बरवादी के ? इतना ही नहीं मोदी के कथन के संदर्भ में कैसे कोई दावा कर सकता है कि सभी हिंदू आहत हुए हैं ? मैं भी एक हिंदू हूं और मैं मोदी का समर्थक न होते हुए भी उसके उक्त वक्तव्य का समर्थन करता हूं । दरअसल जिन दो-चार लोगों से मैंने पूछा किसी ने भी असहमति नहीं व्यक्त की । सवाल उठता है कि जो व्यक्ति आपत्ति करता है वह कैसे पूरे हिंदू समुदाय (या किसी अन्य धार्मिक समुदाय) की भावनाओं का ठेका ले लेता है ?

हिंदू समाज की विशेषता यह है कि हम जहां-तहां मंदिर खड़ा करने में बहुत दिलचस्पी लेते हैं । जो देवालय पहले से ही अस्तित्व में हैं क्या वे पर्याप्त नहीं हैं ? उससे भी अधिक अहम सवाल यह है कि हम देवी-देवताओं को देवालयों में ही क्यों खोजते हैं ? जिन के घरों में पूजाघर हैं वे भी अपने घर में स्थापित देवी-देवताओं को देवालयों में क्यों खोजते हैं ? मुझे तो यह भी समझ में नहीं आता कि लोग उसी देवता की महत्ता को अलग-अलग देवालयों में स्थापित होने पर अलग-अलग प्रकार से आंकते हैं ? लोगों को अक्सर कहते हुए सुनता हूं कि इस मंदिर के हनुमानजी यह मनोकामना पूरी करते हैं और उस मंदिर के हनुमानजी उस मनोकामना को, गोया कि हनुमानजी भी कई हों और वे अलग-अलग प्रकार से पेश आते हों । कहने का मतलब यह है कि देवी-देवतोओं की पूजा-अर्चना तो घर में भी उसी श्रद्धा से की जा सकती है जो देवालयों में संभव है । पुरातन मंदिरों का महत्व कुछ हद तक समझ में आता है, क्योंकि वे प्रायः पौराणिक कथाओं से संबद्ध होते हैं, जैसे शक्तिपीठों के देवी मंदिर अथवा द्वादश ज्योतिर्लिंग, आदि । लेकिन जो नित नये मंदिर स्थापित होते हैं उनके साथ तो ऐसी बात भी नहीं रहती ।

कहने का मतलब यह है कि देवालयों की वैसी आवश्यकता वस्तुतः नहीं है जैसी जनसुविधाओं एवं सामुदायिक संस्थाओं की यथा अस्पताल, स्कूल-कालेज एवं शौचालय । इनके संदर्भ में अपने देश की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती है । कहा जाता है कि शौचालयों के मामले में तो अपना देश कुछ अविकसित देशों से भी पीछे है । और तब कोई यदि शौचालयों की वकालत करे तो क्या गलत करता है ? हाल के वर्षों में कितने देवालय बने हैं मैं कह नहीं सकता, किंतु बनते जरूर हैं और आगे भी बनेंगे यह सत्य है । आप दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर देख लीजिए, कितना पुराना है ? कितना विशाल और भव्य है यह ? जितना खर्च इसे बनाने में लगा होगा उसमें न जाने कितनी जनसुविधाओं की व्यवस्था देश के कोने-कोने में संभव हो सकती थी । यह सही है कि यह स्वयं में पर्यटक-आकर्षण बन सकता है, किंतु यह जनसामान्य की आवश्यकता की पूर्ति नहीं करता । और इसे फिलहाल तो धार्मिक आस्था वालों के लिए तीर्थस्थल के रूप में भी नहीं देखा जा सकता है ।

यों तो उपसना स्थल अन्य धार्मिक समुदायों के भी बनते हैं, लेकिन वे जहां-जहां, जब-तब नहीं बनते रहते हैं । वे योजनावद्ध तरीके से, पर्याप्त आकार के, और स्थानीय सामुदायिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए बनते हैं । लेकिन हिंदू मंदिर कब-कहां रातोरात खड़े कर दिये जाएंगे कहना मुश्किल है । कम से कम मैं अपने शहर बनारस में यही देखता आ रहा हूं । मैंने तो यह भी महसूस किया है कि कभी-कभी इन मंदिरों की आड़ में अतिक्रमण करने में भी किसी की आस्था आहत नहीं होती है । सड़क के किनारे या खाली पड़ी जमीन पर रातोंरात एक मूर्ति रख दो, उस पर पुष्पादि चढ़ाना आंरभ कर दो, तो राह चलते अन्य जन भी फूलपत्र चढ़ाना शुरू कर देंगे । फिर उसे थोड़ा बढ़ा दो और उसके बगल में छोटा-मोटा कारोबार करना आरंभ कर दो, मंदिर को बीच-बीच में बढ़ाने का काम करो और साथ में अपना करोबार भी । इस प्रकार अतिक्रमण सफल हो जाता है । कुछ ऐसा घटित होते मैंने देखा है । इस बात को मैं एक उदाहरण से स्पष्ट करता हूं:

हाल में अपने शहर वाराणसी में प्रशासन ने अतिक्रमण हटाकर सड़कों को चौढ़ी करने का सफल अभियान छेड़ा है । दिखावटी अभियान तो कई बार पहले भी छेड़े गए, किंतु वे कभी प्रभावी नहीं रहे । इस बार वाकई गंभीरता दिखी । उसी के परिणामस्वरूप यहां के करीब 500 मीटर के लंका-नरिया सड़क का नजारा ही बदल गया । पहले जो सड़क करीब 20-22 फुट चौड़ी थी अब करीब 35-40 फुट चौढ़ी हो गई है । मुझे इस शहर में रहते 40 वर्ष से अधिक हो चुके हैं । मैं उक्त सड़क के बारे में यही सोचता था कि शहर पुराने ढर्रे का है, इसलिए यहां के हिसाब से ये सड़क बनी ही ऐसी होगी । सोचा न था कि सड़क के किनारे के मकान-दुकान तो अतिक्रमण की देन हैं । अब जाना कि सड़क के एक सिरे से दूसरे तक लगभग 15 फुट चौढ़ी पट्टी अतिक्रमित थी । असली दिलचस्प पहलू तो यह है कि चौड़ीकरण के बाद अतिक्रमित भूमि पर बने 3-4 मंदिर भी खुले में – असल में अब नये बने डिवाइडर पर या उसके निकट – नजर आने लगे । मैं एक तस्वीर प्रस्तुत कर रहा हूं ।

Mid-Road Temple-1

तस्वीर में दिखाए मंदिरनुमा ढांचे की सीध में पहले मिठाई की दुकान थी जो अब करीब 15 फुट पीछे चली गयी है । अब लगता है इस ढांचे में रखे शिवलिंग की कद्र भी करने वाला कोई नहीं । ये सभी कोई प्राचीन मंदिर नहीं हैं, बल्कि आस्था के नाम पर बनाये गये अवैधानिक ढांचे हैं । हमारी आस्था हमें अतिक्रमण से नहीं रोकती । आस्था के नाम पर प्रशासन भी इन्हें हटाने की हिम्मत नहीं करता ।

लोग चाहते हैं कि उनकी भावनाओं को अन्य जन ठेस न पहुचाएं । परंतु वे स्वयं दूसरों की भावनाओं की कद्र करना क्यों भूल जाते हैं ? वे क्यों इसे अपना अधिकार समझते हैं कि आस्था के नाम पर उन्हें हर चीज की छूट हो, भले ही उससे दूसरों को घोर असुविधा हो । मेरे शहर वाराणसी में धर्मकर्म के नाम पर आए दिन कुछ न कुछ आयोजन होते रहते हैं जिससे सड़कों पर जाम लगता है । कई मौकों पर सड़क घेरकर पूजा-पंडाल तन जाते हैं, दूसरों की परवाह किए बिना । सर्वाधिक आपत्तिजनक तो यह होता है कि लाउडस्पीकरों से शोर मचाया जाता है । मेरे घर के पास ही एक मंदिर है और उसी के सामने सड़क पार एक अस्पताल है । आये दिन मंदिर में कोई न कोई आयोजन होता है और उसके साथ लाउडस्पीकरों से कानफाड़ू शोर । सोचिए कि अस्पताल के मरीजों का क्या हाल होता होगा जहां शोर मचाना मनाही रहती है ।

आपत्तियां अनेकों हैं । हम श्रीगंगा नदी के प्रदूषण की चर्चा करते हैं और उसके नाम पर करोड़ों रुपये बरबाद भी कर चुके हैं, लेकिन उसमें गंदगी गिराने से नहीं हिचकते हैं । उसमें अधजले शव तक बहा देते हैं । नवरात्र की दुर्गा-प्रतिमाएं विसर्जित तो की ही जाती हैं, अब शहर वाराणसी में कालीपूजा, सरस्वतीपूजा, गणेशपूजा, विश्वकर्मापूजा आदि अनेकों पूजाओं के नाम पर स्थापित प्रतिमाएं भी श्रीगंगा को समर्पित की जाती हैं । और यह सब होता है आस्था के नाम पर ।

आस्था के इन तमाम खेलों पर कोई आपत्ति उठाता है, या उस पर टिप्पणी करता है तो लोग आक्रोषित हो उठते हैं । देवालयों की आवश्यकता नहीं है, हमें आवश्यकता है शौचालयों की ऐसा कहने पर तुरंत भावनाओं को ठेस पहुंचाई जा रही है का राग अलापना शुरू हो जाता है । लोगों को विवेकशील होकर विचार करना चाहिए कि हमारे जीवन की प्राथमिकताओं में क्या पहले शामिल होना चाहिए और क्या बाद में । – योगेन्द्र जोशी 

23 मार्च, ‘दि अर्थ ऑवर, यानी पृथ्वी के नाम एक घंटा: है इसकी कोई अहमियत?

आज के दिन (अंताराष्ट्रीय मौसम दिवस – International Meteorological Day) संध्याकाल विश्व में ‘अर्थ ऑवर’ मनाया जाता है । अर्थात् दुनिया के प्रायः सभी देशों में रात्रि प्रथम प्रहर 8:30 बजे से घंटे भर के लिए रोशनियां बंद कर दी जाती हैं । यह दिवस अब 9 वर्ष पुराना हो चला है ।

          क्या है इस दिवस की अहमियत? यों दावा तो यही किया जाता है कि इसके माध्यम से इस धरती के बाशिंदों को ऊर्जा की अधिकाधिक बचत करने और जीवाश्म इंधनों (कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस) पर अपनी निर्भरता घटाने का संदेश जाता है । और यह भी कि ऊर्जा के अपारंपरिक स्रोतों को व्यवहार में लिया जाना चाहिए । जहां तक नये ऊर्जा स्रोतों का प्रश्न है, इस प्रकार के प्रयास तो विभिन्न देशों में चल ही रहे हैं और उसमें सामान्यतः आम आदमी का हाथ कम ही रहता है, क्योंकि इस प्रकार के प्रयास सरकारें अथवा संस्थाएं ही सामान्यतः कर पाती हैं ।

          आम आदमी तो ऊर्जा की बचत ही कर सकता है । दूसरे शब्दों में यह दिवस आम जनों को ऊर्जा की मितव्ययिता का संदेश देता है । मेरे मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या ऐसा कोई संदेश लोगों तक वास्तव में पहुंचता भी है ? और क्या वे इस संदेश को ग्रहण करते हैं ? यह ठीक है कि आज के दिन घंटे भर के लिए घर-बाहर की रोशनी बंद कर देंगे, लेकिन क्या उसके एवज में मोमबत्ती सरीखे प्रकाश-स्रोतों का इस्तेमाल नहीं करेंगे ? क्या उतने समय फ्रिज, ए.सी., टी.वी. जैसे विद्युच्चालित उपकरण भी बंद रखेंगे ? मामला केवल रोशनी बंद रखने तक सीमित नहीं है । आपको बिजली की खपत यथासंभव कम करनी है । क्या लोग तैयार हैं ? संदेश का असल मकसद क्या वे समझ पाते हैं, उसे ग्रहण करते हैं और तदनुरूप व्यवहार करते हैं ? मुझे संदेह है कि मुद्दे के प्रति समर्पण भाव से अपनी भूमिका स्वीकारते हुए ऐसा करने का विचार कम ही लोगों के मन में उपजता होगा ।

          और असल बात तो यह है कि यह दिन केवल प्रतीकात्मक है ऊर्जा की खपत घटाने के पक्ष में । वस्तुतः यह कार्य तो चौबीसों घंटे, 365 दिन चलना चाहिए । कितने लोग हैं जो जीवन में मितव्ययिता बरतते होंगे ? घरों में अनावश्यक बिजली-बल्ब न जलें इसका खयाल कितनों को रहता है ? ए.सी. जैसे सुविधा-भोग के साधन कितने लोग नहीं चाहते हैं ? कितने लोग निजी वाहनों के प्रयोग से बचते हैं ? कितनों के मन में यह विचार आता है कि जहां तक संभव हो साइकिल जैसे साधन प्रयोग में लेने चाहिए ? कितने लोग यह जानकारी रखते हैं कि ‘स्टैंड-बाई की अवस्था में छोड़े गये उपकरणों के साथ भी बिजली की खपत होती है जिसे रोका जा सकता है ? कितनों को मालूम है कि कैसे भोजन बनाते समय गैस की खपत घटाई जा सकती है ?

और मैं तो यह सवाल पूछता हूं कि आदमी धनोपार्जन करता ही क्यों है ? क्या समाजसेवा के लिए ? नहीं, भौतिक सुख-सुविधा के साधन जुटाने के लिए । और यदि वह मितव्ययिता ही बरतने लगे तो अपने धन का उपभोग करेगा कैसे ? उसे ढेर-सी धन-दौलत की जरूरत ही क्या रह जाएगी यदि वह कम से कम खर्चापानी चलाने का इच्छुक हो । स्मरण रहे कि आदमी के प्रायः सभी क्रियाकलाप प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऊर्जा पर निर्भर होते हैं, जिसका लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा आज भी जीवाश्म इंधनों से मिल रहा है । यह भी अनुमान है कि अपारंपरिक ऊर्जा स्रोतों में जो वृद्धि हो रही है वह ऊर्जा की बढ़ती मांग पूरा करने भर के लिए भी पर्याप्त नहीं है ।

मेरा कहने का आशय यह है कि अर्थ ऑवर का संदेश यह समझा जाना चाहिए कि हमें मितव्ययिता अपनाते हुए सादगी भरी जीवनशैली अपनानी चाहिए, न कि एक-दूसरे की नकल करते हुए प्राकृतिक संसाधनों को अधिक से अधिक प्रयोग में लेना चाहिए । मनुष्य और अन्य जीवधारियों की आने वाली पीढ़ियों के लिए इस धरती को रहने योग्य यदि छोड़ना हो तो हमें भोगवाद से बचना होगा । कितने लोग हैं जो इस विचार से सहमत होंगे ? शायद गिनेचुने ही, बस !! – योगेन्द्र जोशी

आया मौसम वर्षफल का (नववर्ष 2013)

ख्रिस्तीय वर्ष 2013 का आगाज हो चुका है । इस मौके पर सभी देशवासियों के प्रति मेरी शुभाकांक्षाएं ।

नववर्ष के आगमन पर लोगों के मन में आने वाला समय कैसा रहेगा खुद के लिये तथा समाज-देश के लिए यह जानने की उत्कंठा होती है । लोग समझते हैं कि भविष्य की तस्वीर खींची जा सकती है । वे समझते हैं कि कुछ विशेषज्ञ भविष्य की घटनाओं को ‘पढ़ने’ की काबिलियत रखते हैं । लोगों की उत्कंठा शांत करने के लिए देश में बहुत से ‘एक्सपर्टों’ का जन्म हुआ है जिन्होंने भविष्यवाणी की अलग-अलग विधियां इजाद की हैं या अपनाई हैं । इनमें सबसे अधिक प्रचलित जन्म के समय ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित है । और इसी का सरलतर संस्करण मात्र जन्मतिथि के विचार पर आधारित विधि है जिसके परिणामों की जानकारी कई अखबारों/पत्रिकाओं में पढ़ने को मिल जाती हैं ।

विगत 28 दिसंबर के ‘अमर उजाला’ के साथ उपलब्ध ‘रुपायन’ नाम के परिशिष्ट के पन्ने जब मैंने पलटे तो पाया कि उसके आरंभ से अंत तक के सभी पृष्ठों में नाम के प्रथम अक्षर पर आधारित वर्षफल का ब्योरा छपा पड़ा है और कुछ नहीं । और परसों, 30 दिसंबर, के समाचारपत्र ‘हिंदुस्तान’ का भी एक पृष्ठ उसी प्रकार की भविष्यवाणी से भरा था, इस बार जन्ममाह पर आधारित । वस्तुतः ऐसे वर्षफल कई पत्र-पत्रिकाओं में दिसंबर-जनवरी के इस मौसम में और टेलीविजन चैनलों पर पढ़ने को मिल जाते हैं । इतना ही नहीं, बाजार में अलग-अलग नामराशियों के वर्षफलों के विस्तार से चर्चा वाली पुस्तिकाएं भी उपलब्ध हो जाती हैं ।

ऐसी प्रकाशित जानकारी देखकर मेरे मन में यह प्रश्न स्वाभाविक तौर पर उठ जाता है कि इन वर्षफलों की वाकई में कोई अहमियत है ? क्या लोग कही गई बातों पर विश्वास करते होंगे ? या ऐसी बातों को महज मनोरंजन के नाते पढ़ते होंगे ? मनोरंजन के लिए हम हास्य कविताएं सुनते हैं, व्यंगलेख पढ़ते हैं, बेतुकी हरकतों वाले वचकानी हेसी वाले टीवी सीरियल देखते हैं, इत्यादि । ठीक वैसे ही ये राशिफल, वर्षफल भी पढ़े जाते होंगे, लेकिन गंभीरता से इन्हें शायद ही कोई लेता होगा ।

इन्हें गंभीरता से लिया भी नहीं जा सकता है, क्योंकि इनका कोई तर्कसम्मत आधार है ही नहीं । बस ऐसा होता है यह कहते हुए इनको सही ठहराने की कोशिश की जाती है । और वैसे भी ये बातें अनुभव में सही ठहरती नहीं । भला कैसे सही हो सकती हैं । एक ही राशिनाम अथवा जन्मदिन वाले अनेक लोग इस धरती पर पैदा हुए होंगे, जिनकी पारिवारिक पुष्ठभूमि में कोई समता नहीं होगी; उनके शारीरिक एवं मानसिक स्वाथ्य तथा क्षमता में समानता की कोई संभावना नहीं; उनके परिवेश अलग-अलग होंगे; उनकी शिक्षा-दीक्षा में भी परस्पर भेद होगा ही; व्यावसायिक दृष्टि से भी उनमें समानता की उम्मीद की नहीं जा सकती है; इत्यादि । तब कैसे एक ही वर्षफल सबके लिए स्वीकार्य हो सकता है ?

इसके अतिरिक्त इस पर भी गौर करें कि लोगों के नाम राशियों के अनुसार हों यह आवश्यक नहीं । मैंने सुना है कि उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में तो राशिनाम प्रयोग में न रखने को प्रचलन है, क्योंकि कुछ लोग मानते हैं कि ऐसा करने पर उम्र घटती है । आजकल तो लोग खोज-खोजकर ऐसा नाम रखने लगे हैं जिसे किसी ने सुना ही न हो – एकदम नया, दुनिया में अकेले एक व्यक्ति का । वैसे भी यह संभावना भी रहती है कि राशि पर आधारित नाम अच्छा लगे । मेरे उत्तराखंडीय समाज में राशिनाम का चलन है, फिर भी मेरा स्वयं का नाम मेरे पिताश्री ने कुछ हटकर चुना था । ऊपर मैंने रूपायन का उल्लेख किया ह, जिसमें नाम के प्रथम अक्षर के वर्षफल के साथ किसी सिनेतारिका अथवा महिला खिलाड़ी का उदाहरण भी दे रखा है । उन्हीं में शामिल है एक मुस्लिम महिला का नाम । मुझे पूरा विश्वास है कि इस्लाम धर्मावलंबियों में महीने की तारीखों के अनुसार नाम रखने की कोई परंपरा नहीं है । अगर होगी भी तो वह ‘हिजरी’ कलेंडर पर आधारित होगा न कि ख्रिस्तीय कलेंडर पर । तब संबंधित भविष्यवक्ता ने अपनी विधि उस महिला पर भी कैसे इस्तेमाल कर दी होगी ?

और गहराई से सोचने पर मन में सवाल उठता है कि कार्य-कारण (कॉज एंड इफेक्ट) के जिस सिद्धांत का उपयोग तार्किक विवेचना में किया जाता है वह ऐसी भविष्यवाणियों के मामले में कहीं नजर नहीं आता है । सवाल यह है किसी दिन विशेष पर पैदा हुए व्यक्ति का भविष्य किस प्रक्रिया के द्वारा जन्मतिथि निर्धारित करती है ।

कुल मिलाकर ऐसी कवायद की अहमियत शुद्ध मनोरंजन के अलावा कुछ और नहीं हो सकती है । भौतिकी (फिजिक्स) के अनुसार तो भविष्य जाना ही नहीं जा सकता है !! – योगेन्द्र जोशी