कोरोना महाप्रकोप का सकारात्मक प्रभाव

जिंदगी बस यही है

इस समय पूरा विश्व कोरोना-जनित महामारी की चपेट में है। कोरोना नामक विषाणु चीन के वुहान शहर से निकलकर सर्वत्र फैल चुका है। खुद चीन में यह कहां से आया यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। कहा जाता है कि वुहान में चमगादड़ों के साथ-साथ अन्य पशु-पक्षियों का मांस बिकता है और विषाणु वहां के चमगादड़-मांस से लोगों के बीच फैला। कुछ लोगों का कहना है कि वुहान की एक विषाणु प्रयोगशाला में ही कोरोना का जन्म हुआ और किसी चूक से यह बाहर नगरवासियों में फैल गया। एक मत यह भी है कि आर्थिक तौर पर दुनिया को पंगु करने के लिए चीन ने इसे ईजाद किया और दुनिया में फैलने दिया। ऐसे अनेक मत व्यक्त किए जा सकते हैं। वास्तविकता क्या है यह अभी कोई नहीं जानता। बस इतना सच है कि इस विषाणु ने दुनिया की बहुत बड़ी आबादी को रोगग्रस्त कर दिया है और लाखों को…

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चाणक्य नीति – राजकर्मचारी राजा से कैसा व्यवहार करे (भाग २)

     दो लेखों की शृंखला का यह मेरा दूसरा लेख है। मैंने पिछले एवं शृंखला के पहले लेख में चाणक्य, जिन्हें कौटिल्य के नाम से भी जाना है, के ग्रंथ “कौटिलीय अर्थशास्त्र” का जिक्र किया था जिसमें राजा के और उसके प्रशासनिक तंत्र की कार्य-प्रणाली की विस्तृत चर्चा की गयी है। शासन के विभिन्न पहलुओं जैसे आर्थिक तंत्र, न्यायिक व्यवस्था, लोक-कल्याण, प्रजा के अधिकार एवं दायित्व, आदि के विषय पर ग्रंथकार ने एक निष्ठावान राजनीतिज्ञ के तौर पर अपना मत व्यक्त किया है।

     इस ग्रंथ के विषयानुसार लिखित अधिकरणों में से एक में राजकर्मचारी के दायित्वों, राजा के प्रति शालीन व्यवहार, और राजा के रोष से बचने की सावधानी आदि की बातें बताई गई हैं (कौटिलीय अर्थशास्त्र, अधिकरण ५, अध्याय ४)। उक्त ग्रंथ के संबंधित ३ छंदों (श्लोकों) का उल्लेख मैं पिछले ब्लॉग-लेख (१९ अक्टूबर) में कर चुका हूं। शेष ४ चार श्लोक यहां पर प्रस्तुत…

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गांधी जयन्ती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस – क्या है अहिंसा?

गांधी जयंती

आज गांधी जयंती है, दो अक्टूबर। गांधी-जन्म के १५० वर्ष पूरे हुए। मैं इस समय गेन्ज़विल (फ़्लोरिडा, अमेरिका) में हूं, कुछ हफ़्तों के प्रवास पर। भारत के राष्ट्रीय समय से यहां की घड़ी ९:३० घंटे विलंबित रहती हैं। यहां इस समय २ अक्टूबर का दिन है और तदनुसार अपने देश में रात्रि है।

जैसा कि परंपरा है गांधीजी के गुणगान करने और उनके विचारों की महत्ता का बखान करने का दिन रहता है यह। देश की खबरें जानने को इंटर्नेट के माध्यम से समाचार पत्रों पर नजर दौड़ाने पर मुझे गांधीजी के विचारों को प्रस्तुत करने, उन्हें प्रसारित करने वाली विज्ञप्तियां दिखती हैं। देश में राजनेताओं, सामाजिक संगठनों, एवं अन्य लोगों ने कैसे यह दिन गांधीजी को समर्पित किया होगा यह तो मुझे कल के समाचारपत्रों से ही पता चलेगा। हमें उनके सुझाए मार्ग पर चलना चाहिए आदि कहकर रस्मादयगी की परंपरा सदैव की भांति निभाई ही गई होगी। जैसा होता आया है विचार व्यक्त करने वाले और सुनने वाले दोनों ही फिर अपने रोजमर्रा की चर्या में लौट जाते हैं। जिसे जैसे जीना है वह इस दिवस के बाद भी अपनी-अपनी सुविधानुसार वैसे ही जीता है, कहीं कोई फर्क पड़ता है ऐसा मुझे नहीं लगता है।

गांधी जी का अहिंसावाद

जिस बात को लेकर गांधीजी की सर्वाधिक चर्चा होती रही है वह है उनका अहिंसावाद। उनके इसी अहिंसावाद को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस विशेष दिन (२ अक्टूबर) को “अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस” घोषित किया था। दुनिया के लिए गांधी का महत्व इसी अहिंसा के विचार तक सीमित है ऐसा मुझे लगता है। इसके आगे भी गांधी की प्रासंगिकता है यह पूरे विश्व के लिए शायद माने नहीं रखता है। किंतु भारत के लिए उनके अन्य विचार अधिक माने रखते हैं जिनकी सार्थकता पर विवाद नहीं हो सकता है। अहिंसा का विचार अच्छा तो है किंतु व्यावहारिक नहीं है ऐसा मैं सोचता हूं। क्यों? इसे स्पष्ट करना मेरे इस आलेख का विषय है। उस विषय पर आऊं इससे पहले उन कुछएक बातों की चर्चा करना समीचीन होगा जो गांधी जी के विचारों में शामिल रहे हैं।

क्या कहते थे गांधी जी?

(१)   वे कहते थे सामाजिक भेदभाव नहीं होना चाहिए जिसका एक पहलू छुआछूत की परंपरा के रूप में समाज में सदियों से रहा है और आज भी कुछ अंश तक बचा है।

(२)   मनुष्य को अपने निजी कार्य यथासंभव खुद ही करना चाहिए, जैसे अपने लत्ते-कपड़े धोना, शौचालय-स्नानगृह साफ रखना आदि। 

(३)   हमें अपने शारीरिक श्रम का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए, जैसे छोटी-मोटी दूरी के लिए पैदल चलना या साइकिल का प्रयोग करना।

(४)   हमें अपने परिवेश को स्वच्छ रखना चाहिए। गांधीजी के इसी विचार से प्रेरित होकर देश में (मात्र आंशिक रूप से सफल) ’स्वच्छ भारत अभियान’ चल रहा है।

(५)   गांधीजी सादे जीवन के पक्षधर थे। मितव्ययिता अमल में लाना और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से बचना उनके विचारों में निहित रहे हैं।

(६)   गांधीजी इस बात के प्रबल पक्षधर थे कि समाज में आर्थिक विषमता एक सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए। अर्थात् अतिसंपन्न लोग अपनी संपदा से विपन्न लोगों की सहायता करें। इस विचार में परोपकारिता की भावना निहित है।

(७)   गांधीजी देश को कृषिप्रधान मानते थे और गांवों के उत्थान के हिमायती रहे। छोटे-मोटे उद्योगों विशेषतः घरेलों उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करते थे।

(८)   कहा जाता है कि गांधीजी अहिंसावादी के साथ सत्यवादी एवं निष्ठावादी भी थे। अर्थात् अपने जिम्मे के कार्य के प्रति दुराव-छिपाव से मुक्त समर्पण भाव लोगों में होना चाहिए।

(9)    गांधीजी भारतीय भाषाओं को अधिकाधिक प्रयोग में लेने एवं अंग्रेजी पर निर्भरता को कम से कम करने के प्रबल पक्षधर थे।

इस प्रकार की अन्य बातें भी उनके विचारों में रही होंगी। गांधीजी को लेकर मेरे ध्यान में जो आया उसका उल्लेख मैंने किया है।

उनके देहावसान को आज ७२ वर्ष बीतने को हैं। उनकी प्रशंसा तो प्रायः सभी करते रहते हैं किंतु सवाल उठता है कि उनके विचारों को अमल में लाने का प्रयास कितने लोग करते हैं? उदाहरण के तौर पर देशज भाषाओं को लीजिए। जिस अंग्रेजी से देश को मुक्तप्राय करने की बात वे करते हैं वह अब देश पर पूरी तरह हावी हो चुकी है। गांधीजी का गुणगान करना एक बात है, उनके विचार स्वीकारना नितांत अलग बात।

मैं गांधीजी के सतही एवं अगंभीर गुणगान का विरोधी हूं। व्यक्तिगत तौर पर मैं यह मानता हूं कि उनके विचार आदर्शों से प्रेरित थे, जिनको व्यावहारिक जीवन में उतारना इस विविधताओं से भरे वास्तविक संसार में संभव नहीं। अगर कुछ हो सकता है तो वह यह कि जब तक गंभीर परेशानी पैदा न हो इन बातों पर टिकने का प्रयास किया जा सकता है।

अस्तु, मैं गांधीजी के अहिंसावाद पर लौटता हूं।

क्या है अहिंसा

अहिंसा की परिभाषा क्या है? प्राचीन भारतीय चिंतक अहिंसा के प्रति व्यापक दृष्टिकोण रखते थे। उनके अनुसार अहिंसा के निहितार्थ आधुनिक पाश्चात्य नॉन-वायलेंस (non-violence) से कहीं अधिक व्यापक रहे हैं। मेरी दृष्टि में इस विषय पर दो बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए:

[१]     भारतीय चिंतन में अहिंसा मनसा-वाचा-कर्मणा तीनों प्रकार का माना गया है। कर्मणा अहिंसा का अर्थ है शारीरिक या भौतिक रूप से किसी को कष्ट न पहुंचाना। विश्व के प्रायः सभी समाजों में अहिंसा की “नॉन-वायलेंस  के तुल्य” यही परिभाषा प्रचलन में है। वाचा एवं मनसा हिंसा की बात शायद ही कहीं कोई करता हो। वाचा का अर्थ है बोले गये शब्दों से किसी को दुःख पहुंचाना। इस हिंसा को हम देख-सुन सकते हैं। मनसा का अर्थ है किसी के अहित का विचार मन में लाना। दूसरा कोई इसे नहीं जान सकता है। प्राचीन चिंतक किसी के प्रति अहितकर या अनिष्ट विचारों को मन में लाना भी हिंसा मानते थे, यानी पूर्णतः कल्याणकारी विचारों को ही मन में स्थान देना व्यक्ति का कर्तव्य है।

[२]     प्राचीन मान्यता में अहिंसा की अवधारणा बहुत व्यापक है और मानव समाज से आगे अन्य प्राणियों तक फैली है। जैन मुनियों के लिए यह बात बहुत माने रखती है। बौद्धमतावलंबी और वैष्ण्वों के लिए भी अहिंसा की ऐसी अवधारणा महत्व रखती है। “अहिंसा” परमो धर्म:” कथन का उल्लेख महाकाव्य महाभारत में यत्रतत्र मिलता है। इस बारे में मैने दो आलेख अपने ब्लॉग में लिखे हैं। (देखें आलेख दिनांक 2017-07-07 एवं दिनांक 2017-07-28)

जिस महाभारत में अहिंसा की वकालत की गई है उसी में तमाम कथाएं भी हैं जिनमें हिंसा का बोलबाला है और स्वयं महाभारत की घटना हिंसक युद्ध का लेखाजोखा है। ऐसा विरोधाभास क्यों है? प्रचीन संस्कृत ग्रंथों में हिंसा की व्यापकता की कथाएं बहुतायत से मिलती हैं। इस विरोधाभास की व्याख्या वस्तुतः कठिन नहीं है।

दरअसल भारतीय धार्मिक मतों के दो स्पष्ट पहलू रहे हैं:

(१)     एक है आध्यात्मिक जिसके अनुसार मनुष्य को जीवन-मरण से मुक्त होने का प्रयास उसका कर्तव्य है और उसके लिए व्यक्ति को ऐहिक सुखों-हितों का मोह त्यागकर खुद को सत्य, अहिंसा, प्रेम, आदि के सन्मार्ग पर ले जाना होता है जिससे वह अंततः निर्वाण (बौद्धमत), मुक्त जीवात्मा (जैन मत) अथवा मोक्ष (वैदिक मत) की परम अवस्था को पा सके। अहिंसा उसी संदर्भ में सार्थक है।

(२)     दूसरा है ऐहिक सामाजिक जीवन से संबंधित जो आदर्शों की दिशा में बढ़ तो सकता है किंतु आदर्शों पर चल नहीं सकता। यह वह क्षेत्र है जिसमें अहिंसा की प्रवृत्ति सभी मनुष्यों में नहीं होती है। असल में सत्य-असत्य, प्रेम-द्वेष, हिंसा-अहिंसा, परोपकार-अपकार आदि परस्पर विपरीत प्रवृत्तियां इस संसार में एक साथ अस्तित्व में रहते हैं।

अहिंसा की व्यावहारिकता

मेरा प्रश्न है क्या गांधीजी ने उपर्युक्त तथ्यों पर मनन करने के बाद अहिंसा की बात की थी? मेरे मत में वे इस तथ्य की अनदेखी करते थे कि उनके अहिंसा के सिद्धांत को सभी आत्मसात नहीं कर सकते हैं। अवश्य ही अहिंसा समाज के लिए वांछित है, किंतु हिंसा से समाज मुक्त नहीं हो सकता। हिंसा केवल आत्मरक्षा के लिए ही नहीं बल्कि समाज को सुव्यवस्थित रखने के लिए, आपराधिक प्रवृत्ति के जनों को नियंत्रित रखने के लिए, भी आवश्यक है। इस बात को गांधीजी समझते थे क्या?

मनुस्मृति में अधोलिखित उक्तियां पढ़ने को मिलती हैं:

“सर्वो दण्डजितो लोको …”,

“उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति …”

“दण्डात् प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते …”

(मनुस्मृति, अध्याय ७, श्लोक २२, २७, २८, क्रमशः)

इन कथनों में यह संदेश दिया गया है कि यह जगत् (मानव समाज) दंड द्वारा ही नियंत्रण में रह पाता है। क्या दंडित करने की व्यवस्था हिंसात्मक नहीं है? अवश्य ही शासन दंडित करने का कार्य अपने हाथ में रखता है न कि उसका अधिकार किसी अन्य देता है। किंतु किसी को जैसे भी दंडित किया जाए उसे कहा तो हिंसा ही जाएगा !

यह भी कहा जाता है कि गांधीजी एक प्रकार से जिद्दी थे। वे दूसरों की कम सुनते थे बल्कि “मेरी बात सही है” यह धारणा उनसे मनवाते थे। उनके अहिंसावाद पर लोग जब तक टिप्पण्णी करते वे महात्मा मान लिए गए थे। तब उनका खुलकर विरोध करने का साहस कम ही लोग जुटा पाए। और जो असहमति व्यक्त करते थे उनकी कोई सुनता नहीं था।

एक धारणा यह भी लोगों के मन में बैठ गई थी कि देश की आज़ादी गांधीजी के अहिंसक आंदोलन का फल था। मैं इस धारणा को स्वीकार नहीं करता। मेरे मत में उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण ऐसे हालात बन चुके थे कि ब्रितानी हुकूमत को अपना वैश्विक साम्राज्य संभालना मुश्किल हो गया था। उसके अधीनस्थ लगभग सभी देश एक-एक कर स्वतंत्र होते चले गये।

इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि गांधीजी पहले व्यक्ति नहीं थे जिन्होंने अहिंसा की बातें की हों। महात्मा बुद्ध, तीर्थंकर महावीर एवं यीशु मसीह सुविख्यात हैं जिन्होंने अहिंसा का उपदेश दिया। किंतु उनके स्वयं के अनुयायी तक सदैव अहिंसक नहीं रह सके। स्पष्ट है कि अहिंसा वांछित है लेकिन सुलभ नहीं है। हिंसा समाज में सदा से रही है और आगे भी रहेगी।

भारतीय समाज व्यक्ति-पूजक है। यदि कोई असामान्य तौर पर प्रतिष्ठित हो जाए तो जन समुदाय उसमें दोष देखना बंद कर देता है। गांधीजी उसी स्तर पर पहुंचा दिए गये थे। – योगेन्द्र जोशी

साफ-सफाई की ध्वस्त नागरिक व्यवस्था

जिंदगी बस यही है

दैनिक जागरण समाचार-पत्र के २१ अगस्त के अंक में वाराणसी की ध्वस्त सफाई व्यवस्था की कुछ तस्वीरें छपी हैं जिनमें से एक यहां प्रस्तुत है। तस्वीरों के पृष्ठ का लिंक पेश कर रहा हूं:

https://epaper.jagran.com/epaper/21-aug-2019-45-varanasi-city-edition-varanasi-city-page-10.html#

      इन तस्वीरों को देख मेरा मन हुआ कि कचरा निबटारे की अपनी निजी व्यवस्था का और साथ ही घर-घर कूड़ा-उठान से जुड़े अनुभव का जिक्र कर डालूं।

वाराणसी में कूड़े-कचरे के निपटारे की कोई कारगर व्यवस्था पहले कभी नहीं थी। लोग सड़क के किनारे रखे गए बड़े-बड़े कूड़ेदानों अथवा खुले में कूड़ा-कचरा डाल देते थे। नगर-निगम की गाड़ी बीच-बीच में आकर उसे उठा लेती थी। 8-10 वर्ष पूर्व घरों से कूड़ा-उठान की नयी योजना आरंभ की गई थी। मेरे मुहल्ले में इस कार्य का जिम्मा “ए-टु-ज़ेड” नाम की संस्था को मिली थी। संस्था को हर घर से 50 रुपये बतौर शुल्क के इकट्ठा करने की जिम्मेदारी भी दी गयी थी। इस योजना…

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स्वाधीनता दिवस – अगस्त १५, २०१९

सर्वप्रथम देशवासियों को हर्षोल्लास के इस दिन की हार्दिक बधाई तथा शुभाकांक्षाएं।

अगस्त १५, २०१९, आज इस राष्ट्र का ७३वां स्वाधीनता दिवस रहा। (इस समय रात्रिकाल है।) १९४७ के इसी दिन यह देश ब्रितानी हुकूमत से मुक्त हुआ, और उसी के साथ एक राष्ट्र के रूप में इसकी स्थापना की नींव पड़ी। शुरुआती कुछ समय तक उपद्रव एवं अव्यवस्था बनी रही जो कि उस समय की विकट स्थिति में स्वाभाविक था। वस्तुतः देश विभाजित हो गया था और एक नये राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान (कहने को स्वतंत्रता दिवस १४ अगस्त) का भी जन्म हुआ जिसके साथ आरंभ से ही तनाव, असहयोग, एवं विद्वेष के संबंध ब्रितानी शासक विरासत में दे गये। संबंध इतने कटु रहे कि उसके साथ युद्ध भी झेलने पड़े तब और उसके बाद भी। उसके शत्रुतापूर्ण रवैये के कारण धरती का स्वर्ग कहलाने वाले कश्मीर की समस्या का फल आज तक इस राष्ट्र को भोगना पड़ रहा है। स्वयं पाकिस्तान को अपने रवैये की कीमत १९७१ में अपने विभाजन के तौर पर चुकानी पड़ी, जब बांग्लादेश का जन्म हुआ। अस्तु।

शुरुवाती कष्टों के बावजूद देशवासी सुखद भविष्य के प्रति आशान्वित रहे। उस काल के राजनेता एक ध्येय के साथ राजनीति में उतरे थे, वह यह कि देश को विदेशियों से मुक्त कर देशवासियों के हाथ में सोंपना है जिसे वे अपनी आकांक्षाओं, उद्येश्यों के अनुसार चला सकें और देश का समग्र विकास कर सकें। उस समय के राजनेताओं अनेक प्रकार के कष्ट सहे, हर प्रकार के त्याग किए, अपने ध्येय के लिए जान तक उन्होंने दी। अवश्य ही उनमें कुछेक को भविष्य में अपने हित साधने की संभावना दिखी होगी, लेकिन वह अपवाद स्वरूप ही रहा होगा ऐसा मेरा सोचना है। आज़ादी के बाद उन नेताओं ने जनप्रतिनिधि बनकर लोकतंत्र के स्थापना की और शासन चलाने की कोशिशें की। वे शासन चलाने के लिए प्रशिक्षित नहीं थे, सबको सबकुछ सीखना था शासन चलाने का अनुभव लेना था। शुरुआती सफलताओं-विफलताओं के साथ देश की शासकीय चल निकली। लेकिन समय के साथ क्य हुआ? यह एक गंभीर प्रश्न है जिसकी ओर में संकेत करना चाहता हूं।

मैं अपने विचार यहां रखने के पूर्व आगे उल्लिखित बातों की ओर पाठकों का ध्यान खींचना चाहता हूं। इनका इस आलेख से क्या संबंध यह बाद की पंक्तियों मेंस्पष्ट होगा।

Pseudo-Democratic: describes a political system which calls itself democratic, but offers no real choice for the citizens. This lack of choice can come from limited amount of diverse parties eligible for a vote, cemented power structures which are not really affected by any vote, no availability of a voting option “none of the above” for voters who favour change to the current political landscape, no direct democratic means, et cetera … [आभासी अथवा छद्म-लोकतंत्र – उस राजनैतिक तंत्र को व्यक्त करता है जो स्वयं को लोकतांत्रिक कहता है, किंतु नागरिकों को वास्तविक विकल्प प्रदान नहीं करता। विकल्पों का यह अभाव मतदान हेतु विविधतापूर्ण योग्य दलों की सीमित उपलब्धता, नियंत्रण की सुदृढ़ (गैर-लचीली) संरचनाएं जो मतों से वस्तुतः प्रभावित नहीं होतीं, उन मतदाताओं के लिए “इनमें से कोई नहीं” के मत-विकल्प की अनुपलब्धता जो मौजूदा राजनैतिक परिदृश्य बदलने के पक्षधर हों, लोकतांत्रिक साधनों के प्रत्यक्ष (अपरोक्ष) अभाव, इत्यादि …]

(Source: http://www.online-nations.net/definitions/def-pseudodemocracy.html)

In the preface to a collection of his speeches, Vajpayee once wondered whether democracy had truly taken root in India. “How can democratic institutions work properly,” he asked, “when politics is becoming increasingly criminalized?” [अपने व्याख्यानों के संकलन के प्राक्कथन में बाजपेयीजी (पूर्व प्रधानमंत्री) ने संदेह व्यक्त किया था कि क्या इंडिया (भारत?) में लोकतंत्र अपनी जड़ें वास्तव में जमा पाया है। “लोकतांत्रिक संस्थाएं समुचित तरीके से कैसे कार्य कर सकतीं हैं”, उनका प्रश्न था, “जब राजनीति का उत्तरोत्तर अपराधीकरण हो रहा है?”]

(Source: http://www.project-syndicate.org/commentary/india-s-pseudo-democracy)

मेरी उम्र लगभग वही है जितने वर्ष देश की स्वाधीनता को हुए हैं, केवल कुछ महीनों का आगा-पीछा रहा है। एक वयस्क के नाते पहला चुनाव सन्‍ १९६७ का था जिसे मैंने देखा। उसके बाद के प्रायः सभी चुनाव देखने को मिले, कुछएक में मतदाता के तौर पर मतदान भी किया तो किसी में केवल एक दर्शक रहा। देश में घोषित आपतकाल का भी मुझे अनुभव है। सन्‍ १९७७ के चुनाओं की भी याद है जिसमें देश के कई दलों ने आपसी मतभेद भुलाकर इंदिराजी को हराने के लिए “जनता पार्टी” का गठन किया। कांग्रेस (इंदिराजी) को बुरी हार का सामना करना पड़ा। लेकिन अपने अंतरविरोधों के कारण जनता पार्टी दो-तीन साल में ही बिखर गई। बाद के चुनाव में जीत हासिल कर इंदिराजी फिर सत्ता पर काबिज हुईं। यही समय था जब कांग्रेस के शीर्ष (अध्यक्ष) पद नेहरू-गांधी परिवार का एकाधिकार हो गया।

भारतीय राजनीति  समय के बाद किस प्रकार से बदलती गई और कैसे उसकी गुणवत्ता में उत्तरोत्तर सुधार की जगह गिरावट आती गई इसे मैं हर चुनाव के बाद अनुभव करता गया। समय के साथ क्षेत्रीयता, जातीयता, एवं धार्मिकता पर आधारित दलों का उदय हुआ है। उत्तर-प्रदेश/बिहार में कोई राजभरों की तो कोई कुशवाहा समुदाय की पार्टी बना के बैठा है। मैं नहीं मान सकता कि मुश्किल से १-२ विधायकों या सांसदों वाले ये दल देश का कोई हित साध सकते हैं। छोटे-छोटे दल बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने का प्रयास जरूर कर सकते हैं। उ.प्र. में मायावती की राजनीति दलितों के नाम पर आरंभ हुई थी। चुनाव जीतने के लिए उ.प्र. में मुलायम सिंह ने और बिहार में लालू प्रसाद ने यादव-मुस्लिम (MY formula) का आविष्कार किया। सत्ता पाने के लिए इस प्रकार के प्रयोग देश भर में होते रहे है। ऐसी बातें मेरी नजर में किसी स्वस्थ एवं उद्येश्यपरक लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं माने जा सकते।

अब जरा उपर्युल्लिखित बाजपेयी जी के कथन पर गौर करें: “”How can democratic institutions work properly, when politics is becoming increasingly criminalized?” प्रश्न है क्या राजनीति का अपराधीकरण सचमुच में हो चुका है या हो रहा है?

हां, राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है इस बात को आम जनता ही नहीं राजनेता भी मानते हैं। किंतु नेतागण राजनीति में अपराधियों के बचाव में ये कुतर्क – जी हां, कुतर्क – भी देते हैं कि जब तक अदालतें किसी को अपराधी न घोषित करें उन्हें अपरधी नहीं माना सकता। मैं भी इस बात स्वीकारता हूं। इसका भरपूर लाभ अपराधिक छवि वाले उठाते आ रहे हैं। अदालतों की बात करें तो मामले वर्षॊं तक अनिर्णीत रहते हैं और इन लोगों की जगह राजनीति में बनी रहती है।

नेताओं के बात को मैं कुतर्क क्यों कहता हूं यह स्पष्ट कर दूं। ठीक है कि जब तक अदालतें किसी के विरुद्ध निर्णय नहीं सुनाती हैं उन्हें अपराधी नहीं मान सकते। परन्तु इसी के साथ यह भी सच नहीं है क्या जब तक अदालतें किसी को निरपराध नहीं घोषित करतीं उन्हें निरपराध भी नहीं माना जा सकता? ऐसे व्यक्ति को सजा तो नहीं दे सकते हैं, लेकिन यह भी स्वीकारा जाना चाहिए कि उन्हें निरपराध मानकर पुरस्कृत भी नहीं कर सकते! इसलिए राजनीति में शुचिता की बात करने वालों को ऐसे व्यक्तियों को अपने दल में स्थान नहीं देना चाहिए, खास तौर पर जब दर्ज अपराधों की संख्या दर्जनों में हो। लेकिन क्या दल ऐसा कर रहे हैं? । दुर्भाग्य से ये बद्नाम छवि वाले चुनाव में जिताऊ होते हैं इसलिए सभी दल उनको पाल-पोष रहे हैं।

मेरा भारतीय लोकतंत्र से वर्षों पहले मोहभंग हो गया था जिसके बाद मैं हर चुनाव में मतदान करता रहा परंतु किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में वोट डालना बंद कर दिया। मोहभंग के अनेक कारण मेरे पास हैं, किंतु इस समय उनका खुलासा नहीं कर पा रहा हूं। कुछ समय से मैंने नोटा (NOTA) का विकल्प चुन लिया है।

स्वातंत्र्य दिवस को उमंग, उल्लास एवं आशा के साथ मनया जाना चाहिए। मुझे भी खुशी व्यक्त करनी चाहिए। परन्तु मैं ऐसा नहीं कर पा रहा हूं। एक सार्थक, उपयोगी, फलदायक लोकतंत्र की उम्मीद मुझे नहीं हो पा रही है। दिल के एक कोने में निराशा घर कर चुकी है। अस्तु, देशवासियों को पुनश्च शुभेच्छाएं।

इस समय मैं इन्हीं शब्दों के साथ अपने लैपटॉप को विराम देता हूं। – योगेन्द्र जोशी

हादसों का देश भारत – क्या देशवासी कभी सुधरेंगे भी?

कल (19 अक्टूबर) दशहरे के दिन रावण-दहन के मौके पर अमृतसर में एक बेहद गंभीर और दुखद हादसा हुआ।

उस अनिष्ट घटना में बहुत से (शायद 50 से अधिक) जनों की अकाल मृत्यु हो चुकी है और पता नहीं कितने जने आहत हुए हैं।

उस हादसे में दिवंगत हो चुके लोगों की आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना और आहतों के त्वरित स्वास्थ्य लाभ की हम सभी कामना कर सकते हैं। प्रभावित पारिवारिक जनों को अप्रत्याशित विकट कष्टप्रद स्थिति का सामना करने का बल मिले यह प्रार्थना सभी करते हैं।

जिम्मेदार कौन?

वह हादसा हुआ क्यों? कौन जिम्मेदार है उसके लिए?

मैं टेलीविज़न समाचार सुन रहा था। दुर्घटना के तुरंत बाद सभी समाचार चैनलों पर उस हृदयविदारक घटना की जानकारी प्रसारित होने लगीं। सभी पर लगभग एक जैसी बातें सुनने को मिल रही थीं। कुछ लोग कह रहे थे कि आयोजकों की गलती से दुर्घटना घटी, तो कोई स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदार ठहरा रहा था। कहने वाले तो रेल प्रशासन को भी कुछ हद तक जिम्मेदार कह रहे थे।

मुझसे पूछें तो मैं स्थानीय प्रशासन और रावण प्रकरण के आयोजकों को तो जिम्मेदार मानता ही हूं। लेकिन क्या वहां तमाशा देखने वाले लोग खुद जिम्मेदार नहीं? टिप्पणी करने वाले यह भी कह रहे थे कि अपने देश में रेलवे विभाग ने पटरियों की फ़ेंसिंग (बाड़ से घेराबंदी) नहीं की है जो कि विकसित देशों में किया जाता है। फ़ेंसिंग होती तो हादसा न होता।

लेकिन सवाल यह है कि फ़ेंसिंग न होने का मतलब यह तो नहीं कि आप रेल पटरियों का इस्तेमाल मनमाने तरीक से करें। क्या लोगों को यह सामान्य समझ नहीं होनी चाहिए कि पटरियों पर खड़े होकर तमाशा देखना खुद में लगत व्यवहार है? क्या प्रशासन डंडा लेकर लोगों को भगाए तभी वे मानें यही रवैया अपनाया जाना चाहिए? दरअसल रेलवे ट्रैक को पार करना भी पड़े तो भी सोच-समझ कर करना चाहिए, और उसे जल्दी ही पार कर लेना चाहिए ताकि किसी हादसे की गुंजाइश न हो। लेकिन मानता कौन है? रेलवे लाइन पर कुछ जने ऐसे बैठते या चलते हैं जैसे वह कोई सामान्य पैदल मार्ग हो। ऐसे हादसे सुनने को मिलते हैं जिनमें रेलवे लाइन पर कोई हेडफोन कान पर लगाए गाना सुन रहा हो, या फोन पर बात कर रहा हो। कोई-कोई तो रेलगाड़ी आ रही हो और उसके सामने सेल्फ़ी भी लेते देखे जाते हैं।

बुरा लगेगा लोगों को परंतु यह बात सही है कि हम भारतीय सुरक्षा के मामले में बेहद लापरवाह हैं और हर बात पर प्रशासन पर दोष मढ़ने लगते हैं। क्या लोगों को खुद भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभानी चाहिए?

जहां तक रेलवे लाइन की फ़ेंसिंग का सवाल है वह मुझे अपने देश में संभव नहीं लगता है। रेलवे के पास संसाधन भी अपर्यप्त हैं और सुरक्षा की उसकी अन्य प्राथमिकताएं हैं। इतना और बता दूं कि विकसित देशों एवं अन्य विकासशील देशों में विकास का अर्थ केवल ढांचागत विकास ही नहीं होता है। अपितु उसके साथ लोगों के व्यवहार, सोच, और कायदे-कानूनों को मानने की प्रवृत्ति भी विकसित होते हैं। यदि लोग लापरवाही वरतना छोड़ दें बहुत-सी दुर्घटनाएं होना ही बंद हो जाएं।

मेरे अनुभव

मैं इंग्लैंड में रह चुका हूं। वहां पर मैंने देखा है कि रेलवे फ़ेंसिंग की आवश्यकता जानवरों के लिए अधिक और आदमियों के लिए कम अनुभव की जाती हैं। लाइन पार करने लिए आवश्यकतानुसार लाइन के ऊपर पुल या नीचे अंडरपास बने रहते हैं। यहां की तरह वहां लोगों की भीड़ भी जहातहां नहीं दिखती है। नियमों को मानते हुए सड़कें या रेलवे लाइन पार करते हैं। पटरियां उन जगहों से गुजरती हैं जहां गाएं एवं अन्य पशुओं को पालने के लिए फ़ार्महाउस बने होते हैं। ढेरों जानवरों के साथ उन्हें देखने वाले ग्वाले बहुत कम होते हैं। चरते-चरते जानवर लाइन पर न आ जाएं इसलिए फ़ेंसिंस की जाती है। अपने यहां फ़ेंसिंस करना भी चाहे तो आसान नहीं। देश में बहुत से इलाके मिल जायेंगे जहां रेलवे लाइन के दोनों तरफ़ रिहायशी मकान बने हों और लोगों का लाइन के आरपार आना जाना लगा रहता है। कम से कम झुग्गी-झोंपड़ियां तो खड़ी रहती ही हैं। ऐसे में रेलवे भी कितना सावधानी वरत सकती है?

मैंने यह भी देखा है कि इंग्लैंड में वहां जहांतहां पटाखे फोड़ना प्रतिबंधित रहता है। वहां भी पटाखों का चलन है जैसे “हैलोवीन” के मौके पर। पटाखों का कार्यक्रम रिहायशी मकानों बीच नहीं होता बल्कि उनके पास खुले मैदानों में ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इसी प्रकार पतंगें भी सड़कों एव मकानों की छतों से नहीं, बल्कि खुले मैदानों में उड़ाई जाती हैं। और अपने यहां?

हादसों के प्रकार अनेक

मैं जब मुद्दे पर गंभीरता से सोचता हूं तो मुझे लगता है कि रोजमर्रा की बहुत-सी दुर्घटनाएं जो पूरी तरह से मानव लापरवाही के कारण होती हैं। उनके लिए न प्रकृति दोषी ठहराई जा सकती है और न ही मशीनी उपकरण। यदि मशीनें कारण दिखाई देती हैं तो वह भी उसी लापरवाही की वजह से। आगे दुर्घाटनाओं के कुछ मामले गिनाता हूं जो बखूबी रोके जा सकते हैं:

(1) हर्ष-फ़ायरिंग कई लोगों को बंदूकें लहराकर खुशी व्यक्त करने का शौक होता है। वे यारों की शादी पर, किसी चहेते नेता की चुनाव में जीत पर, या ऐसे ही किसी और मौके पर हवा में गोली चलाने लगते है। इस अवांछित कृत्य में कभी-कभी किसी को गोली लग जाती है और खुशी मातम में तब्दील हो जाती है।

(2) पटाखों का चलन शादी-ब्याह, दीवाली-होली आदि मौकों पर पटाखों का चलन दिनबदिन बढ़ता जा रहा है। संकरी गलियां हों या बाजार का इलाका शौकीन लोगों को कोई चिंता नहीं रहती है। मुझे अपने शहर वाराणसी की एक दीवाली का स्मरण है जिसमें लंका नामक इलाके में स्थाई दुकानों के आगे पटाखों की अस्थाई दुकानें सजी थीं। पास ही में लोग पटाखे छोड रहे थे। एक चिनगारी कहीं से एक दुकान में गिरी। तब क्या हुआ होगा अंदाजा लगा सकते हैं।

(3) बिना लाइसेंस वाहन चालन मैंने वाहन चलाना वर्षों पहले छोड़ दिया था। जब मैं चलाता था तब मेरी पहचान में किसी का भी लाइसेंस वाहन-चालन के ठोस परीक्षण पर आधारित नहीं था। आज भी स्थिति वैसी ही होगी ऐसा मेरा ख्याल है। दुनिया के प्रमुख देशों में कड़े सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक परीक्षण का प्रावधान है। लोगों को एक-एक घंटा तक सड़कों पर वाहन-चालन क्षमता दिखानी पड़ती है। लाइसेंस के लिए कभी-कभी दो-दो तीन-तीन बार परीक्षण से गुजरना पड़ता है। साफ जाहिर है कि लाइसेंसधारी को नियम-कानूनों का अच्छा ज्ञान तथा जिम्मेदारी का भाव होता है। इसलिए वहां यातायात के नियमों का उल्लंघन बहुत कम होता है और जब होता है तो जुर्माना भी कम नहीं होता। अपने यहां लाइसेंस पाना आलू-प्याज खरीदने के माफिक होता है। सड़कों पर हादसे तो होंगे ही।

(4) व्यक्तिगत सुरक्षा के चिंता महानगरों को छोड़ दें तो आप देखेंगे अन्य शहरों में लोग दुपहिया वाहन पर हेल्मेट नहीं पहनते, कार चलाने में बेल्ट नहीं पहनते, सड़क पर गति की सीमा का ख्याल नहीं रखते, शराब के नशे में भी वाहन चलाते हैं, चलाते समय मोबाइल फोन पर बात करते रहते हैं, नींद के झोंके आ रहे हों तो भी वाहन चलाते है, वाहनों में अनुमत संख्या से कहीं अधिक सवारियां ठूंसते हैं, इत्यादि। प्रशासन की जिम्मेदारी होती है की कड़ाई से नियमों का पालन कराएं। प्रशासन परवाह नहीं करता तो क्या किसी को व्यक्तिगत तौर पर समुचित कदम नहीं उठाना चाहिए?

(5) आग की घटनाएं आए दिन दुकानों मे, बहुमंजिली इमारतों में, रिहायशी भवन में आग की घटनाएं सुनने को मिलती हैं। अक्सर “शॉर्ट-सर्किट” को दोष देकर जिम्मेदारी तय हो जाती है। क्यों होते हैं शॉर्ट-सर्किट इसकी परवाह कोई करता है? और ऐसे मौकों पर अग्निशमन के उपकरण मौके पर क्यों नहीं रहते हैं?

(6) आवारा पशु आवारा जानवर, खास तौर पर आवारा कुत्ते, कई दुर्घटनाओं के कारण बनते हैं। आवारा कुत्तों के झुंडों द्वारा जख्मी किए या मारे जाने की खबरें मीडिया में आती रहती हैं। इनको नियंत्रित करने के लिए क्या कभी राष्ट्र के स्तर पर अथवा राज्यों के स्तर पर समुचित प्रयास की बातें सुनी जाती हैं?

(7) अनियंत्रित भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार इस देश को खोखला कर रहा है। अधिकांश समस्याएं तो उसी की देन हैं। जीर्णशीर्ण भवनों का गिरना, निर्माण के समय भवनों और पुलों का गिरना आम बात है। सभी हादसों में गरीब लोग ही मारे जाते हैं जिनके जीवन की कीमत 2-4 लाख रुपया तय कर दी जाती है और मामले कालांतर में रफादफा हो जाते हैं। किसी को जिम्मेदार नहीं पाया जाता है।

इस प्रकार की अनेक दुर्घटनाएं रोजमर्रा के जीवन में देखने को मिलती हैं। घटना के समय घड़ियाली आंसूं बहाने वाले अनेक मिलेंगे। लेकिन आम जन और प्रशासन उनसे कोई सीख क्यों नहीं लेते? मेरी राय में आम लोग तमाशबीन होते हैं। वे जहां भीड़ हो वहां खतरे हो सकते हैं इसकी अनदेखी करके भीड़ में शामिल हो जाते हैं। क्या इतनी भी समझ नहीं होती कि वे स्वयं बचें?

दुर्घटनाओं के समय शासन चलाने वाले नेता “दोषी व्यक्ति बख्शे नहीं जाएंगे का आलाप शुरू करते हैं” लेकिन किसी को दोषी न ठहरा पाते हैं और न ही किसी जो दंडित करते हैं। अपने यहां के राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी, दोनों ही, असल में गैरजिम्मेदार होते हैं। क्यों न हों? उसी समाज से ही तो वे निकलते हैं जहां लापरवाही को जनता का मौलिक अधिकार समझा जाता है। वे घिसेपिटे तरीके से शासन-प्रशासन चलने के आदी होते हैं। विरला ही कभी थोड़ा नया और सार्थक कार्य करने की कोशिश करता है।

हादसों पर दुःखित होना स्वाभाविक है। लेकिन मुझे इस बात का अधिक दु:ख होता है कि यहां व्यवस्था के लिए उत्तरदायी लोगों को न तो कभी शर्म आती है और न कभी आत्मग्लानि। वे ऐसे हालात में भी देश को विकसित करने का ख्वाब देखते हैं। – योगेन्द्र जोशी

“मेरा भारत महान्” – तथाकथित संत-महात्माओं के लिए उपजाऊ भूक्षेत्र

२५ अप्रैल २०१८. जोधपुर की एक निचली अदालत ने स्वघोषित “संत” आसाराम को उम्रकैद की सजा सुना दी।

आसाराम के हजारों अनुयायियों के लिए यह समाचार बेहद तकलीफदेह एवं अविश्वसनीय रहा है। उन्होंने आसाराम को दोषी मानने से ही इंकार कर दिया।

मेरा मन इस विषय पर बहुत कुछ कहने को हो रहा है। लेकिन बहुत कुछ नहीं लिख सकता। मन में आने वाले विचार स्वतःस्फूर्त एवं तीव्रगति के होते हैं, किंतु उन्हें शब्दों में बांधकर दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करना एक धीमी प्रक्रिया होती है खासकर मुझ जैसे अकुशल लेखक के लिए।

अपने इस आलेख का आरंभ में महाभारत में वर्णित एक प्रकरण से करता हूं: उक्त ग्रंथ के शान्तिपर्व में कौरव-पांडव युद्ध की समाप्ति के बाद की स्थितियों का वर्णन है। युद्ध के दुःखद परिणामों से विचलित होकर राजा युधिष्ठिर राजकाज छोड़कर संन्यास ग्रहण करने का विचार अपने भाइयों के समक्ष रखते हैं । द्रौपदी समेत सभी भाई उन्हें सलाह देते हैं कि उन्हें जनता के हित में राजकाज चलाना चाहिए। वार्तालाप के सिलसिले में अर्जुन गेरुआवस्त्रधारी तथाकथित साधुओं की कटु आलोचना भी कर डालते हैं । वे कहते हैं कि ऐसे कई लोग ढोंगी होते हैं और आम जन को मूर्ख बनाकर अपनी जीविका चलाते हैं । तत्संबंधित दो कथन आगे प्रस्तुत हैं:

परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः ।

सिता बहुविधैः पाशैः सञ्चिन्वन्तो वृथामिषम् ॥32

(महाभारत, शान्तिपर्व, राजधर्मानुशासनपर्व, अध्याय 18)

अनिष्कषाये काषायमीहार्थमिति विद्धि तम् ।

धर्मध्वजानां मुण्डानां वृत्त्यर्थमिति मे मतम् ॥34

(यथोपर्युक्त)

पहले श्लोक के अनुसार अनेक जन गेरुआ वस्त्र धारण करके घूमते रहते हैं। वे लोग अनेक बंधनों से बंधे हुए मिथ्या ही दूसरों से दान पाकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर रहे होते हैं।

यहां स्पष्ट कर दूं कि गेरुआ वस्त्र प्रतीक है उन तौर-तरीकों का जो ये लोग अपनाते हैं। वे तरह-तरह से पहन-ओढ़ कर और स्वांग रचते हुए असामान्य दिखने का प्रयास करते हैं ताकि आम जन उन्हें अलौकिक ज्ञान एवं सामर्थ्य के साधु-महात्मा-संत के तौर पर स्वीकारने लगें। अगले श्लोक में वस्तुस्थिति अधिक स्पष्ट है:

दूसरा श्लोक बताता है कि दूषित (काषाय) मन के साथ गेरुआ/केसरिया चोला पहनना स्वार्थसिद्धि का साधन समझा जाना चाहिए । ऐसे नरमुंडों का मिथ्या  धर्म के नाम का झंडा उठाकर चलना वस्तुतः जीविका चलाने का धंधा है।

दूषित मन यानी जिस में मैल हो, खोट हो, दूसरों को मूर्ख बनाने की लालसा हो।

मैंने संन्यास धर्म को लेकर चार लेखों की एक शृंखला २०१६ में लिखी थी अपने अन्य ब्लॉग में। उनमें ये बातें विस्तार से स्पष्ट की गई हैं।

ये बातें महाभारत काल की हैं। कदाचित् तब झूठ और फरेब का इतना बोलबाला नहीं रहा होगा। अधिकांश जन धर्म के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाने से डरते होंगे। परंतु आज कलियुग है कलियुग ! धर्म के नाम पर ठगी आम बात हो चली है। लोगों के मन में पाप छिपा रहता है, लेकिन वे इस प्रकार व्यवहार करते है कि जैसे उन जैसा संत पुरुष मिलना मुश्किल है। और यही पर आज की कहानी शुरू होती है। अनेक प्रश्न मेरे मन में उठते हैं।

संत कहलाने का अधिकारी कौन?

प्रथम प्रश्न जो मेरे मन में उठता है वह है कि संत-महात्मा कौन होते हैं। क्या वह व्यक्ति संत-महात्मा कहलाने का अधिकारी हो सकता है जो आम जनों की कमजोरी का लाभ उठाते हुए अपना “आध्यात्मिक” साम्राज्य खड़ा कर लेते हैं और भौतिक संसार के आधुनिकतम सुख-सुविधाओं का भोग करते हैं? जरा याद करिए ४००-६०० वर्ष पूर्व के उन उपदेशकों को जिन्हें आज भी लोग संत-महात्मा के नाम पर स्मरण करते हैं और पूजते हैं। गुरु नानकजी, संत रविदासजी, संत कबीर आदि क्या थे? क्या उन्होंने आज के इन आध्यात्मिक “गुरुओं” की भांति अपनी जागीरें खड़ी की थीं? रविदासजी/रैदासजी जूते बनाते/मरम्मत करते थे। संत कबीरदासजी जुलाहे का कार्य करते थे। अपना कार्य वे सामान्य आदमी की तरह करते रहते थे और साथ ही ईश्वर-भक्ति एवं ज्ञान की बातें करते थे जो लोगों को प्रभावित करती थीं। उनका जीवन सरल एवं सादगी से भरा रहता था।

लेकिन आज के इन अध्यात्म के ठेकेदारों को देखिए कि कैसे ऐशोआराम की जिन्दगी जीते हैं, एकदम बेशर्मी के साथ।

विवेकशून्य लोगों का “बाबा-प्रेम”

दूसरा प्रश्न है कि वे क्या बातें हैं जिनके लिए लोग इन “बाबाओं” की शरण में पहुंचते हैं और खुद की सोचने-समझने की बुद्धि खो बैठते है। इसमें बिल्कुल भी संशय नहीं है कि इन बाबाओं को सम्मोहित करने की कला आती है। वे अपने हावभाव एवं भांति-भाति के नाटकीय व्यवहार से कइयों को आकर्षित करने में सफल होते हैं। लेकिन जनता यह क्यों नहीं समझ पाती जो व्यक्ति इस संसार के भोगविलास में लिप्त हो और स्वयं आध्यात्मिक मार्ग से भटक चुका हो दूसरों को कैसे आध्यात्मिक मार्ग दिखा सकता है? जो व्यक्ति पूरी बेशर्मी से स्वयं को भगवत्‍-अवतार घोषित किए बैठा हो कितना पुण्यात्मा होगा वह?

मुझे अक्सर आम लोगों की नादानी पर दुःख होता है और उन पर तरस भी आता है कि परमात्मा ने उनको इतनी सामान्य बुद्धि भी नहीं दे रखी है वे समझ सकें ऐसे ढोंगी बाबा स्वयं सुख भोगने के लिए उनकी मूर्खता का लाभ उठा रहे हैं। यों अपने समाज में दूसरों को तरह-तरह से मूर्ख बनाने वालों की कमी नहीं है। राजनेता सब्जबाग दिखाकर लोकतंत्र के नाम पर सत्तासुख भोगता है। कुछ लोग जनता के धन को माह-दोमाह में ही दूना-तिगुना करने का दावा करके लूटते हैं। प्रशासनिक तंत्र में जनता को लूटने का भ्रष्टाचार का खेल चलता ही है। बहुत से मौकों पर हम असहाय हो सकते हैं और कुछ कर न पायें। किंतु इन बाबाओं के चंगुल में फंसने की विवशता क्योंकर होती है?

स्त्रीजाति के प्रति विशेष लगाव?

तीसरी बात जो सर्वाधिक महत्व की है और जिस पर स्त्रीजाति को विशेष ध्यान देना चाहिए वह है कि अनेक मौकों पर स्त्री पुरुष के पतन का कारण बनती है। जासूसी क्षेत्र में यह सुविख्यात है कि पुरुषों को कर्तव्यच्युत करने के लिए स्त्रियों का भरपूर सहारा लिया जाता है। प्राचीन चिंतकों ने धर्मभ्रष्ट न हों इसके लिए पुरुषों को स्त्रियों के सान्निध्य से बचने की सलाह दी है। अनेक पौराणिक कथाएं पढ़ने को मिलती हैं जिसमें पुरुषों का तप भंग करने के लिए स्त्रियों की मदद ली गई हो। मेरे कहने का तात्पर्य बहुत स्पष्ट है। ये बाबा इन तथ्यों को क्या जानते नहीं हैं? तो फिर क्यों स्त्री-अनुयायियों की फौज खड़ी करते हैं? और स्त्रियां स्वयं इन बातों को क्यों नहीं समझ पातीं? साफ जाहिर है कि इन बाबाओं के असल उद्येश्य ही यौन-सुख भोगना होता है और उनकी पूरी योजना ही उसी के लिए ढली रहती है। लेकिन दुःख तब होता है जब in अनुयायी-स्त्रियों में कुछएक स्वयं को अपने “भगवान्” बाबा भोगने के लिए समर्पित कर देती हैं और शेष बाबा को  निर्दोष कहने में देर नहीं करतीं। क्या यह नहीं समझ में आता है कि कोई भी व्यक्ति दूसरे के २४ घंटों की चर्या पर नजर नहीं रख सकता? परोक्ष में कोई क्या कर रहा है कोई बता ही नहीं सकता। मां-बाप अपनी संतान के क्रियाकलापों के बारे में आश्वस्त नहीं हो सकते। पति-पत्नी भी एक दूसरे के चरित्र की गारंटी नही ले सकते। किसी के अपराधों का लेखा-जोखा रखना सामान्य व्यक्ति के लिए संभव ही नहीं। इसलिए किसी बाबा के निर्दोष होने का आश्वासन कोई अनुयायी भला कैसे दे सकता है? इस बात को याद रखना चाहिए।

राजनेताओं एवं प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका

चौथी बात जिसका उल्लेख करना आवश्यक है वह है कि जब बाबा लोग अनुयायियों की ऐसी फौज खड़ी करते हैं जिसकी अपनी कोई स्वतंत्र सोच रह ही नहीं जाती है तब चुनावों में इन बाबाओं की भूमिका अहम हो जाती है। यह गौर करने की बात है कि चुनावों के मौसम में राजनेता अथवा उनके दल के मुखिया का इन बाबाओं की शरण में पहुंचने लगते हैं ताकि उनके समर्थकों के वोट पाए जा सकें। बाबाओं के प्रति राजनैतिक दलों का इस प्रकार का रवैया उनको स्थापित करने में मदद करता है। बाबाओं और राजनेता का ऐसा गठजोड़ दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन भारतीय लोकतंत्र में सत्ता कैसे हथियाई जाए यही सबसे महत्व की चीज बन चुकी है। यह देशहित में होगा क्या यह प्रश्न कोई भी स्वयं से नही पूछता।

जब बाबाओं से राजनेता उपकृत होते हैं तो बदले में बाबा भी उनसे बहुत कुछ पाने की अपेक्षा करते हैं। उनको सस्ते में जमीन दी जा सकती है ताकि आश्रम स्थापित हो सकें। उनके कुकर्मों पर शासन पर्दा डाल सके यह भी एक दुष्परिणाम होता है। इतना ही नहीं प्रशासनिक अधिकारी भी उनकी शरण में पहुंचने लगते हैं ताकि वे बाबाओं के माध्यम से शासकों से प्रोन्नति में लाभ ले सकें अथवा मुंहमांगा कार्यस्थल पा सकें। इस प्रकार बाबाओं, राजनेताओं, एवं प्रशसनिक अधिकारियों का ऐसा गठजोड़ तैयार होता है जो देश के लिए घातक होता है। इस गठजोड़ के सभी घटक परस्पर एक-दूसरे को बचाते हैं। यही इस देश में होता आ रहा है।

मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं कि धर्म एवं अध्यात्म के नाम पर इतने बाबाओं का अवतरण इसी देश में क्यों हुआ है। अन्य देशों की स्थिति इतनी दयनीय नहीं है। आस्था के नाम पर अंधविश्वास हमारे समाज में जड़े जमा चुका है।

अंत में एक वाकये का जिक्र भी लगे हाथ कर लेता हूं।

अपने विश्वविद्यालय में मेरे एक सहकर्मी शिक्षक हुआ करते थे, लगभग मेरे हमउम्र। कुछ वर्षों पूर्व वे सेवानिवृत्त हो गये। (मैंने पहले ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले थी।) वे जब कार्यरत थे तभी ओशो (आरंभ में भगवान्‍?) रजनीश के अनुयायी बन गए और कत्थई (maroon) रंग के वस्त्र पहनने लगे थे। वि.वि. में ये परिधान शायद नहीं पहनते होंगे। वे अपने “अध्यात्मिक” कार्यक्रमों में मुझे भी अक्सर आमंत्रित करते थे। बिल्कुल दिलचस्पी न होते हुए भी मैं कभी-कभार शिष्टाचार या सदाशयता के नाते उनके कार्यक्रमों में चला जाता था।

जब ओशो रजनीश का देहावसान हो गया और उनका सामाज्य विवादों में घिर गया तो वे हरियाणा के यमुनानगर के किसी “गुरु” की शरण में पहुंच गये। मुझे भी अनुयायी बनने के लिए प्रेरित करते रहते थे। मेरे घर पर अपने गुरु के गुणगान की पत्रिकाएं देते रहते थे। मैं पत्रिकाएं स्वीकार तो कर लेता था लेकिन पढ़ता नहीं था। (मैं किसी भी बाबा/गुरु को सम्मान की दृष्टि से नहीं देख पाता !) पिछले कुछ समय से उनसे मेरी मुलाकात नहीं हुई है। पता चला कि सेवानिवृत्ति के बाद वे अपने गुरु के “पूर्णकालिक” भक्त हो गए। यह भी पता चला कि अपनी पेंशन भी गुरु को समर्पित कर दिए हैं। सुनने में आया कि उनकी पत्नी बेटे की शादी करने का अनुरोध करती रहीं, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें अब कोई दिलचस्पी नहीं। जिस पत्नी के साथ उन्होंने जीवन के ४०-४५ वर्ष बिताए उसकी भी उन्हें परवाह नहीं रही; बच्चों की बात छोड़िए।

यह घटना है वि.वि. स्तर के एक उच्चशिक्षित व्यक्ति के गुरु-शरण में जाने की, उस गुरु की जो स्वयं गार्हस्थ्य जीवन जी रहे हैं, दूसरों की कमाई के बल पर। जब ऐसा व्यक्ति भ्रमित हो सकता है तो आम आदमी कैसे बच सकता है? – योगेन्द्र जोशी

 

 

 

Why one should opt for NOTA : Its importance in Elections

Satyam Naiva Jayati सत्यं नैव जयति

Independence Day, August 15

My Good Wishes to all Countrymen

This on the Occasion of Independent Day

Voter’s right: Voting for no Candidate

The term NOTA is an acronym for “None Of The above” option available to voters in elections who find no candidate to their satisfaction. The Ballot Paper earlier and Electronic Voting Machine (EVM) now lists, from top to Bottom in some prescribed order, Names and Symbols of all Candidates fighting an Election. One selects the candidate from that list and puts one’s seal (a Cross Mark) against that candidate’s name on Ballot Paper, or one presses the button against that name on the EVM.

“Conduct of Elections Rules, 1961” gives a voter the Right of NOT Voting in favour of any Candidate. But it also states that the number of such “No Votes” would not affect the outcome of the Election Results. That means

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“सरकार का काम” – कविता  : एक प्रयोग

हिन्दी तथा कुछ और भी

मुझे, तुझे, हम सब को चाहिए सुरक्षा,

सुरक्षा मुहैया कराना सरकार का काम।

मेरी, तेरी, हमारी कोई जिम्मेवारी नहीं,

सुरक्षा करना-कराना सरकार का काम।

हम घर खुला छोड़ दें चल दें कहीं भी

चोरी न हो, उसे रोकना सरकार का काम।

कान में फोन लगाए रेल-पटरी पार करें

तब हमें चेताना-बचाना सरकार का काम

नदी-सागर के बीच सेल्फी लेने लगें हम

अनहोनी से बचाना भी सरकार का काम

उड़ा नियमों की धज्जी वाहन चलाएं हम,

फिर कहें हादसे रोकना सरकार का काम।

सड़कपै बेखौफ वाहन चलाएं लगाएं जाम,

जाम से निजात दिलाना सरकार का काम।

बात-बात पै गुस्से से नुकसान पहुंचाएं हम

उसका मुआवजा भरना सरकार का काम।

सड़क पर कचरा बिखेरें ये हमारी मरजी,

सड़क साफ रहे यह तो सरकार का काम।

पान खाएं पीक थूकें जहां-तहां सड़क पर

सड़क की धुलाई करना सरकार का काम

किस-किस की छूट मिले कहना है मुश्किल

मनमरजी से जीने दे यही सरकार…

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“अहिंसा परमो धर्मः …” – महाभारत में अहिंसा संबंधी नीति वचन (1)

“अहिंसा परमो धर्मः” यह नीति-वचन लोगों के मुख से अक्सर सुनने को मिलता है। प्राचीन काल में अपने भारतवर्ष में जैन तीर्थंकरों ने अहिंसा को केंद्र में रखकर अपने कर्तव्यों का निर्धारण एवं निर्वाह किया। अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर के लगभग समकालीन (कुछ बाद के) महात्मा बुद्ध ने भी करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व तमाम कर्तव्यों के साथ अहिंसा का उपदेश तत्कालीन समाज को दिया था। अरब भूमि में ईशू मसीह ने भी कुछ उसी प्रकार की बातें कहीं। आधुनिक काल में महात्मा गांधी को भी अहिंसा के महान् पुजारी/उपदेष्टा के रूप में देखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने तो उनके सम्मान में 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस घोषित कर दिया।

अहिंसा की बातें घूमफिर कर सभी समाजों में की जाती रही हैं, लेकिन उसकी परिभाषा सर्वत्र एक जैसी नहीं है। उदाहरणार्थ जैन धर्म में अहिंसा की परिभाषा अति व्यापक है, किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार से…

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