हिंदी (हिन्दी) दिवस यानी Hindi Day, 14 Sept 2021

“हिन्दी दिवस” की सार्थकता पर संदेह व्यक्त करते हुए लिखित ब्लॉग-पोस्ट।

हिन्दी तथा कुछ और भी

1. हिंदी दिवस

आज 14 सितंबर हिंदी दिवस है, अर्थात् Hindi Day(?)! इसी दिन हिन्दी को राजभाषा की उपाधि मिली थी (सन् 1950)। यह दिवस किस वर्ष से मनाया जा रहा है यह मुझे पता नहीं। शायद सन् 1950 के बाद प्रतिवर्ष मनाया जा रहा हो। इसमें मेरी दिलचस्पी 30-35 सालों से है जब से मैं हिंदी लेखन-पठन में विशेष रुचि लेने लगा (फ्रांसीसी शहर पेरिस के अनुभव के बाद)।

आरंभ में मुझे यह दिवस सार्थक एवं आशाप्रद लगा, किंतु जैसे-जैसे समय बीतता गया मुझे इस दिवस के औचित्य पर गंभीर शंका होने लगी। समय के साथ मुझे लगने लगा कि अंग्रेजी की महत्ता दिनबदिन बढ़ ही रही है और लोगों का उसके प्रति लगाव भी बढ़ने लगा है। हर क्षेत्र में उसका प्रयोग घटने के बजाये बढ़ ही रहा है। यहां तक कि सरकारें भी अघोषित तरीके से अंग्रेजी प्रयोग को बढ़ावा देती आ रही हैं। अब तो वैश्विक…

View original post 2,174 और  शब्द

परीक्षा में नकल – तब और अब

जिंदगी बस यही है

परीक्षा में नकल – तब और अब

आज से ५९ वर्ष पहले की एक घटना मुझे याद आती है जब मैं पर्वतीय राज्य उत्तराखंड के एक विद्यालय का छात्र था। उस समय उत्तराखंड उत्तर प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था। मुझे यू.पी. बोर्ड के हाई स्कूल (१०वीं कक्षा) की परीक्षा देनी थी।

मैं एक छोटे-से गांव में जन्मा था और उसी के पास की पाठशाला (प्राथमिक विद्यालय) में मेरी आरंभिक शिक्षा-दीक्षा हुई थी। हाई स्कूल के लिए मुझे गांव से करीब ७-८ किलोमीटर दूर के विद्यालय जाना पड़ा था। उस पर्वतीय क्षेत्र में आनेजाने के लिए आम तौर पर पगडंडी वाले ही रास्ते होते थे। अब तो पर्वतीय क्षेत्रों में भी सड़कों का जाल बिछ चुका है, इसलिए कुछ राहत जरूर है। आवागमन की समुचित सुविधा के अभाव में अपने विद्यालय के निकट भाड़े (किराये) पर रहना मेरी विवशता थी।

उस समय देश को स्वतंत्र हुए मात्र १४-१५ वर्ष हुए…

View original post 444 और  शब्द

सुकून का एहसास

किसी अजनबी से आत्मीयता के साथ जुड़ने का मौका आये और उससे मुलाकात का अंत सुखद रहे तो सुकून का एहसास होता है। (कहानी)

जिंदगी बस यही है

त्रिलोचन बाबू ने घर के मुख्य प्रवेशद्वार (गेट) के खटखटाये जाने की आवाज सुनी। आम तौर पर लोग गेट के बगल में लगी घंटी का बटन दबाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उन्होंने सोचा कि कोई अजनबी होगा जिसे घंटी का अंदाजा न रहा हो। अखबार का हाथ में पकड़ा हुआ पन्ना फेंकते हुए-से अंदाज में उन्होंने सोफे के एक तरफ रखा और उठकर कमरे का दरवाजा खोलने पहुंचे। गर्दन बाहर निकालते हुआ गेट की तरफ देखा। बाहर कोई खड़ा था। वे बाहर आये और गेट की तरफ बढ़े। कोई नया चेहरा था जिसे उन्होंने शायद पहले कभी देखा नहीं था। सवाल किया, “मैंने आपको पहचाना नहीं। मुझसे काम है या किसी और के बारे में …?” कहते हुए गेट का एक पल्ला खोल दिया।

बाहर खड़े आगंतुक ने कहा, “दरअसल आपसे पानी मांगना चाहता था। गरमी है; प्यास लगी है।”

त्रिलोचन बाबू ने उक्त आगंतुक को ऊपर से नीचे…

View original post 717 और  शब्द

साइकिल में गुन बहुत हैं …

साइकिल में गुन बहुत हैं सदा राखिए संग।

पेट्रोल की जहमत नहीं बदलें जीने का ढंग॥

साइकिल के “गुन-अवगुनों” की बात करने से पहले में यह बताना चाहूंगा कि साइकिल से मेरा रिश्ता कब और कैसे स्थापित हुआ।

पर्वतीय पृष्ठभूमि

मेरा जन्म उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) के सुदूर पर्वतीय क्षेत्र के छोटे-से गांव में तब हुआ था, जब अपना देश भारत (यानी इंडिया) बस स्वतंत्र ही हुआ था। उस काल में वहां सड़कों का जाल नहीं था। निकटतम बस अड्डा पैदल मार्ग से लगभग १७ मील (करीब ३२ कि.मी.) दूर हुआ करता था। वह समय था जब शेर-छटांक, गज-फुट, मील, सोलह आने (६४ पैसे) के अंग्रेजी काल के माप-तौल की इकाइयां चलन में थीं। आज के बच्चे-युवा इनका नाम भी नहीं जानते हों तो ताज्जुब नहीं। मेरे जीवन के शुरुआती १३-१४ वर्ष गांव के माहौल में ही बीते थे। कक्षा ५ तक की आरंभिक शिक्षा भी गांव की ही पाठशाला में हुई थी। हम लोग प्राइमरी स्कूल या प्रारंभिक विद्यालय नहीं कहते थे, भले ही इन संबोधनों से परिचित थे। बिजली, टेलीफोन, रेलगाड़ी, बस, साइकिल, आदि शब्द हम बच्चे सुनते तो थे किंतु ये सब क्या होते होंगे की सही कल्पना नहीं कर पाते थे। उस पर्वतीय क्षेत्र की चढ़ाई-ढलान वाली पगडंडियों पर साइकिल का कोई काम नहीं था। कहीँ-कहीं ३-४ फुट चौडे रास्ते भी होते थे जिन पर खच्चर/घोड़े से सामान या सवारी ढोने का कार्य लिया था। यह सब कहने का तात्पर्य यह है कि आरंभिक किशोरावस्था तक साइकिल का साक्षात्कार मैंने नहीं किया था।

छात्रजीवन और साइकिल

जब गांव से ८-१० कि.मी. दूर के विद्यालय से हाई-स्कूल (१०वीं) की परीक्षा उत्तीर्ण करके जब कानपुर पहुंचा आगे की शिक्षा के लिए तब मेरा साइकिल से असल परिचय हुआ। परिचय ही नहीं विद्यालय आने-जाने के लिए गिरते-पड़ते उसे सीखा भी। और फिर वह अपनी सवारी बन गयी अभी तक के जीवन भार के लिए। अभी तक के जीवन भर के लिए इसलिए कह रहा हूं क्योंकि कल किसी ने देखा नहीं, शारीरिक सामर्थ्य कितनी रहेगी कोई बता नहीं सकता।

यह बताना भी समीचीन होगा कि उस जमाने में तांगा, रिक्शा, बस, और साइकिल ही शहरी आवागमन के साधन होते थे, या फिर पैदल ही रास्ता नापा जाता था। स्कूटर, बाइक और कारें किस्मत वालों के पास देखने को मिलते थे। इनकी उपलब्धता भी बेहद कम थी। शहरों में जाम की समस्या शायद ही कहीं सुनने को मिलती होगी। यही साइकिल मेरे और मेरे सहपाठियों के आवागमन का साधन बना रह एक लंबे समय तक। विश्वविद्यालय तक की शिक्षा लेने और उसके बाद शोधछात्र के तौर पर और २-४ साल बाद विश्वविद्यालय में भौतिकी (physics) के शिक्षक के तौर पर कार्यरत होने के बाद भी मेरा साइकिल चलाना वैसे ही चलता था जैसे मेरे अन्य संगीसाथियों का। विकल्प भी कहां थे? वह काल था जब स्कूटर ब्लैक में मिलते थे, विशेषतः वेस्पा मॉडल, दुगुने-डेड़ गुने दाम पर। मुझे याद है यह सुना हुआ कि मेरे एक-दो वरिष्ठ शिक्षक जब कभी विदेश जाते थे तो वहां से मिले डॉलरों से स्कूटर खरीदते थे और कालांतर में उसे ब्लैक में बेच देते थे। सन् १९७० के दशक में सरकारों ने सीमित संख्या में स्कूटर-निर्माण की छूट निर्माताओं को दी और वे लोगों को उपलब्ध होने लगे। मेरे संगी साथियों ने भी अपनी जमा-पूंजी से स्कूटर खरीदे, और फिर उनमें से कुछ की साइकिल की आदत धीरे-धीरे छूट ही गयी। बढ़ती संपन्नता के साथ साइकिल की जगह पहले स्कूटर ने और बाद में कार ने ली।

साइकिल और स्कूटर साथ-साथ

मैंने भी १९८१ में एक स्कूटर खरीदा, किंतु साइकिल छोड़ी नहीं। विश्वविद्यालय या अन्यत्र जाने पर कोई एक इस्तेमाल कर लेता था। जहां किसी और को साथ ले चलना होता, या शीघ्रता से कहीं पहुंचना होता अथवा अधिक दूर जाना होता तो स्कूटर ही प्रयोग में लेता था। अन्यथा कभी साइकिल तो कभी स्कूटर। मेरे शहर वाराणसी की दुर्व्यवस्थित यातायात व्यवस्था वाली सड़कों ने स्कूटर चलाने की मेरी हिम्मत वर्षों पहले छीन ली थी। जीवन के ७३ वसंत पार कर चुका मैं अब स्कूटर नहीं चलाता। बस एकमात्र साइकिल ही मेरा निजी वाहन है। मैं आवश्यकतानुसार पैडल-रिक्शा, ऑटोरिक्शा, अथवा टैक्सी का इस्तेमाल कर लेता हूं।

जैसा कह चुका हूं मेरे परिचितों, संगी-साथियों और सहकर्मियों में से कई ने कारें ले लीं और साइकिलें छोड़ दीं। एक बार जब विश्वविद्यालय कर्मचारियों का वेतन-पुनरीक्षण एवं वेतन-वृद्धि हुई तो मुझे साथियों ने सलाह दी थी कि मैं भी कार खरीद लूं। कार चलाना तो मैंने कभी सीखी नहीं। और मेरे शहर वाराणसी की बेतरतीब तथा जाम से ग्रस्त यातायात व्यवस्था में मुझे उसकी कोई उपयोगी नहीं दिखी। इसलिए मैं ‘बे’कार ही रहा।

अब मैं इस लेख के शीर्षक में व्यक्त असली मुद्दे पर आता हूं। जब मैंने करीब २० साल पहले पर्यावरण (environment), प्रदूषण (pollution), पारिस्थितिकी (ecology) एवं प्राकृतिक संसाधनों (natural resources) जैसे मुद्दों पर जिज्ञासावश जानकारी जुटानी शुरू की तो मुझे एहसास हुआ कि वस्तुस्थिति काफी गंभीर है। लगभग वही समय था जब मेरे हृदयरोग का निदान भी हुआ और डाक्टरी सलाह पर दवाइयों के सेवन के साथ मैंने तेज गति से टहलना (brisk walking) भी आरंभ किया। आज हूं तो हृद्रोगी, लेकिन खुद को हृद्रोगी के रूप में नहीं देखता। इस रोग के होते हुए भी मैं १००-५० नहीं १०००-१२०० सीढ़ियां आराम से चढ़ लेता हूं।

उसी समय मुझे शारीरिक श्रम तथा साइकिल की उपयोगिता विशेष तौर पर समझ में आने लगी। तब की अनुभूति ने मुझे अधिकाधिक पैदल चलने और साइकिल चलाने के लिए प्रेरित किया। साइकिल की उपयोगिता के दूसरे पहलू भी मुझे समझ मैं आने लगे। आगे उसी सब का संक्षेप में उल्लेख कर रहा हूं।

साइकिल में गुन बहुत

किसी वस्तु अथवा कार्य से क्या लाभ हैं इसका आकलन हर व्यक्ति अपनी प्राथमिकताओं और पसंदगी के आधार पर तय करता है। बहुत संभव है कि जिसे में लाभ कहूं उसे आप कोई लाभ नहीं कहकर खारिज कर दें। स्पष्ट है कि मैं अपनी सोच के अनुसार साइकिल के लाभ गिनाउंगा।

(२) यह ऐसा साधन है जिसके इस्तेमाल करने पर शारीरिक व्यायाम भी होता है। आजकल लोग शारीरिक श्रम से परहेज करते हैं और शिकायत करते हैं कि उन्हें हृदरोग जैसी शिकायत है। शारीरिक श्रम के अभाव में रोगी बनने की संभावना बढ़ जाती है यह चिकित्सक भी कहते हैं। साइकिल का प्रयोग करने पर जिम जाने की जरूरत नहीं। वृद्धावस्था में साइकिल चलाना या टहलना ही बेहतर व्यायाम है।

(१) साइकिल यातायात का एक सस्ता साधन है। इंधन-चालित वाहनों की तुलना में उसकी कीमत काफी कम रहती है। उसका रखरखाव का खर्चा भी कुछ खास नहीं होता है। इंधन-आधारित न होने के कारण उसके रोजमर्रा इस्तेमाल पर भी कोई खर्चा भी नहीं होता।

(३) साइकिल पर्यावरण के लिए हितकर है। न कार्बन प्रदूषण, न ध्वनि प्रदूषण, न सड़क पर जाम का खास कारण बनता है। जाम की स्थिति पर जहां अन्य वाहनों को रुकना पड़ता है वहीं साइकिल-चालक बगल-बगल से निकलने में भी सफल हो सकता है। सड़कों पर अन्य वाहन दुर्घटना के कारण बन सकते हैं लेकिन साइकिल शायद ही कभी कारण होगा।

(४) अन्य वाहनों को खड़ा करने के लिए भी जगह चाहिए। आजकल शहरों में वाहनों की “आबादी” पर कोई रोक नहीं किंतु उनकी “पार्किंग” के लिए पर्याप्त स्थान कम ही उपलब्ध है। मेरे शहर, वाराणासी, में तो हालात इतने खराब हैं कि कभी-कभी बेतरतीब खड़े वाहनों के कारण पैदल चलना भी दूभर हो जाता है। साइकिल को खड़ा करना रिहायशी कमरे में भी संभव है और सड़क के किसी कोने-किनारे पर भी।

अवगुन भी तो हैं

(१) साइकिल की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इससे चलाने वाले की प्रतिष्ठा पर बट्टा लग जाता है। आप संपन्न हों तो आपसे उम्मीद की जाती है कि आप कार से नीचे किसी वाहन को नहीं चलाएंगे। कुछ नहीं तो बाइक आपके पास होनी चाहिए। साइकिल तब आपकी प्रतिष्ठा के अनुरूप हो सक्ती है जब आपकी इतनी ख्याति हो कि आपकी संपन्नता से लोग सुपरिचित हों और वे जानते हों कि आप स्वास्थ्य के प्रति सचेत होने से साइकिल चलाते हैं।

(२) आम तौर पर साइकिल एक सवारी के लिए बनी रहती। इसलिए दो या अधिक सवारियों के लिए हरएक के लिए साइकिल की जरूरत होती है। साइकिल की यह कमी गंभीर तो है ही। वैसे कभी-कभार दो-दो तीन-तीन सवरियां ढोते हुए भी लोग दिख जाते हैं।

(३) साइकिल के इस्तेमाल का मतलब है शारीरिक श्रम और उसका मतलब है आराम की जिन्दगी को छोड़ना। आम तौर पर मनुष्य सुखसुविधा से जीना चाहता है। आधुनिक तकनीकी का विकास जीवन को अधिकाधिक आरामदेह बनाना भी है। कष्टकर जीवनशैली को भला कौन चुनना चाहेगा?

अन्त में निजी रुचि

     अभी साइकिल के लाभहानि की उक्त बातें ही मेरे मस्तिष्क में आ रही है। इनके अतितिक्त भी लाभ या हानि की अन्य बातें हो सकती हैं। लेख का समापन करूं इससे पहले यह भी बताना चाहूंगा कि मेरी उम्र ७३+ हो चुकी है, फिर भी पैदल चलना मेरी पहली पसंद है। डेड़-दो कि.मी. दूर के गतव्य के लिए पैदल चलना मुझे स्वीकार्य है। पांचएक कि.मी. की दूरी तक साइकिल से आना-जाना मुझे कठिन नहीं लगता है। अधिक दूरी के लिए ऑटोरिक्शा या अन्य साधनों का सहारा लेना पड़ता है। पहले कभी स्कूटर चलाता था, लेकिन अब नहीं। वाराणसी की दुर्व्यवस्थित यातायात में स्कूटर से चलना मेरे लिए संभव नहीं। – योगेन्द्र जोशी

कोरोना महाप्रकोप का सकारात्मक प्रभाव

जिंदगी बस यही है

इस समय पूरा विश्व कोरोना-जनित महामारी की चपेट में है। कोरोना नामक विषाणु चीन के वुहान शहर से निकलकर सर्वत्र फैल चुका है। खुद चीन में यह कहां से आया यह स्पष्ट नहीं हो पाया है। कहा जाता है कि वुहान में चमगादड़ों के साथ-साथ अन्य पशु-पक्षियों का मांस बिकता है और विषाणु वहां के चमगादड़-मांस से लोगों के बीच फैला। कुछ लोगों का कहना है कि वुहान की एक विषाणु प्रयोगशाला में ही कोरोना का जन्म हुआ और किसी चूक से यह बाहर नगरवासियों में फैल गया। एक मत यह भी है कि आर्थिक तौर पर दुनिया को पंगु करने के लिए चीन ने इसे ईजाद किया और दुनिया में फैलने दिया। ऐसे अनेक मत व्यक्त किए जा सकते हैं। वास्तविकता क्या है यह अभी कोई नहीं जानता। बस इतना सच है कि इस विषाणु ने दुनिया की बहुत बड़ी आबादी को रोगग्रस्त कर दिया है और लाखों को…

View original post 710 और  शब्द

चाणक्य नीति – राजकर्मचारी राजा से कैसा व्यवहार करे (भाग २)

     दो लेखों की शृंखला का यह मेरा दूसरा लेख है। मैंने पिछले एवं शृंखला के पहले लेख में चाणक्य, जिन्हें कौटिल्य के नाम से भी जाना है, के ग्रंथ “कौटिलीय अर्थशास्त्र” का जिक्र किया था जिसमें राजा के और उसके प्रशासनिक तंत्र की कार्य-प्रणाली की विस्तृत चर्चा की गयी है। शासन के विभिन्न पहलुओं जैसे आर्थिक तंत्र, न्यायिक व्यवस्था, लोक-कल्याण, प्रजा के अधिकार एवं दायित्व, आदि के विषय पर ग्रंथकार ने एक निष्ठावान राजनीतिज्ञ के तौर पर अपना मत व्यक्त किया है।

     इस ग्रंथ के विषयानुसार लिखित अधिकरणों में से एक में राजकर्मचारी के दायित्वों, राजा के प्रति शालीन व्यवहार, और राजा के रोष से बचने की सावधानी आदि की बातें बताई गई हैं (कौटिलीय अर्थशास्त्र, अधिकरण ५, अध्याय ४)। उक्त ग्रंथ के संबंधित ३ छंदों (श्लोकों) का उल्लेख मैं पिछले ब्लॉग-लेख (१९ अक्टूबर) में कर चुका हूं। शेष ४ चार श्लोक यहां पर प्रस्तुत…

View original post 618 और  शब्द

गांधी जयन्ती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस – क्या है अहिंसा?

गांधी जयंती

आज गांधी जयंती है, दो अक्टूबर। गांधी-जन्म के १५० वर्ष पूरे हुए। मैं इस समय गेन्ज़विल (फ़्लोरिडा, अमेरिका) में हूं, कुछ हफ़्तों के प्रवास पर। भारत के राष्ट्रीय समय से यहां की घड़ी ९:३० घंटे विलंबित रहती हैं। यहां इस समय २ अक्टूबर का दिन है और तदनुसार अपने देश में रात्रि है।

जैसा कि परंपरा है गांधीजी के गुणगान करने और उनके विचारों की महत्ता का बखान करने का दिन रहता है यह। देश की खबरें जानने को इंटर्नेट के माध्यम से समाचार पत्रों पर नजर दौड़ाने पर मुझे गांधीजी के विचारों को प्रस्तुत करने, उन्हें प्रसारित करने वाली विज्ञप्तियां दिखती हैं। देश में राजनेताओं, सामाजिक संगठनों, एवं अन्य लोगों ने कैसे यह दिन गांधीजी को समर्पित किया होगा यह तो मुझे कल के समाचारपत्रों से ही पता चलेगा। हमें उनके सुझाए मार्ग पर चलना चाहिए आदि कहकर रस्मादयगी की परंपरा सदैव की भांति निभाई ही गई होगी। जैसा होता आया है विचार व्यक्त करने वाले और सुनने वाले दोनों ही फिर अपने रोजमर्रा की चर्या में लौट जाते हैं। जिसे जैसे जीना है वह इस दिवस के बाद भी अपनी-अपनी सुविधानुसार वैसे ही जीता है, कहीं कोई फर्क पड़ता है ऐसा मुझे नहीं लगता है।

गांधी जी का अहिंसावाद

जिस बात को लेकर गांधीजी की सर्वाधिक चर्चा होती रही है वह है उनका अहिंसावाद। उनके इसी अहिंसावाद को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस विशेष दिन (२ अक्टूबर) को “अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस” घोषित किया था। दुनिया के लिए गांधी का महत्व इसी अहिंसा के विचार तक सीमित है ऐसा मुझे लगता है। इसके आगे भी गांधी की प्रासंगिकता है यह पूरे विश्व के लिए शायद माने नहीं रखता है। किंतु भारत के लिए उनके अन्य विचार अधिक माने रखते हैं जिनकी सार्थकता पर विवाद नहीं हो सकता है। अहिंसा का विचार अच्छा तो है किंतु व्यावहारिक नहीं है ऐसा मैं सोचता हूं। क्यों? इसे स्पष्ट करना मेरे इस आलेख का विषय है। उस विषय पर आऊं इससे पहले उन कुछएक बातों की चर्चा करना समीचीन होगा जो गांधी जी के विचारों में शामिल रहे हैं।

क्या कहते थे गांधी जी?

(१)   वे कहते थे सामाजिक भेदभाव नहीं होना चाहिए जिसका एक पहलू छुआछूत की परंपरा के रूप में समाज में सदियों से रहा है और आज भी कुछ अंश तक बचा है।

(२)   मनुष्य को अपने निजी कार्य यथासंभव खुद ही करना चाहिए, जैसे अपने लत्ते-कपड़े धोना, शौचालय-स्नानगृह साफ रखना आदि। 

(३)   हमें अपने शारीरिक श्रम का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए, जैसे छोटी-मोटी दूरी के लिए पैदल चलना या साइकिल का प्रयोग करना।

(४)   हमें अपने परिवेश को स्वच्छ रखना चाहिए। गांधीजी के इसी विचार से प्रेरित होकर देश में (मात्र आंशिक रूप से सफल) ’स्वच्छ भारत अभियान’ चल रहा है।

(५)   गांधीजी सादे जीवन के पक्षधर थे। मितव्ययिता अमल में लाना और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से बचना उनके विचारों में निहित रहे हैं।

(६)   गांधीजी इस बात के प्रबल पक्षधर थे कि समाज में आर्थिक विषमता एक सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए। अर्थात् अतिसंपन्न लोग अपनी संपदा से विपन्न लोगों की सहायता करें। इस विचार में परोपकारिता की भावना निहित है।

(७)   गांधीजी देश को कृषिप्रधान मानते थे और गांवों के उत्थान के हिमायती रहे। छोटे-मोटे उद्योगों विशेषतः घरेलों उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करते थे।

(८)   कहा जाता है कि गांधीजी अहिंसावादी के साथ सत्यवादी एवं निष्ठावादी भी थे। अर्थात् अपने जिम्मे के कार्य के प्रति दुराव-छिपाव से मुक्त समर्पण भाव लोगों में होना चाहिए।

(9)    गांधीजी भारतीय भाषाओं को अधिकाधिक प्रयोग में लेने एवं अंग्रेजी पर निर्भरता को कम से कम करने के प्रबल पक्षधर थे।

इस प्रकार की अन्य बातें भी उनके विचारों में रही होंगी। गांधीजी को लेकर मेरे ध्यान में जो आया उसका उल्लेख मैंने किया है।

उनके देहावसान को आज ७२ वर्ष बीतने को हैं। उनकी प्रशंसा तो प्रायः सभी करते रहते हैं किंतु सवाल उठता है कि उनके विचारों को अमल में लाने का प्रयास कितने लोग करते हैं? उदाहरण के तौर पर देशज भाषाओं को लीजिए। जिस अंग्रेजी से देश को मुक्तप्राय करने की बात वे करते हैं वह अब देश पर पूरी तरह हावी हो चुकी है। गांधीजी का गुणगान करना एक बात है, उनके विचार स्वीकारना नितांत अलग बात।

मैं गांधीजी के सतही एवं अगंभीर गुणगान का विरोधी हूं। व्यक्तिगत तौर पर मैं यह मानता हूं कि उनके विचार आदर्शों से प्रेरित थे, जिनको व्यावहारिक जीवन में उतारना इस विविधताओं से भरे वास्तविक संसार में संभव नहीं। अगर कुछ हो सकता है तो वह यह कि जब तक गंभीर परेशानी पैदा न हो इन बातों पर टिकने का प्रयास किया जा सकता है।

अस्तु, मैं गांधीजी के अहिंसावाद पर लौटता हूं।

क्या है अहिंसा

अहिंसा की परिभाषा क्या है? प्राचीन भारतीय चिंतक अहिंसा के प्रति व्यापक दृष्टिकोण रखते थे। उनके अनुसार अहिंसा के निहितार्थ आधुनिक पाश्चात्य नॉन-वायलेंस (non-violence) से कहीं अधिक व्यापक रहे हैं। मेरी दृष्टि में इस विषय पर दो बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए:

[१]     भारतीय चिंतन में अहिंसा मनसा-वाचा-कर्मणा तीनों प्रकार का माना गया है। कर्मणा अहिंसा का अर्थ है शारीरिक या भौतिक रूप से किसी को कष्ट न पहुंचाना। विश्व के प्रायः सभी समाजों में अहिंसा की “नॉन-वायलेंस  के तुल्य” यही परिभाषा प्रचलन में है। वाचा एवं मनसा हिंसा की बात शायद ही कहीं कोई करता हो। वाचा का अर्थ है बोले गये शब्दों से किसी को दुःख पहुंचाना। इस हिंसा को हम देख-सुन सकते हैं। मनसा का अर्थ है किसी के अहित का विचार मन में लाना। दूसरा कोई इसे नहीं जान सकता है। प्राचीन चिंतक किसी के प्रति अहितकर या अनिष्ट विचारों को मन में लाना भी हिंसा मानते थे, यानी पूर्णतः कल्याणकारी विचारों को ही मन में स्थान देना व्यक्ति का कर्तव्य है।

[२]     प्राचीन मान्यता में अहिंसा की अवधारणा बहुत व्यापक है और मानव समाज से आगे अन्य प्राणियों तक फैली है। जैन मुनियों के लिए यह बात बहुत माने रखती है। बौद्धमतावलंबी और वैष्ण्वों के लिए भी अहिंसा की ऐसी अवधारणा महत्व रखती है। “अहिंसा” परमो धर्म:” कथन का उल्लेख महाकाव्य महाभारत में यत्रतत्र मिलता है। इस बारे में मैने दो आलेख अपने ब्लॉग में लिखे हैं। (देखें आलेख दिनांक 2017-07-07 एवं दिनांक 2017-07-28)

जिस महाभारत में अहिंसा की वकालत की गई है उसी में तमाम कथाएं भी हैं जिनमें हिंसा का बोलबाला है और स्वयं महाभारत की घटना हिंसक युद्ध का लेखाजोखा है। ऐसा विरोधाभास क्यों है? प्रचीन संस्कृत ग्रंथों में हिंसा की व्यापकता की कथाएं बहुतायत से मिलती हैं। इस विरोधाभास की व्याख्या वस्तुतः कठिन नहीं है।

दरअसल भारतीय धार्मिक मतों के दो स्पष्ट पहलू रहे हैं:

(१)     एक है आध्यात्मिक जिसके अनुसार मनुष्य को जीवन-मरण से मुक्त होने का प्रयास उसका कर्तव्य है और उसके लिए व्यक्ति को ऐहिक सुखों-हितों का मोह त्यागकर खुद को सत्य, अहिंसा, प्रेम, आदि के सन्मार्ग पर ले जाना होता है जिससे वह अंततः निर्वाण (बौद्धमत), मुक्त जीवात्मा (जैन मत) अथवा मोक्ष (वैदिक मत) की परम अवस्था को पा सके। अहिंसा उसी संदर्भ में सार्थक है।

(२)     दूसरा है ऐहिक सामाजिक जीवन से संबंधित जो आदर्शों की दिशा में बढ़ तो सकता है किंतु आदर्शों पर चल नहीं सकता। यह वह क्षेत्र है जिसमें अहिंसा की प्रवृत्ति सभी मनुष्यों में नहीं होती है। असल में सत्य-असत्य, प्रेम-द्वेष, हिंसा-अहिंसा, परोपकार-अपकार आदि परस्पर विपरीत प्रवृत्तियां इस संसार में एक साथ अस्तित्व में रहते हैं।

अहिंसा की व्यावहारिकता

मेरा प्रश्न है क्या गांधीजी ने उपर्युक्त तथ्यों पर मनन करने के बाद अहिंसा की बात की थी? मेरे मत में वे इस तथ्य की अनदेखी करते थे कि उनके अहिंसा के सिद्धांत को सभी आत्मसात नहीं कर सकते हैं। अवश्य ही अहिंसा समाज के लिए वांछित है, किंतु हिंसा से समाज मुक्त नहीं हो सकता। हिंसा केवल आत्मरक्षा के लिए ही नहीं बल्कि समाज को सुव्यवस्थित रखने के लिए, आपराधिक प्रवृत्ति के जनों को नियंत्रित रखने के लिए, भी आवश्यक है। इस बात को गांधीजी समझते थे क्या?

मनुस्मृति में अधोलिखित उक्तियां पढ़ने को मिलती हैं:

“सर्वो दण्डजितो लोको …”,

“उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति …”

“दण्डात् प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते …”

(मनुस्मृति, अध्याय ७, श्लोक २२, २७, २८, क्रमशः)

इन कथनों में यह संदेश दिया गया है कि यह जगत् (मानव समाज) दंड द्वारा ही नियंत्रण में रह पाता है। क्या दंडित करने की व्यवस्था हिंसात्मक नहीं है? अवश्य ही शासन दंडित करने का कार्य अपने हाथ में रखता है न कि उसका अधिकार किसी अन्य देता है। किंतु किसी को जैसे भी दंडित किया जाए उसे कहा तो हिंसा ही जाएगा !

यह भी कहा जाता है कि गांधीजी एक प्रकार से जिद्दी थे। वे दूसरों की कम सुनते थे बल्कि “मेरी बात सही है” यह धारणा उनसे मनवाते थे। उनके अहिंसावाद पर लोग जब तक टिप्पण्णी करते वे महात्मा मान लिए गए थे। तब उनका खुलकर विरोध करने का साहस कम ही लोग जुटा पाए। और जो असहमति व्यक्त करते थे उनकी कोई सुनता नहीं था।

एक धारणा यह भी लोगों के मन में बैठ गई थी कि देश की आज़ादी गांधीजी के अहिंसक आंदोलन का फल था। मैं इस धारणा को स्वीकार नहीं करता। मेरे मत में उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण ऐसे हालात बन चुके थे कि ब्रितानी हुकूमत को अपना वैश्विक साम्राज्य संभालना मुश्किल हो गया था। उसके अधीनस्थ लगभग सभी देश एक-एक कर स्वतंत्र होते चले गये।

इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि गांधीजी पहले व्यक्ति नहीं थे जिन्होंने अहिंसा की बातें की हों। महात्मा बुद्ध, तीर्थंकर महावीर एवं यीशु मसीह सुविख्यात हैं जिन्होंने अहिंसा का उपदेश दिया। किंतु उनके स्वयं के अनुयायी तक सदैव अहिंसक नहीं रह सके। स्पष्ट है कि अहिंसा वांछित है लेकिन सुलभ नहीं है। हिंसा समाज में सदा से रही है और आगे भी रहेगी।

भारतीय समाज व्यक्ति-पूजक है। यदि कोई असामान्य तौर पर प्रतिष्ठित हो जाए तो जन समुदाय उसमें दोष देखना बंद कर देता है। गांधीजी उसी स्तर पर पहुंचा दिए गये थे। – योगेन्द्र जोशी

साफ-सफाई की ध्वस्त नागरिक व्यवस्था

जिंदगी बस यही है

दैनिक जागरण समाचार-पत्र के २१ अगस्त के अंक में वाराणसी की ध्वस्त सफाई व्यवस्था की कुछ तस्वीरें छपी हैं जिनमें से एक यहां प्रस्तुत है। तस्वीरों के पृष्ठ का लिंक पेश कर रहा हूं:

https://epaper.jagran.com/epaper/21-aug-2019-45-varanasi-city-edition-varanasi-city-page-10.html#

      इन तस्वीरों को देख मेरा मन हुआ कि कचरा निबटारे की अपनी निजी व्यवस्था का और साथ ही घर-घर कूड़ा-उठान से जुड़े अनुभव का जिक्र कर डालूं।

वाराणसी में कूड़े-कचरे के निपटारे की कोई कारगर व्यवस्था पहले कभी नहीं थी। लोग सड़क के किनारे रखे गए बड़े-बड़े कूड़ेदानों अथवा खुले में कूड़ा-कचरा डाल देते थे। नगर-निगम की गाड़ी बीच-बीच में आकर उसे उठा लेती थी। 8-10 वर्ष पूर्व घरों से कूड़ा-उठान की नयी योजना आरंभ की गई थी। मेरे मुहल्ले में इस कार्य का जिम्मा “ए-टु-ज़ेड” नाम की संस्था को मिली थी। संस्था को हर घर से 50 रुपये बतौर शुल्क के इकट्ठा करने की जिम्मेदारी भी दी गयी थी। इस योजना…

View original post 657 और  शब्द

स्वाधीनता दिवस – अगस्त १५, २०१९

सर्वप्रथम देशवासियों को हर्षोल्लास के इस दिन की हार्दिक बधाई तथा शुभाकांक्षाएं।

अगस्त १५, २०१९, आज इस राष्ट्र का ७३वां स्वाधीनता दिवस रहा। (इस समय रात्रिकाल है।) १९४७ के इसी दिन यह देश ब्रितानी हुकूमत से मुक्त हुआ, और उसी के साथ एक राष्ट्र के रूप में इसकी स्थापना की नींव पड़ी। शुरुआती कुछ समय तक उपद्रव एवं अव्यवस्था बनी रही जो कि उस समय की विकट स्थिति में स्वाभाविक था। वस्तुतः देश विभाजित हो गया था और एक नये राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान (कहने को स्वतंत्रता दिवस १४ अगस्त) का भी जन्म हुआ जिसके साथ आरंभ से ही तनाव, असहयोग, एवं विद्वेष के संबंध ब्रितानी शासक विरासत में दे गये। संबंध इतने कटु रहे कि उसके साथ युद्ध भी झेलने पड़े तब और उसके बाद भी। उसके शत्रुतापूर्ण रवैये के कारण धरती का स्वर्ग कहलाने वाले कश्मीर की समस्या का फल आज तक इस राष्ट्र को भोगना पड़ रहा है। स्वयं पाकिस्तान को अपने रवैये की कीमत १९७१ में अपने विभाजन के तौर पर चुकानी पड़ी, जब बांग्लादेश का जन्म हुआ। अस्तु।

शुरुवाती कष्टों के बावजूद देशवासी सुखद भविष्य के प्रति आशान्वित रहे। उस काल के राजनेता एक ध्येय के साथ राजनीति में उतरे थे, वह यह कि देश को विदेशियों से मुक्त कर देशवासियों के हाथ में सोंपना है जिसे वे अपनी आकांक्षाओं, उद्येश्यों के अनुसार चला सकें और देश का समग्र विकास कर सकें। उस समय के राजनेताओं अनेक प्रकार के कष्ट सहे, हर प्रकार के त्याग किए, अपने ध्येय के लिए जान तक उन्होंने दी। अवश्य ही उनमें कुछेक को भविष्य में अपने हित साधने की संभावना दिखी होगी, लेकिन वह अपवाद स्वरूप ही रहा होगा ऐसा मेरा सोचना है। आज़ादी के बाद उन नेताओं ने जनप्रतिनिधि बनकर लोकतंत्र के स्थापना की और शासन चलाने की कोशिशें की। वे शासन चलाने के लिए प्रशिक्षित नहीं थे, सबको सबकुछ सीखना था शासन चलाने का अनुभव लेना था। शुरुआती सफलताओं-विफलताओं के साथ देश की शासकीय चल निकली। लेकिन समय के साथ क्य हुआ? यह एक गंभीर प्रश्न है जिसकी ओर में संकेत करना चाहता हूं।

मैं अपने विचार यहां रखने के पूर्व आगे उल्लिखित बातों की ओर पाठकों का ध्यान खींचना चाहता हूं। इनका इस आलेख से क्या संबंध यह बाद की पंक्तियों मेंस्पष्ट होगा।

Pseudo-Democratic: describes a political system which calls itself democratic, but offers no real choice for the citizens. This lack of choice can come from limited amount of diverse parties eligible for a vote, cemented power structures which are not really affected by any vote, no availability of a voting option “none of the above” for voters who favour change to the current political landscape, no direct democratic means, et cetera … [आभासी अथवा छद्म-लोकतंत्र – उस राजनैतिक तंत्र को व्यक्त करता है जो स्वयं को लोकतांत्रिक कहता है, किंतु नागरिकों को वास्तविक विकल्प प्रदान नहीं करता। विकल्पों का यह अभाव मतदान हेतु विविधतापूर्ण योग्य दलों की सीमित उपलब्धता, नियंत्रण की सुदृढ़ (गैर-लचीली) संरचनाएं जो मतों से वस्तुतः प्रभावित नहीं होतीं, उन मतदाताओं के लिए “इनमें से कोई नहीं” के मत-विकल्प की अनुपलब्धता जो मौजूदा राजनैतिक परिदृश्य बदलने के पक्षधर हों, लोकतांत्रिक साधनों के प्रत्यक्ष (अपरोक्ष) अभाव, इत्यादि …]

(Source: http://www.online-nations.net/definitions/def-pseudodemocracy.html)

In the preface to a collection of his speeches, Vajpayee once wondered whether democracy had truly taken root in India. “How can democratic institutions work properly,” he asked, “when politics is becoming increasingly criminalized?” [अपने व्याख्यानों के संकलन के प्राक्कथन में बाजपेयीजी (पूर्व प्रधानमंत्री) ने संदेह व्यक्त किया था कि क्या इंडिया (भारत?) में लोकतंत्र अपनी जड़ें वास्तव में जमा पाया है। “लोकतांत्रिक संस्थाएं समुचित तरीके से कैसे कार्य कर सकतीं हैं”, उनका प्रश्न था, “जब राजनीति का उत्तरोत्तर अपराधीकरण हो रहा है?”]

(Source: http://www.project-syndicate.org/commentary/india-s-pseudo-democracy)

मेरी उम्र लगभग वही है जितने वर्ष देश की स्वाधीनता को हुए हैं, केवल कुछ महीनों का आगा-पीछा रहा है। एक वयस्क के नाते पहला चुनाव सन्‍ १९६७ का था जिसे मैंने देखा। उसके बाद के प्रायः सभी चुनाव देखने को मिले, कुछएक में मतदाता के तौर पर मतदान भी किया तो किसी में केवल एक दर्शक रहा। देश में घोषित आपतकाल का भी मुझे अनुभव है। सन्‍ १९७७ के चुनाओं की भी याद है जिसमें देश के कई दलों ने आपसी मतभेद भुलाकर इंदिराजी को हराने के लिए “जनता पार्टी” का गठन किया। कांग्रेस (इंदिराजी) को बुरी हार का सामना करना पड़ा। लेकिन अपने अंतरविरोधों के कारण जनता पार्टी दो-तीन साल में ही बिखर गई। बाद के चुनाव में जीत हासिल कर इंदिराजी फिर सत्ता पर काबिज हुईं। यही समय था जब कांग्रेस के शीर्ष (अध्यक्ष) पद नेहरू-गांधी परिवार का एकाधिकार हो गया।

भारतीय राजनीति  समय के बाद किस प्रकार से बदलती गई और कैसे उसकी गुणवत्ता में उत्तरोत्तर सुधार की जगह गिरावट आती गई इसे मैं हर चुनाव के बाद अनुभव करता गया। समय के साथ क्षेत्रीयता, जातीयता, एवं धार्मिकता पर आधारित दलों का उदय हुआ है। उत्तर-प्रदेश/बिहार में कोई राजभरों की तो कोई कुशवाहा समुदाय की पार्टी बना के बैठा है। मैं नहीं मान सकता कि मुश्किल से १-२ विधायकों या सांसदों वाले ये दल देश का कोई हित साध सकते हैं। छोटे-छोटे दल बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने का प्रयास जरूर कर सकते हैं। उ.प्र. में मायावती की राजनीति दलितों के नाम पर आरंभ हुई थी। चुनाव जीतने के लिए उ.प्र. में मुलायम सिंह ने और बिहार में लालू प्रसाद ने यादव-मुस्लिम (MY formula) का आविष्कार किया। सत्ता पाने के लिए इस प्रकार के प्रयोग देश भर में होते रहे है। ऐसी बातें मेरी नजर में किसी स्वस्थ एवं उद्येश्यपरक लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं माने जा सकते।

अब जरा उपर्युल्लिखित बाजपेयी जी के कथन पर गौर करें: “”How can democratic institutions work properly, when politics is becoming increasingly criminalized?” प्रश्न है क्या राजनीति का अपराधीकरण सचमुच में हो चुका है या हो रहा है?

हां, राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है इस बात को आम जनता ही नहीं राजनेता भी मानते हैं। किंतु नेतागण राजनीति में अपराधियों के बचाव में ये कुतर्क – जी हां, कुतर्क – भी देते हैं कि जब तक अदालतें किसी को अपराधी न घोषित करें उन्हें अपरधी नहीं माना सकता। मैं भी इस बात स्वीकारता हूं। इसका भरपूर लाभ अपराधिक छवि वाले उठाते आ रहे हैं। अदालतों की बात करें तो मामले वर्षॊं तक अनिर्णीत रहते हैं और इन लोगों की जगह राजनीति में बनी रहती है।

नेताओं के बात को मैं कुतर्क क्यों कहता हूं यह स्पष्ट कर दूं। ठीक है कि जब तक अदालतें किसी के विरुद्ध निर्णय नहीं सुनाती हैं उन्हें अपराधी नहीं मान सकते। परन्तु इसी के साथ यह भी सच नहीं है क्या जब तक अदालतें किसी को निरपराध नहीं घोषित करतीं उन्हें निरपराध भी नहीं माना जा सकता? ऐसे व्यक्ति को सजा तो नहीं दे सकते हैं, लेकिन यह भी स्वीकारा जाना चाहिए कि उन्हें निरपराध मानकर पुरस्कृत भी नहीं कर सकते! इसलिए राजनीति में शुचिता की बात करने वालों को ऐसे व्यक्तियों को अपने दल में स्थान नहीं देना चाहिए, खास तौर पर जब दर्ज अपराधों की संख्या दर्जनों में हो। लेकिन क्या दल ऐसा कर रहे हैं? । दुर्भाग्य से ये बद्नाम छवि वाले चुनाव में जिताऊ होते हैं इसलिए सभी दल उनको पाल-पोष रहे हैं।

मेरा भारतीय लोकतंत्र से वर्षों पहले मोहभंग हो गया था जिसके बाद मैं हर चुनाव में मतदान करता रहा परंतु किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में वोट डालना बंद कर दिया। मोहभंग के अनेक कारण मेरे पास हैं, किंतु इस समय उनका खुलासा नहीं कर पा रहा हूं। कुछ समय से मैंने नोटा (NOTA) का विकल्प चुन लिया है।

स्वातंत्र्य दिवस को उमंग, उल्लास एवं आशा के साथ मनया जाना चाहिए। मुझे भी खुशी व्यक्त करनी चाहिए। परन्तु मैं ऐसा नहीं कर पा रहा हूं। एक सार्थक, उपयोगी, फलदायक लोकतंत्र की उम्मीद मुझे नहीं हो पा रही है। दिल के एक कोने में निराशा घर कर चुकी है। अस्तु, देशवासियों को पुनश्च शुभेच्छाएं।

इस समय मैं इन्हीं शब्दों के साथ अपने लैपटॉप को विराम देता हूं। – योगेन्द्र जोशी

हादसों का देश भारत – क्या देशवासी कभी सुधरेंगे भी?

कल (19 अक्टूबर) दशहरे के दिन रावण-दहन के मौके पर अमृतसर में एक बेहद गंभीर और दुखद हादसा हुआ।

उस अनिष्ट घटना में बहुत से (शायद 50 से अधिक) जनों की अकाल मृत्यु हो चुकी है और पता नहीं कितने जने आहत हुए हैं।

उस हादसे में दिवंगत हो चुके लोगों की आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना और आहतों के त्वरित स्वास्थ्य लाभ की हम सभी कामना कर सकते हैं। प्रभावित पारिवारिक जनों को अप्रत्याशित विकट कष्टप्रद स्थिति का सामना करने का बल मिले यह प्रार्थना सभी करते हैं।

जिम्मेदार कौन?

वह हादसा हुआ क्यों? कौन जिम्मेदार है उसके लिए?

मैं टेलीविज़न समाचार सुन रहा था। दुर्घटना के तुरंत बाद सभी समाचार चैनलों पर उस हृदयविदारक घटना की जानकारी प्रसारित होने लगीं। सभी पर लगभग एक जैसी बातें सुनने को मिल रही थीं। कुछ लोग कह रहे थे कि आयोजकों की गलती से दुर्घटना घटी, तो कोई स्थानीय प्रशासन को जिम्मेदार ठहरा रहा था। कहने वाले तो रेल प्रशासन को भी कुछ हद तक जिम्मेदार कह रहे थे।

मुझसे पूछें तो मैं स्थानीय प्रशासन और रावण प्रकरण के आयोजकों को तो जिम्मेदार मानता ही हूं। लेकिन क्या वहां तमाशा देखने वाले लोग खुद जिम्मेदार नहीं? टिप्पणी करने वाले यह भी कह रहे थे कि अपने देश में रेलवे विभाग ने पटरियों की फ़ेंसिंग (बाड़ से घेराबंदी) नहीं की है जो कि विकसित देशों में किया जाता है। फ़ेंसिंग होती तो हादसा न होता।

लेकिन सवाल यह है कि फ़ेंसिंग न होने का मतलब यह तो नहीं कि आप रेल पटरियों का इस्तेमाल मनमाने तरीक से करें। क्या लोगों को यह सामान्य समझ नहीं होनी चाहिए कि पटरियों पर खड़े होकर तमाशा देखना खुद में लगत व्यवहार है? क्या प्रशासन डंडा लेकर लोगों को भगाए तभी वे मानें यही रवैया अपनाया जाना चाहिए? दरअसल रेलवे ट्रैक को पार करना भी पड़े तो भी सोच-समझ कर करना चाहिए, और उसे जल्दी ही पार कर लेना चाहिए ताकि किसी हादसे की गुंजाइश न हो। लेकिन मानता कौन है? रेलवे लाइन पर कुछ जने ऐसे बैठते या चलते हैं जैसे वह कोई सामान्य पैदल मार्ग हो। ऐसे हादसे सुनने को मिलते हैं जिनमें रेलवे लाइन पर कोई हेडफोन कान पर लगाए गाना सुन रहा हो, या फोन पर बात कर रहा हो। कोई-कोई तो रेलगाड़ी आ रही हो और उसके सामने सेल्फ़ी भी लेते देखे जाते हैं।

बुरा लगेगा लोगों को परंतु यह बात सही है कि हम भारतीय सुरक्षा के मामले में बेहद लापरवाह हैं और हर बात पर प्रशासन पर दोष मढ़ने लगते हैं। क्या लोगों को खुद भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभानी चाहिए?

जहां तक रेलवे लाइन की फ़ेंसिंग का सवाल है वह मुझे अपने देश में संभव नहीं लगता है। रेलवे के पास संसाधन भी अपर्यप्त हैं और सुरक्षा की उसकी अन्य प्राथमिकताएं हैं। इतना और बता दूं कि विकसित देशों एवं अन्य विकासशील देशों में विकास का अर्थ केवल ढांचागत विकास ही नहीं होता है। अपितु उसके साथ लोगों के व्यवहार, सोच, और कायदे-कानूनों को मानने की प्रवृत्ति भी विकसित होते हैं। यदि लोग लापरवाही वरतना छोड़ दें बहुत-सी दुर्घटनाएं होना ही बंद हो जाएं।

मेरे अनुभव

मैं इंग्लैंड में रह चुका हूं। वहां पर मैंने देखा है कि रेलवे फ़ेंसिंग की आवश्यकता जानवरों के लिए अधिक और आदमियों के लिए कम अनुभव की जाती हैं। लाइन पार करने लिए आवश्यकतानुसार लाइन के ऊपर पुल या नीचे अंडरपास बने रहते हैं। यहां की तरह वहां लोगों की भीड़ भी जहातहां नहीं दिखती है। नियमों को मानते हुए सड़कें या रेलवे लाइन पार करते हैं। पटरियां उन जगहों से गुजरती हैं जहां गाएं एवं अन्य पशुओं को पालने के लिए फ़ार्महाउस बने होते हैं। ढेरों जानवरों के साथ उन्हें देखने वाले ग्वाले बहुत कम होते हैं। चरते-चरते जानवर लाइन पर न आ जाएं इसलिए फ़ेंसिंस की जाती है। अपने यहां फ़ेंसिंस करना भी चाहे तो आसान नहीं। देश में बहुत से इलाके मिल जायेंगे जहां रेलवे लाइन के दोनों तरफ़ रिहायशी मकान बने हों और लोगों का लाइन के आरपार आना जाना लगा रहता है। कम से कम झुग्गी-झोंपड़ियां तो खड़ी रहती ही हैं। ऐसे में रेलवे भी कितना सावधानी वरत सकती है?

मैंने यह भी देखा है कि इंग्लैंड में वहां जहांतहां पटाखे फोड़ना प्रतिबंधित रहता है। वहां भी पटाखों का चलन है जैसे “हैलोवीन” के मौके पर। पटाखों का कार्यक्रम रिहायशी मकानों बीच नहीं होता बल्कि उनके पास खुले मैदानों में ऐसे कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इसी प्रकार पतंगें भी सड़कों एव मकानों की छतों से नहीं, बल्कि खुले मैदानों में उड़ाई जाती हैं। और अपने यहां?

हादसों के प्रकार अनेक

मैं जब मुद्दे पर गंभीरता से सोचता हूं तो मुझे लगता है कि रोजमर्रा की बहुत-सी दुर्घटनाएं जो पूरी तरह से मानव लापरवाही के कारण होती हैं। उनके लिए न प्रकृति दोषी ठहराई जा सकती है और न ही मशीनी उपकरण। यदि मशीनें कारण दिखाई देती हैं तो वह भी उसी लापरवाही की वजह से। आगे दुर्घाटनाओं के कुछ मामले गिनाता हूं जो बखूबी रोके जा सकते हैं:

(1) हर्ष-फ़ायरिंग कई लोगों को बंदूकें लहराकर खुशी व्यक्त करने का शौक होता है। वे यारों की शादी पर, किसी चहेते नेता की चुनाव में जीत पर, या ऐसे ही किसी और मौके पर हवा में गोली चलाने लगते है। इस अवांछित कृत्य में कभी-कभी किसी को गोली लग जाती है और खुशी मातम में तब्दील हो जाती है।

(2) पटाखों का चलन शादी-ब्याह, दीवाली-होली आदि मौकों पर पटाखों का चलन दिनबदिन बढ़ता जा रहा है। संकरी गलियां हों या बाजार का इलाका शौकीन लोगों को कोई चिंता नहीं रहती है। मुझे अपने शहर वाराणसी की एक दीवाली का स्मरण है जिसमें लंका नामक इलाके में स्थाई दुकानों के आगे पटाखों की अस्थाई दुकानें सजी थीं। पास ही में लोग पटाखे छोड रहे थे। एक चिनगारी कहीं से एक दुकान में गिरी। तब क्या हुआ होगा अंदाजा लगा सकते हैं।

(3) बिना लाइसेंस वाहन चालन मैंने वाहन चलाना वर्षों पहले छोड़ दिया था। जब मैं चलाता था तब मेरी पहचान में किसी का भी लाइसेंस वाहन-चालन के ठोस परीक्षण पर आधारित नहीं था। आज भी स्थिति वैसी ही होगी ऐसा मेरा ख्याल है। दुनिया के प्रमुख देशों में कड़े सैद्धांतिक एवं प्रायोगिक परीक्षण का प्रावधान है। लोगों को एक-एक घंटा तक सड़कों पर वाहन-चालन क्षमता दिखानी पड़ती है। लाइसेंस के लिए कभी-कभी दो-दो तीन-तीन बार परीक्षण से गुजरना पड़ता है। साफ जाहिर है कि लाइसेंसधारी को नियम-कानूनों का अच्छा ज्ञान तथा जिम्मेदारी का भाव होता है। इसलिए वहां यातायात के नियमों का उल्लंघन बहुत कम होता है और जब होता है तो जुर्माना भी कम नहीं होता। अपने यहां लाइसेंस पाना आलू-प्याज खरीदने के माफिक होता है। सड़कों पर हादसे तो होंगे ही।

(4) व्यक्तिगत सुरक्षा के चिंता महानगरों को छोड़ दें तो आप देखेंगे अन्य शहरों में लोग दुपहिया वाहन पर हेल्मेट नहीं पहनते, कार चलाने में बेल्ट नहीं पहनते, सड़क पर गति की सीमा का ख्याल नहीं रखते, शराब के नशे में भी वाहन चलाते हैं, चलाते समय मोबाइल फोन पर बात करते रहते हैं, नींद के झोंके आ रहे हों तो भी वाहन चलाते है, वाहनों में अनुमत संख्या से कहीं अधिक सवारियां ठूंसते हैं, इत्यादि। प्रशासन की जिम्मेदारी होती है की कड़ाई से नियमों का पालन कराएं। प्रशासन परवाह नहीं करता तो क्या किसी को व्यक्तिगत तौर पर समुचित कदम नहीं उठाना चाहिए?

(5) आग की घटनाएं आए दिन दुकानों मे, बहुमंजिली इमारतों में, रिहायशी भवन में आग की घटनाएं सुनने को मिलती हैं। अक्सर “शॉर्ट-सर्किट” को दोष देकर जिम्मेदारी तय हो जाती है। क्यों होते हैं शॉर्ट-सर्किट इसकी परवाह कोई करता है? और ऐसे मौकों पर अग्निशमन के उपकरण मौके पर क्यों नहीं रहते हैं?

(6) आवारा पशु आवारा जानवर, खास तौर पर आवारा कुत्ते, कई दुर्घटनाओं के कारण बनते हैं। आवारा कुत्तों के झुंडों द्वारा जख्मी किए या मारे जाने की खबरें मीडिया में आती रहती हैं। इनको नियंत्रित करने के लिए क्या कभी राष्ट्र के स्तर पर अथवा राज्यों के स्तर पर समुचित प्रयास की बातें सुनी जाती हैं?

(7) अनियंत्रित भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार इस देश को खोखला कर रहा है। अधिकांश समस्याएं तो उसी की देन हैं। जीर्णशीर्ण भवनों का गिरना, निर्माण के समय भवनों और पुलों का गिरना आम बात है। सभी हादसों में गरीब लोग ही मारे जाते हैं जिनके जीवन की कीमत 2-4 लाख रुपया तय कर दी जाती है और मामले कालांतर में रफादफा हो जाते हैं। किसी को जिम्मेदार नहीं पाया जाता है।

इस प्रकार की अनेक दुर्घटनाएं रोजमर्रा के जीवन में देखने को मिलती हैं। घटना के समय घड़ियाली आंसूं बहाने वाले अनेक मिलेंगे। लेकिन आम जन और प्रशासन उनसे कोई सीख क्यों नहीं लेते? मेरी राय में आम लोग तमाशबीन होते हैं। वे जहां भीड़ हो वहां खतरे हो सकते हैं इसकी अनदेखी करके भीड़ में शामिल हो जाते हैं। क्या इतनी भी समझ नहीं होती कि वे स्वयं बचें?

दुर्घटनाओं के समय शासन चलाने वाले नेता “दोषी व्यक्ति बख्शे नहीं जाएंगे का आलाप शुरू करते हैं” लेकिन किसी को दोषी न ठहरा पाते हैं और न ही किसी जो दंडित करते हैं। अपने यहां के राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी, दोनों ही, असल में गैरजिम्मेदार होते हैं। क्यों न हों? उसी समाज से ही तो वे निकलते हैं जहां लापरवाही को जनता का मौलिक अधिकार समझा जाता है। वे घिसेपिटे तरीके से शासन-प्रशासन चलने के आदी होते हैं। विरला ही कभी थोड़ा नया और सार्थक कार्य करने की कोशिश करता है।

हादसों पर दुःखित होना स्वाभाविक है। लेकिन मुझे इस बात का अधिक दु:ख होता है कि यहां व्यवस्था के लिए उत्तरदायी लोगों को न तो कभी शर्म आती है और न कभी आत्मग्लानि। वे ऐसे हालात में भी देश को विकसित करने का ख्वाब देखते हैं। – योगेन्द्र जोशी