भारतीय समाचार माध्यमों (टीवी चैनलों, अकबारों) के मालिकों, सपादकों, पत्रकारों का रुदन क्या वाकई गंभीर है?

प्रेस क्लब में पत्रकारों की बैठक

” ’तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्तनशीं था,

उसको भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था।’

“शुक्रवार की शाम दिल्ली के प्रेस क्लब में इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक और लेखक अरुण शौरी ने जब पाकिस्तानी शायर हबीब जालिब का ये शेर पढ़ा तो वहाँ मौजूद 500 से ज़्यादा पत्रकारों को मालूम था कि शेर दरअसल किसके लिए पढ़ा गया है। उन्होंने तालियों की गड़गड़ाहट से शेर का स्वागत किया.

“प्राइवेट टीवी चैनल एनडीटीवी के प्रोमोटरों प्रणय रॉय और राधिका रॉय के घर और दफ़्तरों पर पिछले हफ़्ते सीबीआई के छापों के ख़िलाफ़ दिल्ली के पत्रकारों की ये दुर्लभ बैठक थी और अरुण शौरी के सीधे निशाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे.”  (http://www.bbc.com/hindi/india-40235229)

मैं न तो मोदी जी का समर्थक हूं और न ही उनका प्रशंसक।

और मैं विरोधी भी नहीं हूं।

मैं विरोधी हूं तो उन सबका जो बातें तो ऊंची-ऊंची करते हैं लेकिन उनका आचरण उसके अनुकूल नहीं रहता। और ऐसे लोग समाज में सर्वत्र, सभी क्षेत्रों में मिल जायेंगे। मीडिया कोई अपवाद नहीं। उसका स्वयं को भिन्न और दोषों से परे दिखाने का प्रयास महज एक ढोंग है।

प्रेस क्लब में पत्रकारिता से संबद्ध जो कार्यक्रम हुआ उसमें शामिल कौन थे? क्या वे वाकई ईमानदार लोग हैं? मुझे शंका है। अवश्य की कुछ जने गंभीर होंगे किंतु मात्र एक छोटा प्रतिशत। जिस प्रकार समाज के अन्य सभी क्षेत्रों में लोग अपने-अपने हितों को साधने में लगे हैं, कुछ अपवादों को छोड़कर, उसी प्रकार मीडिया में भी अधिसंख्य जनों को अपनी चिंता रहती होगी ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।

मैं जब हितों की बात करता हूं तो उसकी बहु-आयामी परिभाषा लेकर चलता हूं। किसी के लिए धन-संपदा बटोरना हित हो सकता है तो किसी अन्य के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा या समाज में विशिष्ठ स्थान पाना; किसी के लिए सत्ता या तत्सदृश ताकत बटोरना और किसी के लिए ईमानदार, समाज के लिए समर्पित, एवं लोकतांत्रिक स्वातंत्र्य का अलमबरदार (झंडा-वाहक) दिखना, इत्यादि। कदाचित मीडिया वाले इस चौथी चीज के शौकीन हों।

ईमानदार कौन ?

इस “इंडिया दैट इज़ भारत” देश में कदाचार सामाजिक चरित्र का हिस्सा बन चुका है। कौन ईमानदार है यह पता ही नहीं चलता। किसी पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा सकते हैं लेकिन आम तौर पर किसी पर आरोप सिद्ध हो नहीं पाता। आरोप लगाने वाला भी साफ-सुथरा और जिस पर आरोप लगता है वह भी साफ-सुथरा। दोनों ही संदेह का लाभ (बेनेफ़िट औफ़्‍ द डाउट) पा जाते हैं। पर क्या यह संभव है कि दोनों की छवि साफ हो? तार्किक समीक्षा करने का आदी व्यक्ति इस तथ्य को सहज रूप से जानता है कि दोंनों भ्रष्ट तो हो सकते हैं, लेकिन दोनों ही की छवि एक साथ साफ हरगिज नहीं हो सकती।

मैं ईमानदार होने की बात करने वाले सभी दावेदारों पर शक करता हूं चाहे वे राजनीति में हों या मीडिया में। इसका मतल्ब यह नहीं कि देश ईमानदारों से वीरान है। नहीं। मैं जिस व्यक्ति को देख-परख नहीं लेता उसे आंख मूंदकर ईमानदार नहीं मान लेता भले ही वह मीडिया का व्यक्ति ही क्यों न हो। जब भी कोई आरोपों के घेरे में आता है और उसके विरुद्ध जांच आरंभ होती है तो वह चीख-चीख कर कहने लगता है “मेरे विरुद्ध साजिश रची गयी है”, “यह तो बदले की भावना से किया जा रहा है” इत्यादि। देश में भ्रष्टाचार है यह हर कोई स्वीकारता है लेकिन कोई भ्रष्टाचारी नहीं है। वाकई चमत्कार है ऐसा होना।

मैं ये बातें इसलिए कह रहा हूं कि हाल में एनडीटीवी (NDTV) के मालिक और उनकी पत्नी के ठिकानों पर जांच एजेंसियों का छापा पड़ा। छापा सकारण पड़ा यह जांच एजेंसियां कह रही हैं। यदि वे झूठे आरोपों के आधार पर जानबूझकर ऐसा कदम उठा रही हैं तो यह वास्तव में आपत्तिजनक है। यदि देश में ऐसा ही बहुत कुछ हो रहा है जैसा कि मीडिया के कुछ जनों का मत है तो यह देश के दुर्भाग्य का द्योतक है।

लेकिन मैं कैसे मानूं कि उक्त आयोजन में मीडिया वाले सच ही बोल रहे हैं और जांच एजेंसियां झूठ? एक आम नागरिक के नाते मैं किस पर भरोसा करूं? और क्या उस बैठक में उस समय अनुपस्थित अन्य मीडियाकर्मी भी उनसे सहमत हैं?

आपातकाल ?

मेरी जानकारी में अपने जैसा यह हालिया पहला वाकया है। हो सकता ऐसे ही दो-एक और भी मामले हों। किंतु इतने भर से क्या यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि देश में पिछली (बीसवीं) शताब्दी के 7वें दशक के मध्य के आपातकाल जैसी स्थिति पैदा हो चुकी है? उस आपातकाल से देश की मौजूदा दशा की तुलना के लिए एक नहीं कई दृष्टांत सामने होने चाहिए। इस समय कितनों की धर-पकड़ हो रही है? कितने लोग भूमिगत हो चुके हैं? कितनों को सलाखों के पीछे भेजा चुका है? ऐसे प्रश्न तो पूछे ही जाने चाहिए।

यदि आपात्कालीन-सी स्थतियां बन चुकी हों तो उसका ज्ञान इन मीडियाकर्मियों को तभी क्यों हुआ जब उनकी बिरादरी के किसी सदस्य पर आंच आई हो? अभी तक उन गंभीर मामलों में इन लोगों ने चुप्पी क्यों साध रखी थी जो उनके मतानुसार अन्यत्र आपातकाल की याद दिलाने वाली घटित हो चुकी हैं? उन सब का खुलासा क्यों नहीं किया संबंधित व्यक्तियों ने?

जब कोई शंका के घेरे में हो तो उसके विरुद्ध जांच होनी चाहिए कि नहीं? और उस प्रक्रिया में छापा पड़ना भी स्वाभाविक है। एनडीटीवी के मालिक के मामले में जो हुआ है उसे निराधार कह देना जल्दीबाजी होगी। इस पर भी गौर करें कि स्वयं एनडीटीवी के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हुई है।

मीडिया के वरिष्ठ, सुप्रतिष्ठित सदस्यों की बातों को आम जन गंभीरता से लेते हैं यह मेरी व्यक्तिगत धारणा है। इसलिए उन्हें वस्तुस्थिति का आकलन वस्तुनिष्ठ आधार पर करना चाहिए। अपने वैयक्तिक मनोभावों को जन-सामान्य के सम्मुख निर्विवाद सत्य के तौर पर प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। अपनी प्रतिष्ठा और आम जन का उनमें भरोसे का लाभ लेकर अतिरंजित बातें करना उन्हें शोभा नहीं देता। उन्हें अहंकार से बचना चाहिए।

वर्तमान सरकार से बहुत-से लोग नाखुश होंगे, बहुतों को असुविधा हो रही होगी, फिर भी यह कहना कि वह आपातकाल की स्थिति रच रही है उचित नहीं होगा। अभी स्थिति भयावह नहीं है! होती तो हमें भी दिखती। फिर बता दूं मैं भाजपा का नहीं हूं। – योगेन्द्र जोशी

 

सवाल “भारत” के वजूद का

जिंदगी बस यही है

वैवाहिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए मैं अपने एक रिश्तेदार के यहां हूं। कई अन्य मित्र-संबंधी भी पहुंचे हैं। घर में भावी समारोह की चहल-पहल है। घर के सदस्य आगामी आयोजन की तैयारी में जुटे हैं और कुछएक अतिथि उस कार्य में अपना योगदान भी दे रहे हैं। अधिकांश अन्य प्राप्तवयस्क, प्रौढ़, एवं अपेक्षया वृद्ध अतिथिगण बाहर खुले में दो-दो-तीन-तीन के समूह में परस्पर वार्तालाप में जुटे हैं। आज के जमाने में स्मार्टफोन की महत्ता कम नहीं है, विशेषतः नवयुवाओं, किशोर-किशोरियों तथा प्राप्तवय बच्चों के लिए। इस मौके पर उक्त अल्पवयस्क वर्ग के कुछएक सदस्य अपने-अपने स्मार्टफोन के साथ व्यस्त हैं।

मैं एक कुर्सी पर बैठा हुआ चारों तरफ़ का नजारा देख रहा हूं। लोगों के परिधानों, उनके हावभावों, उठने-बैठने एवं हंसने-बोलने के तौर-तरीकों आदि को बारीकी से देखना मेरे लिए सदा से एक रोचक विषय रहा है। मैं ऐसे वैविध्यपूर्ण वातावरण में शायद ही कभी ऊबता हूं। इस…

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उनकी हिन्दी बनाम मेरी हिन्दी

हिन्दी तथा कुछ और भी

मैं जो हिन्दी लिखता हूं उसे वे समझ नहीं पाते, और जो हिन्दी वह समझते हैं उसे मैं लिखना नहीं चाहता।

मेरी हिन्दी?

कुछएक मास पूर्व मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा, “मेरी बेटी एक निजी कंपनी में कार्यरत है। कंपनी अपने कर्मियों के लिए हिन्दी में एक पत्रिका छापती है जिसके संपादन आदि का दायित्व बेटी को सोंपा गया है। मैंने उसे बताया कि आप ब्लॉग लिखा करते हैं और सलाह दी कि पत्रिका के लिए वह आपसे भी लेख लिखने का अनुरोध कर सकती है। अथवा आपके ब्लॉगों पर प्रस्तुत आलेखों में से चुनकर पत्रिका में शामिल करने की अनुमति ले सकती है। आप सहमत होंगे न?”

अपने सहमति जताते हुए मैंने उनसे कहा कि वे मेरे ब्लॉगों के पते अपनी बेटी को भेज दें और यह भी कह दें कि आवश्यकता अनुभव करने पर वह मुझसे सीधे संपर्क कर ले।

बात आई-गई-सी हो गई। एक लंबे अंतराल…

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फुटकर काम की तलाश

जिंदगी बस यही है

मैं मखमुठी से अखनूर जा रहा हूं। जम्मूतवी-अखनूर-जोरिवां मार्ग पर स्थित सैन्य-क्षेत्र है मखमुठी जहां मैं कार्यवशात् चार-पांच दिनों के प्रवास पर आया हूं। यह स्थान अखनूर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर है। सुबह के करीब 9:00 बजे हैं। मैं साइकिल से शौकिया अखनूर जा रहा हूं यह जांचने के लिए कि साइकिल से 30-32 कि.मी. आ-जा सकता हूं कि नहीं। मैं साइकिल की उपयोगिता का क़ायल हूं और उम्र के इस पड़ाव में भी साइकिल को ही अपने शहर में आवागमन के लिए यथासंभव इस्तेमाल में लेता हूं।

रास्ते में मैं चाय की छोटी-सी एक दुकान पर रुक जाता हूं, अपने साथ की बोतल से पानी पीने और उसके बाद एक कप चाय पीने के लिए। सड़क की हालत ठीक है, समतल और सपाट, गड्ढामुक्त! वाहनों का आवागमन अधिक नहीं है। फिर भी जो गुजर रहे हैं उनकी रफ़्तार अच्छी-खासी है, इसलिए दोनों तरफ़ देखकर ही सावधानी…

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अंग्रेजी सर्वत्र नहीं चलती (3) – कनाडा प्रवास के दौरान शहर क्यूबेक में प्राप्त अनुभव

हिन्दी तथा कुछ और भी

प्रायः सब सभी भारतीयों को यह भ्रम है कि दुनिया में अंग्रेजी सर्वत्र चलती है। ऐसा वस्तुतः है नहीं। चीन, जापान, कोरिया एवं लैटिन अमेरिकी (दक्षिण अमेरिकी) आदि देशों में अंग्रेजी के प्रति लोगों का उतना मोह देखने को नहीं मिलता जितना अपने देश भारत में। प्रमुखतया अंग्रेजी-भाषी कनाडा के फ़्रांसीसी-भाषी क्यूबेक प्रांत में स्थिति भारत की जैसी नहीं है। दुर्भाग्य है कि दुराग्रह से ग्रस्त व्यक्ति वास्तविकता को भी नकार देता है। अपने लगभग सात सप्ताह के कनाडा प्रवास के दौरान अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषा को लेकर जो मैंने अनुभव किया उसे पाठकों के साथ इस लेखमाला के माध्यम से साझा कर रहा हूं।

पहले कुछ तस्वीरें:

कनाडा प्रवास

विगत ग्रीष्मकाल के दौरान लगभग 7 सप्ताह के अपने कनाडा प्रवास के दौरान अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषाओं को लेकर मुझे जो अनुभव हुआ उस पर आधारित एक परिचयात्मक लेख मैंने पहली जनवरी की प्रविष्टि (पोस्ट) में प्रस्तुत किया था।…

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अंग्रेजी सर्वत्र नहीं चलती (२)- कनाडा प्रवास के दौरान शहर मॉंट्रियाल में प्राप्त अनुभव

कनडा के मॉंट्रियाल (क्यूबेक प्रांत) में फ़्रांसीसी में ही सभी कार्य-व्यापार चलते हैं इस तथ्य को हिन्दीभाषियों के समक्ष रखने का प्रयास किया है इस आलेख में।

हिन्दी तथा कुछ और भी

प्रायः सब सभी भारतीयों को यह भ्रम है कि दुनिया में अंग्रेजी सर्वत्र चलती है। ऐसा वस्तुतः है नहीं। चीन, जापान, कोरिया एवं लैटिन अमेरिकी (दक्षिण अमेरिकी) आदि देशों में अंग्रेजी के प्रति लोगों का उतना मोह देखने को नहीं मिलता जितना अपने देश भारत में। प्रमुखतया अंग्रेजी-भाषी कनाडा के फ़्रांसीसी-भाषी क्यूबेक प्रांत में स्थिति भारत की जैसी नहीं है। दुर्भाग्य है कि दुराग्रह से ग्रस्त व्यक्ति वास्तविकता को भी नकार देता है। अपने लगभग सात सप्ताह के कनाडा प्रवास के दौरान अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषा को लेकर जो मैंने अनुभव किया उसे पाठकों के साथ इस लेखमाला के माध्यम से साझा कर रहा हूं।

 

विगत ग्रीष्मकाल के दौरान लगभग 7 सप्ताह के अपने कनाडा प्रवास के दौरान मुझे अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषाओं को लेकर जो अनुभव हुआ उस पर आधारित एक परिचयात्मक लेख मैंने पहली जनवरी की प्रविष्टि (पोस्ट) में प्रस्तुत किया था। तीन लेखों की अपनी लेखमाला…

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India that is Bharat – a land where safety is lowest-priority item.

Satyam Naiva Jayati सत्यं नैव जयति

Accidents Galore

(1) January 21 (2017).  The Jagdalpur-Bhubaneswar Hirakhand Express met an accident near Kuneru station in Andhra Pradesh, in which 39 persons were killed and dozens of passengers were injured. It is believed that the railway track was sabotaged by Naxals active in that region. Details can be found, for example, at Times of India website.

(2) Earlier on January 15, Makar Sankrati, a major boat accident took place at Gandhi Ghat in Patna, capital of Bihar. 24 persons, including children and women, were drowned in that accident, and many others had to be admitted in hospitals for their injuries. The boat was overcrowded with passengers and got tilted on one side, causing the fall of passengers into the waters sufficiently deep to drown them. For details see Indian Express of January 16.

(3) On the same day (Makar Sankrati) another accident happened at Ganga Sagar, an…

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