2 अक्तूबर – महात्मा गांधी जयन्ती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस

गांधी एवं शास्त्री जयंती

आज गांधी जयन्ती है – 1969 में जन्मे महात्मा गांधी यानी बापू का 150वां जन्मदिन। इस दिन के साथ ही उनके जन्म का 150वां वर्ष आरंभ हो रहा है। संयोग से यही दिन देश के दूसरे प्रधान मंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन रहा है (जन्मवर्ष 1904)। किंतु २ अक्टूबर का सार्वजनिक अवकाश एवं उस दिन के तमाम कार्यक्रम बापू को ही केन्द्र में रखकर आयोजित होते रहे हैं। लगे हाथ शास्त्रीजी का भी जिक्र कर लिया जाता है और उनको श्रद्धांजली अर्पित की जाती है। गांधी जी के सम्मान में इस दिन को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया हुआ है।

केन्द्र सरकार ने इस 150वें वर्ष को सोद्देश्य तरीके से मनाने का कार्यक्रम बनाया है और इस कार्य हेतु एक कार्यकारिणी समिति का गठन किया है। देश के विभिन्न राज्यों की सरकारें और केन्द्र सरकार के विभिन्न महकमे इस वर्ष को अपने-अपने तरीके से मनाने के कार्यक्रम बना रहे हैं। उदाहरणार्थ रेलवे मंत्रालय इस मौके पर अपनी रेलगाड़ियों के डिब्बों में “स्वच्छ भारत” का प्रतीक (लोगो) प्रदर्शित करेगा। इसके अतिरिक्त मंत्रालय साफ-सफाई, अहिंसा, सामुदायिक सेवा, सांप्रदायिक सौहार्द्र, अस्पृश्यता-निवारण, तथा महिला-सशक्तिकरण का व्यापक स्तर पर संदेश अपनी गाड़ियों के माध्यम से देने की योजना बना रहा है। (देखें इकनॉमिक टाइम्ज़ की खबर)

गांधी जन्मदिन एवं जन्मवर्ष सरकारी स्तर पर कैसे बनाए जाएंगे इसकी विस्तृत जानकारी न मुझे है और न ही उसकी चर्चा करने का मेरा इरादा है। जन्मदिवस की सार्थकता क्या है और आम नागरिक उसको कितनी गंभीरता से लेते हैं मैं इस पर अपनी टिप्पणी पेश करना चाहता हूं।

दिवसों की बढ़ती संख्या

अगर आप 40-50 वर्ष पूर्व की बात करें तो पाएंगे कि विभिन्न प्रकार के दिवसों की संख्या तब इतनी नहीं थी जितनी आज है। समय के साथ नये-नये दिवस घोषित होते रहे हैं कुछ हमारे राष्ट्रीय दिवस जिनमें से कई तो “महापुरुषों” के जयंतियों के नाम पर हैं, और कुछ राष्ट्र संघ के द्वारा घोषित किए गए हैं। अपने देश से जुड़े दो अंतरराष्ट्रीय दिवस तो पिछले 11 वर्षों में अस्तित्व में आए हैं। ये हैं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस, 2 अक्टूबर, और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस, 21 जून, जो राष्ट्र संघ द्वारा क्रमशः 2007 तथा 2015 में घोषित किए गए।

मैं जब इन तमाम दिवसों के बारे में सोचता हूं तो मुझे हर किसी दिवस की सार्थकता नजर नहीं आती। वे सार्थक होंगे इस विचार से घोषित किए गए होंगे, लेकिन व्यवहार में वे सार्थक हो पाए हैं इसमें मुझे शंका है। कुछ दिवस तो पारंपरिक रूप से सदियों से मनाए जाते रहे हैं जो समाज के विभिन्न समुदायों (विशेषत: धर्म-आधारित) की आस्थाओं से जुड़े हैं और त्योहारों का रूप ले चुके हैं जैसे अपने देश में राम-नवमी, कृष्ण-जन्माष्टमी, महावीर जयंती एवं नानक जयंती आदि मनाए जाते हैं। ये दिवस कोई खास संदेश देने के लिए मनाए जाते हों ऐसा मैं नहीं समझता।

अपने देश में स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त), गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) एवं गांधी जयंती (2 अक्टूबर) राष्ट्रीय अवकाश एवं पर्व के तौर पर घोषित हैं। सैद्धांतिक तौर यह माना जाएगा कि ये दिवस मात्र छुट्टी मनाने और कुछएक रस्मी कार्यक्रमों के आयोजन तक सीमित नहीं हैं बल्कि ये नागरिकों को उनके कर्तव्य-निर्वाह का स्मरण कराते हैं। लेकिन क्या नागरिकवृंद उस संदेश पर ध्यान देते हैं और क्या उस संदेश के अनुसार चलने का प्रयास करते हैं। अवश्य ही इन अवसरों पर विभिन्न सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं में अनेकानेक आदर्शों की बात की जाती है और जनसमुदाय को अपने जीवन में उन्हें अपनाने का उपदेश दिया जाता है। मुझे लगता है कि आदर्शों की बात करना इन मौकों पर वक्ताओं के लिए विवशता होती है। वे स्वयं उन आदर्शों को – आंशिक तौर पर ही सही – अपनाने की इच्छा नहीं रखते इस बात को श्रोता भली भांति समझते हैं, और श्रोताओं की इस समझ को वक्ता भी जान रहा होता है। किंतु रस्मअदायगी चलती रहती है।

बतौर अहिंसा दिवस के गांधी जयंती की सार्थकता

यों तो गांधी दिवस इस देश में एक राष्ट्रीय अवकाश के तौर पर दशकों से मनाया जा रहा है और साथ में इस दिन की रस्मअदायगी भी चलती आ रही है। किंतु महात्मा गांधी के अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता वाले व्यक्तित्व के चलते इसका महत्व देश तक सीमित नहीं रह गया है। जब से इस दिन को राष्ट्र संघ द्वारा अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया गया है इसका महत्व इस देश के बाशिंदों के लिए खास तौर पर बढ़ गया है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जिस देश से गांधी जुड़े रहे यदि वहीं के लोग गांधी के विचारों को भुला दें तो बाहरियों के लिए हम कितने सम्माननीय रह सकते हैं?

मेरे मन में एक सवाल उठता है कि क्या गांधी दिवस के अहिंसा दिवस बन जाने से लोग अहिंसा-भाव के प्रति प्रेरित हो रहे हैं? यहां पर याद दिलाना चाहता हूं कि अहिंसा एवं सहिष्णुता एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं किंतु दोनों में घनिष्ठ संबंध है। जहां सहिष्णुता होगी, क्षमाशीलता होगी, दूसरों के प्रति संवेदना होगी, वहीं अहिंसा की भावना प्रबल होगी। किंतु जीवन के 70 वसंत पार करते-करते मैं यही अनुभव कर रहा हूं कि समय के साथ देश में असहिष्णुता बढ़ती गई है। दूसरों के प्रति अपराध करने के विचार प्रबल होते जा रहे हैं। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण तो संसद तथा विधानसभाओं में आपराधिक छवि के जन-प्रतिनिधियों की दिनबदिन बढ़ती संख्या है, जिस तथ्य को उच्चतम न्यायालय एवं निर्वाचन आयोग, दोनों, संज्ञान में ले चुके हैं, परंतु लोकतंत्र के पहरेदार हमारे नेता इसे महत्वहीन मानते आ रहे हैं। क्या यह सब गांधी के विचारों के अनुरूप है? तो कैसे मान लें कि लोकतंत्र के शासकीय पक्ष को चलाने वाले गांधी के विचारों के प्रति श्रद्धा रखते हैं।

क्या ऐसा नहीं लगता कि गांधी जयंती अपनी अहिंसा संबंधी अर्थवत्ता खोती जा रही है? क्या अहिंसा का विचार केवल मुख से बोले जाने वाले कथनों तक ही सीमित नहीं होता जा रहा है? मेरा मानना है देश में अहिंसा की भावना को महत्व न देने वाले नागरिकों की संख्या कम नहीं है। इसका जीता-जागता प्रमाण है आजकल अक्सर सुनने में आने वाली “मॉब-लिंचिंग” (भीड़-कृत हत्या) की घटनाएं। किसी बात पर किसी मनुष्य पर किसी ने छोटे-बड़े अपराध का शक जताया नहीं कि भीड़ इकट्ठी हो जाती है और “मारो-मारो” के नारे के साथ उस असहाय को मौत की सजा दे देती है। शक के घेरे में आया व्यक्ति अपराधी हो सकता है तो भी भीड़ अपना निर्णय सुना दे यह सर्वथा निंद्य और अन्यायपूर्ण माना जाएगा। ऐसे मौकों पर कोई एक या दो व्यक्ति विवेक खो बैठें तो समझ में आता है। लेकिन जब दो-चार नहीं बल्कि दर्जनों लोग उस कुकृत्य में जुट जाएं तो मैं यही कहूंगा कि पूरी भीड़ न अहिंसा को मानती है और न ही न्याय की व्यवस्था को सम्मान देती है। ऐसा हिंसक व्यवहार मॉब-लिंचिंग तक ही सीमित नहीं रहता है बल्कि पग-पग पर देखने को मिलता है। जब किसी महिला के साथ दुष्कर्म होता है तो वहां भी अन्य जन घटना को रोकने का प्रयास करने के बजाय उस कुकृत्य में भागीदार बन जाते हैं। कुकृत्यों के उदाहरण आपको देखने-सुनने को मिल जायेंगे। लगता है करुणा भाव एवं उदात्त वृत्ति कहीं तिरोहित हो चुके हैं।

गांधी जयंती और स्वच्छता अभियान

पिछले तीनएक सालों से प्रधानमंत्री मोदी ने एक और आयाम गांधी जयंती से जोड़ा है, और वह है स्वच्छता संदेश। उनकी स्वच्छता की बातें लोगों को भा गई हैं। । “स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत” का नारा भी प्रचलन में आ चुका है। फिर भी देखने में आ रहा है कि अनेक लोगों का स्वच्छता के प्रति रवैया कमोबेश अपरिवर्तित है। यह मैं अपने शहर वाराणसी (मोदी का निर्वाचन क्षेत्र) में महसूस कर रहा हूं। सड़क के किनारे मूत्रत्याग की लोगों की आदत जा नहीं रही है। कूड़ादान पांच कदम की दूरी पर हो तो वहां तक जाकर कूड़ा-कचरा फैंकने की जहमत कई लोग उठाना नहीं चाहते। सड़कों पर छुट्टा जानवर जहां-तहां घूमते दिख जाएंगे और उनके गोबर से सड़कें गंदी हो रही हैं। ये जानवर सड़क के किनारे रखे कूड़े के डिब्बों से कचरा सड़क पर आज भी यथावत फैलाते मिल जाते हैं। इस तथ्य के प्रति प्रशासन बेखबर बना रहता है। दरअसल स्थानीय प्रशासन “काम चल जा रहा है” की उदासीन भावना से कार्य करता है। उसमें समस्याओं को हल करने का उत्साह एवं संकल्प ही नहीं दिखता है। सफाई का भाव नागरिकों में भी आधा-अधूरा ही है। अपने घर-आंगन को वे साफ भले ही रखते हों, लेकिन आम सड़क को साफ-सुथरा रखने में अपना योगदान देने में दिलचस्पी नहीं रखते हैं।  – योगेन्द्र जोशी

 

 

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जाने कहां गये साइकिल के वो दिन … बनाम पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमत

जाने कहां गये वे दिन

सड़कों पर जब साइकिलें चलती थीं।

बच्चा हो या बूढ़ा या जवान

सबको साइकिलें प्यारी लगती थीं।

ठीक हाल में रहती थी हरदम

तभी स्कूल-कालेज पहुंचाती थीं।

अस्पताल जाना हो या ऑफिस

साइकिलें सबकी सवारी होती थीं।

पेट्रोल पंप पर लगे अब भीड़

तब हवा भराकर ही वो चलती थीं।

आयेंगे क्या लौट के वो दिन 

साइकिलें जब सड़क पर दिखती थीं।

पेट्रोल-डीज़ल – बढ़ती कीमतें

पिछले कुछ दिनों से पेट्रोल-डीज़ल के दाम प्रायः हर रोज बढ़ रहे हैं और देश की आम जनता बढ़ती कीमत से त्रस्त है। जिसको देखो वह इस मुद्दे पर मोदी सरकार की आलोचना कर रहा है। सरकार कहती कि अंताराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और देश की तेल कंपनियां उसी से मेल खाती कीमतें तय कर रही है। अब खबर यह है कि दाम कुछ घट रहे हैं  कहा यह भी जा रहा है कि यदि पेट्रोल-डीज़ल को भी जीएसटी (GST) के दायरे लाया जाए तो कीमत घट सकती हैं। किंतु इन पर जीएसटी लगाए जाने के पक्ष में कई राज्य नहीं, कारण कि वे इस पर लगे टैक्स से राज्य की कमाई करती हैं। कहा जाता है कि अपने देश में इन पर भांति-भांति के टैक्स भी बहुत हैं जिससे उनके दाम पहले से ही काफी रहे हैं।

जिस भी कारण से पेट्रोल-डीज़ल के मूल्य बढ़ रहे हों, उससे होनी वाली दिक्कत सभी महसूस कर रहे हैं। आज भौतिक प्रगति के उस मुक़ाम पर हम (मानव समाज) पहुंच चुके हैं जहां इन जीवास्म इंधनों के बिना जीवन सुचारु रूप से जीने की सोची नहीं जा सकती है। इन इंधनों पर हमारी निर्भरता समय के साथ कैसे बढ़ती गई है इस बात को समझने के लिए मैं पिछले करीब  46 वर्षों के  अपने निजी अनुभवों का जिक्र करता हूं।

निजी अनुभव

मैंने सन् 1972 में वाराणसी नगर के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) में बतौर एक शिक्षक के कार्य करना शुरू किया था। वे दिन थे जब इस नगर में पेट्रोल/डीज़ल-चालित वाहन आज की तुलना में नगण्य थे। जैसा मुझे अब याद है कि मेरे भौतिकी (फिज़िक्स) विभाग में कुल दो कारें (एक अंबेसेडर और दूसरी फ़िएट) करीब 40 शिक्षकों में से 2 के पास थीं। और शायद तीन या चार स्कूटर भी कुछ के पास थीं। विभाग में एक लेंब्रेटा, एक वेस्पा और एक फैंटाबुलस देखे की याद है मुझे। फैंटाबुलस स्कूटर का नाम कम ही लोगों ने सुना होगा और उसे कभी शायद देखा भी न हो। वह बाज़ार से बहुत पहले ही गायब हो गयी थी। अब तो स्कूटरों की जगह बाइकों ने ले ली है।

उस काल में स्कूटर खरीदना भी आसान नहीं था; कारण दो थे:

(1) पहला कारण यह कि उनकी कीमतें सामान्य संपन्नता वाले व्यक्ति के लिए भी हैसियत के बाहर होती थीं। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि तब मेरा मासिक वेतन लगभग 650 रुपये था जब कि स्कूटर की कीमत करीब 3000 रुपये होती थी। मतलब यह कि 5-6 महीने की कुल तनख्वाह बचाने पर ही मैं स्कूटर खरीद सकता था। आज विश्वविद्यालय का समकक्ष शिक्षक एक महीने के वेतन से ही बाइक/स्कूटी खरीद सकता है।

(2) दूसरा कारण वास्तव में अधिक गंभीर था। कारण यह था कि स्कूटरों-बाइकों-कारों का उत्पादन देश में बहुत कम था, शायद डेड़-दो लाख से अधिक नहीं। पैसा पास होने और शौक होने के वाबजूद लोगों को स्कूटर की उपलब्धता नहीं थी, कारों की तो बात ही छोड़िए।

वह काल था जब मेरे शहर वाराणसी में साइकिल अथवा रिक्शा से आवागमन होता था। शहर में सरकारी बस-सेवा भी उपलब्ध थी लेकिन ऑटोरिक्शा नहीं थे। जनसंख्या भी तब आज की तुलना में एक-तिहाई/एक-चौथाई रही होगी। वह समय था जब वाहनों द्वारा पैदा धूल-धुएं का प्रदूषण खास न था, न उनका शोर-शराबा था, और सड़कों पर न ही आज के जैसा जाम।

1970 के बाद माहौल बदला जिसके तहत कई प्रांतों में स्कूटरों का उत्पादन आरंभ हुआ, नीजी कंपनियों या सरकारी उद्यमों के द्वारा, जैसे उत्तर प्रदेश में तब ‘स्कूटर्ज़ इंडिया’ स्थापना हुई थी जो अब थ्री-व्हीलर वाहन बनाती है। मुझे याद आता है कि उसी दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी ने ‘मारुति’ कार का उद्योग स्थापित किया जो उनकी असामयिक मृत्यु के बाद ‘मारुति-सुजुकी’ उद्योग बना। सीमित संख्या में कारें, जैसे ‘अंबेसडर’, ‘फ़िएट, एवं शायद ‘स्टैंडर्ड’ देश में बन रही थीं, लेकिन उनकी संख्या इस विशाल देश के लिए ’अपर्याप्त’ थीं।

मेरा ख्याल है कि 1990 का दशक आते-आते देश में कार-निर्माण एवं बाइक-निर्माण उद्योग को बढ़ावा मिला। और सड़कों पर कारों-बाइकों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी।

सड़कों पर वाहनों की बढ़ती भीड़

आज स्थिति यह है कि मध्यम वर्ग के अधिकांश लोगों की आमदनी इतनी है कि वे कारें खरीद सकते हैं। इस हेतु बैंकों से भी आमदनी के अनुरूप आसान किस्तों में ऋण या कर्ज मिल जाता है। आज से 45-50 साल पहले तक कर्ज का जुगाड़ करना आसान नहीं था। लोगों की प्राथमिकताएं भी भिन्न थीं। लोग निजी मकान, बाल-बच्चों की पढ़ाई, उनकी शादी-ब्याह के लिए पैसे की बचत की अधिक सोचते थे। आजकल मध्यम वर्ग में परिवार छोटे हो गये हैं और शादी-ब्याह भी विलंब से होते हैं। प्राथमिकताएं भी बदल चुकी हैं। परिणाम यह है कि नयी पीढ़ी के युवा कार-बाइक की व्यवस्था की पहले सोचने लगे हैं और अन्य बातों की चिंता बाद करते हैं।

जहां तक बाइकों का सवाल है इसने साइकिलों की जगह ले ली है। अब समाज के अपेक्षया कमजोर तबके के लोगों के पास भी बाइक दिखने लगी है।

अमेरिका जैसे विकसित देशों में निजी वाहन एक आवश्यकता बन चुकी है। और हमारा देश भी उसी संस्कृति की ओर बढ़ रहा है। गौर करें कि अपने यहां प्रति व्यक्ति औसत आय अमेरिका की तुलना में 4-6 गुना कम है और पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें वहां से अधिक। फिर भी निजी वाहनों पर जोर अधिक है और सरकारें आर्थिक विकास पाने के चक्कर में लोगों को इस दिशा में ही प्रेरित कर रही हैं। वे साइकिलों के प्रयोग को बढ़ावा देने के बजाय बाइकों-कारों को प्रोत्साहित कर रही हैं। निजी वाहन यहां ‘झूठी’ सामाजिक प्रतिष्ठा के द्योतक बन चुके हैं।

आरंभ में मैंने अपने विश्वविद्यालयीय विभाग में कारों/स्कूटरों की नगण्य संख्या की बात कही थी। आज उस विभाग में प्रायः हर शिक्षक के पास कार है। शहर में भी धनाड्यों/नवधनाड्यों की संख्या बहुत बढ़ गई है। अतः सर्वत्र कारों की भीड़ नजर आती है। साइकिलों की जगह बाइकों ने ले ली है। जो लोग पहले साइकिलों से चलते थे वे अब साइकिल चलाना भी भूल चुके हैं और उनके घरों से साइकिलें ग़ायब हो चुकी हैं। पहले 10-15 किमी की दूरी साइकिल से तय करना आम बात थी। लेकिन अब स्कूली बच्चे साइकिल से कम ही जाते हैं और स्कूटर-बाइक-कारों से अधिक!

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि आज के लोग सुविधाभोगी तथा आरामतलब हो चुके हैं। साइकिल एवं रिक्शा आर्थिक रूप से अपेक्षया कमजोर लोगों की चीजें रह गई हैं। अपेक्षया संपन्न वर्ग के लिए आवागमन हेतु पेट्रोल-डीज़ल निहायत जरूरी उपभोक्ता वस्तुएं बन चुके हैं। इनकी कीमतों में तनिक भी उछाल आने पर या इनकी उपलब्धता कम हो जाने पर हाहाकार मच जाता है।

कोई विकल्प नहीं क्या?

हाल के दिनों में जो मूल्यवृद्धि हुई वह परोक्ष रूप से सभी को प्रभावित करती है इसे औरों की तरह मैं भी स्वीकार करता हूं। यातायात, मालढुलाई, कृषिकार्य आदि जैसे सामुदायिक महत्व के कामों की पेट्रोल-डीज़ल पर निर्भरता को नकारा नहीं जा सकता। व्यक्तिगत तौर पर शायद ही कुछ किया जा सकता है। किंतु यह सवाल तो पूछा ही जा सकता है कि हम न्यूनाधिक शारीरिक श्रम करके अपने बजट को नियंत्रित नहीं कर सकते क्या? एक-डेड़ किलोमीटर दूर जाना हो तो कार-बाइकों का सहारा न लेकर पैदल नहीं जा सकते? साइकिल का यथासंभव उपयोग क्या नहीं किया जा सकता? बच्चों को पैदल या साइकिल से स्कूल-कालेज जाने को प्रेरित नहीं कर सकते?

साइकिल चलाने के अपने लाभ हैं: (1) साइकिल खुद में सस्ता वाहन है; (2) शारीरिक श्रम का अवसर प्रदान कर स्वास्थ्य-लाभ देती है; (3) न पेट्रोल का  खर्चा और न ही रखरखाव में कठिनाई; (4) पार्किंग में कम जगह घेरती है; और (4) प्रदूषक न होने के कारण पर्यावरण के लिए हितकर।

निजी वाहनों का एक विकल्प भी है। सरकारें सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था करके भी लोगों के पेट्रोल खर्च को घटा सकती हैं। इस संदर्भ में सिंगापुर का उदाहरण दिया जा सकता है। वहां सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था उत्कृष्ट श्रेणी की बताई जाती है और खर्चीले निजी वाहन रखने की तुलना में सुविधाजनक भी है। दुर्भाग्य से हमारे यहां की व्यवस्था घटिया दर्जे की और अपर्याप्त है। यह व्यवस्था अपेक्षया कम संपन्न लोगों तक सीमित देखी गयी है। इसके प्रयोग में मिथ्या प्रतिष्ठा भी आड़े आती है।

कुल मिलाकर यह कहना चाहूंगा कि हमें सुविधाभोगी न बनकर शारीरिक श्रम की आदत डालनी चाहिए। – योगेन्द्र जोशी

 

गांधी जयन्ती (2016-10-02, शास्त्री जयन्ती भी): स्वच्छता दिवस राष्ट्र के स्तर पर

गांधी एवं शास्त्री जयंती

आज गांधी जयन्ती है, 1869 में जन्मे महात्मा यानी मोहनदास करमचंद गांधी जी का जन्म-दिवस। संयोग से आज ही का दिन पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी (जन्म 1904) का जन्मदिवस है। इस दिन का महत्व मुख्यतः गांधी जी के कारण ही है और लोग उनका किसी न किसी बहाने स्मरण कर लेते हैं। लगे हाथ शास्त्री जी को भी याद कर लेते हैं। शास्त्री जी का जन्मदिन यदि किसी और दिन होता तो शायद कम ही लोगों को उनका ध्यान आता।

गांधी जी सौभाग्यशाली थे कि उन्हें भारत की स्वतंत्रता का श्रेय पूरा-पूरा नहीं तो काफी हद तक दिया जाता है। उन्हें अहिंसा का पुजारी माना जाता है, और लोग यह धारणा कई लोगों के बीच है कि उन्होंने “खड्ग बिना ढाल” के देश को आजादी दिला दी। व्यक्तिगत स्तर पर मैं आजादी के लिए उन्हें अत्यधिक श्रेय नहीं देता। मेरा मानना है कि द्वितीय विश्वयुद्ध (सितंबर 1, 1939 से सितंबर 2, 1945 तक) के बाद ब्रिटेन (यूरोप के साथ) के हालात बिगड़ चुके थे और उसके लिए अपने सामाज्य को संभालना कठिन पड़ गया था। विगत 19वीं शताब्दी के मध्य के आगे-पीछे ही ब्रितानी शासन के अधीन के प्रायः सभी देश एक-एक कर स्वतंत्र होते गये। भारत तो वैसे ही बड़ा देश था जिसको संभालना ब्रितानी हुकूमत के लिए मुश्किल हो चुका था, विशेषतः जब देश में सर्वत्र आज़ादी-आज़ादी के नारे लग रहे थे। आज़ादी की उस मांग के माहौल के लिए अकेले गांधी जी उत्तरदायी नहीं, बल्कि अनेक जनों का उसमें योग दान था।

स्वतंत्रता के संदर्भ में गांधी जी के योगदान का आकलन भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न करेंगे ही। कुछ भी हो, गांधी जी को विश्व समुदाय ने आधुनिक काल के एक अतिविशिष्ट वक्तिव्य के धनी मानव के रूप में देखा। उनके विचारों का सर्वत्र प्रसार-प्रचार भी हुआ। कई देशों ने तो अपने खास-खास स्थानों पर उनकी प्रतिमाएं भी स्थापित कर दीं, और राष्ट्र संघ ने 2014 में तो उस दिन को विश्व अहिंसा दिवस घोषित भी कर दिया।

शास्त्री जी कदाचित देश के कुशल प्रधानमंत्री सिद्ध हुए होते, किंतु वे अपनी असामयिक मृत्यु के कारण केवल डेड़ साल (9 जून, 1964 से 11 जनवरी, 1966 तक) ही उस पद पर रह सके। पाकिस्तान के साथ 1965 में छिड़ी जंग के बाद ताशकंद में भारत-पाक शान्ति समझौते के बाद संदिग्ध हालत में उनकी मृत्यु हुई थी। उनकी मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी यह बहुतों का मानना है। अस्तु, अगर वे जीवित रहते तो शायद अधिक चर्चित रहे होते। सन् 1965 के युद्धकाल में उन्होंने “जय जवान जय किसान” का नारा दिया था। मुझे याद है जब उन्होंने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने को प्रेरित किया था। वे दिन थे जब देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था और अमेरिका से “पीएल 480 योजना” के अंतर्गत जीरानुमा गेहूं देश में आयात हो रहा था।

कहने का तात्पर्य है कि 2 अक्टूबर का दिन गांधी जी के कारण ही चर्चा का विषय रहा है। विगत गांधी जयंतियों पर मैंने अपने ब्लॉग में उनके विचारों को लेकर अपनी धारणाओं पर लेख लिखे हैं। (देखें 08-10-02, 09-10-02, 10-10-01, 13-10-0214-10-02, एवं 14-10-08 के ब्लॉग-पोस्ट।)

स्वच्छ्ता के विचार का अभाव

इस बार गांधी जयन्ती अहिंसा दिवस के तौर पर चर्चा में नहीं है, बल्कि स्वच्छता दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी ने 2014 में इसी दिन पर स्वच्छता की बात देश के सामने रखी। और इस बार इस दिन को राष्ट्र के स्तर पर स्वच्छता दिवस भी घोषित कर दिया (मैं शायद भूल नहीं कर रहा हूं)। यही इस बार मेरे लिए भी चर्चा का विषय है। तब से दो वर्ष बीत चुके हैं। उस दिशा में कुछ प्रगति जरूर हुई है, किंतु उतनी नहीं जितनी उम्मेद की जाती थी। मीडिया के माध्यम से लोगों को इस बारे में जागरूक करने की कोशशें काफी हुई, परंतु जन समुदाय प्रेरित हुआ इसमें मुझे शंका है।

मैं स्वयं से अक्सर पूछता हूं कि क्या सामाजिक सरोकार की बातों पर किसी व्यक्ति के मन में स्वयं विचार नहीं आने चाहिए? मेरे मन में स्वच्छता की बात किसी के कहने से नहीं आई बल्कि बचपन से वह मौजूद रही है। और तदनुसार मैं अपने परिवेश को यथासंभव साफ़-सुथरा रखने की कोशिश करता हूं। जब हम (मैं एवं मेरी पत्नी) जहां-तहां गंदगी देखते हैं तो बड़ी कोफ़्त होती है। हम राह चलते कुछ खाते-पीते हैं तो उसका कचरा जेब में या झोली में डाल लेते हैं, या खाना-पीना करते ही नहीं। रेल-यात्रा के दौरान फ़र्श पर कचरा न गिरे इसका ध्यान रखते हैं। कचरा इकट्ठा करके कागज आदि में लपेट कर पास में रख लेते हैं, या कूड़ेदान में डाल आते हैं। परंतु हमने देखा है कि कई लोग मूंगफली ठूंगते है तो छिलके फ़र्श पर गिराते जाते हैं। बिस्कुट का रैपर फ़र्श पर डाल देते हैं। वाश-बेसिन पर हाथ-मुंह धोते हैं तो बेसिन में ठीक-से पानी बहाकर उसे साफ नहीं रखते। टायलेट में शौच के बाद फ़्लश करके एक बार भी मुड़कर नहीं देखते कि फ़्लश हुआ भी कि नहीं। इस प्रकार के तमाम अनुभव देखने को मिलते हैं।

समझ में नहीं आता कि सफाई का खयाल क्यों नहीं आता? क्या सफाई की बात के लिए किसी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है? क्या यह ऐसा विषय है कि उच्च शिक्षा हासिल करना पड़े। मुझे सबसे बड़ा आश्चर्य तब होता है जब कोई व्यक्ति घर से गंतव्य के लिए निकलता है, और रास्ते में सड़क किनारे पेशाब करने से नहीं हिचकता है। ऐसा करते मैंने संभांत-से लगने वाले लोगों को भी देखा है। मेरे शहर वाराणसी में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने में डेड़-दो घटे से अधिक का समय नहीं लगता। ऐसे में यदि आप घर से शौच करके निकलें तो गंतव्य तक आपको पेशाब की कोई परेशानी नहीं हो सकती। तब भी वांछित अपनाकर क्यों नहीं चलता कूई? सड़क किनारे पेशाब न करनी पड़े ऐसा क्यों नहीं आता मन में? राह चलते सड़क पर जहां-तहां थूक देना आम बात है। विदेशों में लोग पेपर नैपकिन लेकर चलते है, ताकि जरूरत पड़ने पर उसमें थूककर पास के कूड़ेदान में फेंका जा सके, या जेब में रखा जा सके। क्यों ऐसा ही कोई तरीका देशवासियों को क्यों नहीं सूझता? कम से कम यह तो किया ही जा सकता है कि सड़क के किनारे घास-फूस या मिट्टी में थूका जाये। ध्यान रहे कि सड़क पर थूका गया साफ-साफ नजर आता है।

स्वच्छता-भाव बनाम सौन्दर्यबोध

मेरी धारणा है कि साफ-सफाई वास्तव में सौन्दर्य-बोध का अनन्य हिस्सा है, और आम भारतीयों में वह शायद बहुत कम है। यदि किसी को गंदगी देख बेचैनी नहीं होती, उस स्थल से भाग निकलने की उसकी इच्छा नहीं होती, अथवा तत्सदृश नकारात्मक प्रतिक्रिया उसके मन में नहीं जगती, तो उससे सफाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। चारों ओर गंदगी फैली हो ऐसे वातावरण से सांमजस्य बिठाने में बहुत से लोगों को दिक्कत नहीं होती। वे उसी वातावरण में जमीन में बैठ सकते हैं, गंदगी देखते हुए नाश्ता-पानी कर सकते हैं, इत्यादि। जब इन जनों को गंदगी खले ही नहीं तो उनसे सफाई की  उम्मीद कैसे की जा सकती है?

मेरा रोजमर्रा का अनुभव प्रमुखतया अपने शहर वाराणसी की दुर्व्यवस्था पर आधारित है। मैंने जितने भी शहर देखे हैं उनमें वाराणसी सबसे गंदा और प्रशासनिक उदासीनता का शिकार पाया है। (मैं अक्सर देश के विविध स्थलों की यात्रा कर लेता हूं।) दो वर्ष पहले जब स्वच्छता अभियान चला था तो लगा कि शहर के दिन बहुरेंगे। लेकिन कोई खास अंतर शहर में नहीं आया है। घरों से कूड़ा-उठान की व्यवस्था अवश्य है, लेकिन वह कूड़ा अक्सर सड़कों के किनारे गिरा दिया जाता है। यहां की व्यवस्था का वर्णन कर पाना मेरे लिए सरल नहीं है। शब्दों में वह बात नहीं होती जो प्रत्यक्ष दर्शन में है।

वाराणसी की गंदगी में कुछ योगदान तो आवारा गाय-सांड़ों का रहता है। यहां की गली-कूचों में कुछ लोग अपने निजी दूध के लिए अथवा उसके व्यवसाय के लिए गाय-भेंसे पालते हैं। मेरे घर के सामने की सड़क पर एक सज्जन (?) भी यह कार्य करते हैं। मेरी जानकारी के अनुसार शहर में पशु-पालन पर कोई प्रतिबंध नहीं है और न ही गंदगी फैलाने के विरुद्ध कोई कानून है। अतः यह कार्य धड़ल्ले से चलता आ रहा है। इस कार्य में सड़क पर अतिक्रमण भी होता है। अवश्य ही अतिक्रमण के विरुद्ध कानून हैं, परंतु प्रशासन में कोई देखने वाला हो तब न? साल-छः महीने में अतिक्रमण दस्ता आ भी जाये तो पशुओं को सड़क से हटा लिया जाता है और फिर बाद में स्थिति पूर्ववत। ये पशु हैं जो गोबर की गंदगी तो फैलाते ही हैं, उसके अलावा सड़क के किनारे का कूड़ा भी इधर-उधर बिखेर देते हैं।

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बीते मार्च माह में उच्च न्यायालय ने राज्य (उत्तर प्रदेश) में पॉलिथीन की थैलियों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। आरंभ में लगा था कि अब खुली जगहों पर प्लास्टिक नहीं बिखरा दिखेगा। साग-सब्जी, किराना आदि की दुकानों पर पॉलिथीन थैली का मिलना बंद हो गया। लेकिन महीना बीतते-बीतते पॉलिथीन वापस। अब पूरी तरह पहले की स्थिति है। क्या अदालत ने प्रतिबंध हटा दिया? शायद नहीं, क्योंकि अखबारों मे तद्विषयक कोई समाचार कभी नहीं छपा। मेरा ख्याल है कि प्रशासन की उदासीनता इसका कारण रहा है।

मेरे ही घर के नजदीक मुख्य मार्ग के किनारे सब्जी-सट्टी भी लगती है उसके साथ फुटकर सब्जी की दुकानें। ये लोग अपनी सड़ी-गली सब्जी सड़क पर बिखेर देते हैं न कि उसको एकत्रित रखने की व्यवस्था अपनाते हैं। यह सड़ी-गली सागसब्जी ऊपर बताये आवारा पशुओं का आहार होता है, किंतु गंदगी तो हो ही जाती है। साग-सब्जी की दुकानें शहर में सड़क पर यत्र-तत्र अतिक्रमण करके लगी रहती हैं और गंदगी के स्रोत बने रहते हैं। वाराणसी में तम्बाकूदार पान का बहुत चलन है। लोग पान खाकर कहीं भी पीक थूक देते है। वाहनों में बैठे हुए भी थूकते हैं। और तो और, कार में बैठे जन भी चलते हुए उसका द्वार खोलकर पीक थूकते हैं, किसी की परवाह किए बगैर। कहने का मतलब यह है कि किसी को सद्विचार नहीं सूझते; बस जिसको जो सुविधा हो वह करता है।

वाराणसी की जैसी विकट स्थिति और नगरों की नहीं होगी, लेकिन गंदगी सभी जगह देखने को मिलती है। हाल ही में मैं मुम्बई के पश्चिम भांडूप इलाके में 3 सप्ताह के प्रवास पर गया था। छुट्टा पशु न होने के बावजूद वहां भी खूब गंदगी देखने को मिली, खासकर जंगल-मंगल नामक सड़क पर। दिल्ली के कई इलाकों में भी मैंने गंदगी देखी है। चार साल पहले मैंने पुद्दुचेरी की यात्रा की थी। तब एक नाले के पास से गुजरने पर बदबू के साक्षात्कार हुए थे और गंदगी के भी।

दरअसल अपने देश में संसाधन आबादी के हिसाब से बहुत कम हैं। बहुत-से लोगों को शहरों में सड़क किनारे झुग्गी-झोंपड़ी में जीवन बिताना होता है। उनकी सबसे बड़ी समस्या येनकेन प्रकारेण जीवित रहने की होती है। सुबह से शाम तक जीवन-धारण के साधन जुटाने में ही जिंदगी गुजर जाती है। किसे फ़ुर्सत है कि सफाई की सोचे?

मोदी जी गांधी जी के स्वच्छता के विचार से प्रभावित रहे हैं और स्वच्छता अभियान के सिलसिले में उनका नाम लेते रहते हैं। किंतु वे भी यह भूल जाते हैं कि गांधी जी के हर विषय पर अपने स्पष्ट एवं लीक से हटकर विचार रहे हैं। गांधी जी 

(1) शारीरिक परिश्रम पर जोर देते थे, न कि मशीनों पर अधिकाधिक निर्भरता,

(2) समाज में जाति, धर्म, क्षेत्र आदि पर आधारित भेदभाव के विरुद्ध थे, किंतु स्वतंत्र भारत में ऐसा भेदभाव बढ़ रहा है,

(3) आर्थिक विषमता न्यूनतम रहे यह चाहते थे, किंतु यह विषमता दिनों-दिन बढ़ रही है,

(4) आत्मसंयम के पक्षधर थे और सत्य तथा निष्ठा पर जोर देते थे, जो आज के नेताओं और आम जनों से गायब हो रहे हैं,

(5) इसी प्रकार की अनेक बातें करते थे, लेकिन उन पर कम ही लोग ध्यान देते हैं। – योगेन्द्र जोशी

गोरक्षा का सच: सड़कों पर आवारा गायें और सांड़ गोरक्षकों को नजर क्यों नहीं आते?

मुझे अपनी किशोरावस्था के दिन याद हैं जब मेरे पिताजी ने गांव में गाय पाल रखी थी। चूंकि मेरी मां की पहले ही इहलोकलीला समाप्त हो चुकी थी, अतः गाय की देखभाल, दाना-पानी और दूध दुहने आदि के प्रायः सभी कार्य वे अकेले स्वयं ही करते थे। घर पर हम बच्चे यथासंभव उनका हाथ बंटा देते थे। उत्तराखंड के मेरे उस पहाड़ी गांव में गाय-बैलों की उस काल में काफी अहमियत थी, क्योंकि वे दूध के स्त्रोत के अतिरिक्त कृषि-कार्यों के लिए भी आवश्यक होते थे। उनके गोबर-मूत्र से बने खाद का प्रयोग खेतों में होता था। उस काल में हम रासायनिक खाद से अनभिज्ञ थे। हां, तो मैं बता रहा था कि मेरे पिताजी गाय दुहने का कार्य स्वयं करते थे। उन्होंने नियम बना रखा था कि गाय के थन से उतरने वाला आधा दूध उसके बच्चे – बछिया हो या बछड़ा – को मिले। प्रचलित परंपरा के अनुसार हम लोग बच्चा जनने के २२ दिनों तक गाय का दूध प्रयोग में नहीं लेते थे। उस अंतराल में गाय का बच्चा भरपूर दूध पा जाता था। बाद में आधा दूध उसका और आधा हमारा। उसको घास तथा खाद्य वनस्पति की मुलायम पत्तियां खाना सिखाया जाता था। वह भी एक समय था जब गायें या बैल बूढ़े होने पर भी पलते रहते थे। वे तब भी पूरी तरह निरुपयोगी नहीं होते थे क्योंकि उनका गोबर-मूत्र खाद के काम आता था। उन्हें छोड़ना चाहे कोई तो कहां छोड़ा जाता? छुट्टा छोड़ने का मतलब खेत चरने की छूट। (आवारा छोड़े गये पालतू पशुओं को वाराणसी में छुट्टा कहा जाता है।) मेरे पिताजी तो धार्मिक प्रवृत्ति के थे इसलिए गाय की सेवा कर्तव्य मानते थे। वे तो कुछएक शारीरिक व्याधियों के निराकरण हेतु भी पंचगव्य के सेवन में आस्था रखते थे।

     यह बात कोई पचास-पचपन वर्ष पहले की है। अब न मेरे पिताजी इस लोक में  रह गये हैं और न वे गायें और न ही मैं अब गांव में हूं। किंतु गाय-बैलों की उपयोगिता तो वहां अभी भी है, क्योंकि पर्वतीय क्षेत्र के सीड़ीनुमा खेतों के लिए ट्रक्टर जैसे साधनों की व्यवस्था एवं उपयोग सामान्यतः संभव नहीं।

गोपालकों की गली सुन्दरपुर वाराणसी

 

 

 

 

 

 

वाराणसी में छुट्टा/आवारा गायें 

अब मैं आज के शहरों के गोवंश की बाबत अपने अनुभव की बात करता हूं। मेरा अनुभव मुख्यतया अपनी तथाकथित धार्मिक नगरी (वस्तुत: धर्म के नाम पर पाखंड में अनुरक्त) वाराणसी से जुड़ा है। फिर भी यह कह सकता हूं आवारा या छुट्टा गायों और सांड़ों को मैंने कई शहरों में देखा है और उन शहरों की स्थिति वाराणसी से परिमाणात्मक स्तर पर बेहतर हो सकती है किंतु गुणात्मक स्तर पर नहीं। निश्चय ही वाराणसी की स्थिति अत्यंत दयनीय है।

जहां तक आवारा जानवरों का सवाल है उसमें गायें एवं साड़ों के अतिरिक्त अन्य पालतू पशु भी देखने को मिल जाते हैं, जैसे सुअर, बकरे, गधे तथा खच्चर। आवारा कुत्तों को भी उसमें शामिल कर सकते हैं। इसके अलावा वाराणसी के कई मोहल्लों में और मंदिरों के आसपास बंदरों की फौज़ के दर्शन भी आपको हो जायेंगे। इन सबका कोई इलाज मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में होने से रहा; किसी को भी इस दुर्व्यवस्था से परहेज नहीं।

भारतीयों की खासियत यही है कि अवांछित वस्तुस्थिति से कैसे सामंजस्य बिठाएं इसे वे जन्म के तुरंत बाद ही सीख जाते हैं। जिंदगी ऐसे ही चलते रहनी है।

     जहां तक गायों और साड़ों की बात है मैं बताता हूं वे कहां से आ टपकते हैं। दरअसल इस शहर के गली-कूचों में कई लोग गायें पालते हैं। कुछ ने ताजा एवं “शुद्ध” दूध के लिए निजी तौर पर एक या कभी दो गायें पाल रखी हैं। इसके अलावा कुछ का गोपालन करके दूध का कारोबार करना रोजी-रोटी का साधन है। ऐसे अधिकांश जनों ने अपने पुस्तैनी मकान को और उससे लगे गली-कूचे को ही इस कार्य हेतु प्रयोग में लिया है। इसके लिए कोई पक्का ढांचा गली में खड़ा नहीं करना पड़ता है। इसे आप अतिक्रमण कहेंगे या नहीं मैं नहीं जानता। किंतु प्रशासनिक तंत्र इस व्यवस्था को निर्लिप्त भाव से देखता है। यह भी सच है कि इन लोगों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था की कल्पना भी प्रशासन नहीं कर सकता। यों पिछले बीस-बाइस सालों से मैं वाराणसी में नये-नये आने वाले सक्षम (कानूनन सक्षम लेकिन व्यवहार में अक्षम!) अधिकारियों को सुनते आ रहा हूं कि शहर के किसी कोने में गोशालाएं स्थापित की जायेंगी। आज तक उस दिशा में कभी कोई प्रयास किया गया होगा ऐसा मैं नहीं समझता। अधिकारी दो-तीन वर्ष यहां की हवा में घुल चुके भांग के प्रभाव में रहते हैं, फिर चले जाते हैं।

इन गोपालकों में कुछ ऐसे होते हैं जो प्रातःकाल गाय दुहने के बाद उसे दिन भर के लिए छोड़ देते हैं। वह गाय सड़कों के किनारे की घास चरती है और सड़क के किनारे खुले में पड़े कूड़े-कचरे में कहीं कोई खाद्य सामग्री मिल जाये तो उसे भी खा जाती है। ऐसा खाद्य अक्सर पोलिथीन की थैलियों में रखकर लोग कूड़े में डाल देते हैं। खाद्य को खाते-खाते वह कभी-कभार पोलिथीन ही को निगल जाती है। मैं समझता हूं पोलिथीन खाने के मामले बहुत नहीं होते होंगे। अगर होते तो गायें और सांड़ आये दिन मर रहे होते। मैंने तो २-४ वर्षों तक इन जानवरों को सड़कों पर जीवित देखा है। सड़क पर विचरण करने वाली गाय संध्याकाल को अपने मालिक के पास लौट आती हैं। स्पष्ट है उसे पालने में गोपालक को कम मेहनत पड़ती है।

समस्या तब गंभीर हो जाती है जब ये गायें बच्चे जनने की उम्र पार कर जाती हैं और दुधारू नहीं रह जाती हैं। गोपालक गोसेवक तो होते नहीं कि वे बूढ़े माता-पिता की भांति इन्हें पालें। उनका उद्देश्य तो उनसे दूध पाना होता है जिसे एक प्रकार से गोशोषण कहा जा सकता है। क्यों, यह भी मैं बताऊंगा। अशक्त तथा निरुपयोगी हो चुकीं इन गायों को छोड़ दिया जाता। बेघरबार इंसान की तरह इनका ठिकाना सड़कें हो जाती हैं। दुधारु अवस्था में इन्हें चारा भी मिल जाता था; वह अब कहां से इन्हें नसीब हो? ये हैं गायें जो सड़कों पर इधर-उधर घूमती फ़िरती हैं। जो कुछ भी सड़क में मिल जाये उसे खा लेती हैं। इनके गोबर को देखकर पता चलता है कि उसमें घास का अंश नाममात्र ही होता है। मेरे घर के प्रवेशद्वार (गेट) पर कभी-कभी कोई गाय गोबर कर जाती है। जब मैं उसे साफ करता हूं तो देखता हूं कि वह इंसान के मल के समान बदबू करता है। जिस गोबर से मैं बचपन से वाकिफ़ रहा हूं उस जैसा तो वह हरगिज नहीं होता है। पहले ही उम्र खा चुकी ऐसी गायें अधिक दिनों तक जीवित नहीं रहतीं। मैंने ऐसी ही एक गाय की व्यथा लघुकथा के रूप में अपने अन्य चिट्ठा-आलेख में लिखी है। (देखें: कभी दुधारू रह चुकी उस बूढ़ी गाय की व्यथा)

http://jindageebasyaheehai.wordpress.com/2014/09/06/

वाराणसी में आवारा सांड़

अब आइये अपनी नगरी की गलियों-सड़कों पर विचरण करते सांड़ों की बात पर। हिन्दी में एक कहावत है: “रांड़, सांड़, सीढ़ी औ’ सन्यासी, इनसे बचे सो सेवे काशी।” अर्थात्  सांड़ों की उपस्थिति इस नगरी में कोई नई बात नहीं। पहले वे कहां से आते थे मैं नहीं कह सकता, किंतु आजकल तो वे इन्हीं गोपालकों की देन हैं। होता यह है कि जब गाय बछिया जनती है तो उसे पाल लिया जाता है, क्योंकि वह दो-तीन सालों बाद दुधारू गाय बन सकती है। परंतु जब वह बछड़ा जनती है तो उसका क्या किया जाये? वह बैल बन सकता है। शहरों में किसे जरूरत है बैलों की? अब तो उनकी जरूरत गांवों में भी नहीं रह गयी; उनकी जगह ट्रैक्टर ले चुके हैं। इसलिए नवजात बछड़ा अवांछित होता है। फिर भी कुछ दिनों तक उसे भी पाला ही जाता है ताकि उसकी मौजूदगी से गाय दुहने में आसानी हो। गोपालक उसे यथासंभव कम दूध पीने देते हैं और जैसे ही गाय के थन से दूध उतरने लगता है उसे हटा दिया जाता है। गोपालक गाय को उससे दूर करना शुरू करते हैं और कालान्तर में वह बिना बछड़े के दूध देने लगती है। अपर्याप्त भोजन पाने वाला ऐसा बछड़ा अक्सर कुछ दिनों में मौत का शिकार हो जाता है। यदि वह नहीं मरता है तो उसे सड़क पर छोड़ दिया जाता है। उसकी किस्मत ठीक हुई तो सड़क किनारे की घास तथा अन्य चीजें खाकर जिन्दा रह जाता है और बाद के काल में सांड़ के तौर पर जीवित रहता है। अन्यथा वह भूख अथवा दुर्घटना का शिकार होकर परलोक सिधार जाता है।

तो यह है हमारे गोपालकों/गोसेवकों/गोशोषकों का सच।

     मेरे देशवासी, विशेषतः हिन्दू जन, इस तथ्य को स्वीकारने से कतराते हैं कि हम आडंबरों के साथ जीने के आदी हैं।  हमारी कथनी में आदर्श की खूब बातें होती हैं परन्तु करनी में हम वस्तुस्थिति का भरपूर शोषण करते हैं। गोसेवा एक ढकोसले से भिन्न नहीं है। कुछ ही लोग अपवाद होंगे जो इस कार्य को ईमानदारी से करते हों। – योगेन्द्र जोशी