“अहिंसा परमो धर्मः …” – महाभारत में अहिंसा संबंधी नीति वचन (1)

“अहिंसा परमो धर्मः” यह नीति-वचन लोगों के मुख से अक्सर सुनने को मिलता है। प्राचीन काल में अपने भारतवर्ष में जैन तीर्थंकरों ने अहिंसा को केंद्र में रखकर अपने कर्तव्यों का निर्धारण एवं निर्वाह किया। अंतिम तीर्थंकर भगवान् महावीर के लगभग समकालीन (कुछ बाद के) महात्मा बुद्ध ने भी करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व तमाम कर्तव्यों के साथ अहिंसा का उपदेश तत्कालीन समाज को दिया था। अरब भूमि में ईशू मसीह ने भी कुछ उसी प्रकार की बातें कहीं। आधुनिक काल में महात्मा गांधी को भी अहिंसा के महान् पुजारी/उपदेष्टा के रूप में देखा जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने तो उनके सम्मान में 2 अक्टूबर को अहिंसा दिवस घोषित कर दिया।

अहिंसा की बातें घूमफिर कर सभी समाजों में की जाती रही हैं, लेकिन उसकी परिभाषा सर्वत्र एक जैसी नहीं है। उदाहरणार्थ जैन धर्म में अहिंसा की परिभाषा अति व्यापक है, किसी भी जीवधारी को किसी भी प्रकार से…

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India’s Population Surpasses China’s by 2024 – Should we Rejoice or Regret?

2024 तक भारत की आबादी चीन के बराबर या अधिक हो जायेगी (यू.एन. रिपोर्ट)। इस विषय पर मेरे विचार (आलेख अंग्रेजी में)।

Satyam Naiva Jayati सत्यं नैव जयति

UN Report on World Population

The United Nations (UN) has recently released its report on World Population Prospects.  The report presents a disappointing picture of many Asian and African countries. Regarding India it says:India’s population is likely to exceed that of China by around 2024. When I came across this news item my reaction to it was something like this:

Should we countrymen rejoice on that news, or just regret?

Rejoice? Yes, after that date, we shall be the biggest country on this planet. We shall then be known to be not only the biggest democracy but also population-wise the biggest country. Would not that be a matter of pride for us?

Regret? The country is already riddled with numerous problems. Ever -increasing population is going to add more and more to them. Have we enough resources to solve the population-caused problems? No. Then this population growth must…

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उत्तर प्रदेश में योगी-राज: अभी तक तो असफल होता दिख रहा है

मेरी कुमाउंनी बोली (उत्तराखंड) में एक कहावत है: “सासुलि ब्वारि थैं कै, ब्वारिलि कुकुर थैं कै, और कुकुरैलि पुछड़ हिलै दे।”

मतलब बताने से पहले सोचता हूं कि इसमें एक कड़ी और जोड़ दूं: “सासुलि ब्वारि थैं कै, ब्वारिलि चेलि थैं कै, चेलिलि कुकुर थैं कै, और कुकुरैलि पुछड़ हिलै दे।”

मतलब कुछ यों समझ सकते हैं: किसी कार्य को निबटाने के लिए सास ने बहू (पुत्रवधु) से कहा; बहू ने उसे करने के लिए बेटी को कहा; अल्पवयस्क बेटी ने कार्य की गंभीरता समझे बिना कुत्ते से कहा; और कुत्ते ने स्वभाव के अनुकूल पूंछ हिला दिया। कार्य जैसा का तैसा रह गया।

शासन – अंतर नहीं दिखता

ऊपर्युक्त कहावत हमारे शासकीय तंत्र के चरित्र पर काफी हद तक लागू होती है।

उत्तर प्रदेश की सत्ता सम्हाले योगी आदित्यनाथ को अब तीन माह होने को हैं। इस अल्पावधि में वे जनता की तमाम उम्मीदों को पूरा करते हुए दिखने लगें ऐसी अपेक्षा मैं नहीं रखता। फिर भी कुछ बातें हैं जिनकी झलक नये शासकीय तंत्र में दिखनी ही चाहिए थीं। मैं यह उम्मीद करता था कि जो भाजपा चुनावों के दौरान जोरशोर से कहती थी कि प्रदेश में जंगलराज चल रहा है और अपराधी खुले घूम रहे हैं उसी दल के नेता और कार्यकर्ता अब अपनी अराजकता दिखा रहे हैं। अगर आप समाचार माध्यमों पर विश्वास करें तो ऐसी वारदातें सुनने-देखने में आई हैं जिनमें किसी न किसी बहाने भाजपा के नेता-कार्यकर्ता कानून व्यवस्था अपने हाथ में लिए हों। बसपा एवं सपा की पूर्ववर्ती सरकारों में आपराधिक छवि वाले उनके कार्यकर्ता असामाजिक कृत्यों में लिप्त रहते थे। अब वैसा ही कुछ भाजपा के कार्यकर्ता कर रहे हैं। नयी शासकीय व्यवस्था में भाजपा के लोगों को अनुशासित होकर आम जन के समक्ष दल की अच्छी छवि पेश करनी चाहिए थी। ऐसा हुआ क्या?

योगी जी ने जब सत्ता सम्हाली तो उन्होंने गरजते हुए घोषणा की कि अपराधी तत्व प्रदेश छोड़कर चले जायें अन्यथा वे सींखचों के पीछे जाने के लिए तैयार रहें। इस संदेश से अपराधियों के बीच भय की भावना जगनी चाहिए थी। ऐसा हुआ नहीं। आपराधिक घटनाएं कमोबेश वैसी ही हो रही हैं जैसी बीते समय में हो रही थीं। जो सपा शासन आपराधिक वारदातों के लिए बदनाम रही है वह भी अब कह रही है, “कहां हुए अपराध कम?”

मेरी जानकारी में योगी जी का कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं रहा है। पूर्णतः अनुभवहीन व्यक्ति को समुचित निर्णय लेने में दिक्कत हो सकती है। हमारे लोकतंत्र में यह अघोषित परंपरा रही है कि जिम्मेदार पद पर बैठे अनुभवहीन व्यक्ति के लिए पर्दे के पीछे से मार्गदर्शन करने वाला कोई न कोई रहता है। सुना ही होगा कि कैसे महिला ग्रामप्रधानों के कार्य संपादन उनके पतिवृंद करते आए हैं। बिहार में श्रीमती रावड़ी मुख्यमंत्री बनीं (बनाई गयीं) तो उनके पति लालू जी ही दरअसल राजकाज में मदद कर रहे थे। जब अखिलेश को उत्तर प्रदेश की गद्दी पर बिठाया गया था तो उनके पीछे पिता मुलायम जी का मार्गदर्शन था। लेकिन ऐसा कुछ योगी जी के साथ नहीं है यही मैं समझ रहा हूं। ऐसा नहीं कि इतिहास में सदैव अनुभवी ही सफल होते आये हों। कई बार एकदम नया व्यक्ति भी सफल शासक सिद्ध होते हैं। योगी जी उस श्रेणी में हैं ऐसा नहीं लगता।

प्रशासनिक तंत्र

योगी जी ने सत्ता पर काबिज होते ही अनेकानेक निर्देश अपने प्रशासनिक अधिकारियों को दिए। उन निर्देशों का पालन क्यों नहीं हो रहा है इसे वे क्या समझ पाये हैं? और जो अधिकारी निर्देशों के अनुसार नहीं चल रहा हो उसके विरुद्ध क्या कार्यवाही की गयी? लेख के आरंभ में जो मैंने सुनाया, “सास ने बहू से …” वह प्रशासनिक तंत्र पर लागू होता  है। मुख्यमंत्री शीर्षस्थ अधिकारियों को निर्देश देते हैं, वे कनिष्ठ अधिकारियों को, वे अपने मातहतों को, …।” ये सिलसिला चल निकलता है, और सबसे नीचले पायदान पर का व्यक्ति, “अरे ऐसे आदेश तो आते ही रहते हैं” की भावना से पुराने ढर्रे पर ही चलता रहता है। मेरी समझ में यही कारण होगा कि योगी-राज में अभी कोई खास अंतर दिखाई नहीं देता है।  

निर्देशों की बात पर मुझे अपने वरिष्ठ सहकर्मी शिक्षक के रवैये का स्मरण हो आता है। बात सालों पहले की है जब मैं विश्वविद्यालय में कार्यरत था। मेरे विषय भौतिकी (फिज़िक्स) की प्रायोगिक कक्षा में वे अक्सर विलंब से पहुंचते थे। तब कहते थे, “अरे यार, भूल गये कि क्लास है।” कभी-कभी प्रयोगशाला-परिचर (लैब अटॆंडेंट) उन्हें बुलाने भी चला जाता था। मैं शिष्टता के नाते कुछ कहता नहीं था, लेकिन उनके भूलने को मैं “सुविधानुसार विस्मृति” (फ़गेटफ़ुलनेस ऑव्‍ कन्वीनिअंस) मानता था। मैं समझ नहीं पाता था कि जिस दायित्व के लिए व्यक्ति ने नियुक्ति स्वीकारी हो उसे उस दायित्व की याद दिलाने की जरूरत क्यों पड़ती है?

योगीजी को यह क्यों कहना पड़ता है कि शिक्षक समय पर कक्षा में जायें, चिकित्सक परामर्श कक्ष में समय पर पहुंचें, पुलिस चौकी प्रभारी वारदात की एफ़आईआर दर्ज करें, आदि-आदि। यह तो संबधित अधिकारियों-कर्मियों के दायित्वों में निहित है। यह सब तो उन्हें करना ही करना है अपनी सेवा-शर्तों के अनुरूप। योगी जी को निर्देश निर्गत करने के बजाय यह पूछना चाहिए कि वे दायित्वों के अनुसार कार्य क्यों नहीं कर रहे हैं। अगर उन्हें अपने दायित्वों का ही ज्ञान न हो और उसमें रुचि ही न लें तो फिर शासकीय सेवा में क्यों हैं?

सरकारी ‘सेवा’ बल्लेबल्ले

उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था क्यों घटिया दर्जे की है इसे समझना जरूरी है। सरकारी नौकरी में आर्थिक सुरक्षा उच्चतम श्रेणी की रहती है। ठीकठाक वेतन के अलावा कई प्रकार के लाभ और रियायतें, सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन, आदि इस नौकरी की खासियतें हैं। जब इतना सब किसी को मिल रहा हो तो दायित्व-निर्वाह में ईमानदारी तो बरतनी ही चाहिए। परंतु दुर्भाग्य है कि नौकरी के लाभ तो सभी चाहते हैं किंतु बदले में निष्ठा से काम भी करें यह भावना प्रायः गायब रहती है।

निजी क्षेत्रों में व्यक्ति की अक्षमता माफ नहीं होती, उसे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। लेकिन सरकारे नौकरी में निर्देश पर निर्देश दिए जाते हैं, या तबादला कर दिया जाता है, अथवा कुछ काल के लिए निलंबन। तबादला का मतलब यह है कि निकम्मेपन की जरूरत ‘यहां’ नहीं लेकिन ‘वहां’ है। वाह! लोगों को यह एहसास नहीं है कि निलंबन दंड नहीं होता है। यह तो महज एक प्रक्रिया है तथ्यों की छानबीन के लिए, ताकि दंडित करने न करने का निर्णय लिया जा सके। आम तौर पर 90 दिनों के अंतराल पर निलंबन वापस हो जाता है, और मुलाजिम बाइज्जत अपनी कुर्सी पर!

आजकल सरकारी नौकरियों के लिए मारामारी देखी जाती है। इच्छुक जन हर प्रकार के हथकंडे अपनाते देखे जाते हैं। सत्ता पर बैठे लोग और प्रशासनिक अधिकारी जन अपने-अपने चहेतों को नियुक्ति देते/दिलाते है। जातिवाद, भाई-भतीजाबाद, क्षेत्रवाद आदि की भूमिका अहम रहती है। जब नियुक्तियां ऐसी हों तो अच्छे की उम्मीद क्षीण हो जाती है।

सरकारी नियुक्तियां

नियुक्तियों में शैक्षिक एवं शारीरिक योग्यता (जहां और जैसी उसकी अहमियत हो) तो देखी जाती है, लेकिन किसी भी सरकारी विभाग में नियुक्तियों में आवेदक के बौद्धिक स्तर (इंटेलिजेंस कोशंट) एवं भावात्मक स्तर (इमोशनल कोशंट) का आकलन नहीं किया जाता है। मेरा मानना है कि इन दोनों का गंभीर आकलन नियुक्तियों में होना चाहिए। पुलिस बल में तो इनकी आवश्यकता कुछ अधिक ही है। ऐसे पुलिसकर्मियों की खबरें सुनने को मिलती हैं जिनकी हिरासत से अपराधी चकमा देकर भाग जाते हैं। साफ जाहिर है उनका बौद्धिक स्तर कम ही रहता है। इसी प्रकार वे कभी-कभी एफ़आइआर तक नहीं दर्ज करते हैं, खास तौर पर रसूखदार व्यक्ति के विरुद्ध, क्योंकि वे संवेदनशील नहीं होते हैं। हमें आम जनों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए यह भावना उनके मन में होनी चाहिए कि नहीं? अक्सर देखा गया है कि वे भुक्तभोगी का शोषण करने से परहेज नहीं करते हैं।

जब संवेदेनाहीन व्यक्ति सरकारी तंत्र में हो तो वह आम जन के प्रति ही नहीं अपितु अपने आधिकारिक कर्तव्यों के प्रति भी लापरवाह होता है। और यही इस उत्तर प्रदेश में हो रहा है। यह धारणा सरकारी मुलाजिमों के दिलों में गहरे बैठ चुकी है कि उन्हें उनके निकम्मेपन के लिए दंडित नहीं किया जायेगा। वस्तुतः प्रशासनिक तंत्र के संदर्भ में लापरवाही, कामचोरी, नकारापन, आदि सभी कुछ जन्मसिद्ध अधिकार माना जाता है। एक बार नौकरी में घुस जाओ और जिन्दगी मजे में गुजार लो। बस अपने ऊपर के अधिकारियों को खुश रखो; काम करो या न, बस काम करते हुए-से दिखो।

पिछले 25-30 वर्षों में प्रदेश प्रशासनिक गिरावट के दौर से गुजर चुका है। उसे पटरी पर लाना आसान काम नहीं है। महज निर्देश पर निर्देश देने से कुछ नही होने का यह योगी जी अभी तक समझ नहीं पाये हैं। उन्हें देखना चाहिए कि काम क्यों नहीं हो रहा है। यदि हो रहा है तो घटिया स्तर का क्यों हो रहा है। कुछ को दंडित करके दिखाएं; निलंबन से कुछ नहीं होने वाला।

निर्देश पर निर्देश देने से कुछ नहीं होगा। निर्देश देना यानी “सास ने बहू से कहा, बाहू ने …”।

तंत्र वही है। उसका चरित्र अभी तो अपरिवर्तित ही है। इसलिए योगीराज की सफलता संदिग्ध है। – योगेन्द्र जोशी

भारतीय समाचार माध्यमों (टीवी चैनलों, अकबारों) के मालिकों, सपादकों, पत्रकारों का रुदन क्या वाकई गंभीर है?

प्रेस क्लब में पत्रकारों की बैठक

” ’तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्तनशीं था,

उसको भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था।’

“शुक्रवार की शाम दिल्ली के प्रेस क्लब में इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक और लेखक अरुण शौरी ने जब पाकिस्तानी शायर हबीब जालिब का ये शेर पढ़ा तो वहाँ मौजूद 500 से ज़्यादा पत्रकारों को मालूम था कि शेर दरअसल किसके लिए पढ़ा गया है। उन्होंने तालियों की गड़गड़ाहट से शेर का स्वागत किया.

“प्राइवेट टीवी चैनल एनडीटीवी के प्रोमोटरों प्रणय रॉय और राधिका रॉय के घर और दफ़्तरों पर पिछले हफ़्ते सीबीआई के छापों के ख़िलाफ़ दिल्ली के पत्रकारों की ये दुर्लभ बैठक थी और अरुण शौरी के सीधे निशाने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे.”  (http://www.bbc.com/hindi/india-40235229)

मैं न तो मोदी जी का समर्थक हूं और न ही उनका प्रशंसक।

और मैं विरोधी भी नहीं हूं।

मैं विरोधी हूं तो उन सबका जो बातें तो ऊंची-ऊंची करते हैं लेकिन उनका आचरण उसके अनुकूल नहीं रहता। और ऐसे लोग समाज में सर्वत्र, सभी क्षेत्रों में मिल जायेंगे। मीडिया कोई अपवाद नहीं। उसका स्वयं को भिन्न और दोषों से परे दिखाने का प्रयास महज एक ढोंग है।

प्रेस क्लब में पत्रकारिता से संबद्ध जो कार्यक्रम हुआ उसमें शामिल कौन थे? क्या वे वाकई ईमानदार लोग हैं? मुझे शंका है। अवश्य की कुछ जने गंभीर होंगे किंतु मात्र एक छोटा प्रतिशत। जिस प्रकार समाज के अन्य सभी क्षेत्रों में लोग अपने-अपने हितों को साधने में लगे हैं, कुछ अपवादों को छोड़कर, उसी प्रकार मीडिया में भी अधिसंख्य जनों को अपनी चिंता रहती होगी ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।

मैं जब हितों की बात करता हूं तो उसकी बहु-आयामी परिभाषा लेकर चलता हूं। किसी के लिए धन-संपदा बटोरना हित हो सकता है तो किसी अन्य के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा या समाज में विशिष्ठ स्थान पाना; किसी के लिए सत्ता या तत्सदृश ताकत बटोरना और किसी के लिए ईमानदार, समाज के लिए समर्पित, एवं लोकतांत्रिक स्वातंत्र्य का अलमबरदार (झंडा-वाहक) दिखना, इत्यादि। कदाचित मीडिया वाले इस चौथी चीज के शौकीन हों।

ईमानदार कौन ?

इस “इंडिया दैट इज़ भारत” देश में कदाचार सामाजिक चरित्र का हिस्सा बन चुका है। कौन ईमानदार है यह पता ही नहीं चलता। किसी पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाए जा सकते हैं लेकिन आम तौर पर किसी पर आरोप सिद्ध हो नहीं पाता। आरोप लगाने वाला भी साफ-सुथरा और जिस पर आरोप लगता है वह भी साफ-सुथरा। दोनों ही संदेह का लाभ (बेनेफ़िट औफ़्‍ द डाउट) पा जाते हैं। पर क्या यह संभव है कि दोनों की छवि साफ हो? तार्किक समीक्षा करने का आदी व्यक्ति इस तथ्य को सहज रूप से जानता है कि दोंनों भ्रष्ट तो हो सकते हैं, लेकिन दोनों ही की छवि एक साथ साफ हरगिज नहीं हो सकती।

मैं ईमानदार होने की बात करने वाले सभी दावेदारों पर शक करता हूं चाहे वे राजनीति में हों या मीडिया में। इसका मतल्ब यह नहीं कि देश ईमानदारों से वीरान है। नहीं। मैं जिस व्यक्ति को देख-परख नहीं लेता उसे आंख मूंदकर ईमानदार नहीं मान लेता भले ही वह मीडिया का व्यक्ति ही क्यों न हो। जब भी कोई आरोपों के घेरे में आता है और उसके विरुद्ध जांच आरंभ होती है तो वह चीख-चीख कर कहने लगता है “मेरे विरुद्ध साजिश रची गयी है”, “यह तो बदले की भावना से किया जा रहा है” इत्यादि। देश में भ्रष्टाचार है यह हर कोई स्वीकारता है लेकिन कोई भ्रष्टाचारी नहीं है। वाकई चमत्कार है ऐसा होना।

मैं ये बातें इसलिए कह रहा हूं कि हाल में एनडीटीवी (NDTV) के मालिक और उनकी पत्नी के ठिकानों पर जांच एजेंसियों का छापा पड़ा। छापा सकारण पड़ा यह जांच एजेंसियां कह रही हैं। यदि वे झूठे आरोपों के आधार पर जानबूझकर ऐसा कदम उठा रही हैं तो यह वास्तव में आपत्तिजनक है। यदि देश में ऐसा ही बहुत कुछ हो रहा है जैसा कि मीडिया के कुछ जनों का मत है तो यह देश के दुर्भाग्य का द्योतक है।

लेकिन मैं कैसे मानूं कि उक्त आयोजन में मीडिया वाले सच ही बोल रहे हैं और जांच एजेंसियां झूठ? एक आम नागरिक के नाते मैं किस पर भरोसा करूं? और क्या उस बैठक में उस समय अनुपस्थित अन्य मीडियाकर्मी भी उनसे सहमत हैं?

आपातकाल ?

मेरी जानकारी में अपने जैसा यह हालिया पहला वाकया है। हो सकता ऐसे ही दो-एक और भी मामले हों। किंतु इतने भर से क्या यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि देश में पिछली (बीसवीं) शताब्दी के 7वें दशक के मध्य के आपातकाल जैसी स्थिति पैदा हो चुकी है? उस आपातकाल से देश की मौजूदा दशा की तुलना के लिए एक नहीं कई दृष्टांत सामने होने चाहिए। इस समय कितनों की धर-पकड़ हो रही है? कितने लोग भूमिगत हो चुके हैं? कितनों को सलाखों के पीछे भेजा चुका है? ऐसे प्रश्न तो पूछे ही जाने चाहिए।

यदि आपात्कालीन-सी स्थतियां बन चुकी हों तो उसका ज्ञान इन मीडियाकर्मियों को तभी क्यों हुआ जब उनकी बिरादरी के किसी सदस्य पर आंच आई हो? अभी तक उन गंभीर मामलों में इन लोगों ने चुप्पी क्यों साध रखी थी जो उनके मतानुसार अन्यत्र आपातकाल की याद दिलाने वाली घटित हो चुकी हैं? उन सब का खुलासा क्यों नहीं किया संबंधित व्यक्तियों ने?

जब कोई शंका के घेरे में हो तो उसके विरुद्ध जांच होनी चाहिए कि नहीं? और उस प्रक्रिया में छापा पड़ना भी स्वाभाविक है। एनडीटीवी के मालिक के मामले में जो हुआ है उसे निराधार कह देना जल्दीबाजी होगी। इस पर भी गौर करें कि स्वयं एनडीटीवी के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हुई है।

मीडिया के वरिष्ठ, सुप्रतिष्ठित सदस्यों की बातों को आम जन गंभीरता से लेते हैं यह मेरी व्यक्तिगत धारणा है। इसलिए उन्हें वस्तुस्थिति का आकलन वस्तुनिष्ठ आधार पर करना चाहिए। अपने वैयक्तिक मनोभावों को जन-सामान्य के सम्मुख निर्विवाद सत्य के तौर पर प्रस्तुत नहीं करना चाहिए। अपनी प्रतिष्ठा और आम जन का उनमें भरोसे का लाभ लेकर अतिरंजित बातें करना उन्हें शोभा नहीं देता। उन्हें अहंकार से बचना चाहिए।

वर्तमान सरकार से बहुत-से लोग नाखुश होंगे, बहुतों को असुविधा हो रही होगी, फिर भी यह कहना कि वह आपातकाल की स्थिति रच रही है उचित नहीं होगा। अभी स्थिति भयावह नहीं है! होती तो हमें भी दिखती। फिर बता दूं मैं भाजपा का नहीं हूं। – योगेन्द्र जोशी

 

सवाल “भारत” के वजूद का

जिंदगी बस यही है

वैवाहिक कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए मैं अपने एक रिश्तेदार के यहां हूं। कई अन्य मित्र-संबंधी भी पहुंचे हैं। घर में भावी समारोह की चहल-पहल है। घर के सदस्य आगामी आयोजन की तैयारी में जुटे हैं और कुछएक अतिथि उस कार्य में अपना योगदान भी दे रहे हैं। अधिकांश अन्य प्राप्तवयस्क, प्रौढ़, एवं अपेक्षया वृद्ध अतिथिगण बाहर खुले में दो-दो-तीन-तीन के समूह में परस्पर वार्तालाप में जुटे हैं। आज के जमाने में स्मार्टफोन की महत्ता कम नहीं है, विशेषतः नवयुवाओं, किशोर-किशोरियों तथा प्राप्तवय बच्चों के लिए। इस मौके पर उक्त अल्पवयस्क वर्ग के कुछएक सदस्य अपने-अपने स्मार्टफोन के साथ व्यस्त हैं।

मैं एक कुर्सी पर बैठा हुआ चारों तरफ़ का नजारा देख रहा हूं। लोगों के परिधानों, उनके हावभावों, उठने-बैठने एवं हंसने-बोलने के तौर-तरीकों आदि को बारीकी से देखना मेरे लिए सदा से एक रोचक विषय रहा है। मैं ऐसे वैविध्यपूर्ण वातावरण में शायद ही कभी ऊबता हूं। इस…

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उनकी हिन्दी बनाम मेरी हिन्दी

हिन्दी तथा कुछ और भी

मैं जो हिन्दी लिखता हूं उसे वे समझ नहीं पाते, और जो हिन्दी वह समझते हैं उसे मैं लिखना नहीं चाहता।

मेरी हिन्दी?

कुछएक मास पूर्व मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा, “मेरी बेटी एक निजी कंपनी में कार्यरत है। कंपनी अपने कर्मियों के लिए हिन्दी में एक पत्रिका छापती है जिसके संपादन आदि का दायित्व बेटी को सोंपा गया है। मैंने उसे बताया कि आप ब्लॉग लिखा करते हैं और सलाह दी कि पत्रिका के लिए वह आपसे भी लेख लिखने का अनुरोध कर सकती है। अथवा आपके ब्लॉगों पर प्रस्तुत आलेखों में से चुनकर पत्रिका में शामिल करने की अनुमति ले सकती है। आप सहमत होंगे न?”

अपने सहमति जताते हुए मैंने उनसे कहा कि वे मेरे ब्लॉगों के पते अपनी बेटी को भेज दें और यह भी कह दें कि आवश्यकता अनुभव करने पर वह मुझसे सीधे संपर्क कर ले।

बात आई-गई-सी हो गई। एक लंबे अंतराल…

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फुटकर काम की तलाश

जिंदगी बस यही है

मैं मखमुठी से अखनूर जा रहा हूं। जम्मूतवी-अखनूर-जोरिवां मार्ग पर स्थित सैन्य-क्षेत्र है मखमुठी जहां मैं कार्यवशात् चार-पांच दिनों के प्रवास पर आया हूं। यह स्थान अखनूर से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर है। सुबह के करीब 9:00 बजे हैं। मैं साइकिल से शौकिया अखनूर जा रहा हूं यह जांचने के लिए कि साइकिल से 30-32 कि.मी. आ-जा सकता हूं कि नहीं। मैं साइकिल की उपयोगिता का क़ायल हूं और उम्र के इस पड़ाव में भी साइकिल को ही अपने शहर में आवागमन के लिए यथासंभव इस्तेमाल में लेता हूं।

रास्ते में मैं चाय की छोटी-सी एक दुकान पर रुक जाता हूं, अपने साथ की बोतल से पानी पीने और उसके बाद एक कप चाय पीने के लिए। सड़क की हालत ठीक है, समतल और सपाट, गड्ढामुक्त! वाहनों का आवागमन अधिक नहीं है। फिर भी जो गुजर रहे हैं उनकी रफ़्तार अच्छी-खासी है, इसलिए दोनों तरफ़ देखकर ही सावधानी…

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