गांधी जयन्ती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस – क्या है अहिंसा?

गांधी जयंती

आज गांधी जयंती है, दो अक्टूबर। गांधी-जन्म के १५० वर्ष पूरे हुए। मैं इस समय गेन्ज़विल (फ़्लोरिडा, अमेरिका) में हूं, कुछ हफ़्तों के प्रवास पर। भारत के राष्ट्रीय समय से यहां की घड़ी ९:३० घंटे विलंबित रहती हैं। यहां इस समय २ अक्टूबर का दिन है और तदनुसार अपने देश में रात्रि है।

जैसा कि परंपरा है गांधीजी के गुणगान करने और उनके विचारों की महत्ता का बखान करने का दिन रहता है यह। देश की खबरें जानने को इंटर्नेट के माध्यम से समाचार पत्रों पर नजर दौड़ाने पर मुझे गांधीजी के विचारों को प्रस्तुत करने, उन्हें प्रसारित करने वाली विज्ञप्तियां दिखती हैं। देश में राजनेताओं, सामाजिक संगठनों, एवं अन्य लोगों ने कैसे यह दिन गांधीजी को समर्पित किया होगा यह तो मुझे कल के समाचारपत्रों से ही पता चलेगा। हमें उनके सुझाए मार्ग पर चलना चाहिए आदि कहकर रस्मादयगी की परंपरा सदैव की भांति निभाई ही गई होगी। जैसा होता आया है विचार व्यक्त करने वाले और सुनने वाले दोनों ही फिर अपने रोजमर्रा की चर्या में लौट जाते हैं। जिसे जैसे जीना है वह इस दिवस के बाद भी अपनी-अपनी सुविधानुसार वैसे ही जीता है, कहीं कोई फर्क पड़ता है ऐसा मुझे नहीं लगता है।

गांधी जी का अहिंसावाद

जिस बात को लेकर गांधीजी की सर्वाधिक चर्चा होती रही है वह है उनका अहिंसावाद। उनके इसी अहिंसावाद को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस विशेष दिन (२ अक्टूबर) को “अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस” घोषित किया था। दुनिया के लिए गांधी का महत्व इसी अहिंसा के विचार तक सीमित है ऐसा मुझे लगता है। इसके आगे भी गांधी की प्रासंगिकता है यह पूरे विश्व के लिए शायद माने नहीं रखता है। किंतु भारत के लिए उनके अन्य विचार अधिक माने रखते हैं जिनकी सार्थकता पर विवाद नहीं हो सकता है। अहिंसा का विचार अच्छा तो है किंतु व्यावहारिक नहीं है ऐसा मैं सोचता हूं। क्यों? इसे स्पष्ट करना मेरे इस आलेख का विषय है। उस विषय पर आऊं इससे पहले उन कुछएक बातों की चर्चा करना समीचीन होगा जो गांधी जी के विचारों में शामिल रहे हैं।

क्या कहते थे गांधी जी?

(१)   वे कहते थे सामाजिक भेदभाव नहीं होना चाहिए जिसका एक पहलू छुआछूत की परंपरा के रूप में समाज में सदियों से रहा है और आज भी कुछ अंश तक बचा है।

(२)   मनुष्य को अपने निजी कार्य यथासंभव खुद ही करना चाहिए, जैसे अपने लत्ते-कपड़े धोना, शौचालय-स्नानगृह साफ रखना आदि। 

(३)   हमें अपने शारीरिक श्रम का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए, जैसे छोटी-मोटी दूरी के लिए पैदल चलना या साइकिल का प्रयोग करना।

(४)   हमें अपने परिवेश को स्वच्छ रखना चाहिए। गांधीजी के इसी विचार से प्रेरित होकर देश में (मात्र आंशिक रूप से सफल) ’स्वच्छ भारत अभियान’ चल रहा है।

(५)   गांधीजी सादे जीवन के पक्षधर थे। मितव्ययिता अमल में लाना और संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से बचना उनके विचारों में निहित रहे हैं।

(६)   गांधीजी इस बात के प्रबल पक्षधर थे कि समाज में आर्थिक विषमता एक सीमा से अधिक नहीं होनी चाहिए। अर्थात् अतिसंपन्न लोग अपनी संपदा से विपन्न लोगों की सहायता करें। इस विचार में परोपकारिता की भावना निहित है।

(७)   गांधीजी देश को कृषिप्रधान मानते थे और गांवों के उत्थान के हिमायती रहे। छोटे-मोटे उद्योगों विशेषतः घरेलों उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करते थे।

(८)   कहा जाता है कि गांधीजी अहिंसावादी के साथ सत्यवादी एवं निष्ठावादी भी थे। अर्थात् अपने जिम्मे के कार्य के प्रति दुराव-छिपाव से मुक्त समर्पण भाव लोगों में होना चाहिए।

(9)    गांधीजी भारतीय भाषाओं को अधिकाधिक प्रयोग में लेने एवं अंग्रेजी पर निर्भरता को कम से कम करने के प्रबल पक्षधर थे।

इस प्रकार की अन्य बातें भी उनके विचारों में रही होंगी। गांधीजी को लेकर मेरे ध्यान में जो आया उसका उल्लेख मैंने किया है।

उनके देहावसान को आज ७२ वर्ष बीतने को हैं। उनकी प्रशंसा तो प्रायः सभी करते रहते हैं किंतु सवाल उठता है कि उनके विचारों को अमल में लाने का प्रयास कितने लोग करते हैं? उदाहरण के तौर पर देशज भाषाओं को लीजिए। जिस अंग्रेजी से देश को मुक्तप्राय करने की बात वे करते हैं वह अब देश पर पूरी तरह हावी हो चुकी है। गांधीजी का गुणगान करना एक बात है, उनके विचार स्वीकारना नितांत अलग बात।

मैं गांधीजी के सतही एवं अगंभीर गुणगान का विरोधी हूं। व्यक्तिगत तौर पर मैं यह मानता हूं कि उनके विचार आदर्शों से प्रेरित थे, जिनको व्यावहारिक जीवन में उतारना इस विविधताओं से भरे वास्तविक संसार में संभव नहीं। अगर कुछ हो सकता है तो वह यह कि जब तक गंभीर परेशानी पैदा न हो इन बातों पर टिकने का प्रयास किया जा सकता है।

अस्तु, मैं गांधीजी के अहिंसावाद पर लौटता हूं।

क्या है अहिंसा

अहिंसा की परिभाषा क्या है? प्राचीन भारतीय चिंतक अहिंसा के प्रति व्यापक दृष्टिकोण रखते थे। उनके अनुसार अहिंसा के निहितार्थ आधुनिक पाश्चात्य नॉन-वायलेंस (non-violence) से कहीं अधिक व्यापक रहे हैं। मेरी दृष्टि में इस विषय पर दो बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए:

[१]     भारतीय चिंतन में अहिंसा मनसा-वाचा-कर्मणा तीनों प्रकार का माना गया है। कर्मणा अहिंसा का अर्थ है शारीरिक या भौतिक रूप से किसी को कष्ट न पहुंचाना। विश्व के प्रायः सभी समाजों में अहिंसा की “नॉन-वायलेंस  के तुल्य” यही परिभाषा प्रचलन में है। वाचा एवं मनसा हिंसा की बात शायद ही कहीं कोई करता हो। वाचा का अर्थ है बोले गये शब्दों से किसी को दुःख पहुंचाना। इस हिंसा को हम देख-सुन सकते हैं। मनसा का अर्थ है किसी के अहित का विचार मन में लाना। दूसरा कोई इसे नहीं जान सकता है। प्राचीन चिंतक किसी के प्रति अहितकर या अनिष्ट विचारों को मन में लाना भी हिंसा मानते थे, यानी पूर्णतः कल्याणकारी विचारों को ही मन में स्थान देना व्यक्ति का कर्तव्य है।

[२]     प्राचीन मान्यता में अहिंसा की अवधारणा बहुत व्यापक है और मानव समाज से आगे अन्य प्राणियों तक फैली है। जैन मुनियों के लिए यह बात बहुत माने रखती है। बौद्धमतावलंबी और वैष्ण्वों के लिए भी अहिंसा की ऐसी अवधारणा महत्व रखती है। “अहिंसा” परमो धर्म:” कथन का उल्लेख महाकाव्य महाभारत में यत्रतत्र मिलता है। इस बारे में मैने दो आलेख अपने ब्लॉग में लिखे हैं। (देखें आलेख दिनांक 2017-07-07 एवं दिनांक 2017-07-28)

जिस महाभारत में अहिंसा की वकालत की गई है उसी में तमाम कथाएं भी हैं जिनमें हिंसा का बोलबाला है और स्वयं महाभारत की घटना हिंसक युद्ध का लेखाजोखा है। ऐसा विरोधाभास क्यों है? प्रचीन संस्कृत ग्रंथों में हिंसा की व्यापकता की कथाएं बहुतायत से मिलती हैं। इस विरोधाभास की व्याख्या वस्तुतः कठिन नहीं है।

दरअसल भारतीय धार्मिक मतों के दो स्पष्ट पहलू रहे हैं:

(१)     एक है आध्यात्मिक जिसके अनुसार मनुष्य को जीवन-मरण से मुक्त होने का प्रयास उसका कर्तव्य है और उसके लिए व्यक्ति को ऐहिक सुखों-हितों का मोह त्यागकर खुद को सत्य, अहिंसा, प्रेम, आदि के सन्मार्ग पर ले जाना होता है जिससे वह अंततः निर्वाण (बौद्धमत), मुक्त जीवात्मा (जैन मत) अथवा मोक्ष (वैदिक मत) की परम अवस्था को पा सके। अहिंसा उसी संदर्भ में सार्थक है।

(२)     दूसरा है ऐहिक सामाजिक जीवन से संबंधित जो आदर्शों की दिशा में बढ़ तो सकता है किंतु आदर्शों पर चल नहीं सकता। यह वह क्षेत्र है जिसमें अहिंसा की प्रवृत्ति सभी मनुष्यों में नहीं होती है। असल में सत्य-असत्य, प्रेम-द्वेष, हिंसा-अहिंसा, परोपकार-अपकार आदि परस्पर विपरीत प्रवृत्तियां इस संसार में एक साथ अस्तित्व में रहते हैं।

अहिंसा की व्यावहारिकता

मेरा प्रश्न है क्या गांधीजी ने उपर्युक्त तथ्यों पर मनन करने के बाद अहिंसा की बात की थी? मेरे मत में वे इस तथ्य की अनदेखी करते थे कि उनके अहिंसा के सिद्धांत को सभी आत्मसात नहीं कर सकते हैं। अवश्य ही अहिंसा समाज के लिए वांछित है, किंतु हिंसा से समाज मुक्त नहीं हो सकता। हिंसा केवल आत्मरक्षा के लिए ही नहीं बल्कि समाज को सुव्यवस्थित रखने के लिए, आपराधिक प्रवृत्ति के जनों को नियंत्रित रखने के लिए, भी आवश्यक है। इस बात को गांधीजी समझते थे क्या?

मनुस्मृति में अधोलिखित उक्तियां पढ़ने को मिलती हैं:

“सर्वो दण्डजितो लोको …”,

“उद्वृत्तं सततं लोकं राजा दण्डेन शास्ति …”

“दण्डात् प्रतिभयं भूयः शान्तिरुत्पद्यते …”

(मनुस्मृति, अध्याय ७, श्लोक २२, २७, २८, क्रमशः)

इन कथनों में यह संदेश दिया गया है कि यह जगत् (मानव समाज) दंड द्वारा ही नियंत्रण में रह पाता है। क्या दंडित करने की व्यवस्था हिंसात्मक नहीं है? अवश्य ही शासन दंडित करने का कार्य अपने हाथ में रखता है न कि उसका अधिकार किसी अन्य देता है। किंतु किसी को जैसे भी दंडित किया जाए उसे कहा तो हिंसा ही जाएगा !

यह भी कहा जाता है कि गांधीजी एक प्रकार से जिद्दी थे। वे दूसरों की कम सुनते थे बल्कि “मेरी बात सही है” यह धारणा उनसे मनवाते थे। उनके अहिंसावाद पर लोग जब तक टिप्पण्णी करते वे महात्मा मान लिए गए थे। तब उनका खुलकर विरोध करने का साहस कम ही लोग जुटा पाए। और जो असहमति व्यक्त करते थे उनकी कोई सुनता नहीं था।

एक धारणा यह भी लोगों के मन में बैठ गई थी कि देश की आज़ादी गांधीजी के अहिंसक आंदोलन का फल था। मैं इस धारणा को स्वीकार नहीं करता। मेरे मत में उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण ऐसे हालात बन चुके थे कि ब्रितानी हुकूमत को अपना वैश्विक साम्राज्य संभालना मुश्किल हो गया था। उसके अधीनस्थ लगभग सभी देश एक-एक कर स्वतंत्र होते चले गये।

इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि गांधीजी पहले व्यक्ति नहीं थे जिन्होंने अहिंसा की बातें की हों। महात्मा बुद्ध, तीर्थंकर महावीर एवं यीशु मसीह सुविख्यात हैं जिन्होंने अहिंसा का उपदेश दिया। किंतु उनके स्वयं के अनुयायी तक सदैव अहिंसक नहीं रह सके। स्पष्ट है कि अहिंसा वांछित है लेकिन सुलभ नहीं है। हिंसा समाज में सदा से रही है और आगे भी रहेगी।

भारतीय समाज व्यक्ति-पूजक है। यदि कोई असामान्य तौर पर प्रतिष्ठित हो जाए तो जन समुदाय उसमें दोष देखना बंद कर देता है। गांधीजी उसी स्तर पर पहुंचा दिए गये थे। – योगेन्द्र जोशी