बाबागिरी का खूबसूरत धंधा बनाम आसाराम बापू पर लगे आारोप

निवेदन

सर्वप्रथम मैं राजनेताओं एवं ‘संत-महात्माओं’ के समर्पित भक्तों से क्षमायाचना करता हूं, क्योंकि मैं जो कहने जा रहा हूं उससे वे आहत अनुभव कर सकते हैं । उनसे यही निवेदन है कि वे आगे न पढ़े । उनके आहत होने की संभवना से मैं अपनी बात कहना बंद नहीं कर सकता । किसी को बातें बेहद घटिया लग सकती हैं तो कुछ को उनमें तथ्य नजर आ सकते हैं । कोई भी व्यक्ति सबके मन की नहीं कर सकता है । अतः जिसे पसंद न हो वह खुद ही दूर हो जाए यह नीति ही ठीक है ।

asaram bapu

सम्मान खोती जमाअतें

समाज के दो जमाअतों के प्रति मेरे मन में मुश्किल से कुछ – यों कहिए कि बहुत ही कम – सम्मान बचा है । पहली है राजनेताओं की जमाअत और दूसरी है उन लोगों की जो अध्यात्म के नाम पर दुकानें खोलकर स्वयं को भगवान, महात्मा, संत, संन्यासी, आदि उपाधियों से संबोधित करवाते हैं । यह मेरा दुर्भाग्य है कि इस इक्कीसवीं सदी में शायद ही कोई भारतीय राजनेता दिखाई देता है जिसे मैं सम्मानीय समझ सकूं । सामान्य शिष्टाचार के नाते मैं किसी के प्रति अपशब्द प्रयोग नहीं करना चाहूंगा, किंतु मन में श्रद्धाभाव नहीं उपजता यह बात तो कह ही सकता हूं । यही बात तथाकथित साधु-संतों के बारे में भी कहता हूं । दुर्भाग्य से किसी ऐसे व्यक्ति के दर्शन नहीं हुए जो मुझे अपने सत्कर्मों से प्रभावित कर सका हो । अभी मैं यहां पर राजनेताओं के बारे में कुछ नहीं कह रहा हूं ।

आरोप से घिरे आसाराम बापू

आजकल मीडिया में आसाराम बापू छाए हुए हैं कथित दुष्कर्म के आरोपों से घिरे हुए । असल मामला क्या है यह घर बैठे भला मैं कैसे ठीक-से जान सकता हूं ? मेरे पास महाभारत के संजय – प्रज्ञाचक्षु महाराज धृतराष्ट्र के ‘कमेंटेटर’ – की भांति दिव्यदृष्टि होती तो मामले का सही-सही ज्ञान मुझे बैठे-बैठे हो जाता । काश! कि ऐसा होता ।

आसाराम पर टिप्पणी करने से पहले मैं इस तथ्य का उल्लेख करना चाहता हूं कि आधुनिक काल भौतिकता और उपभोक्तावाद का है । बहुत से मनुष्यों को इस बात का भली-भली ज्ञान हो चला है कि जीवन के सुखदुःख सब इसी जीवन में भोगने होते हैं; इसके आगे कुछ है भी यह कोई माने नहीं रखता है । मनुष्य का पुनीत कर्तव्य है इस जीवन को यथासंभव सुख से जिये और अधिकाधिक सुखोपार्जन के लिए जो भी व्यवसाय ठीक लगे उसे अपना ले । इसी कारण आज वह सब खुलकर होते दिखाई दे रहा है, जिससे लोग कभी पाप कहते हुए बचते थे और जिसे ज्ञानी-धर्मात्मा नरक का मार्ग बतलाते थे । नरक-स्वर्ग, पाप-पुण्य, जन्म-परजन्म जैसे शब्द अब अपनी अहमियत काफी कुछ खो चुके हैं ।

इस धरती पर ऊपर वाले की सृष्टि में निरीह, धर्मभीरु, चिंतनक्षमता में कमजोर, और सरलता से सम्मोहित हो सकने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक है । वे धर्मभीरु तो हैं किंतु धर्म की समझ नहीं रखते हैं, और आसानी से बहकावे में आ जाते हैं । उनकी कमजोरी का लाभ लेने के लिए कुछ अतिचतुर लोगों ने लाभप्रद व्यवसाय के तौर पर धर्म-अध्यात्म की दुकानें खोल ली हैं, और उन निरीह जनों के बल पर सुखभोग कर रहे हैं । वे जब तक इन निरीह जनों का शोषण सीमा के भीतर करते हैं तब तक दुकान बढ़िया चलती है, लेकिन जब कभी आत्मसंयम खोकर अमर्यादित आचरण कर बैठते हैं तो समस्या से घिर जाते हैं । आसाराम ऐसे ही ‘दुकानदार’ हैं जो दुर्भाग्य से अपनी अति के जाल में फंस गये हैं ।

बाबागिरी का कलयुगी धंधा

धर्म-अध्यात्म की दुकान खोलने/चलाने, जिसे में बाबागिरी कहता हूं, में सफल होने के लिए

(1) आपमें संबंधित हुनर होना आवश्यक है । बिना हुनर के तो किसी भी व्यवसाय में सफल नहीं हुआ जा सकता है ।

(2) दूसरा व्यक्ति में वह अदम्य इच्छाशक्ति होनी चाहिए की आप अपने हुनर का लाभ उठाने में हरगिज नहीं हिचकिचाएंगे । मान लें कि कोई लोगों के बटुए पर सफाई से हाथ फेर सकता है, लेकिन उसका मन गवाही न दे तो वह उसे नहीं कर सकता ।

(3) बाबागिरी के लिए व्यक्ति में लोगों को सम्मोहित करने की सामर्थ्य होनी चाहिए । अपने हावभाव, आधे-अधूरे अध्यात्मज्ञान, धार्मिक कथाओं की रोचक प्रस्तुति, लोगों की रुच्यानुसार भजन-कीर्तन गायन-वादन में भागीदारी, आदि से उनका मन मोहने की कला आनी ही चाहिए । परचून की दुकान के लिए शिष्ट व्यवहार काफी होता है, लेकिन बाबागिरी के लिए अभिनय-क्षमता भी जरूरी है ।

(4) बाबागिरि के माध्यम से सुखभोग की इच्छा रखने वाले में धैर्य का होना आवश्यक है । कोई यह न समझे कि वह रातोंरात बहुत कुछ पा जाएगा । जिस प्रकार फैक्टरी स्थापित करते समय उससे लाभ की अपेक्षा नहीं की जा सकती है, केवल बाद में लाभ मिलने लगता है, वैसे ही बाबागिरी में भी होता है । आरंभ में स्वयं को लोगों के समक्ष ऐसे प्रस्तुत करना होता है कि व्यक्ति अलौकिक शक्ति का धनी है । अगर वह सफल हो गया तो एक-एककर निरीह जन उससे जुड़ने लगेंगे । उतावलापन हानिकर होता है ।

(5) जब लोग जुड़ने लगते हैं तो कोशिशें होती हैं कि राजनेता और उच्चाधिकारी भी बाबा के मायाजाल में फंसें, जो वक्त-बेवक्त बाबा का ही नहीं उसके ‘भक्तों’ का भी काम कर देेते हैं और उसका श्रेय बाबा को मिलता है । इससे अनुयायी ‘ब्रेन-वाश्ड’ हो जाते हैं और वे हर कष्ट से बाबा को उबारने में लग जाते हैं । ऐसे ही चेलों ने आसाराम को बचाने की कोशिश की होगी कानून को ताक पर रखकर !

(6) स्मरण रहे कि राजनेतागण वोट को लेकर बहुत चिंतित रहते हैं । अनुयायियों की तादाद बढ़ाकर बाबा भय या भ्रम पैदा कर सकता है कि राजनेता अनुयायिओं का वोटबैंक खो सकते हैं । तब वे उसके पक्ष में बोलने को विवश हो जाते हैं और उसे पाकसाफ घोषित करने लगते हैं ।

(7) समय बीतने के साथ बाबा को सभी सुखसाधन मिल जाते हैं, जब अनुयायी उसपर बहुत कुछ न्यौछावर करने लगते हैं । स्थापित हो चुकने पर भी बाबा को अति से बचना चाहिए । जब तक वह समझदारी और सावधानी से बाबागिरी का सुख भोगता है कोई गंभीर टिप्पणी नहीं करता ।

(8) यदि कोई बाबागिरी के रास्ते कामपिपासा भी शांत करने की इच्छा करे तो उसके सामने खतरा अवश्य रहता है । अन्यथा यह मुमकिन है कि ब्रेन-वाश्ड हो चुके ‘भक्तों’ की भीड़ में समर्पित व्यक्ति मिल जाएं जो स्वेच्छया सहयोग दें और स्वयं को उपकृत समझें न कि ठगा हुआ । लेकिन कभी-कभी धोखा भी हो सकता है, जैसा लगता है आसाराम के साथ इस बार हो गया । मनुष्य ऐसी चूक कर बैठता है ।

(9) बाबागिरी में लगे तथाकथित संत अपने अनुयायियों का चुनाव नहीं करता, बल्कि वह तो चाहता है कि अधिक से अधिक लोग उससे जुड़ें । उसकी ‘अलौकिक’ शक्तियों से आकर्षित होकर कोई भी ‘भक्त’ बन जाता है । बाबा की तथाकथित शक्ति से कुछ पाने की लालसा में आपराधिक मानसिकता वाले भी उसकी भीड़ में शामिल हो लेते हैं । ऐसे अनुयायी काफी काम के होते हैं, जब कभी बाबा पर बाहरी तत्व ‘हमला’ बोलें तो ये खुद उपद्रव पर उतर आते हैं । आसाराम के ‘भक्तों’ में ऐसे लोग भी शामिल हैं यह मीडियाकर्मियों के साथ अभद्र व्यवहार से स्पष्ट है । आसाराम के लिए धरना-प्रदर्शन करने वाले इसी प्रकार के लोग हैं ।

(10) समझदार बाबा उल्टासीधा काम करने से पहले अपनी ऐसी छवि बनाता है कि उसके ‘ब्रेन-वाश्ड’ अनुयायी उसमें देवता के दर्शन पाएं । (वैसे कुछ देवता खुद में खुराफाती रहे हैं जैसे इंद्र जिसके बारे में तमाम पौराणिक कथाएं हैं ।) तत्पश्चात् बाबा कुछ भी करे वह उन लोगों को निर्दोष ही दिखेगा ।

कौन सच्चा, आसाराम या वह नाबालिग?

अब मैं आसाराम पर लगे मौजूदा आरोपों के संदर्भ में कुछएक शब्द कहता हूं । यह तो तय है कि आसाराम एवं उस नाबालिक लड़की में कोई एक तो दोषी है ही । जो कहते हैं कि आसाराम निर्दोष हैं वे प्रकारांतर से यह स्वीकारते हैं कि वह लड़की झूठ बोल रही है । वे खुले शब्दों में भले ही कुछ न कहें, उनका मंतव्य तो यही निकलता है कि वह मक्कार, बदचलन, बिकाऊ और साजिश में शरीक लड़की है । असल बात क्या है यह तो आसाराम और वह ही जानते हैं । जांचकर्ता तो उपलब्ध साक्षों के आधार पर निष्कर्ष निकाल सकते हैं, वह भी तब जब साक्ष बचे भी हों और ईमानदारी से जांच हो, जिसकी उम्मीद मैं तो नहीं करता । इसलिए सही बात जानना आसान नहीं ।

फिर भी मैं लड़की पर 99% भरोसा करूंगा और आसाराम पर मात्र 1% । इसके कई कारण हैं जिनमें

प्रथम तो यही है कि मेरी बाबा लोगों के प्रति नकारात्मक धारणा रही है ।

दूसरा मैं मानता हूं कि हमारे समाज में लड़िकयां ऐसे मामले की शिकार होने के बावजूद रिपोर्ट करने से कतराती हैं; यहां तक कि वे मां-बाप से तक नहीं बोल पाती हैं ।

तीसरा झूठा आरोप लगाकर अपनी ही बेइज्जती कराने वाली लड़कियां समाज में कम ही मिलेंगी, और वह लड़की शायद ही ऐसी खुराफाती हो ।

चौथा झूठा आरोप लगाकर आसाराम जैसे रसूखदार आदमी से पंगा लेने की हिम्मत उसने अकारण जुटा ली हो इसे मैं असंभव-सा मानता हूं । आसाराम तो करोड़ों की फीस देकर वकीलों की फौज की मदद ले सकते हैं, उनके सामने उसकी क्या औकाद ?

पांचवां आसाराम का कहना कि उन्हें साजिशन फंसाया जा रहा है बेमानी है, क्यों ऐसा तर्क तो हर अपराधी देता है ।

छटा आसाराम खुद को संत-महात्मा कहलवाते हैं, लेकिन इस बीच उन्होंने अपने बचाव के लिए तरह-तरह हथकंडे अपनाए । पाकसाफ एवं संत जैसा आदमी पुलिस से क्यों घबड़ाएगा भला ?

सातवां मेरी जानकारी के अनुसार आसाराम का विगत जीवन संदिग्ध रहा है ।

अंत में मैं यह कहना चाहूंगा कि आसाराम दोषी भी हों तो भी लचर न्यायिक व्यवस्था के चलते वे इस जीवन में दंडित नहीं होंगे । – योगेन्द्र जोशी

विडंबना

मानव समाज की विडंबना है कि यहां सच बोलने वाले को कहना होता है, “मैं झूठ नहीं बोलता ।”, और यही वक्तव्य झूठ बोलने वाले के मुख से भी निकलता है। कौन सच्चा तथा कौन नहीं यह जानना अक्सर कठिन होता है, और कभी-कभी तो असंभव भी ।

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