लोकसभा चुनाव 2019 – एक अनूठे ध्रुवीकरण की राजनीति

यों तो मैंने 1957 एवं 1962 के चुनाव देखे हैं (क्रमशः करीब 10 एवं 15 साल की उम्र में), लेकिन लोकतंत्र तथा चुनावों की समझ मैंने 1967 के चुनाव और उसके बाद ही अर्जित की। 1977 के चुनावों तक मैं शायद एक पंजीकृत मतदाता भी बन चुका था। उस समय के चुनावों की परिस्थिति एवं घटनाक्रम मुझे कुछ हद तक याद हैं। उस चुनाव से इस वर्ष के लोकसभा चुनाव की तुलना और संबंधित टिप्पणी मैं अपनी याददास्त पर निर्भर करते हुए कर रहा हूं। वैसे विस्तृत एवं ठीक-ठीक जानकारी अंतरजाल पर मिल ही जाएगी।

इस बार के लोकसभा चुनाव इस अर्थ में दिलचस्प हैं कि इसमें अपने किस्म के एक अनोखे ध्रुवीकरण की राजनीति देखने को मिल रही है। ध्रुवीकरण न जाति के आधार पर है और न ही धर्म अथवा क्ष्रेत्र के आधार पर। यह ध्रुवीकरण है प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध।

जब से क्ष्रेत्रीय दलों का आविर्भाव देश में हुआ और अपने बल पर सरकार बना सकने की कांग्रेस पार्टी की हैसियत समाप्त हो गई, विविध प्रकार के गठजोड़ देखने को मिलने लगे। ध्रुवीकरण की बातें पहले भी होती रही हैं, खासकर मुस्लिम समुदाय को लेकर, लेकिन व्यापक स्तर का ध्रुवीकरण कभी पहले हुआ हो ऐसा मुझे याद नहीं आता एक मामले को छोड़कर। ध्रुवीकरण का वह मामला था 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरुद्ध। लेकिन तब के ध्रुवीकरण और इस बार के ध्रुवीकरण में उल्लेखनीय अंतर है। इस अंतर को समझने के लिए उस काल की राजनीतिक परिस्थिति पर एक नजर डालने की आवश्यकता होगी।

मेरे समान उम्रदराज लोगों को याद होगा कि 1960 के दशक के लगभग मध्य में जनसंख्या नियंत्रण की बात चली थी (कांग्रेस राज में)। लाल त्रिकोण (▼) और “हम दो हमारे दो” के विज्ञापन यत्रतत्र देखने को मिलते थे। योजना के परिणाम भी ठीक होंगे यह उम्मीद बनने लगी थी। लेकिन 1972 के चुनावों के बाद इस परिवार नियोजन कार्यक्रम का हस्र दुर्भाग्यपूर्ण रहा। कैसे? देखें –

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध एवं बांग्लादेश के “जन्म” के बाद कांग्रेस की स्थिति बहुत अच्छी रही। उसे 1972 के चुनावों में उल्लेखनीय सफलता मिली। किंतु देश का दुर्भाग्य कि उसी समय इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी एक गैर-संवैधानिक शक्ति के तौर पर उभरे। इंदिराजी की एक बड़ी भूल थी कि उन्होंने संजय को सरकारी तंत्र में हस्तक्षेप करने से रोका नहीं। संजय को विद्याचरण शुक्ल, नारायण दत्त तिवारी आदि जैसे नेता चाटुकार के रूप में मिल गये। संजय ने सरकारी कामकाज में दखलंदाजी शुरू कर दी। मैं मानता हूं कि संजय के इरादे बुरे नहीं थे किंतु वह अति-उत्साह एवं उतावली में थे देश को तेजी से आगे बढ़ाने में। इसके लिए विभिन्न विभागों को कठोर कदम उठाने के निर्देश दिए जाने लगे। परिवार नियोजन संजय गांधी का अहम मुद्दा था और उसे लेकर जोर-जबर्दस्ती तक होने लगी। अन्य अनेक कारण भी थे जिससे लोगों के मन में धीरे-धीरे आक्रोश पनपने लगा। उसी बीच छात्र आंदोलन भी चल पड़ा जिसकी अगुवाई जयप्रकाश नारायनजी ने की। तब इंदिराजी ने असंवैधानिक तरीके से आपात्काल घोषित कर दिया। लोगों की धर-पकड़ शुरू हुई। कुछ विरोधियों को जेल में डाला गया तो कुछ भूमिगत हो गए। 1977 में चुनाव होने थे। संजय चाहते थे कि आपात्काल को लंबा खींचा जाए, लेकिन इंदिरा जी ने चुनाव घोषित कर ही दिए (छःठी लोकसभा)।

ये उस काल का विस्तृत एवं सटीक विवरण नहीं है, किंतु इससे वस्तुस्थिति का मोटा-माटी अंदाजा लगाया जा सकता है। मैं तब लगभग 30 वर्ष का था।

उस समय जनता काफी हद तक इंदिराजी की विरुद्ध हो गई। प्रायः सभी राजनीतिक दल इंदिरा जी के विरुद्ध लामबंद हो गये। उन सभी ने मिलकर कांग्रेस के विरुद्ध “जनता पार्टी” के नाम से नया दल बना डाला और उम्मीद के अनुरूप चुनाव में उन्होंने कांग्रेस को करीब डेड़ सौ सीटों पर समेट दिया। (जनता दल 298 सीट, कांग्रेस 153 सीट)

दुर्भाग्य से अपने आंतरिक विरोधों के कारण “जनता” सरकार मुश्किल से दो-ढाई साल चली और 1979-80 में फिर चुनाव हुए (सातवीं लोकसभा) जिसमें इन्दिराजी 353 सीटों की “बंपर” जीत के साथ लौटीं।

इस बात पर ध्यान दें कि कांग्रेस/इंदिराजी के विरुद्ध बनी “जनता” पार्टी अधिक दिनों तक टिकी नहीं और अपने घटकों में बिखर गई। क्यों? क्योंकि इस पार्टी का गठन परस्पर बेमेल राजनैतिक विचाराधारा वाले घटक दलों ने भेदभाव मिटाकर किया था महज कांग्रेस को हटाने के लिए। उदाहरणार्थ उसमें बामपंथी दल भी थे और भाजपा (तब जनसंघ) जैसी दक्षिणपंथी भी। लेकिन आपसी विरोध जल्दी ही सतह पर आ गया और पार्टी घटकों में बंट गई।

आज 2019 के चुनावों में फिर से कुछ-कुछ वैसी ही राजनैतिक स्थिति देखने को मिल रही है। तब (1977 में) मुद्दा था “इंदिरा हटाओ“, और आज मुद्दा है “मोदी हटाओ”। लेकिन तब और अब में महत्वपूर्ण अंतर हैं –

∎ (1) 1977 में अधिकांश दल महागठबंधन के बदले एक पार्टी के तौर पर इंदिराजी के विरुद्ध खड़े हो गए। पार्टी बनाने का मतलब पूर्ववर्ती अस्तित्व भुला देना। इस बार क्षेत्रीय स्तर पर छोटे-बड़े गठवंधन बने हैं। महागठबंधन अभी नहीं बना है। बनेगा या नहीं; यदि बना तो उसका स्वरूप क्या होगा यह चुनाव-परिणाम पर निर्भर करेगा। गठबंधन का मतलब है स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखकर एक साथ शासन चलाने की मंशा।

∎ (2) उस दौर में इंदिराजी का विरोध नेताओं तक ही सीमित नहीं था। जनता भी आक्रोषित थी और जनांदोलन के रूप में उसका विरोध व्यक्त हुआ था। इस बार विरोध नेताओं तक ही सीमित है। जनता शान्त है और वह क्या सोचती है यह स्पष्ट नहीं। उनकी सोच चुनाव-परिणामों से ही पता चलेगा।

∎ (3) तब देश में आपात्काल वस्तुतः घोषित हुआ था, जिससे पीड़ित होकर जनता इंदिराजी के विरुद्ध हो गई थी। इस बार आपात्काल नहीं है भले ही विपक्षी अघोषित आपात्काल की बात करते हैं। जनता उनकी बात से सहमत है ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिखता।

∎ (4) 1970 के दशक के उस काल में राजनीति में इस कदर सिद्धांतहीनता नहीं थी। लेकिन आज के दौर में नेता रातोंरात एक विचारधारा त्यागकर एकदम विपरीत विचारधारा स्वीकारते हुए दलों के बीच कूद-फांद मचा रहे हैं।

∎ (5) वैचारिक मतभेद राजनीति में सदा से रहे हैं, किंतु राजनेताओं में एक दूसरे के प्रति सम्मान का अभाव उस दौर में नहीं था। उनकी भाषा काफी हद तक शिष्ट और संयत रहती थी। लेकिन मैं देख रहा हूं कि इस चुनाव में भाषायी मर्यादा जैसे लुप्त हो चुकी है। समाचार माध्यमों से ऐसी जानकारी मिल रही हैं और निर्वाचन आयोग की कुछएक के अमर्यादित व्यवहार के विरुद्ध कदम भी उठा चुका है।

∎ (6) मुझे जितना याद आता है जातीयता और धार्मिकता के आधार पर खुलकर वोट मांगने का चलन 1970 के दशक तक नहीं था। अब तो अनेक नेता अलग-अलग जातीय समुदायों के प्रतिनिधि के तौर पर खुलकर राजनीति कर रहे हैं।

1977 के इंदिरा-विरोध में हुए और इस बार 2019 के मोदी-विरोध में हो रहे ध्रुवीकरण में उक्त प्रकार के अंतर मेरे देखने में आ रहे हैं।

मुझे लगता है कि जब 1977 के गंभीर राजनीतिक परिदृश्य में चुनाव के बाद टिकाऊ सरकार नहीं बन सकी तो इस बार क्या उम्मीद की जा सकती है। अभी तो राष्ट्रीय स्तर पर ही महागठबंधन नहीं बन सका है| महत्वाकांक्षाओं के ग्रस्त क्षेत्रीय क्षत्रप क्या किसी एक का नेतृत्व स्वीकार कर पाएंगे? मोदी के विरुद्ध बहुमत हासिल हो जाए तो भी सरकार गठन की पेचदगी सुलझा पाएगा कोई?

मुझे अपने फल-विक्रेता की बात याद आती है। उसने बारचीत में कहा था, “सा’ब हम मोदी के बदले विपक्ष को वोट तो दे दें, लेकिन ये तो बताइए कि ये सरकार बना भी पाएंगे क्या?” – योगेन्द्र जोशी

11 जुलाई – विश्व जनसंख्या दिवस और इंडिया बनाम भारत

बधाई एवं शुभकामना

आज विश्व जनसंख्या दिवस (World Population Day) है । इस अवसर पर मैं अपने देशवासियों को बधाई और शुभकामना देना चाहता हूं ।

बधाई इस बात पर कि अपना ‘इंडिया दैट इज भारत’ शीघ्र ही सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा । अभी चीन की जनसंख्या सर्वाधिक है किंतु उसकी आबादी नियंत्रण में है । विशेषज्ञों के अनुसार वह अधिकतम करीब 140 करोड़ के आंकड़े को छुएगी । अभी वह 135 के आसपास है । अपने इंडिया दैट इज भारत की आबादी फिलहाल 120 करोड़ से ऊपर है । जिस रफ्तार से वह बढ़ रही है उसे देखते हुए उसे 140 करोड़ पहुंचने में 15 वर्ष से अधिक का समय नहीं लगना चाहिए । थोड़ा विलंब हो भी गया तो भी 20 साल के भीतर तो हम चीन से आगे बढ़ ही जाएंगे । तब हम सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन ही जाएंगे । हम अपने को किसी क्षेत्र में – चाहे जनसंख्या का ही क्षेत्र क्यों न हो – सर्वोंपरि सिद्ध कर लेंगे । क्या यह छोटी-मोटी उपलब्धि होगी ? इसी बात पर मेरी देशवासियों के प्रति बधाई !

साथ में मेरी शुभकामना भी । अपना देश इस बढ़ती जनसंख्या के बोझ को किसी प्रकार वहन कर सके ऐसी शुभेच्छाएं लोगों के प्रति हैं । ऊपर वाले से मेरी प्रार्थना है – अगर वह किसी की सुनता हो तो – कि दुनिया के सभी कुपोषित, भूखे, रुग्ण, अनपढ़ एवं बेरोजगार यहीं हों ऐसी मेहरबानी कृपया न करे । देश भगवान भरोसे है, आगे भी रहेगा, इसलिए उससे प्रार्थना करना निहायत जरूरी है ।

जनसंख्या दिवस – औचित्य?

वैसे ‘विश्व जनसंख्या दिवस’ मनाने का क्या औचित्य है यह मैं आज तक समझ नहीं सका । दीवाली हो तो पटाखे छुड़ाऊं, होली हो तो मित्रों के अबीर-गुलाल लगाऊं, ईद हो तो सेवई खाने-खिलाने की सोचूं, किसी महापुरुष का जन्मदिन हो तो भी जश्न मनाने की सोचूं, आदि-आदि । लेकिन इस दिन को कैसे मनाऊं ?

आप कहेंगे कि जनसंख्या वृद्धि को लेकर कुछ करिए । क्या करूं ? क्या कर सकता हूं मैं ? अपने हाथ में है क्या ? आप कहेंगे लोगों को समझाएं । साल में एक दिन ऐसा करना क्या माने रखता है ? साल के एक दिन क्या किसी शराबी को शराब न पीने की, किसी तंबाकूबाज को सिगरेट न पीने की, सलाह दे दें तो क्या वह मान जाएगा ? बार-बार याद दिलाने पर भी कुछ काम बनेगा इसकी भी आशा मैं नहीं कर पाता । किसी को सलाह देने पर वह कह सकता कि आप परेशान न हों; मेरे परिवार का पेट आपको नहीं भरना पड़ेगा । वह यह भी कह सकता है कि परिवार की वृद्धि तो ऊपर वाले की मरजी से है, मैं भला क्या करूं । वह ऐसे ही तमाम तर्क दे सकता है । मेरे पास समझाने को कुछ नहीं । जिसे ‘सन्मति’ होगी उसे समझाने की जरूरत नहीं, और जिसे नहीं है, उसके मामले में ‘भैंस के आगे बीन बजे, भैंस खड़ी पगुराय’ वाली कहावत लागू होती है ।

यों भी अपने देश में इस दिवस की कोई अहमियत नहीं । हमारे सरकारों, राजनैतिक दलों, प्रशासनिक अधिकारियों एवं बुद्धिजीवियों ने इस मुद्दे को दशकों पहले तिलांजलि दे दी थी । मुझे पिछली सदी के साठ-सत्तर के दशकों की याद है, जब मैं युवावस्था में प्रवेश कर चुका था और परिवार नियोजन के अर्थ समझने लगा था । वे दिन थे जब ‘हम दो हमारे दो’ जैसे नारे जहां-तहां दिखाई-सुनाई पड़ते थे । सड़क किनारे होर्डिंगों, बसों, पत्र-पत्रिकाओं के पृष्ठों आदि पर ‘उल्टा लाल तिकोन’ के निशान दिखते थे । नियोजित परिवार के पक्ष में विज्ञापनों एवं अन्य साधनों का सहारा लिया जाता था ।

पटरी से उतरा परिवार नियोजन कार्यक्रम

तब परिवार नियोजन की गाड़ी चल तो रही थी । इसे देश का दुर्भाग्य कहें कि सौभाग्य यह तो आप जानें कि गाड़ी पटरी से उतरी तो उतरी ही रह गई । ठप हो गयी तो हो गयी । सत्तर के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिराजी के कनिष्ठ पुत्र, स्व. संजय गांधी, के मन में यह जोशीला विचार उठा कि जनसंख्या पर जबर्दस्त तरीकों से नियंत्रण किया जाना चाहिए । उनके बारे में लोगों में यह धारणा व्याप्त थी कि सत्ता पर उनका जोरदार प्रभाव था, और उनके कार्यक्रम के विरोध का साहस सत्तापक्ष में किसी को नहीं था । वे सत्ता में न होते हुए भी सत्ता की हैसियत रखते थे । उनके जोश का परिणाम था कि गाड़ी ने तेज रफ्तार पकड़ी और पटरी से ऐसी उतरी कि फिर पटरी पर चढ़ नहीं सकी । उसके बाद आपात्काल घोषित हुआ, सत्ता परिवर्तन हुआ, कालांतर में श्री संजय गांधी भी इहलोक से विदा हो गये, इत्यादि ।

उस काल की घटनाओं का परिणाम यह रहा कि सभी राजनैतिक दलों ने कसम खा ली कि अब जनसंख्या नियंत्रण की बात सपने में भी नहीं की जानी चाहिए । चूंकि जनसंख्या वृद्धि के बाबत चिंता सारी दुनिया में व्यक्त की जा रही है, अतः इस देश को भी उस कोलाहल में चीखना ही है । लेकिन यह चीखना सतही एवं दिखावे का है, गंभीरता कहीं नहीं है ।

मामला इंडिया बनाम भारत

और असल सवाल तो यह है कि आबादी बढ़ किसकी रही है ? ‘इंडिया’ की कि ‘भारत’ की ? याद रहे यह देश दो खंडों में बंटा है, इंडिया एवं भारत । इंडिया की पॉप्युलेशन नहीं बढ़ रही है । वहां टू-चाइल्ड, वन-चाइल्ड अथवा नो-चाइल्ड नॉर्म प्रैक्टिस में आ चुका है । वहां कि समस्याएं वही नहीं हैं जो भारत की है । वह तो वाकई शाइन कर रहा है । जनसंख्या वृद्धि तो भारत की समस्या है, जहां एक-एक परिवार में छः-छः, सात-सात बच्चे पैदा हो रहे हैं, जिनकी परवरिश बेढंगी है, जो कुपोषित हैं, जिनका इलाज छोलाछाप डाक्टर करते हैं, जिनकी स्कूली व्यवस्था में अक्षरज्ञान तक दुर्लभ है । और क्या-क्या बताऊं ?

भारत की जनसंख्या बढ़ जाए तो इंडिया को क्या फर्क पड़ता है ? देश की व्यवस्था तो इंडिया के हाथ में है । इंडिया घाटे में न रहे इसके लिए हर क्षेत्र में दोहरी व्यवस्था अपनाई गयी है अघोषित रूप में । आबादी बढ़ जाए तो उसको थोड़ी परेशानी तो होगी, लेकिन उसे सह लिया जाएगा । असली परेशानी तो भारत को होगी । उसी को तो संसाधनों के अभाव का दंश झेलना होगा । इंडिया उसके लिए क्यों परेशान होवे ?

इसलिए जनसंख्या की बात बेमानी है !

युवा शक्ति – पूंजी?

विश्व के तमाम देशों में आबादी बुढ़ा रही है; यानी उनके यहां आबादी का बृहत्तर हिस्सा प्रौढ़ों-बुजुर्गों का है । इसके विपरीत इंडिया दैट इज भारत में 70 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम उम्र के युवाओं की है ऐसा दावा किया जाता है । कुछ लोगों का मत है ये युवा तो अपने देश की पूंजी हैं । किन युवाओं की बात करते हैं आप ? सड़क पर कूड़ा बीनते हुए, ढाबे पर चायपानी के बर्तन साफ करते हुए, चौराहे पर फल-सब्जी बेचते हुए अथवा ईंटा-गारा ढोते हुए सार्थक स्कूली शिक्षा से वंचित जो बच्चे युवावस्था में पहुंच रहे हों उनको आप पूंजी कहते हैं ? हो सकता है, मेरी समझ निहायत घटिया हो । – योगेन्द्र जोशी