शौचालय पहले या देवालय? बात-बात पर धर्म/संस्कृति के नाम पर आाहत होना

          अभी चंद रोज पहले भारत के भावी प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेन्द्र मोदी ने एक बयान देकर हिन्दुओं को धार्मिक रूप से “आहत” कर दियाइससे पहले कांग्रेसी नेता एवं मंत्री जयराम रमेश ने भी ऐसा ही बयान दिया था । बहुत से लोग तब भी नाखुश हुए थे । लेकिन इस बार मामला कुछ लोगों को अधिक गंभीर लगा, क्योंकि मोदी कथित तौर पर कट्टर हिन्दूवादी नेता की छवि रखते हैं, अतः उनसे ऐसे बयान की उम्मीद नहीं थी । लोग भूल जाते हैं कि तरह-तरह के कभी शिष्ट तो कभी अशिष्ट बयान तो राजनेता देते ही रहते हैं । उनकी जबान पर इस स्वतंत्र “इंडिया दैट इज भारत” राष्ट्र में कोई रोक नहीं है । दरअसल कुछ और चीजें देश की जनता को मिले या न जो मुख में जो आया उसे बक देने की स्वतंत्रता तो सबको मिली ही है । क्यों न कोई इसका फायदा उठाए ? आम आदमी – मेरा मतलब “आप” पार्टी के सदस्य से नहीं है – कुछ कहे तो मीडिया उसे जनजन तक नहीं पहुंचाएगा, परंतु मोदी सरीखा व्यक्ति कुछ कहे और उसकी चर्चा न हो यह असंभव ही है ।

मोदी का बयान ठीक था या अनुचित यह कह पाना कठिन है, क्योंकि हम सब इन चीजों को अपने-अपने नजरिये से देखते हैं और “मेरे विचार ही सही हैं” का भाव रखते हैं । व्यक्तिगत तौर पर मुझे आपत्ति की कोई बात नहीं लगती, जिसके कारण हैं । लेकिन मोदी के कथित धुरविरोधी तोगड़िया बेहद नाखुश हैं । देखें बीबीसी समाचार

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131005_indiabol_ss.shtml

खबर है कि इस सिलसिले में “मानवाधिकार पार्टी” के प्रवक्ता चंद्रशेखर सिंह ने अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम, वाराणसी, की अदालत में याचिका दाखिल कर रखी है, जिसकी सुनवाई 21 अक्टूबर को होगी।

(देखें http://khabar.ibnlive.in.com/news/109403/12)

मेरी समझ में नहीं आता कि अपने देशवासी (हिंदू हों या मुस्लिम, सिख, इसाई, आदि) बात-बात पर “हमारी धार्मिक भावना आहत हुई है” का हल्ला मचाना क्यों शुरू कर देते हैं । अदालतें भी ऐसे वाद को बहस के लिए कैसे स्वीकार लेती हैं, यह जानते हुए कि अंततः कुछ निकलना नहीं है, सिवाय न्यायाधीश के समय की बरवादी के ? इतना ही नहीं मोदी के कथन के संदर्भ में कैसे कोई दावा कर सकता है कि सभी हिंदू आहत हुए हैं ? मैं भी एक हिंदू हूं और मैं मोदी का समर्थक न होते हुए भी उसके उक्त वक्तव्य का समर्थन करता हूं । दरअसल जिन दो-चार लोगों से मैंने पूछा किसी ने भी असहमति नहीं व्यक्त की । सवाल उठता है कि जो व्यक्ति आपत्ति करता है वह कैसे पूरे हिंदू समुदाय (या किसी अन्य धार्मिक समुदाय) की भावनाओं का ठेका ले लेता है ?

हिंदू समाज की विशेषता यह है कि हम जहां-तहां मंदिर खड़ा करने में बहुत दिलचस्पी लेते हैं । जो देवालय पहले से ही अस्तित्व में हैं क्या वे पर्याप्त नहीं हैं ? उससे भी अधिक अहम सवाल यह है कि हम देवी-देवताओं को देवालयों में ही क्यों खोजते हैं ? जिन के घरों में पूजाघर हैं वे भी अपने घर में स्थापित देवी-देवताओं को देवालयों में क्यों खोजते हैं ? मुझे तो यह भी समझ में नहीं आता कि लोग उसी देवता की महत्ता को अलग-अलग देवालयों में स्थापित होने पर अलग-अलग प्रकार से आंकते हैं ? लोगों को अक्सर कहते हुए सुनता हूं कि इस मंदिर के हनुमानजी यह मनोकामना पूरी करते हैं और उस मंदिर के हनुमानजी उस मनोकामना को, गोया कि हनुमानजी भी कई हों और वे अलग-अलग प्रकार से पेश आते हों । कहने का मतलब यह है कि देवी-देवतोओं की पूजा-अर्चना तो घर में भी उसी श्रद्धा से की जा सकती है जो देवालयों में संभव है । पुरातन मंदिरों का महत्व कुछ हद तक समझ में आता है, क्योंकि वे प्रायः पौराणिक कथाओं से संबद्ध होते हैं, जैसे शक्तिपीठों के देवी मंदिर अथवा द्वादश ज्योतिर्लिंग, आदि । लेकिन जो नित नये मंदिर स्थापित होते हैं उनके साथ तो ऐसी बात भी नहीं रहती ।

कहने का मतलब यह है कि देवालयों की वैसी आवश्यकता वस्तुतः नहीं है जैसी जनसुविधाओं एवं सामुदायिक संस्थाओं की यथा अस्पताल, स्कूल-कालेज एवं शौचालय । इनके संदर्भ में अपने देश की स्थिति अच्छी नहीं कही जा सकती है । कहा जाता है कि शौचालयों के मामले में तो अपना देश कुछ अविकसित देशों से भी पीछे है । और तब कोई यदि शौचालयों की वकालत करे तो क्या गलत करता है ? हाल के वर्षों में कितने देवालय बने हैं मैं कह नहीं सकता, किंतु बनते जरूर हैं और आगे भी बनेंगे यह सत्य है । आप दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर देख लीजिए, कितना पुराना है ? कितना विशाल और भव्य है यह ? जितना खर्च इसे बनाने में लगा होगा उसमें न जाने कितनी जनसुविधाओं की व्यवस्था देश के कोने-कोने में संभव हो सकती थी । यह सही है कि यह स्वयं में पर्यटक-आकर्षण बन सकता है, किंतु यह जनसामान्य की आवश्यकता की पूर्ति नहीं करता । और इसे फिलहाल तो धार्मिक आस्था वालों के लिए तीर्थस्थल के रूप में भी नहीं देखा जा सकता है ।

यों तो उपसना स्थल अन्य धार्मिक समुदायों के भी बनते हैं, लेकिन वे जहां-जहां, जब-तब नहीं बनते रहते हैं । वे योजनावद्ध तरीके से, पर्याप्त आकार के, और स्थानीय सामुदायिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए बनते हैं । लेकिन हिंदू मंदिर कब-कहां रातोरात खड़े कर दिये जाएंगे कहना मुश्किल है । कम से कम मैं अपने शहर बनारस में यही देखता आ रहा हूं । मैंने तो यह भी महसूस किया है कि कभी-कभी इन मंदिरों की आड़ में अतिक्रमण करने में भी किसी की आस्था आहत नहीं होती है । सड़क के किनारे या खाली पड़ी जमीन पर रातोंरात एक मूर्ति रख दो, उस पर पुष्पादि चढ़ाना आंरभ कर दो, तो राह चलते अन्य जन भी फूलपत्र चढ़ाना शुरू कर देंगे । फिर उसे थोड़ा बढ़ा दो और उसके बगल में छोटा-मोटा कारोबार करना आरंभ कर दो, मंदिर को बीच-बीच में बढ़ाने का काम करो और साथ में अपना करोबार भी । इस प्रकार अतिक्रमण सफल हो जाता है । कुछ ऐसा घटित होते मैंने देखा है । इस बात को मैं एक उदाहरण से स्पष्ट करता हूं:

हाल में अपने शहर वाराणसी में प्रशासन ने अतिक्रमण हटाकर सड़कों को चौढ़ी करने का सफल अभियान छेड़ा है । दिखावटी अभियान तो कई बार पहले भी छेड़े गए, किंतु वे कभी प्रभावी नहीं रहे । इस बार वाकई गंभीरता दिखी । उसी के परिणामस्वरूप यहां के करीब 500 मीटर के लंका-नरिया सड़क का नजारा ही बदल गया । पहले जो सड़क करीब 20-22 फुट चौड़ी थी अब करीब 35-40 फुट चौढ़ी हो गई है । मुझे इस शहर में रहते 40 वर्ष से अधिक हो चुके हैं । मैं उक्त सड़क के बारे में यही सोचता था कि शहर पुराने ढर्रे का है, इसलिए यहां के हिसाब से ये सड़क बनी ही ऐसी होगी । सोचा न था कि सड़क के किनारे के मकान-दुकान तो अतिक्रमण की देन हैं । अब जाना कि सड़क के एक सिरे से दूसरे तक लगभग 15 फुट चौढ़ी पट्टी अतिक्रमित थी । असली दिलचस्प पहलू तो यह है कि चौड़ीकरण के बाद अतिक्रमित भूमि पर बने 3-4 मंदिर भी खुले में – असल में अब नये बने डिवाइडर पर या उसके निकट – नजर आने लगे । मैं एक तस्वीर प्रस्तुत कर रहा हूं ।

Mid-Road Temple-1

तस्वीर में दिखाए मंदिरनुमा ढांचे की सीध में पहले मिठाई की दुकान थी जो अब करीब 15 फुट पीछे चली गयी है । अब लगता है इस ढांचे में रखे शिवलिंग की कद्र भी करने वाला कोई नहीं । ये सभी कोई प्राचीन मंदिर नहीं हैं, बल्कि आस्था के नाम पर बनाये गये अवैधानिक ढांचे हैं । हमारी आस्था हमें अतिक्रमण से नहीं रोकती । आस्था के नाम पर प्रशासन भी इन्हें हटाने की हिम्मत नहीं करता ।

लोग चाहते हैं कि उनकी भावनाओं को अन्य जन ठेस न पहुचाएं । परंतु वे स्वयं दूसरों की भावनाओं की कद्र करना क्यों भूल जाते हैं ? वे क्यों इसे अपना अधिकार समझते हैं कि आस्था के नाम पर उन्हें हर चीज की छूट हो, भले ही उससे दूसरों को घोर असुविधा हो । मेरे शहर वाराणसी में धर्मकर्म के नाम पर आए दिन कुछ न कुछ आयोजन होते रहते हैं जिससे सड़कों पर जाम लगता है । कई मौकों पर सड़क घेरकर पूजा-पंडाल तन जाते हैं, दूसरों की परवाह किए बिना । सर्वाधिक आपत्तिजनक तो यह होता है कि लाउडस्पीकरों से शोर मचाया जाता है । मेरे घर के पास ही एक मंदिर है और उसी के सामने सड़क पार एक अस्पताल है । आये दिन मंदिर में कोई न कोई आयोजन होता है और उसके साथ लाउडस्पीकरों से कानफाड़ू शोर । सोचिए कि अस्पताल के मरीजों का क्या हाल होता होगा जहां शोर मचाना मनाही रहती है ।

आपत्तियां अनेकों हैं । हम श्रीगंगा नदी के प्रदूषण की चर्चा करते हैं और उसके नाम पर करोड़ों रुपये बरबाद भी कर चुके हैं, लेकिन उसमें गंदगी गिराने से नहीं हिचकते हैं । उसमें अधजले शव तक बहा देते हैं । नवरात्र की दुर्गा-प्रतिमाएं विसर्जित तो की ही जाती हैं, अब शहर वाराणसी में कालीपूजा, सरस्वतीपूजा, गणेशपूजा, विश्वकर्मापूजा आदि अनेकों पूजाओं के नाम पर स्थापित प्रतिमाएं भी श्रीगंगा को समर्पित की जाती हैं । और यह सब होता है आस्था के नाम पर ।

आस्था के इन तमाम खेलों पर कोई आपत्ति उठाता है, या उस पर टिप्पणी करता है तो लोग आक्रोषित हो उठते हैं । देवालयों की आवश्यकता नहीं है, हमें आवश्यकता है शौचालयों की ऐसा कहने पर तुरंत भावनाओं को ठेस पहुंचाई जा रही है का राग अलापना शुरू हो जाता है । लोगों को विवेकशील होकर विचार करना चाहिए कि हमारे जीवन की प्राथमिकताओं में क्या पहले शामिल होना चाहिए और क्या बाद में । – योगेन्द्र जोशी 

‘विहिप’ का ‘फरमान’: प्रत्येक परिवार चार बच्चे

विगत इक्कीस अक्टूबर के दैनिक वार्तापत्र ‘हिन्दुस्तान’ के मुखपृष्ठ पर एक समाचार देखने को मिला, शीर्षक थाः ‘विश्व हिन्दू परिषद का फतवा – दो अपने लिए, दो राष्ट्र के लिए’ । मुद्रित समाचार के अनुसार ‘धार्मिक संगठन विहिप’ ने एक नई मुहिम छेड़ने की योजना बना ली है, जिसके अनुसार वह हिन्दुओं को परिवार नियोजन न अपनाने की सलाह देगी, ताकि देश में अन्य धर्मावलंबियों (वस्तुतः मुस्लिमों) की लगातार बढ़ रही जनसंख्या उनसे आगे न बढ़ जाये और वे कालांतर में ‘अल्पसंख्यक’ न बन जायें । इस संदर्भ में वह कथित तौर पर यह नारा देगीः ‘प्रत्येक परिवार चार बच्चे – दो राष्ट्र के लिए, दो परिवार के लिए ।’ इसके साथ ही वह तरह-तरह की योजनाओं पर काम कर रही है, जिससे उसका संदेश जनसमुदाय तक पहुंचे और जिनके माध्यम से वह लोगों को अपने पक्ष में लाने में सफल हो सके । इन सभी बातों का संक्षेप उस समाचार में दिया गया है ।

विहिप का फ़रमान

समाचार: विहिप का फ़रमान

मैं दावा नहीं कर सकता कि वह समाचार एकदम पुख्ता है, पर यही मानकर चल रहा हूं कि एक प्रतिष्ठित समाचारपत्र में छपे होने के कारण वह सर्वथा मिथ्या नहीं होगा, भले ही ब्यौरा बढ़चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया हो । मैंने सोचा कि विहिप की वेबसाइट (http://www.vhp.org/) पर अधिक जानकारी मिल सकेगी, किंतु निराश होना पड़ा क्योंकि वेबसाइट पर पहुंच (एक्सेस) की अनुमति नहीं है या फिर वह गलत स्थान पर पहुंचा देती है । । कदाचित् वह पंजीकृत सदस्यों के लिए ही उपलब्ध है । माइक्रोसाफ्ट द्वारा नियंत्रित संबंधित एक ‘ग्रूप’ मुझे दिखा, परंतु उस पर केवल विहिप के सांविधानिक उद्येश्य ही मिल सके । बताता चलूं कि वहां उल्लिखित बातें प्रभावी तथा आदर्श थीं । हकीकत में वे खुद विहिप के लिए अब कितनी मान्य हैं इस पर मुझे शंका अवश्य है, क्योंकि प्रायः सभी संगठन आदर्श धारणाओं के साथ जन्म लेते हैं और समय के साथ विकारग्रस्त होकर रास्ता भटक जाते हैं । अस्तु ।

मैं आगे कुछ कहूं इससे पहले यह स्पष्ट कर दूं कि मेरी किसी भी धार्मिक संगठन के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है । चूंकि यह देश स्वतंत्र है, हमें अपनी बातें कहने की छूट है, अपनी धार्मिक आस्थाओं के अनुसार चलने और उनको प्रसारित-प्रचारित करने का हमें अधिकार है, अतः अधिक कुछ उनके प्रतिपक्ष में कहना निरर्थक है ।

ऊपरी तौर पर देखा जाये तो विहिप, एवं व्यापक स्तर पर हिन्दू संगठनों, की चिंता जायज है । अभी तक यह देश हिन्दूबहुल देश रहा है । अघोषित तौर पर ही सही, यह एक प्रकार से हिन्दू राष्ट्र है इस आश्वस्तिभाव के साथ हिन्दू समाज जीता आ रहा है । कम से कम मैं ऐसा महसूस करता हूं । मेरी यह बात कइयों को नागवार लगेगी यह भी मैं जानता हूं । अब यदि वे हिन्दू कभी किसी भी कारण से अल्पसंख्यक हो चलें तो उनके लिए यह अवश्य असह्य, पीड़ादायक और भविष्य के प्रति निराशाप्रद अनुभव सिद्ध होगा । परंतु क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है, और यदि हां, तो क्या उसका समाधान जनसंख्या-वृद्धि में ही है जैसे सवाल अवश्य उठाये जा सकते हैं ।

मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूं कि जो नारा कथित तौर पर विहिप देने जा रही है उसे आज का मध्यम तथा उच्च वर्ग कुछ भी महत्त्व नहीं देने जा रहे हैं, भले ही वे सिद्धांततः विहिप के पक्षधर हों । मेरा आकलन है कि भौतिक संपन्नता की सीढ़ियां चढ़ते और आधुनिकता का आवरण ओढ़ते हुये ये वर्ग समाज एवं देश के लिए उतना समर्पित नहीं हैं जितना लोग दावा करते होंगे । ये वर्ग अपने हितों को सर्वोपरि रखते हुए ही देश के लिए कुछ करते हैं । ये अपने हितों का त्याग करने नहीं जा रहे हैं । आज स्थिति यह है इन वर्गों का प्रायः हर व्यक्ति स्वयं को अपने व्यावसायिक क्षेत्र में स्थापित करने और सुसंपन्न जीवन जीने की ललक के साथ आगे बढ़ रहा है । वे दिन अब बीत चुके हैं जब वे बच्चों की चाहत में कुछ भी खोने को तैयार हो जाते थे । लेकिन वे आज ‘हम दो हमारे दो के हिमायती भी नहीं रह गये हैं । अब तो वे अपने पेशे की सफलता के लिए और अधिकाधिक अर्थोपार्जन के लिए वच्चों तक का त्याग करने को तैयार हैं । अतः आप देख रहे होंगे कि आज उन नौजवान-नवयुवतियों की संख्या बढ़ रही है जिनके मात्र एक बच्चा है । उनका तर्क सीधा-सा है कि भले ही एक बच्चा हो, पर उसकी परवरिश और शिक्षा उच्चतम स्तर की होनी चाहिए । इतना ही नहीं, अब तो कुछ नवदम्पती एक भी बच्चा नहीं की बात सोचने लगे हैं । क्या विहिप का लक्ष इन वर्गों के लोग हैं ? कम से कम ये लोग विहिप के कहने पर ऐसा त्याग नहीं करने जा रहे हैं ।

तब किसको लक्ष करने जा रही है विहिप ? जाहिर है कि समाज के पिछड़े, अशिक्षित, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पर ही विहिप का प्रभाव पड़ सकता है । यही वे लोग हैं जो धर्म के नाम पर सरलता से बहकाये जा सकते हैं । यदि आप ध्यान से देखें तो पायेंगे कि सभी धर्मावलंबियों के निशाने पर इसी तबके के लोग होते हैं । चाहे इसाई धर्मप्रचारक हों या बौद्ध धर्मगुरु सभी इस तबके को अपने प्रभाव में लाने में जुटे हैं । और धर्म के नाम पर उनसे अधिकाधिक संतान पैदा करने के लिए कहेंगे तो वह ऐसा कर सकते हैं । वस्तुतः इस वर्ग में आज भी आधा-आधा दर्जन बच्चे पैदा हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे चाहे, वे हिंदू हों या मुस्लिम या कोई और । यह एक निर्विवाद तथ्य है कि समाज के संपन्न समुदायों में जनसंख्या वृद्धि की समस्या नहीं है । अपने देश में सर्वाधिक संपन्न पारसी समुदाय के लोग हैं और उनकी जनसंख्या नहीं वढ़ रही है यह उनके लिए खासी चिंता की बात बनी हुयी है । जिस भी तबके में शिक्षा-संपन्नता है वहां जनसंख्या नहीं वढ़ रही है । तो क्या विहिप का लक्ष्य समाज के सबसे निचला वर्ग है ?

इस समय इतना ही । अभी बहुत कुछ और है कहने को । बहस जारी रहेगी । – योगेन्द्र