पुनर्जन्म हिटलर का – चीन में पुरुषों के आनुवंशिक कूट-संकलन

शी जिनपिंग बनाम अडॉल्फ हिटलर

हिटलर कुख्यात शासक माना जाता है। शासकीय व्यवस्था में जहां कहीं ऐसा व्यक्ति दिखता है जो अपनी जिद में किसी भी हद तक जाने को तैयार हो, अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने की सोचता हो, उसे हिटलर की संज्ञा दे दी जाती है। हिटलर यहूदियों पर अत्याचार के लिए जाना जाता है; उन्हें गैस-चैंबर में ठूंसकर मारा गया यह इलजाम हिटलर पर लगाया जाता है। हिटलर दुनिया पर राज करना चाहता था और जर्मन “श्रेष्ठता” स्थापित करना चाहता था। लेकिन उसका अंत जर्मनी की बरबादी एवं विभाजन के साथ हुआ।

हिटलर की मृत्यु विश्वयुद्ध की समाप्ति के समय १९४५ में हुई। तब से बहुत कुछ बदल चुका है। उस काल में डिजिटल तकनीकी जैसी कोई चीज नहीं थी। आज यह तकनीकी पर्याप्त विकसित है और राष्ट्रों की व्यवस्था काफी हद तक इसी तकनीकी पर निर्भर है। शांति स्थापित करना हो या युद्ध लड़ना हो निर्भरता इसी तकनीकी पर आ ठहरती है। इसलिए आज जिसे हिटलर कहा जाना हो उसके तौर-तरीके बीते जमाने के हिटलर से भिन्न होंगे ही। लेकिन ऐसे व्यक्ति की सोच तथा इरादे भिन्न नहीं होंगे। अपने इन विचारों के परिप्रेक्ष में मुझे चीन की साम्यवादी (कम्यूनिस्ट) पार्टी के महासचिव एवं देश के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) में मुझे हिटलर की छवि दिखाई देती है।

आठ-दस रोज पहले मुझे न्यूयॉर्क-टाइम्ज़ (New York Times)  की वेबसाइट पर एक लेख (अंग्रेजी में) पढ़ने को मिला। शीर्षक था

“China Is Collecting DNA From Tens Of Millions of Men And Boys, Using U.S. Equipment”

लेख की लेखिका हैं चीनी मूल की सुइ-ली वी (Sui-Lee Wee) जो बेजिंग में न्यू-यॉर्क टाइम्ज़ की संवाददाता हैं। उक्त लेख का आरंभिक अनुच्छेद/वाक्य ये हैः

“The police in China are collecting blood samples from men and boys from across the country to build a genetic map of its roughly 700 million males, giving the authorities a powerful new tool for their emerging high-tech surveillance state.”

जिसका हिंदी अनुवाद कुछ यों होगाः

“करीब 70 करोड़ पुरुषों के आनुवंशिक कूट तैयार करने के लिए चीन की पुलिस देश के कोने-कोने से आदमियों एवं बालकों से खून के नमूने इकट्ठा कर रही है जिससे उच्च तकनीक की निगरानी/चौकसी की उभरती प्रणाली अधिकारियों को मिल सके।”

क्या मकसद है इस पूरी कवायद का? मैं यही समझता हूं कि जीवन-पर्यन्त चीन के राष्ट्रपति बन चुके शी जिनपिंग हर प्रकार का विरोध कुचल सकें और स्वयं को दुनिया का सबसे ताकतबर नेता बन सकें। उनके अरमान अमेरिका के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र होने का “पद” छीन सकें। मकसद कमोबेश वही है जो हिटलर के थे। शी जिनपिंग हिटलर के आधुनिक अवतार हैं। 

इस लेख के कुछएक बिंदुओं को मैं पाठकों के सामने रख रहा हूं। जो किया जा रहा है और जो उसके संभावित उपयोग/दुरुपयोग होंगे उसका आकलन वे स्वयं कर सकते हैं।

लेख में ऑस्ट्रेलियन स्ट्रीटिजिक पॉलिसी इंस्टिट्यूट (Australian Strategic Policy Institute) का जिक्र करते हुए कहा गया है कि चीन में 2017 से ही नमूने संकलित करने का कार्य चल रहा है। इससे निर्मित आंकड़ाकोष (database) से किसी व्यक्ति के खून, लार एवं अन्य शारीरिक तत्वों के अध्ययन द्वारा उसके रिश्तेदारों का पता लग जायेगा।

इस कार्य में अमेरिका की थर्मो-फिशर कंपनी परीक्षण-किट मुहैया करा रही है।

इस परियोजना (प्रॉजेक्ट) का उद्येश्य चीन की आधुनिकतम तकनीकी के प्रयोग से  लोगों, विशेषतः लक्षित प्रजाति समुदायों (ethnic communities), को नियंत्रण में रखने की विधियों को विस्तार देना है। उन्नत कैमरों, मुखाकृति पहचान, और कृतिम बुद्धि (AI) का इस्तेमाल पुलिस बल पहले से ही कर रहा है।

पुलिस का कहना है उन्हें ऐसे आंकड़ाकोष की आवश्यकता है। इसकी मदद से अपराधियों को पकड़ना आसान होगा। कुछ अधिकारी एवं देश के बाहर के मानवाधिकार समूह चिंता व्यक्त करते हैं कि निजता में हस्तक्षेप और असहमतों (असंतुष्टों, dissidents) के संबंधियों को परेशान करने में इसका दुरुपयोग होगा। ये नमूने व्यक्ति की सहमति के साथ नहीं लिए जा रहे हैं। अधिकारवादी शासन में किसी का असहमत होना माने नहीं रखता। वैसे अधिकांश लोग विरोध में है।

“ह्यूमन राइट्स वॉच” की माया वांग (Maya Wang) के अनुसार किसी सक्रिय जन से कौन अतिनिकटता से संबंधित है यह पता लगाने का विचार ही सिहरन पैदा करता है।

यह कार्यक्रम स्कूलों में भी चल रहा है। जो कोई खून का नमूना नहीं देगा उसके परिवार को “काली सूची” (black household) दर्ज होगा और उसे शासन-प्रदत्त लाभों से वंचित होना पड़ेगा।

नजर रखना चीनी पुरुषों पर

मान्यता है पुरुषों में अपराधी अधिक होते हैं। लेख में एक उदाहरण दिया है कि किस प्रकार जीन-तकनीकी के प्रयोग से चीनी मंगोलिया के 11 किशोरियोँ-युवतियों के हत्यारे को 2016 में पकड़ा गया। हत्यारे का DNA नमूना तो मिला लेकिन उसकी पहचान नहीं हो पाई। 2016 घूस के मामले में एक व्यक्ति पकड़ा गया जिसका DNA नमूना उस अपराधी के सन्निकट था। इस DNA परीक्षण से उस अपराधी तक पहुंचना संभव हुआ जो इस व्यक्ति से संबंधित निकला।

चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा आनुवंशिक आंकड़ा भंडार है। संदिग्ध अपराधियों के आंकड़े इकट्ठे किए जाते रहे हैं ताकि वे कहीं अस्थिरता न फैलाएं। पुलिस ने उईगर (वीगुर, Uyghurs) मुस्लिम समुदाय तथा तिब्बतियों के आंकड़ों को खास तौर पर एकत्रित किया है ताकि उन पर साम्यवादियों (communists) का नियंत्रण बना रहे। हाल में पुरुषॉ के आनुवंशिक नमूने लेने में तत्परता बढ़ गयी है। आबादी के 5 से 10 प्रतिशत पुरुषों के नमूने इकट्ठा करने का लक्ष है। इनकी मदद से अन्य पुरुषों (संबंधीजनों) के DNA चरित्र की जानकारी मिल जाएगी। पुलिस ने डॉंग्लान एवं गुआंक्शी क्षेत्र से करीब 10% पुरुषों के नमूना पा लिये हैं।

परिक्षण-साधन चीन की कंपनियों से खरीदे गये लेकिन कुछ का ऑर्डर अमेरिकी थर्मो-फिशर को भी मिला। थर्मो-फिशर को विशेष चिन्हक (gene-marker) के लिए चुना है ऐसा कंपनी का दावा है। आनुवंशिक चिह्नकों को चीनी मानव-प्रजातियों विशेष तौर पर वीगुर मुस्लिमों एवं तिब्बतियों को ध्यान में रखकर चुना गया है। थर्मो-फिशर के परीक्षण-साधन के संदर्भ में वैज्ञानिकों, नीतिशास्त्रीजनों (ethicists), मानवाधिकारवादियों का मत है कि इस विधा का दुरुपयोग सामाजिक नियंत्रण के लिए किया जा सकता है।

निजता एवं सहमति

अभी आंकड़ा-भडांर बढ़ाया जा रहा है, किंतु इसका उपयोग शुरू हो चुका है। चीनी पुलिस का एक तंत्र “डीएनए स्काईनेट” (DNA Skynet) है जिसमें इसका इस्तेमाल चौकसी (surveillance) के लिए होने जा रहा है। शार्प आई (Sharp Eye) नामक परियोजना में इसे इस्तेमाल किया जाएगा।

चीन के लोग उनके इंटरनेट-प्रयोग तथा अन्य कार्यों में सरकरी दखलंदाजी को स्वीकार कर चुके हैं। लेकिन मौजूदा DNA नमूनों के मामले में विरोध अवश्य दिख रहा है। इस मामले में अभी कोई कानून नहीं है। मार्च माह में चीन की शीर्ष सभा (Parliament) में दो प्रतिभागियों ने सुझाव दिया कि जैसे-जैसे तकनीकी आगे बढ़ती है वैसे-वैसे उपयोक्ताओं के अधिकारों को सुरक्षित रखा जाना चाहिए। [चीन में विरोध तो कर नहीं सकते, सरकार की मेहरवानी की आस रहती है।]

अधिकारी देहाती क्षेत्रों में नमूने लेने के लिए चुपचाप आगे बढ़ रहे है जहां इस प्रोग्राम और उसके निहितार्थ की समझ लोगों में नहीं है। इन इलाकों में अधिकारी गर्वान्वित दिखाए देते हैं और स्कूलों के बच्चों के खून-नमूने लेते हुए फोटो प्रचारित करते हैं। इन फोटो में दिख रहे लोग खून के नमूने लेने का प्रयोजन शायद ही ठीक से समझते हैं। साक्षात्कारों एव सोशल मीडिया की पोस्टों से लगता है कि नमूना न देने पर सजा हो सकती है।

जियांग नाम के कम्प्यूटर एन्जीनियर के कथनानुसार खून का नमूना देने के लिए उसे अपने गांव जाने को कहा गया। वह अस्पताल गया और उसे भुगतान करना पड़ा था। न उसने नमूना लेने का कारण पूछा और न ही उसे बताया गया। चीनी लोगों को अपना पहचान पत्र सदैव साथ रखना पड़ता है इसलिए अधिकारियों से पहचान छिप नहीं सकती।

जनसामान्य के अधिकारों के लिए सक्रिय लोगों का कहना है कि आनुवंशिकी विज्ञान ने चीनी अधिकारियों को नापसंद जनों पर अभियोग चलाने के मौके दे दिये हैं। उन्हें शंका है कि DNA आंकड़े को असंतुष्टों [राजनैतिक dissidents] के विरुद्ध पुख्ता सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता। बीजिंग पुलिस ने कुछ मामलों में ऐसा प्रयोग किया भी है।

निजता के पक्षधर एक चीनी नागरिक ली वेइ (Li Wei) की बात लेख में पेश है। ली का कहना है कि खून या लार आदि के ममूने पुलिस के पास हों तो वे आपराधिक बारदाद के स्थान पर छोड़े जा सकते हैं और उनका दुरुपयोग व्यक्ति को फंसाने में हो सकता है। अपने खुद का अनुभव उन्होंने बताया कि कैसे एक होटल में पुलिस उनके पास पहुंची और पुलिस स्टेशन चलने की और DNA नमूने की मांग करने लगी। उन्होंने मना किया; उन्हें मारा-पीटा गया, पर वे माने नहीं।

ऐंबर वांग (Amber Wang) तथा लियु यी (Liu Yi) के शोधकार्य का लेख को योगदान रहा है। लेख में कई फोटो शामिल हैं जिन्हें मैं यहां नहीं प्रस्तुत कर रहा हूं। उनके लिए मूल लेख देखना पड़ेगा। – योगेंद्र जोशी