2 अक्तूबर – महात्मा गांधी जयन्ती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस

गांधी एवं शास्त्री जयंती

आज गांधी जयन्ती है – 1969 में जन्मे महात्मा गांधी यानी बापू का 150वां जन्मदिन। इस दिन के साथ ही उनके जन्म का 150वां वर्ष आरंभ हो रहा है। संयोग से यही दिन देश के दूसरे प्रधान मंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन रहा है (जन्मवर्ष 1904)। किंतु २ अक्टूबर का सार्वजनिक अवकाश एवं उस दिन के तमाम कार्यक्रम बापू को ही केन्द्र में रखकर आयोजित होते रहे हैं। लगे हाथ शास्त्रीजी का भी जिक्र कर लिया जाता है और उनको श्रद्धांजली अर्पित की जाती है। गांधी जी के सम्मान में इस दिन को संयुक्त राष्ट्र संघ ने अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया हुआ है।

केन्द्र सरकार ने इस 150वें वर्ष को सोद्देश्य तरीके से मनाने का कार्यक्रम बनाया है और इस कार्य हेतु एक कार्यकारिणी समिति का गठन किया है। देश के विभिन्न राज्यों की सरकारें और केन्द्र सरकार के विभिन्न महकमे इस वर्ष को अपने-अपने तरीके से मनाने के कार्यक्रम बना रहे हैं। उदाहरणार्थ रेलवे मंत्रालय इस मौके पर अपनी रेलगाड़ियों के डिब्बों में “स्वच्छ भारत” का प्रतीक (लोगो) प्रदर्शित करेगा। इसके अतिरिक्त मंत्रालय साफ-सफाई, अहिंसा, सामुदायिक सेवा, सांप्रदायिक सौहार्द्र, अस्पृश्यता-निवारण, तथा महिला-सशक्तिकरण का व्यापक स्तर पर संदेश अपनी गाड़ियों के माध्यम से देने की योजना बना रहा है। (देखें इकनॉमिक टाइम्ज़ की खबर)

गांधी जन्मदिन एवं जन्मवर्ष सरकारी स्तर पर कैसे बनाए जाएंगे इसकी विस्तृत जानकारी न मुझे है और न ही उसकी चर्चा करने का मेरा इरादा है। जन्मदिवस की सार्थकता क्या है और आम नागरिक उसको कितनी गंभीरता से लेते हैं मैं इस पर अपनी टिप्पणी पेश करना चाहता हूं।

दिवसों की बढ़ती संख्या

अगर आप 40-50 वर्ष पूर्व की बात करें तो पाएंगे कि विभिन्न प्रकार के दिवसों की संख्या तब इतनी नहीं थी जितनी आज है। समय के साथ नये-नये दिवस घोषित होते रहे हैं कुछ हमारे राष्ट्रीय दिवस जिनमें से कई तो “महापुरुषों” के जयंतियों के नाम पर हैं, और कुछ राष्ट्र संघ के द्वारा घोषित किए गए हैं। अपने देश से जुड़े दो अंतरराष्ट्रीय दिवस तो पिछले 11 वर्षों में अस्तित्व में आए हैं। ये हैं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस, 2 अक्टूबर, और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस, 21 जून, जो राष्ट्र संघ द्वारा क्रमशः 2007 तथा 2015 में घोषित किए गए।

मैं जब इन तमाम दिवसों के बारे में सोचता हूं तो मुझे हर किसी दिवस की सार्थकता नजर नहीं आती। वे सार्थक होंगे इस विचार से घोषित किए गए होंगे, लेकिन व्यवहार में वे सार्थक हो पाए हैं इसमें मुझे शंका है। कुछ दिवस तो पारंपरिक रूप से सदियों से मनाए जाते रहे हैं जो समाज के विभिन्न समुदायों (विशेषत: धर्म-आधारित) की आस्थाओं से जुड़े हैं और त्योहारों का रूप ले चुके हैं जैसे अपने देश में राम-नवमी, कृष्ण-जन्माष्टमी, महावीर जयंती एवं नानक जयंती आदि मनाए जाते हैं। ये दिवस कोई खास संदेश देने के लिए मनाए जाते हों ऐसा मैं नहीं समझता।

अपने देश में स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त), गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) एवं गांधी जयंती (2 अक्टूबर) राष्ट्रीय अवकाश एवं पर्व के तौर पर घोषित हैं। सैद्धांतिक तौर यह माना जाएगा कि ये दिवस मात्र छुट्टी मनाने और कुछएक रस्मी कार्यक्रमों के आयोजन तक सीमित नहीं हैं बल्कि ये नागरिकों को उनके कर्तव्य-निर्वाह का स्मरण कराते हैं। लेकिन क्या नागरिकवृंद उस संदेश पर ध्यान देते हैं और क्या उस संदेश के अनुसार चलने का प्रयास करते हैं। अवश्य ही इन अवसरों पर विभिन्न सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं में अनेकानेक आदर्शों की बात की जाती है और जनसमुदाय को अपने जीवन में उन्हें अपनाने का उपदेश दिया जाता है। मुझे लगता है कि आदर्शों की बात करना इन मौकों पर वक्ताओं के लिए विवशता होती है। वे स्वयं उन आदर्शों को – आंशिक तौर पर ही सही – अपनाने की इच्छा नहीं रखते इस बात को श्रोता भली भांति समझते हैं, और श्रोताओं की इस समझ को वक्ता भी जान रहा होता है। किंतु रस्मअदायगी चलती रहती है।

बतौर अहिंसा दिवस के गांधी जयंती की सार्थकता

यों तो गांधी दिवस इस देश में एक राष्ट्रीय अवकाश के तौर पर दशकों से मनाया जा रहा है और साथ में इस दिन की रस्मअदायगी भी चलती आ रही है। किंतु महात्मा गांधी के अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता वाले व्यक्तित्व के चलते इसका महत्व देश तक सीमित नहीं रह गया है। जब से इस दिन को राष्ट्र संघ द्वारा अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया गया है इसका महत्व इस देश के बाशिंदों के लिए खास तौर पर बढ़ गया है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूं क्योंकि जिस देश से गांधी जुड़े रहे यदि वहीं के लोग गांधी के विचारों को भुला दें तो बाहरियों के लिए हम कितने सम्माननीय रह सकते हैं?

मेरे मन में एक सवाल उठता है कि क्या गांधी दिवस के अहिंसा दिवस बन जाने से लोग अहिंसा-भाव के प्रति प्रेरित हो रहे हैं? यहां पर याद दिलाना चाहता हूं कि अहिंसा एवं सहिष्णुता एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं किंतु दोनों में घनिष्ठ संबंध है। जहां सहिष्णुता होगी, क्षमाशीलता होगी, दूसरों के प्रति संवेदना होगी, वहीं अहिंसा की भावना प्रबल होगी। किंतु जीवन के 70 वसंत पार करते-करते मैं यही अनुभव कर रहा हूं कि समय के साथ देश में असहिष्णुता बढ़ती गई है। दूसरों के प्रति अपराध करने के विचार प्रबल होते जा रहे हैं। इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण तो संसद तथा विधानसभाओं में आपराधिक छवि के जन-प्रतिनिधियों की दिनबदिन बढ़ती संख्या है, जिस तथ्य को उच्चतम न्यायालय एवं निर्वाचन आयोग, दोनों, संज्ञान में ले चुके हैं, परंतु लोकतंत्र के पहरेदार हमारे नेता इसे महत्वहीन मानते आ रहे हैं। क्या यह सब गांधी के विचारों के अनुरूप है? तो कैसे मान लें कि लोकतंत्र के शासकीय पक्ष को चलाने वाले गांधी के विचारों के प्रति श्रद्धा रखते हैं।

क्या ऐसा नहीं लगता कि गांधी जयंती अपनी अहिंसा संबंधी अर्थवत्ता खोती जा रही है? क्या अहिंसा का विचार केवल मुख से बोले जाने वाले कथनों तक ही सीमित नहीं होता जा रहा है? मेरा मानना है देश में अहिंसा की भावना को महत्व न देने वाले नागरिकों की संख्या कम नहीं है। इसका जीता-जागता प्रमाण है आजकल अक्सर सुनने में आने वाली “मॉब-लिंचिंग” (भीड़-कृत हत्या) की घटनाएं। किसी बात पर किसी मनुष्य पर किसी ने छोटे-बड़े अपराध का शक जताया नहीं कि भीड़ इकट्ठी हो जाती है और “मारो-मारो” के नारे के साथ उस असहाय को मौत की सजा दे देती है। शक के घेरे में आया व्यक्ति अपराधी हो सकता है तो भी भीड़ अपना निर्णय सुना दे यह सर्वथा निंद्य और अन्यायपूर्ण माना जाएगा। ऐसे मौकों पर कोई एक या दो व्यक्ति विवेक खो बैठें तो समझ में आता है। लेकिन जब दो-चार नहीं बल्कि दर्जनों लोग उस कुकृत्य में जुट जाएं तो मैं यही कहूंगा कि पूरी भीड़ न अहिंसा को मानती है और न ही न्याय की व्यवस्था को सम्मान देती है। ऐसा हिंसक व्यवहार मॉब-लिंचिंग तक ही सीमित नहीं रहता है बल्कि पग-पग पर देखने को मिलता है। जब किसी महिला के साथ दुष्कर्म होता है तो वहां भी अन्य जन घटना को रोकने का प्रयास करने के बजाय उस कुकृत्य में भागीदार बन जाते हैं। कुकृत्यों के उदाहरण आपको देखने-सुनने को मिल जायेंगे। लगता है करुणा भाव एवं उदात्त वृत्ति कहीं तिरोहित हो चुके हैं।

गांधी जयंती और स्वच्छता अभियान

पिछले तीनएक सालों से प्रधानमंत्री मोदी ने एक और आयाम गांधी जयंती से जोड़ा है, और वह है स्वच्छता संदेश। उनकी स्वच्छता की बातें लोगों को भा गई हैं। । “स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत” का नारा भी प्रचलन में आ चुका है। फिर भी देखने में आ रहा है कि अनेक लोगों का स्वच्छता के प्रति रवैया कमोबेश अपरिवर्तित है। यह मैं अपने शहर वाराणसी (मोदी का निर्वाचन क्षेत्र) में महसूस कर रहा हूं। सड़क के किनारे मूत्रत्याग की लोगों की आदत जा नहीं रही है। कूड़ादान पांच कदम की दूरी पर हो तो वहां तक जाकर कूड़ा-कचरा फैंकने की जहमत कई लोग उठाना नहीं चाहते। सड़कों पर छुट्टा जानवर जहां-तहां घूमते दिख जाएंगे और उनके गोबर से सड़कें गंदी हो रही हैं। ये जानवर सड़क के किनारे रखे कूड़े के डिब्बों से कचरा सड़क पर आज भी यथावत फैलाते मिल जाते हैं। इस तथ्य के प्रति प्रशासन बेखबर बना रहता है। दरअसल स्थानीय प्रशासन “काम चल जा रहा है” की उदासीन भावना से कार्य करता है। उसमें समस्याओं को हल करने का उत्साह एवं संकल्प ही नहीं दिखता है। सफाई का भाव नागरिकों में भी आधा-अधूरा ही है। अपने घर-आंगन को वे साफ भले ही रखते हों, लेकिन आम सड़क को साफ-सुथरा रखने में अपना योगदान देने में दिलचस्पी नहीं रखते हैं।  – योगेन्द्र जोशी

 

 

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गांधी जयन्ती (2016-10-02, शास्त्री जयन्ती भी): स्वच्छता दिवस राष्ट्र के स्तर पर

गांधी एवं शास्त्री जयंती

आज गांधी जयन्ती है, 1869 में जन्मे महात्मा यानी मोहनदास करमचंद गांधी जी का जन्म-दिवस। संयोग से आज ही का दिन पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी (जन्म 1904) का जन्मदिवस है। इस दिन का महत्व मुख्यतः गांधी जी के कारण ही है और लोग उनका किसी न किसी बहाने स्मरण कर लेते हैं। लगे हाथ शास्त्री जी को भी याद कर लेते हैं। शास्त्री जी का जन्मदिन यदि किसी और दिन होता तो शायद कम ही लोगों को उनका ध्यान आता।

गांधी जी सौभाग्यशाली थे कि उन्हें भारत की स्वतंत्रता का श्रेय पूरा-पूरा नहीं तो काफी हद तक दिया जाता है। उन्हें अहिंसा का पुजारी माना जाता है, और लोग यह धारणा कई लोगों के बीच है कि उन्होंने “खड्ग बिना ढाल” के देश को आजादी दिला दी। व्यक्तिगत स्तर पर मैं आजादी के लिए उन्हें अत्यधिक श्रेय नहीं देता। मेरा मानना है कि द्वितीय विश्वयुद्ध (सितंबर 1, 1939 से सितंबर 2, 1945 तक) के बाद ब्रिटेन (यूरोप के साथ) के हालात बिगड़ चुके थे और उसके लिए अपने सामाज्य को संभालना कठिन पड़ गया था। विगत 19वीं शताब्दी के मध्य के आगे-पीछे ही ब्रितानी शासन के अधीन के प्रायः सभी देश एक-एक कर स्वतंत्र होते गये। भारत तो वैसे ही बड़ा देश था जिसको संभालना ब्रितानी हुकूमत के लिए मुश्किल हो चुका था, विशेषतः जब देश में सर्वत्र आज़ादी-आज़ादी के नारे लग रहे थे। आज़ादी की उस मांग के माहौल के लिए अकेले गांधी जी उत्तरदायी नहीं, बल्कि अनेक जनों का उसमें योग दान था।

स्वतंत्रता के संदर्भ में गांधी जी के योगदान का आकलन भिन्न-भिन्न लोग भिन्न-भिन्न करेंगे ही। कुछ भी हो, गांधी जी को विश्व समुदाय ने आधुनिक काल के एक अतिविशिष्ट वक्तिव्य के धनी मानव के रूप में देखा। उनके विचारों का सर्वत्र प्रसार-प्रचार भी हुआ। कई देशों ने तो अपने खास-खास स्थानों पर उनकी प्रतिमाएं भी स्थापित कर दीं, और राष्ट्र संघ ने 2014 में तो उस दिन को विश्व अहिंसा दिवस घोषित भी कर दिया।

शास्त्री जी कदाचित देश के कुशल प्रधानमंत्री सिद्ध हुए होते, किंतु वे अपनी असामयिक मृत्यु के कारण केवल डेड़ साल (9 जून, 1964 से 11 जनवरी, 1966 तक) ही उस पद पर रह सके। पाकिस्तान के साथ 1965 में छिड़ी जंग के बाद ताशकंद में भारत-पाक शान्ति समझौते के बाद संदिग्ध हालत में उनकी मृत्यु हुई थी। उनकी मृत्यु स्वाभाविक नहीं थी यह बहुतों का मानना है। अस्तु, अगर वे जीवित रहते तो शायद अधिक चर्चित रहे होते। सन् 1965 के युद्धकाल में उन्होंने “जय जवान जय किसान” का नारा दिया था। मुझे याद है जब उन्होंने देशवासियों से सप्ताह में एक दिन उपवास रखने को प्रेरित किया था। वे दिन थे जब देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था और अमेरिका से “पीएल 480 योजना” के अंतर्गत जीरानुमा गेहूं देश में आयात हो रहा था।

कहने का तात्पर्य है कि 2 अक्टूबर का दिन गांधी जी के कारण ही चर्चा का विषय रहा है। विगत गांधी जयंतियों पर मैंने अपने ब्लॉग में उनके विचारों को लेकर अपनी धारणाओं पर लेख लिखे हैं। (देखें 08-10-02, 09-10-02, 10-10-01, 13-10-0214-10-02, एवं 14-10-08 के ब्लॉग-पोस्ट।)

स्वच्छ्ता के विचार का अभाव

इस बार गांधी जयन्ती अहिंसा दिवस के तौर पर चर्चा में नहीं है, बल्कि स्वच्छता दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी जी ने 2014 में इसी दिन पर स्वच्छता की बात देश के सामने रखी। और इस बार इस दिन को राष्ट्र के स्तर पर स्वच्छता दिवस भी घोषित कर दिया (मैं शायद भूल नहीं कर रहा हूं)। यही इस बार मेरे लिए भी चर्चा का विषय है। तब से दो वर्ष बीत चुके हैं। उस दिशा में कुछ प्रगति जरूर हुई है, किंतु उतनी नहीं जितनी उम्मेद की जाती थी। मीडिया के माध्यम से लोगों को इस बारे में जागरूक करने की कोशशें काफी हुई, परंतु जन समुदाय प्रेरित हुआ इसमें मुझे शंका है।

मैं स्वयं से अक्सर पूछता हूं कि क्या सामाजिक सरोकार की बातों पर किसी व्यक्ति के मन में स्वयं विचार नहीं आने चाहिए? मेरे मन में स्वच्छता की बात किसी के कहने से नहीं आई बल्कि बचपन से वह मौजूद रही है। और तदनुसार मैं अपने परिवेश को यथासंभव साफ़-सुथरा रखने की कोशिश करता हूं। जब हम (मैं एवं मेरी पत्नी) जहां-तहां गंदगी देखते हैं तो बड़ी कोफ़्त होती है। हम राह चलते कुछ खाते-पीते हैं तो उसका कचरा जेब में या झोली में डाल लेते हैं, या खाना-पीना करते ही नहीं। रेल-यात्रा के दौरान फ़र्श पर कचरा न गिरे इसका ध्यान रखते हैं। कचरा इकट्ठा करके कागज आदि में लपेट कर पास में रख लेते हैं, या कूड़ेदान में डाल आते हैं। परंतु हमने देखा है कि कई लोग मूंगफली ठूंगते है तो छिलके फ़र्श पर गिराते जाते हैं। बिस्कुट का रैपर फ़र्श पर डाल देते हैं। वाश-बेसिन पर हाथ-मुंह धोते हैं तो बेसिन में ठीक-से पानी बहाकर उसे साफ नहीं रखते। टायलेट में शौच के बाद फ़्लश करके एक बार भी मुड़कर नहीं देखते कि फ़्लश हुआ भी कि नहीं। इस प्रकार के तमाम अनुभव देखने को मिलते हैं।

समझ में नहीं आता कि सफाई का खयाल क्यों नहीं आता? क्या सफाई की बात के लिए किसी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है? क्या यह ऐसा विषय है कि उच्च शिक्षा हासिल करना पड़े। मुझे सबसे बड़ा आश्चर्य तब होता है जब कोई व्यक्ति घर से गंतव्य के लिए निकलता है, और रास्ते में सड़क किनारे पेशाब करने से नहीं हिचकता है। ऐसा करते मैंने संभांत-से लगने वाले लोगों को भी देखा है। मेरे शहर वाराणसी में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचने में डेड़-दो घटे से अधिक का समय नहीं लगता। ऐसे में यदि आप घर से शौच करके निकलें तो गंतव्य तक आपको पेशाब की कोई परेशानी नहीं हो सकती। तब भी वांछित अपनाकर क्यों नहीं चलता कूई? सड़क किनारे पेशाब न करनी पड़े ऐसा क्यों नहीं आता मन में? राह चलते सड़क पर जहां-तहां थूक देना आम बात है। विदेशों में लोग पेपर नैपकिन लेकर चलते है, ताकि जरूरत पड़ने पर उसमें थूककर पास के कूड़ेदान में फेंका जा सके, या जेब में रखा जा सके। क्यों ऐसा ही कोई तरीका देशवासियों को क्यों नहीं सूझता? कम से कम यह तो किया ही जा सकता है कि सड़क के किनारे घास-फूस या मिट्टी में थूका जाये। ध्यान रहे कि सड़क पर थूका गया साफ-साफ नजर आता है।

स्वच्छता-भाव बनाम सौन्दर्यबोध

मेरी धारणा है कि साफ-सफाई वास्तव में सौन्दर्य-बोध का अनन्य हिस्सा है, और आम भारतीयों में वह शायद बहुत कम है। यदि किसी को गंदगी देख बेचैनी नहीं होती, उस स्थल से भाग निकलने की उसकी इच्छा नहीं होती, अथवा तत्सदृश नकारात्मक प्रतिक्रिया उसके मन में नहीं जगती, तो उससे सफाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। चारों ओर गंदगी फैली हो ऐसे वातावरण से सांमजस्य बिठाने में बहुत से लोगों को दिक्कत नहीं होती। वे उसी वातावरण में जमीन में बैठ सकते हैं, गंदगी देखते हुए नाश्ता-पानी कर सकते हैं, इत्यादि। जब इन जनों को गंदगी खले ही नहीं तो उनसे सफाई की  उम्मीद कैसे की जा सकती है?

मेरा रोजमर्रा का अनुभव प्रमुखतया अपने शहर वाराणसी की दुर्व्यवस्था पर आधारित है। मैंने जितने भी शहर देखे हैं उनमें वाराणसी सबसे गंदा और प्रशासनिक उदासीनता का शिकार पाया है। (मैं अक्सर देश के विविध स्थलों की यात्रा कर लेता हूं।) दो वर्ष पहले जब स्वच्छता अभियान चला था तो लगा कि शहर के दिन बहुरेंगे। लेकिन कोई खास अंतर शहर में नहीं आया है। घरों से कूड़ा-उठान की व्यवस्था अवश्य है, लेकिन वह कूड़ा अक्सर सड़कों के किनारे गिरा दिया जाता है। यहां की व्यवस्था का वर्णन कर पाना मेरे लिए सरल नहीं है। शब्दों में वह बात नहीं होती जो प्रत्यक्ष दर्शन में है।

वाराणसी की गंदगी में कुछ योगदान तो आवारा गाय-सांड़ों का रहता है। यहां की गली-कूचों में कुछ लोग अपने निजी दूध के लिए अथवा उसके व्यवसाय के लिए गाय-भेंसे पालते हैं। मेरे घर के सामने की सड़क पर एक सज्जन (?) भी यह कार्य करते हैं। मेरी जानकारी के अनुसार शहर में पशु-पालन पर कोई प्रतिबंध नहीं है और न ही गंदगी फैलाने के विरुद्ध कोई कानून है। अतः यह कार्य धड़ल्ले से चलता आ रहा है। इस कार्य में सड़क पर अतिक्रमण भी होता है। अवश्य ही अतिक्रमण के विरुद्ध कानून हैं, परंतु प्रशासन में कोई देखने वाला हो तब न? साल-छः महीने में अतिक्रमण दस्ता आ भी जाये तो पशुओं को सड़क से हटा लिया जाता है और फिर बाद में स्थिति पूर्ववत। ये पशु हैं जो गोबर की गंदगी तो फैलाते ही हैं, उसके अलावा सड़क के किनारे का कूड़ा भी इधर-उधर बिखेर देते हैं।

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बीते मार्च माह में उच्च न्यायालय ने राज्य (उत्तर प्रदेश) में पॉलिथीन की थैलियों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। आरंभ में लगा था कि अब खुली जगहों पर प्लास्टिक नहीं बिखरा दिखेगा। साग-सब्जी, किराना आदि की दुकानों पर पॉलिथीन थैली का मिलना बंद हो गया। लेकिन महीना बीतते-बीतते पॉलिथीन वापस। अब पूरी तरह पहले की स्थिति है। क्या अदालत ने प्रतिबंध हटा दिया? शायद नहीं, क्योंकि अखबारों मे तद्विषयक कोई समाचार कभी नहीं छपा। मेरा ख्याल है कि प्रशासन की उदासीनता इसका कारण रहा है।

मेरे ही घर के नजदीक मुख्य मार्ग के किनारे सब्जी-सट्टी भी लगती है उसके साथ फुटकर सब्जी की दुकानें। ये लोग अपनी सड़ी-गली सब्जी सड़क पर बिखेर देते हैं न कि उसको एकत्रित रखने की व्यवस्था अपनाते हैं। यह सड़ी-गली सागसब्जी ऊपर बताये आवारा पशुओं का आहार होता है, किंतु गंदगी तो हो ही जाती है। साग-सब्जी की दुकानें शहर में सड़क पर यत्र-तत्र अतिक्रमण करके लगी रहती हैं और गंदगी के स्रोत बने रहते हैं। वाराणसी में तम्बाकूदार पान का बहुत चलन है। लोग पान खाकर कहीं भी पीक थूक देते है। वाहनों में बैठे हुए भी थूकते हैं। और तो और, कार में बैठे जन भी चलते हुए उसका द्वार खोलकर पीक थूकते हैं, किसी की परवाह किए बगैर। कहने का मतलब यह है कि किसी को सद्विचार नहीं सूझते; बस जिसको जो सुविधा हो वह करता है।

वाराणसी की जैसी विकट स्थिति और नगरों की नहीं होगी, लेकिन गंदगी सभी जगह देखने को मिलती है। हाल ही में मैं मुम्बई के पश्चिम भांडूप इलाके में 3 सप्ताह के प्रवास पर गया था। छुट्टा पशु न होने के बावजूद वहां भी खूब गंदगी देखने को मिली, खासकर जंगल-मंगल नामक सड़क पर। दिल्ली के कई इलाकों में भी मैंने गंदगी देखी है। चार साल पहले मैंने पुद्दुचेरी की यात्रा की थी। तब एक नाले के पास से गुजरने पर बदबू के साक्षात्कार हुए थे और गंदगी के भी।

दरअसल अपने देश में संसाधन आबादी के हिसाब से बहुत कम हैं। बहुत-से लोगों को शहरों में सड़क किनारे झुग्गी-झोंपड़ी में जीवन बिताना होता है। उनकी सबसे बड़ी समस्या येनकेन प्रकारेण जीवित रहने की होती है। सुबह से शाम तक जीवन-धारण के साधन जुटाने में ही जिंदगी गुजर जाती है। किसे फ़ुर्सत है कि सफाई की सोचे?

मोदी जी गांधी जी के स्वच्छता के विचार से प्रभावित रहे हैं और स्वच्छता अभियान के सिलसिले में उनका नाम लेते रहते हैं। किंतु वे भी यह भूल जाते हैं कि गांधी जी के हर विषय पर अपने स्पष्ट एवं लीक से हटकर विचार रहे हैं। गांधी जी 

(1) शारीरिक परिश्रम पर जोर देते थे, न कि मशीनों पर अधिकाधिक निर्भरता,

(2) समाज में जाति, धर्म, क्षेत्र आदि पर आधारित भेदभाव के विरुद्ध थे, किंतु स्वतंत्र भारत में ऐसा भेदभाव बढ़ रहा है,

(3) आर्थिक विषमता न्यूनतम रहे यह चाहते थे, किंतु यह विषमता दिनों-दिन बढ़ रही है,

(4) आत्मसंयम के पक्षधर थे और सत्य तथा निष्ठा पर जोर देते थे, जो आज के नेताओं और आम जनों से गायब हो रहे हैं,

(5) इसी प्रकार की अनेक बातें करते थे, लेकिन उन पर कम ही लोग ध्यान देते हैं। – योगेन्द्र जोशी

2 अक्टूबरः गांधी जयंती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस और जननेता मोदी का स्वच्छता आह्वान (1)

स्वच्छता अभियान

 

 

 

 

गांधी-शास्त्री जयंती

2 अक्टूबर गांधी जयंती है । प्रायः सभी देशवासी इस दिन से सुपरिचित रहे हैं, क्योंकि प्रथमतः इस दिन सार्वजनिक अवकाश रहता है और द्वितीयतः गांधी के नाम को दुनिया में अहिंसक आंदोलन से जोड़कर देखा जाता है, जिसके कारण इस दिन को विश्व अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया गया है । कदाचित कम ही लोगों को यह याद रहता होगा कि “जय जवान जय किसान” का नारा देने वाले तथा सोमवार को सामूहिक उपवास रखने की अपील करने वाले देश के दूसरे प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री जी का जन्म भी इसी दिन हुआ था ।

मैं देश की स्वाधीनता का श्रेय गांधी को उतना नहीं देता जितना आम तौर पर दिया जाता है । अवश्य ही उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी, किंतु स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लेने वाले अनेकों स्मरणीय जननेताओं का योगदान कम नहीं रहा । वस्तुतः द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश सामाज्य की स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी थी कि उन्हें अपना सामाज्य संभालना कठिन लगने लगा था और एक-एक करके उन्हें तमाम बड़े देशों को स्वतंत्रता प्रदान करनी पड़ी थी । यह मेरा मत है जिसे लोग शायद स्वीकार न करें । मेरा यह आलेख स्वाधीनता के मुद्दे पर केंद्रित न होकर गांधी से जुड़े अन्य बातों पर केंद्रित है ।

गांधी और अहिंसा

निःसंदेह गांधी अहिंसा के पक्षधर थे, लेकिन कदाचित कायरता के पक्षधर नहीं थे । वे कठिन परिस्थिति में अपनी सुरक्षा के लिए हिंसक मार्ग अपनाने से हिचकने की सलाह देते रहे हों मैं ऐसा नहीं समझता । अस्तु, अहिंसा को केवल गांधी से जोड़कर ही क्यों देखा जाता है ? अनेक ऐसे महापुरुष हो चुके हैं जिन्होंने हिंसा का मार्ग त्यागने की सलाह दी है । यह ठीक है कि सभी समान रूप से सुविख्यात नहीं रहे हैं, पर उनको भुलाया नहीं जा सकता । भगवान महावीर, महात्मा बुद्ध, एवं प्रभु यीशु को तो दुनिया जानती ही है । वे सभी तो अहिंसा का उपदेश देते रहे । अवश्य ही उन्हें अहिंसक आदोलन चलाने की आवश्यकता नहीं रही, क्योंकि उनके काल में राजनैतिक परिस्थियां आधुनिक काल की सी नहीं रहीं । वस्तुतः गांधी स्वयं इन महापुरुषों से प्रेरित रहे हैं ।

सवाल है कि गांधी की चर्चा अहिंसा के संदर्भ में ही सर्वाधिक क्यों की जाती है । उन्होंने तमाम अन्य बातों पर भी जोर डाला था जिनको अपनाने की सलाह उन्होंने लोगों को दी थी । किंतु उन बातों की चर्चा आम तौर पर जोरशोर से नहीं की जाती है । मैं समझता हूं कि गांधी के अहिंसा की बात को सारी दुनिया इसलिए महत्व देती है क्योंकि हिंसा से प्रायः हर मनुष्य डरता है । हो सकता है कि आंतकवादी और उनके विरुद्ध लड़ने का दायित्व निभाने वाले सुरक्षकर्मी न डरते हों । अथवा स्वीकारे गए दायित्य के कारण उन्हें कदाचित निडरता बरतनी पड़ती हो । अतः अधिकांशतः सभी चाहेंगे हि मानव समाज हिंसामुक्त हो । मैं इस भावना को मनुष्य के स्वार्थ की प्रवृत्ति से जोड़कर देखता हूं, अर्थात उसकी इस अपेक्षा से कि अन्य जन उसको हानि न पहुंचाएं । गांधी की अन्य बातें मनुष्य के स्वार्थ के अनुरूप नहीं हैं, अतः उन बातों का पक्ष लेने और उन्हें जीवन में अपनाने में उन्हें असुविधा अधिक और व्यक्तिगत लाभ कम दिखता है ऐसा मैं मानता हूं । इसलिए लोग उन बातों को तवज्जू नहीं देते हैं । मैं अपने उक्त मत को सप्ष्ट करता हूं:

गांधी के विषय में व्यापक एवं शोधपरक अध्ययन मैंने नहीं किया है । अतः उनके बारे में बहुत कुछ तथा वह भी सही-सही जानता हूं यह दावा नहीं कर सकता । जितना मैं समझ पाया हूं उसके अनुसार वे अहिंसा के अतिरिक्त अधोलिखित बातों को महत्व देते थे और उन पर स्वयं अमल करते थे, न कि दूसरों को महज उपदेश भर देते थे:

गांधी – अहिंसा से आगे कुछ और भी

(1) स्वच्छता – गांधी का स्वच्छता पर विशेष ध्यान था । वे मानते थे कि हर व्यक्ति को स्वयं अपने हाथ से साफ-सफाई करनी चाहिए । यदि दूसरों का शौच आदि उठाने की जरूरत पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए । स्वच्छता से उनका ताप्तर्य दूसरों से सफाई करवाना नहीं था, बल्कि उसमें स्वयं भागीदारी निभाना था ।

(2) शारीरिक श्रम – गांधी शारीरिक श्रम के पक्षधर थे और यह विचार रखते थे कि मनुष्य को अपना कार्ययथासंभव अपने शारीरिक श्रम के संपन्न करना चाहिए । मशीनों पर निर्भरता कम से कम होना चाहिए । उन्हें किस स्थिति में इस्तेमाल करना चाहिए इस पर विवेकपूर्ण विचार होना चाहिए । मात्र आलस्य अथवा सुविधाभोग के लिए हमें अपने शारीरिक श्रम से नहीं बचना चाहिए । श्रम करने के लाभ क्या-क्या हैं यह तो लोग समझते हैं, किंतु उससे फिर भी बचते हैं । गांधी की नजर में व्यावसायिक तौर पर शारीरिक श्रम करने वालांे को हेय दर्जा देना अक्षम्य माना जाना चाहिए ।

(3) सादा जीवन – वे सादगी भरे जीवन के पक्षधर थे । शानो-शौकत और दिखावे का जीवन उनके विचारों के प्रतिकूल था । उनके मतानुसार व्यक्ति की श्रेष्ठता उसके विचारों से आंकी जानी चाहिए न कि उसकी भौतिक सपन्नता से । आज के युग में गांधी के कितने प्रशंसक होंगे जो अपनी आर्थिक संपन्नता के बावजूद सादा जीवन जीते हों । आज तो व्यक्ति ही संपन्नता ही उसकी सामाजिक श्रेष्ठता का आधार बन चुका है ।

(4) सामाजिक समानता – गांधी का मत था कि सभी मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए, सबको सम्मान दिया जाना चाहिए । यह सच है कि प्रकृति ने सबको समान नहीं बनाया है । परंतु  सभ्य समाज वही कहला सकता है जिसमें इस अंतर को भेदभाव का आधार न बनाया जाता हो । शारीरिक अथवा बौद्धिक स्तर पर कोई अधिक समर्थ होता है तो कोई कम । तदनुसार लोग अपना-अपना व्यावसायिक क्षेत्र चुनते हैं, परंतु उस क्षेत्र के आधार पर उन्हें ऊंचनीच की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए । धर्म, नस्ल, जाति, क्षेत्रीयता के आधार पर तो भेदभाव किया ही नहीं जा सकता, क्योंकि ये कृत्रिम आधार हैं – समाज में घर कर गईं विकृतियां । छुआछूत गांधी की दृष्टि में हिंदू समाज पर एक कलंक है ।

(5) कमजोर का शोषण न हो – अपेक्षया कमजोर व्यक्ति का शोषण विश्व के हर समाज में सदा से ही होता रहा है । गांधी चाहते थे कि हमें शोषण की प्रवृत्ति से स्वयं को मुक्त करना चाहिए । किंतु देखने में आता है कि समाज में कमजोर व्यक्ति से तरह-तरह से लाभ उटाये जाते हैं । कमजोर व्यक्ति से कम से कम पारिश्रमिक देकर अधिक से अधिक कार्य लेना आम बात है । दूसरों का हक छीनने में भी बहुतों को कोई संकोच नहीं होता है । वास्तव में देखा जाय तो समाज में फैले कदाचार का संबंध शोषण की प्रवृत्ति से ही है । वस्तुस्थिति का अपने हक में लाभ उठाना और दूसरों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में हानि पहुंचाना आम प्रवृत्ति है ।

(6) आर्थिक विषमता कम हो

कहा जा चुका है कि प्रकृति ने सबको समान नहीं बनाया है । अतः अर्थोपार्जन की क्षमताएं असमान है । अपने बौद्धिक कौशल से कोई असीमित संपन्नता अर्जित कर लेता है तो कोई अपनी सीमित क्षमताओं के कारण जीवन-यापन के लिए पर्याप्त साधन तक नहीं जुटा पाता है । फलतः समाज में आर्थिक विषमता स्वाभाविक तौर पर बढ़ती जाती है । गांधी का मत था कि सब असमान जन्म लेेते हैं के तर्क के साथ इस असमानता का औचित्य नहीं ठहराया जाना चाहिए । वे चाहते थे कि हमें ऐसी सामाजिक एवं शासकीय व्यवस्था अपनानी चाहिए जिससे यह अंतर कम से कम हो । इसका सीधा तात्पर्य यह है कि समाज में यह प्रवृत्ति पैदा की जानी चाहिए कि संपन्न वर्ग किंचित त्याग के लिए प्रस्तुत हो और कमजोर वर्ग को ऊठाने में योगदान दे ।

ये वे कुछ बातें हैं जो इस समय मेरे विचार में आ रही हैं । ऐसी अन्य बातें भी होंगी जो गांधी के चिंतन में रही हों । गौर करें तो देखेंगे कि ये बातें मनुष्य के विविध स्वार्थों के प्रतिकूल हैं – स्वार्थ जिनमें सुविधा भोगना, संपन्नता अर्जित करना, दूसरों पर वर्चस्व पाना, दायित्वों से बचना, आदि शामिल हैं ।

स्वच्छता अभियान

गांधी-चिंतन में जिस स्वच्छता को महत्व दिया गया है उसे आज मौजूदा प्रधानमंत्री मोंदी ने अपने स्वच्छता व्भियान का आधार बना लिया है । मोदी ने भविष्य में सतत चलने वाले इस अभियान के लिए गांधी जयंती को चुना है । देखने पर मोदी के इरादे सराहनीय लगते हैं । साथ में मेरे मन में ये सवाल भी उठते हैं:

(1) वे और उनके दल के लोग इस विषय पर कितने गंभीर होंगे ?

(2) उनकी खुद की सरकार तथा राज्यों की सरकारों की प्रतिवद्धता किस स्तर की होगी ?

(3) इस कार्य के लिए कैसे पर्याप्त संसाधन जुटाए जाएंगे ?

और (4) आम जन का कितना सहयोग उन्हें मिलेगा ?

ऐसे और भी प्रश्न हैं । इन प्रश्नों के उत्तर स्वयं मोदी के पास होंगे इसमें मुझे शंका है । उम्मीद पर दुनिया टिकी है, सो हमें सफलता की आशा करनी चाहिए । इस बारे में कुछ अधिक कहने से पहले मैं कांग्रेस पार्टी पर संक्षिप्त टिप्पणी करना चाहता हूं ।

कांग्रेस पार्टी गांधी पर अपना “कॉपीराइट” जताती है, जब कि गांधी स्वातंत्र्योत्तर भारत के किसी दल के नेता नहीं थे । वे पूर्व में एक जननायक थे और वही अंत तक रहे । कांग्रेस यह भूल जाती है कि वे उस कांग्रेस के नेता थे जो देश के स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत थी । और उन्होंने स्वतंत्र भारत में चुनाव लड़ने के लिए बने राजनैतिक दल के तौर पर कांग्रेस को नहीं स्वीकारा । वे उससे नाता तोड़ चुके थे । ऐसे में कांग्रेसियों का उन्हें अपने दल से जुड़ा होना कहना नितांत गलत है । वैसे भी कितने कांग्रेसी हैं जिन्होंने गांधी की जीवन शैली अपनाई हो ?  गांधी को अपना कहने वाले कांग्रेस के किसी नेता ने ऐसा अभियान क्यों नहीं चलाया ? क्यों नहीं स्वयं मनमोहन सिंह के दिमाग में स्वच्छता अभियान का खयाल आया ? अस्तु, गांधी के नाम पर किए जाने वाले मोदी के अभियान को कांग्रेस तथा अन्य दलों ने सहयोग देना चाहिए, न कि उस पर कोई टिप्पणी करनी चाहिए ।

शंकाएं

मैंने इस अभियान के संदर्भ में ऊपर कुछ सवाल उठाऐ हैं । अभियान किस हद तक सफल होगा और क्या अड़चनें मोदी के समक्ष होंगी इस पर मैं अपनी टिप्पणियां इस ब्लॉग की अगली पोस्ट में करूंगा । – योगेन्द्र जोशी

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क्या महात्मा गांधी की अहिंसा नीति वास्तव में व्यावहारिक है ?

गांधीजी और स्वाधीनता संघर्ष

कल 2 अक्टूबर गांधी जयंती है और साथ ही विश्व अहिंसा दिवस भी । वस्तुतः गांधीजी विश्व भर में उनके अहिंसात्मक आंदोलन के लिए जाने जाते हैं, और यह दिवस उनके प्रति वैश्विक स्तर पर सम्मान व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है । यह आम धारणा लोगों में व्याप्त है कि गांधीजी के अहिंसक आंदोलन ने ही देश को स्वाधीनता दिलाई थी । मुझे इस मत को पूर्णतः स्वीकारने में हिचकिचाहट होती है । मेरी अपनी धारणा है कि उस संग्राम में अनेकों सेनानियों ने योगदान दिया था । उस काल में अंग्रेज सामाज्य कठिन परिस्थितियों से जूझ रहा था । एक ओर विश्वयुद्ध की समस्या पूरे यूरोप को घेरे थी तो दूसरी ओर विश्व के प्रायः सभी पराधीन देश अंग्रेजी शासन से मुक्ति के लिए आंदोलनरत थे । ब्रितानी सरकार को यह अहसास हो चुका था कि अब अपने सामाज्य को यथावत् बनाए रखना आसान नहीं । याद करें कि उस कालखंड में अनेकों लोग यूरोप में मारे गये थे, और उन्हें ‘मैन-पावर’ की समस्या का सामना करना पड़ रहा था, जिस कारण से कालांतर में भारत-पाकिस्तान सरीखे देशों से कई-कई लोग पुरुष कर्मियों की कमी पूरा करने के लिए ब्रिटेन पहुंचे थे । ऐसे में ब्रितानी हुकूमत ने एक-एक कर विभिन्न देशों को स्वाधीनता देना आरंभ कर दिया था । गांधीजी के आंदोलन को अकेले फलदायक मान लेना उचित नहीं है । स्वाधीनता प्राप्ति में उन अनेकों लोगों का निर्विवाद योगदान भी शामिल था जो गांधीजी से मतभेद रखते थे ।

अगर यह मान भी लें कि गांधीजी का अहिंसक आंदोलन वस्तुतः कारगर रहा, तो भी इतने मात्र से उसकी प्रभाविता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना उचित नहीं होगा । यद्यपि मैं व्यक्तिगत तौर पर अहिंसा का पक्षधर हूं, और कामना करता हूं कि सभी सांसारिक जन ऐसा ही करें, तथापि इस तथ्य को नकारना मैं नादानी मानता हूं और इस पर जोर डालता हूं कि ऐसा न कभी हुआ है और न कभी होगा । मेरे अपने तर्क हैं; उन्हें प्रस्तुत करने से पहले मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मेरे लिए महात्मा गांधी उन गिने-चुने ऐतिहासिक महापुरुषों – शायद दर्जन भर भी नहीं – में से एक हैं, जिनको मैं विशेष सम्मान की दृष्टि से देखता हूं । साफ-साफ कहूं तो इस सूची में उनके अलावा महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर, ईसा मसीह, और यूनानी दार्शनिक सुकरात जैसे महापुरूष शामिल हैं । मैं इन सभी को उनकी सिद्धांतवादिता, स्पष्टवादिता, त्यागशीलता, आम जन के प्रति संवेदनशीलता, और इन सबसे अधिक अहम (भेड़चाल से हटकर) स्वतंत्र चिंतन की गुणवत्ता के कारण सम्मान देता हूं ।

हिंसा: स्वाभाविक प्रवृत्ति

अब मैं मुद्दे पर लौटता हूं । मनुष्य में तमाम प्रकार की स्वाभाविक प्रवृत्तियां अलग-अलग तीव्रता के साथ मौजूद रहती हैं । जो प्रवृत्तियां समाज के लिए किसी भी प्रकार से हितकर हों उन्हें सकारात्मक कहा जा सकता है, और जो अहितकर हों उन्हें नकारात्मक । किसी भी व्यक्ति में दोनों ही अलग-अलग मात्रा में मौजूद हो सकती हैं । परिस्थितियां नियत करती हैं कि कब कौन-सी प्रवृत्तियां हावी होंगी और कितने समय तक प्रभावी रहेंगी । इन प्रवृतियों में से एक हिंसा की प्रवृत्ति है, जो प्रायः सभी विकसित जीव-जन्तुओं में विद्यमान रहती है । वस्तुतः प्रकृति ने जीवधारियों में यह प्रवृत्ति अपनेे अस्तित्व को बनाए रखने के एक साधन के रूप में प्रदान किया है । इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है कि मनुष्य में भी यह स्वाभाविक तौर पर मौजूद रहती है । किंतु अन्य प्राणियों तथा मनुष्य में अंतर यह है कि मनुष्य हिंसात्मक प्रवृत्ति के नकारात्मक पहलू को समझ सकता है और यदि वह चाहे तो स्वयं को एक हद तक उससे मुक्त कर सकता है । ‘यदि वह चाहे तो’ एक महत्वपूर्ण शर्त है जो कम ही मौकों पर पूरी हो पाती है ।

कौन ऐसा है जो खुलकर एस बात की वकालत न करे कि समाज में संवेदनशीलता हो, परोपकार भावना हो, अन्य जनों पर हावी होने का भाव न हो, दूसरों के शोषण की प्रवृत्ति न हो, इत्यादि । पर क्या हमारे चाहने भर से ये बातें समाज में व्यापक स्तर पर दिखाई देती हैं ? विश्व के इतिहास में कितने महापुरुष हैं जो अपने अथक प्रयासों से समाज को इन गुणों के प्रति पे्ररित कर सके हों ? निश्चित ही एक बहुत बड़ा जनसमुदाय उन इतिहास-पुरुषों का प्रशंसक हो सकता है और स्वयं को उनका अनुयायी होने का दंभ भर सकता है । किंतु इसके यह अर्थ कतई नहीं है वह उन गुणों को अपनाने का संकल्प भी लिए हो । यह विडंबना ही है कि अनुयायी होने की बात अनेक जन करते हैं, परंतु तदनुरूप आचरण विरलों का ही होता है ।

मैं कहना चाहता हूं बहुत-से सामाजिक चिंतक/उपदेष्टा अहिंसा की बातें करते आए हैं, फिर भी हिंसा की प्रवृत्ति समाज में बनी हुई है और उससे लोग मुक्त नहीं हुए हैं । वास्तविकता के धरातल पर अहिंसा की बात कितनी सार्थक है यह इस तथ्य से समझा जा सकता है कि किसी भी देश का शासन तंत्र हिंसा के प्रयोग पर टिका है । उनकी न्यायिक व्यवस्था मैं दंड का प्रावधान हिंसा पर आधारित है । शासन तंत्र नागरिकों में यह भय पैदा करता है कि यदि वे अनुचित कार्य करेंगे तो उन्हें दंडित होना पड़ेगा । चाहे परिवार के भीतर की बात हो या समाज की बात व्यक्ति को हिंसा का ही भय दिखाया जाता है, और लोगों को दंडित करके उदाहरण प्रस्तुत किए जाते हैं । देश बाह्य सुरक्षा हो या आंतरिक, सेना एवं पुलिस का गठन ही हिंसा पर आधारित होता है ।

यह तर्क दिया जा सकता है कि उपर्युक्त मामलों को हिंसा की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए । हिंसा परिभाषा ही बदलकर उसका औचित्य निर्धारण करना क्या उचित है यह विचारणीय एवं विवादास्पद विषय है । जब आप अहिंसक आंदोलनों की बात करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि वे तभी सफल होते हैं जब दूसरा पक्ष – जो अक्सर शासन में होता है – भयभीत हो जाता है यह सोचते हुए कि आंदोलन उग्र होकर हिंसक रूप ले लेगा । हालिया अन्ना हजारे आंदोलन जब देशव्यापी हो गया तो सरकार को भय लगने लगा कि स्थिति विस्फोटक हो सकती है । अन्यथा कई जन अहिंसक विरोध का रास्ता अपनाते हैं, लेकिन असफल रहते हैं ।

अहिंसक विरोध: संदिग्ध सफलता

मेरा अनुभव यह है कि अहिंसक विरोध/आंदोलन तभी सफल होता है जब उठाया गया मुद्दा समाज को व्यापक स्तर पर उद्वेलित करता है । स्वाधीनता-पूर्व गांधीजी का आंदोलन, आठवें दशक का जेपी आंदोलन, और हालिया अन्ना हजारे का आंदोलन इसलिए सफल हुए – अगर आप सफल मानते हों तो – क्योंकि उठाया गया मुद्दा लोगों की सहभागिता पा सका और उन्हें आंदोलन से जोड़ सका । लेकिन जब मुद्दा क्षेत्रीय स्तर की अहमियत रखता हो या एक सीमित जनसमुदाय की दिलचस्पी का हो, तब सफलता की संभावना घट जाती है । वास्तव में जैसे-जैसे मुद्दे की व्यापकता घटती जाती है, वैसे-वैसे अहिंसक आंदोलन/विरोध की सफलता भी कम होते जाती है । देखने में तो यही आता है कि जब विरोध करने वाला अकेला या केवल दो-चार व्यक्तियों का समूह होता है, तब वह असफल ही हो जाता है । हरिद्वार में गंगा बालू उत्खनन रोकने के लिए अनशनरत स्वामी निगमानंद की मृत्यु इसी तथ्य की पुष्टि करता है । ऐसे अवसरों पर हिंसक आंदोलन ही कुछ हद तक सफल होते हैं, या शासन उनको दंड के सहारे दबा देता है, जो उसकी हिंसक नीति दर्शाता है ।

अहिंसक आंदोलन तभी सफल होता है जब विरोधी पक्ष में किंचित् संवेदना, लज्जा, विनम्रता एवं दायित्व भाव हो । जिसमें ये न हों उसका मन आंदोलन को देख पसीजेगा यह सोचना ही मुर्खता है । आज के विशुद्ध भौतिकवादी युग में लोग निहायत स्वार्थी एवं संवेदनशून्य होते जा रहे हैं । ऐसी स्थिति में अहिंसा की वकालत करना बेमानी हो जाता है ऐसा मेरा दृढ मत है ।

गांधी दर्शन: केवल अहिंसा ही नहीं

गांधीजी की चर्चा अहिंसा के पुजारी के तौर पर की जाती है । लोग यह भूल जाते हैं कि गांधीजी के अन्य बातें मानव समाज के लिए अहिंसा से कम अहमियत नहीं रखती हैं । वे शारीरिक परिश्रम के पक्षधर थे । वे आ बात पर जोर देते थे हर इंसान को अपना निजी कार्य को यथासंभव स्वयं ही करना चाहिए । वे मानव-मानव के बीच असमानता के विरोधी थे । उनके मतानुसार हमारी नीतियां आर्थिक विषमता को घटाने वाली होनी चाहिए । वे ग्रामीण विकास, कृषि, एवं घरेलू उद्योगों की वकालत करते हैं । दुर्भाग्य से वर्तमान भारतीय समाज इन मूल्यों को भुला चुका है । कहां हैं गांधीजी अब ?योगेन्द्र जोशी

गांधी जयंती एवं अंताराष्ट्रीय अहिंसा दिवस: निष्प्रभावी हो चुका गांधी का अहिंसा सिद्धांत

गांधी जयंती

कल, 2 अक्टूबर, गांधी जयंती है । इसी दिन हमारे पूर्वप्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन है । गांधी जयंती हम दशकों से मनाते आ रहे हैं, और अब तो ‘अंताराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ (International Nonviolence Day) के तौर पर उसे विश्व स्तर के दिवस का दर्जा भी मिल चुका है । औपचारिकता के नाते ही सही, गांधी को याद करने वाले कम नहीं हैं । उस दिन की सरकारी छुट्टी प्रायः हर किसी को गांधी की याद तो दिला ही जाती है । लेकिन शास्त्रीजी का भी यही जन्मदिन है यह बात शायद कम ही लोगों के ध्यान में आती होगी । उनके संक्षिप्त प्रधानमंत्रित्व काल और तासकंद में उनकी ‘रहस्यमय’ मृत्यु का कुछ स्मरण तो बुढ़ा रही मेरी पीढ़ी के लोगों को होगा ही ।

उन दोनों दिवंगत जननेताओं – एक तो महात्मा ही माने जाते हैं – को मैं श्रद्धांजलि पेश करता हूं । इसके अतिरिक्त मैं कर भी क्या सकता हूं भला ! उनकी जो बातें मुझे ठीक लगती हैं उन्हें अपनाने की भरसक कोशिश करते ही आ रहा हूं । यह भी बता दूं कि उनकी हर बात, खासकर गांधीजी की, हर बात मुझे सही नहीं लगती है । शास्त्रीजी के बारे में बहुत कुछ कहने को नहीं है । उन्हें एक ईमानदार राजनेता एवं प्रधानमंत्री के तौर पर जाना जाता है । बस इतना ही काफी है । किंतु गांधीजी के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है । वे विवादों से पूरी तरह परे रहे हों और सभी उन्हें समान रूप से सम्मान देते आए हों ऐसा नहीं हैं ।

श्रद्धा का आधार

अस्तु इस अवसर पर गांधीजी को लेकर एक टिप्पणी प्रस्तुत करने का मन है मेरा । गांधीजी को सारे विश्व में अहिंसा के पुजारी के तौर पर जाना जाता है । किंतु लोग यह भूल जाते हैं कि अहिंसा उनके विचारों या जीवन दर्शन का मात्र एक पहलू था । क्या और कुछ भी ऐसा नहीं रहा है जिसके लिए उन्हें याद किया जाए ? दूसरे शब्दों में क्या कुछ ऐसी बातें गांधी-दर्शन में नहीं रही हैं जो अहिंसा के भी ऊपर हों ? क्या कारण है कि उन्हें केवल अहिंसा के लिए इतना याद किया जाता है ? (देखें पहले कभी लिखा आलेख)

गांधीजी उन गिने-चुने महान् व्यक्तियों में से एक हैं जिनको मैं विशेष श्रद्धा के साथ याद करता हूं । बमुश्किल आठ-दश लोग होंगे, बस । दुर्भाग्य से वर्तमान समय में एक भी नहीं जिसे मैं श्रद्धेय पाता हूं । फिर भी मैं गांधीजी की हर बात को सही नहीं मानता, उनका हर विचार या व्यवहार मेरे लिये स्वीकार्य नहीं है । उन बातों को लेकर मैं उनकी आलोचना करने से नहीं हिचकता । मैं उन्हें श्रद्धेय इसलिए मानता हूं कि वे संकल्प के धनी थे, उनकी करनी और कथनी में पर्याप्त संगति रहती थी, जो आज के अतिसम्मानित माने जाने वाले किसी चर्चित व्यक्ति में नहीं दिखाई देती है । वे समाजहित के प्रति संवेदनशील थे । उनके इरादे नेक थे । उनमें अनेकों ऐसी बातें थीं जो बिरले लोगों में ही देखने को मिलती हैं । फिर भी मेरी दृष्टि में अहिंसा उनके विचारों का सर्वाधिक कमजोर पक्ष था । इस माने में मैं गांधीजी को एक भ्रमित व्यक्ति मानता हूं । कैसे यही मैं स्पष्ट करना चाहता हूं ।

अहिंसा की बात

हिंसा प्राणीमात्र की एक कमजोरी है, ठीक वैसे ही जैसे भूख-प्यास, भय, क्रोध, काम (यौनेच्छा), छल, वर्चस्व, प्रेम, करुणा, आदि । अविकसित जीवधारियों में ये बहुत स्पष्ट तौर पर नहीं दिखाई देते हैं, किंतु विकसित में कमोबेश नजर आ ही जाते हैं । और मनुष्यों में तो इससे आगे बहुत कुछ और भी देखने को मिलता है, जैसे धन-संपदा संग्रह करने की लालसा, दूसरे को अपनी हैसियत दिखाने की प्रवृत्ति, निंदा-प्रशंसा करना, एवं उनसे प्रभावित होना, बदले की भावना, और अहंकार, इत्यादि । शायद ही कोई व्यक्ति हो जो इनसे मुक्त हो । लेकिन इन सबके ऊपर विवेक है जो मनुष्य को अन्य जीवधारियों से भिन्न बनाता है । यही विवेक उसे अपनी तमाम कमजोरियों का ‘दमन’ अथवा ‘शमन’ करने को प्रेरित करता है, उसी के बल पर वह स्थिति को नियंत्रण में रखता है । विवेक के कारण ही प्राचीन मनीषियों ने मानव योनि को कर्मयोनि एवं अन्यों को भोगयोनि कहा है ।

किंतु विवेक की तीव्रता तथा उसकी प्रभाविता सबमें समान रूप से विद्यमान नहीं रहती हैं । अनुभव बताता है कि जहां एक ओर लोग दूसरों के कष्ट से स्वयं दुःखी होते हैं, तो वहीं अन्य दूसरों को कष्ट में देख या उन्हें कष्ट देकर आनंदित भी होते हैं । आप राक्षसी वृत्ति कहकर इस प्रवृत्ति की निंदा कर सकते हैं, लेकिन इसके अस्तित्व को मानने से इनकार नहीं कर सकते हैं और न ही उसे मिटा सकते हैं । जो है सो है ही, हमें अच्छा और स्वीकार्य लगे या बुरा तथा अवांछित, कोई माने नहीं रखता है । मनुष्यों में अवगुण क्यों होते हैं, वे कहां से आते हैं, उनसे मुक्ति कैसे मिल सकती है, जैसे प्रश्नों के बारे में तमाम तरह के मत हो सकते हैं । मैं उनकी चर्चा में नहीं पड़ता, मैं तो इस बात पर जोर डालना चाहता हूं कि लोगों में गुण-अवगुण कमोबेश होते ही हैं, किसी में बेहद कम तो किसी में बेहद अधिक भी । और यही तथ्य व्यवहार में माने रहता है ।

अवगुणों से आप मानव समुदाय को मुक्त नहीं कर सकते हैं । संभव है कि आप किसी एक को या कुछएक को प्रेरित कर लें, उन्हें अवगुणों से मुक्त कर लें, किंतु सब पर प्रभाव नहीं डाल सकते हैं । इतिहास साक्षी है कि कभी भी ऐसा कोई महापुरुष पैदा नहीं हुआ है जो पूरे समाज को ‘रास्ते’ में ला सका हो, यहां तक कि उन लोगों को भी नहीं जो उसके अनुयायी होने का दम्भ भरते हों । अगर ऐसा होता तो बुद्ध, महावीर या ईसा के ‘तथाकथित’ अनुयायी अहिंसक होते । यह भरोसा करना भी मूर्खता होगी कि वारंवार के अनुनय-विनय से कोई व्यक्ति मान ही जाएगा और उस रास्ते पर चल पड़ेगा जिसे श्रेयस्कर बताया गया हो ।

प्रभावी है क्या अहिंसा का मार्ग?

मेरी दृष्टि में अहिंसा के रास्ते को ही एकमात्र एवं उचित रास्ता बताना गांधीजी की कमजोरी थी । वे यह मानते थे, जितना मैं समझ पाया हूं, कि अहिंसक विरोध या असहयोग के माध्यम से आप दूसरों को अपने पक्ष में कर सकते हैं । किंतु ऐसा मानना आम सामाजिक अनुभव को नकारना है । यह संभव है कि जिस व्यक्ति में संवेदनशीलता तथा उदारता का पर्याप्त अंश हो वह आपके निरंतर चल रहे विरोध से पसीज जाए और आपकी बात मान ले । लेकिन ऐसा सभी के साथ नहीं हो सकता है । ऐसे लोग भी इस धरती पर मिलेंगे, जो आपके विरोध पर और अधिक उग्र एवं कठोर हो जाएंगे । आपका विरोध यदि किसी के अहंभाव को ठेस पहुंचावे तो वह शायद ही आपकी बात माने । जैसे आप अपनी बात पर अड़े रहें, यह दावा करते हुए कि आप सही हैं, वैसे ही वह भी अपनी जिद नहीं छोड़ने वाला । तब आपका अहिंसक विरोध निष्फल होना ही है ।

असल तथ्य यह है कि हिंसक आंदोलन अधिक प्रभावी होता है । ऐसा सुनना बृहत्तर जनसमुदाय को अच्छा नहीं लगेगा । परंतु यह समाज की एक वास्तविकता है, ऐसा मेरा मानना है । इस बात को नकारा नहीं जा सकता है कि कोई भी जीवधारी भय की सहज वृत्ति से मुक्त नहीं होता है, मनुष्य भी नहीं । अवश्य ही कुछएक मनुष्य सिद्धांतों के प्रति इतने समर्पित हो सकते है कि भय की भावना कमजोर पड़ जाए । किंतु ऐसा अपवाद-स्वरूप कभी-कभार होता है न कि सामान्यतः । ऐसे अपवादों को छोड़ दें तो अधिसंख्य लोग भय के वश में रहते हैं । हिंसा की संभावना इस भय की जननी होती है । इसलिए अहिंसा की तुलना में हिंसा कहीं अधिक प्रभावी होती है, भले ही हम अहिंसा की बात जोरशोर से करें ।

सामाजिक व्यवस्थाएं हिंसा पर आधारित होती हैं – ऐसी हिंसा जिसे वैधानिक मान्यता मिली रहती है । राष्ट्रों के बीच शांति एवं समझौता सैनिक-हिंसा के भय पर ही आधारित रहती है । राष्ट्र के भीतर भी व्यवस्था हिंसक बल-प्रयोग से ही संभव हो पाती है । आज तो स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि अहिंसक आंदोलनों को सरकारें एवं संस्थाएं नजरअंदाज कर देती हैं । संवाद-प्रक्रिया भी तभी स्थापित हो पाती है जब आप हिंसक आंदोलन पर उतरते हैं या उसका भय विरोधी पक्ष को दिखाते हैं ।

मानव समाज में आदर्श मूल्य कभी भी पूर्णरूपेण स्थापित रहे होंगे यह मैं नहीं मान सकता, तथाकथित सत्ययुग में भी, फिर भी हालात इतने बुरे शायद नहीं रहे होंगे । आज मूल्यों में काफी गिरावट आ चुकी है, और लक्ष्य-प्राप्ति में हिंसा एक प्रभावी हथियार बन चुका है । मुझे लगता है कि गांधीजी के अहिंसा-सिद्धांत की व्यावहारिक प्रभाविता अब बाकी नहीं बची है ।

निस्संदेह अहिंसा मानव समाज का आदर्श है, परंतु व्यावहारिक जीवन में हिंसा ही प्रभावी रहती है ।योगेन्द्र जोशी

लेख में प्रयुक्त ‘दमन’ एवं ‘शमन’ की व्याख्याः

दमन (suppression) – सहज कमजोर प्रवृत्ति को नियंत्रण में रखना, ताकि वह व्यवहार में प्रतिबिंबित न होने पावे और व्यक्ति किसी प्रकार के अनिष्ट करने/कराने से बचा रहे । लेकिन तत्संबधित भाव मनुष्य में विद्यमान रहता है ।
शमन (subsidence) – कमजोर प्रवृत्ति को शांत कर लेना । तब आप वस्तुतः उससे मुक्त हो जाते हैं, इसलिए तज्जनित परिणामों की संभावना नहीं रह जाती है । शमन गंभीर आत्मचिंतन, आत्मपरिष्करण एवं मानसिक तप से प्राप्य स्थिति को दर्शाता है ।

उदाहरणार्थ जब कोई आपकी निंदा करे तो आप गुस्से से आगबबूला हो सकते हैं और मारपीट-गालीगलौज पर उतर सकते हैं । किंतु कतिपय व्यावहारिक कारणों के चलते आप वक्ता से उलझने के बजाय चुपचाप दूर हट सकते हैं । किंतु “मेरी निंदा की गयी” इस बात का कष्ट आपको बना रहेगा और उसका उल्लेख अपने मित्रों से करके आप हल्का भी हो लेंगे । शमन की अवस्था में आप उस निंदा से अप्रभावित रहेंगे, आपके मन में कोई प्रतिक्रिया ही नहीं होगी । निंदा से विचलित होने और प्रशंसा से प्रसन्न होने के ‘मनोविकारों’ से आप ऊपर उठ चुके होंगे ।

2 अक्टूबर, गांधी एवं शास्त्री जयंती – अहिंसा से आगे बहुत कुछ और भी

Gandhi-Shastriआज 2 अक्टूबर है, बापू यानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (2 अक्टूबर, 1869 – 30 जनवरी, 1948) और देश के दूसरे प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री (2 अक्टूबर, 1904 – 11 जनवरी, 1966) की जन्मतिथि । दोनों का स्मरण करने और दोनों से किंचित् प्रेरणा लेने का दिन, हो सके तो ।

जहां तक शास्त्रीजी का सवाल है उन्हें उनकी निष्ठा, देशभक्ति और सादगी के लिए याद किया जाता है, भले ही वैयक्तिक स्तर पर कम ही लोगों के लिए ये बातें आज सार्थक रह गयी हैं । प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की काबिना के एक ईमानदार मंत्री के तौर पर उनकी पहचान अवश्य रही है । किंतु प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल संक्षिप्त ही रहा, अतः उस भूमिका में वे कितना सफल रहे होते कह पाना आसान नहीं ।

महात्मा गांधी की बात कुछ और ही रही है । उन्हें विश्व में अहिंसा के पुजारी के तौर पर जाना जाता है । संयुक्त राष्ट्र संगठन (UNO) ने तो आज के दिन (2 अक्टूबर) को ‘अहिंसा दिवस’ (Non-Violence Day) घोषित कर रखा है ।

मैं समझ नहीं पाता कि गांधीजी के विचारों को केवल अहिंसा के संदर्भ में ही क्यों महत्त्व दिया जाता है । क्या इसलिए कि आज के समय में जब चारों ओर हिंसात्मक घटनाएं नजर आ रही हैं, हर कोई अपने को असुरक्षित अनुभव कर रहा है ? यूं भौतिक (दैहिक तथा पदार्थगत) स्तर की हिंसा मानव समाज में सदा से ही रही है, परिवार के भीतर, परिवार-परिवार के बीच, विभिन्न समुदायों के बीच, और देशों के बीच । किंतु आतंकवाद के रूप में एक नये प्रकार की हिंसा का उदय हालिया वर्षों में हुआ है, जिससे हर कोई डरा-सहमा-सा दिखता है । जिस प्रकार की हिंसा आज देखने को मिल रही है वह अमीर-गरीब, राजनेता, उच्चपदस्थ प्रशासनिक अधिकारी, और आम आदमी सभी में असुरक्षा की भावना पैदा कर रही है । ऐसी स्थिति में हिंसात्मक घटनाओं की निंदा और अहिंसा की अहमियत पर जोर डालना ‘फैशनेबल’ बात बन गयी है । अन्यथा क्या मानव समाज के समक्ष अन्य प्रकार की अनेकों समस्याएं नहीं हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए और जिनके संदर्भ में गांधीजी के विचारों की चर्चा की जानी चाहिए ?
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2 अक्टूबरः गांधी जयंती, शास्त्री जयंती

आज गांधी जयंती है । तमाम देशवासियों ने आज बापू को याद किया होगा । सार्वजनिक अवकाश होने के कारण किसी कार्यालय में किसी प्रकार का समारोह आयोजित हुआ होगा यह मैं नहीं समझता । सार्वजनिक स्थलों पर विविध आयोजन हुए ही होंगे, और संबंधित कार्यक्रमों में वक्ताओं ने अपने विचार पूरे जोर से श्रोताओं के सामने रखे होंगे, अथवा बापू के प्रति अपने-अपने तरीके से श्रद्धांजलि प्रस्तुत की होगी ।

विदेशों में भी इस दिन को महत्त्व मिल चुका है और इसे अंतरराष्ट्रीय अहिंसा-दिवस के तौर पर मान्यता मिली है । समाचार माध्यमों ने भी महात्मा को याद किया है और उनको केंद्र में रखते हुए अपने-अपने उद्गार पाठकों के समक्ष रखे हैं । मेरे प्रातःकालीन अखबार हिन्दुस्तान ने भी अपना फर्ज निभाते हुए इस बात पर बहुत कुछ लिखा है कि कुछ चुने हुए ख्यातिलब्ध व्यक्ति क्या सोचते हैं । ख्यातनाम सामाजिक कार्यकर्ता अण्णा हजारे ने राज ठाकरे को संबोधित करते हुए उन्हें दूर की सोचने की सलाह दी है, तो योगाचार्य बाबा रामदेव ने सभी देशवासियों से अनुरोध किया कि वे स्वदेशी भावना अपनायें । एक ओर चर्चित सच्चर कमेटी के पूर्व-न्यायाधीश राजेन्द्र सच्चर देश न बांटने की गुजारिश ‘प्राइम मिनिस्टर इन वेटिंग’ आडवाणीजी से करते हैं, तो दूसरी ओर आरएसएस के सुदर्शनजी को समाजवादी नेता सुरेन्द्र मोहन हिंदुत्व की आत्मा पहचानने की मंत्रणा दे रहे हैं । लेखक सुधीश पचौरी द्वारा टीवी सीरियलों की निर्मात्री एकता कपूर को सलाह दी गयी है कि वे सच पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करें, और इसी प्रकार मेरे उक्त अखबार की प्रमुख संपादक मृणाल पांडे भारी-भरकम काया के मालिक राजनेता पप्पू यादव से कहती हैं कि वे उपवास करना सीखें ।

उक्त अखबार में इस अवसर पर विभिन्न संगठनों तथा संस्थाओं द्वारा भी विज्ञापनों द्वारा बापू को याद किया गया है । इन सभी बातों के बीच मेरे लिए सर्वाधिक माने रखते हैं गांधीवादी अर्थशास्त्री एल सी जैन के विचार, जो उन्होंने अपने अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को लक्ष्य करके कहे हैं (क्लिक करें)। मेरी याददास्त के अनुसार इन जैन साहब का पूरा नाम लक्ष्मीचंद रहा है और वे काफी समय पहले योजना आयोग के सदस्य रह चुके हैं । मुझसे भूल हो सकती है । जैन साहब प्रधानमंत्री जी से आग्रह करते हैं कि वे अपनी चिंताएं केवल ‘इंडिया’ तक ही सीमित न रखें, बल्कि उसका दायरा ‘भारत’ तक बढ़ायें, जहां लोग दो वक्त के खाने तक को तरस रहे हैं । गौर करने की बात है कि जैन साहब ने ‘इंडिया’ तथा ‘भारत’ के भेद का स्पष्ट उल्लेख किया है ।

यही दिन पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय शास्त्रीजी का भी जन्मदिन है । किंतु उनकी चर्चा शायद ही कहीं होती हो । मुझे अपने हिन्दी अखबार में उनका कहीं जिक्र नहीं दिखा । कहीं किसी कोने में उनका भी नाम रहा हो तो कह नहीं सकता ।

मैं अपने इस ब्लॉग की शुरुआत बीबीसी रेडियो के उस आलेख के उल्लेख से करना चाहता था जो मैंने करीब डेड़ वर्ष पहले पढ़ा था । उस लेख में इंडिया तथा भारत के अंतर की संक्षिप्त विवेचना की गयी है । मुझे ब्लॉग की कोई जल्दबाजी नहीं थी । सोचा था किसी दिन मन हो गया तो लिखना आंरभ कर दूंगा । लेकिन आज के उक्त लेख ने मेरे इरादे बदल दिये । सोचा कि क्यों न गांधी-जयंती ही को शुभमुहूर्त मान कर आज ही लिखना शुरू कर दूं ।

इंडिया एवं भारत के अंतर को मैं कैसे देखता हूं इसका खुलासा यहां नहीं करने जा रहा हूं । तत्संबंधित जो विचार मेरे मन में थे वे अभी वहीं हैं । उनका नंबर बाद में आयेगा । अभी इतना ही कहना है कि कथित अंतर वास्तविक है और गंभीर तथा चिंताप्रद है । इंडिया भारत से हटकर कर कुछ और ही है यह बात में पहले भी टेलीविजन चैनलों पर आयोजित परिचर्चाओं में कई बार सुन चुका हूं । आप ध्यान दें तो पायेंगे कि आज इस देश में भारत की बात करने वाला कोई नहीं है । सबके मुख से इंडिया और इंडिया की प्रॉग्रेस की बात निकलती है । देश इकॉनामिक सुपरपावर बनने बाला है, देश को नॉलेज पावर बनना है, आगामी दो हजार बीस तक यह डिवेलप्ड कंट्रीज की बराबरी में खड़ा हो जायेगा जैसे शब्द लोगों के मुख से निकलना आम बात-सी हो चली है । पर भारत कहां है ? किसी को उसकी याद ही नहीं । वस्तुतः इस देश का नाम भारत भी है यह लोग भूल चुके हैं । विगत काल में बम्बई का मुम्बई, मद्रास का चेन्नई, बंगलौर का बेंगलुरु नामकरण किया जाये जैसी मांगें देश के विभिन्न कोनों से उठी हैं और मानी गयी हैं, लेकिन इंडिया को भारत कहा जाये कम से कम जब हम अपनी ही बोली में बात कर रहे हों ऐसा कोई नहीं कहता है । यही है शुरुआत भारत को भूलने की । देखें आगे हम कहां पहुचते हैं ।
गांधीजी प्रार्थनाओं में विश्वास करते थे । आत्म-शुद्धि के लिए अपनाया जाने वाला यह उनका साधन था । मैं भी प्रार्थना करता हूं: ‘मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’ । नहीं, ‘नः मनांसि शिवसंकल्पानि सन्तु’ । आमीन । – योगेन्द्र