पुनर्मूषको भव – किन्तु न शक्यं तत्कर्तुम् (विवशता अपराधी के मुठभेड़ की)

देश में अनेक मौकों पर दुर्दांत अपराधियों का मुठभेड़ (इंकाउन्टर) में मारा जाना कोई नई बात है। पुलिसबलों द्वारा ऐसी घटनाओं को अंजाम देना एक प्रकार की विवशता का द्योतक है। अभी हाल में मुठभेड़ की ऐसी ही एक घटना कानपुर के अपराधी विकास दुबे के साथ घटी। उस घटना पर मुझे एक शिक्षाप्रद कथा की याद हो आई जिसे मैंने छात्र-जीवन में अपनी किसी संस्कृत पुस्तक में पढ़ी थी। कथा का शीर्षक थाः “पुनर्मूषको भव”, अर्थात् फिर से मूस (mouse) हो जाओ।

कुख्यात अपराधियों को लेकर अपनी टिप्पणी करने से पहले मैं उक्त कथा का संक्षेप में उल्लेख कर देता हूं।

किसी वन में एक महात्माजी (संन्यासीजी) कुटिया बनाकर रहते थे। वे किसी वनीय प्राणी को भगाते-दौड़ाते नहीं थे। विपरीत उसके वे अपने भिक्षार्जित भोज्य पदार्थ उनको भी खिलाते थे। समय वीतते-वीतते वहां के सभी प्राणी उनके सापेक्ष निर्भिक हो चुके थे। पास के गांव से कुत्ते-बिल्ली भी उनके पास आते-जाते थे।

उनकी कुटिया के निकट एक मूस/चूहा भी बिल बनाकर रहता था। वह भी उनके समीप निडर होकर खेलता-कूदता था। एक बार चूहे ने महात्माजी को अपनी व्यथा सुनाई, “महाराज, आप तो अपने तप के बल पर बहुत-से कार्य सिद्ध कर सकते हैं। मुझे भी एक कष्ट से मुक्ति दिलाइये।”

उदारमना महात्माजी ने जब उसके कष्ट के बारे में जानना चाहा तो चूहे ने कहा, “महाराज, एक बिल्ली अक्सर यहां आती है। वह मुझे मारकर खाना चाहती है। उससे मुझे डर लगता है। क्यों नहीं आप मुझे बिल्ली बना देते हैं ताकि मैं उसका मुकाबला कर सकूं।”

महात्माजी ने उसकी बात मानकर उस पर अभिमंत्रित का सिंचन किया और ‘तथास्तु’ कहते हुए उसे बिल्ली बना दिया। अब बिल्ली बना चूहा खुश था और निर्भीक होकर कुटिया के आसपास घूमने लगा। दिन बीतते गये। एक दिन कोई कुत्ता आकर उस बिल्ली के पीछे दौड़ पड़ा। जब भी कोई कुत्ता आता वह बिल्ली को काटने दौड़ पड़ता। बिल्ली ने महात्माजी से शिकायत करके उसे भी कुत्ता बना देने की प्रार्थना की। महात्माजी ने दया-भाव से उसे कुत्ता बना दिया। उस वन में जंगली जानवर भी रहते थे जो अक्सर कुटिया के आसपास आ जाते थे। महात्माजी उन्हें भी प्यार से पास आने देते। उन्हें देख कुत्ता डर जाता था। एक बाघ उस कुत्ते को शिकार बनाने की फिराक में था। तब उस कुत्ते ने महात्माजी को अपनी परेशानी बताई और उसे भी बाघ बना देने का अनुरोध किया। दयालु महात्माजी ने तथास्तु कहते हुए उसकी यह मुराद भी पूरी कर दी। बाघ की हिंसक प्रकृति के अनुरूप व्यवहार करते हुए वह महात्माजी पर झपटने की सोचने लगा। महात्माजी उसका इरादा भांप गये और “पुनर्मूषको भव” कहते हुए मंत्रों से उसे फिर से चूहा बना दिया।

उक्त कथा प्रतीकात्मक है नीति की बात स्पष्ट करने के लिए। प्राचीन संस्कृत साहित्य में पशु चरित्रों के माध्यम से बहुत ही बातें समझाने की परंपरा रही है। उक्त कथा में चूहे ने कोई अपराध नही किया उसे कोई सजा नहीं दी महात्माजी ने, लेकिन जब बाघ बने उसकी आपराधिक वृत्ति उजागर हुई तो उन्होंने उसे फिर से निर्बल चूहा बना दिया। उसकी औकात उसे दिखा दी।

अब मैं अपराधियों के मुठभेड़ की बात पर लौटता हूं। उपरिलिखित कथा बताती है कि अयोग्य व्यक्ति पर उपकार करना घातक सिद्ध हो सकता है। यानी आपराधिक वारदातों में लिप्त व्यक्ति पर रहम नहीं किया जा सकता है; उसके बचाव में उतरना कालांतर में घातक होता है। जब चीजें बहुत आगे बढ़ जाती हैं तो लौटकर भूल-सुधार की संभावना नहीं रहती। उक्त कथा में महात्माजी चूहे को बाघ योनि तक बढ़ा सके थे और उसको खतरनाक पाने पर पूर्ववर्ती योनि में लौटा सके थे। अपराधों की दुनिया में ऐसी वापसी संभव नहीं। जो अपराध किया जा चुका हो उसे “न हुआ” जैसा नहीं कर सकते। वस्तुस्थिति गंभीर हो इससे पहले ही कारगर कदम उठाना जरूरी होता है।

दुर्भाग्य से हमारी शासकीय व्यवस्था अपराधों को गंभीरता से नहीं लेती और समय रहते समुचित कारगर कदम नहीं उठाती। पुलिस बल अपराधों को रोकने और अपराधियों पर नकेल कसने के लिए बनी है। आम जनता की नुमायंदगी करने वाले राजनेताओं से उम्मीद की जाती है कि वे देखें कि शासकीय व्यवस्था उनके घोषित उद्येश्यों के अनुरूप चल रहा है। ये बातें हो रही हैं क्या? हरगिज नही!

विपरीत उसके अपराधियों के साथ साठगांठ रचने उनको बढ़ावा देने में हमारा पुलिसबल, प्रशासनिक तंत्र और शासकीय व्यवस्था चलाने वाले राजनेता, सभी एकसमान भूमिका निभाते हैं।

एक नागरिक के तौर पर मैं मौजूदा राजनैतिक जमात को सम्मान की दृष्टि से नहीं देख पाता। चाहे, मोदी हों, या योगी, या मुलायम सिंह, मायावती, और अन्य, लोग सभी के दलों में आपराधिक मानसिकता के नेता भरे पड़े हैं। कहा जाता है कि तकरीबन ३०% जनप्रतिनिधि आपराधिक बारदातों में लिप्त लोग हैं। मैं आपसे सवाल पूछता हूं। आप अपने आसपास, चारों तरफ नजर दौड़ाइये, यारदोस्तों-परिचितों से पूछिये कि आम लोगों के बीच किस अनुपात में अपराधी होंगे। १% भी नहीं, या १%, २%, ३%, … मुझे पूरा विश्वास है कोई भी अधिक नही बतायेगा। तो फिर राजनीति में इतने अधिक क्यों हैं? स्पष्ट है कि राजनीति उनकी शरणस्थली बन चुकी है।

सवाल उठता है कि राजनीति में ही इतने अधिक अपराधी क्यों हैं?

उनके बचाव में राजनेताओं की बेहूदी दलील सुनिएः उनके विरुद्ध झूठे मुकदमे दर्ज होते हैं। क्यों होते हैं झूठे मुकदमे? आमजन पर तो ऐसे झूठे मुकदमें सामान्यतः दर्ज नहीं होते तो इनके विरुद्ध ही क्यों? क्यों इनके इतने दुश्मन होते है? इलजाम छोटे-मोटे नहीं। कोई कत्ल का तो कोई बलात्कार का, कोई जमीन-जायदाद हड़पने का। एक औसत आदमी पर तो ऐसे  मुकदमें दर्ज नहीं होते। फिर इन्हीं राजनेताओं पर एक-दो नहीं दर्जनों मुकदमें क्यों दर्ज होते हैं, वह भी हत्या, बलात्कार, लूटपाट, अपहरण जैसे संगीन बारदातों के? आखिर इन ताकतबर लोगों ने इतने दुश्मन क्यों पाले हैं जो उनके विरुद्ध मुकदमे ठोकते हैं। जाहिर है कि मौजूदा राजनीति में अपराधियों का बोलबाला है और हर दल उन्हें संरक्षण देता है, मानें या न मानें।

हर राजनैतिक दल कहता है कि जब तक इन लोगों को अदालत दोषी घोषित नहीं करती इन्हें अपराधी कैसे मान लें? बहुत खूब! यह है “न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी” का सटीक उदाहरण अदालत में अपराध सिद्ध करेगा कौन? आपराधिक छवि ये लोग पुलिस में, राजनेताओं के बीच, अपनी पैठ बना लेते हैं। किसकी मजाल है कि जान पर खेलते हुए उनके विरुद्ध गवाही दे। पुलिस तो इतनी ईमानदार है कि परिस्थितिजन्य सभी साक्ष्य मिटा देती है। “कोढ़ में खाज” की स्थिति। न्यायिक व्यवस्था इतनी लचर है कि सालों लग जाते हैं निर्णय आने में। तारीख पर तारीख पर तारीख … यह अदालतों की कार्य-प्रणाली बन चुकी है। हमारी न्यायिक व्यवस्था अपराधी को कैसे बचाया जाये इस बात को महत्व देती हैं न कि भुक्तभोगी को कैसे न्याय दिलाया जाये उसको। कुल मिलाकर किसी का अपराधी सिद्ध होना आसान नहीं होता है।

सवाल उठता है कि किसी की छवि का भी महत्व होना चाहिए कि नहीं? अपने व्यक्तिगत जीवन में हम इसे महत्व देते है। फिर राजनीति में क्यों इसकी अनदेखी होती है? किसी राजनेता को अपने साथ आपराधिक छवि वाले को देख शर्म क्यों नही आती?

इन सवालों को उन राजनेताओं के सामने उठाना बेमानी है जो खुद इसके लिए जिम्मेदार हैं।

पुलिसकर्मी भी राजनेताओं के चहेते अपराधियों के बचाव में आ जाते हैं। कुछ तो उनसे दोस्ती ही कर लेते हैं, तो कुछ मजबूरी में चुप रहते हैं, क्योंकि नेताओं की बात न मानना घाटे का सौदा होता है।

कुल मिलाकर अपराधियों को रोकने वाला कोई नहीं।

लेकिन जब उनकी हरकतें इतनी बढ़ जाती हैं कि उनके संरक्षक या उनको प्रश्रय देने वाले ही खतरा महसूस करने लगें तो वे उनको ठिकाने लगाने की सोचते हैं। कानपुर के विकास दुबे ने जब ८ पुलिसकर्मियों को मार डाला तब सबकी नींद खुली। उसको मृत्युदंड जैसी न्यायसंगत सजा दिलाना संभव नहीं उस पुलिस बल के लिए जो तब तक उसे बचाती आ रही थी। अतः मुठभेड़ के नाम पर उसे यमलोक पहुंचाना उनकी विवशता थी।

इस घटना पर मैंने एक ब्लॉगलेख लिखा है (दिनांक १५ जुलाई २०२०) ।  घटना का वीडियो देख मुझे लगा कि वह तो एक घटिया और बनावटी तरीके से नियोजित इंकाउंटर का खेल था।

जब किसी अपराधी के हौसले इतने बुलंद हो जायें कि वह पुलिसबल के सिर पर चढ़ बैठे तो पुलिस असहाय हो जाती है। इसी बात को रेखांकित करने के लिए मैंने कथा के शीर्षक में यह शब्द जोड़े हैंः “किन्तु न शक्यं तत्कर्तुम्” अर्थात् वैसा करना संभव नहीं जैसा महात्माजी ने किया था कथा में। – योगेन्द्र जोशी

लोकसभा के 60 वर्ष एवं ‘कार्टून कथा’ – वाकई सफल है अपना लोकतंत्र?

संसद के 60 वर्ष

कल रविवार 13 मई के दिन देश के दोनों सदनों की बैठक चल रही थी । संसद ने ‘सफलता पूर्वक’ 60 वर्ष पूरे कर लिए हैं । इसी उपलक्ष्य पर विशेष बैठक कल के साप्ताहिक अवकाश यानी रविवार के दिन आयोजित हुई थी । चुने गये कुछ सांसदों ने अपने-अपने उद्गार प्रस्तुत किए । दिन भर की कार्यवाही देखने-सुनने में मेरी खास दिलचस्पी नहीं थी । दो-चार सदस्यों के विचार सुन लिए, उतने से ही चर्चा का लुब्बेलुआब समझ में आ गया था । हमारा संविधान उत्कृष्टतम है और हमारा लोकतंत्र सफल है ऐसा मत कमोबेश सभी संसद-सदस्यों का था ऐसा मुझे प्रतीत हो रहा था ।

संसद की कार्यवाही देख मेरे मन में प्रश्न उठता है कि अपना लोकतंत्र क्या वाकई सफल है? सफलता की कैसे व्याख्या की जानी चाहिए? देश की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था किन उद्येश्यों को पूरा करने में सफल हुई है? कुुछ सांसदों ने असफलताओं की ओर भी इशारा किया । फिर भी वे इस बात पर संतुष्ट दिखाई दिए कि तमाम कमियों के बावजूद अपना लोकतंत्र सफल है ।

सफल लोकतंत्र, वाकई?

हां, अपना लोकतंत्र सफल है इस माने में कि मतदाता निर्भीक होकर मतदान में भाग ले सकते हैं । जाति, धर्म, लिंग अथवा क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है; सबको समान अधिकार प्राप्त हैं । हमारे निर्वाचन आयोग ने अपने सांविधानिक अधिकारों और दायित्वों के अनुरूप कार्य करने में काफी हद तक सफलता पाई है । उसकी कार्यप्रणाली में उत्तरोत्तर सुधार हुआ है । अवश्य ही आयोग प्रशंसा एवं शाबाशी का पात्र है । किंतु इस कार्य में राजनेताओं, विशेषकर सांसदों, की रचनात्मक भूमिका रही है ऐसा दावा करना सही नहीं होगा । संसद के माध्यम से जिस प्रकार के सुधारों की वकालत आयोग करता रहा है उनमें सांसदों ने वांछित रुचि नहीं दिखाई है । बल्कि उनका रवैया कुछ हद तक टालने या रोड़ा अटकाने की ही रही है ।

यह भी सच है कि अपना लोकतंत्र अभी तक लड़खड़ाया नहीं है । अभी इस लोकतंत्र के प्रति विद्रोह नहीं दिखाई देता है । किंतु इस संभावना से हम इंकार नहीं कर सकते हैं कि भविष्य में स्थिति बदतर हो सकती है, यदि देश की प्रशासनिक व्यवस्था में कार्यकुशलता, ईमानदारी और दायित्वों के प्रति प्रतिबद्धता लाने के प्रभावी प्रयास नहीं किए जाते हैं ।

लोगों के मतदान में रुचि लेना और निर्वाचन आयोग की सफलता को ही लोकतंत्र की सफलता का मापदंड नहीं माना जा सकता है । निर्वाचन कार्य तो लोकतांत्रिक कार्यसूची का केवल आरंभिक कदम भर होता है । उसके बाद सभी कुछ तो जनप्रतिनिधियों के दायित्व-निर्वाह पर निर्भर करता है । अगर वह संतोषप्रद न हो तब हमें सफलता पर सवाल उठाने चाहिए ।

लोकतंत्र का उद्येश्य केवल यह नहीं है कि जनता संसद में जनप्रतिनिधियों को बिठा दे । मूल आवश्यकता यह है कि वे जन-अपेक्षाओं को पूरा करने में प्रयासरत हों; कि वे जनता की समस्याओं को हल करें; कि वे कुशल, समर्पित एवं संवेदनशील प्रशासन देश को दें; कि वे जनता के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करें; इत्यादि । वस्तुतः इस प्रकार के कई सवाल उठाए जा सकते हैं जिनके सापेक्ष लोकतंत्र की सफलता को आंका जाना चाहिए । कहां खड़ा है हमारा लोकतंत्र? कुछ सवाल हैं मेरे मन में ।

मेरे सवाल-जवाब

प्रश्नः मेरा आरंभिक प्रश्न यह है कि हमारे मौजूदा सांसद (और राज्यों के स्तर पर विधायक) नैतिकता, आचरण, जनहित की चर्चा, आदि की दृष्टि से क्या उन सांसदों से बेहतर सिद्ध हो रहे हैं जो संसद के आरंभिक दौर में उसके सदस्य बने । आम जन से जो सम्मान सांसदों को तब प्राप्त था क्या उसके बराबर सम्मान आज के सांसदों को मिल रहा है? लोकतंत्र की सफलता तो तभी मानी जानी चाहिए, जब संसद बेहतर और बेहतर नजर आने के लिए प्रयत्नशील हो । क्या ऐसा हो रहा है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः क्या संसद में होने वाली बहसों का स्तर पहले की तुलना में बेहतर हुआ है? क्या सांसद हर बात पर हंगामा खड़ा करने के बजाय धैर्यपूर्वक सार्थक चर्चा में भाग लेते हैं, और अपने बातों के प्रति अन्य को सहमत करने के प्रयास करते हैं? क्या वे संसद के भीतर बहुमत को समझते हैं और उसका सम्मान करते हैं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः संसद/विधानसभाओं में आपराधिक छवि एवं वैसी मानसिकता के सदस्यों की संख्या समय के साथ घटी है क्या? हमारे सांसद जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण पेश करते हैं क्या? अपनी सामूहिक छबि के प्रति क्या वे जागरूक दिखाई देते हैं क्या? अपनी ही संसद के बनाए कानूनों का वे सभी सम्मान करते हैं क्या?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः लोकतंत्र की दुहाई देने वाले राजनैतिक दलों में क्या आंतरिेक लोकतंत्र है? कांग्रेस पार्टी अपने 126 साल पुराने इतिहास पर गर्व करती है, किंतु वह भूल जाती है कि उसका चरित्र पिछले 4-5 दशकों में पूरी तरह बदल चुका है । अब यह पूरी तरह गांधी-नेहरु परिवार पर केंद्रित है । उसमें कभी मतभेदों के लिए जगह हुआ करती थी, किंतु आज मुुखिया ने जो कह दिया वह सबके लिए वेदवाक्य बन जाता है । पिछले 4 दशकों में जिन दलों ने जन्म लिया वे अब किसी न किसी नेता की ‘प्राइवेट कंपनी’ बन कर रह गए हैं । उनमें मुखिया की बात शिरोधार्य करना कर्तव्य समझा जाता है । चाहे डीएमके हो या एआइएडीएमके या त्रृृणमूल कांग्रेस, शिवसेना, नैशनल कांफरेंस, बसपा, सपा, राजद आदि आदि, सब इसी रोग के शिकार हैं । जो दल आंतरिक लोकतंत्र से परहेज रखते हैं उनसे सफल लोकतंत्र की उम्मींद नहीं की जा सकती है । क्या मेरी बातें गलत हैं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे जनप्रतिनिधि संसद/विधानसभाओं में अपने-अपने दलों की नीतियों का समर्थन करते हैं न कि लोगों की भावनाओं को व्यक्त करते हैं जिनकी नुमाइंदगी का वे दावा करते हैं । वे दल द्वारा जारी ‘ह्विप’ के अधीन कार्य करते हैं न कि अपने मतदाताओं के मत के अनुसार । लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि को यह विवशता नहीं होनी चाहिए कि दल की नीति का वह समर्थन करे ही भले उसे वह नीति अनुचित लगे । क्या मैं अनुचित कह रहा हूं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे जनप्रतिनिधियों के संसद में उपस्थित रहने और कार्यवाही में सक्रिय तथा सार्थक भागीदारी निभाने की मौजूदा तस्वीर संसद के आरंभिक दिनों की अपेक्षा बेहतर कही जा सकती है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि वे दायित्वों के प्रति ईमानदार, समय पर कार्य निष्पादित करने वाली, और जनता के प्रति संवेदनशील प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करें । अलावा इसके वे भ्रष्ट, लापरवाह, कार्य टालने वाले प्रशासनिक कर्मियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक/दंडात्मक कार्यवाही करें । लेकिन हम पाते हैं कि प्रशासन में भ्रष्टाचार निरंतर बढ़ता जा रहा है । इस संदर्भ में सरकारें चलाने वाले सांसदों का रवैया क्या संतोषप्रद रहा है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे सांसदों ने कानून तो बहुत बनाए हैं? किंतु क्या उन्होंने कभी इस बात की चिंता की है कि उनका ठीक से पालन नहीं हो रहा है? त्वरित कानूनी कार्यवाही की व्यवस्था क्या बीते 60 सालों में की गयी है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः इस देश में पुलिस बल सत्तासीन राजनेताओं के इशारे पर उनकी असफलताओं के विरुद्ध आवाज उठाने वालों पर डंडा चलाने का काम करती है । उनकी कार्यप्रणाली ब्रिटिश राज से भी बदतर है और उनके नियम-कानून आज भी अंग्रेजी काल के हैं । आम आदमी पुलिस बल को खौफ के नजरिये से देखता है, उसे एक मित्र संस्था के रूप में नहीं । पुलिस की छबि सुधारने के लिए सांसदों/विधायकों ने कारगर कदम नहीं उठाए हैं । तब भी लोकतंत्र को सफल माना जाए?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे राजनेता सत्ता पाने और उस पर चिपके रहने के लिए वोटबैंक की राजनीति करते आ रहे हैं । वे जनता की भावनाओं को उभाड़ने के लिए बेतुके और गैरजरूरी मुद्दे उठाने से नहीं हिचकते हैं । संसद में उठा ‘कार्टून’ मुद्दा इसका ताजा उदाहरण है । वे जनभावनाओं के ‘आहत’ होने की बात करते हैं, भले ही जनता को मुद्दे की जानकारी ही न हो और वह उसे तवज्जू ही न दे । ऐसा लगता है कि वे “तुम्हें आहत होना चाहिए” का संदेश फैलाकर जनभावनाओं का शोषण करते हैं और अपना वोट बैंक मजबूत करते हैं । क्या मैं गलत कर रहा हूं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः आम जनता में राजनेताओं की साख गिरी है इस बात की ओर वे स्वयं यदाकदा इशारा कर जाते हैं । कौन है जिम्मेदार? गिरती हुई साख क्या सफल लोकतंत्र का संकेतक है?
उत्तरः नहीं ।

निष्कर्ष

मेरे जेहन में अभी ये सवाल उठे हैं । ऐसे तमाम अन्य सवाल पूछे जा सकते हैं, और जिनके सापेक्ष लोकतंत्र की सफलता को आंका जा सकता है । कुल मिलाकर मैं भारतीय लोकतंत्र को सफल नहीं कहूंगा, क्योंकि यह जनाकांक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतर पा रहा है । अवश्य ही यह ध्वस्त नहीं हो रहा है । इस बात का श्रेय जनता को जाता है जो धैर्यवान है और लोकतंत्र में आस्था रखती है । – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी

दो-तीन रोज पहले संविधान-लेखन से संबंधित नेहरू-आंबेदकर को लेकर तत्कालीन विख्यात कार्टूनिस्ट शंकर द्वारा 1949 में अंकित एक कार्टून बना हंगामा खड़ा किया था । यह कार्टून एनसीआरटी की 11-12वीं की पुस्तक में शामिल है । और यही विवाद का विषय था । अधिक जानकारी के लिए देखें ‘डेलीन्यूज’ अथवा ‘बीबीसी’, और ‘कार्टून-अकैडेमी’ । मेरी जानकारी में कार्टून यह हैः

क्या डा. मनमोहन सिंह भ्रष्टतम प्रधानमंत्री सिद्ध हो रहे हैं?

स्वतंत्र भारत के किसी बड़े स्तर के घोटाले से मेरा परिचय सबसे पहले तब हुआ था जब 1960-65 के दौरान कभी तत्कालीन वित्तमंत्री टी.टी. कृष्णमचारी को चर्चित ‘मुंदड़ा कांड’ के कारण अपना पद छोड़ना पड़ा । तब पंडित नेहरू देश के प्रधानमंत्री (प्रथम) हुआ करते थे । मैं तब हाईस्कूल या इंटर का छात्र हुआ करता था । वित्तीय घोटालों की तब मुझे कोई खास समझ नहीं थी । टेलीविजन तो तब था नहीं, रेडियो और अखबार से ही खबरें मिलती थीं । उसके बाद किसी बहुत बड़े घोटाले का ध्यान मुझे नहीं है । छोटे-मोटे कांड तो पहले भी होते थे, लेकिन काफी हद तक चोरी-छिपे अंदाज में ।

कहीं खो चुकी शर्मोहया

वह भी एक समय था जब कोई मंत्री राष्ट्र के अहित में घटी किसी घटना के लिए अपने को जिम्मेदार मानता था और कुर्सी छोड़ देता था । भ्रष्टाचार उजागर होने पर संबंधित व्यक्ति की नजरें नींची हो जाती थीं और उसके विरुद्ध थू-थू का वातावरण तैयार हो जाता था । किंतु स्वतंत्र भारत में राजनीति ने बड़ी तेजी से करवट बदली, और भ्रष्टाचार सामाजिक जीवन का स्वीकृत अंग बन गया । अब भ्रष्टाचार के आरोपों पर किसी को शर्म नहीं आती है । बल्कि साफ-सुथरे आदमी को स्वयं पर यह सोचकर लज्जा आती है कि मैं किन पाखंडियों के राज में जी रहा हूं । वह समझ नहीं पाता है कि क्या यह वही देश है जिसे धर्मभीरु माना जाता था, जहां नैतिकता की बातें कही जाती थीं, जहां भौतिकवाद को सम्मान से नहीं से देखा जाता था, इत्यादि ।

आज देश भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा पर पहुंच चुका है । राजनीति अपने स्वार्थों को सिद्ध करने का सबसे कारगर रास्ता बन चुका है । सरकारें अब खुल्लमखुल्ला लेन-देन पर आधारित होने लगी हैं । कहीं खुलकर पैसा बंटता है तो कहीं मंत्रीपद बंटते हैं, अथवा कहीं किसी और प्रकार के छिपे लाभों का आश्वासन बंटता है । सरकारें देश के लिए नहीं राजनीतिक दलों के हितों के हिए कार्य करने लगी हैं । भ्रष्टाचार की छूट उनकी विशेषता बन चुकी है । चीजें लगातार गिरावट पर चल रही हैं ।

भ्रष्टतम प्रधानमंत्री कौन?

ऐसे में जब मैं यह समझने की कोशिश करता हूं कि स्वतंत्र इंडिया दैट इज भारत का भ्रष्टतम प्रधानमंत्री किसे कहा जाए, तब काफी सोचने पर मुझे अपने मौजूदा प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ही नंबर एक पर दिखाई देते हैं । ऐसा नहीं है कि पहले के प्रधानमंत्री साफ-सुथरे ही रहे हों । मेरी दृष्टि में लालबहादुर शास्त्री सर्वाधिक ईमानदार थे । पंडित नेहरू के समय तक अवयस्क होने के कारण राजनीति की मेरी समझ काफी कम थी, अतः उनके बारे में अधिक कुछ नहीं कहता । मेरे मत में इंदिरा गांधी तुलनया सभी में सर्वाधिक शक्तिशाली रहीं हैं, किंतु अपनी सत्ता बचाने के लिए उन्होंने भी कुछ हथकंडे अपनाने से परहेज नहीं किया, अतः वे पूरी तरह साफ नहीं थीं । चरणसिंह एवं चंद्रशेखर भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर तिकड़मों से ही पहुंचे थे ऐसा कहा जाता है । देश का कोई प्रधनमंत्री एकदम पाकसाफ रहा हो यह दावा राजनेता ही कर सकते हैं, लेकिन राजनीतिक प्रतिबद्धता से परे आम आदमी शायद ही करे । राजनीति में थोड़ा-सा भ्रष्टाचार का होना राष्ट्र और समाज को खास प्रभावित नहीं करता है । किंतु जब भ्रष्टाचार का खेल खुलकर खेला जाये, शर्मोहया ताक पर रख दी जाये, अपनी सफाई में ‘मेरे विराधियों की साजिश है यह सब’ बोला जाये, और जांच एजेंसियां निकम्मी सिद्ध होने लगें, तो स्थिति गंभीर और खतरनाक हो जाती है । अपने मौजूदा प्रधानमंत्री के कार्यकाल में शासकीय व्यवस्था इसी स्थिति में पहुंच चुकी है ऐसा मेरा मत है । भ्रष्टाचार की कीचड़ दशकों पहले फैलने लग गई थी, और हर सरकार ने उसे पनपने दिया, कुछ ठोस किया नहीं, और अब वह विकराल रूप धारण कर चुकी है ।

डा. मनमोहन सिंहः कुछ खास बातें

मेरी धारणा मौजूदा प्रधानमंत्री, डा. मनमोहन सिंह, के प्रति नकारात्मक है और इसके कारणों को मैं स्पष्ट करता हूं । लेकिन उसके पहले मैं उनके तमाम प्रशंसकों से प्रार्थना करूंगा कि वे मुझे क्षमा करें । मैं उनकी कुछ खासियतों की चर्चा पहले करता हूं । संयोग से वे कभी भी जननेता नहीं रहे । उन्होंने एक बार – जीवन में केवल एक बार – दक्षिण दिल्ली से लोकसभा चुनाव अवश्य लड़ा था किंतु हार गये । इस प्रकार वे जनता द्वारा सीधे चुने गये जनप्रतिनिधियों की लोकसभा के सदस्य कभी नहीं रहे । वे सदैव क्रांग्रेस पार्टी की अनुकंपा से राज्यसभा के सदस्य बने । इस सभा के सदस्यों को सही अर्थ में जनप्रतिनिधि नहीं माना जा सकता । वास्तव में वे सदा ही एक नौकरशाह रहे और उनके जीवन का अधिकांश समय राजनीति से दूर देश के बाहर यू.एन.ओ. (राष्ट्र संघ) आइ.एम.एफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) जैसी संस्थाओं में बीता । बीस-पच्चीस साल पहले वे देश के रिजर्व बैंक के भी गवर्नर बने । मेरा खयाल है कि वे सदा से नेहरू-गांधी परिवार के चहेते रहे हैं, और फलतः क्रांग्रेस के भी प्रियपात्र रहे । (यह तो सभी समझ सकते हैं कि नेहरू-गांधी परिवार को जो पसंद वही क्रांग्रेस को भी पसंद ।) अर्थशास्त्री होने के नाते उन्हें विशेष सम्मान मिलता रहा, और फलतः बिना किसी राजनीतिक अनुभव के वे केंद्र सरकार के वित्तमंत्री और बाद में प्रधानमंत्री बने ।

देश-दुनिया के अनेकों लोग डा. मनमोहन सिंह को एक साफ-सुथरी छवि वाला व्यक्ति एवं सफल अर्थशास्त्री मानते आये हैं । प्रायः हर मौके पर उनके अर्थशास्त्री होने का जिक्र सुनने को मिलता है, गोया कि अर्थशास्त्री या किसी विषय का विशेषज्ञ होना प्रधानमंत्री के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि हो । देश में पहले भी ऐसे प्रधानमंत्री हो चुके हैं जो किसी न किसी विषय के अच्छे जानकार थे, लेकिन उनकी विशेषज्ञता का उल्लेख बारबार इतना खुलकर कभी नहीं हुआ । अर्थशास्त्री होने के नाते डा. सिंह से लगता है कि लोगों ने कुछ जरूरत से अधिक उम्मीदें पाल ली थीं । लोग यह मान बैठे कि उनकी नीतियां देश की आर्थिक तस्वीर ही नहीं बदल डालेगी, बल्कि गरीबी को भी मिटा डालेगी । ऐसा कुछ जादुई अभी तक घटा नहीं । मेरे लिए उनका अर्थशास्त्री होना माने नहीं रखता, क्योंकि विषय-विशेषज्ञ होना किसी का समाज और देश के प्रति समर्पण का प्रमाण नहीं होता । यह मानकर चलना निहायत नादानी होगी कि किसी विषय का अव्वल दर्जे का जानकार समर्पित अध्यापक भी होगा, या चिकित्सा क्षेत्र में महारत वाला अपने मरीजों के प्रति संवेदनशील होगा, कानून का जानकार अपना ज्ञान निरपराध को बचाने और अपराधी को सजा दिलाने में ही करेगा, इत्यादि । ऐसा कुछ भी जरूरी नहीं है । अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री आर्थिक तंत्र को साफ-सुथरा करके ही दम लेगा यह भी मानना मूर्खता है ।

यह बात मुझे दुर्भाग्यपूर्ण एवं विडंबनामय लगती है कि साफ-सुथरे कहे जाने वाले प्रधानमंत्री को भारतीय मीडिया में एक कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर भी पेश किया जाता है । अक्सर यह सुनने को मिलता है वे कोई निर्णय लेने से पहले 10 जनपथ का मुंह ताकते हैं । कई लोग उनको ‘रिमोट-कंट्रोल्ड’ प्रधानमंत्री भी कहते हैं । वैचारिक पराधीनता के द्योतक ऐसे शब्द पहले कभी किसी अन्य प्रधानमंत्री के लिए प्रयोग में नहीं लिए गये थे ।

क्या मतलब है भ्रष्टाचार का?

अब मैं इस बात को स्पष्ट करता हूं कि मैं उन्हें क्यों एक भ्रष्ट प्रधानमंत्री के तौर पर देखता हूं । साफ-सुथरा होने की मेरी परिभाषा कुछ कठोर है । इस प्रयोजन के लिए मेरा मापदंड किसी संस्था के शीर्ष पद पर आसीन व्यक्ति के लिए वही नहीं है जो एक रिक्शावाले, सड़क किनारे के अदना दुकानदार, या दफ्तर के चपरासी के लिए प्रयुक्त हो । रिक्शावाले आदि का आचरण बमुश्किल से दो-एक लोगों को प्रभावित करता है और केवल उनके लिए अहमियत रखता है । व्यापक स्तर पर देश और समाज को उससे कोई संदेश नहीं मिलता और न ही वह चर्चा का विषय बनता है । शीर्षस्थ लोगों का हर कार्य देश और समाज को बना-बिगाड़ सकता है । इसलिए यह कह देना कि कोई साफ-सुथरा है काफी नहीं है, जब तक कि यह स्पष्ट न किया जाए कि उसने देश के अहम मामलों में क्या रवैया अख्तियार किया है । अपनी बात अधिक स्पष्ट करने के लिए मैं चार प्रकार के भ्रष्ट आचरण की बात करता हूं । इन पर ध्यान दें:

(1) पहला भ्रष्टाचार वह है जिसके तहत व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से नाजायज तरीके से अपने तथा अपने परिवार के स्वार्थ साधता है, जैसे घूस लेकर बैंक बैलेंस बढ़ाना और सरकारी गाड़ी को परिवार की सेवा में लगाना ।

(2) दूसरा वह है जिसके तहत व्यक्ति अपने नाते-रिश्तेदारों, मित्र-परिचितों को गलत-सलत तरीके से लाभ पहुंचाता है, जैसे अपने अयोग्य संबंधी को नौकरी दिलाना और परिचित को ठेका दिलाना ।

(3) तीसरी श्रेणी में मैं उस भ्रष्टाचार को रखता हूं जिसमें व्यक्ति सक्षम होने पर भी अपने से संबंद्ध लोगों के भ्रष्टाचार के प्रति आंखें बंद किये रहता है और दायित्व के बावजूद समुचित कदम उठाने से बचता है । देश के प्रशासनिक तंत्र में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है ।

(4) चौथा वह भ्रष्ट आचरण है जिसके अंतर्गत सक्षम व्यक्ति भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को बचाने की भरसक कोशिश करता है और उसके लिए जांच एजेंसियों, पुलिस एवं न्यायव्यवस्था पर दवाब डालता है और मामले को वर्षों तक लंबित रखने की कोशिश करता है । अपने देश के शासकीय-प्रशासनिक तंत्र में ऐसा बहुत कुछ प्रत्यक्षतः हो रहा है, और हर बीते दिन के साथ स्थिति बद से बदतर हो रही है ।

मैं तीसरे-चौथे प्रकार के भ्रष्ट आचरण को सबसे गंभीर और खतरनाक मानता हूं, क्योंकि यह देश के शासकीय तंत्र को अविश्वसनीय बना देता है और आम लोगों के मन में यह धारणा पैदा करता है कि कुछ भी कर लो कुछ होना नहीं है । आपराधिक स्वभाव वाले लोगों को कानून का भय नहीं रह जाता है । इन दोनों के चलते पहले-दूसरे प्रकार के भ्रष्ट आचरण पर अंकुश लगने की उम्मीद समाप्त हो जाती है । जब जिम्मेदार व्यक्ति तीसरे-चौथे श्रेणी का भ्रष्ट व्यक्ति हो तो शिकायत किससे करें ?

पहले-दूसरे दर्जे के भ्रष्टाचार से मुक्त होने के बावजूद किसी संस्था के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति की छबि को स्वच्छ कहना सही नहीं होगा, यदि वह ऊपर कहे गये तीसरी-चौथी बात के अनुसार खरा नहीं उतरता । उपर्युक्त बिंदुओं पर विचार करने पर मैं अपने वर्तमान प्रधानमंत्री को स्वच्छ नहीं पाता । निःसंदेह उन्होंने मौके का लाभ उठाकर अपने वैयक्तिक हित न साधे हों, किंतु दूसरों को भ्रष्टाचार की छूट उन्होंने अभी तक दे रखी थी/है ।

मौजूदा प्रधानमंत्री एवं भ्रष्टाचार

दुर्भाग्य से मौजूदा क्रांग्रेस-नीत सरकार के कार्यकाल में रिकार्ड-तोड़ भ्रष्टाचारों की चर्चा हुई है । हाल के कॉमनवेल्थ गेम्ज, टेलीकॉम एवं आदर्श बिल्डिंग सोसाइटी घोटालों ने जैसी सुर्खियां बटोरी हैं वैसी पहले कभी मिडिया में नहीं देखी गईं । संचार मंत्रालय दावा करता है कि सब कुछ नियमानुसार हुआ, फिर भी ए. राजा से इस्तीफा लिया जाता है । क्यों? और वह भी इतने हल्ले-गुल्ले के बाद? आपत्तिजनक यह भी है कि प्रधानमंत्री ने सुब्रह्मण्यम स्वामी की मांग का जवाब लंबे अर्से तक क्यों नही दिया, भले ही वह जवाब ‘न’ में होता? चुप्पी क्यों साधी थी? शायद पहली दफा है कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी प्रधानमंत्री से उसकी निष्क्रियता पर जवाब मांगा है ।

इधर सी.बी.आई. पर आरोप लगते रहे हैं कि वह प्रधानमंत्री के इशारे पर काम करती है, कभी जांच की तेजी का नाटक रचती है तो कभी ढिलाई पर उतर आती है । मामलों को अंजाम तक पहुंचाने में इस संस्था का रिकार्ड संतुष्टिप्रद नहीं रहा है, खासकर केंद्र सरकार से जुड़े मामलों में या देश-प्रदेशों के बड़े घोटालों में । ऐसा लगता है कि सरकार इसका प्रयोग राजनीतिक दलों को डराए रखने में ज्यादा करती है घोटालेबाजों को त्वरित सजा दिलाने में कम । सी.बी.आई. कई बार अदालतों की फटकार सुन चुकी है । इसके अलावा हाल में नेता विपक्ष की गंभीर आपत्ति के बावजूद सी.वी.सी. (चीफ विजिलेंस कमिशनर) के पद पर आरोपों के घेरे में रहे पी.जे. थॉमस की नियुक्ति पर भी सवाल उठे हैं और शीर्ष अदालत ने भी तद्विषयक जानकारी मांगी । मामला गंभीर इसलिए भी है कि यह नियुक्ति तीन-सदस्यीय समिति द्वारा की जाती है जिसमें प्रधानमंत्री, गृहमंत्री एवं नेता विपक्ष शामिल रहते हैं । प्रथम दो की सहमति बहुत माने नहीं रखती है, क्योंकि दोनों ही सरकार की तरफ से होते हैं । आम सहमति को महत्त्व देने वाली सरकार ने इस मौके पर ‘हमारी मर्जी’ वाला रवैया क्यों अपनाया?

आजकल देश की राजनीति में एक नये शब्द, ‘गठबंधन धर्म’, का धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है । किस वेद-पुराण-कुरान-बाइबिल में जिक्र है इसका? सरकार एक दल की हो या मिलकर बहुतों की, उसका मौलिक कर्तव्य है राष्ट्र के हितों को साधना । स्वच्छ शासकीय व्यवस्था प्रदान करना सभी दलों का सामूहिक दायित्व है । सबने मिलकर चलानी होती है सरकार । किंतु गठबंधन के नाम पर इन दलों ने यह तस्वीर पेश की है कि सरकार तो कांग्रेस की है, और जब तक वह हमको मनमानी की छूट दे तब तक उसे चलने देंगे, अन्यथा नहीं । गोया कि सरकार गिरेगी तो कांग्रेस की, उनकी नहीं । कैसा गठबंधन है ये जहां कांग्रेस दल का भयदोहन (ब्लैकमेलिंग) छोटे दलों द्वारा किया जा रहा है । प्रधानमंत्री की गलती/कमजोरी यह है कि उन्होंने भयदोहन की इस अपसंस्कृति को आगे बढ़ने दिया है । वे इतनी हिम्मत नहीं दिखा सके कि देशहित के विरुद्ध मनमर्जी की छूट किसी को नहीं है और सरकार का अस्तित्व बचाए रखना अकेले उनका नहीं सभी की जिम्मेदारी है । उन्होंने दो टूक शब्दों में स्पष्ट कहना चाहिए था कि भयदोहन की राजनीति नहीं चलेगी, भले ही गठबंधन टूट जाय ।

मेरा सोचना है कि भ्रष्टाचार-मुक्त शासन प्रदान करने के मामले में डा. मनमोहन सिंह की दिलचस्पी नहीं रही है । भगवान भरोसे देश चल रहा है यही काफी है ।

कुल मिलाकर मेरी धारणा मौजूदा प्रधानमंत्री के प्रति नकारात्मक है । देश के अंदरूनी हालातों के मामले में वे असफल लगते हैं । प्रधानमंत्री पद पर तो गैरकांग्रेसी नेता भी बैठे, लेकिन उनकी सरकारें बरसाती नालों की तरह अस्तित्व में आईं और गयीं । केंद्र में तो अभी तक अकेले या मिलकर कांग्रेस की सरकारें ही रहीं, सिवा एक बार की बाजपेई सरकार के (1998-2004) । अतः देश के हालातों के लिए कांग्रेस ही मुख्यतः जिम्मेदार कही जाएगी – योगेन्द्र

विंस्टन चर्चिल, भारत की स्वाधीनता, लोकतंत्र और …(भाग 2)

(23 अगस्त की पोस्ट का पूरक अंश)

“Democracy without self-control and restraint turns into anarchy. Discipline is the very essence of democracy.”
– Jawaharlal Nehru (Speech, Pune, 26 July 1939)

मेरे अनुभव

अपने प्राथमिक विद्यालय के दिनों (1952-7) की बातें याद करते हुए मुझे आज के हालातों को देख निराशा होती है । अपनी अल्पशिक्षित मां से मैंने महारानी विक्टोरिया (1819-1901)
और उनके राजकाज की तारीफ सुनी थी । मां का तो विक्टोरिया-काल में जन्म भी नहीं हुआ था । अवश्य ही उन्होंने अपने बुजुर्गों से कुछ सुना होगा । अंग्रेजी राज की प्रशंसा में वह कहती थीं कि कहीं कोई चोरी नहीं होती थी, पुलिस अपना काम मुस्तैदी से करती थी, घूसखोरी जैसी चीजें नहीं थीं, इत्यादि । ये बातें चर्चिल द्वारा कहे गये कथन (देखें पिछली पोस्ट) के अनुरूप थीं कि अंग्रेज अधिकारियों को वेतन के अलावा ऊपरी आमदनी से बचने की सख्त हिदायत है । मेरे बचपन के दिनों में लोगों के घरों में ताले नहीं लगते थे; दरवाजे पर सांकल-सिटकनी लगती थी । लेकिन जब दूर-दराज से चोरी जैसी घटनाओं की बातें सुनने को मिलने लगी थीं । परिचितों-आगंतुकों के साथ मां की बातों में मुझे सुनने को मिलता था कि फलां-फलां घूस लेने लगा है । फलां इंजीनियर/ओवरसियर ऊपरी आमदनी करता है, इत्यादि । साथ ही वे देश की आजादी की बात पर भी खुश थीं । आज लगता है कि दोनों बातों में एक विरोधाभास था । आज के हालात देखकर मुझे लगता है कि मेरी मां को आजादी की खुशी के साथ यह एहसास होने लगा होगा कि शासन-प्रशासन का स्तर गिरने जा रहा है, जिसकी शंका विंस्टन चर्चिल ने जताई थी ।

मैंने साधारण विद्यालयों में शिक्षा पाई थी, किंतु मैं निःसंकोच कह सकता हूं कि मेरे उन सभी विद्यालयों में पढ़ाई होती थी । अध्यापक नदारत नहीं रहते थे । मैं समझता हूं कि उस जमाने के अधिकतर लोग सरकारी/अनुदानप्राप्त स्कूलों में ही शिक्षित हुए थे । आज की तरह अंग्रेजी स्कूलों की भरमार तब नहीं थी । आज हालत यह है कि सरकारी स्कूली व्यवस्था ध्वस्त-सी हो चुकी है । स्तरीय शिक्षा पर अब निजी संस्थानों का कब्जा हो चुका है । उन दिनों नकल के किस्से भी इक्के-दुक्के ही होते थे ओर फर्जीवाड़ा नाममात्र को । लेकिन अब सर्वत्र फर्जी काम तथा नकल का बोलबाला है । एक अध्यापक के नाते मैंने महसूस किया है कि तब की तुलना में अधिकतर सरकारी विद्यालयों का स्तर काफी गिर चुका है, भले ही कंप्यूटरों का प्रयोग हो रहा हो ।

दुर्भाग्य से ऐसी गिरावट हर क्षेत्र में देखने को मिल रही है । मैं पुराने दिनों को याद करता हूं । रेलगाड़ियां आज की तरह 15-20 घंटे लेट नहीं होती थीं, उनमें लूटपाट के किस्से कम ही सुनने को मिलते थे, दुर्घटनाएं आज की तरह आम बातें नहीं थीं और जो होती थीं तो उन पर तहलका मच जाता था, इत्यादि । बिमारी में लोग आम सरकारी अस्पतालों में ही जाते थे । लेकिन आज हालत यह है कि मेरे कार्यस्थल रहे विश्वविद्यालय के कर्मचारी तक वि.वि. का बड़ा अस्पताल छोड़ निजी अस्पतालों का रूख करने लगे हैं । पहले बिजली सब जगह नहीं थी, किंतु जहां थी भरोसेमंद थी । आज कब जाएगी और कब आयेगी कहना मुश्किल है । कम से कम अपने उत्तर प्रदेश के हाल तो ऐसे ही हैं । पहले सड़कें कई-कई साल तक चलती थीं, लेकिन आजकल एक ही बरसात में धुल जाती हैं । सड़कों के किनारे गंदगी के ढेर आज की तरह पहले नहीं दिखते थे, और न ही नालियां इस कदर बदबदाती थीं ।

क्या-क्या बयां करूं ? देश के हालात किस गिरावट पर हैं, इसका अंदाजा आप राजधानी दिल्ली और वहां आयोजित होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के इंतजाम से लगा सकते हैं । इतना कहना काफी है ।

बेमानी हो चुकी आजादी

कैसी आजादी ?”, “हमारी आजादी आधी-अधूरी है ।” जैसे कथन अब आम हो चुके हैं । 15-20 साल पहले तक ऐसे वाक्य नहीं सुने जाते हैं । ऐसा लगता है कि आम जन का आजादी से मोहभंग होने लगा है । जनप्रतिनिधियों के प्रति उनका विश्वास उठ रहा है । क्यों ?

कई लोग अब यह मानने लगे हैं कि यह देश इंडिया एवं भारत में विभक्त हो चुका है । इंडिया प्रगति पथ पर, विकास के फलों को भोग रहे लोगों की अपनी दुनिया, जो शरीर से तो इस भूभाग के हैं, लेकिन मन से ‘अंग्रेज’ हो चुके हैं । उनके तौर-तरीके, रहन-सहन, भाषा आदि अब विदेशी हो रहे हैं । यूं कहें कि इंडिया का अमेरिकीकरण/अंग्रेजीकरण का दौर चल चुका है । और भारत ? पारंपरिक जड़ताओं एवं अंधविश्वासों में पड़े हुए और गरीबी से जूझते लोग । प्राकृतिक आपदाएं, बिमारियां, कुपोषण, भूख, अशिक्षा, आदि सब उनके हिस्से में हैं । उनके नाम पर सरकारी रुपये-पैसे की लूट इंडिया में मची है । शासन इंडिया का चलता है । पुलिस के लोग सरकार के बधुंआ मजदूर बनकर रह गए हैं । सरकारों को मनमर्जी निर्णय लेने का अधिकार है । जिसने विरोध किया उस पर पुलिस से डंडे बरसा दिये । जितनी निरंकुश, असंवेदन एवं क्रूर आज की पुलिस है, उतनी परतंत्र भारत में भी नहीं रही होगी ।

अपने को जनप्रतिनिधि कहने वाले लोग अपनी स्वार्थसिद्धि में किसी भी सीमा तक जा सकते हैं । वे मनमर्जी के कोई भी निर्णय ले सकते हैं, किंतु कभी भी बेचारी जनता से नहीं पूछते कि वे निर्णय मान्य होंगे । विकास के नाम पर गरीबों से संसाधन छीन धनाड्यों को सौंप देना हमारे लोकतंत्र की खासियत है । सरकारों की प्राथमिकता का आधार समझ से परे है । देख्एि एक तरफ राष्ट्रमंडल खेलों पर अरबों रुपया पानी की तरह बहाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ अनाज के गोदाम बनाने के लिए पैसे की कमी का रोना रोया जाता है । उत्तर प्रदेश सरकार को देखिए, कि मूर्तियों की स्थापना के लिए 900 करोड़ और बुंदेलखंड के विकास के लिए मात्र 10 करोड़, जैसा सुनने में आता है । गरीबों के सेवक होने का नाटक रचने वाले जनप्रतिनिधियों के आंसुओं को देखिए, कहते हैं कि हम खुद ही अपनी तनख्वाह 80 हजार कर दें ताकि भत्तों और सुविधाओं को मिला डेढ़े-दो लाख पाने लगें । यह मांग उस देश में उठती है जहां के चौथाई परिवारों की कुल आमदनी 5 हजार माहवारी भी नहीं हो पाती है । अंधेर नगरी चौपट राजा की तर्ज पर सरकारें चल रही हैं । क्या ऐसी ही सरकारों के लिए आजादी का सपना देखा गया था ?

राष्ट्र की प्रगति का अर्थ

किसी राष्ट्र के लिए 63 साल का समय बहुत बड़ा तो नहीं होता, लेकिन यह इतना छोटा भी नहीं कि निराशाजनक हालात बने रहें । विश्व के कई देशों में प्रगति का दौर पिछले 60-70 सालों में ही चला है, और वे हमसे कहीं आगे निकल गये । यह समय इतना बड़ा तो था ही कि जनता की साक्षरता, दो वक्त के भोजन, कुपोषण से मुक्ति, बराबरी का दर्जा, आदि का इंतजाम हो सके । ऐसा करना कौन चाहता था ?

याद रखें कि कोई भी राष्ट्र छः-आठ लेन की सड़कों, गगनचुंबी इमारतों, कारों, टीवी, फ्रिजों, सेलफोनों जैसे उपभोक्ता वस्तुओं की प्रचुरता, आदि से नहीं बनता है । भौतिक साधन-संसाधन का अपना महत्त्व है अवश्य, किंतु वे राष्ट्र को परिभाषित नहीं करते । राष्ट्र बनता है वहां के निवासियों से । निवासियों का चरित्र कैसा है, देश और समाज के प्रति वे कितने समर्पित हैं, साथी नागरिकों के साथ उनका कैसा व्यवहार है, कायदे-कानूनों को कितना सम्मान देते हैं, अपने कर्तव्यों का वे निर्वाह करते हैं कि नहीं, इत्यादि बातें हैं जो राष्ट्र को महान या निम्न कोटि का बनाते हैं । हमें अपनी स्वतंत्रता की अर्थवत्ता का आकलन इन्हीं कसौटियों के सापेक्ष करना चाहिए ।

पिछले कुछ समय से अपनी सरकारें देशवासियों को यह कहकर भ्रमित करती आ रही हैं कि 8-10% की आर्थिक विकास दर से आगे बढ़ रहे हैं और निकट भविष्य में हम विश्व की सबसे बड़ी – कदाचित् तीसरी-चौथी – महाशक्ति बनने जा रहे हैं । मुझे शंका होती है कि प्रगति का यह गुब्बारा भविष्य में कहीं ध्वस्त न हो जाए । माना कि आर्थिक प्रगति है और चामत्कारिक है, तो क्या इससे हमारी सामाजिक समस्याएं सुलझ जाएंगी ? क्या आर्थिक विकास से लोग बेहतर नागरिक बन जाएंगे, प्रशासन कार्यकुशल संवेदनशील हो जाएगा, देश से भ्रष्टाचार मिट जाएगा, न्यायिक व्यवस्था उत्तम एवं भरोसेमंद हो जाएगी, समाज के सर्वाधिक जरूरतमंद को रोटी-कपड़ा मिल जाएगा, सामुदायिक जनसुविधाएं बढ़ जाएंगी । जी नहीं, आर्थिक विकास का इन सबसे कोई सीधा रिश्ता नहीं है । इन सबको पाने के लिए चाहिए व्यवस्था में सुधार । व्यवस्था अच्छी है तो आर्थिक विकास के लाभ देश भर को मिल सकते हैं, अन्यथा इससे धनवान् अधिक धनी तो बन जाएगा, लेकिन की भूखे का पेट नहीं भरने का ।

कोई मुझसे पूछे कि इन दो विकल्पों से क्या चुनोगेः (1) 12-13%: का आर्थिक विकास दर के साथ दुनिया के सर्वाधिक धनी, संख्या एवं संपदा में, यहीं देखने को मिलने लगें और साथ ही भूखे पेट सोने को मजबूर लोग भी यहीं हों, और (2) मात्र 4-5% की दर से विकास हो, जिससे कोई भी अतिशय धनाड्य न बन पाए, लेकिन किसी को भूखा भी न रहना पड़े ? तो मैं विकल्प (2) को चुनूंगा ।

देश की स्वाधीनता की सार्थकता और लोकतंत्र की सफलता का आकलन करते समय आप इन प्रश्नों पर विचार करें:-
1 – क्या हमारी लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था उत्तरोत्तर सुधरती जा रही है? क्या हम स्वतंत्रता के साथ पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था को त्वरित गति से बदलकर नया रूप दे पाये हैं ? क्या यह सच नहीं है कि आज भी हम परतंत्र काल के कानूनों को ढो रहे हैं ?
2 – क्या हमारे जनप्रतिनिधि जनता के हितों के प्रति अधिकाधिक समर्पित होते जा रहे हैं ? क्या वे समाज के समक्ष अपने व्यवहार से अनुकरणीय उदाहरण पेश करते आये हैं ? उनकी संपदा सत्तासीन होने पर तेजी से नहीं बढ़ने लगती है क्या ?
3 – क्या धूमिल अथवा संदेहास्पद छवि वाले लोगों की संख्या राजनीतिक दलों में बढ़ रही है ? क्या इन दलों में आंतरिक लोकतंत्र है ? अथवा दलों के सदस्य अपने मुखिया के मनोभावों को पढ़ते हुए ‘यस मिनिस्टर’ की तर्ज पर अपना मत व्यक्त करते हैं ?
4 – क्या देश की राजनीति एक संवेदनशील एवं कार्यकुशल प्रशासन स्थापित कर सकी है ? क्या हमारा पुलिसबल आम आदमी की सहायता के लिए तत्पर रहता है ? क्या किसी राजनीतिक दल ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के सार्थक प्रयास किये हैं ? कितने उच्चपदस्थ भ्रष्टाचारियों को आज तक दंडित किया गया है ?
5 – क्या देश में एकसमान छोड़ दोहरी शिक्षा व्यवस्था नहीं चल रही है ? क्या हमारा राजकाज उस भाषा में नहीं चल रहा है जिसे 10% देशवासी भी नहीं समझ पाते हैं ?
6 – क्या हमारी न्याय-व्यवस्था लचर और कछुए की गति से नहीं चल रही है ? कितने लोग हैं जो भरोसा कर पाते हैं कि न्याय मिलेगा और वह भी समय पर ?
7 – बीते 63 सालों में क्या हम जनसंख्या पर नियंत्रण कर सके हैं, या उसे भगवान् भरोसे नहीं छोड़ चुके हैं ? क्या लोगों में राष्ट्रभावना जगा पाये हैं ? क्या जातीयता, धार्मिकता एवं क्षेत्रीयता की संकुचित भावना से उबर सके हैं ? या उसमें डूब रहे हैं ?

ऐसे अनेकों सवाल हैं जो पूछे जा सकते हैं । मैं इन पर विचार करता हूं तो सिर भन्ना जाता हैं । सब कुछ भगवान् भरोसे है यह मैं नहीं कई लोग कहते हैं ।

कुल मिलाकर लगता है कि स्वाधीनता से कुछ खास हासिल हुआ नहीं । सड़क पर कूड़ा बीनने वाला बच्चा पहले भी बीन रहा था, आज भी बीन रहा है, और कल भी बीनेगा । मेरी नजर में देश चरित्रहीनता, बेशर्मी, अनुशासनहीनता और अबाधित भ्रष्टाचार के दौर से गुजर रहा है । इन बातों की शंका विंस्टन चर्चिल ने जताई थी । (देखें कल की पोस्ट) – योगेन्द्र जोशी

और चलते-चलते इस समाचार (लिंक) पर नजर डालें:-
http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2010/07/100707_china_death_va.shtml

(लोकतंत्र की व्यथाकथा, पांच:) मतदान करना अधिकार है, बाध्यता नहीं

मैं समाचार माध्यमों पर सुनता आ रहा हूं कि लोगों को मतदान करने का लोकतांत्रिक अधिकार मिला है, जिसका उपयोग करते हुए उन्हें अधिकाधिक संख्या में वोट डालना चाहिए । यह भी सुनता हूं कि उन्हें साफ-सुथरे और ईमानदार प्रत्याशी को वोट देना चाहिए । क्या पहचान है अच्छे प्रत्याशी की और कहां से लायें ऐसा व्यक्ति इस बात पर मैं अभी बहस नहीं करने जा रहा हूं । मैं यह जानना चाहता हूं कि यदि आप किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करना चाहें, और ऐसा करने के आपके ठोस कारण होंगे ही, तब आप क्या करेंगे ।

जब ‘हमें वोट डालने का अधिकार मिला है’ जैसी बात कही जाती है तो इसके यह अर्थ कदापि नहीं कि मतदान करना आपकी बाध्यता या अनिवार्यता है । अधिकार का अर्थ है आप स्वतंत्र निर्णय ले सकते हैं किसी के भी पक्ष में । परंतु किसी के पक्ष में खड़ा न होने का विकल्प भी इस अधिकार में निहित है । इसमें किसी को वोट देने की वाध्यता नहीं है । मैंने इस अधिकार में निहित विकल्पों के मद्देनजर ही किसी को भी वोट न देने का निर्णय लिया है, क्योंकि मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था से मेरा मोहभंग हो चुका है । वस्तुतः ऐसा में पिछले दो-एक चुनावी ‘पर्वों’ से कर रहा हूं । ऐसा करने के मेरे खास कारण हैं, जिनकी विस्तार से चर्चा मैं करूंगा भी, भविष्य में । अभी यह बता दूं कि मैं बीस-पच्चीस वर्षों से मतदान करता आया हूं और वह भी पूरे उत्साह से । लेकिन मैं देख रहा हूं कि अपने देश की राजनीति में लगातार गिरावट आती जा रही है । एक विशेषज्ञ की भांति मैं राजनीति की बात नहीं कर सकता, किंतु उस विषय पर बिल्कुल भी समझ नहीं रखता ऐसा भी नहीं है । देश में क्या चल रहा है इसे तो मैं कोई चालीस साल से देख ही रहा हूं । अपने अनुभवों और आकलनों पर ही मेरा निर्णय आधारित है, सोच-समझकर लिया गया निर्णय । मेरा विचार किसी के कहने, बहलाने या भ्रमित करने पर आधारित नहीं है । हां, इस निर्णय का कार्यान्वयन कैसे हो यह मेरे लिए अवश्य एक समस्या थी और है । शेष के लिए यहां >> क्लिक करें

(लोकतंत्र की व्यथाकथा, चारः) लोकतांत्रिक ढांचा, भावना नहीं

(१० फरवरी, २००९ की पोस्ट से आगे) लोकतांत्रिक शासन-पद्धति की शुरुआत निःसंदेह मतदान से होती है । हमारे देश में वयस्क लोगों को मतदान करने का अधिकार है और निर्वाचन आयोग यथासंभव ईमानदारी से प्रयास करता है कि हर व्यक्ति अपने मताधिकार का प्रयोग निर्भय होकर कर सके । यह भी सच है कि लोग मतदान करते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या वे इस अधिकार का सोच-समझ कर इस्तेमाल करते हैं । क्या उन्हें इस बात की ठीक-ठीक समझ है कि उन्हें किस व्यक्ति के पक्ष में मत डालना चाहिए और वह किस आधार पर ? मैं यही अनुभव करता हूं कि लोग वोट डालते अवश्य हैं, किंतु सही निर्णय नहीं लेते हैं । या यूं कहिये कि वे सही निर्णय ले नहीं सकते हैं । इस बात को मैं अधिक स्पष्ट करूंगा, परंतु उससे पहले यह सवाल कि क्या मतदान प्रक्रिया का निर्विघ्न संपन्न हो जाना और मतदाता का निर्वाचन स्थल से संतुष्ट होकर लौटना ही सफल लोकतंत्र की पहचान है । क्या उसके बाद पांच वर्ष तक जो शासन चले उसकी गुणवत्ता का कोई मतलब नहीं ? उस पूरे अंतराल में जनप्रतिनिधियों का आचरण क्या रहा, उन्होंने अपने निजी हितों के ऊपर आम आदमी के हितों को तवज्जू दी कि नहीं, शासकीय व्यवस्था ने समाज के किस वर्ग को सर्वाधिक महत्त्व दिया, लोकतंत्र के कर्णधारों ने कुशल, ईमानदार तथा संवेदनशील प्रशासन स्थापित किया या नहीं आदि ऐसे सवाल हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती है । यदि इनके उत्तर संतोषप्रद न रहे हों अथवा नकारात्मक रहे हों तो हमें स्वीकार लेना चाहिए कि लोकतंत्र सफल नहीं हो पाया । तब क्षण भर ठहरकर पूरी पद्धति की समीक्षा करनी चाहिए और तदनुसार सुधार की पहल करनी चाहिए । कौन करेगा सुधार, कौन लायेगा परिवर्तन ? यदि असफलता दिखती है तो उसके लिए किसे जिम्मेदार कहा जायेगा इसका स्पष्ट उत्तर दिया जाना चाहिए । क्या यह सब कारगर तरीके से हो रहा है ?

निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी मतदान की प्रक्रिया के आरंभ से उसके समापन तक ही सीमित है । उसके आगे शेष कार्य तो राजनेताओं पर निर्भर करता है जिन्हें चुना जाता है और जिनको विधायिका का दायित्व निभाना होता है । जनता की प्रत्यक्ष भूमिका तो मतदान-प्रक्रिया के दौरान के कुछेक दिनों की होती है, उसके बाद सब कुछ राजनेताओं के हाथ में रहता है । जनता का तो फिर पांच वर्ष तक उन पर कोई नियंत्रण ही नहीं होता । नियंत्रण तो दूर की बात, उनसे सामान्य संवाद तक नहीं हो पाता । तब अगर वे जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य न करें, बल्कि अपनी मनमर्जी से चलें तो क्या लोकतंत्र सफल कहा जायेगा ? यदि किसी व्यक्ति को ऐसी व्यवस्था अस्वीकार्य लगे तो क्या उसे मतदान करते रहना चाहिए ? ऐसे लोकतंत्र के विरुद्ध अपनी भावना वह कैसे व्यक्त करे ? मुझे मतदान न करने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा नजर नहीं आता । मौजूदा व्यवस्था में ‘मैं किसी को भी वोट नहीं देना चाहता हूं’ इस आशय का विकल्प चुनावों में हमारे यहां उपलब्ध ही नहीं है । अतः असंतोष अनुभव करने पर मतदान से विरत रहने का मैं पक्षधर हूं । जो संतुष्ट हो उसके मतदान का अवश्य अर्थ है । शेष के लिए यहां क्लिक करें >>

(लोकतंत्र की व्यथाकथा, दो:) अपना जनतंत्र बड़ा किंतु महान् नहीं

पिछली पोस्ट (९ जनवरी) में मैंने इस बात का जिक्र किया था कि विगत कुछ समय से मैंने देश के चुनावों में मतदान करना बंद कर दिया । जब भी मैं अपने इस निर्णय की बात मित्रों-परिचितों आदि से करता हूं तो यह टिप्पणी सुननी पड़ती है कि इससे समस्याओं, यदि कोई हों, का समाधान नहीं हो सकता है । यह तो नितांत नकारात्मक सोच है । मुझसे पूछा जाता है कि अगर लोग ऐसे ही चुनावों से विरत होने लगें तो भला हमारे लोकतंत्र का क्या होगा । मेरा मानना यह है कि यही तो नहीं होने जा रहा है । मुझ जैसे कितने लोग होंगे जो सोचे-समझे कारणों से मत न डालने की ठाने हों ? और यदि सच में लोग मतदान में भाग न लें तो हो सकता है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था सुधर जाये । मैं यह मानता हूं कि लोकतंत्र का मौजूदा मॉडल मेरी दृष्टि में असफल हो रहा है, इसीलिए मैं वोट नहीं डालता । इसमें उत्तरोत्तर सुधार होने के बजाय गिरावट आ रही है ।हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा जनतंत्र है ऐसा दावा हम करते रहते हैं । यह बात सच भी है और बड़ा होना हमारी विवशता भी है । हमारे बड़े जनतंत्र होने का श्रेय हमारी अनियंत्रित जनसंख्या है । यदि चीन में लोकतांत्रिक शासन पद्धति होती तो हम दूसरे नंबर पर होते । पर ऐसा है नहीं और मजबूरन पहले नंबर पर हैं हम, लगातार बढ़ रही जनसंख्या के कारण । यह मानना पड़ेगा कि हम बड़े भले ही हों किंतु महान् नहीं हैं । महान् कहलाने के लिए जनसंख्या नहीं लोकतांत्रिक मूल्य, उनके प्रति सम्मान और संविधान में लिखित दिशानिदेशक सिद्धांतों की अनुरूप लक्ष्य प्राप्ति होती है, वह संविधान जिसके लिए दावा किया जाता है कि तमाम अन्य देशों के संविधानों से निकाले गये निचोड़ पर उसे लिखा गया है । इन सब बातों में हम कितना सफल हो पाये हैं ? हमारे जनतंत्र को साठ वर्ष होने जा रहे हैं, और इतना समय किसी राष्ट्र के लिए बहुत अधिक भले न हो, किंतु कम भी नहीं है । इस काल में दो पीढ़ियां गुजर चुकी हैं; और इतने समय में सबसे निचले पायदान पर खड़े समाज के कमजोर वर्ग का शैक्षिक, आर्थिक तथा सामाजिक उत्थान हो चुका होता । संबंधित सभी क्षेत्रों में व्याप्त विसंगतियां घट चुकी होतीं । किंतु विसंगतियां घटने के बजाय बढ़ती जा रही हैं । इन सब बातों की विस्तार से चर्चा की जरूरत है, और मैं वह करूंगा भी, आगामी आलेखों में ।

यहां इतना ही कहना है कि हम विफल रहे हैं । देश ने चंद्रमा की सतह पर चंद्रयान उतार दिया, नाभिकीय विस्फोट में सफलता अर्जित कर ली, उल्लेखनीय आर्थिक विकास दर हासिल कर ली, आदि आदि । परंतु याद रखा जाना चाहिए कि आंकड़े असली तस्वीर नहीं बताते हैं, और बहुधा वे कृत्रिम भी होते हैं दूसरों को प्रभावित करने के लिए । हकीकत के लिए आसमान की ओर नहीं अपने पास की जमींन पर नजर डालनी होती है । आंकड़े तो यह भी कहेंगे कि देश में साक्षरता बढ़ी है, लेकिन यह नहीं बताते कि जिन बच्चों के लिए दावा किया जाता है कि वे प्राथमिक शिक्षा पा चुके हैं उनमें से तो कई अपना नाम तक ठीक से नहीं लिख सकते, पढ़-लिख पाने की बात ही छोड़िये । आंकड़े तो यह भी कहते हैं कि चीन के बाद अपना देश ही है जो आठ-आठ नौ-नौ फीसदी की रफ्तार से प्रगति कर रहा है । परंतु यह कोई नहीं बताता कि देश में एक वक्त के खाने को भी कइयों के पास अनाज नहीं है, भले ही दुनिया के सबसे रईसों में अपने देशवासी भी अच्छी-खासी संख्या में शुमार हों । ऐसी ढेरों बातें हैं जो हमारे जनतंत्र में व्याप्त विसंगतियां दर्शाती हैं । कुल मिलाकर अपनी मौजूदा शासन प्रणाली विफल चल रही है ।

ध्यान दें कि सफल जनतंत्र के लिए इतना पर्याप्त नहीं कि अपने यहां हर वयस्क नागरिक को मताधिकार मिला है और वह निर्भय होकर मत डालता भी है । (कितना सच है यह कहना मुश्किल है, फिर भी मान लेता हूं ।) यह तो शासन व्यवस्था की शुरुआत भर है, उसके बाद तो असली काम बचता है । अपने जनप्रतिनिधिगण तत्पश्चात् का अपना कर्तव्य कितने कारगर तरीके से निभाते हैं इस बात के आधार पर ही जनतंत्र का गुणात्मक मूल्यांकन किया जा सकता है । बाद की कहानी संतोषप्रद नहीं है ।

अभी यहीं पर रुकता हूं, शेष बातें बिंदुवार अगली पोस्टों में । – योगेन्द्र

कितना फ़र्क़ है अमेरिकी एवं हिंदुस्तानी ‘डिमॉक्रेसी’ में?

पिछली पोस्ट (16 अक्टूबर, 2008: बराक ओबामा, अमेरिकी डिमॉक्रेसी और हिंदुस्तानी लोकतंत्र) में मैंने इसी सप्ताह संपन्न हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की संक्षिप्त चर्चा के साथ अमेरिकी तथा अपने देश की लोकतांत्रिक सोच के अंतर के बारे कुछ टिप्पणियां आरंभ की थीं । आगे प्रस्तुत है उन्हीं के शेष अंश ।

कितने राजनैतिक दल हैं अपने यहां जिनमें आंतरिक लोकतंत्र है । अधिकांशतः सभी एक व्यक्ति की ‘फलां एवं कंपनी’ से अधिक नहीं हैं, जो जब तक चाहे शीर्ष की ‘राजगद्दी’ पर आसीन रहेगा और आवश्यक हुआ तो अपनी संतान की बाकायदा ताजपोशी कर डालेगा । अन्य सब स्वयं उपकृत-से महसूस करते हुए खुशी का इजहार करने लगते हैं । क्या मजाल कि कोई चूं भी कर दे । हो किसी को आपत्ति तो दल से निकलकर अपनी अलग ‘कंपनी’ बना डाले । दल में रहना हो तो ’हाइकमांड’ के वर्चस्व तथा आदेश मानने ही पड़ेंगे । क्या यही है हमारे लोकतंत्र की उपलब्धि ?  (आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें >>)