निर्वाचन आयोग की दोषपूर्ण कार्यशैली और दोहरे मतदान की संभावना

[इस आलेख में उल्लिखित चुनाव संबंधी अनुभव का कथा रूपांतर अन्यत्र प्रस्तुत किया गया है ।]

हाल में संपन्न लोकसभा चुनावों में वाराणसी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का विशेष महत्व रहा है, क्योंकि यहां से भाजपा के बहुचर्चित प्रत्याशी और देश के भावी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनाव लड़ रहे थे और उनको चुनौती दे रहे थे आप पार्टी के नवोदित राजनेता अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस के अजय राय, सपा के कैलाश चौरसिया, तथा बसपा के विजय जायसवाल । वैसे मैदान में कुल 42प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे थे जिनमें अधिकतर वे थे जिनका नाम पहले कभी न सुना गया था और न चुनाव के बाद ही सुना गया । अज्ञात श्रेणी के ऐसे प्रत्याशी चुनाव क्यों लड़ते होंगे यह मेरी समझ मैं कभी नहीं आया । ऐसे प्रत्याशियों का योगदान चुनाव प्रक्रिया को पेचीदा बनाने के अलावा कुछ भी रचनात्मक रहता होगा यह मैं नहीं सोच सकता । वाराणसी में प्रत्याशियों की इतनी बड़ी संख्या के लिए हर निर्वाचन स्थल पर तीन-तीन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की व्यवस्था करनी पड़ी थी । ज्ञातव्य है कि एक वोटिंग मशीन में केवल 16बटनों का प्रावधान रहता है । मैं समझता हूं कि  मतदाताओं को मशीन पर अपने मनपसंद प्रत्याशी का नाम/चुनाव-चिह्न खोजने में अवश्य दिक्कत हुई होगी ।

सुना जाता है कि चेन्नै में भी 42प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे । अवश्य ही ऐसे “फिजूल”के प्रत्याशी चुनाव की गंभीरता का सम्मान नहीं करते और संविधान द्वारा प्रदत्त चुनाव लड़ने की आजादी का मखौल उड़ाते हैं । आयोग और देश की विधायिका को चाहिए कि ऐसे प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने से रोके जाने का रास्ता खोजें, अथवा उन्हें गंभीरता बरतने के लिए प्रेरित करें ।

इस बार “वीआईपी”चुनाव क्षेत्र का रुतवा हासिल कर चुके वाराणसी का मैं तथा मेरी पत्नी दशकों से मतदाता हैं । हम दोनों लंबे अर्से से अपने मतदान का प्रयोग करते आ रहे हैं । पिछले बारह-तेरह वर्षों से मैंने किसी के भी पक्ष में मतदान न करने की नीति अपना रखी है । (पत्नी अपना निर्णय स्वतंत्र रूप से लेती हैं !) मेरा मानना है कि अपने लोकतंत्र में छा चुके तमाम दोषों के लिए अपनी मौजूदा राजनैतिक जमात ही जिम्मेदार है । आप कभी एक को तो कभी दूसरे को मत देकर चुने गए जनप्रतिनिधि तो बदल सकते हैं, किंतु राजनैतिक बिरादरी का स्वरूप नहीं बदल सकते हैं । इसलिए चाहे मोदी आवें, या राहुल अथवा केजरीवाल, वस्तुस्थिति उल्लेखनीय तरीके से बदलने वाली नहीं है । मैं आमूलचूल बदलाव का हिमायती हूं । मुझे “नोटा”बटन में ही उम्मीद दिखती है, इसलिए उसी को इस्तेमाल करता हूं । अब तो नोटा बटन है, पहले उसके बदले एक फार्म (फॉर्म 17ए आयोग के नियम 49-ओ के अंतर्गत) भरना होता था ।

दो-दो मतदाता सूचियां

चुनाव में भाग लेने के लिए मतदान केंद्र पर पहुंचने पर पता चला कि वहां दो परस्पर भिन्न मतदाता सूचियों के अनुसार मतदान हो रहा है । हमें यह देख हैरानी हुई कि एक तरफ इन सूचियों से कुछ मतदाताओं के नाम गायब थे तो दूसरी तरफ कुछ के नाम दोनों में ही मौजूद थे । मतदान की प्रक्रिया दो कमरों संपन्न की जा रही थी – पहले कमरे में एक सूची तो दूसरे में  अगली सूची के अनुसार । साफ जाहिर में कि कुछ मतदाता दो बार मत दे सकते थे, बशर्ते कि वे उंगली पर लगाए गये निशान को मिटा सकें । हम दोनों का ही नाम सही फोटो के साथ दोनों सूचियों में मौजूद थे ।

मैंने तो पहली सूची के अनुसार मत दे दिया, लेकिन मेरी पत्नी को यह कहकर संबंधित मतकर्मियों ने लौटा दिया कि वे कालोनी की मतदाता होती थीं लेकिन स्थान छोड़ देने के कारण अब वह मतदाता नहीं रहीं । इसके लिए उन्होंने “विलोपित”श्रेणी का जिक्र किया । खैर पत्नी महोदया लाइन में लगकर दूसरे कमरे में मतदान कर आईं जहां मैं भी जा सकता था ।

यह हमारी समझ से परे था कि क्यों मेरी पत्नी “विलोपित”हो गईं जब कि मैं “विलोपित”नहीं हुआ । इससे अधिक अहम सवाल यह है कि हूबहू एक ही विवरण के साथ दो सूचियां कैसे बनाई गई थीं और क्यों इस्तेमाल हो रही थीं । मैं स्वयं देख चुका था कि मुझसे संबंधित विवरण दोनों में एकसमान था ।

दोहरा मतदान

मैं कह चुका हूं कि एक ही मतदाता का नाम दो-दो सूचियों में मौजूद होने पर दोहरे मतदान की गुंजाइश बनती है । इस बात का एहसास मुझे दूसरे दिन एक युवक से भेंट होने पर हुआ । उसने मुझे बताया कि वह एक बार पहली सूची के अनुसार वोट डालकर घर लौटा; पपीते की चेप से उसने उंगली पर लगा निशान मिटाया; और फिर दूसरी सूची के अनुसार वोट डाल आया । यह भी बता दूं कि वह किसी और मतदान केंद्र का मतदाता था । इसका मतलब यह हुआ कि दो-दो (या अधिक?) सूचियों का प्रयोग कई मतदान केंद्रों पर हो रहा था ।

मुझे शंका है कि चुनाव उतने साफ-सुथरे नहीं होते है जितना दावा किया जाता है । कहीं मतदाताओं के नाम ही गायब रहते हैं तो कहीं दोहरा मतदान भी कुछ लोग कर लेते हैं । निर्वाचन आयोग को इस संदर्भ में गंभीर कदम उठाने की जरूरत है । – योगेन्द्र जोशी

और अब ई.वी.एम. (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) पर हमला

एक-डेड़ माह पूर्व संपन्न चुनावों में पराजित दो-एक प्रत्याशियों ने अपनी हार का कारण इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को ठहरा दिया । हुआ यह था कि अहमियत रखने वाले कुछ राजनेता (जैसे माननीय चिदंबरम, श्रीमती मेनका गांधी) हारते-हारते जीत गये । मामूली अंतर से हार रहे इन नेताओं ने जब दुबारा मतगणना की मांग की थी और उनकी मांग मान ली गयी तो ये विजयी घोषित हो गये । परिणामों के इस प्रकार उलट जाने के कारण ही शायद कुछ प्रत्याशियों को ई.वी.एम. के प्रति शंका हो गयी होगी । रोचक तथ्य यह है कि मशीन पर लगाया गये उनके आरोपों को अन्य राजनेताओं ने नजरअंदाज करने के बजाय उस शंका के प्रति समर्थन देना आंरभ कर दिया । भाजपा के श्री आडवाणी और सीपीएम के श्री यचूरी आदि जैसे धुरंधर राजनेताओं ने एक बहस ही छेड़ दी है । क्रांग्रेस ने इस शंका को पूर्णतः निराधार कह दिया है । मुझे लगता है कि चुनाव में जिन प्रत्याशियों या दलों को अच्छे परिणाम मिले हैं वे चुप हैं, और नतीजे जिनके पक्ष में नहीं रहे उन्होंने बेचारे ई.वी.एम. पर ही दोष मढ़ना शुरू कर दिया है । अब सवाल यह है कि क्या ये मशीनें गड़बड़ करती हैं, कर सकती हैं ? मुझे अधोलिखित संभावनाएं नजर आती हैं:

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लोकतंत्र की व्यथाकथा, ग्यारह – निरर्थक अभियान ‘मतदान अवश्य करो’ का

आगामी लोकसभा के लिए आयोजित करीब एक मास के मतदान कार्यक्रम के बाद अंततः चुनाव प्रक्रिया का अंतिम चरण बीते 13 तारीख संपन्न हो ही गया । जनता जितनी भागीदारी निभाने के लिए अधिकृत थी उतनी उसने निभा ली, कुछ ने किसी प्रत्याशी के पक्ष में वोट देकर तो कुछ ने नकारात्मक मत व्यक्त करके । कुछ ने तो खुलकर बहिष्कार भी कर दिखाया और शेष ने उदासीनता व्यक्त करते हुए चुप बैठना ठीक समझा । अब सरकार किसकी बनेगी और कैसे बनेगी यह दो-चार दिनों में पता चल ही जायेगा । हो सकता है सरकार का गठन किसी भी दल के लिए औरों के ‘अवसरवाद-प्रेरित सहयोग’ के बावजूद आसान काम न हो । लेकिन अंत में जोड़-तोड़ में कोई न कोई तो सफल होगा ही ऐसी उम्मींद की जानी चाहिए । हां, इतना अवश्य है कि कोई भी सरकार आवे, वह पुराने घिसे-पिटे ढर्रे पर ही चलेगी, ‘किसी प्रकार से पांच साल खींचो और जैसे देश की गाड़ी आज तक चलती रही है वैसे चलाते रहे’ की तर्ज पर । देश की तस्वीर न कोई बदलने वाला है, और न किसी में वैसा करने का इरादा है, और न ही किसी में काबिलियत ही है । बस कुर्सी पर बैठने वाले चेहरे नये होंगे, ढर्रा नया नहीं होगा । अस्तु, अपने देशवासियों के प्रति मेरी शुभेच्छाएं ।

इस बार के चुनावों का एक दिलचस्प पहलू मेरी नजर में यह था कि मतदाताओं को वोट डालने के लिए प्रेरित करने हेतु विभिन्न संस्थाओं द्वारा अभियान चलाये गये । फिर भी मतदान प्रतिशत सर्वत्र संतोषप्रद रहा यह कहना ठीक नहीं होगा । ये अभियान मतदाताओं को मतकेंद्रों तक खींच ले जाने में किंचित् भी सफल हुए होंगे इसमें मुझे शंका है । मेरी दृष्टि में तो ये अर्थहीन प्रयास थे । मेरे इस विचार के आधार हैं । मैं समझ नहीं पाया कि किसी व्यक्ति को मतदान के दिन क्यों यह स्मरण दिलाना पड़ता है कि उसे वोट डालना है या डालना चाहिए । किसी व्यक्ति को याद कब दिलाना पड़ता है ? तभी न कि जब उसके ध्यान से कोई बात उतर गयी हो ? जैसे बाजार में खरीदारी करते वक्त किसी सामान का ध्यान न रहे । अपने मित्र से मिलने का वादा आपने किया हो और व्यस्तता के कारण ऐन मौके पर उसका खयाल ही न रहे । ऐसे कह कुछ मौके हो सकते हैं जब किसी को याद दिलाना पड़े । किंतु किसी अध्यापक को यह बताने जरूरत पड़े कि उसके छात्र कक्षा में प्रतीक्षारत हैं, या किसी चिकित्सक को ध्यान दिलाना पड़े कि उसे बहिरंग में पहुंचना है, या ऐसे ही किसी मामले में व्यक्ति को याद दिलाने की बात उठे तो ऐसा प्रयास हास्यास्पद कहा जायेगा । अपने दायित्व से बचने के ऐसे तमाम मामलों के पीछे के कारणों की गंभीर समीक्षा की जानी चाहिए । मतदान कार्यक्रम ऐसा नहीं कि कोई मतदान करना ही भूल जाये । टीवी चैनलों और अखबारों के संपर्क में जो हो उसे मतदान का ध्यान ही न रहे ऐसा सोचना बेमानी है । और जिस बेचारे की पहुंच इन माध्यमों तक हो ही न उसके लिए तो ये निःसंदेह निरर्थक कहे जायेंगे । तात्पर्य यह है कि बार-बार याद दिलाने की वाकई कोई अर्थवत्ता नहीं ।

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(लोकतंत्र की व्यथाकथा, पांच:) मतदान करना अधिकार है, बाध्यता नहीं

मैं समाचार माध्यमों पर सुनता आ रहा हूं कि लोगों को मतदान करने का लोकतांत्रिक अधिकार मिला है, जिसका उपयोग करते हुए उन्हें अधिकाधिक संख्या में वोट डालना चाहिए । यह भी सुनता हूं कि उन्हें साफ-सुथरे और ईमानदार प्रत्याशी को वोट देना चाहिए । क्या पहचान है अच्छे प्रत्याशी की और कहां से लायें ऐसा व्यक्ति इस बात पर मैं अभी बहस नहीं करने जा रहा हूं । मैं यह जानना चाहता हूं कि यदि आप किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करना चाहें, और ऐसा करने के आपके ठोस कारण होंगे ही, तब आप क्या करेंगे ।

जब ‘हमें वोट डालने का अधिकार मिला है’ जैसी बात कही जाती है तो इसके यह अर्थ कदापि नहीं कि मतदान करना आपकी बाध्यता या अनिवार्यता है । अधिकार का अर्थ है आप स्वतंत्र निर्णय ले सकते हैं किसी के भी पक्ष में । परंतु किसी के पक्ष में खड़ा न होने का विकल्प भी इस अधिकार में निहित है । इसमें किसी को वोट देने की वाध्यता नहीं है । मैंने इस अधिकार में निहित विकल्पों के मद्देनजर ही किसी को भी वोट न देने का निर्णय लिया है, क्योंकि मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था से मेरा मोहभंग हो चुका है । वस्तुतः ऐसा में पिछले दो-एक चुनावी ‘पर्वों’ से कर रहा हूं । ऐसा करने के मेरे खास कारण हैं, जिनकी विस्तार से चर्चा मैं करूंगा भी, भविष्य में । अभी यह बता दूं कि मैं बीस-पच्चीस वर्षों से मतदान करता आया हूं और वह भी पूरे उत्साह से । लेकिन मैं देख रहा हूं कि अपने देश की राजनीति में लगातार गिरावट आती जा रही है । एक विशेषज्ञ की भांति मैं राजनीति की बात नहीं कर सकता, किंतु उस विषय पर बिल्कुल भी समझ नहीं रखता ऐसा भी नहीं है । देश में क्या चल रहा है इसे तो मैं कोई चालीस साल से देख ही रहा हूं । अपने अनुभवों और आकलनों पर ही मेरा निर्णय आधारित है, सोच-समझकर लिया गया निर्णय । मेरा विचार किसी के कहने, बहलाने या भ्रमित करने पर आधारित नहीं है । हां, इस निर्णय का कार्यान्वयन कैसे हो यह मेरे लिए अवश्य एक समस्या थी और है । शेष के लिए यहां >> क्लिक करें

(लोकतंत्र की व्यथाकथा, चारः) लोकतांत्रिक ढांचा, भावना नहीं

(१० फरवरी, २००९ की पोस्ट से आगे) लोकतांत्रिक शासन-पद्धति की शुरुआत निःसंदेह मतदान से होती है । हमारे देश में वयस्क लोगों को मतदान करने का अधिकार है और निर्वाचन आयोग यथासंभव ईमानदारी से प्रयास करता है कि हर व्यक्ति अपने मताधिकार का प्रयोग निर्भय होकर कर सके । यह भी सच है कि लोग मतदान करते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या वे इस अधिकार का सोच-समझ कर इस्तेमाल करते हैं । क्या उन्हें इस बात की ठीक-ठीक समझ है कि उन्हें किस व्यक्ति के पक्ष में मत डालना चाहिए और वह किस आधार पर ? मैं यही अनुभव करता हूं कि लोग वोट डालते अवश्य हैं, किंतु सही निर्णय नहीं लेते हैं । या यूं कहिये कि वे सही निर्णय ले नहीं सकते हैं । इस बात को मैं अधिक स्पष्ट करूंगा, परंतु उससे पहले यह सवाल कि क्या मतदान प्रक्रिया का निर्विघ्न संपन्न हो जाना और मतदाता का निर्वाचन स्थल से संतुष्ट होकर लौटना ही सफल लोकतंत्र की पहचान है । क्या उसके बाद पांच वर्ष तक जो शासन चले उसकी गुणवत्ता का कोई मतलब नहीं ? उस पूरे अंतराल में जनप्रतिनिधियों का आचरण क्या रहा, उन्होंने अपने निजी हितों के ऊपर आम आदमी के हितों को तवज्जू दी कि नहीं, शासकीय व्यवस्था ने समाज के किस वर्ग को सर्वाधिक महत्त्व दिया, लोकतंत्र के कर्णधारों ने कुशल, ईमानदार तथा संवेदनशील प्रशासन स्थापित किया या नहीं आदि ऐसे सवाल हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती है । यदि इनके उत्तर संतोषप्रद न रहे हों अथवा नकारात्मक रहे हों तो हमें स्वीकार लेना चाहिए कि लोकतंत्र सफल नहीं हो पाया । तब क्षण भर ठहरकर पूरी पद्धति की समीक्षा करनी चाहिए और तदनुसार सुधार की पहल करनी चाहिए । कौन करेगा सुधार, कौन लायेगा परिवर्तन ? यदि असफलता दिखती है तो उसके लिए किसे जिम्मेदार कहा जायेगा इसका स्पष्ट उत्तर दिया जाना चाहिए । क्या यह सब कारगर तरीके से हो रहा है ?

निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी मतदान की प्रक्रिया के आरंभ से उसके समापन तक ही सीमित है । उसके आगे शेष कार्य तो राजनेताओं पर निर्भर करता है जिन्हें चुना जाता है और जिनको विधायिका का दायित्व निभाना होता है । जनता की प्रत्यक्ष भूमिका तो मतदान-प्रक्रिया के दौरान के कुछेक दिनों की होती है, उसके बाद सब कुछ राजनेताओं के हाथ में रहता है । जनता का तो फिर पांच वर्ष तक उन पर कोई नियंत्रण ही नहीं होता । नियंत्रण तो दूर की बात, उनसे सामान्य संवाद तक नहीं हो पाता । तब अगर वे जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य न करें, बल्कि अपनी मनमर्जी से चलें तो क्या लोकतंत्र सफल कहा जायेगा ? यदि किसी व्यक्ति को ऐसी व्यवस्था अस्वीकार्य लगे तो क्या उसे मतदान करते रहना चाहिए ? ऐसे लोकतंत्र के विरुद्ध अपनी भावना वह कैसे व्यक्त करे ? मुझे मतदान न करने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा नजर नहीं आता । मौजूदा व्यवस्था में ‘मैं किसी को भी वोट नहीं देना चाहता हूं’ इस आशय का विकल्प चुनावों में हमारे यहां उपलब्ध ही नहीं है । अतः असंतोष अनुभव करने पर मतदान से विरत रहने का मैं पक्षधर हूं । जो संतुष्ट हो उसके मतदान का अवश्य अर्थ है । शेष के लिए यहां क्लिक करें >>

(लोकतंत्र की व्यथाकथा, एक:) अब वोट नहीं डालता मैं

एक समय था जब मैं लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में सोत्साह मतदान करता था । मुझे ठीक-ठीक स्मरण नहीं कि मेरा नाम मतदाता सूची में कब सम्मिलित हुआ होगा । मेरा अनुमान है ढाई-तीन दशक पूर्व से मैं मतदान करता आया हूं । बर्षों पहले मतदान प्रक्रिया भरोसेमंद नहीं थी । मैं पाता था कि सूची में अपना नाम किसी वर्ष रहता था तो किसी वर्ष उससे गायब मिलता था । इससे बड़ी समस्या यह होती थी कि मतदान केंद्र पहुंचने पर पता चलता था कि मेरे नाम पर तो कोई अन्य व्यक्ति मतदान कर चुका है । उन दिनों ऐसा होना आम बात थी । अतः सावधानी बरतते हुए आरंभ में मतदान कर लेना ही सुरक्षित होता था ।

बाद के वर्षों में निर्वाचन आयोग में कई सुधार और परिवर्तन हुए, जिससे पूरी प्रक्रिया काफी हद तक साफ-सुथरी तथा भरोसेमंद होने लगी । परिवर्तन एवं सुधार का सिलसिला मेरे आकलन में निर्वाचन आयुक्त शेषन के कार्यकाल में सार्थक स्तर पर आरंभ हुआ और कमोबेश अभी चल रहा है । मेरे मत में हाल के वर्षों में मतदाता के लिए परिचय-पत्र या उसके तुल्य मान्य पहचान-पत्र की अनिवार्यता से और सुधार हुआ है तथा फर्जी मतदान के मामले काफी घट गये हैं । दूसरे के नाम पर मतदान के मामलों में अब तक पर्याप्त कमी आ चुकी होगी ऐसा मेरा सोचना है । ‘बूथ-कैप्चरिंग’ भी कम हो गयी है ।
मैं किसी भी राजनीतिक दल का पक्षधर नहीं रहा हूं । इस समय मैं इतना ही दावा कर सकता हूं कि अलग-अलग मौकों पर मैंने भिन्न-भिन्न दलों के प्रत्याशियों को मत दिया होगा । एक समय था जब मेरा झुकाव कुछ हद तक बीजेपी यानी भारतीय जनता पार्टी की ओर था । तब उस दल के नेता ‘पार्टी विद् अ डिफरंस’ का नारा गाते रहते थे । मैं समझता हूं कि उस काल में कई लोग मेरी ही भांति रहे होंगे जो उनके इस नारे से भ्रमित हुए होंगे । एक दो बार के चुनावों बाद मेरा उक्त दल से मोहभंग हो गया । मैंने कांग्रेस के प्रत्याशियों को भी कभी न कभी मत दिया होगा । ठीक-ठीक याद नहीं, फिर भी सोचता हूं कि सपा अर्थात् समाजवादी पार्टी के हक में भी कभी न कभी मत दिया ही होगा । इतना अवश्य है कि बसपा यानी बहुजन समाजवादी पार्टी मेरे लिए ‘अछूत’ बनी रही है और ऐसा अकारण नहीं है । ऐसा क्यों इस बारे में अभी नहीं पर बाद में अवश्य कुछ लिखूंगा ।

जैसे-जैसे अपने देश की जनतांत्रिक व्यवस्था का मेरा अनुभव बढ़ता गया, मुझे विश्वास होने लगा कि आप किसी भी दल के प्रति विश्वास जतायें कोई खास अंतर नहीं पड़ता । मैं नेहरु युग से भी परिचित रहा हूं, यद्यपि तब मतदाता सूची में मैं शामिल नहीं था । मुझे उन दिनों की राजनीतिक स्थिति का कुछ-कुछ अंदाजा है । इंदिरा युग तक मैं वयस्क हो चुका था । मैं स्व. लालबहादुर शास्त्री और गुलजारीलाल नंदा की कार्यशैली को आज भी पूरी तरह नहीं भूला हूं । उन दिनों से आज तक के अपने देश के राजनैतिक सफर पर जब मैं दृष्टि डालता हूं तो यही पाता हूं कि राजनीति में लगातार गिरावट आती गयी है और यह गिरावट रुकने वाली नहीं है । राजनेता स्वच्छंद, निरंकुश और अनुशासनविहीन होते जा रहे हैं । पूरे प्रशासनिक तंत्र को वे अपने हितों के अनुरूप ढालते जा रहे हैं । राजनीतिक दलों के न कोई सिद्धांत हैं और न ही उनकी कोई विश्वसनीयता । इन सब बातों के कारण मेरा मौजूदा चुनाव से ही मोहभंग हो चुका है ।

पिछले कुछ समय से मैंने चुनावों के प्रति नकारात्मक रवैया अख्तियार कर लिया है । हालिया समय में जब तक कागज के मतपत्रों का चलन था, मैंने जानबूझ कर अमान्य मत डालना शुरू कर दिया था, ताकि मेरे नाम पर कोई अन्य मतदान न कर सके और स्वयं मेरा नकारात्मक मत (negative vote) रहे । दुर्भाग्य से हमारी चुनावी प्रणाली में नकारात्मक मत की व्यवस्था नहीं है । फलतः अमान्य मत का सहारा ही मेरे सामने एक विकल्प रहा । अब जब से ‘इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन’ का चलन हो गया है, मेरे लिए स्थिति अधिक कठिन हो गयी है । अब एक बार आप मशीन पर पहुंचे और मतदान अधिकारी ने अपने हिस्से वाला उसका बटन दबाकर आपके वोट की प्रतीक्षा आरंभ कर दी, तो आप को स्वयं कोई न कोई बटन दबाना ही पड़ता है । आपको शेष प्रक्रिया संपन्न करनी ही पड़ती है, जैसा कि मुझे हर अवसर पर बताया गया । निर्वाचन आयोग स्वयं यह अनुभव करता है कि ‘किसी को वोट नहीं’ का विकल्प भी मतपत्र या मतदान मशीन, जो भी इंतजामात हों, पर उपलब्ध होना चाहिए । अभी उस विकल्प के आसार मुझे नहीं दीखते हैं । तब तक के लिए मैं यही कर सकता हूं कि मत डालना ही बंद कर दूं और दुआ करूं कि कोई अन्य मेरे नाम पर मत डालने न पहुंचे । मौजूदा व्यवस्था के पक्षधरों से क्षमा मांगते हुए मैं फिलहाल यही कर रहा हूं । अपने इस रवैये के कारणों के बारे में मैं आगामी आलेखों में कुछ न कुछ लिखूंगा । – योगेन्द्र