11 जुलाई, विश्व जनसंख्या दिवस – भारत की विकट समस्या, जनसंख्या

विश्व जनसंख्या दिवस – उद्देश्य

आज, जुलाई 11, विश्व जनसंख्या दिवस है। क्या भारत के संदर्भ में इसकी कोई अहमियत है? मेरी नजर में नही!

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1989 में 11 जुलाई का दिन “विश्व जनसंख्या दिवस” के तौर पर घोषित किया था। असल में 1987 की इसी तारीख पर विश्व जनसंख्या उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित अनुमान के अनुसार 5 अरब को पार कर गई थी। संयुक्त राष्ट्र को तब लगा कि दुनिया की आबादी को नियंत्रित किया जाना चाहिए, और  इसके लिए सभी को जागरूक किया जाना चाहिए। उस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए दो वर्ष बाद इस दिन को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

उक्त जनसंख्या दिवस का उद्देश्य है सभी देशों के नागरिकों को बढ़ती आबादी से उत्पन्न खतरों के प्रति जागरूक करना और उन्हें आबादी नियंत्रण के प्रति प्रेरित करना। क्या भारत की सरकारें, यहां की संस्थाएं और सामान्य जन इस समस्या को कोई अहमियत दे पाए हैं? उत्तर नहीं में ही मिलता है।

भारत – अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि

ध्यान दें इस दिवस को अब 28 वर्ष हो रहे हैं। यह अंतराल छोटा नहीं; इस बीच पूरी एक नयी पीढ़ी पैदा हो चुकी है और उसके बाद की पीढ़ी पैदा होकर शैशवावस्था में आ चुकी है। यदि देश में जनसंख्या को लेकर कुछ भी सार्थक एवं कारगर किया जा रहा होता तो इन लगभग 3 दशकों में उल्लेखनीय परिणाम देखने को मिल चुके होते। जनसंख्या उसी रफ्तार से या थोड़ा-सा कम रफ्तार से अभी भी बढ़ रही है।  अपने देश की आबादी किस कदर बढ़ती गई है इसे आगे प्रस्तुत तालिका से समझा सकता है:

 वर्ष जनसंख्या

 करोड़ों में

  प्रतिशत वृद्धि

  प्रति 10-वर्ष

 जनसंख्या प्रतिशत

  1951 के सापेक्ष

1951 36.01 —– 100
1961 43.92 21.64 122
1971 54.81 24.80 152
1981 68.33 24.66 190
1991 84.64 23.87 235
2001 102.37 21.54 284
2011 121.02 17.64 336

1 करोड़  = 10 मिलियन  = 100 लाख

Source:  http://www.iipsenvis.nic.in/Database/Population_4074.aspx

गौर करें कि 1991 से 2011 के 20 वर्षों के अंतराल में ही देश में करीब 37 करोड़ लोग जुड़ गये और आबादी 1.43 गुना हो गई। और चिंता की बात यह है आज 1917 में अनुमानित आबादी 132-134 करोड़ बताई जा रही है। क्या सीखा देश ने इस जनसंख्या दिवस से? कौन-से कारगर तरीके अपनाए देश ने आबादी नियंत्रित करने के लिए?

मैं पाठकों का ध्यान इस तथ्य की ओर खींचता हूं कि चीन ने 1979 में एक-संतान की कानूनी नीति अपनाई। तब उसकी आबादी लगभग 98 करोड़ थी (भारत की करीब 68 करोड़ उसके सापेक्ष) आज वह 140 करोड़ आंकी जा रही है।

तस्वीर वर्ष 2024 की

हाल में संयुक्त राष्ट्र की विश्व जनसंख्या संबंधी रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसके अनुसार अगले सात वर्षों बाद 2024 में भारत की आबादी चीन के बराबर, फि र उसके अधिक हो जायेगी। यह अनुमान इन आंकड़ों पर आधारित है कि भारत की मौजूदा आबादी करीब 134 करोड़ और वृद्धि दर 1.1% प्रति वर्ष है जब की चीन की आबादी 140 करोड़ और वृद्धि दर मात्र 0.4 % प्रतिवेर्ष है।

इतना ही नहीं, अनुमान यह भी है कि 2030 आते-आते चीन की आबादी करीब-करीब स्थिर हो जायेगी और बाद के वर्षो में उसमें गिरावट भी आ सकती है। इसके विपरीत अपने देश की आबादी 2030 तक 150 करोड़  और बढ़ते हुए 2050 में 166 करोड़ हो जायेगी। उसके बाद उसके स्थिर होने की संभावना रहेगी।

मैं सोचता था कि देश के बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन, सरकारी तंत्र एवं शासन चलाने वाले राजनेता उक्त समाचार से चिंतित होंगे, मुद्दे को लेकर संजीदा होते हुए आम जन को सार्थक संदेश देंगे, और इस दिशा में कारगर कदम उठाने की बात करेंगे। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। किसी भी टीवी चैनल पर कोई बहस चली हो ऐसा भी शायद नहीं हुआ।

आबादी को लेकर कोई भी गंभीर नहीं जब कि यह देश के सामने खड़ी विकट समस्या है जिससे अन्य तमाम समस्याएं पैदा हो रही हैं।

1970 का दुर्भाग्यपूर्ण दशक

बढ़ती आबादी को लेकर जो उदासीनता देखने में आ रही है उसका मूल मेरे मत में 1970 का वह दशक है जिसमें आपातकाल लगा था, इंदिरा गांधी के तथाकथित अधिनायकवादी रवैये के विरुद्ध जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनांदोलन चला था, पहली बार कांग्रेस सत्ताच्युत हुई थी, विपक्षी दलों ने विलय करके जनता पार्टी बनाई और सत्तासीन हुए थे, आदि-आदि। इसी दशक में संजय गांधी (इंदिराजी के छोटे पुत्र) एक असंवैधानिक ताकत के तौर पर उभरे।

बीसवीं सदी के साठ-सत्तर के दशकों में भारत ने परिवार नियोजन की नीति अपनाई थी। मुझे उस समय के “हम दो हमारे दो” के नारे और परिवार नियोजन के कार्यक्रम का द्योतक चिह्न “लाल त्रिकोण” की याद अच्छी तरह है।

संजय गांधी को परिवार नियोजन की योजना बहुत भाई। उनका यह सोचना कि आबादी को बढ़ते देने से देश का दीर्घकालिक अहित निश्चित है। कार्यक्रम तो चल ही रहा था, उसको गति देने के लिए उन्होंने सत्ता से अपनी निकटता का भरपूर किंतु अनुचित लाभ उठाना आरंभ किया। उनके चाटुकारों की कोई कमी नहीं थी और जब वे जोर-जबरदस्ती परिवार नियोजन थोपने लगे तो परिणाम घातक हो गये। मैं उस समय की स्थिति का विवरण नहीं दे सकता। लेकिन वस्तुस्थिति का अंदाजा इसी उदाहरण से लगाया जा सकता है कि अस्पताल कर्मचारियों को नसबंदी के मामले खोज-खोजकर लाना आवश्यक हो गया, अन्यथा तनख्वाह/नौकरी पर आंच आ सकती थी। तब के जनांदोलन में संजय गांधी भी एक कारण बने।

तब परिवार नियोजन कार्यक्रम पर ऐसा ग्रहण लगा कि आज तक उसका कुफल देश को भुगतना पड़ रहा है। परिवार नियोजन ऐसा शब्द बन गया कि राजनेता उसे मुंह से निकालने से भी कतराने लगे। जनसंख्या वृद्धि रोकने की कवायत राजनीति से गायब हो गई। परिणाम?

आज की हमारी आबादी (132+ करोड़) तब (1974-75)  की आबादी (60-62 करोड़) के दोगुने से अधिक हो चुकी है। और जल्दी ही हम चीन को पछाड़ने वाले हैं। इस संभावना पर खुश होवें कि अपना माथा पीटें?

एक अन्य संबंधित समाचार मुझे पढ़ने को मिला (देखें: टाइम्ज़ अव् इंडिया), जिसके अनुसार 2050 तक भारत की मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की मुस्लिम आबादी से अधिक हो जायेगी। अभी सर्वाधिक मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की है, भारत से कुछ करोड़ अधिक। इस विषय की अधिक चर्चा मैं नहीं कर रहा हूं।

कई राज्यों का बेहतर कार्य

वे क्या कारण थे कि राजनेताओं ने बढ़ती आबादी पर खुलकर चर्चा नहीं की? ऐसा तो नहीं कि “आबादी नियंत्रण की कोशिश करने पर जनता कहीं नाखुश न हो जाए और हमें वोट न दें” यह विचार उनके दिमाग में गहरे घुस गया हो? या वे मुद्दे के प्रति एकदम उदासीन हो गए हों। कारण कुछ भी हों देश को बढ़ती आबादी का दंश तो झेलना ही पड़ रहा है।

फिर भी कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में रुचि ली और उसके परिणाम उन्हें मिले भी हैं।

यहां उल्लेख कर दूं कि विषय के जानकारों के अनुसार जनसंख्या के स्थिरता (वृद्धि दर शून्य) के लिए प्रजनन दर करीब 2.1 प्रति स्त्री होनी चहिए। इससे कम पर आबादी घटने लगती है। मैं कुछ गिने-चुने राज्यों के प्रजनन दर के आंकड़े (वर्ष 2016) प्रस्तुत करता हूं (स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_states_ranking_by_fertility_rate):

1) सिक्किम – 1.2 !

2) केरला, पंजाब – 1.6

3) गोवा, तमिलनाडु, त्रिपुरा, दिल्ली, पुद्दुचेरी = 1.7

4) आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल = 1.8

5) हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र = 1.9

6) गुजरात, जम्मू कश्मीर = 2.0

7) अरुणाचल, उत्तराखंड, ओडीसा, हरयाणा = 2.1 

8) आसाम, छत्तीसगढ़ = 2.2

9) मध्य प्रदेश, मिजोरम = 2.3

10) राजस्थान = 2.4

11) झारखंड, मणिपुर = 2.6

12) उत्तर प्रदेश, ) नगालैंड = 2.7 ?

13) मेघालय = 3.0 ?

14) बिहार = 3.4 ?

पूरे देश का औसत प्रजनन दर  2.2  है, स्थिरता वाले मान से थोड़ा अधिक।

इन आंकड़ों को शब्दश: नही लिया जाना चाहिए, किंतु इससे अलग-अलग राज्यों की स्थिति का अंदाजा अवश्य लगता है। छोटे राज्यों का प्रदर्शन अपेक्षया बेहतर रहा है। किंतु उत्तर प्रदेश एवं बिहार जैसे विशाल राज्यो के लिए ये प्रजनन दर अभी बहुत अधिक है, बिहार के लिए तो एकदम चिंताजनक। उत्तर प्रदेश की स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं होगी जितना उपर्युक्त जानकारी संकेत देतीहै।

जनसंख्या वृद्धि एक गंभीर समस्या है इसे एक बच्चा भी समझ सकता है। हमारे प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं। भूक्षेत्र बढ़ नहीं सकता, बनीय क्षेत्र सीमित है, जल से स्रोत सीमित हैं, आदि-आदि। तब इतनी-सी सामान्य बात शासन चलाने वाले और जनता क्यों नहीं समझ पाते हैं कि बढ़ती जनसंख्या के लिए इन संसाधनों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता घटती जाएगी। – योगेन्द्र जोशी

 

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‘सत्यमेव जयते’ – आमिर खान का नया धारावाहिक

आम तौर पर मैं टेलिविजन कार्यक्रम नहीं देखता । बस समाचार चैनलों पर नजर दौड़ाता हूं, वह भी चाय-पानी या भोजन करते हुए । वर्षों से मैंने कोई टीवी सीरियल नहीं देखा है ।

 ‘सत्यमेव जयते’ 

किंतु आज, रविवार, 6 मई, मेरा मन हुआ कि मैं फिल्म अभिनेता आमिर खान का नितांत नया धारावाहिक ‘सत्यमेव जयते’ देख लूं; देखूं तो कि इस सीरियल में आखिर क्या है । इस सीरियल को लेकर आमिर के किसी टीवी समाचार चैनल पर प्रसारित एक साक्षात्कार के कुछ अंश मैं पहले देख-सुन चुका था, जिसमें आमिर ने यह खुलासा नहीं किया कि धारावाहिक में वह असल में क्या दिखाने जा रहे हैं । महज इस बात पर जोर था कि कुछ हटकर, कुछ नया, उसमें रहेगा । मुझे जिज्ञासा हुई कि मैं भी देखूं तो उसमें कुछ भी नया क्या है, उसमें क्या संदेश देने की आमिर ने कोशिश की है, इत्यादि ।

दरअसल आमिर को मैं लीक से हटकर कार्य करने वाला कलाकार समझता आया हूं । पिछले 20-25 वर्षों में मैंने एक या दो फिल्में देखी होंगी । इसलिए में इस काल के कलाकारों के बारे में खास कुछ जानता । चलते-चलाते जो सुनने-पढ़ने में आता है उसी पर मेरी जानकारी आधारित है । कुछ भी हो आमिर के बारे में मेरी धारणा थोड़ा हटकर ही रही है

इन आरंभिक शब्दों के बाद मैं धारावाहिक की विषयवस्तु पर लौटता हूं ।

विषयवस्तु 

निःसंदेह इसमें बहुत कुछ नया है, सामयिक एवं पीड़ाप्रद सामाजिक समस्या को धारावाहिक का मुद्दा बनाया गया है, और समाज को रचनात्मक संदेश का सार्थक प्रयास किया गया है । ‘स्टार प्लस’ पर पूर्वाह्न 11:00 से 12:30 बजे तक प्रसारित आज के प्रथम अंक (एपिसोड) में क्या था मैं इस स्थल पर उसका संक्षिप्त उल्लेख करने जा रहा हूं ।

पहले इसके नाम के बारे में । धारावाहिक का नाम ‘सत्यमेव जयते’ चुना गया है । ये शब्द हमारे संघीय सरकार के अशोक की लाट वाले प्रतीक अथवा मोहर के साथ प्रयुक्त हुए हैं । मेरा अनुमान है कि उक्त पदबंध ‘मुण्डक उपनिषद्’ के एक मंत्र का आरंभिक वाक्यांश है, किंतु वहां पर ‘जयति’ प्रयुक्त है न कि ‘जयते’, जो कि व्याकरण की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण लगता है । इस मंत्र के बारे में मैंने अन्यत्र लिखा भी है

आमिर के धारावाहिक का आज का अंक देश में इस समय प्रचलित भ्रूण हत्या पर केन्द्रित है । आमिर ने दो-तीन पीड़ित महिलाओं की व्यथा-कथा उन्हीं की जुबानी सुनाई है कि किस प्रकार उनकी सहमति के बिना उनके गर्भ इसलिए गिराए गये कि भावी संतानें कन्याएं होतीं; कैसे उन्होंने अंततः कन्याओं को जन्म दिया और परिवार (ससुराल) से अलग होकर नया जीवन आरंभ किया ।

कन्या भ्रूण हत्या

‘अल्ट्रासाउंड’ की चिकित्सकीय निदान विधि पर आधारित कन्या भ्रूण हत्या समाज के किस वर्ग में प्रमुखतया प्रचलित होगी इस बाबत आमिर ने कार्यक्रम में शामिल दर्शकों की राय जाननी चाही । लोगों का मत यही था कि यह समाज के अपेक्षया गरीब एवं अनपढ़ लोगों में अधिक प्रचलित है । आमिर ने एक शोधकर्ता के हवाले से इस धारणा का खंडन किया और बताया कि कन्या भ्रूण हत्या समाज के अपेक्षया संपन्न, उच्चशिक्षित और लब्धप्रतिष्ठ लोगों में अधिक मिलती है । आम धारणा के विपरीत अपने इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए अतिसामान्य तबके की दो-एक महिलाओं के साक्षात्कार भी प्रस्तुत किए गये कि कन्या-जन्म क्यों उनको स्वीकार्य है ।

यहां इस बात पर मैं टिप्पणी करना समीचीन समझता हूं कि समाज में एक भ्रम सदैव से व्याप्त रहा है । वह यह कि भ्रष्ट आचरण, आपराधिक प्रवृत्ति, और अशिष्ट व्यवहार आदि समाज के गरीब और अशिक्षित वर्ग में अधिक होता है । मेरे अनुभव में यह धारणा पूर्वाग्रहजनित एवं तथ्यहीन है । अभिजात लोगों के इस मत पर मुझे संस्कृत नाट्यकृति ‘मृच्छकटिकम्’ की यह उक्ति याद आती है “पापं कर्म च यत्परैरपि कृतं तत्तस्य संभाव्यते ।” अर्थात् दूसरों के पापकर्म को भी बेचारे गरीब द्वारा किया हुआ मानने में लोग नहीं हिचकिचाते हैं । भर्तृहरि नीतिशतक में भी कहा गया है “सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति”, अर्थात् सभी गुण धनवानों में ही देखे जाते हैं न कि धनहीनों में ।

आमिर ने अपने कार्यक्रम में आंकड़ों द्वारा यह भी दिखाया है कि पुरुष एवं स्त्रियों के मध्य लिंगानुपात पिछले 25 वर्षों में किस प्रकार लगातार घटता गया है, और कुछ राज्यों में तो यह 1000 पुरुषों पर लगभग 800 स्त्रियों के स्तर पर पहुंच चुका है । अल्ट्रासोनिक विधि को अपनाते हुए गर्भ में पल रही कन्या का भ्रूण गिराना दो-तीन हजार करोड़ रुपये का व्यवसाय बन चुका है इसका भी खुलासा किया गया है । देश के भौगोलिक मानचित्र के माध्यम से यह दिखाने की चेष्टा भी कार्यक्रम में की गयी है कि हरयाणा के आसपास आरंभ हुए यह व्यवसाय किस प्रकार देश के प्रायः हर कोने में फैल चुका है यह देखना चिंताजनक है । गर्भ गिराने का यह रोग उत्तराखंड (मेरा गृहराज्य) तक पहुंच गया है यह जान मुझे हैरानी हुई, जिसका मुझे अंदेशा नहीं था ।

परिवार नियोजन  से संबंध

कार्यक्रम में प्रस्तुत अधिकांश जानकारी मुझे कमोबेश पहले से थी । किंतु एक नई बात हैरान करने और कष्ट पहुंचाने वाली थी । एक स्त्रीरोग विशेषज्ञ ने यह जानकारी दी कि भ्रूण हत्या का यह फैशन विगत सदी के सत्तर के दशक में चलन में आया, जब परिवार नियोजन की बात जोर-शोर से चल रही थी । परिवार नियोजन लोग अपनाना तो चाहते थे, लेकिन चाहते थे कि ऐसा कोई रास्ता हो कि लड़का ही हो न कि लड़की । हैरानी की बात यह थी कि इसकी शुरुआत सरकारी अस्पतालों से हुई जो कालांतर में विरोध के चलते हुए चोरीे-छिपे जारी रहा । बाद में इसे गैरकानूनी घोषित तो कर दिया, लेकिन यह निजी अस्पतालों में घड़ल्ले से आज तक चलता आ रहा है । कार्यक्रम में दो पत्रकारों ने यह भी स्पष्ट किया कि कैसे उन्होंने सौ-एक डाक्टरों की इस अवैधानिक व्यवसाय में संलिप्तता पर स्टिंग आपरेशन किया । राजस्थान के विभिन्न अदालतों में उनके मामले कछुआ चाल से चल रहे हैं, और उन पर निर्णय आने की फिलहाल कोई उम्मींद नहीं ।

इस घटते अनुपात के गंभीर दुष्परिणामों की ओर आमिर ने ध्यान आकर्षित किया है । एक वीडियो दिखाया गया है जिसमें हरयाणा के कुछ युवकों ने अपना दुखड़ा रोया है कि लड़कियों की अनुपलब्धता के कारण उनकी शादी नहीं हो पा रही है । यह बात भी बताई गयी है कि किस प्रकार देश के अन्य क्षेत्रों से गरीब परिवारों की लड़कियां खरीदकर राजस्थान, हरयाणा जैसे जगहों पर बेचा जा रहा है । इन लड़कियों से शादी का स्वांग भर होता है, किंतु उन्हें नौकरानी से अधिक का दर्जा नहीं मिलता है ।

आमिर का निवेदन

आमिर ने इस मुद्दे पर रचनात्मक क्या हो रहा है इसकी जानकारी भी लोगों को दी है । यह बताया गया है कि कुछ सालों पहले पंजाब के नवाशहर में एक सरकारी अधिकारी (डिपुटी कमिश्नर/कलेक्टर ?) ने कन्याओं के पक्ष में मुहिम चलाई जो सफल रहा । लोग उससे जुड़ते गये और आज उसके आशाप्रद परिणाम सामने आ रहे हैं । लोगों की सोच में उल्लेखनीय अंतर आया है ।
कार्यक्रम में स्वयंसेवी संस्था ‘स्नेहालय’ की भी चर्चा की गई है, जो मां-बापों द्वारा त्यागी गई कन्याओं को अपनाता है, उनका लालन-पालन करता है । अंत में आमिर ने लोगों से स्नेहालय की मुहिम से जुड़ने की अपील की है, और उसके लिए चंदा देने की भी प्रार्थना की है । लोगों से यह भी मांग की गयी है कि वे आमिर से संपर्क साधकर राजस्थान सरकार से निवेदन करें कि ऊपर कहे गये अदालती मामलों में फास्ट-ट्रैक कोर्ट का गठन किया जाए और अपराधियों को शीघ्र सजा दिलाई जाए ।

कुल मिलाकर यह कार्यक्रम उन लोगों के लिए अहमियत रखता है जो संवेदनशील हों और सामाजिक मुद्दों से सरोकार रखने के इच्छुक हों । ‘अरे सब चलता है’ की सोच रखने वालों के लिए यह कार्यक्रम नहीं है ।

आमिर और उनके सहयोगियों को मेरी बधाई और आगे सफलता के लिए शुभकामनाएं । योगेन्द्र जोशी

आमिर के धारावाहिक की वेबसाइट हैः satyamevjayate.in

अव्वल दर्जे की आबादी वाला देश हिंदुस्तान, आज नहीं तो कल !

आज विश्व जनसंख्या दिवस है, 11 जुलाई ।

लीजिए जश्न मनाइए, विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या भारत (इंडिया?) की । चौंकिए नहीं ! अगर आंकड़ों पर भरोसा (?) करें तो आज के दिन ऐसा नहीं है, पर कल तो हो ही जायेगा । अभी तक चीन की आबादी ही सबसे अधिक है । लेकिन चीन में जनसंख्या बहुत नियंत्रित जल रही है । अब आप वहां लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के न होने को इस बात के लिए श्रेय दें या वहां के औसत नागरिक की समझदारी को, अथवा दोनों को मिलाकर । अभी चीन की जनसंख्या हम (लगभग 115 करोड़) से करीब 18-20 करोड़ अधिक है । जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार जैसी चल रहीं है वैसी चलती रहे तो इस अंतर को हम बीस-एक साल में पाट लेंगे, इतने में नहीं तो पच्चीस-तीस साल में पाटने में सफल हो ही जायेंगे । नंबर एक बनने से चीन को छोड़ भला कौन रोक सकता है हमें । और वह है कि ‘कॉम्प्टीशन्’ से हटने की सोच रहा है । तब नंबर एक ! कहीं किसी बात में तो नंबर एक होने का गर्व कर सकेंगे ।

लेकिन एक शर्त है, कोई व्यापक प्राकृतिक आपदा देश पर कहर न बरपा डाले या भयंकर संक्रामक रोग अपने पांव न पसार बैठे । यदि अवर्षण जैसे कारणों से अकाल या दुर्भिक्ष की स्थिति व्यापक स्तर पर पैदा हो गई तो हमारी सरकारें उसे संभाल नहीं पायेंगी । कहां से भरेंगे लोगों के पेट ? थोड़ा भोजन भंडार पास में हो भी और कुछ बाहर से आयातित हो भी जाये, तो भी अधिसंख्य ग्रामीणों के जीवन के आधार कृषि और पशुधन को कैसे बचाया जाएगा ? हर बीतते वर्ष के साथ जो हालात देश में बनते हुए नजर आ रहे हैं उसमें हमारे समक्ष गंभीर जलसंकट के आसार दिखाई दे रहे हैं । देश के कई हिस्सों में पानी को लेकर अभी ही प्रदर्शन-दंगे हो रहे हैं, दुर्भिक्ष के समय क्या होगा ? गंभीर रोग-संक्रमण होने पर भी हालात बेकाबू हो सकते हैं । सरकारी अस्पतालों की दशा आज ही दयनीय है । आर्थिक दृष्टि से असमर्थ कितने लोगों को संतोषप्रद इलाज वहां मिलता है ? उन्हें अक्सर निजी अस्पतालों की शरण लेनी पड़ती है । तब व्यापक संक्रमण के फैलने पर हालात बेकाबू हो जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा । आप या मैं चाहें या न, तब जनसंख्या पर असर पड़ेगा ही । प्रकृति तो अपने तरीके से निबटेगी ही ।

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‘विहिप’ का ‘फरमान’ – असुरक्षा की सार्वत्रिक भावना

(नवंबर २० की पोस्ट के आगे) वस्तुतः तथाकथित धर्मरक्षकों की चिंता धर्म को परिभाषित करने और उसमें जनसमुदाय को संलग्न होने की प्रेरणा देना नहीं है । जो मैं देखता आ रहा हूं उसके अनुसार धर्म अपना असली अर्थ खोकर एक सामुदायिक पहचान भर बन के रह गया है । जैसे किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता उसकी पहचान बनती है, ठीक वैसे ही धर्म भी मानव समाज में एक वृहत् समुदाय का सदस्य होने की पहचान प्रदान करता है । कभी पहनावा तो कभी नाम और कभी ‘धार्मिक’ कर्मकांड हमें सामूहिक पहचान प्रदान करते हैं । दाढ़ी-मूंछ बढ़ाकर सिर पर पगड़ी धारण कर ली तो सिख हो गये और बिना मूंछ के दाढ़ी बढ़ाकर सिर पर विशिष्ट टोपी पहन ली या बुरका ओड़ लिया तो मुस्लिम हो गये । माथे पर तिलक या बिंदी लगाकर मंदिर प्रसाद चढ़ाने पर हिंदू कहलाने लगे अन्यथा हर ‘संडे’ चर्च में ‘सर्मन’ सुनने चले या गले में क्रास धारण कर लिया तो इसाई । कुछ इसी प्रकार के प्रतीक हमारे हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई आदि होने की पहचान बनाते हैं । बस । हमारा आचरण क्या है यह माने नहीं रखता है । वास्तव में सामूहिक पहचान के कई आधार हम अपनाते हैं । कभी जाति में, तो कभी क्षेत्रीयता में, और कभी भाषा में अपनी पहचान खोजते हैं । शेष के लिए क्लिक करें >>

‘विहिप’ का ‘फरमान’ – क्या अर्थ है धर्म का?

(नवंबर 2 की पोस्ट के आगे) करीब दो सप्ताह पहले मैंने ‘विहिप’ के ‘फरमान’, (उसे आप आदेश, अनुरोध, सलाह, प्रस्ताव आदि जो ठीक समझें कह सकते हैं) का जिक्र किया था । विहिप ने कहा था कि हिंदू कुछ समय में अल्पसंख्यक हो जायेंगे, अतः उन्हें अधिक बच्चे पैदा करके अपनी जनसंख्या बढ़ानी चाहिये । वस्तुतः उनके दो बच्चे अपने लिए और दो ‘राष्ट्र’ के नाम होने चाहिए ।

समाचार पढ़ने पर मेरे मन में अनेकों सवाल उठने लगे । मुझे उनका समुचित उत्तर मिल नहीं पा रहा था । क्या विहिप वाकई परेशान है ? क्या उसने सोच-समझ कर ही नारा दिया है ? अविश्वास का कारण मुझे नहीं दिखा, इसलिए वे सवाल मुझे परेशान करते रहे । आगे पढ़्ने के लिए क्लिक करें >>

‘विहिप’ का ‘फरमान’: प्रत्येक परिवार चार बच्चे

विगत इक्कीस अक्टूबर के दैनिक वार्तापत्र ‘हिन्दुस्तान’ के मुखपृष्ठ पर एक समाचार देखने को मिला, शीर्षक थाः ‘विश्व हिन्दू परिषद का फतवा – दो अपने लिए, दो राष्ट्र के लिए’ । मुद्रित समाचार के अनुसार ‘धार्मिक संगठन विहिप’ ने एक नई मुहिम छेड़ने की योजना बना ली है, जिसके अनुसार वह हिन्दुओं को परिवार नियोजन न अपनाने की सलाह देगी, ताकि देश में अन्य धर्मावलंबियों (वस्तुतः मुस्लिमों) की लगातार बढ़ रही जनसंख्या उनसे आगे न बढ़ जाये और वे कालांतर में ‘अल्पसंख्यक’ न बन जायें । इस संदर्भ में वह कथित तौर पर यह नारा देगीः ‘प्रत्येक परिवार चार बच्चे – दो राष्ट्र के लिए, दो परिवार के लिए ।’ इसके साथ ही वह तरह-तरह की योजनाओं पर काम कर रही है, जिससे उसका संदेश जनसमुदाय तक पहुंचे और जिनके माध्यम से वह लोगों को अपने पक्ष में लाने में सफल हो सके । इन सभी बातों का संक्षेप उस समाचार में दिया गया है ।

विहिप का फ़रमान

समाचार: विहिप का फ़रमान

मैं दावा नहीं कर सकता कि वह समाचार एकदम पुख्ता है, पर यही मानकर चल रहा हूं कि एक प्रतिष्ठित समाचारपत्र में छपे होने के कारण वह सर्वथा मिथ्या नहीं होगा, भले ही ब्यौरा बढ़चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया हो । मैंने सोचा कि विहिप की वेबसाइट (http://www.vhp.org/) पर अधिक जानकारी मिल सकेगी, किंतु निराश होना पड़ा क्योंकि वेबसाइट पर पहुंच (एक्सेस) की अनुमति नहीं है या फिर वह गलत स्थान पर पहुंचा देती है । । कदाचित् वह पंजीकृत सदस्यों के लिए ही उपलब्ध है । माइक्रोसाफ्ट द्वारा नियंत्रित संबंधित एक ‘ग्रूप’ मुझे दिखा, परंतु उस पर केवल विहिप के सांविधानिक उद्येश्य ही मिल सके । बताता चलूं कि वहां उल्लिखित बातें प्रभावी तथा आदर्श थीं । हकीकत में वे खुद विहिप के लिए अब कितनी मान्य हैं इस पर मुझे शंका अवश्य है, क्योंकि प्रायः सभी संगठन आदर्श धारणाओं के साथ जन्म लेते हैं और समय के साथ विकारग्रस्त होकर रास्ता भटक जाते हैं । अस्तु ।

मैं आगे कुछ कहूं इससे पहले यह स्पष्ट कर दूं कि मेरी किसी भी धार्मिक संगठन के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है । चूंकि यह देश स्वतंत्र है, हमें अपनी बातें कहने की छूट है, अपनी धार्मिक आस्थाओं के अनुसार चलने और उनको प्रसारित-प्रचारित करने का हमें अधिकार है, अतः अधिक कुछ उनके प्रतिपक्ष में कहना निरर्थक है ।

ऊपरी तौर पर देखा जाये तो विहिप, एवं व्यापक स्तर पर हिन्दू संगठनों, की चिंता जायज है । अभी तक यह देश हिन्दूबहुल देश रहा है । अघोषित तौर पर ही सही, यह एक प्रकार से हिन्दू राष्ट्र है इस आश्वस्तिभाव के साथ हिन्दू समाज जीता आ रहा है । कम से कम मैं ऐसा महसूस करता हूं । मेरी यह बात कइयों को नागवार लगेगी यह भी मैं जानता हूं । अब यदि वे हिन्दू कभी किसी भी कारण से अल्पसंख्यक हो चलें तो उनके लिए यह अवश्य असह्य, पीड़ादायक और भविष्य के प्रति निराशाप्रद अनुभव सिद्ध होगा । परंतु क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है, और यदि हां, तो क्या उसका समाधान जनसंख्या-वृद्धि में ही है जैसे सवाल अवश्य उठाये जा सकते हैं ।

मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूं कि जो नारा कथित तौर पर विहिप देने जा रही है उसे आज का मध्यम तथा उच्च वर्ग कुछ भी महत्त्व नहीं देने जा रहे हैं, भले ही वे सिद्धांततः विहिप के पक्षधर हों । मेरा आकलन है कि भौतिक संपन्नता की सीढ़ियां चढ़ते और आधुनिकता का आवरण ओढ़ते हुये ये वर्ग समाज एवं देश के लिए उतना समर्पित नहीं हैं जितना लोग दावा करते होंगे । ये वर्ग अपने हितों को सर्वोपरि रखते हुए ही देश के लिए कुछ करते हैं । ये अपने हितों का त्याग करने नहीं जा रहे हैं । आज स्थिति यह है इन वर्गों का प्रायः हर व्यक्ति स्वयं को अपने व्यावसायिक क्षेत्र में स्थापित करने और सुसंपन्न जीवन जीने की ललक के साथ आगे बढ़ रहा है । वे दिन अब बीत चुके हैं जब वे बच्चों की चाहत में कुछ भी खोने को तैयार हो जाते थे । लेकिन वे आज ‘हम दो हमारे दो के हिमायती भी नहीं रह गये हैं । अब तो वे अपने पेशे की सफलता के लिए और अधिकाधिक अर्थोपार्जन के लिए वच्चों तक का त्याग करने को तैयार हैं । अतः आप देख रहे होंगे कि आज उन नौजवान-नवयुवतियों की संख्या बढ़ रही है जिनके मात्र एक बच्चा है । उनका तर्क सीधा-सा है कि भले ही एक बच्चा हो, पर उसकी परवरिश और शिक्षा उच्चतम स्तर की होनी चाहिए । इतना ही नहीं, अब तो कुछ नवदम्पती एक भी बच्चा नहीं की बात सोचने लगे हैं । क्या विहिप का लक्ष इन वर्गों के लोग हैं ? कम से कम ये लोग विहिप के कहने पर ऐसा त्याग नहीं करने जा रहे हैं ।

तब किसको लक्ष करने जा रही है विहिप ? जाहिर है कि समाज के पिछड़े, अशिक्षित, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पर ही विहिप का प्रभाव पड़ सकता है । यही वे लोग हैं जो धर्म के नाम पर सरलता से बहकाये जा सकते हैं । यदि आप ध्यान से देखें तो पायेंगे कि सभी धर्मावलंबियों के निशाने पर इसी तबके के लोग होते हैं । चाहे इसाई धर्मप्रचारक हों या बौद्ध धर्मगुरु सभी इस तबके को अपने प्रभाव में लाने में जुटे हैं । और धर्म के नाम पर उनसे अधिकाधिक संतान पैदा करने के लिए कहेंगे तो वह ऐसा कर सकते हैं । वस्तुतः इस वर्ग में आज भी आधा-आधा दर्जन बच्चे पैदा हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे चाहे, वे हिंदू हों या मुस्लिम या कोई और । यह एक निर्विवाद तथ्य है कि समाज के संपन्न समुदायों में जनसंख्या वृद्धि की समस्या नहीं है । अपने देश में सर्वाधिक संपन्न पारसी समुदाय के लोग हैं और उनकी जनसंख्या नहीं वढ़ रही है यह उनके लिए खासी चिंता की बात बनी हुयी है । जिस भी तबके में शिक्षा-संपन्नता है वहां जनसंख्या नहीं वढ़ रही है । तो क्या विहिप का लक्ष्य समाज के सबसे निचला वर्ग है ?

इस समय इतना ही । अभी बहुत कुछ और है कहने को । बहस जारी रहेगी । – योगेन्द्र