11 जुलाई, विश्व जनसंख्या दिवस – भारत की विकट समस्या, जनसंख्या

विश्व जनसंख्या दिवस – उद्देश्य

आज, जुलाई 11, विश्व जनसंख्या दिवस है। क्या भारत के संदर्भ में इसकी कोई अहमियत है? मेरी नजर में नही!

संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1989 में 11 जुलाई का दिन “विश्व जनसंख्या दिवस” के तौर पर घोषित किया था। असल में 1987 की इसी तारीख पर विश्व जनसंख्या उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित अनुमान के अनुसार 5 अरब को पार कर गई थी। संयुक्त राष्ट्र को तब लगा कि दुनिया की आबादी को नियंत्रित किया जाना चाहिए, और  इसके लिए सभी को जागरूक किया जाना चाहिए। उस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए दो वर्ष बाद इस दिन को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

उक्त जनसंख्या दिवस का उद्देश्य है सभी देशों के नागरिकों को बढ़ती आबादी से उत्पन्न खतरों के प्रति जागरूक करना और उन्हें आबादी नियंत्रण के प्रति प्रेरित करना। क्या भारत की सरकारें, यहां की संस्थाएं और सामान्य जन इस समस्या को कोई अहमियत दे पाए हैं? उत्तर नहीं में ही मिलता है।

भारत – अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि

ध्यान दें इस दिवस को अब 28 वर्ष हो रहे हैं। यह अंतराल छोटा नहीं; इस बीच पूरी एक नयी पीढ़ी पैदा हो चुकी है और उसके बाद की पीढ़ी पैदा होकर शैशवावस्था में आ चुकी है। यदि देश में जनसंख्या को लेकर कुछ भी सार्थक एवं कारगर किया जा रहा होता तो इन लगभग 3 दशकों में उल्लेखनीय परिणाम देखने को मिल चुके होते। जनसंख्या उसी रफ्तार से या थोड़ा-सा कम रफ्तार से अभी भी बढ़ रही है।  अपने देश की आबादी किस कदर बढ़ती गई है इसे आगे प्रस्तुत तालिका से समझा सकता है:

 वर्ष जनसंख्या

 करोड़ों में

  प्रतिशत वृद्धि

  प्रति 10-वर्ष

 जनसंख्या प्रतिशत

  1951 के सापेक्ष

1951 36.01 —– 100
1961 43.92 21.64 122
1971 54.81 24.80 152
1981 68.33 24.66 190
1991 84.64 23.87 235
2001 102.37 21.54 284
2011 121.02 17.64 336

1 करोड़  = 10 मिलियन  = 100 लाख

Source:  http://www.iipsenvis.nic.in/Database/Population_4074.aspx

गौर करें कि 1991 से 2011 के 20 वर्षों के अंतराल में ही देश में करीब 37 करोड़ लोग जुड़ गये और आबादी 1.43 गुना हो गई। और चिंता की बात यह है आज 1917 में अनुमानित आबादी 132-134 करोड़ बताई जा रही है। क्या सीखा देश ने इस जनसंख्या दिवस से? कौन-से कारगर तरीके अपनाए देश ने आबादी नियंत्रित करने के लिए?

मैं पाठकों का ध्यान इस तथ्य की ओर खींचता हूं कि चीन ने 1979 में एक-संतान की कानूनी नीति अपनाई। तब उसकी आबादी लगभग 98 करोड़ थी (भारत की करीब 68 करोड़ उसके सापेक्ष) आज वह 140 करोड़ आंकी जा रही है।

तस्वीर वर्ष 2024 की

हाल में संयुक्त राष्ट्र की विश्व जनसंख्या संबंधी रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। उसके अनुसार अगले सात वर्षों बाद 2024 में भारत की आबादी चीन के बराबर, फि र उसके अधिक हो जायेगी। यह अनुमान इन आंकड़ों पर आधारित है कि भारत की मौजूदा आबादी करीब 134 करोड़ और वृद्धि दर 1.1% प्रति वर्ष है जब की चीन की आबादी 140 करोड़ और वृद्धि दर मात्र 0.4 % प्रतिवेर्ष है।

इतना ही नहीं, अनुमान यह भी है कि 2030 आते-आते चीन की आबादी करीब-करीब स्थिर हो जायेगी और बाद के वर्षो में उसमें गिरावट भी आ सकती है। इसके विपरीत अपने देश की आबादी 2030 तक 150 करोड़  और बढ़ते हुए 2050 में 166 करोड़ हो जायेगी। उसके बाद उसके स्थिर होने की संभावना रहेगी।

मैं सोचता था कि देश के बुद्धिजीवी, सामाजिक संगठन, सरकारी तंत्र एवं शासन चलाने वाले राजनेता उक्त समाचार से चिंतित होंगे, मुद्दे को लेकर संजीदा होते हुए आम जन को सार्थक संदेश देंगे, और इस दिशा में कारगर कदम उठाने की बात करेंगे। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। किसी भी टीवी चैनल पर कोई बहस चली हो ऐसा भी शायद नहीं हुआ।

आबादी को लेकर कोई भी गंभीर नहीं जब कि यह देश के सामने खड़ी विकट समस्या है जिससे अन्य तमाम समस्याएं पैदा हो रही हैं।

1970 का दुर्भाग्यपूर्ण दशक

बढ़ती आबादी को लेकर जो उदासीनता देखने में आ रही है उसका मूल मेरे मत में 1970 का वह दशक है जिसमें आपातकाल लगा था, इंदिरा गांधी के तथाकथित अधिनायकवादी रवैये के विरुद्ध जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में जनांदोलन चला था, पहली बार कांग्रेस सत्ताच्युत हुई थी, विपक्षी दलों ने विलय करके जनता पार्टी बनाई और सत्तासीन हुए थे, आदि-आदि। इसी दशक में संजय गांधी (इंदिराजी के छोटे पुत्र) एक असंवैधानिक ताकत के तौर पर उभरे।

बीसवीं सदी के साठ-सत्तर के दशकों में भारत ने परिवार नियोजन की नीति अपनाई थी। मुझे उस समय के “हम दो हमारे दो” के नारे और परिवार नियोजन के कार्यक्रम का द्योतक चिह्न “लाल त्रिकोण” की याद अच्छी तरह है।

संजय गांधी को परिवार नियोजन की योजना बहुत भाई। उनका यह सोचना कि आबादी को बढ़ते देने से देश का दीर्घकालिक अहित निश्चित है। कार्यक्रम तो चल ही रहा था, उसको गति देने के लिए उन्होंने सत्ता से अपनी निकटता का भरपूर किंतु अनुचित लाभ उठाना आरंभ किया। उनके चाटुकारों की कोई कमी नहीं थी और जब वे जोर-जबरदस्ती परिवार नियोजन थोपने लगे तो परिणाम घातक हो गये। मैं उस समय की स्थिति का विवरण नहीं दे सकता। लेकिन वस्तुस्थिति का अंदाजा इसी उदाहरण से लगाया जा सकता है कि अस्पताल कर्मचारियों को नसबंदी के मामले खोज-खोजकर लाना आवश्यक हो गया, अन्यथा तनख्वाह/नौकरी पर आंच आ सकती थी। तब के जनांदोलन में संजय गांधी भी एक कारण बने।

तब परिवार नियोजन कार्यक्रम पर ऐसा ग्रहण लगा कि आज तक उसका कुफल देश को भुगतना पड़ रहा है। परिवार नियोजन ऐसा शब्द बन गया कि राजनेता उसे मुंह से निकालने से भी कतराने लगे। जनसंख्या वृद्धि रोकने की कवायत राजनीति से गायब हो गई। परिणाम?

आज की हमारी आबादी (132+ करोड़) तब (1974-75)  की आबादी (60-62 करोड़) के दोगुने से अधिक हो चुकी है। और जल्दी ही हम चीन को पछाड़ने वाले हैं। इस संभावना पर खुश होवें कि अपना माथा पीटें?

एक अन्य संबंधित समाचार मुझे पढ़ने को मिला (देखें: टाइम्ज़ अव् इंडिया), जिसके अनुसार 2050 तक भारत की मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की मुस्लिम आबादी से अधिक हो जायेगी। अभी सर्वाधिक मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया की है, भारत से कुछ करोड़ अधिक। इस विषय की अधिक चर्चा मैं नहीं कर रहा हूं।

कई राज्यों का बेहतर कार्य

वे क्या कारण थे कि राजनेताओं ने बढ़ती आबादी पर खुलकर चर्चा नहीं की? ऐसा तो नहीं कि “आबादी नियंत्रण की कोशिश करने पर जनता कहीं नाखुश न हो जाए और हमें वोट न दें” यह विचार उनके दिमाग में गहरे घुस गया हो? या वे मुद्दे के प्रति एकदम उदासीन हो गए हों। कारण कुछ भी हों देश को बढ़ती आबादी का दंश तो झेलना ही पड़ रहा है।

फिर भी कुछ राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में रुचि ली और उसके परिणाम उन्हें मिले भी हैं।

यहां उल्लेख कर दूं कि विषय के जानकारों के अनुसार जनसंख्या के स्थिरता (वृद्धि दर शून्य) के लिए प्रजनन दर करीब 2.1 प्रति स्त्री होनी चहिए। इससे कम पर आबादी घटने लगती है। मैं कुछ गिने-चुने राज्यों के प्रजनन दर के आंकड़े (वर्ष 2016) प्रस्तुत करता हूं (स्रोत: https://en.wikipedia.org/wiki/Indian_states_ranking_by_fertility_rate):

1) सिक्किम – 1.2 !

2) केरला, पंजाब – 1.6

3) गोवा, तमिलनाडु, त्रिपुरा, दिल्ली, पुद्दुचेरी = 1.7

4) आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल = 1.8

5) हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र = 1.9

6) गुजरात, जम्मू कश्मीर = 2.0

7) अरुणाचल, उत्तराखंड, ओडीसा, हरयाणा = 2.1 

8) आसाम, छत्तीसगढ़ = 2.2

9) मध्य प्रदेश, मिजोरम = 2.3

10) राजस्थान = 2.4

11) झारखंड, मणिपुर = 2.6

12) उत्तर प्रदेश, ) नगालैंड = 2.7 ?

13) मेघालय = 3.0 ?

14) बिहार = 3.4 ?

पूरे देश का औसत प्रजनन दर  2.2  है, स्थिरता वाले मान से थोड़ा अधिक।

इन आंकड़ों को शब्दश: नही लिया जाना चाहिए, किंतु इससे अलग-अलग राज्यों की स्थिति का अंदाजा अवश्य लगता है। छोटे राज्यों का प्रदर्शन अपेक्षया बेहतर रहा है। किंतु उत्तर प्रदेश एवं बिहार जैसे विशाल राज्यो के लिए ये प्रजनन दर अभी बहुत अधिक है, बिहार के लिए तो एकदम चिंताजनक। उत्तर प्रदेश की स्थिति भी उतनी अच्छी नहीं होगी जितना उपर्युक्त जानकारी संकेत देतीहै।

जनसंख्या वृद्धि एक गंभीर समस्या है इसे एक बच्चा भी समझ सकता है। हमारे प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं। भूक्षेत्र बढ़ नहीं सकता, बनीय क्षेत्र सीमित है, जल से स्रोत सीमित हैं, आदि-आदि। तब इतनी-सी सामान्य बात शासन चलाने वाले और जनता क्यों नहीं समझ पाते हैं कि बढ़ती जनसंख्या के लिए इन संसाधनों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता घटती जाएगी। – योगेन्द्र जोशी

 

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