लॉकडाउन काल में मन में उपजे छिटपुट छितराए विचार (२)

इस समय बेंगलूरु में हूं गृहनगर वाराणसी से दूरलॉकडाउन में कुछ ढील मिल चुकी है। कहने को रेलयात्रा एवं हवाईयात्रा की सुविधा आरंभ हो चुकी है। लेकिन भ्रम इतना फैला है कि वापसी यात्रा की तिथि तय नहीं हो पा रही है। मैं २४ घंटे व्यस्तता से बिता सकता हूं, परंतु दो-अढाई मास के इस अनियोजित प्रवास में अपनी आम दैनिक चर्या से वंचित हूं, जिसका एहसास रह-रह के बेचैन करता है। अन्यथा इंटरनेट से प्राप्य विविध जानकारी, लैपटॉप पर भंडारित पाठ्यसामग्री, और मन में उठते विचारों को लेकर ब्लॉग-लेखन यहां भी चल ही रहा है। यहां बहुमंजिली २३ इमारतों वाले विस्तृत परिसर के चारों ओर टहलने में सुबह-शाम आधा-आधा घंटा लग जाता है। टहलते समय परिसर के पर्यावरण, परिसर-निवासियों भाषा-जीवनशैली, कोरोना महामारी, लॉकडाउन एवं समाचारों को लेकर तरह-तरह के विचार मन में उठते हैं। परस्पर असंबद्ध, संक्षिप्त, तथा बिखरे हुए विचार पूर्ववर्ती आलेख तथा इस स्थल पर कलमबद्ध हैं।

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छिद्रेषु अनर्था बहुलीभवन्ति

यह संस्कृत साहित्य की एक उक्ति है जिसका सीधा अर्थ यह है कि विपत्तियां अकेले नहीं आती हैं। अंग्रेजी में इसके लिए “Misfortunes never come single.” अथवा “Misfortunes seldom come alone.” लोकोक्ति उपलब्ध है। इस कहावत को लेकर मैंने एक लेख अपने ब्लॉग में ११ वर्ष पहले लिखा था।

इस वर्ष की शुरुआत से ही पूरी दुनिया कोरोना से पैदा हुई महामारी से जूझ रही है। यह लोगों को रोगी बना रहा है जिसका कोई इलाज अभी उपलब्ध नहीं है जिससे अनेक जन दिवंगत हो रहे हैं। समाचार माध्यम पिछले ३-४ माह से प्रायः सिर्फ कोरोना से जुड़ी खबरें परोस रहे हैं, गोया कि जानने योग्य और कुछ इस संसार में नहीं घट रहा हो। निःसंदेह कोरोना का महाप्रकोप सामुदायिक समस्या बनकर उपस्थित हुआ है लगभग हर राष्ट्र के समक्ष। परंतु मेरी नजर में अधिक दुःखद बात यह है कि इसने तमाम तरह की समस्याएं लोगों के सामने व्यक्तिगत स्तर पर पैदा कर दी हैं। अर्थात् उन समस्याओं का हल खोजना और उनके दुष्परिणाम भुगतना हरएक की व्यक्तिगत नियति बन चुकी है।

इस कोरोना संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए अन्य देशों की भांति अपने देश ने भी लॉकडाउन का रास्ता अपनाया है। इससे अनेक परेशानियां पैदा हुई है। देखिए क्या-क्या भुगतना पड़ रहा है संसाधन-विहीन आम आदमी को –

(१) उद्योगधंधों का बंद हो जाना जिससे रोज कमा-खाने वालों के समक्ष रोजी रोटी के लाले पड़ने लगे।

(२) जमा-पूंजी जब चुकने लगी और पर्याप्त मदद नहीं मिली तो अपने पैतृक गांव-घरों को लौटने लगे।

(३) आवागमन के साधन ट्रेन/बस उपलब्ध न होने के कारण उन्हें सामान ढोने वाले ट्रकों में भेड़-बकरियों की तरह ठुंसकर निकलना पड़ा।

(४) जिनको वह भी न मिला पाया वे १०००-१५०० किलोमीटर पैदल नापने को विवश हो गए।

(५) मार्ग में कइयों को जान से हाथ धोना पड़ा बिमारी से या दुर्घटना के शिकार बनकर। दुर्घटनाओं का हृदय-विदारक पक्ष यह रहा कि कहीं कमाने वाला मुखिया चल बसा, तो कहीं मांबाप खोकर बच्चे अनाथ हो गये और किसी को प्रसव-पीड़ा सहनी पड़ी, और किसी नवजात को त्यागना पड़ा। इत्यादि।

ये सब बातें विवश करती हैं कहने को “छिद्रेषु …

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कोरोना काल में लिफ्ट का परित्याग

मैं सदा से ही शारीरिक श्रम का पक्षधर रहा हूं। घर-गृहस्थी के छोटेमोटे काम अपने हाथ से करना पसंद करता हूं। जहां तक संभव हो एक-डेड़ किलोमीटर की दूरी पैदल चलना मेरी रुचि के अनुकूल है। उससे अधिक दो-चार किमी तक साइकिल से जाना ठीक समझता हूं। कभी स्कूटर का भी प्रयोग कर लेता था लेकिन अब बढ़ती उम्र और नगर की बेतरतीब यातायात व्यवस्था के चलते उसका प्रयोग बंद हो चुका है। कार का शौक न पहले था और न अब हैसीड़ियां चढ़ने-उतरने में अभी कोई दिक्कत महसूस नहीं करता।

इधर बेंगलूरु में बहुमंजिली इमारत के सातवें तल पर रह रहा हूं। लॉकडाउन घोषित होने से पहले मैं भूतल से उस तल तक चढ़ने-उतरने के लिए सामान्यतः लिफ्ट का प्रयोग कर रहा था। किंतु जब कोरोना महामारी के दायरा बढ़्ने की खबरें जोरशोर से आने लगीं तो उसे गंभीरता से लेने में ही मुझे बुद्धिमत्ता नजर आई। तब से हम पति-पत्नी सीढ़ियों का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। दिन भर में पत्नी महोदया को एक बार ही ऊपर-नीचे आना-जाना होता है, लेकिन मैं चूंकि दो बार टहलने निकलता हूं अतः मुझे यही कार्य दो बार करना पड़ता है।

बाहर खुले में प्रातःसायं टहलना स्वास्थ्य बनाये के लिए उपयोगी होता है ऐसी राय व्यक्त करते हैं डॉक्टरवृंद। मेरा ख्याल है कि दिन भर में कुछ सीढ़ियां चढ़ना-उतरना भी खुद में शरीर के अस्थि-जोड़ों के लिए लाभप्रद होना चाहिए। जिनके घुटने अभी ठीकठाक चल रहे है उनको दिन भर में सीढ़ियों का भी व्यायाम कर लेना चाहिए।

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कोरोना का संदेश – जनसंख्या नियंत्रण

मेरा मत है कि मौजूदा कोरोना संक्रमण ने एक गंभीर संदेश दिया है। वह है जनसंख्या पर नियंत्रण। हो सकता है देशवासियों को वह नजर न आ रहा हो।

सन् १९६० के दशक में (कदाचित् १९६५ के आसपास) तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण की योजना बनाई और उसका कार्यान्वयन भी सुचारु होने लगा। “हम दो हमारे दो” का नारा दिया गया। बसों तथा अन्य साधनों पर “लाल त्रिकोण” के प्रतीक के साथ यह नारा सर्वत्र प्रचरित होने लगा। लोगों में जागरूकता फैलने लगी और वे स्वेच्छया परिवार नियोजन के विविध साधन अपनाने लगे। शनैःशनैः ही सही नीति सही दिशा में चल रही थी।

दुर्भाग्य से १९७० के दशक में इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी ने एक “असंवैधानिक” शक्ति के तौर पर उभर कर इस कार्य योजना के लिए जोर-जबर्दस्ती का मार्ग अपनाना शुरू किया। लोगों में असंतोष पनपने लगा, और तथा अन्य कारणों से भी वे आंदोलित होने लगे, आपातकाल घोषित हुआ, यह योजना उसका शिकार बनी।

उसके बाद किसी राजनैतिक दल ने हिम्मत नहीं जुटाई योजना को आगे बढ़ाने की। बाद में खुद कांग्रेस लंबे अरसे तक सत्ता में रही लेकिन उसने भी योजना को भुला दिया।

परिणाम? १९६५ के आसपास देश की आबादी करीब ५० करोड़ थी। आज वह करीब १३५ करोड़ आंकी जाती है, २.७ गुना !! परंतु देश है कि चुप्पी साधे है।

गौर करें आगे प्रस्तुत नक्शे पर जो दिखाता है कि कुछ राज्य हैं जिनकी आबादी बढ़ने की दर अन्य इतनी अधिक है उनके नागरिकों को पेट पालने के लिए दूसरे राज्यों की शरण लेनी पड़ती है। लेकिन इन राज्यों को लज्जा फिर भी नहीं आती। जब कोरोना ने विकट स्थिति पैदा कर दी इन नागरिकों को डेढ़—डेढ़ हजार किमी पैदल चलकर तथाकथित घर लौटना पड़ता है तब भी इन राज्यों को लज्जा नहीं आती। (स्रोतः censusindia.gov.in पर उपलब्ध है।)

राज्यों के पास अपने बाशिंदों के पेट भरने के संसाधन न हों तो भी आबादी बढ़ने देनी चाहिए क्या? आंख खुलेगी कब? – योगेन्द्र जोशी

लॉकडाउन काल में मन में उपजे छिटपुट छितराए विचार

इस समय हम बेंगलूरु में हैं अपने बेटे के पास। एक मास के नियोजित बेंगलूरु-प्रवास के बाद तारीख २२ मार्च को लौटना था अपने गृहनगर वाराणसी को, किंतु पहले “जनता” कर्फ्यू फिर लॉकडाउन घोषित हो जाने पर यात्रा स्थगित कर दी। इस समय उसका चौथा चरण चल रहा है। बीते २१ ता. को हमारे अनियोजित प्रवास के दो माह हो गये। हवाई सेवा प्रारंभ होने की खबर है लेकिन सर्वत्र भ्रम फैला है।

अब ऊब होने लगी है। वैसे मेरे लिए २४ घंटे व्यस्तता से बिताना कोई कठिन काम नहीं है। परंतु इस अनियोजित प्रवास में मेरी जो आम दैनिक चर्या होती थी उससे वंचित हूं, जिसका एहसास रह-रह के बेचैन करता है। अन्यथा इंटरनेट से प्राप्य विविध जानकारी, लैपटॉप पर भंडारित पाठ्यसामग्री, और मन में उठते विचारों को लेकर ब्लॉग-लेखन यहां भी चल ही रहा है।

हम बहुमंजिली इमारतों और उनके बहु-अपार्टमेंटों के विस्तृत परिसर में रह रहे हैं। बाउंडरी से घिरे परिसर के चारों ओर टहलने में आधे घंटे से अधिक समय लग जाता है। टहलना मेरी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा रहा है। टहलते समय परिसर के परिवेश, परिसर-निवासियों के तौरतरीके, मौजूदा महामारी, संबंधित लॉकडाउन, वैश्विक खबरों आदि को देख तरह-तरह के विचार मन में उठते रहते हैं। उनसे जुड़े परस्पर असंबद्ध, संक्षिप्त, तथा बिखरे विचार इस स्थल पर कलमबद्ध हैं।

 

[१] कष्टकर लॉकडाउन

सोशल मीडिया अर्थात् सामाजिक माध्यम पर ऐसे कई किस्से-कहानियां देखने-सुनने को मिल जा रहे हैं जो दिखाते हैं कि लॉकडाउन काल में लोगों को चौबीसों घंटे घर में रुके रहना कितना बेचैन कर रहा है। मनोवैज्ञानिक यह चिंता व्यक्त करते हैं ऐसी स्थिति में कई-कई दिनों तक पड़े रहना कइयों के लिए मानसिक तनाव एवं तज्जन्य मनोरोग का कारण बन सकता है। कुछ लोग टेलीफोन एवं टीवी पर अवश्य समय गुजारते होंगे। आज के युग में शेष दुनिया से संपर्क साधे रहने के कई अन्य साधन भी उपलब्ध हैं।

मेरे मन में यह सवाल रह-रहकर उठता है कि वे लोग जो किसी न किसी ध्येय की प्राप्ति के लिए जिंदगी को दांव पर लगाते हों, जेल की काल-कोठरी में रहने को भी तैयार हो जाते हों, उनकी सहना शक्ति कितनी अधिक होती होगी? जिस हालात में औसत आदमी पागल हो जाए उसमें भी वे बिना मानसिक संतुलन खोये हफ्तों, महीनों या सालों बिता देते हों यह अविश्वसनीय-सा लगता है। देश के स्वाधीनता संघर्ष में देश के अनेक सुपुत्र इस सामर्थ्य के धनी थे। मुझे वीर सावरकर का नाम याद आता है जिनको अंडमान-नीकोबार – अंग्रेजी-काल में कालापानी – में वर्षों कालकोठरी में गुजारने पड़े। कालापानी अर्थात् देश की मुख्यभूमि से हजारों कि.मी. दूर समुद्रस्थ निर्जन द्वीपीय स्थान। वैसी सामर्थ्य एवं इच्छाशक्ति विरलों को ही मिली रहती है। धन्य हैं वे।

[२] मित्रोँ-परिचितों के निधन का दुर्योग

इसे संयोग, वस्तुतः दुर्योग, ही कहा जाएगा कि लॉकडाउन काल में मुझे नजदीकी मित्रों, सहयोगियों एवं रिश्तेदारों से संबंधित शोकसमाचार सुनने को मिले। हादसे तो होते ही रहते हैं लेकिन जिनकी बात मैं कर रहा हूं उनमें एक मेरी पूर्व-सहयोगी, दो पड़ोसी, और दो निकट संबंधी रहे। गौर करने योग्य बात यह थी वे सभी पहले से ही गंभीर रूप से रुग्ण थे और उनकी लंबे जीवन की आशा नहीं थी। दो तो कैंसर-पीड़ित थे, एक हृदयरोगी, और दो जटिल मिश्रित रोगों से ग्रस्त थे। वे महीनों पूर्व भी दिवंगत हो चुके होते, किंतु संयोग यह रहा कि इसी लॉकडाउन काल में उक्त हादसे हुए।

इन लोगों के दिवंगत होने का जो दुःख उनके पारिवारिक सदस्यों को हुआ उससे अधिक कष्ट इस बात का रहा होगा कि वे उनके अंतिम दर्शन भी नहीं कर सके, क्योंकि दूरस्थ होने और आवागमन के साधन बंद होने के कारण वे मन मसोस कर रह गये। मैं दिवंगत आत्माओं की शांति की प्रार्थना करता हूं, और उनके भाई-बहनों, बेटे-बेटियों आदि निकट संबंधियों के प्रति कष्ट सहने की सामर्थ्य की कामना के साथ सहानुभूति व्यक्त करता हूं। प्रार्थना है कि भविष्य में कोई अनिष्ट समाचार सुनने को न मिले।

[३] भविष्यवाणी के प्रति अविश्वास

मैं ज्योतिष में विश्वास नहीं करता, यद्यपि मेरे खानदान की पूर्ववर्ती पीढ़ियों की जीवनचर्या में पौरोहित्य एवं ज्योतिष शामिल थे। भौतिकी (फिजिक्स) का छात्र, अध्येता और अंततः शोधकर्ता-शिक्षक के तौर पर जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ता गया वैसे-वैसे मेरा विश्वास भविष्यवाचन की सभी विधाओँ-कलाओं से उठता चला गया। भौतिकी में प्रकृति के जिन नियमों का अध्ययन किया जाता है और जिन पर आधुनिक टेक्नॉलॉजी (प्रोद्योगिकी, तकनीकी) आधारित है उनके मद्देनजर मेरे मत में भविष्यवाणी संभव नहीं। किंतु परम आस्था जिसको हो वह तो विश्वास करता रहेगा भले ही विफल भविष्यवाणियों की गठरी ही उसके सामने खोल दी जाए।

इधर वैश्विक कोरोना महामारी को देखकर मेरे मन में भविष्यवाणी के प्रति शंका की बात ताजा हो उठी। जो लोग भविष्यवाणी की किसी भी विधा या कला में विश्वास करते हैं उनको इस प्रश्न का उत्तर देना चाहिए कि किसी भी भविष्यवेत्ता ने इस महामारी की भयावहता की बात विगत समय में – महीनों, सालों पहले – क्यों नहीं की? अब यदि घटना घट चुकने के बाद कोई यह दावा करे कि उसे इसका अंदाजा पहले ही लग चुका था तो उसकी अहमियत नहीं है।

सोचने की बात है कि इस सदी की, और मैं तो कहूंगा सन् १९०० के बाद, वैश्विक स्तर की ऐसी कोई महामारी मानवजाति को नहीं झेलनी पड़ी है। विश्व में आधुनिकतम चिकित्सकीय व्यवस्था के उपलब्ध होने और लॉकडाउन का रास्ता अपनाने के बावजूद संक्रमण के मामले बढ़ते जा रहे हैं और मृतकों की संख्या लाखों में पहुंच चुकी है। क्या यह कोई छोटी-मोटी दुर्घटना है जिसे भविष्यवक्ता जान ही न पाये हों?

दरअसल भावी घटनाओं का ज्ञान संभव नहीं है केवल उनका अनुमान लग सकता है यदि पर्याप्त आधार उपलब्ध हों। ऐसे सुविचारित तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं जिनसे उक्त मत सिद्ध होता हो। मैं वह सब यहां पेश नहीं कर सकता क्योंकि यह विषय विशद तर्क-वितर्क का है। -योगेन्द्र जोशी

आया मौसम वर्षफल का (नववर्ष 2013)

ख्रिस्तीय वर्ष 2013 का आगाज हो चुका है । इस मौके पर सभी देशवासियों के प्रति मेरी शुभाकांक्षाएं ।

नववर्ष के आगमन पर लोगों के मन में आने वाला समय कैसा रहेगा खुद के लिये तथा समाज-देश के लिए यह जानने की उत्कंठा होती है । लोग समझते हैं कि भविष्य की तस्वीर खींची जा सकती है । वे समझते हैं कि कुछ विशेषज्ञ भविष्य की घटनाओं को ‘पढ़ने’ की काबिलियत रखते हैं । लोगों की उत्कंठा शांत करने के लिए देश में बहुत से ‘एक्सपर्टों’ का जन्म हुआ है जिन्होंने भविष्यवाणी की अलग-अलग विधियां इजाद की हैं या अपनाई हैं । इनमें सबसे अधिक प्रचलित जन्म के समय ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति पर आधारित है । और इसी का सरलतर संस्करण मात्र जन्मतिथि के विचार पर आधारित विधि है जिसके परिणामों की जानकारी कई अखबारों/पत्रिकाओं में पढ़ने को मिल जाती हैं ।

विगत 28 दिसंबर के ‘अमर उजाला’ के साथ उपलब्ध ‘रुपायन’ नाम के परिशिष्ट के पन्ने जब मैंने पलटे तो पाया कि उसके आरंभ से अंत तक के सभी पृष्ठों में नाम के प्रथम अक्षर पर आधारित वर्षफल का ब्योरा छपा पड़ा है और कुछ नहीं । और परसों, 30 दिसंबर, के समाचारपत्र ‘हिंदुस्तान’ का भी एक पृष्ठ उसी प्रकार की भविष्यवाणी से भरा था, इस बार जन्ममाह पर आधारित । वस्तुतः ऐसे वर्षफल कई पत्र-पत्रिकाओं में दिसंबर-जनवरी के इस मौसम में और टेलीविजन चैनलों पर पढ़ने को मिल जाते हैं । इतना ही नहीं, बाजार में अलग-अलग नामराशियों के वर्षफलों के विस्तार से चर्चा वाली पुस्तिकाएं भी उपलब्ध हो जाती हैं ।

ऐसी प्रकाशित जानकारी देखकर मेरे मन में यह प्रश्न स्वाभाविक तौर पर उठ जाता है कि इन वर्षफलों की वाकई में कोई अहमियत है ? क्या लोग कही गई बातों पर विश्वास करते होंगे ? या ऐसी बातों को महज मनोरंजन के नाते पढ़ते होंगे ? मनोरंजन के लिए हम हास्य कविताएं सुनते हैं, व्यंगलेख पढ़ते हैं, बेतुकी हरकतों वाले वचकानी हेसी वाले टीवी सीरियल देखते हैं, इत्यादि । ठीक वैसे ही ये राशिफल, वर्षफल भी पढ़े जाते होंगे, लेकिन गंभीरता से इन्हें शायद ही कोई लेता होगा ।

इन्हें गंभीरता से लिया भी नहीं जा सकता है, क्योंकि इनका कोई तर्कसम्मत आधार है ही नहीं । बस ऐसा होता है यह कहते हुए इनको सही ठहराने की कोशिश की जाती है । और वैसे भी ये बातें अनुभव में सही ठहरती नहीं । भला कैसे सही हो सकती हैं । एक ही राशिनाम अथवा जन्मदिन वाले अनेक लोग इस धरती पर पैदा हुए होंगे, जिनकी पारिवारिक पुष्ठभूमि में कोई समता नहीं होगी; उनके शारीरिक एवं मानसिक स्वाथ्य तथा क्षमता में समानता की कोई संभावना नहीं; उनके परिवेश अलग-अलग होंगे; उनकी शिक्षा-दीक्षा में भी परस्पर भेद होगा ही; व्यावसायिक दृष्टि से भी उनमें समानता की उम्मीद की नहीं जा सकती है; इत्यादि । तब कैसे एक ही वर्षफल सबके लिए स्वीकार्य हो सकता है ?

इसके अतिरिक्त इस पर भी गौर करें कि लोगों के नाम राशियों के अनुसार हों यह आवश्यक नहीं । मैंने सुना है कि उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में तो राशिनाम प्रयोग में न रखने को प्रचलन है, क्योंकि कुछ लोग मानते हैं कि ऐसा करने पर उम्र घटती है । आजकल तो लोग खोज-खोजकर ऐसा नाम रखने लगे हैं जिसे किसी ने सुना ही न हो – एकदम नया, दुनिया में अकेले एक व्यक्ति का । वैसे भी यह संभावना भी रहती है कि राशि पर आधारित नाम अच्छा लगे । मेरे उत्तराखंडीय समाज में राशिनाम का चलन है, फिर भी मेरा स्वयं का नाम मेरे पिताश्री ने कुछ हटकर चुना था । ऊपर मैंने रूपायन का उल्लेख किया ह, जिसमें नाम के प्रथम अक्षर के वर्षफल के साथ किसी सिनेतारिका अथवा महिला खिलाड़ी का उदाहरण भी दे रखा है । उन्हीं में शामिल है एक मुस्लिम महिला का नाम । मुझे पूरा विश्वास है कि इस्लाम धर्मावलंबियों में महीने की तारीखों के अनुसार नाम रखने की कोई परंपरा नहीं है । अगर होगी भी तो वह ‘हिजरी’ कलेंडर पर आधारित होगा न कि ख्रिस्तीय कलेंडर पर । तब संबंधित भविष्यवक्ता ने अपनी विधि उस महिला पर भी कैसे इस्तेमाल कर दी होगी ?

और गहराई से सोचने पर मन में सवाल उठता है कि कार्य-कारण (कॉज एंड इफेक्ट) के जिस सिद्धांत का उपयोग तार्किक विवेचना में किया जाता है वह ऐसी भविष्यवाणियों के मामले में कहीं नजर नहीं आता है । सवाल यह है किसी दिन विशेष पर पैदा हुए व्यक्ति का भविष्य किस प्रक्रिया के द्वारा जन्मतिथि निर्धारित करती है ।

कुल मिलाकर ऐसी कवायद की अहमियत शुद्ध मनोरंजन के अलावा कुछ और नहीं हो सकती है । भौतिकी (फिजिक्स) के अनुसार तो भविष्य जाना ही नहीं जा सकता है !! – योगेन्द्र जोशी

 

वर्ष 2011 की भविष्यवाणी – राशिनाम को लेकर की गयी बेतुकी कवायद

बात 2011 के वर्षफल की

ज्योतिष् एक विवादास्पद विषय माना जाता है । दुनिया में बहुत-से लोग ज्योतिषीय भविष्यवाणी में विश्वास करते हैं । अपने देश में आस्थावानों की संख्या अपेक्षया अधिक ही है । यहां तो बहुत से सामाजिक एवं धार्मिक कृत्य ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार करने की ही परंपरा रही है । ऐसे बहुत ही कम लोग मिलेंगे जो ज्योतिष् पर आधारित भविष्यवाणियों को सिरे से नकार दें । लोगों में व्याप्त विश्वास के कारण ही देश के समाचार माध्यमों पर ज्योतिष् संबंधी बातों की भरमार देखने को मिलती है । अब चंद घंटों के भीतर नये कलेंडर वर्ष का आगमन होने जा रहा है । यह उपयुक्त काल है जब टेलीविजन चैनल, पत्र-पत्रिकाएं एवं समाचारपत्र अपने पृष्ठों में नये वर्ष की संभावनाओं की भविष्यवाणियां भी शामिल करें – भविष्यवाणियां जो कहीं व्यक्तियों से संबंध रखती हैं तो कहीं व्यापक सामाजिक एवं राष्ट्रीय संदर्भ में कही जाती हैं । किसकी क्या सफलता/असफलता रहेगी, राजनैतिक गतिविधियां क्या रहेंगी, प्राकृतिक आपदाएं कितनी विकट होंगी, आदि की बातें । वह सब कितना सच सिद्ध होगा और कितना झूठ यह तो समय बीतने पर ही स्पष्ट हो पाएगा, किंतु कुछ बातें तो जाहिरा तौर पर ही बेतुकी नजर आती है । मैं भविष्यवाणियों के ऐसे ही एक वाकये की बात करने जा रहा हूं ।

मेरे हिंदी दैनिक समाचारपत्र के साथ एक साप्ताहिक परिशिष्ट भी नियमतः आया करता है । आज के अंक के साथ जो परिशिष्ट मिला है वह वर्ष 2011 के लिए ज्योतिषीय भविष्यवाणी को समर्पित है । इसमें बारहों राशियों से संबंधित लोगों के भविष्य की प्रमुख दशा-दिशा की बातें कही गयी हैं । प्रत्येक राशि के लोगों के बारे में अगले वर्ष की संभावनाओं की चर्चा के साथ ही देश केे स्तर पर ख्यात एक-एक हस्ती के बारे में भी दो-चार शब्द कहे गये हैं । जैसा सोचा जा सकता है हमारे देश में सर्वाधिक महत्त्व फिल्मी हस्तियों की दिया जाता है, और उसी के अनुरूप उक्त परिशिष्ट में 12 में से 10 फिल्मी दुनिया से ही चुनी गयी हैं, तकरीबन सभी तारिकाएं, जिनमें से एक मुस्लिम समुदाय की है । इनके अतिरिक्त मात्र एक महिला खेल-कूद की दुनिया से है – बैडमिंटन के क्षेत्र की अंतरराष्ट्रीय स्तर की मौजूदा नामी खिलाड़ी । और दूसरी अपने देश की शीर्षस्थ यानी नंबर एक दलित राजनेत्री (बोलचाल में राजनेता) ।

राशिनाम

जिन भविष्यवाणियों पर मैं टिप्पणी कर रहा हूं वह पूरी तरह राशिनामों पर आधारित है । मतलब यह है कि आपकी राशि क्या है यह आपके नाम के प्रथम अक्षर पर निर्भर करता है । जैसे चू, चे चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ में से किसी एक से आरंभ होने वाले नाम वाले व्यक्ति की राशि मेष होगी । क्या इसका मतलब यह है कि नाम से किसी की राशि निर्धारित होती है ? जी नहीं, नाम से राशि निर्धारित नहीं होती है, बल्कि राशि के अनुसार नाम चुना जाना चाहिए यह ज्योतिषीय परंपरा है । ज्योतिषियों का सुझाव रहता है कि व्यक्ति (तकनीकी भाषा में जातक) का नाम उसकी राशि को ध्यान में रखकर चुना जाना चाहिए, और यह राशि वस्तुतः चंद्र-राशि होती है । चंद्र-राशि वह राशि है जिसमें चंद्रमा उस काल में स्थित होता है जब ‘जातक’ जन्म लेता है । सुविधा एवं व्यक्ति की राशि का त्वरित ज्ञान हो सके इस प्रयोजन से ज्योतिषियों ने वर्णमाला के विभिन्न अक्षरों (समुचित स्वर-मात्रा के साथ) को इन राशियों से संबद्ध किया गया है । साफ जाहिर है कि जातक के जन्म का सही-सही समय का हिसाब रखा जाना चाहिए और राशि की गणना करते हुए जातक का नामकरण किया जाना चाहिए ।

परंतु नामकरण की यह व्यवस्था व्यापक नहीं है । मेरा अनुमान है कि यह परंपरा ब्राह्मणों तक सीमित है और वह भी शायद सर्वत्र नहीं । मेरी जानकारी के अनुसार पूर्वांचल में राशिनाम का उल्लेख केवल जन्मकुंडली में रहता है, और व्यक्ति को संबोधित करने के लिए कोई ‘अच्छा-सा’ वैकल्पिक नाम चुना जाता है । मैंनं इस आम धारणा के बारे में भी सुना है कि राशिनाम से किसी को संबोधित करने से उसकी उम्र घटती है । वस्तुतः बच्चों का नामकरण बिरले लोग ही राशि को ध्यान में रखकर करते हैं । भले ही राशिनाम क्या होना चाहिए यह लोग जानते हों, लेकिन वे अपनी पसंद से नाम ही चुनते हैं । इसलिए जब आप व्यक्तियों के नाम सुनकर ही राशि की बात करते हैं तो ज्योतिषीय विसंगति के साथ आगे बढ़ रहे होते हैं । पहले यह निश्चित कर लेना आवश्यक है कि प्रश्नगत कोई नाम राशि पर आधारित है भी कि नहीं । उक्त मौलिक सिद्धांत पर ध्यान दिए बिना ही नाम के आधार पर भविष्यवाणी करना लोगों को मूर्ख बनाने से अधिक कुछ भी नहीं कहा जा सकता है

मेरे विचार में शायद ही किसी फिल्मी हस्ती का नाम उसकी राशि से संबंधित हो । वे सब आवश्यकतानुसार आकर्षक नाम चुनने से नहीं हिचकते हैं । मैंने कहा कि ज्योतिषीय चर्चा में एक मुस्लिम महिला भी शामिल की गयी है । मुझे पूरा विश्वास है कि उसका नाम राशि पर विचार के साथ नहीं रखा गया होगा । मेरी जानकारी में मुस्लिम समाज में हिंदू ज्योतिष् की मान्यता नहीं है । यह भी मैंने कहा है कि एक दलित राजनेत्री के बारे में भी कुछ बातें कही गयी हैं । क्या जन्म के समय उस राजनेता के तब के ‘गरीब’ माता-पिता ने पंडितजी से सलाह करके उसका नाम रखा होगा ? दलित और वह भी गरीब, भला कौन पंडित मुंह लगाएगा ? उसके राशिनाम पर भी मुझे शंका है । असल बात तो यह है कि आजकल लोग शब्दकोश में खोज-खोज कर नितांत नये-नये लुभावन नाम अपने बच्चों के लिए चुनने लगे हैं । गौर करें तो कई बार अ से आरंभ होने वाले नामों की भरमार देखने को मिलती है । किसी-किसी दौर में तो कुछ नाम अत्यधिक लोकप्रिय हो जाते हैं और उस दौर के लोगों में वह नाम आम दिखाई देता है । मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि बहुत कम ऐसे नाम सुनने में आयेंगे जो ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार हों ।

सौर मास आधारित राशि

ऐसी स्थिति में नाम पर आधारित भविष्यवाणी का अर्थ ही क्या रह जाता है ? चलते-चलते एक बात और । पाश्चात्य ज्योतिष् में सूर्य पर आधारित राशि का प्रचलन है । अर्थात् व्यक्ति के जन्म के समय सूर्य जिस राशि में हो वही व्यक्ति की राशि कहलाती है । पाश्चात्य ज्योतिष् में एक कलेंडर माह के 27-28 तारीख के आसपास सूर्य नयी राशि में प्रवेश करता है और तीसएक दिन उस राशि में रहता है । इस काल में जन्मे सभी लोग एक ही राशि में माने जाते हैं और उनके लिए कमोबेश एक ही वर्षफल मान्य रहता है । किंतु इसी बीच चंद्रमा बारहों राशियों का चक्रमण कर चुका होता है और भारतीय ज्योतिष् के अनुसार बारह प्रकार की भविष्यवाणियां उन लोगों के लिए क्रमशः बताई जाती हैं । है न विसंगति ? कौन-सी पद्धति वस्तुतः सही है । इतना ही नहीं भारतीय ज्योतिष् में सूर्य एक राशि से दूसरे में संक्रमण कलेंडर माह के करीब 14-15 तारीख के आसपास करता है, जैसे 14-15 जनवरी में वह मकर राशि में प्रवेश करता है (माघ मास) । तदनुसार दो महीनों की उक्त तारीखों के बीच जन्मे व्यक्तियों की ‘सौर-राशि’ एक रहती है, जो पाश्चात्य पद्धति से मेल नहीं खाती । फिर सही क्या है ?

मीडिया में वर्णित ज्योतिषीय बातें सार्थक होती हैं यह बात संदेहास्पद है, किंतु वे मनोरंजन का अच्छा मसाला जरूर बनाते हैं । लोग विश्वास न भी करें तो भी चाव से ऐसी बातें पढ़ते हैं, और एकबारगी उसे सच मानकर प्रमुदित भी हो लेते हैं, एक प्रकार की तसल्ली पा लेते हैं । परंतु गंभीरता से इन बातों को लेने का कोई तुक नहीं बनता । पाठकवृंद इस बात के लिए क्षमा करें कि मैं इन्हें ऊटपटांग बातें मानता हूं । – योगेन्द्र जोशी