सावधान, महाराजाधिराज पधार रहे हैं! तीन बार स्थगित हो चुका प्रधानमंत्री का वाराणसी आगमन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी बीते 16 जुलाई अपने संसदीय क्षेत्र (अर्थात मेरे नगर) वाराणसी आने वाले थे । ऐन वक्त पर उनका आगमन निरस्त हो गया । कारण बताया जाता है कि रेलवे की औद्यागिक संस्था डी.एल.डब्ल्यू. (डीजल लोकोमोटिव वर्क्स) यानी डि.रे.का. (डीजल रेल कारखाना) में मोदीजी के संबोधन के लिए बनाए गए विशाल पंडाल की सजावट में लगे किसी श्रमिक की दुर्घटनावश मृत्यु हो गई । शायद यह वास्तविक कारण रहा हो । कुछ ऐसी ही एक दुर्घटना दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल की रैली में पहले कभी हुई थी । रैली चलती रही और बाद में केजरीवाल की काफी आलोचना हुई थी । ऐसे मातमी माहौल में भाषणबाजी करने पर मोदीजी की भी आलोचना होती अवश्य । मोदी जी के दौरों के बारे में जानकारी यहां और यहां प्राप्य है ।

मोदी जी विगत कुछ महीनों से वाराणसी नहीं आ पा रहे हैं । उन्हें विगत 16 जुलाई अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी आना था । इस बार प्रस्तावित उनके विविध कार्यक्रमों में से एक था काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) चिकित्सा संस्थान के नियंत्रण में चलने वाले ‘ट्रॉमा सेंटर’ का उद्घाटन । आधुनिक एवं उन्नत दर्जे का यह ‘अभिघात केंद्र’ पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपने किस्म की प्रथम चिकित्सकीय व्यवस्था है । मोदी जी को अपने गोद लिए गांव, जयापुर, भी जाना था । संयोग कहिए या दुर्योग, कि उक्त तारीख की पूर्व रात्रि जो बारिश आंरभ हुई वह अगले दिन (16 तारीख) डेड़-दो बजे तक चलती रही । इस बारिश की बजह से डीएलडब्ल्यु परिसर में बनाये गए विशाल पंडाल की स्थिति दयनीय हो गई । मोदी जी को सुनने के लिए कीचड़मय पंडाल के नीचे भीड जुट भी पायेगी इसमें शंका होने के कारण मोदी जी का वाराणसी दौरा निरस्त कर दिया गया । लेकिन कहा यही जाता है पानी से भीगे पंडाल में बिजली का कंरेंट लगने से वहां कार्य कर रहे एक मजदूर की मृत्यु हो गयी । असली कारण क्या रहा होगा यह प्रशासन ही बता सकती है ।

असल में मोदी जी को पिछले माह 28 जून को वाराणसी आना था । तब भी ऐन मौके पर अतिवृष्टि के कारएा उनका वाराणसी दौरा रद किया गया था । इस माह के 16 जुलाई का दौरा उसी रद दौरे के ऐवज में था, और वह भी फलित नहीं हो सका । अब फिर भविष्य में किसी दिन उनके आने का कार्यक्रम होगा । इस पावस ऋतु में उनका भावी दौरा फिर से निरस्त हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा । दोनों ही तारीखों पर अतिवृष्टि के कारण उनके दौरे निरस्त करने पड़े थे । संयोग देखिए उक्त तारीखों के आगे-पीछे कोई खास बारिश नहीं हुई । असल में 16 तारीख की दोपहर बारह-एक बजे तक पानी बरसना बंद हो चुका था, लेकिन तब तक उनका कार्यक्रम निरस्त घोषित हो चुका था । कल 22 तारीख थी और मेरे इलाके में 16 के बाद तब तक  पानी ही नहीं बरसा । शहर में हो सकता है कहीं थोड़े-बहुत छीटे पड़े होंगे ।

यह भी उल्लेखनीय है कि 12 अक्टूबर 2014 को भी मोदी जी का दौरा होना था । तब देश के पूर्वी समुद्र तट पर आए हुदहुद तूफान के कारण यहां का मौसम खराब हो गया था और उनका आगमन नहीं हो पाया । इस प्रकार हाल में उनके तीन प्रस्तावित वाराणसी-दौरे निरस्त हुए । इस अंतराल में वे 11 नवंबर एवं 25 दिसंबर को वाराणसी आए थे लेकिन तब तक बी.एच.यू. स्थित अभिघात केंद्र (ट्रॉमा सेंटर) का कार्य पूरा नहीं हो सका था ।

अखबार में छपी खबर के अनुसार जिन निरस्त दौरों का जिक्र ऊपर किमोदी के वाराणसी दौरेया गया है उन पर 30-35 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं । बात सही होनी चाहिए । कहा जा रहा है कि डी.एल.डब्ल्यू में विशाल पंडाल खड़ा करने में 9 करोड़ की लागत आई । उस पंडाल में विदेशी वाटरप्रूफ कनात-शामियाना इस्तेमाल हुआ था ऐसा सुना जाता है ।

मैं समझ नहीं पाता कि मोदी जी के दौरे पर इतनी विशाल राशि खर्चने की क्यों आवश्यकता है । यह सब उस मोदी जी के लिए जो दावा करते हैं कि उन्होंने गरीबी देखी है, वे गरीब परिवार में पले-बढ़े हैं । क्या बचपन की गरीबी के कारण अब वे शानोशौकत, दिखावा, तामझाम के शौकीन हो चले हैं । उनकी सुरक्षा मात्र पर तो यह राशि खर्च नहीं हो रही होगी ऐसा मेरा सोचना है । अगर सुरक्षा का इतना बड़ा सवाल है तो उन्हें वाराणसी आना ही नहीं चाहिए । बरसात के मौसम में जलजमाव होना सामान्य बात है । ऐसे में यह दौरा बरसात में रखा भी नहीं जाना चाहिए था ।

गरीबी और गरीबों की बात करने वाले मोदी जी को समझना चाहिए कि इतनी बड़ी राशि में कई गरीबों का भला हो सकता है । उन्होंने अपना दौरा सादगी के संदेश के साथ संपन्न करना चाहिए था । लेकिन अब वे गरीब कहां जो उसका दर्द समझें ।

मोदी जी के दौरे पर धन का अपव्यय तो होता ही है, साथ में आम जनता को दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं । दिक्कतों का अनुभव स्वयं मुझे हुआ है । बीते नवंबर में मेरे एक मित्र सपत्नीक भोपाल से आए थे । संयोग से उनके रेलगाड़ी से लौटने की तारीख वही थी जब मोदी जी का यहां कार्यक्रम चल रहा था । मेरे घर के पास के मुख्य मार्ग, बी.एच.यू.-डी.एल.डब्ल्यू. सड़क, पर वाहनों का आवागमन ठप था । आटोरिक्शा की दिक्कत हो सकती है इसका अंदाजा मुझे था । मैंने प्रातःकाल ही पास के चौराहे पर जाकर आटोरिक्शा वालों से समाधान पुछा था । तब उन्होंने बताया कि मुख्य मार्ग पर तो वाहन खड़े मिलेंगे नहीं, परंतु गलीकूचों के भीतर जरूर खड़े रहेंगे और आपको कोई न कोई मिल ही जाएगा । उस दिन स्टेशन जाने के लिए मैंने कोई छेड़-दो घंटे का अतिरिक्त समय निर्धारित कर रखा था । जब समय आने पर मैंने आटोरिक्शे खोजे जो कहीं कोई नहीं दिखा । इससे तनाव बढ़ा कि 10 कि.मी. दूर स्टेशन कैसे जाया जाए । तभी ध्यान में आया कि मेरे पासपड़ोस में रहने वाले और आटोट्रॉली से सामान ढोने का धंधा करने वाले कुछ मदद कर सकेंगे । संयोग से उस समय एक नौजवान घर पर मिल गया । उसकी मदद से मित्र को गली-कूचों से होते हुए स्टेशन तक छोड़ पाना संभव हो सका ।

दूसरा अनुभव बीते दिसंबर माह के 25 तारीख का है जब मेरे बेटा-बहू विदेश से वाराणसी आए हुए थे । वे मात्र 5-6 दिन के संक्षिप्त अंतराल के लिए यहां आए थे और अपना कार्यक्रम पहले से तय किए हुए थे । उस दिन आटोरिक्शा से उन्हें कहीं निकलना था । वाहन न मिलने के कारण उन्हें पैदल ही गंतव्य तक जाना पड़ा ।

और तीसरा अनुभव बीते 15 तारीख का है जब मोदी के 16 तारीख के आगमन की तैयारी चल रही थी । मुझे उस दिन कार्यवशात् लंका जाना पड़ा था । बी.एच.यू. प्रवेशद्वार के आसपास का इलाका लंका कहलाता है । यहीं से बी.एच.यू.-डी.एल.डब्ल्यू. मार्ग आरंभ होता है । मैं लंका पहुंच तो गया, किंतु कालांतर में जब लौटने लगा तो देखा कि विश्वविद्यालय प्रवेशद्वार के आसपास जबरदस्त जाम लगा है । जाम की समस्या तो वाराणसी में रहती ही है, लेकिन यह जाम पुलिस के 20-30 जीपों के कारण था जो अगले दिन मोदी जी की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम के चक्कर में नगरवासियों के लिए आफत पैदा किए हुए थे । गनीमत थी कि मैं साइकिल से गया था । उस जाम से साइकिल घसीटते हुए अगल-अगल के गली-कूचों से होकर मैं किसी तरह बी.एच.यू. परिसर में पहुंचा और वहां से लंबा रास्ता लेते हुए घर पहुंचा । लंका से आने में सामान्यतः जहां दसएक मिनट लगते हैं वहां इस बार आधे घंटे से अधिक का समय मुझे लगा ।

लोग लोकतंत्र के प्रशंसा-गीत गाते रहते हैं कि इसमें सभी नागरिक बराबर होते हैं । अवश्य ही मतदान के समय सभी बराबर होते हैं । सभी लाइन में लगते हैं और नंबर आने पर ही मत डालते हैं । मेरी जानकारी में विशिष्ट/अतिविशिष्ट जन भी उसी लाइन में लगते हैं । किंतु वोट डालने के बाद गैरबराबरी वापस लौट आती है । चुने गये राजनेता आम आदमी नहीं रह जाते हैं । उनके लिए सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ विशेष होता है जिनको पाने का सपना भी आम आदमी नहीं देख सकता ।

मैं अपने देश के लोकतंत्र को निर्वाचित राजशाही कहता हूं । लंबे अरसे से चले आ रही राजशाही विश्व में अब कम ही रह गए हैं । लगभग सभी प्रतीकात्मक रह गए हैं जिसमें राजा/रानी  की सक्रियता नहीं के बराबर होती है । वे सामान्यतः वंशानुगत होते थे, अर्थात राजा/रानी के बाद उनके बेटे-बेटियां सत्ता संभालती थीं/हैं । हमारे देश में ऐसा राजतंत्र अब रहा नहीं । लेकिन इस देश में लोकतंत्र ने जो स्वरूप धारण किया हुआ है वह राजशाही का ही बदला स्वरूप है, नया अवतार है । इस नये राजतंत्र में राजा जनता के मतों के आधार पर चुना जाता है, एक बार में केवल 5 साल के लिए । जो चुनकर गद्दी हासिल कर लेता है वह राजा हो जाता है विशेष अधिकारों से सुसंपन्न । एक प्रकार से देखा जाए तो वह मनमरजी से राजकाज कर सकता है । पूरी व्यवस्था उसके हाथ में होती है । अगर वह अपनी पुलिस को कहे कि अपराधी को पकड़ो तो वह पकड़ेगी, अगर कहे कि उसे छूना मत तो नहीं छुएगी । वह निरपराध को जेल में डाल सकता है, जिसे यह भ्रम हो सकता है कि कानून उसे बचाएगा, यह भूलते हुए कि पूरा शासकीय तंत्र तो लोकतंत्र के उस राजा के हाथ में रहेगा । उसे निरपराध सिद्ध कौन करेगा ? उस 5 साल में राजा बहुत कुछ कर सकता है, जो चाहे वह । प्रशासनिक तंत्र इस राजा के चेहरे के भाव पढ़कर कार्य करता है । पुलिस-प्रशासन जनता की समस्याओं की चिंता कम राजा की चिंता अधिक करता है ।

सरकार चलाने वालों को मैं तीन वर्गों में बांटता हूंः

(1) प्रथम महाराजाधिराज जिसमें राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री शामिल किए जा सकते हैं ।

(2) द्वितीय महाराजा जिसमें राज्यपाल, मुख्यमंत्री सरीखे राजनेता सम्मिलित किए जा सकते हैं ।

(3) तृतीय वर्ग राजाओं का जिसमें मंत्रियों को गिना जा सकता है ।

अन्य जनप्रतिनिधियों में से कुछ को मैं दरवारी कहता हूं जो राजा की कृपा पाने में प्रयासरत रहते हैं । उन्हें राजा का साथ देना होता है, बदले में राजा उन्हें विविध तरीकों से उपकृत करता है । उनके लिए राजा का विरोध करना वर्जित रहता है । जो दरवारी नहीं बन पाते हैं उन्हें अगली बार के राजा की प्रतीक्षा रहती है ।

इनको मैं राजा-महाराजा क्यों कहता हूं ? इसलिए कि वे राजा-महाराजाओं वाली सुख-सुविधाओं के हकदार होते हैं । सुरक्षा के नाम पर इनके लिए इंतजामात देखिए । पुलिसबल की पूरी ताकत इनके लिए तैनात रहती है । मरणासन्न मरीज का एंबुलेंस तक उनके रास्ते में नहीं आ सकता है । उनके रोगों के इलाज के लिए सर्वोत्तम अस्पताल/चिकित्सक रातदिन उपलब्ध रहते हैं । इलाज भी मुफ्त में । वे जब चाहें विदेश जा सकते हैं, अपनी गांठ का धेला खर्च किए बिना । मुफ्त का मकान, विजली-पानी चौबीसों घंटे । लोकतंत्र के ऐसे राजा-महाराजा जब अपनी दौरे पर निकलते हैं तो रातोंरात सड़कें समतल हो जाती हैं, सड़कों से कूड़ा गायब हो जाता है, बदबदाती नालियां साफ हो जाती है, और न जाने क्या-क्या नहीं हो जाता है । एक व्यक्ति के लिए इतना सब प्रजा के लिए क्यों नहीं ? आम आदमी सोच सकता है ऐसे विशेषाधिकार की ? इन्हें राजा न कहूं तो क्या कहूं ?

ऐसी राजकीय व्यवस्था में मोदी जी के वाराणसी आगमन की तैयारी पर करोड़ो खर्च हो जाए तो किसे कोफ्त होगी । कहते है डी.एल.डब्ल्यू के क्रीडांगन (स्पोर्ट्स ग्राउंड) की जमीन पंडाल की बजह से खराब हालत में हैं । सरकारी धन की बरबादी से इस देश में किसी को कचोटन नहीं होती है; अपनी जेब से थोड़े ही जा रहा हैं !

जीवन के आरंभ में गरीबी झेल चुके लोग जब कुरसी पर बैठते हैं तो वे अपने अतीत की चर्चा वोट बटोरने के लिए करते हैं,  न कि अतीत को याद करके जनता की सेवा के लिए । बीते समय की अपनी गरीबी को भी वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल करते हैं, और जनता उनके सम्मोहन में फंस जाती है । क्या करें, कुरसी की तासीर ही कुछ ऐसी होती है ! – योगेन्द्र जोशी

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प्रधानमंत्रीः “इंडिया अमेरिका नहीं है”, बेशक! और सरकारः “आतंकवाद पर हम गंभीर हैं”, क्या वाकई?

इंडिया अमेरिका नहीं है

अपनी हालिया अफगानिस्तान यात्रा के दौरान देश के माननीय प्रधानमंत्री डा. मनमोहनजी ने आतंकवाद के संदर्भ में है कहा था कि इंडिया अमेरिका नहीं है (ऐसी ही खबर सुनने को मिली थी) । ये बात प्रधानमंत्री ने कुछ ऐसे लहजे में कहा जैसे कि अपने देशवासियों को यह गलतफहमी हो कि अब हम विश्व महाशक्ति बन चुके हैं और अमेरिका की बराबरी पर पहुंच चुके हैं । मुझे पूरा विश्वास है कि किसी को भी ऐसी गलतफहमी नहीं रही होगी, न अपने देशवासियों को न ही विदेशियों को । जो कोई भी अमेरिका के बारे में थोड़ा-बहुत जानता है वह भली भांति समझता है कि अपना ‘इंडिया दैट इज भारत’ अभी अमेरिका से कोसों दूर है । अमेरिका की बराबरी पर यह देश कभी आ भी सकेगा यह संदेहास्पद है । फिलहाल अभी आगामी 2-3 पीढ़ियों तक तो कोई उम्मीद नहीं है । हो सकता है कि 8-10 फीसदी की आर्थिक विकासदर की वजह से कुछ लोग गलतफहमी के शिकार हों ।

निःसंदेह प्रधानमंत्रीजी के उद्गार व्यापक संदर्भ में नहीं थे । दुनिया के तथाकथित सबसे बड़े आतंकी ओसामा को अमेरिका द्वारा मौत के घाट उतारे जाने पर पत्रकारों की जिज्ञासा पर उन्होंने यह बात कही थी । लोग शायद यह जानना चाहते थे कि क्या पाकिस्तान स्थित आतंकियों पर अपना देश भी कुछ वैसे ही कदम उठाने की सोच सकता है जैसे अमेरिका ने उठाए । उनका दो टूक उत्तर “इंडिया अमेरिका नहीं है” इस बात को स्पष्ट करता है कि हमारे पास अमेरिका की भांति संसाधन नहीं हैं । यह भी सच है कि अमेरिका मित्र देशों तथा समुद्र से घिरा है, जब यह देश शत्रु देशों अथवा उन देशों से घिरा है जिनकी मित्रता संदिग्ध है । लेकिन सबसे बड़ी बात जो प्रधानमंत्रीजी के मंतव्य में निहित रही है वह है कि हमारे पास अमेरिका की भांति दृढ़ इच्छाशक्ति तो है ही नहीं । हमारी सोच जब वैसी है ही नहीं तो किसी भी प्रकार की कार्यवाही का सवाल ही नहीं उठता । हम बंदरघुड़की दे सकते हैं, लेकिन उसके आगे कुछ नहीं कर सकते हैं ।

सरकार आतंकवाद पर गंभीर?

मैं आगे कुछ और कहूं इसके पहले इस बात का भी जिक्र कर दूं कि दो-चार दिन पहले सरकार का यह वक्तव्य सुनने को मिला थाः “आतंकवाद पर हम गंभीर हैं ।” क्या वाकई में? गंभीरता का मतलब क्या है? देश के मुखिया, डा. मनमोहन सिंह, सदा ही गंभीर नजर आते हैं । उनके मुख पर आम तौर पर न खुशी के भाव नजर आते हैं और न ही चिंता के । वे किसी भी अवसर पर बोलने से कतराते हैं; चुप्पी साधे रहना उनकी आदत है । गंभीरता के अर्थ क्या उनके इसी रवैये से है?  गंभीर बने रहो, न कुछ बोलो और न कुछ सुनो, न ही कुछ देखो । रोजमर्रा की जिंदगी में लोग ऐसे व्यक्ति को गंभीर कहते हैं, जो खुशी में न खिलखिलाकर हंस सके और न ही तकलीफ होने पर आह भर सके । देश तमाम तरह की घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन वे चुप बैठे रहते हैं । अधिक से अधिक मुझे खेद है का वक्तव्य दे दो, बस ।

लेकिन जब सरकार कहती है “आतंकवाद पर हम गंभीर हैं ।” तो अवश्य ही उसके अर्थ मात्र शाब्दिक नहीं होंगे । सरकार यह जताना चाहती होगी कि वह आतंकवाद को लेकर मात्र चिंतित ही नहीं है, बल्कि उससे निबटने के लिए कारगर कदम उठाने का संकल्प ले रही है । लेकिन कारगर उपाय क्या हो सकते हैं इस बात का कहीं कोई संकेत नहीं मिलते हैं । अभी तक का जो अनुभव रहा है उसके आधार पर यही कहा जा सकता है कि सरकार का दावा कोरे आश्वासन के अधिक कुछ नहीं हो सकता है । जो कुछ अभी तक होता आया है वही आगे भी होगा । आतंकियों को जहां मौका मिलेगा वे वारदात को अंजाम देंगे ही । वे पक्के इरादे लेकर चलते हैं । उनकी अपनी जान निकल भी जाए तो कोई बात नहीं, बस घटना को अंजाम देना है यह विचार उनके नियंताओं द्वारा उनकी सोच में गहरे बिठा दी जाती है । तब आप कर क्या सकते हैं?

शायद सरकार अपने खुफिया तंत्रों को अधिक सुदृढ़ करने का विचार कर रही है । ऐसा करने से कहां आतंकी घटना होने जा रही है इसकी पूर्व सूचना मिल जाएगी और घटना को रोका जा सकेगा । अवश्य ही ऐसा करना वांछित होगा, पर इतना क्या पर्याप्त होगा? क्या यह आवश्यक है कि किसी संभव वारदात की जानकारी सदैव जुटाई जा सके? क्या खुफिया विभागों में सुयोग्य लोग भरे पड़े हैं, और वह भी पर्याप्त संख्या में? जिस देश में सर्वत्र भ्रष्टाचार फैला हो वहां क्या साफ-सुथरे खुफिया तंत्र की उम्मीद की जानी चाहिए? उनकी ईमानदारी पर भरोसा भी कर लें तो भी क्या आम जनता से पर्याप्त सहयोग मिल सकता है? आम जनता तो रोजमर्रा की जिंदगी में भी लापरवाही से होने वाली दुर्घटनाओं को नहीं रोक पाती है; उससे भला कितनी उम्मीद करें? सरकारी रवैया यह है कि जब वारदात हो जाती है तो संबंधित सरकारी मुलाजिम हरकत में आ जाते है और सर्वत्र चेतावनी जारी कर दी जाती है, गोया कि अब किस क्षण, कहां पर अगली वारदात होने जा रही है यह पता चल गया हो । लेकिन दो-चार दिनों में ही सब ढीले पड़ जाते हैं, और तब तक आतंकी अगली वारदात के लिए तैयार हो जाते हैं । यही सिलसिला बदस्तूर चलता आ रहा है ।

आक्रामकता का अभाव

आतंकी वारदातों में मोबाइल फोनों की अहम भूमिका पायी गयी है । लेकिन सरकारी तंत्र की गंभीरता का अंदाजा इसी से लग जाता है कि हमारे यहां मोबाइल नंबरों का कोई सत्यापन नहीं होता है । कागजों में शायद बहुत कुछ हो रहा होगा, परंतु वास्तविकता में नहीं । नकली दस्तावेजों के आधार पर मोबाइल पा लेना बहुत मुश्किल काम नहीं है । आतंकियों के पास मोबाइल पहुंचते कैसे हैं? इतना ही नहीं, दुपहिया-चौपहिया वाहनों के मालिकों तक का पता पुलिस नहीं लगा पाती है । चंद्रमा में उतरने के ख्वाब देख रहे देश में आज भी यह व्यवस्था नहीं है कि एक क्लिक पर वाहन-स्वामी का नाम-पता-ठिकाना मालूम हो जाए, या उसके चोरी हो चुकने की जानकारी मिल जाए । क्या सरकार की गंभीरता में वांछित ‘डाटा-बेस’ की कोई अहमियत है? केवल कागजी योजनाएं बनाकर बैठ जाना बेमानी है ।

लगता है कि सरकार आतंकी वारदातों के संदर्भ में रोकथाम के तरीके ईजाद कर रही है । ऐसा करना ‘बचाव मार्ग या डिफेंसिव अप्रोच’ है, जो उपयोगी तो है, किंतु पर्याप्त नहीं । अमेरिका भी बचाव के सभी रास्ते अपना रहा है । लेकिन वह साथ में ‘आक्रामक या ऑफेंसिव’ तरीका भी अपनाते आ रहा है । जब भी उसे लगता है कि फलां-फलां खतरे बन सकते हैं तो वह उन्हें ठिकाने लगाने से भी पीछे नहीं रहता है । ओसामा के मामले में उसने बड़ी बारीकी से ऐसा किया और उसका काम तमाम कर दिया । अमेरिका ओसामा का नाम तो नहीं मिटा सकता, लेकिन उसकी कोई निशानी बचने न पाए इसकी पूरी कोशिश की । उसके शव समुद्र में कहां ठिकाने लगाया इसका पता तक नहीं ।

निश्चय ही इंडिया अमेरिका नहीं है । मुझे पूरा विश्वास है कि अमेरिका ने ओसामा को जिंदा न पकड़ने का प्रयास जानबूझ कर किया । ओसामा को अपना पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया, ताकि कानूनी लड़ाई का अवसर देकर कोई नयी आफत न मोल लेनी पड़े । ऐसे आतंकी के शव को ज्ञात स्थान पर दफनाना तक अमेरिका को गवारा नहीं था । आतंकियों को कड़ा संदेश देना अमेरिका जरूरी मानता है, भले ही आतंकियों पर उसका असर न पड़े । किंतु रियायत किसी भी हाल में नहीं ।

कड़ा संदेश नहीं

लेकिन ‘इंडिया’ ने आतंकियों को यह संदेश कभी नहीं दिया कि उनके साथ कड़ाई से पेश आया जाएगा । हम केवल उनकी सही-गलत लिस्ट बनाते हैं और पाकिस्तान को पेश करके इंतिजार करते हैं कि वे इस देश को सौंपे जाएंगे । कानूनी प्रक्रिया के समय और उसके बाद भी वे हमारे जेलों में मेहमान की तरह रखे जाएंगे । उनकी सुरक्षा पर लाखों-करोड़ों खर्च किया जाएंगे; उच्चतम न्यायालय फांसी की सजा सुना दे, फिर भी उन्हें फांसी नहीं दी जाएगी ।

क्या वजह है कि यह देश कसाब और अफजल को फांसी देने तक की हिम्मत नहीं कर पाता? जब कोई आतंकी घोषित हो चुका हो, उसे फांसी की सजा सुना दी जा चुकी हो, तो फिर उस पर कैसा रहम? यदि हम सजा का कार्यान्वयन नहीं कर सकते तो आतंकियों को क्या संदेश जाता है? उन्हें क्या हम यह बताना चाहते हैं कि हम तुम्हें क्षमा कर सकते हैं? आतंकवाद के प्रति यह किस गंभीरता का द्योतक है? वारदात को रोकना सही है, लेकिन घट चुकी वारदात के लिए जिम्मेदार लोगों को त्वरित सजा निहायत जरूरी है, यदि आप सच में गंभीर हैं तो । क्या यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि कल ऐसे आतंकियों को छुड़ाने के लिए अपहरण जैसी घटना घटे और देश को उसकी भारी कीमत चुकानी पड़े?

सरकार के ऐसे नरम रवैये के पीछे मुझे एक कारण नजर आता है । आप उसे नहीं मानेंगे; शायद ही कोई मेरी ‘थ्यौरी’ पर भरोसा करेगा । मेरा सोचना कि भारत का हर राजनैतिक दल मुस्लिम समुदाय से डरा सहमा रहता है । अफजल-कसाब मुस्लिम समाज से आते हैं और प्रायः हर दल सोचता है कि इनको फांसी देने पर उक्त समुदाय दंगे-फसाद पर उतर आएगा । न भी दंगा करे तो भी चुनावों में वोट नहीं देगा । सत्ता पर टिके रहने के लिए उनकी अनुकंपा आवश्यक है, अतः उन्हें नाखुश नहीं किया जाना चाहिए । बेचारा मुस्लिम समुदाय वास्तव में क्या सोचता है यह कोई जानने की कोशिश नहीं करता । उन्हें अफजल-कसाब से कुछ लेना-देना नहीं होगा, किंतु हमारे सियासी दल आश्वस्त नहीं रहते हैं । अन्यथा उच्चतम न्यायालय फांसी की सजा सुनाए फिर भी वर्षों उस पर अमल न हो यह समझ से परे है, खासकर जब मामला आतंकी वारदात से जुड़ा  हो । क्या कोई आतंकी रहम के काबिल हो सकता है? हमारी सरकारें टालमटोल की नीति पर चलती है, त्वरित निर्णय लेकर जोखिम उठाने का माद्दा किसी भी दल में नहीं है ।

सरकार ऐसा कुछ भी करने में सफल नहीं है जिससे आतंकी संगठन भयभीत हो सकें । इसके विपरीत देश उनसे भयभीत है और बचाव के रास्ते खोजता रहता है । यही सब तो आतंकियों का मकसद है । वे सफल हैं! – योगेन्द्र जोशी

भारत के अभी तक के प्रधानमंत्रियों में भ्रष्टतम कौन?

‘फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन’

दुनिया की सबसे बड़ी डिमॉक्रसी या लोकतंत्र कहलाने वाले अपने देश इंडिया दैट इज भारत का नागरिक होने का एक अविवादित लाभ यह है कि आप यहां पूरी तरह स्वतंत्र है । आपको अमर्यादित स्वछंदता हासिल है कि आप जो चाहे कर लें । भ्रष्टाचार के नाले में जब चाहें जितना चाहें नहाने की छूट यदि आपको मिली हो, तो भला सच-झूट, सार्थक-निरर्थक, मीठा-कड़ुआ, कुछ भी बोलने का अधिकार तो मिलना ही है न ? आपको खाने को मिले या न मिले, पास में पहनने-ओड़ने को कुछ रहे या न रहे, खुले आसमान के नीचे रात गुजारनी पड़े या नहीं, लेकिन कुछ भी बोलने की छूट तो हर किसी को मिली ही है । बोलने की छूट ही नहीं,  बोलने पर ‘मैंने ऐसा नहीं कहा’ कहने की भी छूट आपको प्राप्त है । ऐसी ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ अर्थात् ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ अपने नागरिकों को मिली है । इस जीवन में भला कुछ और क्या चाहिए ? इसी ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ का लाभ लेते हुए मैं कुछ कहने जा रहा हूं । क्षमा करें यदि आप ‘ऑफेंडेड’ या आहत हों । ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ नामक अधिकार का ही तो प्रयोग कर रहा हूं, क्या गलत कर रहा हूं?

मैं अपनी बात विशेष अवसर पर कर रहा हूं । बीते कल सुप्रतिष्ठित समाजसेवी माननीय अन्ना हजारे आमरण अनशन पर बैठे चुके हैं । उन्होंने यह कदम देश में निरंतर बढ़ रहे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज के तौर पर उठाया है । उनकी मांग है कि सरकार प्रभावी लोकपाल बिल पास कराए और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कारगर कदम उठाए । उनको अनेकों सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों का समर्थन मिल रहा है । क्या वजह है कि उन्हें यह कदम उठाना पड़ा है? क्या वजह है कि सरकार खुदबखुद उसके नाक के नीचे घट रहे भ्रष्टाचार पर नजर नहीं डालती है? क्या वजह है कि वे भ्रष्ट व्यक्तियों के विरुद्ध तब तक कदम नहीं उठाती है, जब तक कि जनता सड़क पर नहीं उतरती और उच्चतम न्यायालय घटनाओं को संज्ञान में लेते हुए समुचित आदेश नहीं देती?

मेरी नजर में यह सब इसलिए है क्योंकि इस देश की बागडोर इस समय आज तक के सबसे भ्रष्ट प्रधानमंत्री के हाथ में है । दुर्भाग्य से राजकाज ऐसे व्यक्ति के हाथ में है जो साफ-सुथरी छवि का मुखौटा पहने हुए भ्रष्टाचार को अपने पांव फैलाने दे रहा है । जी हां, मौजूदा प्रधानमंत्री को मैं अभी तक के सभी प्रधानमंत्रियों में भ्रष्टतम मानता हूं । मेरे अपने तर्क हैं । आपको उन तर्कों को सिरे से नकारने की स्वतंत्रता है, ठीक वैसे ही जैसे मुझे उन्हें पेश करने की । यदि आप मेरी बात से आहत हों तो यहीं थमकर आगे की बात पढ़ना बंद कर दें ।  अपनी बात कहना शुरु करूं इसके पहले मैं अभी तक के सभी प्रधानमंत्रियों की सूची प्रस्तुत करता हूं:

भारत के अभी तक के प्रधानमंत्री (अगस्त 1947 – मार्च 2011)

1. पंडित जवाहरलाल नेहरू, 15 अगस्त 1947 – 27 मई 1964, करीब 15 साल 9 महीने [Pundit  Jawaharlal Nehru, 15 Aug. 1947 – 27 May 1964, 15 years 9 months]
*** श्री गुलजारीलाल नंदा, 27 मई 1964 – 9 जून 1964, 14 दिन [Sri Guljarilal Nanda, 27 May 1964 – 9 June 1964, 14 days]
2. श्री लालबहादुर शास्त्री, 9 जून 1964 – 11 जन. 1966, करीब 1 साल 7 महीने [Sri Lal Bahadur Shastri, 9 June 1964 – 11 Jan. 1966, about 1 year 7 months]
*** श्री गुलजारीलाल नंदा, 11 जन. 1966 – 24 जन. 1966, 14 दिन [Sri Guljarilal Nanda, 11 Jan. 1966 – 24 Jan. 1966, 1 4 days]
3. श्रीमती इंदिरा गांधी, 24 जन. 1966 – 24 मार्च 1977, करीब 11 साल 2 महीने [Srimati Indira Gandhi, 24 Jan. 1966 – 24 March 1977, about 11 years 2 months]
4. श्री मोरारजी देसाई, 24 मार्च 1977 – 28 जुलाई 1979, करीब 2 साल 4 महीने [Sri Morarjee Desai, 24 March 1977 – 28 July 1979, about 2 years 4 months]
5. श्री चरण सिंह, 28-7-1979 – 14 जन. 1980, करीब 6 महीने [Sri Charan Singh, 28 July 1979 – 14 Jan. 1980, about 6 months]
3. श्रीमती इंदिरा गांधी, 14 जन. 1980 – 31 अक्टू. 1984, करीब 4 साल 10 महीने [Srimati Indira Gandhi, 14 Jan. 1980 – 31 Oct. 1984, about 4 years 10 months]
6. श्री राजीव गांधी, 31 अक्टू. 1984 – 2 दिस. 1989, करीब 5 साल 1 महीना [Sri Raajiv Gandhi, 31 Oct. 1984 – 2 Dec. 1989, about 5 years 1 month]
7. श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, 2 दिस. 1989 – 10 नव. 1990, करीब 11 महीने [Sri Vishwanath Pratap Singh, 2 Dec. 1989 – 10 Nov. 1990, about 11 months]
8. श्री चंद्रशेखर, 10 नव. 1990 – 21 जून 1991, करीब 7 महीने [Sri Chandrasekhar Singh, 10 Nov. 1990 – 21 June 1991, about 7 months]
9. श्री पी. वी. नरसिम्हाराव, 21 जून 1991 – 16 मई 1996, करीब 4 साल 11 महीने [Sri P. V. Narsimharao, 21 June 1991 – 16 May 1996, about 4 years 11 months]
10. श्री अटल बिहारी बाजपाई, 16 मई 1996 – 1 जून 1996, करीब 17 दिन [Sri Atal Bihari Bajpayee, 16 May 1996 – 1 June 1996, 17 days]
11. श्री एच. डी. देवगौढा 1 जून 1996 – 21 अप्रैल 1997, करीब 11 महीने [Sri H. D. Deve Gauda 1 June 1996 – 21 April 1997, about 11 months]
12. श्री इंदर कुमार गुजराल, 21 अप्रैल 1997 – 19 मार्च 1998, करीब 11 महीने [Sri Inder Kumar Gujral, 21 April 1997 – 19 March 1998, about 11 months]
10. श्री अटल बिहारी बाजपाई, 19-3-1998 – 22 मई 2004, करीब 6 साल 2 महीने [Sri Atal Bihari Bajpayee, 19 March 1998 – 22 May 2004, about 6 years 2 months]
13. श्री मनमोहन सिंह, 22 मई 2004 से पद पर, करीब 6 साल 9 महीने [Sri Manmohan Singh, 22 May 2004 onward, 6 years 9 months completed]

अभी तक कुल 13 प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल इस देश ने देखा है । इसके अतिरिक्त श्री गुलजारीलाल नंदा भी इस कुर्सी पर बैठ चुके हैं, किंतु दुर्भाग्य से वे तात्कालिक अवश्यकताओं के कारण दो बार केवल कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर टिक पाए, पहली बार जब पंडित नेहरू का देहावसान हुआ, और दूसरी बार जब शास्त्रीजी की ताशकंद (तत्कालीन सोवियत रूस) में आकस्मिक मृत्यु हुई । दोनों बार वरिष्ठतम राजनेता होने के बावजूद प्रधानमंत्री पद के औपचारिक चुनाव के बाद उन्हें चयनित व्यक्ति के लिए पद छोड़ना पड़ा । इसलिए उन्हें असल प्रधानमंत्रियों की सूची में नहीं गिना जाता है ।

अगर यह सवाल उठे कि इस देश के आज तक के सभी प्रधानमंत्री क्या पूर्णतः ईमानदार रहे हैं, तो मेरा उत्तर ‘नहीं’ में होगा । (आप यदि ऐसा नहीं मानते तो आपको मैं एक सौभाग्यशाली व्यक्ति कहूंगा, क्योंकि ऐसा भ्रम पालकर सुखी रह पाना हर किसी के नसीब में नहीं हो सकता ।) उदाहरण के तौर पर यदि श्रीमती इंदिरा गांधी साफ-सुथरी ही मानी गयी होतीं, तो जयप्रकाशजी को उनके विरुद्ध आंदोलन न छेड़ना पड़ता, उन्हें अपनी गद्दी बचाए रखने के लिए आपात्काल घोषित न करना पड़ता, और कालांतर में (1977 में) कांग्रेस के बदले जनता पार्टी केंद्रीय सत्ता पर काबिज न होती, इत्यादि । यदि उक्त सभी को इमानदारों की श्रेणी में माना जाएं, तब कम भ्रष्ट एवं अधिक भ्रष्ट का सवाल ही नहीं रह जाता है । उसके आगे तुलना में कुछ कहने को रह ही क्या जाता है?

ईमानदार कौन?

‘बेचारे’ गुलजारीलाल जी सही माने में प्रधानमंत्री नहीं बन सके, अन्यथा वे शायद सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री माने जाते । मैं यह बात इस आधार पर कह रहा हूं कि एक कांग्रेसी राजनेता के तौर वे बेहद ईमानदार व्यक्ति कहे जाते थे, सही अर्थों में गांधीवादी और पूरी सादगी के साथ जीवनयापन करने वाले । (उन दिनों मैं कालेज/विश्वविद्यालय स्तर का छात्र हुआ करता था, इसलिए राजनीति की बातों को समझने लगा था ।)

विगत प्रधानमंत्रियों की ईमानदारी के संदर्भ में परस्पर तुलना तभी सार्थक हो सकती है जब उनके कार्यकालों की अवधि पर भी विचार हो । गौर करें कि केंद्र की सत्ता पर लंबे अरसे तक कांग्रेस का ही कब्जा रहा है । कांग्रेस से संबद्ध सभी प्रधानमंत्रियों (क्रमशः पंडित नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री राजीव गांधी, श्री नरसिम्हाराव, डा. सिंह) ने करीब 5 साल या उससे कहीं अधिक समय तक कुर्सी संभाली है । इतने लंबे अंतराल के प्रधानमंत्रित्व का गैरकांग्रेसी अपवाद एकमात्र बाजपाईजी रहे हैं ।

श्री शास्त्रीजी एवं श्री देसाईजी का कार्यकाल भी बमुश्किल ढाई साल या उससे भी कम रहा है । शेष अर्थात् सर्वश्री चरण सिंह, विश्वनाथ सिंह, चंद्रशेखर, देवगौढा, गुजराल तो साल-साल भर भी नहीं टिक पाए । इन लोगों का कार्यकाल जोड़तोड़ तथा मौके के फायदे से कुर्सी हथियाने और उस पर टिकने की रही है, किंतु सफल कोई नहीं रहा । इनका कार्यकाल इतना छोटा रहा कि उसके आधार पर उनकी ईमानदारी आंकना ही बेमानी है । इनके राजकाज में भ्रष्टाचार की बातें कम रहीं और ‘अब किसकी बारी है, कौन कब लुड़केगा, कौन किसे लंगड़ी मारेगा’ आदि के लिए अधिक जाना जाएगा । अतः भ्रष्टाचार विषयक तुलना के लिए इनके नामों पर विचार का अर्थ नहीं है ।

शास्त्री भी एक ईमानदार व्यक्ति माने जाते थे । ताशकंद में चली ‘भारत-पाक’ समझौते की बैठक में न जाने क्या हुआ कि उनका निधन वहीं हो गया । उनकी मृत्यु रहस्यमयी ही रही है । बेचारे अगर जीवित रहते तो शायद अच्छे प्रधानमंत्री सिद्ध होते । जितना कुछ मुझे याद पड़ता है, उसके अनुसार उन पर शायद ही अंगुली उठाई गयी हो ।

देसाईजी के प्रति मुझे सहानुभूति है । 1977 में जनता दल की सरकार तो बन गयी, किंतु बतौर प्रधानमंत्री देसाईजी टिकाऊ नहीं सिद्ध नहीं हो सके । दरअसल तब चौधरी चरण सिंह और श्री जगजीवन राम असंतुष्ट बने रहे । नेताओं में कुर्सी हथियाने की लालसा परोक्ष रूप से कार्यशील रही और अंत में श्री चरण सिंह ने श्रीमती गांधी की मदद से पद पा लिया, जिस पर श्रीमती गांधी ने उन्हें अधिक दिनों तक टिकने नहीं दिया (श्रीमती गांधी की ईमानदारी!)। बेचारे देसाईजी इतना समय ही न पा सके कि देश का भला-बुरा कुछ कर पाते । बहरहाल यही कह सकता हूं कि वे भ्रष्ट नहीं माने जाते थे ।

भ्रष्टतम प्रधानमंत्री?

अतः भ्रष्टतम का निर्धारण करने के लिए आपके सामने बाजपाई जी के अलावा केवल कांग्रेससंबद्ध प्रधानमंत्री रह जाते हैं । इनमें से किसी को भी पूरी तरह पाकसाफ कहना अनुचित होगा । नेहरू जी के समय भी घोटाले हुए थे ऐसा मेरे ध्यान में है । तब भी वे बदनाम नहीं हुए । श्रीमती गांधी राजनीतिक रूप से साफ नहीं रही हैं, परंतु उनके होते हुए गंभीर आर्थिक घोटाले हुए हों ऐसा शायद ही कोई कहेगा । श्री राजीव गांधी पर घोटाले का दाग सुविख्यात है, और उसी के बल पर श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह कुर्सी पा सके । अपनी कुर्सी बचाने के लिए हथकंडे अपनाने के लिए श्री नरसिम्हाराव भी बदनाम रह चुके हैं । अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने के आरोप बाजपाईजी पर भी लगे ही हैं ।

इतना सब होने पर भी एक-से-बढ़कर-एक आर्थिक घोटालों की बात इन सबके कार्यकाल के संदर्भ में नहीं कही जाती है (बोफोर्स घोटाले को छोड़ दें तो) । लेकिन अब डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल की जो तस्वीर साफ हो रही है वह अवश्य ही घबड़ाहट एवं निराशा पैदा करने वाली है । और इसीलिए मैं उन्हें भ्रष्टतम प्रधानमंत्री कहता हूं ।

अपनी बात स्पष्ट करने के लिए मैं अपनी इस मान्यता पर जोर डालना जरूरी समझता हूं कि प्रधानमंत्री की ईमानदारी के लिए वही मापदंड नहीं अपनाए जा सकते हैं जो किसी रिक्शे वाले या सड़क किनारे ठेले पर सामान बेचने वाले या आफिस के चपरासी जैसे आम जनों पर लागू किए जाएं । यह कहना कि मौजूदा प्रधानमंत्री ‘व्यक्तिगत तौर पर’ एक साफ-सुथरे व्यक्ति हैं निरर्थक/बेमानी बात है । ऐसे वक्तव्य शिष्टाचार के नाते दिये जाते हैं । उच्च पदस्थ व्यक्ति के मामले में उसके पद की गरिमा का विचार भी ऐसे में बहुत कुछ कहने से हमें रोकता है ।

डा. मनमोहन सिंह बतौर प्रधानमंत्री

याद रखें कि प्रधानमंत्री पूरे देश के राजकाज को करीने से चलाने के लिए होता है । अगर वह बेईमान लोगों को साथ लेकर चल रहा हो, उनको जो जी में आए उसे करने की छूट देता हो, उनके क्रियाकलापों की समीक्षा करने से कतराता हो, तो उसे साफ नहीं कहा जा सकता है । कोई भी ईमानदार व्यक्ति बेईमान लोगों की शर्तों पर राजकाज चलाने को तैयार नहीं हो सकता है । भ्रष्टाचार बढ़ता जाए, लोग ‘त्राहि माम’ कहने लगें फिर भी प्रधानमंत्री ‘गठबंधन धर्म’ जैसे भ्रामक शब्द बोलकर अपने असली दायित्व से बचते रहें, तब उन्हें ‘स्वच्छ छवि वाला’ कहना निहायत बचकानी बात होगी । क्या होता है ये गठबंधन धर्म? किस धर्मग्रंथ में है इसका जिक्र? किस राजनीतिशास्त्र में लिखा है कि सरकार चलाने के लिए, अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए, हर समझौता स्वीकारा जाना चाहिए? क्या सरकार चलाने का मौलिक उद्येश्य देश के हित साधना है, या राजनीतिक दलों के सिद्धांतहीन गठजोड़ को बनाए रखना, भले ही देश रसातल को चला जाए? एक ईमानदार व्यक्ति अपने दायित्वों के मामले में ढुलमुल रवैया नहीं अपना सकता । लेकिन डा. मनमोहन सिंह का रवैया ऐसा ही अवांछित है ।

मौजूदा प्रधानमंत्री के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के सभी रिकार्ड टूटे हैं, और वे चुप्पी साधे रहे हैं । “ मैं क्या करूं”, “मुझे नहीं मालूम” जैसी बचकानी बातें करके अपना बचाव करते आए हैं । प्रधानमंत्री लाचार तो देश का क्या होगा?

कभी-कभी मुझे लगता है कि डा. सिंह महात्मा गांधी के अनुयायी तो नहीं हैं, परंतु गांधीजी के ‘तीन बंदरों’ के अनुयायी अवश्य हैं । उन बंदरों की तरह भ्रष्टाचार के बारे में वे “न कुछ देखते हैं”, “न कुछ सुनते हैं”, और “न कुछ बोलते हैं” । चुप्पी लगा लो और समय के साथ सब शांत हो जाएगा के सिद्धांत पर वे चलते हैं ।

डा. सिंह कितने ईमानदार हैं इसकी सर्वोत्तम बानगी उनके द्वारा की गयी चीफ विजिलेंस कमिश्नर (सीवीसी) की नियुक्ति का मामला है । जिसकी नियुक्ति हुई उस व्यक्ति पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और न्यायालय में मामला विचाराधीन है । प्रधानमंत्री लंबे अर्से तक नियुक्ति को उचित ठहराते रहे, जब तक कि उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्ति अवैध घोषित न हो गयी । अब वे गले से न उतरने वाला तर्क देते हैं कि संबंधित अधिकारियों ने उन्हें अंधेरे में रखा । यह तो हास्यास्पद है कि उन्हीं के अधीनस्थों की यह हिम्मत कि उन्हें धोखा दें । ऐसे अधिकारियों को घंटों के भीतर निकाल बाहर किया जाना चाहिए, लेकिन वाह रे अपने लाचार प्रधानमंत्री । किंतु समझ से परे तो यह वाकया है कि नियुक्ति समिति की सदस्या, श्रीमती सुषमा स्वराज (नेता विपक्ष), ने जब मामले की गंभीरता की ओर उनका घ्यान खींचा तो वस्तुस्थिति को ठीक-से जांचने के लिए 24 घंटे का भी समय नहीं लगाया । इसके विपरीत आनन-फानन में नेता विपक्ष को नजरअंदाज करते हुए उन्होंने गलत निर्णय ले ही लिया । आप उसे गलती नहीं कह सकते, क्योंकि उनको गलती का एहसास दिलाया जा रहा था । ऐसा आनन-फानन का निर्णय एक भ्रष्ट व्यक्ति ही ले सकता है

ऊपर का उदाहरण अकेला नहीं हैं । हाल के महीनों में मौजूदा प्रधानमंत्री के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के अनेकों मामले उजागर हुए हैं, और हर मामले में उनकी चुप्पी रहस्यमय रही है । पूर्व संचारमंत्री ए. राजा का ही मामला ले लीजिए, जिनकी शिकायतें उन्हें मिलती रहीं, और वे राजा का बचाव तब तक करते रहे जब तक संभव था । एक ईमानदार प्रधानमंत्री क्या ऐसा कर सकता है ?

देश का दुर्भाग्य है कि इसका शासन एक मूलतः नौकरशाह के हाथ में है । डा. सिंह कि खासियत यह है कि वे कभी जननेता नहीं रहे हैं, उनकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं रही है, वे कभी भी एक सक्रिय नेता की भांति आम लोगों के बीच नहीं रहे हैं, उन्होंने कभी भी आम लोगों की लड़ाई नहीं लड़ी है, और मेरा मानना है कि उनकी प्रतिबद्धता आम लोगों के प्रति कम और नेहरू-गांधी परिवार के प्रति अधिक है । मेरे मत में उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि नौकरशाहों की बिरादरी के प्रति वे अति उदार हैं । वे नहीं चाहेंगे कि कोई नौकरशाह कभी सजा पाए, चाहे वह कितना ही भ्रष्ट हो !

माननीय अन्ना हजारे अनशन पर बैठे हैं । आगे क्या होगा यह कोई ज्योतिषी नहीं बता सकता है । लेकिन यह सुनिश्चित है कि अपने प्रधानमंत्री एड़ी-चोटी का जोर लगायेंगे कि ऐसा लोकपाल बिल पास होवे जो निष्प्रभावी एवं निर्बल हो, ताकि न कोई राजनेता और न ही कोई नौकरशाह जीते-जी दंडित हो सके । वाह, क्या ईमानदारी है ।

भगवान् भरोसे है यह देश ! – योगेन्द्र

विंस्टन चर्चिल, भारत की स्वाधीनता, लोकतंत्र और …(भाग 2)

(23 अगस्त की पोस्ट का पूरक अंश)

“Democracy without self-control and restraint turns into anarchy. Discipline is the very essence of democracy.”
– Jawaharlal Nehru (Speech, Pune, 26 July 1939)

मेरे अनुभव

अपने प्राथमिक विद्यालय के दिनों (1952-7) की बातें याद करते हुए मुझे आज के हालातों को देख निराशा होती है । अपनी अल्पशिक्षित मां से मैंने महारानी विक्टोरिया (1819-1901)
और उनके राजकाज की तारीफ सुनी थी । मां का तो विक्टोरिया-काल में जन्म भी नहीं हुआ था । अवश्य ही उन्होंने अपने बुजुर्गों से कुछ सुना होगा । अंग्रेजी राज की प्रशंसा में वह कहती थीं कि कहीं कोई चोरी नहीं होती थी, पुलिस अपना काम मुस्तैदी से करती थी, घूसखोरी जैसी चीजें नहीं थीं, इत्यादि । ये बातें चर्चिल द्वारा कहे गये कथन (देखें पिछली पोस्ट) के अनुरूप थीं कि अंग्रेज अधिकारियों को वेतन के अलावा ऊपरी आमदनी से बचने की सख्त हिदायत है । मेरे बचपन के दिनों में लोगों के घरों में ताले नहीं लगते थे; दरवाजे पर सांकल-सिटकनी लगती थी । लेकिन जब दूर-दराज से चोरी जैसी घटनाओं की बातें सुनने को मिलने लगी थीं । परिचितों-आगंतुकों के साथ मां की बातों में मुझे सुनने को मिलता था कि फलां-फलां घूस लेने लगा है । फलां इंजीनियर/ओवरसियर ऊपरी आमदनी करता है, इत्यादि । साथ ही वे देश की आजादी की बात पर भी खुश थीं । आज लगता है कि दोनों बातों में एक विरोधाभास था । आज के हालात देखकर मुझे लगता है कि मेरी मां को आजादी की खुशी के साथ यह एहसास होने लगा होगा कि शासन-प्रशासन का स्तर गिरने जा रहा है, जिसकी शंका विंस्टन चर्चिल ने जताई थी ।

मैंने साधारण विद्यालयों में शिक्षा पाई थी, किंतु मैं निःसंकोच कह सकता हूं कि मेरे उन सभी विद्यालयों में पढ़ाई होती थी । अध्यापक नदारत नहीं रहते थे । मैं समझता हूं कि उस जमाने के अधिकतर लोग सरकारी/अनुदानप्राप्त स्कूलों में ही शिक्षित हुए थे । आज की तरह अंग्रेजी स्कूलों की भरमार तब नहीं थी । आज हालत यह है कि सरकारी स्कूली व्यवस्था ध्वस्त-सी हो चुकी है । स्तरीय शिक्षा पर अब निजी संस्थानों का कब्जा हो चुका है । उन दिनों नकल के किस्से भी इक्के-दुक्के ही होते थे ओर फर्जीवाड़ा नाममात्र को । लेकिन अब सर्वत्र फर्जी काम तथा नकल का बोलबाला है । एक अध्यापक के नाते मैंने महसूस किया है कि तब की तुलना में अधिकतर सरकारी विद्यालयों का स्तर काफी गिर चुका है, भले ही कंप्यूटरों का प्रयोग हो रहा हो ।

दुर्भाग्य से ऐसी गिरावट हर क्षेत्र में देखने को मिल रही है । मैं पुराने दिनों को याद करता हूं । रेलगाड़ियां आज की तरह 15-20 घंटे लेट नहीं होती थीं, उनमें लूटपाट के किस्से कम ही सुनने को मिलते थे, दुर्घटनाएं आज की तरह आम बातें नहीं थीं और जो होती थीं तो उन पर तहलका मच जाता था, इत्यादि । बिमारी में लोग आम सरकारी अस्पतालों में ही जाते थे । लेकिन आज हालत यह है कि मेरे कार्यस्थल रहे विश्वविद्यालय के कर्मचारी तक वि.वि. का बड़ा अस्पताल छोड़ निजी अस्पतालों का रूख करने लगे हैं । पहले बिजली सब जगह नहीं थी, किंतु जहां थी भरोसेमंद थी । आज कब जाएगी और कब आयेगी कहना मुश्किल है । कम से कम अपने उत्तर प्रदेश के हाल तो ऐसे ही हैं । पहले सड़कें कई-कई साल तक चलती थीं, लेकिन आजकल एक ही बरसात में धुल जाती हैं । सड़कों के किनारे गंदगी के ढेर आज की तरह पहले नहीं दिखते थे, और न ही नालियां इस कदर बदबदाती थीं ।

क्या-क्या बयां करूं ? देश के हालात किस गिरावट पर हैं, इसका अंदाजा आप राजधानी दिल्ली और वहां आयोजित होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों के इंतजाम से लगा सकते हैं । इतना कहना काफी है ।

बेमानी हो चुकी आजादी

कैसी आजादी ?”, “हमारी आजादी आधी-अधूरी है ।” जैसे कथन अब आम हो चुके हैं । 15-20 साल पहले तक ऐसे वाक्य नहीं सुने जाते हैं । ऐसा लगता है कि आम जन का आजादी से मोहभंग होने लगा है । जनप्रतिनिधियों के प्रति उनका विश्वास उठ रहा है । क्यों ?

कई लोग अब यह मानने लगे हैं कि यह देश इंडिया एवं भारत में विभक्त हो चुका है । इंडिया प्रगति पथ पर, विकास के फलों को भोग रहे लोगों की अपनी दुनिया, जो शरीर से तो इस भूभाग के हैं, लेकिन मन से ‘अंग्रेज’ हो चुके हैं । उनके तौर-तरीके, रहन-सहन, भाषा आदि अब विदेशी हो रहे हैं । यूं कहें कि इंडिया का अमेरिकीकरण/अंग्रेजीकरण का दौर चल चुका है । और भारत ? पारंपरिक जड़ताओं एवं अंधविश्वासों में पड़े हुए और गरीबी से जूझते लोग । प्राकृतिक आपदाएं, बिमारियां, कुपोषण, भूख, अशिक्षा, आदि सब उनके हिस्से में हैं । उनके नाम पर सरकारी रुपये-पैसे की लूट इंडिया में मची है । शासन इंडिया का चलता है । पुलिस के लोग सरकार के बधुंआ मजदूर बनकर रह गए हैं । सरकारों को मनमर्जी निर्णय लेने का अधिकार है । जिसने विरोध किया उस पर पुलिस से डंडे बरसा दिये । जितनी निरंकुश, असंवेदन एवं क्रूर आज की पुलिस है, उतनी परतंत्र भारत में भी नहीं रही होगी ।

अपने को जनप्रतिनिधि कहने वाले लोग अपनी स्वार्थसिद्धि में किसी भी सीमा तक जा सकते हैं । वे मनमर्जी के कोई भी निर्णय ले सकते हैं, किंतु कभी भी बेचारी जनता से नहीं पूछते कि वे निर्णय मान्य होंगे । विकास के नाम पर गरीबों से संसाधन छीन धनाड्यों को सौंप देना हमारे लोकतंत्र की खासियत है । सरकारों की प्राथमिकता का आधार समझ से परे है । देख्एि एक तरफ राष्ट्रमंडल खेलों पर अरबों रुपया पानी की तरह बहाया जा रहा है, तो दूसरी तरफ अनाज के गोदाम बनाने के लिए पैसे की कमी का रोना रोया जाता है । उत्तर प्रदेश सरकार को देखिए, कि मूर्तियों की स्थापना के लिए 900 करोड़ और बुंदेलखंड के विकास के लिए मात्र 10 करोड़, जैसा सुनने में आता है । गरीबों के सेवक होने का नाटक रचने वाले जनप्रतिनिधियों के आंसुओं को देखिए, कहते हैं कि हम खुद ही अपनी तनख्वाह 80 हजार कर दें ताकि भत्तों और सुविधाओं को मिला डेढ़े-दो लाख पाने लगें । यह मांग उस देश में उठती है जहां के चौथाई परिवारों की कुल आमदनी 5 हजार माहवारी भी नहीं हो पाती है । अंधेर नगरी चौपट राजा की तर्ज पर सरकारें चल रही हैं । क्या ऐसी ही सरकारों के लिए आजादी का सपना देखा गया था ?

राष्ट्र की प्रगति का अर्थ

किसी राष्ट्र के लिए 63 साल का समय बहुत बड़ा तो नहीं होता, लेकिन यह इतना छोटा भी नहीं कि निराशाजनक हालात बने रहें । विश्व के कई देशों में प्रगति का दौर पिछले 60-70 सालों में ही चला है, और वे हमसे कहीं आगे निकल गये । यह समय इतना बड़ा तो था ही कि जनता की साक्षरता, दो वक्त के भोजन, कुपोषण से मुक्ति, बराबरी का दर्जा, आदि का इंतजाम हो सके । ऐसा करना कौन चाहता था ?

याद रखें कि कोई भी राष्ट्र छः-आठ लेन की सड़कों, गगनचुंबी इमारतों, कारों, टीवी, फ्रिजों, सेलफोनों जैसे उपभोक्ता वस्तुओं की प्रचुरता, आदि से नहीं बनता है । भौतिक साधन-संसाधन का अपना महत्त्व है अवश्य, किंतु वे राष्ट्र को परिभाषित नहीं करते । राष्ट्र बनता है वहां के निवासियों से । निवासियों का चरित्र कैसा है, देश और समाज के प्रति वे कितने समर्पित हैं, साथी नागरिकों के साथ उनका कैसा व्यवहार है, कायदे-कानूनों को कितना सम्मान देते हैं, अपने कर्तव्यों का वे निर्वाह करते हैं कि नहीं, इत्यादि बातें हैं जो राष्ट्र को महान या निम्न कोटि का बनाते हैं । हमें अपनी स्वतंत्रता की अर्थवत्ता का आकलन इन्हीं कसौटियों के सापेक्ष करना चाहिए ।

पिछले कुछ समय से अपनी सरकारें देशवासियों को यह कहकर भ्रमित करती आ रही हैं कि 8-10% की आर्थिक विकास दर से आगे बढ़ रहे हैं और निकट भविष्य में हम विश्व की सबसे बड़ी – कदाचित् तीसरी-चौथी – महाशक्ति बनने जा रहे हैं । मुझे शंका होती है कि प्रगति का यह गुब्बारा भविष्य में कहीं ध्वस्त न हो जाए । माना कि आर्थिक प्रगति है और चामत्कारिक है, तो क्या इससे हमारी सामाजिक समस्याएं सुलझ जाएंगी ? क्या आर्थिक विकास से लोग बेहतर नागरिक बन जाएंगे, प्रशासन कार्यकुशल संवेदनशील हो जाएगा, देश से भ्रष्टाचार मिट जाएगा, न्यायिक व्यवस्था उत्तम एवं भरोसेमंद हो जाएगी, समाज के सर्वाधिक जरूरतमंद को रोटी-कपड़ा मिल जाएगा, सामुदायिक जनसुविधाएं बढ़ जाएंगी । जी नहीं, आर्थिक विकास का इन सबसे कोई सीधा रिश्ता नहीं है । इन सबको पाने के लिए चाहिए व्यवस्था में सुधार । व्यवस्था अच्छी है तो आर्थिक विकास के लाभ देश भर को मिल सकते हैं, अन्यथा इससे धनवान् अधिक धनी तो बन जाएगा, लेकिन की भूखे का पेट नहीं भरने का ।

कोई मुझसे पूछे कि इन दो विकल्पों से क्या चुनोगेः (1) 12-13%: का आर्थिक विकास दर के साथ दुनिया के सर्वाधिक धनी, संख्या एवं संपदा में, यहीं देखने को मिलने लगें और साथ ही भूखे पेट सोने को मजबूर लोग भी यहीं हों, और (2) मात्र 4-5% की दर से विकास हो, जिससे कोई भी अतिशय धनाड्य न बन पाए, लेकिन किसी को भूखा भी न रहना पड़े ? तो मैं विकल्प (2) को चुनूंगा ।

देश की स्वाधीनता की सार्थकता और लोकतंत्र की सफलता का आकलन करते समय आप इन प्रश्नों पर विचार करें:-
1 – क्या हमारी लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था उत्तरोत्तर सुधरती जा रही है? क्या हम स्वतंत्रता के साथ पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था को त्वरित गति से बदलकर नया रूप दे पाये हैं ? क्या यह सच नहीं है कि आज भी हम परतंत्र काल के कानूनों को ढो रहे हैं ?
2 – क्या हमारे जनप्रतिनिधि जनता के हितों के प्रति अधिकाधिक समर्पित होते जा रहे हैं ? क्या वे समाज के समक्ष अपने व्यवहार से अनुकरणीय उदाहरण पेश करते आये हैं ? उनकी संपदा सत्तासीन होने पर तेजी से नहीं बढ़ने लगती है क्या ?
3 – क्या धूमिल अथवा संदेहास्पद छवि वाले लोगों की संख्या राजनीतिक दलों में बढ़ रही है ? क्या इन दलों में आंतरिक लोकतंत्र है ? अथवा दलों के सदस्य अपने मुखिया के मनोभावों को पढ़ते हुए ‘यस मिनिस्टर’ की तर्ज पर अपना मत व्यक्त करते हैं ?
4 – क्या देश की राजनीति एक संवेदनशील एवं कार्यकुशल प्रशासन स्थापित कर सकी है ? क्या हमारा पुलिसबल आम आदमी की सहायता के लिए तत्पर रहता है ? क्या किसी राजनीतिक दल ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के सार्थक प्रयास किये हैं ? कितने उच्चपदस्थ भ्रष्टाचारियों को आज तक दंडित किया गया है ?
5 – क्या देश में एकसमान छोड़ दोहरी शिक्षा व्यवस्था नहीं चल रही है ? क्या हमारा राजकाज उस भाषा में नहीं चल रहा है जिसे 10% देशवासी भी नहीं समझ पाते हैं ?
6 – क्या हमारी न्याय-व्यवस्था लचर और कछुए की गति से नहीं चल रही है ? कितने लोग हैं जो भरोसा कर पाते हैं कि न्याय मिलेगा और वह भी समय पर ?
7 – बीते 63 सालों में क्या हम जनसंख्या पर नियंत्रण कर सके हैं, या उसे भगवान् भरोसे नहीं छोड़ चुके हैं ? क्या लोगों में राष्ट्रभावना जगा पाये हैं ? क्या जातीयता, धार्मिकता एवं क्षेत्रीयता की संकुचित भावना से उबर सके हैं ? या उसमें डूब रहे हैं ?

ऐसे अनेकों सवाल हैं जो पूछे जा सकते हैं । मैं इन पर विचार करता हूं तो सिर भन्ना जाता हैं । सब कुछ भगवान् भरोसे है यह मैं नहीं कई लोग कहते हैं ।

कुल मिलाकर लगता है कि स्वाधीनता से कुछ खास हासिल हुआ नहीं । सड़क पर कूड़ा बीनने वाला बच्चा पहले भी बीन रहा था, आज भी बीन रहा है, और कल भी बीनेगा । मेरी नजर में देश चरित्रहीनता, बेशर्मी, अनुशासनहीनता और अबाधित भ्रष्टाचार के दौर से गुजर रहा है । इन बातों की शंका विंस्टन चर्चिल ने जताई थी । (देखें कल की पोस्ट) – योगेन्द्र जोशी

और चलते-चलते इस समाचार (लिंक) पर नजर डालें:-
http://www.bbc.co.uk/hindi/news/2010/07/100707_china_death_va.shtml