Cartoonist Aseem Trivedi is arrested under Article 124 A (Non-bailable) of Indian Penal Code.

I do not remember of having heard in the past about the nearly-25-year-old Sri Aseem Trivedi of Kanpur working in Mumbai. His cartoons did not come to my notice through the newspaper media or otherwise. It may have been my ignorance, or maybe he was a low-profile cartoonist in the process of establishing himself. It was only day before yesterday when the TV channels telecast the news of his arrest by Mumbai Police, booking him allegedly for sedition, for showing disrespect to the constitution and the country’s icons of democracy, etc. The police claims to have made thorough inquiries during the past several months before arresting him.

Now there is a fresh news that the sedition case does not actually hold and that he would be soon released.

Aseem has been associated with the sociopolitical movement named India Against Corruption. He was active during Anna’s nonviolent agitation, demanding enactment of the Lokpal Bill and action against the corrupt politicians and bureaucracy of the so called biggest democracy on earth, India. Aseem had been expressing his feelings of anguish in terms of satirical cartoons depicting mostly corrupt political class of India. His boldness in doing all that appears to be the root cause of his arrest.

India is a democracy with its numerous problems which our politicians have miserably failed to solve. There has been unabated deterioration in our political system, and no one other than the political class has been responsible for that. Born with the freedom of the country and subsequent democratic system of governance, I have been a witness to that deterioration. Corruption is now rampant everywhere. Persons with criminal background or dubious character have succeeded in getting ‘honourable’ entry in to all political parties and are playing their active part in the governmental system. Bureaucrats are insensitive to the peoples’ problems, and have been enjoying non-accountability for decisions and general behaviour, and are very rarely penalized for their wrong-doings. And the most deplorable and agonizing fact is that Indian political parties have ashamedly been creating vote banks, by dividing the society on the basis of religion, caste, regionalism and language, ignoring the dangers ensuing therefrom.

The Indian people have started getting disillusioned with the current political milieu. And people are expressing their resentment in different ways. Cartoonists have been doing their job. In democratic regimes, they have always painted politicians in their cartoons satirically. A cartoon often contains a message that only a detailed verbal depiction could convey. Unfortunately our politicians have become intolerant to such messages. Bengal’s iron lady Ms. Mamata Banerji is an ideal example of an intolerant politician.

The role of the police force is also worth noting.

Indian police has never been committed to serve the people. They are there to suppress the poor peoples’ voice, when that seems to be inconvenient to those in powers. Resorting to lathi-charge wherever people protest with justifiable reasons against government policies and decisions is regarded by them to be their sacred duty

The present breed of politicians have lost peoples’ respect and trust. They should correct themselves rather than correcting cartoonists and other activists. People have the right not to respect them when they do not deserve that. Their arrogant remark that they are “peoples’ elected representatives” cannot necessarily earn them respect.

लोकसभा के 60 वर्ष एवं ‘कार्टून कथा’ – वाकई सफल है अपना लोकतंत्र?

संसद के 60 वर्ष

कल रविवार 13 मई के दिन देश के दोनों सदनों की बैठक चल रही थी । संसद ने ‘सफलता पूर्वक’ 60 वर्ष पूरे कर लिए हैं । इसी उपलक्ष्य पर विशेष बैठक कल के साप्ताहिक अवकाश यानी रविवार के दिन आयोजित हुई थी । चुने गये कुछ सांसदों ने अपने-अपने उद्गार प्रस्तुत किए । दिन भर की कार्यवाही देखने-सुनने में मेरी खास दिलचस्पी नहीं थी । दो-चार सदस्यों के विचार सुन लिए, उतने से ही चर्चा का लुब्बेलुआब समझ में आ गया था । हमारा संविधान उत्कृष्टतम है और हमारा लोकतंत्र सफल है ऐसा मत कमोबेश सभी संसद-सदस्यों का था ऐसा मुझे प्रतीत हो रहा था ।

संसद की कार्यवाही देख मेरे मन में प्रश्न उठता है कि अपना लोकतंत्र क्या वाकई सफल है? सफलता की कैसे व्याख्या की जानी चाहिए? देश की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था किन उद्येश्यों को पूरा करने में सफल हुई है? कुुछ सांसदों ने असफलताओं की ओर भी इशारा किया । फिर भी वे इस बात पर संतुष्ट दिखाई दिए कि तमाम कमियों के बावजूद अपना लोकतंत्र सफल है ।

सफल लोकतंत्र, वाकई?

हां, अपना लोकतंत्र सफल है इस माने में कि मतदाता निर्भीक होकर मतदान में भाग ले सकते हैं । जाति, धर्म, लिंग अथवा क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है; सबको समान अधिकार प्राप्त हैं । हमारे निर्वाचन आयोग ने अपने सांविधानिक अधिकारों और दायित्वों के अनुरूप कार्य करने में काफी हद तक सफलता पाई है । उसकी कार्यप्रणाली में उत्तरोत्तर सुधार हुआ है । अवश्य ही आयोग प्रशंसा एवं शाबाशी का पात्र है । किंतु इस कार्य में राजनेताओं, विशेषकर सांसदों, की रचनात्मक भूमिका रही है ऐसा दावा करना सही नहीं होगा । संसद के माध्यम से जिस प्रकार के सुधारों की वकालत आयोग करता रहा है उनमें सांसदों ने वांछित रुचि नहीं दिखाई है । बल्कि उनका रवैया कुछ हद तक टालने या रोड़ा अटकाने की ही रही है ।

यह भी सच है कि अपना लोकतंत्र अभी तक लड़खड़ाया नहीं है । अभी इस लोकतंत्र के प्रति विद्रोह नहीं दिखाई देता है । किंतु इस संभावना से हम इंकार नहीं कर सकते हैं कि भविष्य में स्थिति बदतर हो सकती है, यदि देश की प्रशासनिक व्यवस्था में कार्यकुशलता, ईमानदारी और दायित्वों के प्रति प्रतिबद्धता लाने के प्रभावी प्रयास नहीं किए जाते हैं ।

लोगों के मतदान में रुचि लेना और निर्वाचन आयोग की सफलता को ही लोकतंत्र की सफलता का मापदंड नहीं माना जा सकता है । निर्वाचन कार्य तो लोकतांत्रिक कार्यसूची का केवल आरंभिक कदम भर होता है । उसके बाद सभी कुछ तो जनप्रतिनिधियों के दायित्व-निर्वाह पर निर्भर करता है । अगर वह संतोषप्रद न हो तब हमें सफलता पर सवाल उठाने चाहिए ।

लोकतंत्र का उद्येश्य केवल यह नहीं है कि जनता संसद में जनप्रतिनिधियों को बिठा दे । मूल आवश्यकता यह है कि वे जन-अपेक्षाओं को पूरा करने में प्रयासरत हों; कि वे जनता की समस्याओं को हल करें; कि वे कुशल, समर्पित एवं संवेदनशील प्रशासन देश को दें; कि वे जनता के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करें; इत्यादि । वस्तुतः इस प्रकार के कई सवाल उठाए जा सकते हैं जिनके सापेक्ष लोकतंत्र की सफलता को आंका जाना चाहिए । कहां खड़ा है हमारा लोकतंत्र? कुछ सवाल हैं मेरे मन में ।

मेरे सवाल-जवाब

प्रश्नः मेरा आरंभिक प्रश्न यह है कि हमारे मौजूदा सांसद (और राज्यों के स्तर पर विधायक) नैतिकता, आचरण, जनहित की चर्चा, आदि की दृष्टि से क्या उन सांसदों से बेहतर सिद्ध हो रहे हैं जो संसद के आरंभिक दौर में उसके सदस्य बने । आम जन से जो सम्मान सांसदों को तब प्राप्त था क्या उसके बराबर सम्मान आज के सांसदों को मिल रहा है? लोकतंत्र की सफलता तो तभी मानी जानी चाहिए, जब संसद बेहतर और बेहतर नजर आने के लिए प्रयत्नशील हो । क्या ऐसा हो रहा है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः क्या संसद में होने वाली बहसों का स्तर पहले की तुलना में बेहतर हुआ है? क्या सांसद हर बात पर हंगामा खड़ा करने के बजाय धैर्यपूर्वक सार्थक चर्चा में भाग लेते हैं, और अपने बातों के प्रति अन्य को सहमत करने के प्रयास करते हैं? क्या वे संसद के भीतर बहुमत को समझते हैं और उसका सम्मान करते हैं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः संसद/विधानसभाओं में आपराधिक छवि एवं वैसी मानसिकता के सदस्यों की संख्या समय के साथ घटी है क्या? हमारे सांसद जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण पेश करते हैं क्या? अपनी सामूहिक छबि के प्रति क्या वे जागरूक दिखाई देते हैं क्या? अपनी ही संसद के बनाए कानूनों का वे सभी सम्मान करते हैं क्या?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः लोकतंत्र की दुहाई देने वाले राजनैतिक दलों में क्या आंतरिेक लोकतंत्र है? कांग्रेस पार्टी अपने 126 साल पुराने इतिहास पर गर्व करती है, किंतु वह भूल जाती है कि उसका चरित्र पिछले 4-5 दशकों में पूरी तरह बदल चुका है । अब यह पूरी तरह गांधी-नेहरु परिवार पर केंद्रित है । उसमें कभी मतभेदों के लिए जगह हुआ करती थी, किंतु आज मुुखिया ने जो कह दिया वह सबके लिए वेदवाक्य बन जाता है । पिछले 4 दशकों में जिन दलों ने जन्म लिया वे अब किसी न किसी नेता की ‘प्राइवेट कंपनी’ बन कर रह गए हैं । उनमें मुखिया की बात शिरोधार्य करना कर्तव्य समझा जाता है । चाहे डीएमके हो या एआइएडीएमके या त्रृृणमूल कांग्रेस, शिवसेना, नैशनल कांफरेंस, बसपा, सपा, राजद आदि आदि, सब इसी रोग के शिकार हैं । जो दल आंतरिक लोकतंत्र से परहेज रखते हैं उनसे सफल लोकतंत्र की उम्मींद नहीं की जा सकती है । क्या मेरी बातें गलत हैं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे जनप्रतिनिधि संसद/विधानसभाओं में अपने-अपने दलों की नीतियों का समर्थन करते हैं न कि लोगों की भावनाओं को व्यक्त करते हैं जिनकी नुमाइंदगी का वे दावा करते हैं । वे दल द्वारा जारी ‘ह्विप’ के अधीन कार्य करते हैं न कि अपने मतदाताओं के मत के अनुसार । लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि को यह विवशता नहीं होनी चाहिए कि दल की नीति का वह समर्थन करे ही भले उसे वह नीति अनुचित लगे । क्या मैं अनुचित कह रहा हूं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे जनप्रतिनिधियों के संसद में उपस्थित रहने और कार्यवाही में सक्रिय तथा सार्थक भागीदारी निभाने की मौजूदा तस्वीर संसद के आरंभिक दिनों की अपेक्षा बेहतर कही जा सकती है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि वे दायित्वों के प्रति ईमानदार, समय पर कार्य निष्पादित करने वाली, और जनता के प्रति संवेदनशील प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करें । अलावा इसके वे भ्रष्ट, लापरवाह, कार्य टालने वाले प्रशासनिक कर्मियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक/दंडात्मक कार्यवाही करें । लेकिन हम पाते हैं कि प्रशासन में भ्रष्टाचार निरंतर बढ़ता जा रहा है । इस संदर्भ में सरकारें चलाने वाले सांसदों का रवैया क्या संतोषप्रद रहा है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे सांसदों ने कानून तो बहुत बनाए हैं? किंतु क्या उन्होंने कभी इस बात की चिंता की है कि उनका ठीक से पालन नहीं हो रहा है? त्वरित कानूनी कार्यवाही की व्यवस्था क्या बीते 60 सालों में की गयी है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः इस देश में पुलिस बल सत्तासीन राजनेताओं के इशारे पर उनकी असफलताओं के विरुद्ध आवाज उठाने वालों पर डंडा चलाने का काम करती है । उनकी कार्यप्रणाली ब्रिटिश राज से भी बदतर है और उनके नियम-कानून आज भी अंग्रेजी काल के हैं । आम आदमी पुलिस बल को खौफ के नजरिये से देखता है, उसे एक मित्र संस्था के रूप में नहीं । पुलिस की छबि सुधारने के लिए सांसदों/विधायकों ने कारगर कदम नहीं उठाए हैं । तब भी लोकतंत्र को सफल माना जाए?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे राजनेता सत्ता पाने और उस पर चिपके रहने के लिए वोटबैंक की राजनीति करते आ रहे हैं । वे जनता की भावनाओं को उभाड़ने के लिए बेतुके और गैरजरूरी मुद्दे उठाने से नहीं हिचकते हैं । संसद में उठा ‘कार्टून’ मुद्दा इसका ताजा उदाहरण है । वे जनभावनाओं के ‘आहत’ होने की बात करते हैं, भले ही जनता को मुद्दे की जानकारी ही न हो और वह उसे तवज्जू ही न दे । ऐसा लगता है कि वे “तुम्हें आहत होना चाहिए” का संदेश फैलाकर जनभावनाओं का शोषण करते हैं और अपना वोट बैंक मजबूत करते हैं । क्या मैं गलत कर रहा हूं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः आम जनता में राजनेताओं की साख गिरी है इस बात की ओर वे स्वयं यदाकदा इशारा कर जाते हैं । कौन है जिम्मेदार? गिरती हुई साख क्या सफल लोकतंत्र का संकेतक है?
उत्तरः नहीं ।

निष्कर्ष

मेरे जेहन में अभी ये सवाल उठे हैं । ऐसे तमाम अन्य सवाल पूछे जा सकते हैं, और जिनके सापेक्ष लोकतंत्र की सफलता को आंका जा सकता है । कुल मिलाकर मैं भारतीय लोकतंत्र को सफल नहीं कहूंगा, क्योंकि यह जनाकांक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतर पा रहा है । अवश्य ही यह ध्वस्त नहीं हो रहा है । इस बात का श्रेय जनता को जाता है जो धैर्यवान है और लोकतंत्र में आस्था रखती है । – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी

दो-तीन रोज पहले संविधान-लेखन से संबंधित नेहरू-आंबेदकर को लेकर तत्कालीन विख्यात कार्टूनिस्ट शंकर द्वारा 1949 में अंकित एक कार्टून बना हंगामा खड़ा किया था । यह कार्टून एनसीआरटी की 11-12वीं की पुस्तक में शामिल है । और यही विवाद का विषय था । अधिक जानकारी के लिए देखें ‘डेलीन्यूज’ अथवा ‘बीबीसी’, और ‘कार्टून-अकैडेमी’ । मेरी जानकारी में कार्टून यह हैः

अण्णा के अनशन की समाप्ति और सिमरन-इकरा की भूमिका

दिल्ली के रामलीला मैदान पर भूख-हड़ताल पर बैठे अण्णा हजारे जी ने कल पूर्वाह्न करीब 10 बजे अपना अनशन तोड़ दिया, और उसी के साथ भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनके अभियान का पहला एवं अहम चरण पूरा हुआ । आगे का कार्य देश के जनप्रतिनिधियों के हाथ में है । उम्मीद की जानी चाहिए कि वे टालमटोल का रास्ता न अपनाकर यथाशीघ्र (जन) लोकपाल बिल का अंतिम मसौदा तैयार करके उसे पास कर पायेंगे ।

अण्णा के अनशन तोड़ते समय उनको शहद एवं नारियल पानी पिलाने का कार्य किया दो छोटी बच्चियां: इकरा, 4 साल, समीना बेगम तथा शहाबुद्दीन की बेटी, और सिमरन, 5 साल, रेखा तथा बच्चू सिंह की बेटी ने । पहली मुस्लिम समुदाय की तो दूसरी हिंदू दलित वर्ग की थी । क्या राज था इनको खास तौर पर चुनने का ? खुलकर शायद कहा न जा रहा हो, लेकिन बात छिपी नहीं है ।

दिल्ली के रामलीला मैदान में चल रहे अनशन के दौरान टीवी चैनलों के माध्यम से एक बात मेरे देखने में आई । मुस्लिम समुदाय तथा हिंदू दलित वर्ग के कुछ जन अण्णा के आंदोलन से नाखुश नजर आये, यहां तक कि वे विरोधी स्वर व्यक्त करने से भी नहीं बचे । कुछ जन तो यह भी कह बैठे कि यह आंदोलन दलित विरोधी है । उनका कहना था कि आंदोलन हिंदू सवर्णों के द्वारा चलाया गया है और उसमें दलितों एवं मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व नहीं है । ऐसे खयालात इन समुदायों के आम लोग कहते तो मैं उनकी बातों को तवज्जू न देता । लेकिन कहने वालों में बुद्धिजीवी भी शामिल थे ।

मुझे उनके तर्क हास्यास्पद और बेमानी नजर आते हैं । इस संदर्भ में निम्नांकित बिंदुओं पर तनिक विचार करेंः

■ (1)  

अण्णा का आंदोलन भ्रष्टाचार के विरुद्ध था और उसके निवारण के लिए सरकार पर दबाव डालने हेतु वे अनशन पर बैठे थे । उसके अपनी तार्किक परिणति तक पहुंचने में अभी कितनी अड़चनें आएंगी कहना मुश्किल है । भ्रष्टाचार का मामला देश के किसी समुदाय से जुड़ा नहीं हैं । देश के अधिकांश लोग, विशेषकर कमजोर नागरिक जिनके पास धन, बाहुबल, राजनैतिक पहुंच या प्रशासनिक संरक्षण नहीं है, वे भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं । उक्त आंदोलन उसके निवारण की दिशा में उठाया गया कदम है । यह किसी तबके के हित-साधन में नहीं किया गया । तब किस आधार पर कुछ दलितों/मुस्लिमों को इससे विरोध था ?

■ (2)    

मैं समझता हूं कि आंदोलन का विचार समाज के 5-10 संवेदनशील जनों में पैदा हुआ होगा, और उन्होंने कुछ और लोगों को स्वयं से जोड़ते हुए अण्णा के नेतृत्व में मुहिम छेड़ दी होगी । इस प्रयोजन के लिए उन्होंने समाज के किसी वर्ग विशेष से साथ देने के लिए सदस्यों को नहीं चुना होगा । जिसमें दिलचस्पी जगी होगी और जिसे भी सहभागिता निभाने में पर्याप्त समय तथा ऊर्जा लगाने की सामर्थ्य लगी होगी वह जुड़ा होगा । संयोग से यदि किसी समुदाय विशेष का कोई कार्यकर्ता इस मुहिम में नहीं शामिल हो सका हो तो इससे यह कहना कि यह आंदोलन उस खास समुदाय के विरुद्ध है सर्वथा अनुचित है । अगर किसी दलित/मुस्लिम ने आगे बढ़कर इसमें सहभागिता निभाने की बात की होती और उसको मना कर दिया होता तो वह विरोध का आधार बन सकता था । मुझे विश्वास है कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ होगा । ध्यान रहे कि आंदोलन उसकी व्यवस्था करने वालों तक सीमित नहीं था । दिल्ली तथा अन्यत्र आंदोलन में सम्मिलित होने वाले विशाल जन समुदाय में तो सभी तबकों के लोग थे । फिर विरोध कैसा ?

■ (3)    

जहां तक आंदोलन के कर्ताधर्ताओं में दलितों या मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व का सवाल है, इस पर भी ध्यान देें कि कई अन्य समुदायों या सामाजिक तबकों के मामले में भी यह कहा जा सकता है । मुझे आंदोलन की केंद्रीय समिति में कोई सिख, इसाई या बौद्ध नहीं दिखा । ओर क्षेत्रीयता की बात करें तो कोई, बंगाली, असमी या कन्नड़ भी उसमें नहीं था । वे भी विरोध के पक्ष में तर्क दे सकते थे । तब फिर दलितों/मुस्लिमों को ही मौजूदा मामला नागवार क्यों  गुजरा ?

■  (4)    

इस संदर्भ में एक विचारणीय तथ्य यह है कि जिन मुद्दों पर जनांदोलन होते हैं उन्हें दो श्रेणियों में रखा जा सकता है । पहली श्रेणी में वे आते हैं जो किसी खास सामाजिक वर्ग या भौगोलिक क्षेत्र से सरोकार रखते हों । मुस्लिम वर्ग के लिए आरक्षण की आजकल की जा रही वकालत और अलग तेलंगाना राज्य की मांग इस प्रकार के मुद्दे हैं । ऐसे मुद्दे देश के सभी नागरिकों को आकर्षित नहीं करते हैं । इसलिए इन मामलों में राष्ट्रव्यापी जनसमर्थन की आशा नहीं की जाती है । इनके विपरीत दूसरी श्रेणी में वे मुद्दे आते हैं जिनका ताल्लुक किसी खास समुदाय से या क्षेत्रविशेष से नहीं होता । महंगाई का मुद्दा इस श्रेणी का ज्वलंत उदाहरण है । भ्रष्टाचार के जिस मुद्दे से अण्णा के आंदोलन का संबंध रहा है वह भी सभी से सरोकार रखता है । इन दोनों के मामले में जनसमर्थन देश के हर कोने से और हर तबके के नागरिक से मिल सकता है । इन मुद्दों को सवर्णों अथवा केवल हिंदुओं से जोड़ना किसी भी तरह से उचित नहीं है ।

अण्णा आंदोलन में मुस्लिमों या दलितों की सहभागिता के न दिखाई देने का कारण मुद्दे का संकीर्ण होना नहीं है । मेरा अनुभव यह है कि इन सामाजिक तबकों के सामाजिक कार्यकर्ता आम तौर पर केवल उन्हीं मुद्दों में दिलचस्पी लेते जो इन तबकों से संबंध रखते हों । वे अक्सर दलितों या मुस्लिमों के हितों तक ही अपने कार्य सीमित रखते हैं । ऐसे दलित/मुस्लिम कार्यकर्ता अधिक नहीं होंगे जो अपने-अपने समुदायों के हटकर सभी नागरिकों के हितों की बात करते हों । ऐसी स्थिति में इन समुदायों के लोगों की भागीदारी अण्णा आंदोलन के प्रबंधन में यदि नहीं दिखी तो इसमें आश्चर्य नहीं है ।

अंत में इस बात पर आपका ध्यान खींचता हूं कि अण्णा के अनशन तोड़ने में दो बच्चियों, सिमरन एवं इकरा, की खास भूमिका दलित एवं मुस्लिम वर्गों को यह बताने के लिए रही होगी कि आंदोलन के कर्ताधर्ताओं को इन समुदायों से कोई परहेज नहीं । उनका समर्थन सहर्ष स्वीकारा जाएगा यह संदेश उक्त घटना में निहित है । – योगेन्द्र जोशी

हादसों का देश – लापरवाही, नियम-कानूनों की अनदेखी, संवेदनहीनता आदि-आदि का दुष्परिणाम

अनूठा देश

अपना देश वाकई अनूठा है, चामत्कारिक है, अपने किस्म का अकेला है । यहां ऐसा बहुत कुछ घटता रहता है जिसकी संभावना दुनिया के उन प्रमुख देशों में नहीं के बराबर रहती है जिनके स्तर पर पहुंचने का हम ख्वाब देखते हैं । यह चमत्कारों का देश है, लापरवाही का देश है, कर्तव्यहीनता का देश है, भ्रष्टाचार का देश है, प्रशासनिक संवेदनहीनता का देश है, और इस सब के ऊपर, नियम-कानूनों एवं सलाह-मशविरा को न मानने वाला देश है ।

इस प्रकार के खयाल मेरे मन में तब उठने लगते हैं जब कभी दुर्घटनाओं की बात टेलीविजन चैनलों पर देखता हूं । मेरे मत में अधिकांश दुर्घटनाएं आम आदमी अथवा सरकारी तंत्र की घोर लापरवाही की वजह से होते हैं । अलग-अलग स्तरों पर थोड़ी सावधानी बरती जाए तो यह न हों । आम आदमी लापरवाह न हो और प्रशासन संवेदनशून्यता तथा कर्तव्यहीनता का बुरी तरह शिकार न हो तो ये न घटनाएं न घटें । लेकिन किसी से भी कुछ कहना बेकार है । अपने देशवासियों पर तो “भैंस के आगे बीन बजे भैंस खड़ी पगुराय” की उक्ति सटीक बैठती है ।

दर्दनाक हादसा

परसों सुबह एक दर्दनाक दुर्घटना की खबर किसी टीवी चैनल पर देखने-सुनने को मिली । बाद में मैंने पाया कि संबंधित खबर एवं वीडियो एनडीटीवी चैनल की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है । (देखें एनडीटीवी समाचार) परसों की खबर थी कि इंदौर के पास पातालपानी नामक झरने के पास एक परिवार पिकनिक मनाने पहुंचा था । संबंधित नदी के बीच धारा में एक चट्टान पर परिवार के पांच सदस्य खड़े होकर फोटो खिंचवाने के लिए उत्सुक थे । इसी बीच पानी का जलस्तर बढ़ने लगा । चट्टानों पर खड़े पर्यटक दौड़कर नदी के किनारे पहुंच गये । लोंगों ने उन्हें भी आगाह किया, लेकिन वे इस गलतफहमी के साथ वहीं पर डटे रहे कि वे सुरक्षित रह जाएंगे । एक-दूसरे को सहारा देते हुए वे वहां पर कुछ देर तक तो खडे़ रह सके । लेकिन नदी थी कि उसने अपना विकराल रूप दिखा ही दिया । नदी का जलस्तर बढ़ता गया और उसका प्रवाह झेलना उन लोगों के सामर्थ्य से बाहर हो गया । परिणाम दुःखद – सभी बह गये और आगे जलप्रपात से नीचे गिर गये । एक लाश तो जल्दी मिल गयी शेष की खोज चलने लगी ।

मुझे इस बात का अंदाजा है कि बरसात में किस प्रकार पहाड़ी नदी का प्रवाह कभी-कभी इतना तेज हो जाता है कि उसमें खड़े रह पाना असंभव-सा हो जाता है । अपने बचपन में मैंने घर (उत्तराखंड) के आसपास की नदियों की भयावहता का अनुभव किया है । हमें हिदायतें होती थीं कि किसी अनुभवी सयाने व्यक्ति की मदद के बिना उसे पार करने का दुस्साहस न करें । बरसात के दिनों में धोखे की बहुत गुंजाइश रहती है । ऐसा हो सकता है कि आप जहां खड़े हों उस क्षेत्र में पानी न बरस रहा हो, किंतु नदी के उद्गम की ओर कहीं अन्यत्र तेज पानी बरस रहा हो । तब वर्षा का वह पानी चारों ओर से पहाड़ी ढलान पर मिट्टी-कंकड़-पत्थर लेते हुए एक साथ उतरकर नदी में जलस्तर अनायास बहुत अधिक बढ़ा देता है । इस बढ़े हुए जलस्तर का अग्रभाग साफ पहचान में आ जाता है और देखना दिलचस्प होता कि कैसे यह पूरी ताकत से उस स्थान तक पहुचता है जहां आप खड़े हों । जिसे इस बात का अंदाजा न हो कि कहीं अन्यत्र पानी बरस रहा होगा वह ऐसे अवसरों पर धोखा खा सकता है ।

पिकनिक पर गये उस अभागे परिवार को बरसात में पहाड़ी नदी के इस व्यवहार का अंदाजा नहीं रहा होगा । लेकिन आसपास खड़े लोगों ने उन्हें आगाह तो किया ही था । वे अपने दुस्साहस के शिकार हुए । इसे मैं लापरवाही का परिणाम मानता हूं । दुस्साहस जीवन के ध्येय के लिए तो समझ में आता है, किंतु महज मौजमस्ती के लिए मूर्खता ही मानी जानी चाहिए ।

दुर्घटनाएं और दुर्घटनाएं

कल-परसों ही कहीं एक बस इसी प्रकार नदी में बह गयी एक बच्चे को छोड़कर सभी बच गये, लेकिन बस उलटते-पलटते बीच धारा में फंस गयी । इसी प्रकार चंद रोज पहले किसी लेखपाल महोदय के साथ भी कुछ ऐसा ही घटित हुआ । नदी पार करते-करते पानी का स्तर बढ़ गया और उनकी जीप मझदार में फंस गयी । भला हो आसपास के लोगों का कि वे उनकी मदद कर सके । असल में छोटी नदियों में सामान्यतः पानी काफी कम रहता है । कई जगहों पर साल के अधिकांश समय के लिए पत्थरों की दीवार खड़ी करके नदी के ऊपर सड़क बना ली जाती है । पानी उसके नीचे पत्थरों के बीच छोड़ी गयी खाली जगहों से होते हुए बह जाता है । बरसात में कभी-कभी जलस्तर के अनायास बढ़ जाने पर पानी उस सड़क के ऊपर बहने लगता है । तब सड़क अधिक दिनों तक नहीं टिक पाती है । लेकिन जब तक वह कामचलाऊ दिखती है, वाहन चलते हैं और प्रवाह तेज होने पर वह अनियंत्रित होते हुए सड़क के किनारे पहुचकर पलट जाती है । ऐसे मौकों पर वाहनचालक का गलत अनुमान या अति साहस ही हादसे का कारण होता है

चिंता एवं पीड़ा की बात यह है कि अपने यहां हर प्रकार के हादसे होते रहते हैं । कल ही नौइडा/गाजियाबाद में एक कार चलते-चलते सड़क पर आठ-दस फुट नीचे धंस गयी । चलते-चलते चालक को लगा कि सड़क धंस रही है, और जब तक वह कुछ समझ पाता सड़क पर कार के नीचे गड्ढा हो चुका था । बाद में क्रेन की मदद से कार निकाली गयी । यही गनीमत रही कि बेचारा वाहनमालिक चालक बच गया । बताते हैं कि अभी चंद रोज पहले ही उस सड़क का निर्माण था । इसमें दो राय नहीं कि ठेकेदार तथा सरकारी अभियंताओं की घोर लापरवाही और उनमें व्याप्त भ्रष्टाचार का ही यह परिणाम था । लेकिन अपने देश के सरकारी तंत्र में यह सब क्षम्य है । किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता । न शर्मिंदगी न आत्मग्लानि । धन्य हैं ऐसे राष्ट्रभक्त नागरिक !

आजकल पूरे उत्तर प्रदेश में सड़कें खुदी हुई हैं, या यों कहिए कि प्रदेशवासियों की किस्मतें खुदी हैं । बनारस में सदाबहार गड्ढेदार सड़कें रहती हैं और लोग उनसे भलीभांति परिचित रहते हैं । इसलिए गंभीर दुर्घटनाएं कम ही होती हैं । फिर भी पूरे शहर का मुआयना करने निकलें तो आप को कहीं न कहीं कोई वाहन गड्ढे में धंसा दिख ही जाएगा । क्यों होता है ऐसा, यह सोचने की बात है ।

कल-परसों ही एक लगभग पूर्णतः निर्मित इमारत ढह गयी, कहां यह ठीक-से याद नहीं आ रहा । कहा जाता है उसमें प्लास्टर का कार्य चल रहा था । पानी बरसा और इमारत ढह गयी । संवाददाता दिखा रहा था कि उसमें प्रयुक्त बालू-सीमेंट कैसे भुरभुरी होकर गिर रही थी । एक दो जने गिरफ्तार किए गये हैं, लेकिन बिल्डर भाग गया । गिरफ्तारी सरकारी स्तर की रस्मअदायगी के लिए की जाती है, ताकि लोगों को लगे कि कुछ हो रहा है । कुछ दिनों बाद बात भुला दी जाती है, और पकड़े गये लोग अगली दुर्घटना को अंजाम देने निकल पड़ते हैं, पूरी बेहयाई के साथ । वा रे मेरा ‘महान्’ देश !

प्रशासनिक भ्रष्टाचार

राजमार्गों/सड़कों पर कारों-बसों आदि की दुर्घटनाओं के समाचार आम बातें हैं । दो वाहन आपने-सामने से टकरा गये, बस अनियंत्रित होकर पुल से नीचे गिर गयी, चालक को झपकी आने से कार गड्ढे में गिर गयी या पेड़ से जा टकराई, जैसी खबरें समाचार माध्यमों पर देखने-सुनने को मिलती रहती हैं । या खबर मिलेगी की हाइटेंशन तार की चपेट में आने से बस आग का गोला बन गयी । इस प्रकार की घटनाएं अपने देश में आम हैं, जब कि प्रमुख देशों में वे शायद ही कभी घटती हैं, और जब घटती हैं तो उन्हें संजीदगी से लिया जाता है । हमारे नेता हों या सरकारी मुलाजिम बेशरमी से कहते हैं कि हादसे तो होते रहते हैं । अपने देश में आदमी के जान की कोई अहमियत नहीं । अधिक से अधिक लाख-दो-लाख के मुआवजे की कोरी घोषणा कर दी और बात खत्म । मुआवजा भी सरकारी मुलाजिम डकार जाते हों तो कोई आश्चर्य नहीं ।

पिछले कुछ समय से रेल हादसों की बाढ़ आ गयी है । लेकिन न तो रेलमंत्री और न ही प्रधानमंत्री के चेहरे पर चिंता एवं आत्मग्लानि के भाव उभरते दिखई देते हैं । उनका रवैया साफ रहता है – हमारा क्या नुकसान हुआ है जो हम आंसू बहाएं । वाह रे भारत के राजनेतागण ! इनकी अपनी सुरक्षा के लिए न धन की कमी रहती है और न त्वरित कार्य-निष्पादन की । लेकिन जब रेल सुरक्षा की बात होती है तो उनकी लापरवाही की कोई सीमा नहीं रहती है । लेबल-क्रासिंग पर वाहन रेलगाड़ियों से टकरा जाती हैं, लेकिन किसी को समुचित कदम उठाने की चिंता कहां ?

आजकल अग्निकांडों की खबरें भी खूब मिलती हैं । कल ही दिल्ली के कनाटप्लेस में एलआइसी की बहुमंजिली इमारत में आग लग गयी । ऐसे अवसरों पर जब कुछ समझ में नहीं आता है तो कह दिया जाता है कि शार्ट-सर्किट से आग लगी । बेचारी बिजली पर दोष मढ़ना सबसे आसान है । गलती तो बिजली की है, फिर भला कोई आदमी दोषी कैसे हो सकता है ? शार्ट-सर्किट हो या कुछ, आजकल ऐसे साधन उपलब्ध हैं जो तुरंत चेतावनी दे देते हैं । भवनों में आग बुझाने के साधन तैयार रहने चाहिए । ऐसी बातें कही तो जाती हैं, लेकिन उन पर अमल नहीं होता । किसे दोष दें इस लापरवाही के लिए ? सरकारों को या आम आदमी को या दोनों को ? किंतु लापरवाही तो भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार है !

सभी प्रमुख देशों में वाहन-चालन का लाइसेंस तभी मिलता है जब आवेदक लिखित तथा प्रायोगिक परीक्षा पास कर लेता है । इन परीक्षणों को गंभीरता से लिया जाता है । आवेदक को कभी-कभी दो या अधिक बार परीक्षा देनी पड़ती है । (पढ़िये मेरा एक अनुभव) परंतु अपने देश में लाइसेंस का मामला गंभीरता से नहीं लिया जाता है । मैं किसी व्यक्ति को नहीं जानता जिसने ‘ड्राइविंग टेस्ट’ देकर लाइसेंस पाया हो । लाइसेंस लेना सब्जीमंडी से आलू खरीदने जैसा है । दलाल को आर्डर दीजिए, और घर बैठे लाइसेंस लीजिए । कम से कम वाराणसी में तो यही चलता है । यह व्यवस्था लापरवाही का संकेतक नहीं है क्या ? कौन है जिम्मेदार ? दरअसल सरकारी तंत्र और आम आदमी, दोनों ही । परिणाम यह है कि लाइसेंस-धारक को स्टियरिंग घुमाने, एक्सीलरेटर दबाने और ब्रेक लगाने से अधिक जानकारी वाहन-चालन के बारे में नहीं होती है । ऐसे चालकों द्वारा दुर्घटना होना आश्चर्य की बात नहीं है ।

भगवान भरोसे

कुल मिलाकर यह देश भगवान भरोसे चल रहा है । यहां सभी नियम-कानून कागजों तक सिमटकर रह जाते हैं । व्यवहार में हर कोई ‘मेरी मरजी’ की नीति पर चलता है । तब आये दिन हादसे होना कोई नहीं रोक सकता है । या खुदा, लोगों की अक्ल का ताला कभी खुलेगा क्या ! – योगेन्द्र जोशी

‘द न्यू साइंस अव् टेम्टेशन’ अर्थात् प्रलोभन का नवीन विज्ञान, और भ्रष्ट आचरण

‘साइंटिफिक अमेरिकन’ नामक वैज्ञानिक पत्रिका में एक लेख छपा है ‘The New Science of Temptation’, यानी ‘प्रलोभन का नवीन विज्ञान’ । पत्रिका के 3 नवंबर के इंटरनेट संस्करण में यह लेख उपलब्ध है । मनोवैज्ञानिक अध्ययन/अनुसंधान के परिणामों पर आधारित उक्त लेख मुझे रोचक और ज्ञानवर्धक लगा, क्योंकि यह मनुष्य के व्यक्तित्व के एक महत्त्वपूर्ण पहलू को छूता है । लेख के आरंभिक अनुच्छेद के शब्द ये हैं: “The power to resist temptation has been extolled by philosophers, psychologists, teachers, coaches, and mothers. Anyone with advice on how you should live your life has surely spoken to you of its benefits.” (दार्शनिकों, मनोविज्ञानियों, शिक्षकों, अनुशिक्षकों, तथा माताओं के द्वारा प्रलोभन से बचने की सामर्थ्य की प्रशंसा की जाती है । जीवन कैसे जियें इस पर राय देने वाले हर व्यक्ति ने इसके लाभों की बात आप से अवश्य की होगी ।)

लेख में प्रलोभन से बचने की जरूरत और उससे लाभ हानि की बातें तो कही ही गयी हैं, साथ में सामान्यतः प्रचलित इस मान्यता का भी उल्लेख किया है कि मनुष्य अक्सर अपने अंदर छिपे ‘शैतान’ के वश में रहता है, जो उसे लुब्ध करने वाली चीजों को अपने कब्जे में लेने को प्रेरित करता है, भले ही ऐसा करना अनुचित माना जाता हो । यह ‘शैतान’ वस्तुतः आपकी प्रलोभन से न बच पाने की आपकी कमजोरी को व्यक्त करता है । उपदेश अथवा सलाह दी जाती है कि मनुष्य इस कमजोरी को नियंत्रण में रखे । यह माना जाता है कि प्रलोभन तो हर व्यक्ति में होता है । जो लोग प्रलोभन से बच निकलते हैं वे वस्तुतः अपनी इस कमजोरी पर नियंत्रण पा लेते हैं । नियंत्रण पाने के लिए उन्हें प्रयास करना पड़ता है । वे उसके अवांछित परिणामों के बारे में सोचते हैं और अंत में अपने को अलग कर लेते हैं । किंतु सामने आये आकर्षण को तो वे भी महसूस करते ही हैं ।

परंतु उक्त लेख सुविख्यात अमेरिकी विश्वविद्यालय, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, में कार्यरत मनोविज्ञानियों, ग्रीन (Joshua D. Greene) एवं पैक्स्टन (Joseph M. Paxton), द्वारा संपादित एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहता है कि ऐसा सदैव नहीं होता है । वास्तविक जीवन में कई लोग एकाधिक कारणों से स्वयं को प्रलोभन से बचा ले जाते हैं । लेकिन यदि पूरी छूट मिल रही हो और यह विश्वास जग रहा हो कि लालच पैदा करने वाली वस्तु को चुपचाप स्वीकार लेने में कोई हानि नहीं है, तो कई लोग स्वनियंत्रण से बाहर निकल उस वस्तु को अपना लेंगे, भले ही ऐसा करना अनैतिक माना जाता हो । ऐसे अवसरों पर ही किसी के व्यक्तित्व का नैतिक पक्ष स्पष्ट हो पाता है । कथित अध्ययन में कुछ ऐसे ही परिणाम पाये गये हैं । यह पता चलता है कि कुछ लोग प्रलोभन से ही स्वाभाविक तौर पर मुक्त होते हैं और उनके मामले में अपनी कमजोरी पर नियंत्रण पाने की बात लागू नहीं होती है । लेख के शब्दों में Greene and Paxton were interested in why people behave honestly when confronted with the opportunity to anonymously cheat for personal gain. They considered two possible explanations. First, there is the “Will” hypothesis: in order to behave honestly people must actively resist the temptation to cheat. … Alternatively, there is the “Grace” hypothesis: honest behavior results from the absence of temptation. (ग्रीन एवं पैक्स्टन की रुचि यह जानने में थी कि पहचाने न जाने की स्थिति में धोखा देते हुए वैयक्तिक लाभ का मौका मिलने पर {भी} लोग क्यों ईमानदारी से पेश आते हैं । उन्होंने दो संभव कारणों पर विचार किया है । पहला है “संकल्पशक्ति” (“Will”, कई जन “इच्छाशक्ति” कहेंगे) की प्राक्कल्पना; ईमानदारी से पेश आने के लिए व्यक्ति ठगने के प्रलोभन से बचने की सक्रिय चेष्ठा अपनावे । विकल्पतः दूसरा है संतुष्टि की प्राक्कल्पना; व्यवहार में ईमानदारी प्रलोभन के अभाव से स्वतः आती है ।)

लेख पर नजर पड़ने पर मुझे यह समझने की इच्छा हुई कि तत्संबंधित अनुसंधान कैसे किया गया और प्रस्तुत परिणामों की सामाजिक संदर्भ में क्या व्यापक अर्थवत्ता संभव हैं । उसी सब की संक्षिप्त चर्चा के साथ में अपनी दो-एक टिप्पणियां करने जा रहा हूं ।

अनुसंधानकर्ताओं ने एक कंप्यूटर खेल प्रयोग में लिया । खेल को एक प्रकार का बहुत सरल ‘जुआ’ कहा जा सकता है, जिसमें उपयुक्त बटन दबाने पर कंप्यूटर ‘पर्दे पर उछाले गये सिक्के’ का ‘हेड’ अथवा ‘टेल’ यादृच्छिकतया (randomly) प्रस्तुत करता है । ऐसा करने पर परिणाम क्या होंगे इसे अग्रिम तौर पर वह खिलाड़ी से पूछ लेता है । खिलाड़ी का अनुमान सही सिद्ध होने पर उसे नियत धनराशि ‘इनाम’ में मिल जाती है, अन्यथा वह कुछ नहीं पाता है और न कुछ खोता है । (लाभ हो सकता है पर हानि नहीं !) अध्ययन का असली तकनीकी पक्ष यह था कि खेल के समय खिलाड़ी के मस्तिष्क-तरंगों (brain waves) के मापन के साथ उसकी दिमागी हलचल को भी परखा गया । अध्ययनकर्ताओं ने कुछ स्वयंसेवी सहभागियों को उक्त खेल में शामिल करते हुए उन्हें दो वर्गों में बांट लियाः एक में वे थे जिनके अनुमानों का ब्यौरा कंप्यूटर द्वारा सीधे रखा गया और उसी के आधार पर जिनका इनामी भुगतान किया गया । दूसरा वह वर्ग था जिनको हिदायत थी कि वे अपने अनुमानों के सही-गलत का लेखा-जोखा स्वयं प्रस्तुत करें; उसी के आधार पर उन्हें इनाम दिया गया । जाहिर है कि दूसरे वर्ग के सहभागियों को ठगने का पूरा मौका मिल रहा था, और उन्होंने उसका फायदा उठाया भी ।

अध्ययन में पाया गया कि जिन लोगों ने ठगने के अवसर के बावजूद अपने अनुमानों के सही-गलत होने का ईमानदारी से ब्यौरा तैयार किया, उनकी दिमागी हलचल हल्की-फुल्की रही और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भी उनका समय अधिक नहीं लगा । ध्यान रहे कि जब दिमाग उपस्थित परिस्थिति का विश्लेषण करते हुए ‘यह करूं या वह’ का निर्णय लेने लगता है और ऊहापोह की अवस्था से गुजरता है, तब मस्तिष्क-तरंगें तीव्र हो उठती हैं । इसके विपरीत शांत और ऊहापोह से मुक्त दिमाग की तरंगों की तीव्रता अधिक नहीं रहती । जिनकी दिमागी हलचल अधिक थी उनमें से कई ऐसे थे जिन्हांेने विवरण प्रस्तुत करने में झूठ का सहारा लिया था ।

अनुसंधानकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जिन लोगों में प्रलोभन का अभाव था, कम से कम उक्त खेल के समय, उनको अधिक सोचने की जरूरत ही नहीं थी । वे अधिक इनाम पाने के प्रति इतने उतावले नहीं रहे कि उन्हें ऊहापोह की स्थिति से गुजरना पड़े । दूसरी तरफ वे थे जो अधिक से अधिक इनाम की लालसा से ग्रस्त थे । उन्हीं को दिमाग पर अधिक जोर डालना पड़ा । “पता तो चलेगा नहीं, तो फिर क्यों न झूठ बोला जाय, सब चलेगा” की भावना के साथ उन्हें उलझना पड़ा । तब उनमें से कुछ को झूठ का सहारा लेने में भी हिचक नहीं रही, और शेष को ईमानदारी बरतने के लिए सचेत होकर अपनी “संकल्पशक्ति” का सहारा लेना पड़ा, जिसका संकेत उनके मस्तिष्क-तरंगों में मिला ।

उक्त अध्ययन के परिणामों के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि मानव समाज में मुख्यतः दो प्रकार के लोग होते हैं । एक वे जो लोभ-लालच से कमोबेश मुक्त होते हैं । वे इसी बात से संतुष्ट रहते हैं कि उनका काम चल रहा है । चाहे सरकारी तंत्र हो, व्यावसायिक संस्था हो, परिचित-अपरिचित हों, अथवा अपने ही मित्र-संबंधी आदि हों, किसी को ठगकर अनैतिक लाभ लेने का विचार ही उनके मन में नहीं उठता है । मौके का नाजायज फायदा उठाने के विचार से लड़ने के लिए उन्हें “संकल्पशक्ति” की जरूरत नहीं होती । दुर्भाग्य से ऐसे लोगों की संख्या अपने भारतीय समाज में नगण्य है ऐसा मेरा सोचना है । दूसरे वे लोग हैं जिन्हें लोभ-लालच आ घेरता है और मौका मिलने पर उन्हें स्वयं को रोकने का प्रयास करना पड़ता है, अर्थात् “संकल्पशक्ति” का सहारा । “नहीं, यह गलत है; मुझे यह नहीं करना चाहिए”, और “अरे नहीं, फायदे को छोड़ना बेवकूफी है; नैतिकता-वैतिकता सब दकियानूसी बातें हैं; डरते हैं लोग इसलिए ऐसा कहते हैं” जैसे विरोधी भावों के बीच उन्हें झूलना पड़ता है । अंत में वे इधर या उधर, किसी एक निर्णय पर पहुंचते हैं । कहा जाता है कि जिसकी “इच्छाशक्ति” बलवती होती है वह प्रलोभन से बच निकलता है

अब सवाल उठता है कि वह कौन-सी बातें हैं जो इस इच्छाशक्ति अथवा “संकल्पशक्ति” को प्रभावित करती हैं । मेरे ध्यान में प्रमुखतया तीन बातें आ रही हैं । प्रथम है अंतःकरण । अंतःकरण की बातें सर्वत्र कही जाती हैं । हम सभी यह मानते हैं कि यही अंतकरण व्यक्ति को अनुचित से उचित, अकर्तव्य से कर्तव्य, अनैतिक से नैतिक की ओर ले जाता है । क्या हर व्यक्ति अंतःकरण से प्रेरित होकर अपने को अनुचित से बचाता है ? क्या अंतःकरण सदैव, सबके मामले में समान रूप से प्रभावी रहता है ? कदाचित् नहीं । मैं समझता हूं कि अंतःकरण जैविक गुण के रूप में व्यक्ति को जन्मना प्राप्त होता है । कुछ जन जन्म से ही वैचारिक दृष्ट्या अत्यंत मजबूत होते हैं, अधिकतर नहीं । पारिवारिक पृष्ठभूमि, परिवेश, अनुभवों और अध्ययनों, आदि से यह अधिकाधिक पुष्ट या दुर्बल होता होगा ऐसा सोचना है मेरा ।

द्वितीय है विवशता का अभाव । मैं समझता हूं कि कुछ परिस्थितियां मनुष्य को विवश कर देती हैं अनुचित कर बैठने के लिए । जैसे किसी व्यक्ति के साथ ऐसी स्थिति पैदा हो कि उसका परिवार भूखा रहने को मजबूर हो जाए, तब प्रलोभन से बच पाना उसके लिए अत्यंत कठिन होगा । वह आगे बढ़कर अवसर का लाभ ले लेगा । सामान्य परिस्थितियों में वह जो न करता वह कर बैठेगा । उसे आत्मग्लानि भी अनुभव हो सकती है, किंतु अंततः परिस्थितियों को दोष देकर संतुष्ट हो लेगा । कहने का तात्पर्य है कि विवशता का न होना आत्मसंयम में सहायक होता है ।

और तृतीय है भय, जो मेरी दृष्टि में सर्वाधिक महत्त्व का है । ऐसा हो सकता है कि मनुष्य के समक्ष कोई विवशता न हो, उसका अंतःकरण भी उसे न रोके, तो भी प्रलोभन से वह बचा रहे । देखा जाता है कि किसी एक या दूसरी तरह का भय उसे प्रलोभन में पड़ने से रोक लेता है । यह भय कई प्रकार का हो सकता है । एक भय तो प्रतिष्ठा खो बैठने का है । मेरी ओर लोगों की उंगलियां उठेंगी यह सोचकर वह स्वयं को रोक लेता है । कभी बदनामी को एक असह्य सजा के रूप में देखा जाता था । दुर्भाग्य से इस प्रकार के भय की भावना अब समाज में नियम स्वरूप नहीं रह गया है; वह अपवाद बन चुका है । दूसरा भय है कानून का । व्यक्ति को यह भय सता सकता है कि वह प्रलोभन में पड़कर जो अनुचित लाभ हासिल करेगा उसकी भारी कीमत उसे चुकानी पड़ेगी । अतः जोखिम उठाना बुद्धिमत्ता नहीं होगी ऐसा विचार उसके मन में घर कर सकता है ।

लोभ-लालच, उसका अभाव, और उस पर नियंत्रण, आदि की बातें अपने समाज में सर्वत्र व्याप्त भ्रष्टाचार के संदर्भ में बहुत अहमियत रखती हैं । हमारे समाज में उस वर्ग का आकार नित्यप्रति बढ़ता जा रहा है जो लालच में आकर कुछ भी करने को तैयार है । कहा जाना चाहिए कि उनका अंतःकरण मर चुका है । उनके लिए आत्मग्लानि जैसी चीज बेमानी हो चुकी है, और इस बात की भी कोई अहमियत नहीं रह गयी है कि अन्य जन उनके बारे में क्या सोचते हैं । वस्तुतः स्थिति उलट-सी गयी है । अब लोग ऐसे व्यक्ति के दुस्साहस की सराहना करने लगे हैं, न कि उसकी आलोचना । उस व्यक्ति की प्रतिष्ठा घटती नहीं, बढ़ती है, जो ऐनकेन प्रकारेण दौलत अर्जित कर लेता है ।

कानून का भय अवश्य कारगर हो सकता, किंतु मौजूदा हालात में हैसियत वालों को पूरा भरोसा हो चला है कि कानून का शिकंजा उनके लिए नहीं । वह तो केवल कमजोर व्यक्ति को ही दंडित करेगा । समर्थ व्यक्ति आश्वस्त रहता है कि लोगों की फौज उसके समर्थन में जुट जायेगी, कि मुंहमांगी रकम पर पहुंचे हुए अधिवक्तागण उसे बचाने का रास्ता खोज लेंगे, और अंततः उसे कोई दंड नहीं दिया जायेगा । वर्तमान न्यायिक व्यवस्था की असफलता या निष्प्रभाविता को देखते हुए कोई भी भरोसे से कह सकता है कि ‘समरथ को नहीं दोष गोसाईं’

तब आत्मनियंत्रण, इच्छाशक्ति या “संकल्पशक्ति”, जो भी नाम दें, की उम्मींद कहां रह जाती है ? – योगेन्द्र जोशी

राष्ट्रीय पर्व पंद्रह अगस्त – रस्मअदायगी तक सिमटा अहमियत खोता हुआ एक दिवस (2)

आज (15 अगस्त) की पहली पोस्ट के आगे ।

मेरे मतानुसार जिन मुद्दों को देश में नजरअंदाज किया जा रहा है उनमें से कुछ ये हैं:

1. जनसंख्या – मेरी नजर में बेतहासा बढ़ रही जनसंख्या देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है । हमारे समस्त संसाधन, प्रशासनिक व्यवस्था, भोजन-स्वास्थ-शिक्षा के इंतजामात, विकास कार्यों के परिणाम मौजूदा जनसंख्या के लिए ही अपर्याप्त हैं । लेकिन देश का दुर्भाग्य देखिये कि कोई राजनीतिक दल इसके बारे में एक शब्द तक नहीं बोलता है । हर किसी को वोट बैंक की चिंता है और हर कोई इसकी चर्चा करना सत्ता के रास्ते का अड़ंगा मानता है । हर किसी को उस दिन की प्रतीक्षा है, जब आधा-आधा दर्जन बच्चे पैदा करने वालों के मस्तिष्क में नियोजित परिवार की सद्बुद्धि का उदय हो । हम यह भूल करते आ रहे हैं कि जनसंख्या किसी दल-विशेष का मुद्दा नहीं है । यह देश का मुद्दा है और सभी दलों को मिलकर एक सुविचारित नीति अपनानी चाहिए । पर ऐसी सन्मति उन्हें आये तब न ?

2. भ्रष्टाचार – भ्रष्टाचार अब इस देश के सामाजिक जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है । देश के इस ‘संक्रामक सामाजिक रोग’ के सैद्धांतिक विरोध में बड़ी-बड़ी बातें राष्ट्रपति से लेकर अदना कार्यालय चपरासी तक करता है, किंतु उससे मुक्ति हेतु कोई भी एक कदम नहीं उठाना चाहता है । मैंने अब तक के जीवन में कई सरकारें देखी हैं, पर कभी किसी सरकार को भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कृतसंकल्प नहीं पाया । आज कोई सरकारी महकमा नहीं जहां अवसरों के होते हुए भी भ्रष्टाचार न हो । जहां अवसर ही न हों वहां की ईमानदारी का दृष्टांत देना माने नहीं रखता है । कहीं भ्रष्टाचार खुलेआम जनता की नजर के सामने है, तो कहीं परदे के पीछे । ईश्वर सर्वव्यापी हो या न हो, भ्रष्टाचार तो सर्वत्र है, प्रायः सबके हृदय में बस चुका है । चाहे पुलिस भरती हो या सैनिक भरती, चाहे ‘बीपीएल’ कार्ड हो या ‘नरेगा’ के तहत काम, चाहे सरकारी संस्थाओं को खाद्य आपूर्ति का मामला हो या अस्पतालों में दवा खरीद का, कोई जगह बची नहीं है । देश के शीर्षस्थ पदों पर बैठे सभी को सब कुछ पता है, पर उन्हें कुछ करना नहीं होता । स्थिति तो यह है कि यदि कोई कभी भूले-भटके पकड़ में आ जाता है तो उसको सजा दिलाने वालों से कहीं अधिक बचाने वाले बीच में आ पड़ते हैं – राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी, कर्मचारी संगठन, वकालत पेशे के नामी-गिरामी नाम, आदि । तब फिर उम्मीद क्या की जाये ?

3. शिक्षा – एक शिक्षाविद् के नाते मैं महसूस करता आ रहा हूं कि हालात चिंताजनक हैं । सबसे दुःखद पहलू यह है कि सरकारों ने दोहरी शिक्षा नीति को बढ़ावा दिया है । ‘एरिया स्कूलों’ की अवधारणा कई विकसित देशों में प्रचलित है, किंतु अपने देश में लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के नाम पर लोगों को पूरी छूट है कि वे अपने बच्चों को जहां चाहें पढ़ाएं । फलतः एक तरफ व्यावसायिक लाभ कमाने में लिप्त निजी ‘पब्लिक स्कूल’ समाज के अपेक्षया संपन्न वर्ग को स्तरीय शिक्षा दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ वे सरकारी स्कूल हैं जहां की व्यवस्था घ्वस्तप्राय है, जहां न समुचित संसाधन हैं, न पर्याप्त संख्या में अध्यापक और कार्य-संस्कृति का तो नितांत अभाव है । प्रशासन के जिन लोगों पर उनकी व्ववस्था का दायित्व है उनके अपने स्वयं के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं, कतिपय अपवादों को छोड़कर । लिहाजा वहां के हालात पर उनको कोई चिंता नहीं रहती है । आज हालात यह हैं कि देश भर के इन सरकारी स्कूलों के करीब एक-तिहाई बच्चे ‘प्राइमरी’ पास करने के बाद भी अपना नाम लिख-पढ़ नहीं सकते हैं । (‘प्रथम’ नाम की गैरसरकारी संस्था के एक सर्वेक्षण से कभी मैंने यह जाना ।) ऐसे बच्चों को साक्षर कहा जा सकता है क्या ? हां, यदि आप स्वयं को भ्रम में रखना पसंद करें तो, अन्यथा वे निरक्षर ही कहे जायेंगे । इस देश ने झूठे आंकड़ों से संतोष पाने की आदत पाल ली है । कहां से आयेगी साक्षरता देश में ?

4. स्वास्थ्य – शिक्षा की तरह सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का हाल भी कष्टप्रद है । संपन्न वर्ग के लिए निजी अस्पताल हैं, किंतु गरीबों के लिए तो सरकारी ही हैं, जहां सुविधाओं का अभाव आम बात है । कभी डाक्टर नहीं तो कभी नर्स नहीं । सरकार दावा करती है मुफ्त दवा देने की, पर वहां दवा होगी नहीं, यदि हो तो ‘इस्पायर्ड’ ! जांच के नाम पर मशीनें काम नहीं कर रही हैं की घोषणा । पैसा देकर बाहर जांच कराइये, जहां से डाक्टरों-कर्मियों को कमिशन मिलता है । देश में डाक्टरों का अभाव है, और जो हैं निजी प्रैक्टिस से धन कमाने को अधिक तवज्जू देते हैं । सरकारी नौकरी कर तो लेंगे लेकिन प्राइवेट प्रैक्टिस करते रहेंगे, भले ही उसका भत्ता पाते हों । देश डाक्टर-इंजिनियर पैदा करके उनका ‘निर्यात’ करने में गर्व अनुभव करता है, पर भूल जाता है कि उनकी आवश्यकता तो यहां की जनता को है । समस्या का कोई समाधान है क्या ?

5. पुलिस – मुझे सबसे अधिक कष्ट होता है यहां की पुलिसिया तंत्र से । पुलिस का रवैया वही है जो अंगरेजों के जमाने में रहा होगा । सत्तासीन राजनेताओं की सेवा करना उसका धर्म है । उनके आदेश पर जनता पर जब चाहा जहां चाहा डंडे बरसाना उनका कर्तव्य बनता है । जो सत्ता पा गये वे खुद को नियम कानूनों से ऊपर शासक और जनता को शासित प्रजा के रूप में देखते हैं । अपने जनप्रतिनिधि होने का ध्यान उन्हें नहीं रहता है । जनता ने कहीं असंतोष व्यक्त किया नहीं कि डंडे से उन्हें काबू में लाने हेतु उनकी पुलिस है, न कि जनता के कष्टों को सुनने के लिए । आजकल रोज कहीं न कहीं से पुलिसिया तांडव की घटनाएं सुनने को मिल जाती हैं । पुलिस बल है कि निरपराध-निरीह के सामने तो शेर बनती है, और पैसा, राजनीतिक पहुंच, और प्रशासनिक रसूख वालों के सामने घुटने टेक देती है । ज्यादतियों की शिकायत लेकर आम आदमी किसकी शरण में जाये ?

6. आर्थिक विकास – विगत कुछ समय से सरकारें आठ-नौ प्रतिशत की आर्थिक विकास का ढिंढोरा पीटती आ रही हैं । क्या है इस आर्थिक विकास का राज और निहितार्थ ? ऐसा लगता है कि जैसे ये आर्थिक प्रगति एक जादुई डंडा है, जिससे देश की समस्त समस्याएं सुलझ जायेंगी । जिन समस्याओं का मैंने उल्लेख किया है और जिनका जिक्र नहीं किया है, क्या उनसे मुक्ति मिल जायेगी ? क्या इस आर्थिक प्रगति से भूखे को भोजन मिल जायेगा, रोगी को दवा मिल जायेगी, अथवा गरीब को उचित शिक्षा मिल जायेगी ? जी नहीं, आज जो आर्थिक प्रगति हो रही है वह संपन्न वर्ग के आर्थिक निवेश पर आधारित है, जिससे पैदा होने वाली संपदा अधिकांशतः संबंधित गिने-चुने संपन्न लोगों में ही बंट जानी है । उससे न किसी रिक्शा वाले को कुछ मिलने का, न खेत के मजदूर को और न ही ईंटा ढोने वाले श्रमिक को । मौजूदा आर्थिक तंत्र बड़े-बड़े उद्योग-धधों को बढ़ावा देने वाला है, जिसके खिलाड़ी भी बड़े होते हैं । समाज के निचले तबके का भला तो तब होगा, जब उसके हितों से प्रत्यक्षतः जुड़े छोटे-मोटे धंधों को आगे बढ़ावा मिले । ऐसे धंधे किसी को खरबपति नहीं बना सकते, लेकिन जो भी संपदा अर्जित होगी वह बहुत न होकर भी सभी गरीबों को थोड़ा-थोड़ा अवश्य मिलेगा; उन्हें राहत तो मिलेगी । केवल सरकारें ही यह काम कर सकती हैं । क्या कभी इस विषय पर ईमानदारी से सोचेगा कोई ?

7. राजनेता – यूं तो जिन समस्याओं पर मेरा ध्यान जाता है वे कई हैं । यहां मैं उदाहरण रूप में कुछएक का जिक्र कर रहा हूं । मेरी दृष्टि में सभी के मूल में है हमारी विकारग्रस्त हो रही बहुदलीय लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था । यह शिकायत तो स्वयं राजनेता भी करने लगे हैं कि राजनीतिक दलों का अपराधीकरण हो चुका है । विडंबना देखिये कि सुधार तथा परिष्कार करने से सभी बच रहे हैं, कारण सामूहिक संकल्प का अभाव । प्रायः सभी दलों में ऐसे तत्व हैं जो खुद को नियम-कानूनों से परे मानते हैं । हमारे नेता उनका उल्लंघन अथवा उनकी अवहेलना करना अपनी ताकत का द्योतक मानते हैं । वे सोचते हैं कि अगर नियम-कानूनों से वे भी वैसे ही बंधे रहंे जैसे आम आदमी, तो फिर वे ‘विशेष’ कहां रह जायेंगे ? लोकतंत्र है पर सामंती सोच बरकरार है । यह तो है हकीकत का एक पहलू । दूसरा है मनमरजी का तंत्र । अपने यहां यह प्रथा चल चुकी है कि सत्ता पर कब्जा पाने के बाद हर दल नीति संबंधी अपने किस्म के प्रयोग आरंभ कर देता है, बिना इस पर ध्यान दिये कि उसकी नीतियां सत्ता परिवर्तन के बाद मान्य रहेंगी कि नहीं । मैं अपनी बात समझाने के लिए उत्तर प्रदेश का उदाहरण देता हूं । आजकल प्रदेश की मुख्यमंत्री महोदया उच्च प्राथमिकता के साथ ‘गरीबों के सामाजिक उत्थान के लिए’ पार्क बनवाने तथा मूर्तियां लगवाने में जुटी हैं । इन मूर्तियों को बसपा के चुनावचिह्न से जोड़कर देखा जा रहा है । अगर भविष्य में ‘सपा’ सत्ता में आई तो संभव है कि वे मूर्तियों को ही तोड़ डालें । अगर नहीं, तो वे पार्कों और मूर्तियों के रखरखाव के लिए तो धन आबंटित करने से रहे । रखरखाव के अभाव में वे खुदबखुद ध्वस्त होने लगेंगी । सोचिये कि करोड़ों रुपये खर्च करके आज जो किया जा रहा है वह उचित है, जब उसे आदरभाव से नहीं देखा ही नहीं जा रहा है । कैसा लोकतंत्र है यह जिसमें ‘मेरी मरजी’ के सिद्धांत से शासन चल रहा हो । लोग क्या चाहते हैं इस पर विचार हो रहा है कहीं ? हमारी प्राथमिकताएं ऐसे ही तय होने लगें तो देश रसातल को नहीं जायेगा क्या ?

बहुत कुछ और कहा जा सकता है । अंत नहीं बातों का । पर बानगी के तौर पर इतना कुछ ही बहुत है । देश की तस्वीर इसी में काफी झलक जाती है ।

कुछ भी हो ‘स्वतंत्रता दिवस’ की दुबारा शुभेच्छाएं । क्या पता देश में शनैः-शनैः सन्मति का उदय हो और तस्वीर बदले । यही उम्मीद पाल लेता हूं । आमीन ! – योगेन्द्र जोशी

छब्बीस जनवरी अर्थात् गणतंत्र दिवस, और मैं

आज गणतंत्र दिवस है, साठवां गणतंत्र दिवस । हर बीते वर्ष की तरह मनाया जाने वाला दिवस । अगले वर्ष इसी तारीख पर फिर मनेगा, हर बार की भांति रस्मअदायगी निभाते हुए । बड़े-बड़े संकल्पों की बात की जायेगी, देश की उपलब्धियां गिनी और गिनायी जायेंगी । लेकिन क्या है जो होना चाहिये था, जो इस तारीख तक हो ही जाना चाहिये था, इस बात का जिक्र रस्मअदायगी के समय नहीं किया जाता है । ऐसा करना निराशाप्रद जो समझा जायेगा ।

कहने को मैं इन सभी साठों दिवसों का गवाह रहा हूं । लेकिन उनके अर्थ कोई पैंतालीस साल पहले समझने लगा होऊंगा, शायद । उसके पहले समझने की समझ ही कहां थी ! आरंभ में मुझे भी इस दिन कुछ जोश, उत्साह, और उमंग अनुभव होता था । फिर प्रौढ़ावस्था आते-आते ये बातें दिलो-दिमाग से निकलने लगीं और रस्मअदायगी का भाव मन में अधिक रहने लगा । और अब वरिष्ठ नागरिक बनते-बनते इस दिवस में दिलचस्पी ही समाप्त हो चुकी है । अब हर बीते दिन की तरह का ही एक और दिन लगता है यह मुझे ।

मैं निकल पड़ता हूं बाहर सड़क पर देखने कि क्या कुछ अलग है आज । करीब दस बज रहे हैं । घर के गेट से बाहर निकलते हुए सुनता हूं एक रद्दी वाले की आवाज, रोज की भांति, ‘रद्दी पेपर, कापी-किताब, लोहाऽऽ…’ । अपनी गली के दूसरे कोने पर आंखों से ओझल होते देखता हूं उसे, कुछ सेकंड तक, और बढ़ जाता हूं घर के पास की मुख्य सड़क बीएचयू-डीएलडब्ल्यू रोड पर । ‘प्रभात-फेरी’ के रूप में पंक्तिबद्ध स्कूली छोटे बच्चों को आगे बढ़ते हुए पाता हूं नारे लगाते हुए । उनके साथ हैं अध्यापक एवं अघ्यापिकाएं उनको नियंत्रित करने में व्यस्त । मैं खुद से पूछता हूं कि ये बच्चे क्या इस दिन के मतलब समझते होंगे, क्या ये उन नारों के अर्थ जानते होंगे जिन्हें ये जोर-जोर से बोल रहे हैं, आदि । शायद इतना सब उनकी समझ में अभी नहीं आता होगा । या हो सकता है वे मुझसे अधिक समझदार हों इस मामले में और उत्साहित हों इस दिवस की अर्थवत्ता जानने के लिए । हो सकता है ।

मैं आगे बढ़ जाता हूं उसी मुख्य मार्ग पर और गांधीनगर पहुंचने पर बांये घूम जाता हूं, संकटमोचन मार्ग के रास्ते अस्सी (गंगा) घाट तक जाने के लिए । संकटमोचन ले जाने वाली उस सड़क की मरम्मत हुए बमुश्किल दो-ढाई महीना हुआ होगा, लेकिन उसकी हालत ? मेरा मन कह उठता है, भगवान् ही मालिक है इस देश का । ऐसा लगता है कि कंकणों से लदे किसी ट्रक से कंकड़ गिरकर सड़क पर बिखर गये होंगे । कोई कह ही नहीं सकता है कि यह सड़क हाल में कभी बनी होगी । लेकिन मुझे याद है उसे बनते हुए मैंने देखा था । मैं सोचता हूं कि किस रफ्तार से भ्रष्टाचार फैल रहा है इस देश में । हम भले ही और मामलों में लंगड़ाते-घिसटते आगे बढ़ रहे हों, किंतु भ्रष्टाचार में हम तेजी से दौड़ रहे हैं । भगवान् ही मालिक । मैं उस सड़क की तस्वीर खींचता हूं और आगे बढ़ जाता हूं ।

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बस थोड़ी ही दूर पर मिल जाता है सड़क के किनारे पड़े कूड़े का ढेर । नजदीक जाता हूं तो देखता हूं उस लड़की को जो कूड़े से प्लास्टिक चुन रही होती है । आज की रोटी का इंतजाम जो करना है उसे । गणतंत्र दिवस का कोई अस्तित्व नहीं उसके लिए । पता नहीं किस उम्र में उसने पेट भरने के इस रास्ते पर कदम रखे होंगे । अब तो यही उसकी जिंदगी है । मैं उसे भी अपने कैमरे में कैद कर लेता हूं । शायद मेरा कैमरा उसकी तस्वीर खींचने वाला पहला और अंतिम कैमरा होगा । मन वितृष्णा से भर जाता है ।

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आगे बढ़ जाता हूं मैं और पहुंचता हूं संकटमोचन मंदिर के प्रवेशद्वार के पास । यहां भी सड़क के वही हाल ! क्या हो गया है इस देश को, मैं सोचता हूं । अब आगे अस्सी घाट तक जाने का मेरा मन नहीं होता है । मैं वहीं से लौट आता हूं । गणतंत्र की सफलता की याद दिलाने वाले ये ही अनुभव मेरे लिए काफी हैं । क्या करूंगा मैं गंगाघाट तक जाकर ? गंगा नदी के पक्के घाट से नगवा की ओर के कच्चे किनारे पर ताजी और बासी शौच की बदबू का अनुभव ही तो मिलेगा वहां ? स्वच्छ गंगा अभियान के नाम पर करोड़ों बरबाद करने के बाद भी इससे अधिक क्या हुआ होगा वहां, मैं सोचता हूं ।

बेकार है आगे जाना सोचते हुए मैं घर वापस लौट आता हूं । दिन का शेष समय घर पर चुपचाप बीत जाता है मेरा इस पोस्ट को लिखने, कुछ अन्य चीजें पढ़ने-लिखने और चंद मिनट टीवी पर समाचार सुनने में । – योगेन्द्र

‘विहिप’ का ‘फरमान’ – असुरक्षा की सार्वत्रिक भावना

(नवंबर २० की पोस्ट के आगे) वस्तुतः तथाकथित धर्मरक्षकों की चिंता धर्म को परिभाषित करने और उसमें जनसमुदाय को संलग्न होने की प्रेरणा देना नहीं है । जो मैं देखता आ रहा हूं उसके अनुसार धर्म अपना असली अर्थ खोकर एक सामुदायिक पहचान भर बन के रह गया है । जैसे किसी व्यक्ति की राष्ट्रीयता उसकी पहचान बनती है, ठीक वैसे ही धर्म भी मानव समाज में एक वृहत् समुदाय का सदस्य होने की पहचान प्रदान करता है । कभी पहनावा तो कभी नाम और कभी ‘धार्मिक’ कर्मकांड हमें सामूहिक पहचान प्रदान करते हैं । दाढ़ी-मूंछ बढ़ाकर सिर पर पगड़ी धारण कर ली तो सिख हो गये और बिना मूंछ के दाढ़ी बढ़ाकर सिर पर विशिष्ट टोपी पहन ली या बुरका ओड़ लिया तो मुस्लिम हो गये । माथे पर तिलक या बिंदी लगाकर मंदिर प्रसाद चढ़ाने पर हिंदू कहलाने लगे अन्यथा हर ‘संडे’ चर्च में ‘सर्मन’ सुनने चले या गले में क्रास धारण कर लिया तो इसाई । कुछ इसी प्रकार के प्रतीक हमारे हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई आदि होने की पहचान बनाते हैं । बस । हमारा आचरण क्या है यह माने नहीं रखता है । वास्तव में सामूहिक पहचान के कई आधार हम अपनाते हैं । कभी जाति में, तो कभी क्षेत्रीयता में, और कभी भाषा में अपनी पहचान खोजते हैं । शेष के लिए क्लिक करें >>

‘विहिप’ का ‘फरमान’ – क्या अर्थ है धर्म का?

(नवंबर 2 की पोस्ट के आगे) करीब दो सप्ताह पहले मैंने ‘विहिप’ के ‘फरमान’, (उसे आप आदेश, अनुरोध, सलाह, प्रस्ताव आदि जो ठीक समझें कह सकते हैं) का जिक्र किया था । विहिप ने कहा था कि हिंदू कुछ समय में अल्पसंख्यक हो जायेंगे, अतः उन्हें अधिक बच्चे पैदा करके अपनी जनसंख्या बढ़ानी चाहिये । वस्तुतः उनके दो बच्चे अपने लिए और दो ‘राष्ट्र’ के नाम होने चाहिए ।

समाचार पढ़ने पर मेरे मन में अनेकों सवाल उठने लगे । मुझे उनका समुचित उत्तर मिल नहीं पा रहा था । क्या विहिप वाकई परेशान है ? क्या उसने सोच-समझ कर ही नारा दिया है ? अविश्वास का कारण मुझे नहीं दिखा, इसलिए वे सवाल मुझे परेशान करते रहे । आगे पढ़्ने के लिए क्लिक करें >>

इंडिया, भारत एवं अडिगा का ह्वाइट टाइगर

‘द गार्जियन’ की समीक्षा-पृष्ठ का एक अंश

‘द गार्जियन’ की समीक्षा-पृष्ठ का एक अंश

मुझे इस स्थल पर अपने इस मत कि इंडिया भारत नहीं है और दोनों में अच्छा-खासा अंतर है पर चर्चा जारी रखनी थी । उसे मैं अगली बार के लिए टाल रहा हूं और अकस्मात् इस वर्ष के ‘बूकर’ पुरस्कार की खबर पर उतर रहा हूं । इसके कारण हैं । कल ही मेरी दृष्टि वार्तापत्र ‘द हिंदू’ के मुखपृष्ठ पर छपे इस समाचार पर गयी कि इस वर्ष का प्रतिष्ठित ‘बूकर पुरस्कार’ तैंतीस-वर्षीय भारतीय अंग्रेजी लेखक अरविंद अडिगा को उनके प्रथम उपन्यास ‘द ह्वाइट टाइगर’ पर दिया गया है । भला ‘इंडिया बनाम भारत’ का इस समाचार से क्या वास्ता ? वास्ता है और वही इस आलेख का विषय है ।

‘द हिंदू’ में छपी रिपोर्ट के अंत के अनुच्छेदों में यह पाठ्य है-
… Chairman of the Jury Michael Portillo, the Tory politician-turned-critic, colourfully put it. “My criteria were ‘Does it knock my socks off?’ and this one did… the others impressed me … this one knocked my socks off,” Mr. Portillo said. “The novel is in many ways perfect. It is quite difficult to find any structural flaws with it,” he said.

रिपोर्ट के अनुसार अडिगा के उपन्यास में अपने देश की विषमतापूर्ण एवं विसंगतिमय प्रगति की पीड़ादायक कहानी है, जिसने निर्णायक-मंडल के सदस्यों को विचलित कर दिया । इस बात ने मेरी जिज्ञासा जागृत कर दी यह जानने के लिए कि उनन्यास में है क्या । मैंने उपन्यास का नाम पहले नहीं सुना था । इसकी कोई प्रति मेरे पास नहीं है कि उसे पढ़ूं । मैंने संक्षेप में जानकारी पाने हेतु अंतरजाल पर पुस्तक की समीक्षा खोजना चाहा । समीक्षाएं तो ढेरों हैं, किंतु मैंने ब्रितानिया के केवल दो प्रतिष्ठित समाचारपत्रों, ‘द गार्जियन’ तथा ‘द टेलीग्राफ’ पर नजर डालना काफी समझा । कहानी ‘बलराम हलवाई’ नाम के पात्र (ह्वाइट टाइगर) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक गरीब तथा अनपढ़ परिवार में जन्मने के बावजूद यह जान जाता है कि वह किस ‘अंधकारमय’ जीवन के साथ जी रहा है और उसको कैसे ऊपर उठते हुए दिल्ली के ‘प्रकाशमय’ संसार में अपनी जगह बनानी है । वह ‘सफलता’ की सीढ़ियां चढ़ने के लिए सभी ‘हथकंडे’ अपनाता है जिसमें संवेदना और सद्व्यवहार के लिए कोई स्थान नहीं है । अंत में वह एक सफल उद्यमी बनकर उभरता है और चीनी प्रधानमंत्री के साथ उद्यमिता के बहाने पत्राचार में जुट जाता है, इस देश की जिंदगी की हकीकत को उजागर करते हुए । कहानी किसी के लिए चिंतन का विषय बन सकती है, तो कुछ अन्य में तिलमिलाहट अथवा बौखलाहट पैदा कर सकती है ।

‘द गार्जियन’ की समीक्षा ने बलराम के चरित्र को यूं दर्शाया है-
He is heading for glory in India’s bright future. He will be one of those who stuffs cash into brown envelopes for policemen and politicians, and not just another victim.

अर्थात् ठान लेता है कि उसे क्या करना है आगे बढ़ने के लिए । वह लिफाफों में पैसा भर-भर कर पुलिसकर्मियों तथा राजनेताओं तक पहुंचायेगा, क्योंकि यही यहां की हकीकत है ! वह अपनी जमात के अन्य अभागे जनों की तरह सताया जाने वालों में नहीं शरीक होगा ।

समीक्षा के कुछ अन्य चुने अंशों पर गौर करें-
… he, along with most lowly Indians, inhabits the Darkness, a place where basic necessities are routinely snatched by the wealthy, who live in the Light.

कौन जिम्मेदार है उस जैसे विपन्न लोगों के हालात के लिए ? बलराम को इसका एहसास हो जाता है और वह संपन्नों की जमात में जा मिलने का विचार बना लेता है । समीक्षा में आगे है(कोष्ठकों में मेरे शब्द हैं)-
The home country [India that is Bharat] is invariably presented as a place of brutal injustice [क्रूर अन्याय] and sordid corruption [घृणास्पद भ्रष्टाचार] one in which the poor are always dispossessed and victimised by their age-old enemies, the rich. Characters at the colourful extremities of society are Dickensian grotesques [ugly or shocking], Phiz [reviewer] sketches, adrift in a country that is lurching rapidly towards bland middle-class normality.

देश की आर्थिक प्रगति की विषमता इस अनुच्छेद में स्पष्ट है । एक छोर पर है विपन्न वर्ग जिसके लिए प्रगति की कोई सार्थकता नहीं है, तो दूसरे छोर पर है नवसंपन्न बनता हुआ मध्य वर्ग जिसे प्रथम वर्ग की कीमत पर संपन्नता अर्जित करने में कोई बुराई नहीं दिखती और न उसमें आत्मग्लानि का भाव जगता है कि वह उस विपन्न वर्ग के हितों के लिए प्राथमिकता के आधार पर प्रयास करे ।

‘द टेलीग्राफ’ की समीक्षा में भी कुछ मिलते-जुलते विचार व्यक्त हैं-
He begins in the rural “Darkness”, a world of landlord and peasant. And when he escapes to the “Light” of the cities, it is into a world of servants and masters.

यानी देश के दो पक्ष हैं, एक अंधकारमय तो दूसरा प्रकाशित । एक में मालिक तो दूसरे में सेवक । आगे देखें-
The secret of India, he tells Wen [Jiabao], is the way that its extreme inequality is stabilised by its strong family structures: “Never before in human history have so few owed so much to so many.”

बलराम की नजर में एक छोटा वर्ग एक बड़े वर्ग के प्रति ऋणी है, क्योंकि उसने उस वर्ग के हकों की कीमत पर ही अपनी संपन्नता की मीनार खड़ी की है । और बलराम के ‘सत्य के बोध’ का वर्णन देखिये-
Advancement can be achieved only by patronage and corruption – if you make friends with the local political thugs, you might get a job as a bus conductor – or by Balram’s eventual method: stepping outside the “coop” of conventional morality.

नैतिकता की अवधारणा को पुस्तकों में समेटते हुए भ्रष्टाचार के रास्ते ही आगे बढ़ा जा सकता है । बहुत कुछ और भी है इन समीक्षाओं में जो देश की मौजूदा कटु सच्चाई उजागर करती हैं ।

मैं दावा नहीं कर सकता कि पुस्तक के विषयवस्तु के बारे में मैं ठीक-ठीक अनुमान लगा पाया हूं, परंतु मुझे लगता है उपन्यासकार अपने तरीके से देश की उस तस्वीर को पेश करता है जिसे मैं इंडिया तथा भारत के अंतर के रूप में देखता आ रहा हूं । यही कारण है कि मेरा ध्यान अकस्मात् इस घटना पर गया । अन्यथा पुस्तकों की चर्चा और उनके पुरस्कृत होने की घटना व्यापक सामाजिक संदर्भों में कभी-कभार ही माने रखती है । – योगेन्द्र