लोकसभा चुनाव 2019 – एक अनूठे ध्रुवीकरण की राजनीति

यों तो मैंने 1957 एवं 1962 के चुनाव देखे हैं (क्रमशः करीब 10 एवं 15 साल की उम्र में), लेकिन लोकतंत्र तथा चुनावों की समझ मैंने 1967 के चुनाव और उसके बाद ही अर्जित की। 1977 के चुनावों तक मैं शायद एक पंजीकृत मतदाता भी बन चुका था। उस समय के चुनावों की परिस्थिति एवं घटनाक्रम मुझे कुछ हद तक याद हैं। उस चुनाव से इस वर्ष के लोकसभा चुनाव की तुलना और संबंधित टिप्पणी मैं अपनी याददास्त पर निर्भर करते हुए कर रहा हूं। वैसे विस्तृत एवं ठीक-ठीक जानकारी अंतरजाल पर मिल ही जाएगी।

इस बार के लोकसभा चुनाव इस अर्थ में दिलचस्प हैं कि इसमें अपने किस्म के एक अनोखे ध्रुवीकरण की राजनीति देखने को मिल रही है। ध्रुवीकरण न जाति के आधार पर है और न ही धर्म अथवा क्ष्रेत्र के आधार पर। यह ध्रुवीकरण है प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध।

जब से क्ष्रेत्रीय दलों का आविर्भाव देश में हुआ और अपने बल पर सरकार बना सकने की कांग्रेस पार्टी की हैसियत समाप्त हो गई, विविध प्रकार के गठजोड़ देखने को मिलने लगे। ध्रुवीकरण की बातें पहले भी होती रही हैं, खासकर मुस्लिम समुदाय को लेकर, लेकिन व्यापक स्तर का ध्रुवीकरण कभी पहले हुआ हो ऐसा मुझे याद नहीं आता एक मामले को छोड़कर। ध्रुवीकरण का वह मामला था 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरुद्ध। लेकिन तब के ध्रुवीकरण और इस बार के ध्रुवीकरण में उल्लेखनीय अंतर है। इस अंतर को समझने के लिए उस काल की राजनीतिक परिस्थिति पर एक नजर डालने की आवश्यकता होगी।

मेरे समान उम्रदराज लोगों को याद होगा कि 1960 के दशक के लगभग मध्य में जनसंख्या नियंत्रण की बात चली थी (कांग्रेस राज में)। लाल त्रिकोण (▼) और “हम दो हमारे दो” के विज्ञापन यत्रतत्र देखने को मिलते थे। योजना के परिणाम भी ठीक होंगे यह उम्मीद बनने लगी थी। लेकिन 1972 के चुनावों के बाद इस परिवार नियोजन कार्यक्रम का हस्र दुर्भाग्यपूर्ण रहा। कैसे? देखें –

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध एवं बांग्लादेश के “जन्म” के बाद कांग्रेस की स्थिति बहुत अच्छी रही। उसे 1972 के चुनावों में उल्लेखनीय सफलता मिली। किंतु देश का दुर्भाग्य कि उसी समय इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी एक गैर-संवैधानिक शक्ति के तौर पर उभरे। इंदिराजी की एक बड़ी भूल थी कि उन्होंने संजय को सरकारी तंत्र में हस्तक्षेप करने से रोका नहीं। संजय को विद्याचरण शुक्ल, नारायण दत्त तिवारी आदि जैसे नेता चाटुकार के रूप में मिल गये। संजय ने सरकारी कामकाज में दखलंदाजी शुरू कर दी। मैं मानता हूं कि संजय के इरादे बुरे नहीं थे किंतु वह अति-उत्साह एवं उतावली में थे देश को तेजी से आगे बढ़ाने में। इसके लिए विभिन्न विभागों को कठोर कदम उठाने के निर्देश दिए जाने लगे। परिवार नियोजन संजय गांधी का अहम मुद्दा था और उसे लेकर जोर-जबर्दस्ती तक होने लगी। अन्य अनेक कारण भी थे जिससे लोगों के मन में धीरे-धीरे आक्रोश पनपने लगा। उसी बीच छात्र आंदोलन भी चल पड़ा जिसकी अगुवाई जयप्रकाश नारायनजी ने की। तब इंदिराजी ने असंवैधानिक तरीके से आपात्काल घोषित कर दिया। लोगों की धर-पकड़ शुरू हुई। कुछ विरोधियों को जेल में डाला गया तो कुछ भूमिगत हो गए। 1977 में चुनाव होने थे। संजय चाहते थे कि आपात्काल को लंबा खींचा जाए, लेकिन इंदिरा जी ने चुनाव घोषित कर ही दिए (छःठी लोकसभा)।

ये उस काल का विस्तृत एवं सटीक विवरण नहीं है, किंतु इससे वस्तुस्थिति का मोटा-माटी अंदाजा लगाया जा सकता है। मैं तब लगभग 30 वर्ष का था।

उस समय जनता काफी हद तक इंदिराजी की विरुद्ध हो गई। प्रायः सभी राजनीतिक दल इंदिरा जी के विरुद्ध लामबंद हो गये। उन सभी ने मिलकर कांग्रेस के विरुद्ध “जनता पार्टी” के नाम से नया दल बना डाला और उम्मीद के अनुरूप चुनाव में उन्होंने कांग्रेस को करीब डेड़ सौ सीटों पर समेट दिया। (जनता दल 298 सीट, कांग्रेस 153 सीट)

दुर्भाग्य से अपने आंतरिक विरोधों के कारण “जनता” सरकार मुश्किल से दो-ढाई साल चली और 1979-80 में फिर चुनाव हुए (सातवीं लोकसभा) जिसमें इन्दिराजी 353 सीटों की “बंपर” जीत के साथ लौटीं।

इस बात पर ध्यान दें कि कांग्रेस/इंदिराजी के विरुद्ध बनी “जनता” पार्टी अधिक दिनों तक टिकी नहीं और अपने घटकों में बिखर गई। क्यों? क्योंकि इस पार्टी का गठन परस्पर बेमेल राजनैतिक विचाराधारा वाले घटक दलों ने भेदभाव मिटाकर किया था महज कांग्रेस को हटाने के लिए। उदाहरणार्थ उसमें बामपंथी दल भी थे और भाजपा (तब जनसंघ) जैसी दक्षिणपंथी भी। लेकिन आपसी विरोध जल्दी ही सतह पर आ गया और पार्टी घटकों में बंट गई।

आज 2019 के चुनावों में फिर से कुछ-कुछ वैसी ही राजनैतिक स्थिति देखने को मिल रही है। तब (1977 में) मुद्दा था “इंदिरा हटाओ“, और आज मुद्दा है “मोदी हटाओ”। लेकिन तब और अब में महत्वपूर्ण अंतर हैं –

∎ (1) 1977 में अधिकांश दल महागठबंधन के बदले एक पार्टी के तौर पर इंदिराजी के विरुद्ध खड़े हो गए। पार्टी बनाने का मतलब पूर्ववर्ती अस्तित्व भुला देना। इस बार क्षेत्रीय स्तर पर छोटे-बड़े गठवंधन बने हैं। महागठबंधन अभी नहीं बना है। बनेगा या नहीं; यदि बना तो उसका स्वरूप क्या होगा यह चुनाव-परिणाम पर निर्भर करेगा। गठबंधन का मतलब है स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखकर एक साथ शासन चलाने की मंशा।

∎ (2) उस दौर में इंदिराजी का विरोध नेताओं तक ही सीमित नहीं था। जनता भी आक्रोषित थी और जनांदोलन के रूप में उसका विरोध व्यक्त हुआ था। इस बार विरोध नेताओं तक ही सीमित है। जनता शान्त है और वह क्या सोचती है यह स्पष्ट नहीं। उनकी सोच चुनाव-परिणामों से ही पता चलेगा।

∎ (3) तब देश में आपात्काल वस्तुतः घोषित हुआ था, जिससे पीड़ित होकर जनता इंदिराजी के विरुद्ध हो गई थी। इस बार आपात्काल नहीं है भले ही विपक्षी अघोषित आपात्काल की बात करते हैं। जनता उनकी बात से सहमत है ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिखता।

∎ (4) 1970 के दशक के उस काल में राजनीति में इस कदर सिद्धांतहीनता नहीं थी। लेकिन आज के दौर में नेता रातोंरात एक विचारधारा त्यागकर एकदम विपरीत विचारधारा स्वीकारते हुए दलों के बीच कूद-फांद मचा रहे हैं।

∎ (5) वैचारिक मतभेद राजनीति में सदा से रहे हैं, किंतु राजनेताओं में एक दूसरे के प्रति सम्मान का अभाव उस दौर में नहीं था। उनकी भाषा काफी हद तक शिष्ट और संयत रहती थी। लेकिन मैं देख रहा हूं कि इस चुनाव में भाषायी मर्यादा जैसे लुप्त हो चुकी है। समाचार माध्यमों से ऐसी जानकारी मिल रही हैं और निर्वाचन आयोग की कुछएक के अमर्यादित व्यवहार के विरुद्ध कदम भी उठा चुका है।

∎ (6) मुझे जितना याद आता है जातीयता और धार्मिकता के आधार पर खुलकर वोट मांगने का चलन 1970 के दशक तक नहीं था। अब तो अनेक नेता अलग-अलग जातीय समुदायों के प्रतिनिधि के तौर पर खुलकर राजनीति कर रहे हैं।

1977 के इंदिरा-विरोध में हुए और इस बार 2019 के मोदी-विरोध में हो रहे ध्रुवीकरण में उक्त प्रकार के अंतर मेरे देखने में आ रहे हैं।

मुझे लगता है कि जब 1977 के गंभीर राजनीतिक परिदृश्य में चुनाव के बाद टिकाऊ सरकार नहीं बन सकी तो इस बार क्या उम्मीद की जा सकती है। अभी तो राष्ट्रीय स्तर पर ही महागठबंधन नहीं बन सका है| महत्वाकांक्षाओं के ग्रस्त क्षेत्रीय क्षत्रप क्या किसी एक का नेतृत्व स्वीकार कर पाएंगे? मोदी के विरुद्ध बहुमत हासिल हो जाए तो भी सरकार गठन की पेचदगी सुलझा पाएगा कोई?

मुझे अपने फल-विक्रेता की बात याद आती है। उसने बारचीत में कहा था, “सा’ब हम मोदी के बदले विपक्ष को वोट तो दे दें, लेकिन ये तो बताइए कि ये सरकार बना भी पाएंगे क्या?” – योगेन्द्र जोशी

क्या नेरेन्द्र मोदी फिर से प्रधान मंत्री बनेंगे? लगता तो ऐसा ही है!  

आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट कर दूं —

मैं वाराणसी का वरिष्ठ (उम्र 70+) मतदाता हूं। मतदान छोड़ता नहीं किंतु किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करता, मोदीजी के पक्ष में भी नहीं। दरअसल मैं नोटा का प्रबल पक्षधर हूं और उसकी वकालत करता हूं। मैंने एक वयस्क नागरिक के रूप में 1969 और उसके बाद के चुनाव देखे हैं और पिछले दो-तीन दशकों से लोकतांत्रिक प्रणाली में गंभीर और तेजी से गिरावट महसूस करने लगा हूं। फलतः लोकतंत्र के मौजूदा मॉडल से मेरा मोहभंग हो चुका है। किस-किस तरीके की गिरावट देख रहा हूं इसका विवरण मैं यहां नहीं दे सकता, क्योंकि इस आलेख का विषय वह नहीं है।

मैंने पिछले कुछ दिनों जिज्ञासावश यह जानने-समझने की कोशिश की कि मोदीजी के सत्ता में लौटने की संभावना कितनी है। मेरा अनुमान या आकलन अलग-अलग मौकों तथा स्थानों पर आम लोगों से हुई बातों पर आधारित है। मेरी बात बमुश्किल 10-15 लोगों से हुई होगी, जो सांख्यिकीय (statistical) दृष्टि से अपर्याप्त है। फिर भी मुझे जो लगा वह कुछ हद तक माने तो रखता ही है।

मैं अपने अनुभवों को कालक्रमबद्ध (chronological order) तरीके से पेश कर रहा हूं —

(1)

दो-ढाई महीने पहले मेरे पड़ोस में एक सज्जन ने अपने नये मकान में प्रवेश किया। उस अवसर पर उन्होंने गृह-प्रवेश के पारंपरिक पूजा-सह-भोज का आयोजन किया था, जिसमें मुझे भी आमंत्रित किया गया था। उस मौके पर उनके परिवारी जनों के अलावा गांव से भी कुछ लोग आये हुए थे। उनके यहां बैठे हुए कुछ लोगों के बीच राजनीति और आगामी लोकसभा चुनावों की चर्चा हो रही थी। मैं उन लोगों की बातों को ध्यान से सुन रहा था। सभी एक बात पर सहमत दिखे, वह यह कि लोग (यानी विपक्ष के लोग) बिलावजह मोदीजी के पीछे पड़े हैं। मोदीजी को चुनाव जीतना चाहिए। मैंने सुनिश्चित करने के लिए किसी एक से पूछ लिया, “लगता है आप लोग मोदीजी को वोट देने की सोच रहे हैं। आपके गांव में क्या मोदीजी के पक्ष में माहौल है?”

उत्तर था, “हां लगभग सभी इसी मत के हैं”। उन लोगों से बातें तो काफी विस्तार से हुईं किंतु उतना सब मुझे न याद है और न उतना सब प्रस्तुत करने की जरूरत है।

(2)

विगत जनवरी के अंतिम सप्ताह में मेरी पत्नी एवं मैं लखनऊ गए थे एक वैवाहिक समारोह में सम्मिलित होने के लिए। पहले दिन वैवाहिक कार्यक्रम-स्थल पर रेलवे स्टेशन से जाने और दूसरे दिन वापस स्टेशन आने के लिए हमने ऊबर (Uber) टैक्सी-सेवा का प्रयोग किया था। रास्ते की एकरसता से बचने के लिए दोनों बार हमने संबंधित टैक्सी-चालक से बातचीत की और स्वाभाविक तौर पर प्रासंगिक विषय – चुनावों – की चर्चा की। चर्चा मोदीजी के दुबारा प्रधानमंत्री बनने परकेंद्रित थी। वे दोनों मोदीजी के प्रबल समर्थक निकले। वे कह रहे थे “मोदीजी जो कर रहे ठीक कर रहे हैं। उनकी योजनाओं का लाभ तुरंत लोगों को मिले यह हो नहीं सकता, कुछ समय लगेगा ही। लोगों को धैर्य रखना चाहिए।”

वे मोदीजी की ईमानदारी एवं नीयत के क़ायल थे। इस बात पर दोनों का ही जोर था कि मोदीजी अपने घर-परिवार के लिए तो वह सब नहीं कर रहे हैं जो कि आजकल सभी दलों के मुखिया कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह रही कि रात्रि द्वीतीय प्रहर में जब हम वाराणसी वापस पहुंचे और ऑटो-रिक्शा से अपने घर वापस आने लगे तो ऑटो-चालक की मोदीजी के बारे में कमोबेश वही राय थी जो लखनऊ के टैक्सी चालकों की थी। उनके विचार रखने और शब्दों के चयन में फर्क स्वाभाविक था। कुल मिलाकर हमें लगा कि वे मोदीजी की कार्यप्रणाली ठीक बता रहे थे और उनकी सत्ता में वापसी के प्रति आश्वस्त थे।

(3)

(वाराणसी) उक्त घटना के दो-तीन रोज के बाद मैं अपने दर्जी के पास से कपड़े लेने गया। दर्जी महोदय उस समय खास व्यस्त नहीं थे और कोई अन्य ग्राहक उस समय वहां नहीं था। ऐसे मौकों पर मैं दुकानदार से थोड़ी-बहुत गपशप भी कर लेता हूं। उसी रौ में मैंने दर्जी से चुनाव की बात छेड़ी और पूछा, “इस बार किसको जिता रहे हैं वाराणसी से?” (मोदीजी का निर्वाचन क्षेत्र था 2014 में; और इस बार भी रहेगा ऐसी उम्मीद है।)

जवाब सीधा एवं सपाट था, “मोदीजी जीतेंगे और फिर से प्रधान मंत्री बनेंगे।”

“लेकिन मोदीजी पर विपक्ष बुरी तरह हमलावर है जो कहता है कि नोटबंदी तथा जीएसटी (GST) ने व्यापार चौपट कर दिया और श्रमिक बेरोजगार हो गए, इत्यादि-इत्यादि।” मैंने विपक्ष का तर्क सामने रखा।

“देखिए आरोप लगाना तो विपक्ष की मजबूरी है। लेकिन नोटबंदी एवं जीएसटी से कुछ समय परेशानी अवश्य हुई होगी। परंतु यह भी समझिए कि दीर्घकालिक देशहित के लिए कष्ट तो सहना ही पड़ेगा। … सबसे बड़ी बात यह है कि मोदीजी यह सब अपने परिवार के लिए, भाई-बंधुओं के लिए नहीं कर रहे न? उनके परिवारीजन अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं और मोदीजी से किसी प्रकार का लाभ लेने की नहीं सोचते हैं। ये राजनेता तो सबसे पहले अपना घर भरते हैं। देखिए कुछ तो विधानसभा, लोकसभा में सबसे पहले अपने भाई-बहनों, चाचा-भतीजों को ही पहुंचाते हैं। ठीक है क्या? मोदी ऐसा तो नहीं करते न?”

दर्जी महोदय राजनीतिक तौर पर काफी सजग थे और वस्तुस्थिति का ठीक-ठीक आकलन करने की कोशिश कर रहे थे।

(4)

फ़रवरी माह के अंतिम और मार्च के प्रथम सप्ताह हम राजस्थान भ्रमण पर निकले थे। हम दोनों को मिलाकर कुल छ: जने थे, सब के सब वरिष्ठ नागरिक। चुनाव की बात करना हम वहां भी नहीं भूले। जैसलमेर में मेरी पत्नी और मैं मिठाई की एक दुकान में गये। जैसा मुझे याद है दुकान के बोर्ड पर लिखा था “पालीवाल मिष्ठान्न”. खरीद-फरोख्त के साथ थोड़ी-बहुत बात भी हो गई। “इस बार केन्द्र में किसकी सरकार बनवा रहे हैं?” हमने सवाल पूछा।

दुकान के मालिक का त्वरित उत्तर था, “मोदीजी वापस आएंगे। और भला है ही कौन? ये लोग मिलकर सरकार चला पाएंगे?”

“लगता है आप मोदी के प्रबल समर्थक हैं।” हमने टिप्पणी की।

उन सज्जन का सीधा उत्तर था “हम तो भाजपा वाले हैं, वोट उसी को देंगे।”

बातचीत के बाद हम आगे बढ़ गए। एक फल वाले के ठेले पर हम रुक गए कुछ फल खरीदने के लिए। फल वाले से यों ही पूछ लिया, “कुछ ही दिनों में देश में चुनाव होने हैं। चुनाव में दिलचस्पी लेते हैं कि नहीं?”

फल वाले ने कहा, “दिलचस्पी क्यों नहीं लेंगे भला? वोट भी डालेंगे; देश के भविष्य से जुड़ा है चुनाव तो।”

“आप लोगों ने तो पिछले प्रादेशिक चुनावों में कांग्रेस के पक्ष में वोट डाला था। इस बार भी कांग्रेस के प्रत्याशी को वोट देंगे न?” हमने टिप्पणी की।

“तब वसुंधराजी से नाखुशी थी प्रदेशवासियों को, किंतु मोदीजी से नहीं। इस बार उन्हीं के पक्ष में वोट पड़ेंगे।

(5)

राजस्थान पर्यटन के दौरान हम जोधपुर भी गये थे। वहां मैं इस विषय पर अधिक लोगों से बातचीत नहीं कर पाया। परंतु एक व्यक्ति, जो कपड़ों की सिलाई की दुकान चला रहे थे, और उनके साथी से बातें अवश्य हुईं। उनकी दुकान स्टेशन के सामने की सड़क पर 300-400 मीटर की दूरी पर थी। वहां मुझे ऐसे सज्जन मिले जो मोदीजी के घोर विरोधी थे। नोटबंदी एवं जीएसटी (GST) को लेकर वे गुस्से में थे और कह रहे थे कि मोदी ने गरीबों की रोजी-रोटी छीन दी। ऐसा इलजाम विपक्ष लगाता ही रहा है।

उन सज्जन ने मुझसे मेरा परिचय जानना चाहा । बदले में मैंने भी उनसे उनका परिचय ले लिया। संयोग की रही कि उनका जातिनाम भी मोदी ही था। मेरी आम धारणा यह रही है कि अधिकतर भारतीय अपनी जाति के लोगों के प्रति कोमल भाव रखते हैं। लेकिन यहां पर उल्टा ही हो रहा था।

जैसलमेर एवं जोधपुर में हम लोगों को मरुभूमि के रेतीले टीलों (sand dunes) पर जीप से घूमने का मौका मिला (वहां का प्रमुख आकर्षण)। दोनों ही बार हमें मोदी-विरोध सुनने को मिला। उन जीप-चालकों से अधिक बातें करने पर पता चला कि वे मुस्लिम समुदाय से हैं। हमने महसूस किया कि धार्मिक पृष्ठ्भूमि मोदीजी के संदर्भ में अहमियत रखती है। ऐसा अनुभव अन्यत्र भी हमें हुआ।

(6)

हम लोग जयपुर भी घूमने गए थे। वहां मुझे चुनावों के बारे में किसी से बातें करने का मौका नहीं मिला। जयपुर के दर्शनीय स्थलों को दिखाने वाले टैक्सी-चालक से अवश्य बातें हुईं। उसने बताया कि मिर्जापुर (या सोनभद्र, याद नहीं) में उसकी ससुराल है और वाराणसी से खास लगाव रखता है। उसने मोदीजी के पक्ष में ही अपनी राय रखी। संयोग से वह हिन्दू निकला।

(7)

(वापस वाराणसी) एक दिन मैं वाराणसी में अपने घर से बमुश्किल तीन-चार सौ मीटर दूर  प्रातः से दोपहर तक लगने वाली सट्टी में फल-सब्जी खरीदने गया। (सट्टी = थोक एवं फुटकर फलों एवं सब्जियों का बाजार।) मैं वर्षों से हफ़्ते में दो-तीन बार इस कार्य के लिए जाया करता हूं। कुछ फुटकर विक्रेताओं से मेरा अच्छा-खासा परिचय है और मैं उनसे आम ग्राहकों की तरह पेश नहीं आता, बल्कि उनसे थोड़ी-बहुत गुफ्तगू भी कर लेता हूं। उन्हीं में से एक से मैंने पूछ लिया, “कहिए, आपके ’मोदीजी’ के क्या हाल हैं? इस बार भी सरकार बना पाएंगे क्या?”

प्रत्युत्तर में उसने मुझसे ही सवाल कर दिया, ” आप ही बताइए किसको वोट दें? विकल्प कहां है? विपक्ष के नेता मिलकर सरकार बना पाएंगे क्या? बना भी लें तो चला पाएंगे? कितनी टिकाऊ होगी उनकी सरकार? सबके आपने-अपने स्वार्थ हैं।”

सब्जी विक्रेता की बातों में स्पष्ट संकेत था। मोदीजी को वोट न दें तो किसे दें?

निष्कर्ष –

अब चुनाव घोषित हो चुके हैं, दलों की घोषणाएं मतदाताओं को सुनने को मिल रही हैं। कांग्रेस गरीबों को 72 हजार रुपये सालाना देने का वादा कर रही है। ऐसे वादे मरदाताओं के विचार बदल सकते हैं। परिस्थितियां बदलने पर चुनाव के परिणाम भी बदलेंगे ही।

फिर भी मुझे लगता है कि कांग्रेस पार्टी पर्याप्त सीटें नहीं जीत पाएगी। कोई चमत्कार हो जाए तो बात अलग है। अन्य दलों का देशव्यापी जनाधार है नहीं। प्रायः सभी क्षेत्रीय (या एक प्रकार से क्षेत्रीय) दल हैं। उनमें परस्पर स्थायी सहमति एवं एकता दिखाई नहीं देती। भविष्य में सहमति बन पाएगी क्या? मुझे लगता है मोदीजी सत्ता में लौटेंगे। हो सकता है रा.लो.ग. (NDA) को बहुमत न मिले, फिर भी जोड़तोड़ करके सरकार बना ली जाएगी।

अवश्य ही मोदीजी की सत्ता में वापसी को कुछ लोग देश का दुर्भाग्य कहेंगे। – योगेन्द्र जोशी

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