(लोकतंत्र की व्यथाकथा, एक:) अब वोट नहीं डालता मैं

एक समय था जब मैं लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में सोत्साह मतदान करता था । मुझे ठीक-ठीक स्मरण नहीं कि मेरा नाम मतदाता सूची में कब सम्मिलित हुआ होगा । मेरा अनुमान है ढाई-तीन दशक पूर्व से मैं मतदान करता आया हूं । बर्षों पहले मतदान प्रक्रिया भरोसेमंद नहीं थी । मैं पाता था कि सूची में अपना नाम किसी वर्ष रहता था तो किसी वर्ष उससे गायब मिलता था । इससे बड़ी समस्या यह होती थी कि मतदान केंद्र पहुंचने पर पता चलता था कि मेरे नाम पर तो कोई अन्य व्यक्ति मतदान कर चुका है । उन दिनों ऐसा होना आम बात थी । अतः सावधानी बरतते हुए आरंभ में मतदान कर लेना ही सुरक्षित होता था ।

बाद के वर्षों में निर्वाचन आयोग में कई सुधार और परिवर्तन हुए, जिससे पूरी प्रक्रिया काफी हद तक साफ-सुथरी तथा भरोसेमंद होने लगी । परिवर्तन एवं सुधार का सिलसिला मेरे आकलन में निर्वाचन आयुक्त शेषन के कार्यकाल में सार्थक स्तर पर आरंभ हुआ और कमोबेश अभी चल रहा है । मेरे मत में हाल के वर्षों में मतदाता के लिए परिचय-पत्र या उसके तुल्य मान्य पहचान-पत्र की अनिवार्यता से और सुधार हुआ है तथा फर्जी मतदान के मामले काफी घट गये हैं । दूसरे के नाम पर मतदान के मामलों में अब तक पर्याप्त कमी आ चुकी होगी ऐसा मेरा सोचना है । ‘बूथ-कैप्चरिंग’ भी कम हो गयी है ।
मैं किसी भी राजनीतिक दल का पक्षधर नहीं रहा हूं । इस समय मैं इतना ही दावा कर सकता हूं कि अलग-अलग मौकों पर मैंने भिन्न-भिन्न दलों के प्रत्याशियों को मत दिया होगा । एक समय था जब मेरा झुकाव कुछ हद तक बीजेपी यानी भारतीय जनता पार्टी की ओर था । तब उस दल के नेता ‘पार्टी विद् अ डिफरंस’ का नारा गाते रहते थे । मैं समझता हूं कि उस काल में कई लोग मेरी ही भांति रहे होंगे जो उनके इस नारे से भ्रमित हुए होंगे । एक दो बार के चुनावों बाद मेरा उक्त दल से मोहभंग हो गया । मैंने कांग्रेस के प्रत्याशियों को भी कभी न कभी मत दिया होगा । ठीक-ठीक याद नहीं, फिर भी सोचता हूं कि सपा अर्थात् समाजवादी पार्टी के हक में भी कभी न कभी मत दिया ही होगा । इतना अवश्य है कि बसपा यानी बहुजन समाजवादी पार्टी मेरे लिए ‘अछूत’ बनी रही है और ऐसा अकारण नहीं है । ऐसा क्यों इस बारे में अभी नहीं पर बाद में अवश्य कुछ लिखूंगा ।

जैसे-जैसे अपने देश की जनतांत्रिक व्यवस्था का मेरा अनुभव बढ़ता गया, मुझे विश्वास होने लगा कि आप किसी भी दल के प्रति विश्वास जतायें कोई खास अंतर नहीं पड़ता । मैं नेहरु युग से भी परिचित रहा हूं, यद्यपि तब मतदाता सूची में मैं शामिल नहीं था । मुझे उन दिनों की राजनीतिक स्थिति का कुछ-कुछ अंदाजा है । इंदिरा युग तक मैं वयस्क हो चुका था । मैं स्व. लालबहादुर शास्त्री और गुलजारीलाल नंदा की कार्यशैली को आज भी पूरी तरह नहीं भूला हूं । उन दिनों से आज तक के अपने देश के राजनैतिक सफर पर जब मैं दृष्टि डालता हूं तो यही पाता हूं कि राजनीति में लगातार गिरावट आती गयी है और यह गिरावट रुकने वाली नहीं है । राजनेता स्वच्छंद, निरंकुश और अनुशासनविहीन होते जा रहे हैं । पूरे प्रशासनिक तंत्र को वे अपने हितों के अनुरूप ढालते जा रहे हैं । राजनीतिक दलों के न कोई सिद्धांत हैं और न ही उनकी कोई विश्वसनीयता । इन सब बातों के कारण मेरा मौजूदा चुनाव से ही मोहभंग हो चुका है ।

पिछले कुछ समय से मैंने चुनावों के प्रति नकारात्मक रवैया अख्तियार कर लिया है । हालिया समय में जब तक कागज के मतपत्रों का चलन था, मैंने जानबूझ कर अमान्य मत डालना शुरू कर दिया था, ताकि मेरे नाम पर कोई अन्य मतदान न कर सके और स्वयं मेरा नकारात्मक मत (negative vote) रहे । दुर्भाग्य से हमारी चुनावी प्रणाली में नकारात्मक मत की व्यवस्था नहीं है । फलतः अमान्य मत का सहारा ही मेरे सामने एक विकल्प रहा । अब जब से ‘इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन’ का चलन हो गया है, मेरे लिए स्थिति अधिक कठिन हो गयी है । अब एक बार आप मशीन पर पहुंचे और मतदान अधिकारी ने अपने हिस्से वाला उसका बटन दबाकर आपके वोट की प्रतीक्षा आरंभ कर दी, तो आप को स्वयं कोई न कोई बटन दबाना ही पड़ता है । आपको शेष प्रक्रिया संपन्न करनी ही पड़ती है, जैसा कि मुझे हर अवसर पर बताया गया । निर्वाचन आयोग स्वयं यह अनुभव करता है कि ‘किसी को वोट नहीं’ का विकल्प भी मतपत्र या मतदान मशीन, जो भी इंतजामात हों, पर उपलब्ध होना चाहिए । अभी उस विकल्प के आसार मुझे नहीं दीखते हैं । तब तक के लिए मैं यही कर सकता हूं कि मत डालना ही बंद कर दूं और दुआ करूं कि कोई अन्य मेरे नाम पर मत डालने न पहुंचे । मौजूदा व्यवस्था के पक्षधरों से क्षमा मांगते हुए मैं फिलहाल यही कर रहा हूं । अपने इस रवैये के कारणों के बारे में मैं आगामी आलेखों में कुछ न कुछ लिखूंगा । – योगेन्द्र