अपने प्रधानमंत्री – भ्रष्ट हैं, ईमानदार हैं, भ्रष्ट हैं, ईमानदार हैं, …! सच क्या है?

देशव्यापी भ्रष्टाचार

पिछले कुछ समय से सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की चर्चा जोरों पर है । देश की राजनीति पर भ्रष्टाचार के काले दाग पूरी चमक के साथ लोगों को नजर आ रहे हैं । कोई भी राजनैतिक दल स्वयं को साफ और दूसरों को दागदार कहने में नहीं हिचक रहा है । इस माने में पूरी बेशर्मी छाई हुई है देश भर में । आप किसी से पूछिए कि आपकी पार्टी में भ्रष्ट नेता भरे हैं तो वह सिरे से नकार देगा, और लगे हाथ दूसरे दलों में बेईमानों का चिट्ठा खोलने बैठ जाएगा । मान लें कि आप राह चलते किसी से पूछते हैं, “जनाब, दशाश्वमेध घाट के लिए किधर से रास्ता जाता है?” (दशाश्वमेध घाट वाराणसी नगरी की उत्तरवाहिनी गंगा – उल्टी, दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवाहित – के तट पर अवस्थित है ।) और आपको जवाब मिलता है, “कैंट रेलवे स्टेशन यहां से करीब 7 किलोमीटर है ।” आपको कैसा लगेगा? आप माथा पकड़कर चलते बनेंगे । कुछ ऐसा ही है रवैया आपने राजनेताओं का । आप उनके भ्रष्टाचार की बात पूछेंगे और वे किसी और की बात शुरू कर देंगे । सवाल का संक्षिप्त और सटीक (टु द पॉइंट) उत्तर अपने राजनेताओं से मिलने का नहीं ।

मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं कि इस देश में भ्रष्टाचार है भी कहीं? क्या ये कोरी कल्पना तो नहीं है । बचपन में संध्याकाल के बाद जब अपने गांव में अंधेरा छा जाता था तो मेरी मां कहती थीं कि बाहर मत जाना बाघ-भालू खा जाएंगे या भूतप्रेत उठा ले जाएंगे । उस काल में मां की बातें सच लगती थीं । घर के एक कोने में बिस्तर पर दुबक कर बैठ जाते थे । बाद के वर्षों में, जब उम्र के साथ अक्ल ने भी धीमी दौड़ लगाई, तब समझ में आया कि वे डराती भर थीं । मुझे लगता है कि बस यही बात आजकल के बहुचर्चित भ्रष्टाचार के बारे में सही है । पता नहीं क्यों राजनैतिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की बातें जोरशोर से उठाई जा रही हैं, जब कि आजतक दो-चार अपवादों को छोड़ कहीं कोई राजनेता अपराधी सिद्ध नहीं हो पाया । कहीं कोई साक्ष्य मिलें तब तो ! जब भी कोई तथाकथित भ्रष्ट राजनेता कुछ दिनों या हफ्तों की पिकनिक पर तिहाड़ जेल भेजा जाता है, तब वह पूरी ताकत से चीखता है कि वह निरपराध है और उसे किसी साजिश के तहत फंसाया जा रहा है । मैं यही देखता आ रहा हूं कि उसकी बात अंत में सही निकलती है । वह पूरे स्वास्थ्यलाभ के साथ तिहाड़ से लौटता है ।

मैं सोचता हूं कि जिस देश में यत्र तत्र सर्वत्र चमत्कार ही चमत्कार देखने को मिलते हों वहां भ्रष्टाचार की घटनाएं भी कहीं दैवी चमत्कार तो नहीं होती हैं । घटना तो होती है, लेकिन कोई मनुष्य उसे अंजाम नहीं देता है । जिस देश में छुन्नूलाल जैसा एकदम लापरवाह आदमी, जो किसी लायक न हो, श्री श्री निर्मल बाबा (जिनकी शोहरत टीवी चैनलों ने तीनों लोकों में फैला दी है) की कृपा से मुंहमांगा कुछ भी पा जाए, उस देश में असंभव-सा लगने वाला कुछ भी घटित हो सकता है । किसी की हत्या हो जाए पर कोई हत्यारा न हो, किसी युवती के साथ दुष्कर्म हो पर कोई दुष्कर्म करने वाला न हो, किसी के घर में करोड़ों की धनराशि जमा हो जाए पर उसे पता तक न चले, या ऐसी अन्य घटनाएं घट जाएं तो आश्चर्य की क्या बात है? ऐसे चमत्कार तो हो ही सकते हैं । तब किसी को जिम्मेदार कैसे ठहरा सकते हैं?

मौजूदा प्रधानमंत्री कितने ईमानदार?

अब मैं अपने सम्मानित प्रधानमंत्री की बात पर आता हूं । उनके बारे में अपनी राय मैंने अन्यत्र व्यक्त की है । दुनिया क्या कहती है, या समाचार माध्यमों के अनुसार दुनिया क्या सोचती है, इसे लेकर कुछ कहना है मुझे भी । उन्हें आज तक सर्वाधिक ईमानदार राजनेता कहा जाता रहा है । क्रांग्रेस दल में कोई बेईमान हो या न हो डा. मनमोहन सिंह तो बेईमान हो ही नहीं सकते हैं ये राग क्रांग्रेस के विरोधी जन भी अभी तक अलापते रहे हैं । यह भी कहा जाता है कि उनकी साख विदेशों में बहुत अच्छी है । लेकिन अब एक-एक कर कुछ लोग उनकी तरफ अंगुली उठाने लगे हैं । वे लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? कल तक तो वे भी प्रशंसक थे पर अब क्या हो गया? माननीय अण्णाजी भी उन्हें ईमानदार कहते आये हैं, लेकिन अब उन्हें भी शंका हो रही है । यह सब मुझे स्वयं में चमत्कार नजर आता है । चमत्कारों के देश में कब कौन कहां भ्रमित हो जाए यह कह पाना कठिन है ।

मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि किसकी बात सच है किसकी झूठ यह पता लगाना मरणशील मनुष्य के लिए असंभव है । पूरी स्थिति मरुभूमि में भटक रहे यात्रिक की सी है जिसे दूर कहीं जलाशय के रूप में मृग-मरीचिका के दर्शन होते हैं, लेकिन जिसके पास वह सामर्थ्य नहीं रह गयी हो कि वह उस स्थल पर जाकर स्वयं देख सके कि वह भ्रम है या यथार्थ । भ्रष्टाचार के मामले में भी हम सब भ्रम में जी रहे हैं । आप ही बताएं कि सीबीआइ जैसी संस्था कभी कहती है सच क्या है यह पता चल गया; फिर कहती है सच तो कुछ और ही है (याद करें हेमराज-आरुषी कांड)। कभी वह सच की तलाश में बर्षों इस धरती पर भटकती है और सच है कि दूर, और दूर, होता जाता है (बोफार्स का मामला याद है?)। सत्य का ज्ञान बड़े-बड़े महात्माओं तक को नहीं हो सका है, तब हम जैसे नाचीजों की बात ही क्या है ।

हमारे प्रधानमंत्री जी सदा यही कहते रहे हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता है कि कहीं कोई बेईमानी भी कर रहा है । वे तो गांधीजी के तीन बंदरों की नीति में आस्था रखते हैं – न बुरा देखो, न बुरा सुनो और न हि बुरा कहो । इतना ही नहीं वे चमत्कारों में आस्था रखते होंगे ऐसा मैं मानता हूं । शासन में भ्रष्टाचार है यह तो वे स्वीकारते हैं, लेकिन साथ में यह भी मानते हैं कोई भ्रष्ट नहीं है । उनकी नजर में भ्रष्टाचार दैवी आपदा है ।

राजनैतिक संन्यास की बात

अब मीडिया में यह खबर भी आ गई है कि प्रधानमंत्री जी ने टीम अन्ना के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि यदि उन पर आरोप सिद्ध हो गए तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे । उम्र को देखते हुए संन्यास तो उन्हें वैसे भी ले लेना चाहिए । दुबारा प्रधानमंत्री बनने के उनके आसार अब मुझे तो दिखते नहीं । यदि 2014 में यूपीए सत्ता में न लौट पाई तो वे प्रधानमंत्री कैसे बनेंगे? यदि संयोग से यूपीए फिर जीतकर आ गई तो अब के बारी राहुल गांधी की होगी । दोनों ही स्थितियों में कुर्सी मिलने से रही । चुनाव वे लड़ेंगे नहीं तो संन्यास ही बचा रहेगा । वैसे भी कांग्रेस के भोंपू श्री दिग्विजय सिंह चाहते हैं कि उम्रदराज लोग अब रिटायर हो जाएं ।

जहां तक उन पर लगे आरोपों का सवाल है उनकी जांच होगी भी? जांच कौन करेगा? सभी जांच एजेंसियां तो सरकार के अधीन होती हैं । सीबीआइ के हाल सभी जानते हैं । जब जांच का काम सालों-साल चलता रहे और आरोप झूठ या सच सिद्ध न हो पाएं तब आरोपी साफसुथरा होने का दावा करता रहेगा ।

“न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी ।”

समस्या इस बात की भी है कि बेईमानी की कोई स्पष्ट परिभाषा कहीं नहीं मिलती है । आप अगर घूस नहीं लेते या इसी प्रकार का कोई अवैधानिक लाभ नहीं उठाते, लेकिन उन दायित्वों का निर्वाह नहीं करते जिसे आपने स्वीकारी हैं तो आप ईमानदार हैं या नहीं? देश के जननेताओं का जवाब मौके की नजाकत पर निर्भर करता है । अपने उत्तर प्रदेश (उल्टा प्रदेश?) में पूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी और अपने ‘हीरो’ की मूर्तियां पार्कों में करोड़ों रुपये में लगवाईं । मामला कोर्ट में पहुंचा तो अदालत ने कहा जब कैबिनेट ने यही निर्णय लिया है तो इसे गलत कैसे कहें । जब पार्टी में सब ‘यस मिनिस्टर’ शैली में हां में हां मिलाने वाले ठुंसे पड़े हों, आंतरिक लोकतंत्र जैसी चीज न हो, तब विरोध करेगा कौन । निष्कर्ष: ‘निर्णय एकदम सही था’ । आंख मूंदकर जहां उल्टा-सीधा होने दिया जाए वहां किसे ईमानदार कहें?

मेरी समझ में नहीं आता है कि ‘हमारे प्रधानमंत्री ईमानदार हैं’ का राग सब अलाप रहे हैं । अन्य मंत्री बेईमान हैं क्या? यदि नहीं तो अकेले प्रधानमंत्री की ही इतनी तारीफ क्यों?

मैं सोच नहीं पा रहा हूं कि अपने प्रधानमंत्री को ईमानदार कहूं अथवा बेईमान । – योगेन्द्र जोशी

लोकतंत्र की व्यथाकथा, नौ – चुनाव बहिष्कार और जूता-फेंक विरोध

joota-chappalअपने देश में इस समय १५वीं लोकसभा के चुनाव हो रहे हैं । मुझे ये चुनाव अन्य वर्षों की तुलना में कई मानों में भिन्न नजर आ रहे हैं । पहली बात तो यह है कि इस बार मतदान प्रतिशत अपेक्षया कम हो रहा है । राजनेताओं की नजर में देश के बृहत्तर हिस्से में अनुभव की जा रही तीष्ण गर्मी इसका कारण है । किंतु चुनाव विश्लेषकों के मत में मतदान के प्रति लोगों में व्याप्त उदासीनता इसका कारण हैं । दूसरी बात यह है इस बार लोगों को अपने ‘अमूल्य वोट’ का प्रयोग अवश्य करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है । ‘वोट दो’ का संदेश इतने व्यापक स्तर पर मैंने कभी नहीं देखा था । समाचार माध्यमों पर इस उद्येश्य के विज्ञापन खूब दिखायी दे रहे हैं । गैरसरकारी गैरराजनैतिक संगठन तथा फिल्मी हस्तियां और स्वयं चुनाव आयोग इस बाबत लोगों से लगातार अपील कर रहा है । फिर भी वोट प्रतिशत ऊपर नहीं उठ पा रहा है । तीसरी अहम बात यह है कि इस बार चुनाव बहिष्कार की घटनाएं भी अधिक हो रही हैं । गांव के गांव ‘मतदान नहीं करेंगे’ का सफल निर्णय लिये बैठे हैं । दिलचस्प तो यह है कि राजनैतिक दृष्टि से देश के सबसे ‘शक्तिशाली’ परिवार के प्रत्याशी को भी लोकप्रियता के बावजूद अपने निर्वाचन क्षेत्र में ऐसा बहिष्कार झेलना पड़ा है । वे कहीं न कहीं मौजूदा व्यवस्था और उसके पीछे के राजनेताओं से ऊब चुके हैं । चौथी बात यह है कि राजनेताओं के खिन्न लोगों ने उनके प्रति अपने असंतोष तथा विरोध को ‘जूता-फेंक’ कार्यक्रमों के माध्यम से प्रदर्शित करना आरंभ कर दिया है ।

इस समय के चुनाव लोगों को विभिन्न समस्याओं के उत्पन्न अपने आक्रोश को व्यक्त करने का अवसर दे रहे हैं । यही वह वक्त है जब राजनेता लोगों के सामने सुबह से लेकर शाम तक खुद को पेश कर रहे होते हैं । इसी समय वे आपको खोजते हुए आप तक पहुंचते हैं । अन्यथा इन राजनेताओं के दर्शन कहां फिर हो सकते हैं; कहां वे आसानी से मिल सकते हैं भला ?

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लोकतंत्र की व्यथाकथा, आठ – नकारात्मक मत, कर्मियों को खबर नहीं

परसों, यानी १८ अप्रैल के दिन, मतदान का पहला चरण संपन्न हो गया । मेरे शहर के निर्वाचन क्षेत्र में भी उसी दिन मतदान हुआ । मैंने किसी को भी वोट न देने का निर्णय लिया था, लेकिन वोट देने के अधिकार के तहत में ‘किसी को भी मत नहीं’ का नकारात्मक विकल्प मुझे चाहिए था । करीब ११:३० बजे मैं अपने मतदान केंद्र पर पहुंचा । सोचा था कि कम से कम दो-चार जने तो लाइन में खड़े होंगे ही । किंतु संयोग से सन्नाटा छाया था । उस स्थल पर केवल दलों के कार्यकर्ता, सुरक्षा में लगे जवान और निर्वाचन-कर्मी ही थे । स्थानीय विद्यालय के मतदान हेतु नियत उस कमरे में पांच कर्मचारी बैठे थे । मैंने जाते ही उन्हें अपने निर्णय के बारे में बताया और उनसे निवेदन किया कि वे निर्वाचन आयोग के नियम २२ और ४९ब के तहत मेरा नाम दर्ज कर लें । लेकिन मुझे यह देख हैरानी हुई कि मतदान-कर्मियों को इस विकल्प के बारे में कुछ भी मालूम न था । मुझे यही कहा गया कि ‘मजिस्ट्रेट’ महोदय के आने पर ही इस विषय में कुछ पता चलेगा और तभी कुछ हो सकेगा । लेकिन वे कब आयेंगे यह बताने में असमर्थ थे । उस समय मतदाताओं की मौजूदगी न होने के कारण उन लोगों से ५-७ मिनट तक मेरी बात आराम से हो सकी । नतीजा खास नहीं रहा । बहरहाल उन्होंने मतदाता सूची में मेरे नाम के आगे मेरे आने की बात दर्ज कर ली और मुझे आश्वासन दिया कि कोई अन्य व्यक्ति मेरे नाम से वोट डालने का प्रयास नहीं करेगा । मैं पांच बजे से पहले एक बार फिर उस स्थल पर दुबारा आने की बात कहते हुए लौट आया ।

मैं एक बार फिर वहां पहुंचा, करीब ४:३० बजे । मतदान की समाप्ति का समय होने जा रहा था । इस बीच ‘मजिस्ट्रेट’ साहब आकर लौट चुके थे, अतः उनसे मेरी भेंट नहीं हो सकी । वहां मौजूद निर्वाचन-कर्मियों के अनुसार उन्हें भी उक्त विकल्प के बारे में मालूम नहीं था । उन्होंने यह चौंकाने वाली बात मुझे बताई कि संबंधित प्रशिक्षण के दौरान नकारात्मक मत के विकल्प की जानकारी किसी ने भी उन्हें नहीं दी । बाद में मुझे पता चला कि इस विकल्प कि जानकारी तो आम जनता को है ही नहीं । ‘अपना अमूल्य वोट अवश्य डालिए’ की बातें तो सर्वत्र सुनाई पड़ रही हैं, किंतु नकारात्मक वोट भी डाला जा सकता है और वह भी तो एक वोट है इस बात का जिक्र कोई नहीं कर रहा । खैर, उस समय निराश होकर मैं इस भरोसे के साथ लौट आया कि मेरे नाम पर फर्जी मतदान नहीं होगा । परंतु दी गयी स्थिति में अपने ‘किसी को भी मत नहीं’ वाले विकल्प के निष्प्रभावी हो जाने का खेद मुझे अवश्य हुआ ।

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लोकतंत्र की व्यथाकथा, सात – भला किसे चुनें प्रतिनिधि, और क्यों ?

आजकल अखबारों और इलेक्ट्रानिक संचार माध्यमों पर दिखाये जा रहे विज्ञापनों तथा परिचर्चाओं आदि के द्वारा देश के मतदाताओं से अनुरोध किया जा रहा है कि वे अवश्य वोट (vote) डालें और वह भी सोच-समझकर सही व्यक्ति को, साफ-सुथरी छवि वाले व्यक्ति को, ऐसे व्यक्ति को जो जनसेवा के प्रति समर्पित हो । उनसे कहा जा रहा है कि वे जाति, धर्म तथा क्षेत्रीयता के आधार पर मतदान न करें, बल्कि देश के व्यापक हितों को ध्याान में रखें । ऐसी ही ढेर सारी बातें । जब ये सब बातें कही जाती हैं तो मेरे मन में तमाम सवाल उठ खड़े होते हैं ।

मुझे यह नहीं समझ में आता है कि क्योंकर किसी वोटर को यह याद दिलाने की जरूरत पड़ती है कि वह मताधिकार का अवश्य प्रयोग करे । और यह क्यों कहना पड़ता है कि वह सोच-समझकर स्वच्छ छवि के जनसेवक को चुने ? लोकतंत्र के मूल में तो यह धारणा रहती है कि लोग अपनी जिम्मेदारी को समझते हैं और उसे निभाने की कोशिश करना जानते हैं । वयस्क व्यक्ति को इतनी सब समझ तो होगी ही इस विश्वास के साथ ही उसे मताधिकार मिलता है । अवयस्क को यह समझ नहीं होगी यह मान्यता प्रचलित है । मतदाता प्रत्याशियों के बारे में कम जानकारी रखे यह तो संभव है, किंतु कैसा व्यक्ति चुना जाये इसकी समझ ही न रखे यह कैसे हो सकता है ? और यदि मतदाता नासमझी बरतता है और सही तथा स्वतंत्र निर्णय की योग्यता ही नहीं रखता है तब उसे मताधिकार ही क्यों मिले ? आगे पढ़ने के लिए यहां >> क्लिक करें

(लोकतंत्र की व्यथाकथा, चारः) लोकतांत्रिक ढांचा, भावना नहीं

(१० फरवरी, २००९ की पोस्ट से आगे) लोकतांत्रिक शासन-पद्धति की शुरुआत निःसंदेह मतदान से होती है । हमारे देश में वयस्क लोगों को मतदान करने का अधिकार है और निर्वाचन आयोग यथासंभव ईमानदारी से प्रयास करता है कि हर व्यक्ति अपने मताधिकार का प्रयोग निर्भय होकर कर सके । यह भी सच है कि लोग मतदान करते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या वे इस अधिकार का सोच-समझ कर इस्तेमाल करते हैं । क्या उन्हें इस बात की ठीक-ठीक समझ है कि उन्हें किस व्यक्ति के पक्ष में मत डालना चाहिए और वह किस आधार पर ? मैं यही अनुभव करता हूं कि लोग वोट डालते अवश्य हैं, किंतु सही निर्णय नहीं लेते हैं । या यूं कहिये कि वे सही निर्णय ले नहीं सकते हैं । इस बात को मैं अधिक स्पष्ट करूंगा, परंतु उससे पहले यह सवाल कि क्या मतदान प्रक्रिया का निर्विघ्न संपन्न हो जाना और मतदाता का निर्वाचन स्थल से संतुष्ट होकर लौटना ही सफल लोकतंत्र की पहचान है । क्या उसके बाद पांच वर्ष तक जो शासन चले उसकी गुणवत्ता का कोई मतलब नहीं ? उस पूरे अंतराल में जनप्रतिनिधियों का आचरण क्या रहा, उन्होंने अपने निजी हितों के ऊपर आम आदमी के हितों को तवज्जू दी कि नहीं, शासकीय व्यवस्था ने समाज के किस वर्ग को सर्वाधिक महत्त्व दिया, लोकतंत्र के कर्णधारों ने कुशल, ईमानदार तथा संवेदनशील प्रशासन स्थापित किया या नहीं आदि ऐसे सवाल हैं जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती है । यदि इनके उत्तर संतोषप्रद न रहे हों अथवा नकारात्मक रहे हों तो हमें स्वीकार लेना चाहिए कि लोकतंत्र सफल नहीं हो पाया । तब क्षण भर ठहरकर पूरी पद्धति की समीक्षा करनी चाहिए और तदनुसार सुधार की पहल करनी चाहिए । कौन करेगा सुधार, कौन लायेगा परिवर्तन ? यदि असफलता दिखती है तो उसके लिए किसे जिम्मेदार कहा जायेगा इसका स्पष्ट उत्तर दिया जाना चाहिए । क्या यह सब कारगर तरीके से हो रहा है ?

निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी मतदान की प्रक्रिया के आरंभ से उसके समापन तक ही सीमित है । उसके आगे शेष कार्य तो राजनेताओं पर निर्भर करता है जिन्हें चुना जाता है और जिनको विधायिका का दायित्व निभाना होता है । जनता की प्रत्यक्ष भूमिका तो मतदान-प्रक्रिया के दौरान के कुछेक दिनों की होती है, उसके बाद सब कुछ राजनेताओं के हाथ में रहता है । जनता का तो फिर पांच वर्ष तक उन पर कोई नियंत्रण ही नहीं होता । नियंत्रण तो दूर की बात, उनसे सामान्य संवाद तक नहीं हो पाता । तब अगर वे जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य न करें, बल्कि अपनी मनमर्जी से चलें तो क्या लोकतंत्र सफल कहा जायेगा ? यदि किसी व्यक्ति को ऐसी व्यवस्था अस्वीकार्य लगे तो क्या उसे मतदान करते रहना चाहिए ? ऐसे लोकतंत्र के विरुद्ध अपनी भावना वह कैसे व्यक्त करे ? मुझे मतदान न करने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा नजर नहीं आता । मौजूदा व्यवस्था में ‘मैं किसी को भी वोट नहीं देना चाहता हूं’ इस आशय का विकल्प चुनावों में हमारे यहां उपलब्ध ही नहीं है । अतः असंतोष अनुभव करने पर मतदान से विरत रहने का मैं पक्षधर हूं । जो संतुष्ट हो उसके मतदान का अवश्य अर्थ है । शेष के लिए यहां क्लिक करें >>

बराक ओबामा, अमेरिकी डिमॉक्रेसी और हिंदुस्तानी लोकतंत्र

संयुक्त राज्य अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति, बराक ओबामा, ने चुनाव परिणाम की घोषणा के तुरंत बाद अपने समर्थकों के जनसमूह के प्रति संबोधित उद्गारों का आरंभ इन शब्दों से कियाः “Hello, Chicago. If there is anyone out there who still doubts that America is a place where all things are possible, who still wonders if the dream of our founders is alive in our time, who still questions the power of our democracy, tonight is your answer.” अर्थात् जिनको संदेह है कि बहुत कुछ अब अमेरिका में संभव नहीं, जिनको शंका है कि हमारे संस्थापकों के सपने अब बेमानी हो चुके हैं और जो समझते हैं कि अमेरिकी लोकतंत्र अपनी ताकत खो चुका है, उनकी निराशा का उत्तर आज के चुनाव परिणाम ने दे दिया है ।

और यह उत्तर दिया है by young and old, rich and poor, Democrat and Republican, black, white, Hispanic, Asian, Native American, gay, straight, disabled and not disabled. Americans who sent a message to the world that we have never been just a collection of individuals or a collection of red states and blue states. We are, and always will be, the United States of America. (युवाओं तथा वृद्धों ने, अमीर-गरीब, डिमॉक्रेट तथा रिपब्लिकन, अश्वेत, श्वेत, स्पेनीभाषियों, एशियाइयों, देशज अमेरिकियों, समलैंगिकों, सीधे-सादों, विकलांगों एवं अविकलांगों ने ।)

अपने शब्दों पर जोर डालते हुए ओबामा का कहना था, “… above all, I will never forget who this victory truly belongs to. It belongs to you. It belongs to you.” (सबसे अहम है कि मैं नहीं भूल सकता कि यह विजय वस्तुतः किसकी है । यह विजय तो आपकी है । यह आपकी है ।)

किसने उसे मत दिया और किसने नहीं को ध्यान में रखते हुए उसके अगले वचन थे, “To those Americans whose support I have yet to earn,” he said, “I may not have won your vote, but I hear your voices, I need your help, and I will be your president, too.” अर्थात् मेरे शब्द उन अमेरिकियों के प्रति हैं जिनका सहयोग मुझे अभी पाना है । आपने मुझे वोट न दिया हो, पर मैं आपकी आवाज सुन रहा हूं, मुझे आपकी मदद चाहिए, और विश्वास रखें मैं आपका भी राष्ट्रपति हूं ।

उधर ओबामा की जीत पर बधाई दे चुकने के बाद प्रतिस्पर्धी जॉन मैकेन ने अपने समर्थकों से निवेदन किया, “These are difficult times for our country, and I pledged to him tonight to do all in my power to help him lead us through the many challenges we face. I urge all Americans who supported me to join me in not just congratulating him, but offering our next president our goodwill and earnest effort to find ways to come together.” (इस समय देश कठिन दौर से गुजर रहा है, और मैंने आज की रात उसको [ओबामा को] विश्वास दिलाया है कि मेरी सामर्थ्य में जो बन पड़ेगा वह किया जायेगा, ताकि वह अनेकों चुनौतियों का सामना करते हुए हमें उन्नतिमार्ग पर ले चले । मेरा उन सभी अमेरिकियों, जिन्होंने मुझे सहयोग दिया, से निवेदन है कि वे मेरा साथ न केवल उसे बधाई देने में दें, अपितु अगले राष्ट्रपति को सम्मिलित हो आगे बढ़ने में अपने मैत्रीभाव एवं निष्ठापूर्ण सहप्रयास समर्पित करें ।)

नये चयनित राष्ट्रपति का संबोधन (क्लिक करें) पर्याप्त लंबा है । (उसे विभिन्न वेबसाइटों पर देखा जा सकता है, जैसे The Houston Chronicle के http://www.chron.com/) ऐसे अवसरों पर व्यक्ति निःसंदेह भावुक होता है, और उसके उद्गार भावनात्मक अधिक होते हैं । भविष्य में चयनित राष्ट्रपति का कार्यकाल कितना सफल और जनाकांक्षाओं के अनुरूप होगा यह तो कोई नहीं बता सकता है । हम अभी उसके इरादों और लोगों की उम्मींदों और सहयोग की बात भर सोच सकते हैं ।

यहां पर मेरा इरादा उक्त संबोधन की विस्तृत चर्चा करना नहीं है, और न ही संपन्न चुनावों की अहमियत स्वयं अमेरिका के लिए तथा व्यापक स्तर पर पूरे विश्व के लिए क्या हैं इस बात पर कोई टिप्पणी करना है । मेरी रुचि अमेरिकी ‘डिमॉक्रेसी’ और भारतीय लोकतंत्र के बीच के अंतर पर गौर करने में है । दोनों देश लोकतंत्र कहलाते हैं — विश्व के दो विशालतम लोकतंत्र । किंतु दोनों में कितना फर्क है ! मैं तकनीकी अंतर की बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि दोनों देशों के जनसमुदाय तथा राजनेताओं में व्याप्त जनतांत्रिक भावना की बात कर रहा हूं ।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव एक पेचीदी एवं समयसाध्य प्रक्रिया है । राज्यों के अपने मत व्यक्त करने के नियम अलग-अलग हैं । फिर भी पूरी प्रक्रिया अपने किस्म की लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत ही होती है । ओबामा उसी प्रक्रिया से गुजरकर अपने मुकाम पर पहुंचा है । प्रत्याशी बनने के लिए व्यक्ति को अपनी योग्यता सिद्ध करनी होती है । उसे दूसरों से प्रतिस्पर्धा में आगे आना होता है । वह जनसमर्थन के बल पर उस जगह पर पहुंचता है । उसे किसी व्यक्तिविशेष के आशीर्वाद या कृपा पर निर्भर नहीं होना पड़ता । कोई ‘हाई-कमांड’ नहीं जिसका प्रसाद उसे प्रत्याशी बनाता है ।

किंतु अपने यहां क्या है ? सब कुछ ‘हाई-कमांड’ की इच्छा पर निर्भर करता है । इस बात का कोई महत्त्व नहीं रहता है कि जनसमुदाय उसे प्रत्याशी देखना चाहता है या नहीं । कोई राजनेता यह कहते नहीं हिचकता है कि वह तो फलां-फलां के आशीर्वाद से उस स्थान पर है । दल के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति जब जैसा चाहेगा वैसा वह करेगा । कोई-कोई तो दौड़कर चरणस्पर्श से भी नहीं परहेज करते हैं ! क्या इसी लोकतंत्र पर गर्व होना चाहिए हमें ?

दोनों लोकतन्त्रों के अंतर पर अतिरिक्त चर्चा अगली पोस्ट में रहेगी । – योगेन्द्र

इंडिया, भारत एवं अडिगा का ह्वाइट टाइगर

‘द गार्जियन’ की समीक्षा-पृष्ठ का एक अंश

‘द गार्जियन’ की समीक्षा-पृष्ठ का एक अंश

मुझे इस स्थल पर अपने इस मत कि इंडिया भारत नहीं है और दोनों में अच्छा-खासा अंतर है पर चर्चा जारी रखनी थी । उसे मैं अगली बार के लिए टाल रहा हूं और अकस्मात् इस वर्ष के ‘बूकर’ पुरस्कार की खबर पर उतर रहा हूं । इसके कारण हैं । कल ही मेरी दृष्टि वार्तापत्र ‘द हिंदू’ के मुखपृष्ठ पर छपे इस समाचार पर गयी कि इस वर्ष का प्रतिष्ठित ‘बूकर पुरस्कार’ तैंतीस-वर्षीय भारतीय अंग्रेजी लेखक अरविंद अडिगा को उनके प्रथम उपन्यास ‘द ह्वाइट टाइगर’ पर दिया गया है । भला ‘इंडिया बनाम भारत’ का इस समाचार से क्या वास्ता ? वास्ता है और वही इस आलेख का विषय है ।

‘द हिंदू’ में छपी रिपोर्ट के अंत के अनुच्छेदों में यह पाठ्य है-
… Chairman of the Jury Michael Portillo, the Tory politician-turned-critic, colourfully put it. “My criteria were ‘Does it knock my socks off?’ and this one did… the others impressed me … this one knocked my socks off,” Mr. Portillo said. “The novel is in many ways perfect. It is quite difficult to find any structural flaws with it,” he said.

रिपोर्ट के अनुसार अडिगा के उपन्यास में अपने देश की विषमतापूर्ण एवं विसंगतिमय प्रगति की पीड़ादायक कहानी है, जिसने निर्णायक-मंडल के सदस्यों को विचलित कर दिया । इस बात ने मेरी जिज्ञासा जागृत कर दी यह जानने के लिए कि उनन्यास में है क्या । मैंने उपन्यास का नाम पहले नहीं सुना था । इसकी कोई प्रति मेरे पास नहीं है कि उसे पढ़ूं । मैंने संक्षेप में जानकारी पाने हेतु अंतरजाल पर पुस्तक की समीक्षा खोजना चाहा । समीक्षाएं तो ढेरों हैं, किंतु मैंने ब्रितानिया के केवल दो प्रतिष्ठित समाचारपत्रों, ‘द गार्जियन’ तथा ‘द टेलीग्राफ’ पर नजर डालना काफी समझा । कहानी ‘बलराम हलवाई’ नाम के पात्र (ह्वाइट टाइगर) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक गरीब तथा अनपढ़ परिवार में जन्मने के बावजूद यह जान जाता है कि वह किस ‘अंधकारमय’ जीवन के साथ जी रहा है और उसको कैसे ऊपर उठते हुए दिल्ली के ‘प्रकाशमय’ संसार में अपनी जगह बनानी है । वह ‘सफलता’ की सीढ़ियां चढ़ने के लिए सभी ‘हथकंडे’ अपनाता है जिसमें संवेदना और सद्व्यवहार के लिए कोई स्थान नहीं है । अंत में वह एक सफल उद्यमी बनकर उभरता है और चीनी प्रधानमंत्री के साथ उद्यमिता के बहाने पत्राचार में जुट जाता है, इस देश की जिंदगी की हकीकत को उजागर करते हुए । कहानी किसी के लिए चिंतन का विषय बन सकती है, तो कुछ अन्य में तिलमिलाहट अथवा बौखलाहट पैदा कर सकती है ।

‘द गार्जियन’ की समीक्षा ने बलराम के चरित्र को यूं दर्शाया है-
He is heading for glory in India’s bright future. He will be one of those who stuffs cash into brown envelopes for policemen and politicians, and not just another victim.

अर्थात् ठान लेता है कि उसे क्या करना है आगे बढ़ने के लिए । वह लिफाफों में पैसा भर-भर कर पुलिसकर्मियों तथा राजनेताओं तक पहुंचायेगा, क्योंकि यही यहां की हकीकत है ! वह अपनी जमात के अन्य अभागे जनों की तरह सताया जाने वालों में नहीं शरीक होगा ।

समीक्षा के कुछ अन्य चुने अंशों पर गौर करें-
… he, along with most lowly Indians, inhabits the Darkness, a place where basic necessities are routinely snatched by the wealthy, who live in the Light.

कौन जिम्मेदार है उस जैसे विपन्न लोगों के हालात के लिए ? बलराम को इसका एहसास हो जाता है और वह संपन्नों की जमात में जा मिलने का विचार बना लेता है । समीक्षा में आगे है(कोष्ठकों में मेरे शब्द हैं)-
The home country [India that is Bharat] is invariably presented as a place of brutal injustice [क्रूर अन्याय] and sordid corruption [घृणास्पद भ्रष्टाचार] one in which the poor are always dispossessed and victimised by their age-old enemies, the rich. Characters at the colourful extremities of society are Dickensian grotesques [ugly or shocking], Phiz [reviewer] sketches, adrift in a country that is lurching rapidly towards bland middle-class normality.

देश की आर्थिक प्रगति की विषमता इस अनुच्छेद में स्पष्ट है । एक छोर पर है विपन्न वर्ग जिसके लिए प्रगति की कोई सार्थकता नहीं है, तो दूसरे छोर पर है नवसंपन्न बनता हुआ मध्य वर्ग जिसे प्रथम वर्ग की कीमत पर संपन्नता अर्जित करने में कोई बुराई नहीं दिखती और न उसमें आत्मग्लानि का भाव जगता है कि वह उस विपन्न वर्ग के हितों के लिए प्राथमिकता के आधार पर प्रयास करे ।

‘द टेलीग्राफ’ की समीक्षा में भी कुछ मिलते-जुलते विचार व्यक्त हैं-
He begins in the rural “Darkness”, a world of landlord and peasant. And when he escapes to the “Light” of the cities, it is into a world of servants and masters.

यानी देश के दो पक्ष हैं, एक अंधकारमय तो दूसरा प्रकाशित । एक में मालिक तो दूसरे में सेवक । आगे देखें-
The secret of India, he tells Wen [Jiabao], is the way that its extreme inequality is stabilised by its strong family structures: “Never before in human history have so few owed so much to so many.”

बलराम की नजर में एक छोटा वर्ग एक बड़े वर्ग के प्रति ऋणी है, क्योंकि उसने उस वर्ग के हकों की कीमत पर ही अपनी संपन्नता की मीनार खड़ी की है । और बलराम के ‘सत्य के बोध’ का वर्णन देखिये-
Advancement can be achieved only by patronage and corruption – if you make friends with the local political thugs, you might get a job as a bus conductor – or by Balram’s eventual method: stepping outside the “coop” of conventional morality.

नैतिकता की अवधारणा को पुस्तकों में समेटते हुए भ्रष्टाचार के रास्ते ही आगे बढ़ा जा सकता है । बहुत कुछ और भी है इन समीक्षाओं में जो देश की मौजूदा कटु सच्चाई उजागर करती हैं ।

मैं दावा नहीं कर सकता कि पुस्तक के विषयवस्तु के बारे में मैं ठीक-ठीक अनुमान लगा पाया हूं, परंतु मुझे लगता है उपन्यासकार अपने तरीके से देश की उस तस्वीर को पेश करता है जिसे मैं इंडिया तथा भारत के अंतर के रूप में देखता आ रहा हूं । यही कारण है कि मेरा ध्यान अकस्मात् इस घटना पर गया । अन्यथा पुस्तकों की चर्चा और उनके पुरस्कृत होने की घटना व्यापक सामाजिक संदर्भों में कभी-कभार ही माने रखती है । – योगेन्द्र