कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी की ताजपोशी

 

चुनाव कांग्रेस के पार्टी अध्यक्ष का

समाचार माध्यमों के अनुसार श्री राहुल गांधी ने बीते 16 तारीख (दिसंबर) कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष पद संभाल लिया है। मेरी समझ से यह औपचारिकता 19 तारीख होनी चाहिए थी।

अध्यक्ष पद के चुनाव की पूरी प्रक्रिया इस बार जोर-शोर से प्रकाशित हुई और समाचार माध्यमों पर चर्चा का विषय बनी। कार्यक्रम के अनुसार इस माह (दिसंबर) की 1ली तारीख चुनाव की विज्ञप्ति जारी की गई;  नामांकन एवं उनकी जांच 5 तारीख और नाम-वापसी की तारीख 11 रखी गई। मतदान 16 को होना था जिसकी आश्यकता नहीं रह गई। चुनाव परिणाम 19 दिसंबर घोषित होने हैं जिस दिन राहुल गांधी को औपचारिक तौर पर पार्टी का नवनिर्वाचित अध्यक्ष घोषित कर दिया जाना था। (देखें इंडियन एक्सप्रैस समाचार)

ध्यान दें कि इस बार नेहरू-गांधी परिवार के इस वारिस की ताजपोशी के लिए अध्यक्ष पद का चुनाव निर्धारित प्रक्रियानुसार किया गया है। मेरी जानकारी में लंबे अरसे से पार्टी-अध्यक्ष चुने जाने की प्रक्रिया नहीं अपनाई जा रही थी। राहुल के चुनाव की पूरी प्रक्रिया की बात मीडिया में इतनी क्यों छाई रही यह मेरी समझ से बाहर है। क्या कांग्रेस यह दिखाना चाहती है कि वह पूरी लोकतांत्रिक पद्धति से अध्यक्ष का चुनाव करती है? पहले भी यही गंभीरता दिखाई गई है क्या?

इस विषय पर आगे कुछ कहने से पहले पार्टी-संविधान के अनुसार क्या होना चाहिए इसकी चर्चा कर लूं। मेरी जानकारी हिन्दुस्तान अखबार

में छपी खबर पर आधारित है। पार्टी की शीर्ष समिति, कांग्रेस वर्किंग कमिटी, चुनाव का कार्यक्रम निर्धारित करती है। 10 या अधिक पार्टी-प्रतिनिधि इच्छुक प्रत्याशी का नामांकन करते हैं। राज्यों की वर्किंग कमिटियों के सदस्य प्रतिनिधि होते हैं। नामांकन की अंतिम तारीख के बाद कोई भी प्रत्याशी 7 दिनों के भीतर  नाम वापस ले सकता है। उसके बाद नियत तारीख पर आवश्यक होने पर मतदान होता है। 50% से अधिक मत पाने वाला निर्वाचित अध्यक्ष कहलाता है जो अगले अधिवेशन (जब भी हो) की अध्यक्षता करता है जिसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है। आवश्यक होने पर मतों में व्यक्त दूसरी वरीयता को भी शामिल किया जाता है। 4 दशक पूर्व तक यह  मात्र 1 वर्ष का होता था।

कांग्रेस संविधान की एक बात महत्वपूर्ण है: कांग्रेस वर्किंग कमिटी को यह अधिकार है कि समय पर चुनाव न करवा पाने पर वह अनंतिम (provisional) या अस्थाई तौर पर किसी को भी अध्यक्ष पद पर नियुक्त कर सकती है। मैं समझता हूं कि यह प्राविधान कुछ विशेष परिस्थितियों के लिए स्वीकारा गया होगा। लेकिन इसका भरपूर – और मेरी दृष्टि में बेजा – इस्तेमाल नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के लिए किया गया है। इसी प्राविधान के तहत ही इंदिरा, राजीव (जब तक ये दो जीवित रहे), और सोनिया गांधी लंबे अरसे तक पार्टी अध्यक्ष बने रहे। सोनिया गांधी तो लगातार 19 वर्षों तक शीर्ष पद पर बनी रहीं। अवश्य ही सन् 2000 में कांग्रेस नेता जितेन्द्र प्रसाद उनके विरुद्ध चुनाव लड़े परंतु उन्हें  बहुत बुरी हार मिली।

विगत काल के कांग्रेस अध्य्क्ष

इस आलेख के अंत में सन् 1885 से अब तक के कांग्रेस अध्यक्षों की सूची शामिल की गई है। इस विषय की जानकारी ऑल इंडिया कांग्रेसआईएनसी (इंडियन नैशनल कांग्रेस), एवं विकीपीडिया आदि की वेबसाइटों पर मिल सकती है।

सूची में लाल रंग एवं कोष्टक में अंकित संख्या कोई व्यक्ति कितनी बार अध्यक्ष चुना गया इसकी जानकारी देता है। गौर से देखने पर कुछ बातें साफ नजर आएंगी। स्वातंत्र्य पूर्व अध्यक्षों का कार्यकाल एक वर्ष का होता था। विशेष परिस्थितियों में कार्यकाल कुछ माह का या साल भर से भी अधिक का होता होगा ऐसा मेरा सोचना है। उदाहरण के तौर पर 1918 में आयोजित विशेष अधिवेशन (बम्बई) की अध्यक्षता सैयद हसन इमाम (Syed Hasan Imam) ने की थी और उसी वर्ष के दूसरे अधिवेशन में मदन मोहन मालवीय (Madan Mohan Malaviyav) ने अध्यक्षता की।

दी गई सूची में उन कांग्रेस नेताओं के नाम लाल रंग से इंगित हैं जो एक से अधिक बार अध्यक्ष बने। स्वतंत्रता पूर्व भारत में दादाभाई नरौजी,  मदन मोहन मालवीय, जवाहर लाल नेहरू अधिकतम 3 बार अध्यक्ष बने। स्वतंत्रता के बाद भी नेहरूजी 3 बार (लगातार) अध्यक्ष बने थे। इस प्रकार नेहरूजी कुल 6 बार अध्यक्ष बने। अन्यथा सूची से यह ज्ञात होता है कि धेबर महोदय 5 बार अध्यक्ष चुने गए। धेबर को छोड़ कोई भी इस पद पर लगातार 5 साल से अधिक नहीं रहा।

कांग्रेस के अध्यक्षों की एक वर्ष के कार्यकाल की परंपरा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी कुछ समय तक चलती रही। लेकिन जब इंदिरा गांधी कांग्रेस राजनीति में ताकतबर नेता के तौर पर उभरीं और 1966 में देश की प्रधानमंत्री बनी तो यह सिलसिला गड़बड़ाने लगा। सन्‍ 1969 से अध्यक्ष का कार्यकाल 3-3 वर्ष का देखने को मिलता है।

पंचवर्षीय कार्यकाल

कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष का कार्यकाल आजकल 5 वर्ष का है। मेरा ख्याल है कि यह तबदीली इंदिरा गांधी के समय (1978) से हो गया था। वे 1978 में और फिर 1983 में अध्यक्ष बनी। लेकिन 1984  में उनकी हत्या हो गई। तत्पश्चात्‍ कुछ माह के लिए अनंतिम तौर पर कोई अध्यक्ष रहा या नहीं मुझे पता नहीं। अवश्य ही वरिष्ठतम उपाध्यक्ष ने पद संभाला होगा। बाद में 1985 के बंबई अधिवेशन में राजीव गांधी अध्यक्ष चुने गए, लेकिन उनकी हत्या (मई 21, 1991) के बाद यह पद कुछ समय खाली रहा।

इंदिरा गांधी के काल में ही यह सुनिश्चित हो गया था कि अध्यक्ष पद नेहरू-गांधी परिवार में ही रहना है। कमोबेश सभी कांग्रेस-जनों को यह स्वीकार्य था। यदि राजीव गांधी जीवित होते तो शायद आज भी वही पार्टी अध्यक्ष होते, या अपने जीवन काल ही में वे राहुल को गद्दी सोंप दिए होते।

राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस में उक्त परिवार का कोई भी सदस्य नहीं रह गया था। कांग्रेस दल में एक प्रकार की रिक्तता छा गई। यह मौका था जब कांग्रेसी नेहरू-गांधी परिवार के आभामंडल से बाहर निकल सकते थे। ऐसा हुआ भी लेकिन प्रयोग सफल नहीं हुआ। 1992 में पी.वी. नरसिम्हाराव अध्यक्ष चुने गए और उन्होंने सत्ता भी संभाली। 5 वर्ष के कार्यकाल के दौरान तमाम आरोप लगे। विपक्षियों का विरोध तो उन्हें झेलना पड़ा, उसके अलावा कांग्रेस पार्टी के भीतर असंतोष भी पनपने लगा।

सन्‍ 1996 के आम चुनाव में कांग्रेस को हार का मुख देखना पड़ा। विपक्षी दलों (भाजपा को छोड़कर) के गठबंधन ने सरकार बनाई जो लगभग दो वर्षों के भीतर ही अपने अंतर्विरोधों के चलते बिखर गई। 1997 में वरिष्ठ नेता सीताराम केसरी ने अध्यक्ष पद संभाला किंतु उसके पहले के 5-6 सालों के अंतराल में कांग्रेस के भीतर यह विचार जड़ें जमा चुका था कि नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य के बिना पार्टी का उद्धार कोई नहीं कर सकता। अतः सोनिया गांधी को मनाया जाने लगा। कांग्रेस जनों के दबाव या प्रार्थना के बावजूद वह लंबे समय तक राजनीति से दूर रह रही थीं, किंतु अंततः 1997 के अंत आते-आते उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता स्वीकार कर ली और लगभग दो माह बाद केसरी को पद से हटाकर 1998 के आरंभ में उन्हें अध्यक्ष की गद्दी सोंप दी गई। तब से वह अभी तक (19 वर्ष) इस पर काबिज हैं, हालांकि 2000 में जितेन्द्र प्रसाद ने उन्हें चुनौती दी थी।

वर्तमान कांग्रेस की राजनैतिक संस्कृति

विगत कुछ दशकों में स्पष्टतः परिभाषित एवं मीडिया में प्रकाशित चुनाव-प्रक्रिया कितनी बार अपनाई गई यह मैं नहीं जानता। अगर अपनाई भी गई हो तो वह खानापूर्ति से अधिक कुछ भी नहीं रही होगी। हर बार मीडिया में खबर छप जाती थी कि अमुक व्यक्ति (आवश्यक रूप से नेहरू परिवार का सदस्य) पार्टी-अध्यक्ष चुन लिया गया है।

लेकिन इस बार इतना ढिंढोरा क्यों पीटा गया? इसका कारण है।

पिछले कुछ वर्षों से सोनिया गांधी अस्वस्थ चल रही हैं। वे अध्यक्ष के कार्यभार से मुक्त होना चाहती थीं। अपनी विरासत किसे सोंपें? राहुल गांधी से बेहतर (उनके लिए) कौन वारिस हो सकता हैं? यों पुत्री प्रियंका (वाड्रा) को अधिक कांग्रेसी चाहते हैं ऐसा मालूम पड़ता है। कदाचित् पुत्रमोह उन्हें राहुल को पार्टी के शीर्ष पद पर स्थापित करने को प्रेरित करता है। यों भी गांधी के नाम से प्रियंका नहीं जानी जाएंगी जो एक प्रकार से दिक्कत की बात हो सकती है। राहुल को तैयार करने के लिए सोनिया गांधी ने उन्हें अपने अधिकार कुछ हद तक सोंप दिए थे। राहुल कहने को उपाध्यक्ष थे लेकिन अघोषित तौर पर कार्यकारी अध्यक्ष बने हुए थे।

कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी से कहीं अधिक वरिष्ठ एवं अनुभवी नेता रहे हैं लेकिन उनमें से किसी को भी वे विशेषाधिकार प्राप्त नहीं हो सके जो राहुल गांधी को प्राप्त रहे हैं। दरअसल इंदिरा गांधी के समय ही यह परंपरा स्थापित हो गई थी कि अध्यक्ष का पद नेहरू-गांधी परिवार के लिए आरक्षित रहेगा। राहुल गांधी को एक कार्यकर्ता की हैसियत से कोई अनुभव एवं योग्यता प्राप्त न होने बावजूद उन्हें 2004 में सीधे महासचिव और तत्पश्चात् 2013 में (वरिष्ठ्तम?) उपाध्यक्ष बना दिया गया। कांग्रेसजन बंधुआ नेताओं की तरह सब हंसते हुए, खुशी मनाते हुए, स्वीकार करते आ रहे हैं (बंधुआ नेता – बंधुआ मजदूरों के माफिक)।

कांग्रसजनों का तर्क सदैव यह रहा है: “नेहरू-गांधी परिवार ने इस देश के लिए जो त्याग किया है, बलिदान दिया है, उससे किसी और की तुलना नहीं की जा सकती। इसलिए कांग्रेस की हो बागडोर या देश की वह तो नेहरू-गांधी परिवार के हाथों में ही होनी चाहिए।”

यह तर्क (या कुतर्क?) यह मान के चलता है कि पुरखों के योगदानों का फल उनकी आने वाली पीढ़ियों को मिलते रहना चाहिए। यह मान भी लें कि उक्त परिवार के सदस्यों का योगदान अविस्मरणीय रहा है, लेकिन क्या अन्य परिवारों ने देश के लिए बलिदान नहीं दिए? उनमें से कितनों को कांग्रेसियों ने महत्व दिया है? कहां हैं वे और क्या हैसियत है उनकी आज के कांग्रेस दल में? उसी नेहरू-गांधी परिवार के तो मेनका गांधी और वरुण गांधी भी हैं। उनको उस परिवार के योगदानों का श्रेय और लाभ क्यों नहीं दिया जा रहा है?

राहुल की ताजपोशी : चुनाव का दिखावा?

राहुल की ताजपोशी की बात लंबे अरसे से चल रही थी। विगत कुछ समय से यह सुनने में आता रहा है कि राहुल अमुक तारीख तक अध्यक्ष पद ग्रहण कर लेंगे; और वह तारीख टलती जा रही थी। राहुल का कहना था, “अभी मुझे पार्टी के बारे में बहुत कुछ समझना है, बहुत कुछ सीखना है।” कांग्रेसजनों ने तो मन बना ही रखा था कि जब राहुल तैयार हो जाएंगे और चाहेंगे उनको अध्यक्ष पद सोंप दिया जाएगा। वह घड़ी आ गई, राहुल ने हांमी भर दी, और कांग्रेसियों की ख्वाहिश पूरी हो गई।

पूरा देश जानता था जब भी होगा राहुल को ही अध्यक्ष बनना हैं। तब निर्वाचन की प्रक्रिया का दिखावा क्यों? उसका भी कारण है। राहुल कहते आ रहे थे कि वह पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र स्थापित करेंगे और पार्टी के संविधान के अनुसार कार्य निबटाएंगे। क्या अभी तक आंतरिक लोकतंत्र नहीं था?

अध्यक्ष के चुनाव की प्रक्रिया दिखावा भर है यह बात शहज़ाद पूनावाला की बातों से स्पष्ट है। शहज़ाद कांग्रेस का सदस्य और महाराष्ट्र राज्य में पार्टी-सचिव हैं। अभी तक उन्होंने राहुल के लिए ही कार्य किया है। लेकिन इस बार उन्हें लगा कि कांग्रेस की संस्कृति के अनुसार कोई भी अन्य कांग्रेसी अध्यक्ष पद के लिए नामांकन कर ही नहीं सकता। हर कोई यह मान के चलता है कि जब तक नेहरू-गांधी परिवार का सदस्य उपलब्ध हो किसी और को चुनाव लड़ने की सोचनी ही नहीं चाहिए। जब स्थिति इतनी स्पष्ट थी तो चुनाव का ढोंग रचने की आवश्यकता ही क्या थी? और यदि लोकतांत्रिकता का प्रदर्शन करना ही था तो किसी और को भी नामांकन के लिए प्रेरित करना चहिए था – दिखावे के लिए ही सही।

कांग्रेसजनों का नेहरू-गांधी परिवार के प्रति कितनी अंधभक्ति है इसका ज्वलंत उदाहरण शहज़ाद के बड़े भाई तहसीन पूनावाला (वे भी कांग्रेस सदस्य) ने पेश किया है। उन्होंने और उनके परिवार ने शहजाद से परिवारिक नाते ही तोड़ दिए। “तुम्हारी ये हिम्मत कैसे हो गई?”

खैर, “कोई अध्यक्ष होय हमें का हानि!”

भारतीय यानी इंडियन लोकतंत्र

भारत यानी इंडिया विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लेकिन यह महान् लोकतंत्र नहीं है। बड़ा होना इसकी उपलब्धि नहीं बल्कि विवशता है। जब आबादी अमेरिका से करीब 4 गुना हो तब बड़ा तो होना ही है। किंतु महान् बनने के लिए आबादी नहीं लोकतंत्र की गुणवत्ता माने रखती है। अपनी उम्र के 70 वर्ष के पड़ाव पर यही कह सकता हूं कि समय के साथ लोकतंत्र में गिरावट ही आई है। तब महानता के लक्षण कहां?  देश में अनेक राजनैतिक दल चुनाव लड़ते हैं। उनमें से कितनों में आंतरिक लोकतंत्र है? कदाचित् 10% में भी नहीं। सभी में सामन्ती व्यवस्था है। कांग्रेस ने भी उसी व्यवस्था को अपना लिया है।

असल में कांग्रेस पार्टी में यह धारणा घर गई है कि इसके बिखराव को केवल नेहरू-गांधी परिवार ही रोक सकता है। – योगेन्द्र जोशी

List of Past Presidents of Indian National Congress (INC, Congress in short)

 

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (संक्षेप में कांग्रेस) के विगत-काल के अध्यक्षों की सूची

 

स्वातंत्र्यपूर्व भारत Pre-Independence India
1885 (Bombay बम्बई) Womesh Chandra Bonnerjee वोमेश चन्द्र बनर्जी (1)
1886 (Calcutta कलकत्ता) Dadabhai Naoroji दादाभाई नरौजी (1)
1887(Madras मद्रास) Badruddin Tyabji बदरुद्दीन तैयबजी
1888 (Allahabad इलाहाबाद) George Yule ज्यॉर्ज यूल
1889 (Bombay बम्बई) William Wedderburn विलिअम वेडरबर्न
1890 (Calcutta कलकत्ता) Pherozeshah Mehta फ़िरोज़शाह मेहता
1891 (Nagpur नागपुर) P. Ananda Charlu पी. आनन्द चार्लू
1892 (Allahabad इलाहाबाद) Womesh Chandra Bonnerjee वोमेश चन्द्र बनर्जी (2)
1893 (Lahore लाहौर) Dadabhai Naoroji दादाभाई नरौजी (2)
1894 (Madras मद्रास) Alfred Webb आलफ़्रेड वेब
1895 (Poona पूना ) Surendranath Banerjea  सुरेन्द्र नाथ बनर्जी
1896 (Calcutta कलकत्ता) Rahimtulla M. Sayani   रहीमतुल्ला एम. सयानी
1897 (Amraoti अमरावती) C. Sankaran Nair सी. शंकरन नायर
1898 (Madras, मद्रास) Ananda Mohan Bose आनंद मोहन बोस
1899 (Lucknow, लखनऊ) Romesh Chunder Dutt रमेश चंद्र दत्त
1900 (Lahore लाहौर) Narayan Ganesh Chandavarkar नारायण गणेश चंदावरकर
1901 (Calcutta, कलकत्ता) Dinshaw Edulji Wacha  दिनशॉ एदुलजी वाचा
1902 (Ahmedabad अहमदाबाद) Surendranath Banerjea सुरेन्द्र नाथ बनर्जी
1903 (Madras, मद्रास) Lalmohan Ghosh  लालमोहन घोष
1904 (Bombay, बम्बई) Henry Cotton हेनरी कॉटन
1905 (Benares बनारस) Gopal Krishna Gokhale गोपाल कृष्ण गोखले
1906 (Calcutta कलकत्ता) Dadabhai Naoroji दादाभाई नरौजी (3)
1907 (Surat सूरत) Rashbihari Ghosh  राशबिहारी घोष (1)
1908 (Madras मद्रास) Rashbihari Ghosh  राशबिहारी घोष (2)
1909 (Lahore लाहौर) Madan Mohan Malaviya मदन मोहन मालवीय (1)
1910 (Allahabad इलाहाबाद) William Wedderburn  विलिअम वेडरबर्न
1911 (Calcutta कलकत्ता) Bishan Narayan Dar  बिशन नारायन डार
1912 (Bankipur बांकीपुर) Rao Bahadur Raghunath Narasinha Mudholkar

राव बहादुर रघुनाथ नरसिंह मुधोलकर

1913 (Karachi करांची) Nawab Syed Mohammad Bahadur

नवाब सैयद मुहम्मद बहादुर

1914 (Madras मद्रास) Bhupendra Nath Bose  भूपेन्द्र नाथ बोस
1915 (Bombay, बम्बई) Satyendra Prasanna Sinha सत्येन्द्र प्रसन्ना सिंहा
1916 (Lucknow लखनऊ) Ambica Charan Mazumdar अंबिका चरन मजुमदार
1917 (Calcutta, कलकत्ता) Annie Besant  एनी बेसंट
1918 (Bombay, बम्बई) Syed Hasan Imam सैयद हसन इमाम
1918 (Delhi दिल्ली) Madan Mohan Malaviyav मदन मोहन मालवीय (2)
1919 (Amritsar अमृतसर) Motilal Nehru  मोतीलाल नेहरू (1)
1920 (Calcutta, कलकत्ता) Lala Lajpat Rai  लाला लाजपत राय
1920 (Nagpur नागपुर ) C. Vijayaraghavachariar  सी. विजय राघवाचारियार
1921 (Ahmedabad अहमदाबाद) Hakim Ajmal Khan  हकीम अजमल ख़ान
1922 (Gaya गया) Chittaranjan Das  चित्तरंजन दास
1923 (Cocanada काकीनाड) Maulana Mohammad Ali  मौलाना मुहम्मद अली
1923 (Delhi दिल्ली) Maulana Abul Kalam Azad  मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (1)
1924 (Belgaum बेलगाम) Mohandas Karamchand Gandhi  मोहनदास करमचंद गांधी
1925 (Kanpur कानपुर) Sarojini Naidu  सरोजिनी नायडू
1926 (Gauhati गुवाहाटी S. Srinivasa Iyengar एस. श्रीनिवास आयंगर
1927 (Madras मद्रास) Mukhtar Ahmad Ansari  मुख़्तार अहमद अंसारी
1928 (Calcutta, कलकत्ता) Motilal Nehru  मोतीलाल नेहरू (2)
1929 (Lahore लाहौर) Jawaharlal Nehru  जवाहर लाल नेहरू (1)
1931 (Karachi करांची) Vallabhbhai Patel  बल्लभभाई पटेल
1932 (Delhi दिल्ली) Madan Mohan Malaviya मदन मोहन मालवीय (3)
1933 (Calcutta, कलकत्ता) Nellie Sen Gupta नेली सेन गुप्ता
1934 (Bombay, बम्बई) Rajendra Prasad राजेन्द्र प्रसाद
1935 (Lucknow लखनऊ) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (2)
1936 (Faizpur फ़ैज़पुर) Jawaharlal Nehru  जवाहर लाल नेहरू (3)
1938 (Haripura हरीपुरा) Subhas Chandra Bose सुभाष चंद्र बोस (1)
1939 (Tripuri त्रिपुरी) Subhas Chandra Bose सुभाष चंद्र बोस (2)
1940 (Ramgarh रामगढ़) Maulana Abul Kalam Azad मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (2)
1946 (Meerut मेरठ) J. B. Kripalani  जे. बी. कृपलानी
स्वातंत्र्योत्तर भारत Post-Independence India
1948 (Jaipur जयपुर) Pattabhi Sitaramayya  पट्टाभि सीतारमैय्या
1950 (Nasik नासिक) Purshottam Das Tandon  पुरुषोत्तम दास टंडन
1951 (New Delhi नई दिल्ली) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (4)
1953 (Hyderabad हैदराबाद) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (5)
1954 (Kalyani कल्याणी) Jawaharlal Nehru जवाहर लाल नेहरू (6)
1955 (Avadi अवादी) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (1)
1956 (Amritsar अमृतसर) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (2)
1957 (Indore इंदौर) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (3)
1958 (Gauhati गुवाहाटी) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (4)
1959 (Nagpur नागपुर) U. N. Dhebar यू. एन. धेबर (5)
1960 (Bangalore बंगलौर) Neelam Sanjeeva Reddy  नीलम संजीव रेड्डी (1)
1961 (Bhavnagar भावनगर) Neelam Sanjeeva Reddy  नीलम संजीव रेड्डी (2)
1962 (Patna पटना) Neelam Sanjeeva Reddy नीलम संजीव रेड्डी (3)
1964 (Bhubaneswar भुवनेश्वर) K. Kamaraj के. कामराज (1)
1965 (Durgapur दुर्गापुर) K. Kamaraj के. कामराज (2)
1966 (Jaipur जयपुर) K. Kamaraj के. कामराज (3)
1968 (Hyderabad हैदराबाद) S. Nijalingappa एस. निजलिंगप्पा (1)
1969 (Faridabad फ़रीदाबाद) S. Nijalingappa एस. निजलिंगप्पा (2)
1969 (Bombay बम्बई) Jagjivan Ram  जगजीवन राम
1972 (Calcutta कलकत्ता) Shankar Dayal Sharma  शंकर दयाल शर्मा
1975 (Chandigarh चंडीगढ़) Dev Kanta Borooah देवकांत बरुआ
1978 (New Delhi नई दिल्ली) Indira Gandhi इंदिरा गांधी (1)
1983 (Calcutta, कलकत्ता) Indira Gandhi इंदिरा गांधी (2)
1985 (Bombay बम्बई) Rajiv Gandhi राजीव गांधी
1992 (Tirupati तिरुपति) P. V. Narasimha  Rao पी.वी. नरसिम्हाराव
1997 (Calcutta कलकत्ता) Sitaram Kesri सीताराम केसरी
1998 (New Delhi नई दिल्ली) Sonia Gandhi सोनिया गांधी

 

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चुनाव आयोग का राहुल गांधी से सवाल – क्या हो राहुल का जवाब

राहुल का इंदौर भाषण २०१३

 

 

बेचारे राहुल गांधी, कांग्रेस के स्टार प्रचारक और लगभग सर्वेसर्वा । बुलंदशहर के हालिया दंगों को लेकर उन्होंने जो उल्टासीधा बोल दिया वह अब उनके गले की हड्डी बन गया है । (देखें 29 अक्टूबर की पोस्टसमझ में नहीं आता कि उन्होंने जो कुछ कहा वह निहायत नादानी में कह दिया या सोचसमझकर । इस बात को शायद वह भी खुद ठीक से नहीं जानते होंगे । बस जोशोखरोश में मन में कुछ आया और बोल गए, आगा-पीछा देखे बिना ।

राहुल गांधी अभी राजनीति में कच्चे खिलाड़ी हैं । कांग्रेसजन तो उन्हीं को आगे करने में उतावले हैं, और उनकी नजर में वे ही प्रधानमंत्री पद के योग्यतम व्यक्ति हैं, क्योंकि वे जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के वंशज हैं और राजनीति में निपुणता उनको उनसे विरासत में मिली हैं । वे भूल जाते हैं धनसंपदा-जमीन-जायदाद तो कानूनन विरासत में मिलती है, लेकिन किसी विषय में महारत या नैपुण्य नहीं । खैर, होगी क्रांग्रेसजनों की भी कोई मजबूरी !

इन बातों पर लंबी बहस संभव है । मुझे अभी उसमें पड़ने की जरूरत नहीं है । मेरी चिंता तो इस बात को लेकर है कि चुनाव आयोग ने उनसे उनके उपरिकथित दंगों के संदर्भ में स्पष्टीकरण मांग डाला है, जिसका उत्तर वे अभी तक नहीं दे पाए और जिसके लिए उन्होंने हफ्ते भर की मोहलत और मांगी है । जो कहा उसके लिए वे कुछ ऐसी सफाई देना चाहेंगे कि उन्हें शर्मसार न होना पड़े । क्रांग्रेसजन तो अभी तक उनका बचाव करते ही आ रहे हैं । उनकी भी कुछ किरकिरी होनी लाजिमी है । इस मौके पर मेरे दिमाग में एक स्पष्टीकरण सूझ रहा है । काश! कि यह उन तक पहुंच जाए । यों उनके पास तो एक से एक धुरंधर कानूनी सलाहकार होंगे । उन्हीं की पार्टी में अनेकों हैं । फिर भी विधिवेत्ता कभी-कभी चूक कर जाते हैं, जैसे जेठमलानी आत्मविश्वास की अतिशयता में बापू आसाराम को बचाने के चक्कर में बिना किसी प्रमाण के उस नाबालिग को ही दिमागी तौर पर असंयत बता बैठे, जिसने आसाराम पर आरोप लगाए हैं । हां, तो मेरी सफाई कुछ यों है:

“मेरे पास एक आदमी आया था जिसका कहना था कि वह अमुक खुफिया एजेंसी में कार्यरत है । मैं झूठ नहीं बोलूगा; मैंने उस पर भरोसा कर लिया । मुझे लगा कि यह व्यक्ति मुझ तक यों ही नहीं पहुंच गया होगा । उस आदमी को मेरी उच्चतम श्रेणी की सुरक्षा व्यवस्था से गुजरना ही पड़ा होगा । सुरक्षाकर्मियों ने अवश्य ही उसके बारे में पूरी जांच की होगी और उसके दावे को सही पाया होगा । मैं खुद अपने से मिलने वालों की जांच कभी नहीं करता, सो इस बार भी वैसा करने की जरूरत नहीं थी । उस व्यक्ति ने मुझे जो बताया वह सब जगजाहिर है । उसने वह सब मुझे बताना चाहिए था या नहीं इसका ख्याल तो उसे रहा ही होगा । उसे तो अपने खुफिया तंत्र के सर्विस-रूल्स मालूम ही होंगे । उसने जो कुछ बताया वह क्यों बताया, जब इस सवाल पर मैंने गंभीरता से विचार किया तो यही समझ में आया कि दंगों के दुष्परिणामों की हकीकत देश की जनता के सामने आनी चाहिए । लोगों को जानने का हक है इसीलिए तो हम आर.टी.आई. कानून लाए थे । जब देश में कोई आंतकी घटना होती है तो उसे छिपाते नहीं हैं । उसकी चर्चा करते हैं और पाकिस्तानी आई.एस.आई. की भूमिका की बात करते हैं । ठीक उसी तर्ज पर मैंने वे बातें कहीं जिनकी सफाई मुझसे मांगी जा रही है । इसे यदि मेरी गलती मानी जाती है तो मैं इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं । अगर गलती उस खुफिया-कर्मी की है तो उसकी सफाई वही दे सकता है । और यदि वह व्यक्ति खुफियाकर्मी ही नहीं था तो गलती मेरे सुरक्षकर्मियों की है और वे ही उसकी सफाई दे सकते है ।”

जाहिर में कि पूरा मामला लंबीचौढ़ी जांच का बन जाता है । उसके लिए एक जांच कमिशन होना चाहिए जिसके नतीजे सालों में आएं । अंततः मामला रफादफा हो जाए । मेरी दिली तमन्ना है कि ऐसा ही हो ! – योगेन्द्र जोशी

राहुल गांधी का प्रधानमंत्री बनना देशहित में होगा या …?

राहुल का इंदौर भाषण २०१३

 

आलोचना राहुल गांधी की

यदि मैं राहुल गांधी पर कोई नकारात्मक या आलोचनात्मक टिप्पणी करूं तो कांग्रेसजन आगबबूला हो जाएंगे । चूंकि प्रायः सभी लोग कहते हैं कि इस देश में अपनी बात कहने का सबको हक है, इसलिए मैं भी कुछ कहने की हिम्मत कर रहा हूं । शायद दो-चार ऐसे लोग मिल जाएं जो मुझसे सहमत हों । तब यह समझूंगा कि मेरी बात सौ फीसद मिथ्या नहीं मानी जा रही, अन्यथा खुद के खयालात पर शक होने लगेगा ।

मेरी नजर में राहुल गांधी राजनैतिक दृष्टि से नितांत अपरिपक्व हैं । वे नहीं जानते कि उन्हें क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं । लगता है उन्हें ऐतिहासिक तथ्यों की भी जानकारी नहीं । अपने भाषणों में वे अपने एवं अपने परिवार की बातें जरूरत से अधिक करते है, परिवार के तथाकथित त्याग की चर्चा करते हैं, गोया कि लोग, यानी आगामी चुनावों के मतदाता, अपने समस्त कष्टों को भूलकर उनकी पार्टी को सत्ता सोंप देंगे ।

आगामी (2014) केंद्रीय सरकार का प्रधानमंत्री

कह नहीं सकता कि अगली सरकार कांग्रेस की अगुवाई में बनेगी या नहीं । मुझे नहीं लगता कि इस पार्टी को खास सफलता मिलेगी । उनके नाम उपलब्धियों की तुलना में विफलताएं कहीं अधिक हैं । जनता शायद उन्हें वोट देना पसंद न करे । तीसरा मोर्चा बनेगा या नहीं बनेगा, यदि बनेगा तो कैसे ये सवाल अभी पूर्णतः अनुत्तरित हैं । जिसका जन्म अभी हुआ नहीं उस तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी इसकी संभावना मेरे मत में क्षीण है । हो सकता है भाजपा अधिक सीटें ले जाए, लेकिन अपर्याप्त । मुझे डर है कि वह सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या में समर्थन जुटाने में असफल रहेगी । क्या पता अन्य दल तथाकथित “सेक्युलरिज्म” के नाम पर उसे रोकने की कोशिश में एकजुट हो जाएं । इस देश में सेक्युलरिज्म का फेबिकॉल दुश्मनों को भी आपस में जोड़ सकता है । इसलिए अंततः घूमफिर के कांग्रेस के हाथ में ही कमान आ जाए, किंतु उसकी स्थिति इस बार काफी कमजोर रहेगी ।

अगर जोड़तोड़ करके कांग्रेस ने सत्ता संभाल ही ली तो उसका प्रधानमंत्री कौन बनेगा यह बात फिलहाल भविष्य के गर्त में ही छिपी है । मेरा मानना है राहुल गांधी इस पद को स्वीकार नहीं करेंगे । मैं उन्हें मूर्ख तो मानता हूं (क्षमा करें यदि आपको बुरा लगे तो), लेकिन वे महामूर्ख नहीं हैं कि इस समय खाहमखाह जोखिम उठाएं और अपना भविष्य दांव पर लगाएं । परिस्थितियां कांग्रेस के अनुकूल नहीं हैं, भले ही कांग्रेस-नीत सरकार बन जाए ।

यह याद रखना चाहिए कि कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार ही सभी निर्णय लेता है । वह परिवार ही अंततोगत्वा बताएगा कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा । राहुल गांधी को यह जन्मसिद्ध विशेषाधिकार प्राप्त है कि वे “हां” या “न” कहें । अन्य लोगों को यह अधिकार नहीं है । अतः जिसे यह परिवार कहेगा उसे प्रधानमंत्री का पद सम्हालना ही पड़ेगा ।  और इस कार्य के लिए अपने मनमोहन जी से बेहतर कौन हो सकता है ? उन जैसा समर्पित व्यक्ति भला कौन हो सकता है । कांग्रेसजन लाख कहें कि उनकी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र है और प्रधानमंत्री का चयन चुनाव जीतकर आए सांसद करते हैं, हकीकत में ऐसा है नहीं ।

आन्तरिक लोकतंत्र का अभाव

दरअसल भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है देश के अधिकांश दल किसी न किसी व्यक्ति या परिवार की बपौती बनकर रह गये हैं, जहां संपूर्ण अधिकार मुखिया या उसके परिवार में निहित रहते हैं । कांग्रेस ही में यह नहीं है, कश्मीर से कन्याकुमारी तक यही कहानी है प्रायः सभी दलों की है । एनसीपी के फारूख अब्दुला, अकाली दल का बादल परिवार, लोकदल के अजीत सिंह, सपा के मुलायम सिंह, बसपा की मायावती, राजद के लालू यादव, लोजपा के रामविलास पासवान, त्रिणमूल की ममता, बीजद के बीजू पटनायक, टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू, शिवसेना के उद्धव ठाकरे, एमएनएस के राज ठाकरे, डीएमके के करुणानिधि, एआईएडीएमके की जयललिता, तथा अन्य कई दलों की यही कहानी है । इन दलों में आंतरिक लोकतंत्र नाम की चीज ही नहीं है, लेकिन वे लोकतंत्र की बात करते अवश्य हैं । खैर, मेरे कहने से क्या होता है !

मैंने कहा कि मैं राहुल गांधी को कुछ हद तक मूर्ख मानता हूं, क्योंकि वे कई मौकों पर बेसिरपैर की बातें कर जाते हैं । कांग्रेसजनों की खूबी यह है कि वे हर हाल में उनकी बातें सही ठहराते हैं । राहुल भला कैसे गलत हो सकते हैं ? वे हमारे नेता हैं जो भी कहते है सही कहते है, दूसरे लोग ही गलत समझते हैं । वाह रे राजनैतिक दर्शन ! किसी लोकतांत्रिक दल में यह हो ही नहीं सकता कि किसी एक सदस्य की सभी बातों को समवेत स्वर में सही कहा जा सके । किसी विशिष्ट व्यक्ति के साथ अन्य सदस्यों की यदाकदा असहमति हो यह किसी भी लोकतांत्रिक दल के लिए स्वाभाविक है । राहुल गांधी की गलतियों को कांग्रेसजन कभी भी सहजतया क्यों नहीं स्वीकारते ?

तथ्यहीन उद्गार

मेरा राहुल गांधी के प्रति जो नजरिया है उसके कारण स्पष्ट करना चाहूंगा । हाल में इंदौर की रैली में उन्होंने कुछ बातें कहीं जो हास्यास्पद अथवा आपत्तिजनक, और उनकी अपर्याप्त जानकारी के द्योतक मानी जा सकती हैं । मैं उदाहरण पेश करता हूं:

(1) राहुल गांधी भाजपा का नाम नहीं लेते हैं, किंतु जब वे सांप्रदायिक ताकतों की बात करते हैं तो इशारा भाजपा की ओर ही रहता है । उनकी बातों से लगता है कि देश में सभी दंगे भाजपा ही कराती है । क्या कभी यह बातें प्रमाणित हुई हैं ? इन दंगों के दौरान केंद्र सरकार ओैर राज्य सरकारें कहां सोई रहती हैं ? और जब शिया-सुन्नी दंगे होते हैं तो क्या वे भी भाजपा-प्रायोजित होते हैं ? देश के तथाकथित “सेक्युलरवादी दल” सभी दंगों के लिए आंतरिक कारणों के तौर पर भाजपा और बाह्य कारणों के तौर पर पाकिस्तान की “आई.एस.आाई.” को जिम्मेदार मानते हैं बिना असंदिग्ध प्रमाणों के ।

(2) राहुल गांधी दंगों के संदर्भ में बिना नाम लिए भाजपा को समुदायों के बीच वैमनस्य पैदा करने और मारकाट मचाने वाली पार्टी कहते हैं । उसी रौ में वह अनर्गल बोल जाते हैं: “इन लोगों ने मेरी दादी को मारा, मेरे पिता को मारा, और अब मुझे भी मार डालेंगे ।” कौन हैं उनके वक्तव्य के “ये लोग” ? किसकी ओर इशारा है उनका ? क्या उनको यह मालूम नहीं कि उनके दादी-पिता किसी दंगे के शिकार नहीं हुए । वे कुछ हद तक अपनी ही गलतियों से मारे गये । कैसे ? क्या वे इस हकीकत को नहीं जानते कि उनकी दादी, इंदिरा गांधी, ने सेना को अमृतसर के स्वर्णमंदिर में घुसकर भिंडरावाले का सफाया करने का आदेश दिया था ? सिखों की दृष्टि में यह मंदिर को अपवित्र करने की घटना थी । इससे दो-चार सिख उनकी जान के दुश्मन बन गये थे । कहा जाता है कि उनकी दादी को अपनी सुरक्षा में समुचित तबदीली की सलाह दी गयी थी जो उन्होंने नहीं मानी । उसी तंत्र से एक सिख ने गुस्से में उनकी जान ले ली थी ? कौन जिम्मेदार था ? इसी प्रकार श्रीलंका में तमिल उग्रवाद के विरुद्ध वहां की सरकार को उनके पिता, राजीव गांधी, ने भारतीय सेना की टुकड़ी भेजी थी । कई तमिलों की नजर में यह उनके तमिल-बंधुओं के विरुद्ध कदम था । और उन्हीं में से एक ने मानव-बम बनकर उनकी जान ले ली ? भाषण हेतु मंच पर वे लोग पहुंचे कैसे ? किसकी गलती थी ?

(3) मुजफ्फरपुर के हालिया दंगों के सिलसिले में जो बात राहुल गांधी ने कही उसे मैं अक्षम्य और आपत्तिजनक मानता हूं । क्या कहा यह आरंभ में दिए न्यूज-क्लिप से स्पष्ट है । राहुल गांधी को किस खुफिया अधिकारी ने कथित बातें बताईं और किस हैसियत से ? क्या खुफिया अधिकारी इतने मूर्ख होते हैं कि सरकार का हिस्सा न होते हुए भी राहुल गांधी को खुफिया जानकारी दें ? इसके अलावा उसने अपने उच्चाधिकारियों को समुचित रिपोर्ट दी ? नहीं ! इसके अलावा यह कहना कि पाकिस्तान की “आई.एस.आाई.” वहां के 10-15 नौजवानों के संपर्क में है कहां तक सही है ? क्या वे सच बोल रहे हैं या जनता को महज मूर्ख बना रहे हैं ? देश में अनेक जन उनको भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं । तब क्या उन्हें सोच-समझकर नहीं बोलना चाहिए ?

राहुल गांधी: प्रधानमंत्री बन गये तो?

मुझे लगता है कि राहुल गांधी यदि सचमुच में प्रधानमंत्री बन गये तो इस देश का बंटाधार ही होगा ! जो व्यक्ति ऐतिहासिक तथ्यों को न जानता हो, जो भावनाओं में बह जाता हो तथा अपने परिवार का गुणगान करने लगता हो, और शब्दों को नापतौलकर न बोल पाता हो, वह क्या सफल प्रधानमंत्री हो सकेगा ? ऐसे व्यक्ति को समुचित सलाह देने वाले साथ हों तो समस्या नहीं होगी । लेकिन आज की कांग्रेस की यह परंपरा बन चुकी है कि राहुल गांधी कुछ गलत भी बोल जाएं तो उसका भी कांग्रेसजन एक सुर से समर्थन करते हैं । उनकी कोई भी बात न काटी जाए यह उस दल की नीति बन चुकी है । तात्पर्य यह है कि तब उस दल में कौन होगा जो सही सलाह दे ?

मैं भाजपा का पक्षधर नहीं हूं । उसे मैं वोट नहीं देता । दरअसल मैं पिछले 10-12 सालों से किसी भी दल के प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करता । मेरी दृष्टि में सब एक ही थैली के चट्टेबट्टे हैं । जब मौका मिले आपस में गले लग जाते हैं, और जरूरत पड़े तो एक-दूसरे के विरुद्ध अनापशनाप बोल जाते हैं । येनकेन प्रकारेण सत्ता हथियाना उन सभी का लक्ष्य बन चुका है । भाजपा सत्ता में आ जाए तो भी कोई मौलिक शासकीय परिवर्तन नहीं होने का ।

मेरी ये बातें भाजपा का पक्ष लेकर नहीं कहीं गई हैं । मैं तो राहुल गांधी की अनर्गल बातों की आलोचना कर रहा हूं । – योगेन्द्र जोशी