अपने प्रधानमंत्री – भ्रष्ट हैं, ईमानदार हैं, भ्रष्ट हैं, ईमानदार हैं, …! सच क्या है?

देशव्यापी भ्रष्टाचार

पिछले कुछ समय से सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार की चर्चा जोरों पर है । देश की राजनीति पर भ्रष्टाचार के काले दाग पूरी चमक के साथ लोगों को नजर आ रहे हैं । कोई भी राजनैतिक दल स्वयं को साफ और दूसरों को दागदार कहने में नहीं हिचक रहा है । इस माने में पूरी बेशर्मी छाई हुई है देश भर में । आप किसी से पूछिए कि आपकी पार्टी में भ्रष्ट नेता भरे हैं तो वह सिरे से नकार देगा, और लगे हाथ दूसरे दलों में बेईमानों का चिट्ठा खोलने बैठ जाएगा । मान लें कि आप राह चलते किसी से पूछते हैं, “जनाब, दशाश्वमेध घाट के लिए किधर से रास्ता जाता है?” (दशाश्वमेध घाट वाराणसी नगरी की उत्तरवाहिनी गंगा – उल्टी, दक्षिण से उत्तर की ओर प्रवाहित – के तट पर अवस्थित है ।) और आपको जवाब मिलता है, “कैंट रेलवे स्टेशन यहां से करीब 7 किलोमीटर है ।” आपको कैसा लगेगा? आप माथा पकड़कर चलते बनेंगे । कुछ ऐसा ही है रवैया आपने राजनेताओं का । आप उनके भ्रष्टाचार की बात पूछेंगे और वे किसी और की बात शुरू कर देंगे । सवाल का संक्षिप्त और सटीक (टु द पॉइंट) उत्तर अपने राजनेताओं से मिलने का नहीं ।

मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं कि इस देश में भ्रष्टाचार है भी कहीं? क्या ये कोरी कल्पना तो नहीं है । बचपन में संध्याकाल के बाद जब अपने गांव में अंधेरा छा जाता था तो मेरी मां कहती थीं कि बाहर मत जाना बाघ-भालू खा जाएंगे या भूतप्रेत उठा ले जाएंगे । उस काल में मां की बातें सच लगती थीं । घर के एक कोने में बिस्तर पर दुबक कर बैठ जाते थे । बाद के वर्षों में, जब उम्र के साथ अक्ल ने भी धीमी दौड़ लगाई, तब समझ में आया कि वे डराती भर थीं । मुझे लगता है कि बस यही बात आजकल के बहुचर्चित भ्रष्टाचार के बारे में सही है । पता नहीं क्यों राजनैतिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की बातें जोरशोर से उठाई जा रही हैं, जब कि आजतक दो-चार अपवादों को छोड़ कहीं कोई राजनेता अपराधी सिद्ध नहीं हो पाया । कहीं कोई साक्ष्य मिलें तब तो ! जब भी कोई तथाकथित भ्रष्ट राजनेता कुछ दिनों या हफ्तों की पिकनिक पर तिहाड़ जेल भेजा जाता है, तब वह पूरी ताकत से चीखता है कि वह निरपराध है और उसे किसी साजिश के तहत फंसाया जा रहा है । मैं यही देखता आ रहा हूं कि उसकी बात अंत में सही निकलती है । वह पूरे स्वास्थ्यलाभ के साथ तिहाड़ से लौटता है ।

मैं सोचता हूं कि जिस देश में यत्र तत्र सर्वत्र चमत्कार ही चमत्कार देखने को मिलते हों वहां भ्रष्टाचार की घटनाएं भी कहीं दैवी चमत्कार तो नहीं होती हैं । घटना तो होती है, लेकिन कोई मनुष्य उसे अंजाम नहीं देता है । जिस देश में छुन्नूलाल जैसा एकदम लापरवाह आदमी, जो किसी लायक न हो, श्री श्री निर्मल बाबा (जिनकी शोहरत टीवी चैनलों ने तीनों लोकों में फैला दी है) की कृपा से मुंहमांगा कुछ भी पा जाए, उस देश में असंभव-सा लगने वाला कुछ भी घटित हो सकता है । किसी की हत्या हो जाए पर कोई हत्यारा न हो, किसी युवती के साथ दुष्कर्म हो पर कोई दुष्कर्म करने वाला न हो, किसी के घर में करोड़ों की धनराशि जमा हो जाए पर उसे पता तक न चले, या ऐसी अन्य घटनाएं घट जाएं तो आश्चर्य की क्या बात है? ऐसे चमत्कार तो हो ही सकते हैं । तब किसी को जिम्मेदार कैसे ठहरा सकते हैं?

मौजूदा प्रधानमंत्री कितने ईमानदार?

अब मैं अपने सम्मानित प्रधानमंत्री की बात पर आता हूं । उनके बारे में अपनी राय मैंने अन्यत्र व्यक्त की है । दुनिया क्या कहती है, या समाचार माध्यमों के अनुसार दुनिया क्या सोचती है, इसे लेकर कुछ कहना है मुझे भी । उन्हें आज तक सर्वाधिक ईमानदार राजनेता कहा जाता रहा है । क्रांग्रेस दल में कोई बेईमान हो या न हो डा. मनमोहन सिंह तो बेईमान हो ही नहीं सकते हैं ये राग क्रांग्रेस के विरोधी जन भी अभी तक अलापते रहे हैं । यह भी कहा जाता है कि उनकी साख विदेशों में बहुत अच्छी है । लेकिन अब एक-एक कर कुछ लोग उनकी तरफ अंगुली उठाने लगे हैं । वे लोग ऐसा क्यों कर रहे हैं? कल तक तो वे भी प्रशंसक थे पर अब क्या हो गया? माननीय अण्णाजी भी उन्हें ईमानदार कहते आये हैं, लेकिन अब उन्हें भी शंका हो रही है । यह सब मुझे स्वयं में चमत्कार नजर आता है । चमत्कारों के देश में कब कौन कहां भ्रमित हो जाए यह कह पाना कठिन है ।

मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि किसकी बात सच है किसकी झूठ यह पता लगाना मरणशील मनुष्य के लिए असंभव है । पूरी स्थिति मरुभूमि में भटक रहे यात्रिक की सी है जिसे दूर कहीं जलाशय के रूप में मृग-मरीचिका के दर्शन होते हैं, लेकिन जिसके पास वह सामर्थ्य नहीं रह गयी हो कि वह उस स्थल पर जाकर स्वयं देख सके कि वह भ्रम है या यथार्थ । भ्रष्टाचार के मामले में भी हम सब भ्रम में जी रहे हैं । आप ही बताएं कि सीबीआइ जैसी संस्था कभी कहती है सच क्या है यह पता चल गया; फिर कहती है सच तो कुछ और ही है (याद करें हेमराज-आरुषी कांड)। कभी वह सच की तलाश में बर्षों इस धरती पर भटकती है और सच है कि दूर, और दूर, होता जाता है (बोफार्स का मामला याद है?)। सत्य का ज्ञान बड़े-बड़े महात्माओं तक को नहीं हो सका है, तब हम जैसे नाचीजों की बात ही क्या है ।

हमारे प्रधानमंत्री जी सदा यही कहते रहे हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता है कि कहीं कोई बेईमानी भी कर रहा है । वे तो गांधीजी के तीन बंदरों की नीति में आस्था रखते हैं – न बुरा देखो, न बुरा सुनो और न हि बुरा कहो । इतना ही नहीं वे चमत्कारों में आस्था रखते होंगे ऐसा मैं मानता हूं । शासन में भ्रष्टाचार है यह तो वे स्वीकारते हैं, लेकिन साथ में यह भी मानते हैं कोई भ्रष्ट नहीं है । उनकी नजर में भ्रष्टाचार दैवी आपदा है ।

राजनैतिक संन्यास की बात

अब मीडिया में यह खबर भी आ गई है कि प्रधानमंत्री जी ने टीम अन्ना के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि यदि उन पर आरोप सिद्ध हो गए तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे । उम्र को देखते हुए संन्यास तो उन्हें वैसे भी ले लेना चाहिए । दुबारा प्रधानमंत्री बनने के उनके आसार अब मुझे तो दिखते नहीं । यदि 2014 में यूपीए सत्ता में न लौट पाई तो वे प्रधानमंत्री कैसे बनेंगे? यदि संयोग से यूपीए फिर जीतकर आ गई तो अब के बारी राहुल गांधी की होगी । दोनों ही स्थितियों में कुर्सी मिलने से रही । चुनाव वे लड़ेंगे नहीं तो संन्यास ही बचा रहेगा । वैसे भी कांग्रेस के भोंपू श्री दिग्विजय सिंह चाहते हैं कि उम्रदराज लोग अब रिटायर हो जाएं ।

जहां तक उन पर लगे आरोपों का सवाल है उनकी जांच होगी भी? जांच कौन करेगा? सभी जांच एजेंसियां तो सरकार के अधीन होती हैं । सीबीआइ के हाल सभी जानते हैं । जब जांच का काम सालों-साल चलता रहे और आरोप झूठ या सच सिद्ध न हो पाएं तब आरोपी साफसुथरा होने का दावा करता रहेगा ।

“न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी ।”

समस्या इस बात की भी है कि बेईमानी की कोई स्पष्ट परिभाषा कहीं नहीं मिलती है । आप अगर घूस नहीं लेते या इसी प्रकार का कोई अवैधानिक लाभ नहीं उठाते, लेकिन उन दायित्वों का निर्वाह नहीं करते जिसे आपने स्वीकारी हैं तो आप ईमानदार हैं या नहीं? देश के जननेताओं का जवाब मौके की नजाकत पर निर्भर करता है । अपने उत्तर प्रदेश (उल्टा प्रदेश?) में पूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी और अपने ‘हीरो’ की मूर्तियां पार्कों में करोड़ों रुपये में लगवाईं । मामला कोर्ट में पहुंचा तो अदालत ने कहा जब कैबिनेट ने यही निर्णय लिया है तो इसे गलत कैसे कहें । जब पार्टी में सब ‘यस मिनिस्टर’ शैली में हां में हां मिलाने वाले ठुंसे पड़े हों, आंतरिक लोकतंत्र जैसी चीज न हो, तब विरोध करेगा कौन । निष्कर्ष: ‘निर्णय एकदम सही था’ । आंख मूंदकर जहां उल्टा-सीधा होने दिया जाए वहां किसे ईमानदार कहें?

मेरी समझ में नहीं आता है कि ‘हमारे प्रधानमंत्री ईमानदार हैं’ का राग सब अलाप रहे हैं । अन्य मंत्री बेईमान हैं क्या? यदि नहीं तो अकेले प्रधानमंत्री की ही इतनी तारीफ क्यों?

मैं सोच नहीं पा रहा हूं कि अपने प्रधानमंत्री को ईमानदार कहूं अथवा बेईमान । – योगेन्द्र जोशी

नोबेल शांति पुरस्कार मानवाधिकार तथा लोकतंत्र समर्थक लिउ जियाओबो को और चीन की नाराजगी

वर्ष 2010 का नोबेल शांति पुरस्कार

इस वर्ष का ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ चीन के 54 वर्षीय लिउ जियाओबो (Liu Xiaobo)  को दिया गया है । विगत 8 अक्टूबर इस बात की घोषणा ‘नॉर्वेजियन नोबेल समिति’ (Norwegian Nobel Committee) द्वारा नार्वे की राजधानी ओस्लो में की गयी । मैंने यह समाचार बीबीसी-हिंदी वेबसाइट पर पढ़ा । यों आज के प्रायः सभी समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक सूचना माध्यमों ने इसकी चर्चा प्रमुखता से की है ।

इस वर्ष के पुरस्कार का समाचार अधिक दिलचस्प एवं महत्त्वपूर्ण है क्योंकि लियाओबो चीन के नागरिक हैं और पिछले कई वर्षों से वे चीन में मानवाधिकार के हनन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रोक के विरुद्ध आवाज उठाने वालों में प्रमुख रहे हैं । 1989 में बीजिंग के तियाननमेन चौक में संपन्न हुई विरोध रैली में उनकी विशेष भूमिका रही थी । पिछले ही वर्ष उन्होंने बहुदलीय शासन व्यवस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में चाटंर-8 नाम का दस्तावेज तैयार किया था, जिसे चीनी सरकार ने अपराध मानते हुए उन्हें 11 साल की कारावास की सजा दे रखी है ।

नाराजगी चीन की

इस पुरस्कार से चीन बेहद नाखुश है । उसने जियाओबो को गंभीर अपराधी कहते हुए नॉर्वे के राजदूत को बुलाया और तुरंत अपना विरोध दर्ज किया । चीन ने आगाह किया है कि नार्वे के साथ उसके संबंध इस पुरस्कर से बिगड़ सकते हैं । लेकिन नार्वे ने स्पष्ट किया है कि नोबेल समिति एक स्वतंत्र संस्था है, और वह उसके निर्णयों को प्रभावित नहीं कर सकता । कहा जाता है कि चीन ने उस समिति पर काफी दबाव डाला था कि जियाओबो को पुरस्कर न दिया जाये । दरअसल उसकी नजर में, और कदाचित वहां के राष्ट्रवादी जनता की नजर में, यह पुरस्कार चीन को नीचा दिखाने और उसे निर्दय देश के रूप में पेश करने का प्रयास है ।

ऐसा प्रतीत होता है कि इस पुरस्कार से विश्व भर में जियाओबो के पक्ष में जनमत बनने लगा है । हांक-कांग में उनके पक्ष में आवाज उठने लगी है । अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी उनको रिहा किए जाने की बात कही है । राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून के अनुसार यह पुरस्कार विश्व भर में मानवाधिकार स्थापना और सांस्कृतिक परिष्करण की आवश्यकता को रेखांकित करता है । वस्तुतः विश्व भर के राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया सकारात्मक रही है । जियाओबो की पत्नी लिउ जिया पुरस्कार से अतीव संतुष्ट है और उसने उन सभी की प्रशंसा की है जो जियाओबो के पक्ष में बोलते रहे हैं । अब नई खबर है कि उसे सरकार बीजिंग छोड़कर छोटे शहर जिनझाओ (Jinzhou), जहां जियाओबो जेल में हैं, जाने को विवश कर रही है

लोकतंत्र मानवाधिकार की गारंटी नहीं

उक्त पुरस्कार दो खास बातों को ध्यान में रखते हुए दिया गया हैः पहला शासन के स्तर पर मानवाधिकार हनन का विरोध, और दूसरा लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के पक्ष में जनमत बनाना, ताकि चीन की एकदलीय व्यवस्था समाप्त हो । मैं व्यक्तिगत तौर पर मानवाधिकार के पक्ष में हूं और उन सभी को

मेरा समर्थन है जो इस दिशा में सक्रिय हैं । किंतु मैं इस बात पर जोर डालता हूं कि मानवाधिकार का बहुदलीय लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था से कोई सीधा रिश्ता नहीं हैं । यह कोई गारंटी नहीं है कि ऐसी व्यवस्था मानवाधिकार के लिए समर्पित हो । यह भी जरूरी नहीं है कि राजशाही अथवा एकदलीय शासन-पद्धति में मानवाधिकारों का उल्लंघन हो ही । वस्तुतः बहुदलीय लोकतंत्र सभी मौकों पर सफल रहेगा यह मानना गलत है । अपना देश भारत इस बात का उदाहरण पेश करता है कि लोकतंत्र यदि अयोग्य हाथों में चला जाए तो वह घातक सिद्ध हो सकता है । अपने देश में मानवाधिकार हनन आम बात है । लेकिन चूंकि उसके शिकार कमजोर और असहाय लोग होते हैं और उसमें बलशाली लोग कारण होते हैं, अतः वे बखूबी नजरअंदाज कर दिए जाते हैं । हमारे जनप्रतिनिधि जिसको चाहें उसे परेशान कर सकते हैं, प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारी किसी भी निरपराध को सलाखों के पीछे भेज सकते हैं, न्यायिक व्यवस्था कमजोरों को न्याय नहीं दिला सकती है, और सरकार अपने विरोधियों पर कभी भी डंडे बरसा सकती है, इत्यादि । ये सब मानवाधिकार के विरुद्ध होते हैं, किंतु जांच-पड़ताल का कार्य करने वाले लीपापोती करके ‘जो हुआ’ उसे ‘नहीं हुआ’ घोषित कर देते हैं ।हमें यह भी समझना चाहिए कि पिछले तीस वर्षों में चीन ने भिभिन्न क्षेत्रों में जो प्रगति की है, और कभी भारत से पिछड़ा रहा वह देश अब कहीं आगे निकल चुका है, उसके पीछे उसका अनुशासित एकदलीय शासन है । यदि भारत की तरह का लोकतंत्र वहां भी स्थापित हो जाए तो उसकी भी हालत बदतर हो जाएगी । हमारे यहां के लोकतंत्र में स्वतंत्रता का अर्थ है अनुशासनहीनता, निरंकुशता, नियम-कानूनों के प्रति निरादर भाव, आदि-आदि । हमारे राजनीतिक दलों के कोई सिद्धांत नहीं हैं, केवल सत्ता हथियाना और उस पर टिके रहने के लिए हर सही-गलत समझौता स्वीकारना उनकी प्रकृति बन चुकी है । क्या लोकतंत्र की हिमायत करते समय ऐसी बातों पर ध्यान दिया जाता है ? मैं इस पक्ष का हूं कि लोकतंत्र का समर्थन आंख मूंदकर नहीं किया जा सकता है, बल्कि यह देखना निहायत जरूरी है कि संबंधित जनता और राजनेता लोकतंत्र की भावना को सही अर्थों में स्वीकारते हैं और उसके प्रति समर्पित हैं कि नहीं ? वास्तव में बुद्धिजीवी उसकी हिमायत महज इसलिए करते हैं कि आजकल लोकतंत्र का पक्ष लेना एक फैशन बन चुका है । कैसा लोकतंत्र, किसके द्वारा प्रबंधित लोकतंत्र, इन बातों पर विचार किए बिना ही वे उसकी हिमायत करते हैं ।

मेरी मान्यता है कि भारत, चीन, पाकिस्तान, नेपाल आदि इस क्षेत्र के देश लोकतंत्र के लिए ढले ही नहीं हैं । इन देशों में लोकतंत्र की सफलता संदिग्ध है/रहेगी ।

और अंत में

इस बार के ‘नोबेल शांति पुरस्कार’ की जानकारी लेते समय मुझे पता चला कि यह पुरस्कार नॉर्वे की राजधानी ऑस्लो में दिये जाते हैं, और पुरस्कार के चयन का कार्य ‘नॉर्वेजियन नोबेल इंस्टिट्यूट’ (Norwegian Nobel Institute) में अवस्थित ‘नॉर्वेजियन नोबेल समिति’ (Norwegian Nobel Committee) द्वारा किया जाता है । अन्य सभी पुरस्कार-प्राप्त-कर्ताओं का चयन और उन्हें प्रदान करने का कार्य स्वेडन की राजधानी स्टॉकहोम में ही ‘नोबेल पुरस्कार समिति’ द्वारा किया जाता है । आल्फ्रेड नोबेल, जिनके नाम पर यह पुरस्कार दिये जाते हैं वस्तुतः नॉर्वे के थे, किंतु उनका कार्यक्षेत्र प्रमुखतया स्वेडन ही रहा । अपनी वसीहत में लिख गये थे शांति पुरस्कार की चयन-प्रक्रिया आदि नॉर्वे में ही संपन्न होवे । नॉर्वेजियन नोबेल इंस्टिट्यूट के निदेशक गायर लुंडस्टाड (Geir Lundestad) ने पुरस्कार के संदर्भ में बताया है कि इस बार पुरस्कार के लिए प्रस्तावित नामों की संख्या 237 थी, जो विगत सभी वर्षों की तुलना में सर्वाधिक है । इनमें 38 संस्थाओं के नाम भी शामिल थे । – योगेन्द्र जोशी

(लोकतंत्र की व्यथाकथा, एक:) अब वोट नहीं डालता मैं

एक समय था जब मैं लोकसभा एवं विधानसभा चुनावों में सोत्साह मतदान करता था । मुझे ठीक-ठीक स्मरण नहीं कि मेरा नाम मतदाता सूची में कब सम्मिलित हुआ होगा । मेरा अनुमान है ढाई-तीन दशक पूर्व से मैं मतदान करता आया हूं । बर्षों पहले मतदान प्रक्रिया भरोसेमंद नहीं थी । मैं पाता था कि सूची में अपना नाम किसी वर्ष रहता था तो किसी वर्ष उससे गायब मिलता था । इससे बड़ी समस्या यह होती थी कि मतदान केंद्र पहुंचने पर पता चलता था कि मेरे नाम पर तो कोई अन्य व्यक्ति मतदान कर चुका है । उन दिनों ऐसा होना आम बात थी । अतः सावधानी बरतते हुए आरंभ में मतदान कर लेना ही सुरक्षित होता था ।

बाद के वर्षों में निर्वाचन आयोग में कई सुधार और परिवर्तन हुए, जिससे पूरी प्रक्रिया काफी हद तक साफ-सुथरी तथा भरोसेमंद होने लगी । परिवर्तन एवं सुधार का सिलसिला मेरे आकलन में निर्वाचन आयुक्त शेषन के कार्यकाल में सार्थक स्तर पर आरंभ हुआ और कमोबेश अभी चल रहा है । मेरे मत में हाल के वर्षों में मतदाता के लिए परिचय-पत्र या उसके तुल्य मान्य पहचान-पत्र की अनिवार्यता से और सुधार हुआ है तथा फर्जी मतदान के मामले काफी घट गये हैं । दूसरे के नाम पर मतदान के मामलों में अब तक पर्याप्त कमी आ चुकी होगी ऐसा मेरा सोचना है । ‘बूथ-कैप्चरिंग’ भी कम हो गयी है ।
मैं किसी भी राजनीतिक दल का पक्षधर नहीं रहा हूं । इस समय मैं इतना ही दावा कर सकता हूं कि अलग-अलग मौकों पर मैंने भिन्न-भिन्न दलों के प्रत्याशियों को मत दिया होगा । एक समय था जब मेरा झुकाव कुछ हद तक बीजेपी यानी भारतीय जनता पार्टी की ओर था । तब उस दल के नेता ‘पार्टी विद् अ डिफरंस’ का नारा गाते रहते थे । मैं समझता हूं कि उस काल में कई लोग मेरी ही भांति रहे होंगे जो उनके इस नारे से भ्रमित हुए होंगे । एक दो बार के चुनावों बाद मेरा उक्त दल से मोहभंग हो गया । मैंने कांग्रेस के प्रत्याशियों को भी कभी न कभी मत दिया होगा । ठीक-ठीक याद नहीं, फिर भी सोचता हूं कि सपा अर्थात् समाजवादी पार्टी के हक में भी कभी न कभी मत दिया ही होगा । इतना अवश्य है कि बसपा यानी बहुजन समाजवादी पार्टी मेरे लिए ‘अछूत’ बनी रही है और ऐसा अकारण नहीं है । ऐसा क्यों इस बारे में अभी नहीं पर बाद में अवश्य कुछ लिखूंगा ।

जैसे-जैसे अपने देश की जनतांत्रिक व्यवस्था का मेरा अनुभव बढ़ता गया, मुझे विश्वास होने लगा कि आप किसी भी दल के प्रति विश्वास जतायें कोई खास अंतर नहीं पड़ता । मैं नेहरु युग से भी परिचित रहा हूं, यद्यपि तब मतदाता सूची में मैं शामिल नहीं था । मुझे उन दिनों की राजनीतिक स्थिति का कुछ-कुछ अंदाजा है । इंदिरा युग तक मैं वयस्क हो चुका था । मैं स्व. लालबहादुर शास्त्री और गुलजारीलाल नंदा की कार्यशैली को आज भी पूरी तरह नहीं भूला हूं । उन दिनों से आज तक के अपने देश के राजनैतिक सफर पर जब मैं दृष्टि डालता हूं तो यही पाता हूं कि राजनीति में लगातार गिरावट आती गयी है और यह गिरावट रुकने वाली नहीं है । राजनेता स्वच्छंद, निरंकुश और अनुशासनविहीन होते जा रहे हैं । पूरे प्रशासनिक तंत्र को वे अपने हितों के अनुरूप ढालते जा रहे हैं । राजनीतिक दलों के न कोई सिद्धांत हैं और न ही उनकी कोई विश्वसनीयता । इन सब बातों के कारण मेरा मौजूदा चुनाव से ही मोहभंग हो चुका है ।

पिछले कुछ समय से मैंने चुनावों के प्रति नकारात्मक रवैया अख्तियार कर लिया है । हालिया समय में जब तक कागज के मतपत्रों का चलन था, मैंने जानबूझ कर अमान्य मत डालना शुरू कर दिया था, ताकि मेरे नाम पर कोई अन्य मतदान न कर सके और स्वयं मेरा नकारात्मक मत (negative vote) रहे । दुर्भाग्य से हमारी चुनावी प्रणाली में नकारात्मक मत की व्यवस्था नहीं है । फलतः अमान्य मत का सहारा ही मेरे सामने एक विकल्प रहा । अब जब से ‘इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन’ का चलन हो गया है, मेरे लिए स्थिति अधिक कठिन हो गयी है । अब एक बार आप मशीन पर पहुंचे और मतदान अधिकारी ने अपने हिस्से वाला उसका बटन दबाकर आपके वोट की प्रतीक्षा आरंभ कर दी, तो आप को स्वयं कोई न कोई बटन दबाना ही पड़ता है । आपको शेष प्रक्रिया संपन्न करनी ही पड़ती है, जैसा कि मुझे हर अवसर पर बताया गया । निर्वाचन आयोग स्वयं यह अनुभव करता है कि ‘किसी को वोट नहीं’ का विकल्प भी मतपत्र या मतदान मशीन, जो भी इंतजामात हों, पर उपलब्ध होना चाहिए । अभी उस विकल्प के आसार मुझे नहीं दीखते हैं । तब तक के लिए मैं यही कर सकता हूं कि मत डालना ही बंद कर दूं और दुआ करूं कि कोई अन्य मेरे नाम पर मत डालने न पहुंचे । मौजूदा व्यवस्था के पक्षधरों से क्षमा मांगते हुए मैं फिलहाल यही कर रहा हूं । अपने इस रवैये के कारणों के बारे में मैं आगामी आलेखों में कुछ न कुछ लिखूंगा । – योगेन्द्र

कितना फ़र्क़ है अमेरिकी एवं हिंदुस्तानी ‘डिमॉक्रेसी’ में?

पिछली पोस्ट (16 अक्टूबर, 2008: बराक ओबामा, अमेरिकी डिमॉक्रेसी और हिंदुस्तानी लोकतंत्र) में मैंने इसी सप्ताह संपन्न हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की संक्षिप्त चर्चा के साथ अमेरिकी तथा अपने देश की लोकतांत्रिक सोच के अंतर के बारे कुछ टिप्पणियां आरंभ की थीं । आगे प्रस्तुत है उन्हीं के शेष अंश ।

कितने राजनैतिक दल हैं अपने यहां जिनमें आंतरिक लोकतंत्र है । अधिकांशतः सभी एक व्यक्ति की ‘फलां एवं कंपनी’ से अधिक नहीं हैं, जो जब तक चाहे शीर्ष की ‘राजगद्दी’ पर आसीन रहेगा और आवश्यक हुआ तो अपनी संतान की बाकायदा ताजपोशी कर डालेगा । अन्य सब स्वयं उपकृत-से महसूस करते हुए खुशी का इजहार करने लगते हैं । क्या मजाल कि कोई चूं भी कर दे । हो किसी को आपत्ति तो दल से निकलकर अपनी अलग ‘कंपनी’ बना डाले । दल में रहना हो तो ’हाइकमांड’ के वर्चस्व तथा आदेश मानने ही पड़ेंगे । क्या यही है हमारे लोकतंत्र की उपलब्धि ?  (आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें >>)