कोरोना ने लगाई लगाम शराब पै – बेचैन हुए शौकीन

पिछले करीब दो माह से देश लॉकडाउन झेल रहा है। देश भर में कुछ जिले है जहां महामारी का प्रकोप गंभीर है। उन जिलों को रेड ज़ोन यानी लाल क्षेत्र नाम दिया गया है। ये वे क्षेत्र हैं जहां तमाम गतिविधियां थम-सी गई है। अत्यावश्यक कार्य के लिए ही किसी व्यक्ति को घर से बाहर निकलने की अनुमति है। खाद्य पदार्थों की आपूर्ति होम-डिलीवरी से की जा रही है। लेकिन शराब जैसी खूबसूरत चीज की आपूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं की गयी। लॉकडाउन जैसी दशा में घरों में कैद रहने से कोई शख्स जहां उबिया रहा हो वहां गम गलत करने का साधन शराब भी नसीब न हो तो सोचिए बंदे की हालत क्या होगी?

वाह! खुल गयी दुकान

शराब की दुकानों को खोलने की सरकार ने चंद रोज पहले इजाजत क्या दी कि मदिरापान के शौकीनों की जैसे लॉटरी ही खुल गयी। न लॉकडाउन के नियमों का ख्याल किसी को रहा और न ही अपनी तथा अगल-बगल के अन्य जनों के कोरोना से बचाव की चिंता। समाचार माध्यमों ने देश के प्रायः सभी इलाकों के मदिरा विक्रय केन्द्रों के सामने की जिस भीड़ की तस्वीरें पेश कीं उनको शब्दों में बयाँ करना मेरे लिए मुश्किल है।

शराब को लेकर जान तक दाँव पर लगाने वालों को देख मुझे बीते जमाने के अपने अनुभवों की याद हो आई। किसी को गलतफहमी न हो सो इस बाबत बता दूं कि मैं शराब का शौकीन नहीं हूं और न कभी पहले रहा। लेकिन उसे छुआ है और पिया भी है, नियमतः तो नहीं बस यदा-कदा। इसे सौभाग्य कहें या दुर्भाग्य – आप जो ठीक समझें – अपने को जो अड़ोसी-पड़ोसी, यार-दोस्त, सहकर्मी, नाते-रिश्तेदार, मिले वे भी इस खूबसूरत पेय का शौक नहीं अपना सके। इतने सब के बावजूद मैं इसका अंदाजा लगा ही सकता हूं कि शराब के बिना क्या गत होती होगी किसी शौकीन की, शायद “जल बिन मीन” की सी।

जैसा कह चुका हूं मैंने शराब का आस्वादन किया है। शराब का ही नहीं और व्यसनों का भी अनुभव लिया है। बीड़ी-सिगरेट पी रखी है; पान गुटके का सेवन भी कर रखा है, बहुत कुछ जिज्ञासावश, कुछ तो बचपन में ही। कब कौन-सा व्यसन दिमाग में आया और फिर ग़ायब हुआ इसे बताने से पहले यह बता दूं कि सब कुछ अनुभव करने के बाद वयस्क होते-होते इसी निष्कर्ष पर पहुंचा कि नशे की किसी चीज का कोई गंभीर मकसद नहीं, कोई आकर्षण नहीं, फिजूलखर्ची से आगे सब निरुपयोगी ही हैं, सभी मनुष्य की कमजोरी को प्रबिंबित करते हैं, आदि-आदि। जब कभी कोई कहता है कि फलां आदत छूट नहीं रही है तो मेरी टिप्पणी यही होती है कि जब आप छोड़ना ही न चाहें तो छूटेगी कैसे। कोई दूसरा तो आदत के लिए मजबूर कर नहीं रहा होगा। नशा आप शुरू करें तो आप ही को छोड़ना होगा। इत्यादि।

जैसा कह चुका हूं बीड़ी-सिगरेट, गुटखा, शराब-बियर का आस्वादन मैंने भी किया है, लेकिन जिंदगी के अलग-अलग वर्षों में और अल्प अंतरालों के लिए। लेकिन इन नशों का गुलाम बनने से बचता रहा। मौजूदा कोरोना-काल की उपर्युल्लिखित घटना को लेकर मन हुआ कि अपना अनुभव साझा करूं।

आरंभ इस खुलासे से करता हूं कि मेरा जन्म उत्तराखंड के पर्वतीय अंचल कुमाऊं के एक छोटे-से गांव में हुआ था, आठ-नौ परिवारों का गांव। सभी एक ही पूर्वजों की संतानें थे और आपस में ताऊ-ताई, चाचा-बुआ, भाई-भतीजे जैसे घनिष्ठ रिश्तों से जुड़े थे। गांव में लगभग १०-१२ बच्चे रहे होंगे और उनमें से हम-उम्रों की आपस में दोस्ती सहज तौर पर हुई रहती थी। मैं सन् १९५५ के आसपास की बात कर रहा हूं जब मैं प्राथमिक पाठशाला में पढ़ता था।

बीड़ी का चस्का

मेरा एक दोस्त था। हमें एक बार विचार आया कि क्यों न बीड़ी पी जाए। बड़े लोगों को पीते देखते थे तो अपने को भी इच्छा हो जाती थी। लेकिन बीड़ी मिले कहां से। सो बड़ों को ताके रहते थे और उनके बुझाए हुए बीड़ी के टुकड़े उठा लाते थे और उन्हें सुलगा के पीते थे। पीते क्या थे मुंह में धुआं भरकर हवा में महज फूंक मारते थे। इतना ही हमारे लिए काफी था। यह सब चोरीछिपे होता था। फिर भी पता नहीं कैसे एक दिन मेरी बड़ी बहिनजी तक बीड़ी की गंध पहुंच गयी और वह हमारे सामने अवतरित हो गईं। मेरा मुंह खुलवाकर सूंघा और लगाई डांट। भागे हम वहां से।

इतने से कोई असर हम पर पड़ने वाला नहीं था। हमने किसी प्रकार दोएक रुपये का इंतिजाम किया और ले आये दुकान से ताजा “घोड़ा छाप” बीड़ी का बंडल और “विम्को की एक्का छाप” दियासलाई की डिब्बी। इन्हें हमने अपने घर के निकट सीड़ीनुमा एक खेत की दीवाल के कोटर में छिपा दिया था। (पर्वतीय क्षेत्र में आम तौर पर सीड़ीनुमा खेत ही मिलते हैं।) रोज शाम को हम बीड़ी का आनंद लेने चुपचाप आते थे। लेकिन एक दिन मेरे दोस्त की माताजी को पता चल गया। वे कहीं आसपास काम कर रही थीं और कमवक्त बीड़ी की गंध उन तक पहुंच गयी। वे पहुंची पास और ऐसी डांट लगाई हमें कि बीड़ी-सिगरेट का भूत सर से उतर गया।

समय बीतता गया और मैं प्राथमिक (प्राइमरी) शिक्षा पार कर माध्यमिक (जूनियर) शिक्षा के लिए गांव से बाहर चला गया। उसके बाद मेरी विश्वविद्यालय तक की शिक्षा बाहर ही हुई। समय के उस अंतराल में मुझे किसी प्रकार के व्यसन का न तो ध्यान आया और न ही कोई मौका मिला।

सिगरेट का मजा

स्नातकोत्तर (एम.एससी.) उपाधि पा लेने के बाद मैंने अपने एक सहपाठी एवं मित्र के साथ शोध-पाठ्यक्रम में दाखिला लिया। इसी दौरान हमें दो चीजों का शौक चर्रायाः पहला था दाढ़ी रखना और दूसरा था सिगरेट पीना। दाढ़ी तो तब से बरकरार है; लेकिन सिगरेट साल भर से कम ही चल पाई। मैं दिन भर में ५-१० सिगरेट से अधिक नहीं पीता था। एक बार मैं एक-डेढ़ माह के लिए बेंगलूरु गया था। तभी एक दिन रात में मुझे बेचैन करने वाला सपना दिखा सिगरेट से जुड़ा हुआ। बस उसके बाद मैंने सिगरेट छोड़ दी। मैंने इस घटना पर आधारित लघुकथा अन्य ब्लॉग में लिखी थी।

ब्रैंडी-अंडे का पेय

शोध पाठ्यक्रम से अर्जित डाक्टरेट की उपाधि पाकर मैं वाराणसी आ गया और वहीं बी.एच.यू. में बतौर शिक्षक मैंने नियुक्ति ले ली। वह मेरी युवावस्था का काल था। मेरी उम्र पच्चीस-छब्बीस वर्ष की रही होगी। मै शरीर से सदा ही दुबला-पतला रहा हूं। एक बार मेरे मन में थोड़ा-बहुत मोटा होने का विचार आया। एक वरिष्ठ साथी ने सलाह दी कि मैं अंडे की जर्दी-अलब्युमिन का ब्रैंडी (brandy) के साथ मिलाकर सेवन करूं। क्या स्वाद रहा होगा इसका अनुमान लगा सकते हैं। करीब महीना भर सेवन किया होगा। शरीर या मस्तिष्क कहीं पर भी उसका असर नहीं पड़ा। छोड़ दिया। किसी अल्कोहॉलीय पेय का यह प्रथम अनुभव था मेरा।

वाराणसी में पान का चलन बहुत अधिक है। मैंने भी इसका आनंद उठाने की कोशिश की। लेकिन पान-सुपाड़ी मुझे रास नहीं आई। जब भी खाऊं गला सूख-सा जाता था, थूक निगलने में परेशानी होने लगती, कान की लौ गरम हो उठतीं। मैंने पान खाना ही बंद कर दिया पूरी तरह। बनारस में रहने के बावजूद पान से दूर ही रहा।

अल्कोहॉलीय पेय

अल्कोहॉलीय पेय का दूसरा अनुभव मेरा शेरी (sherry) आस्वादन का है। एक बार मैं शिलांग (मेघालय) किसी गोष्ठी में भाग लेने गया था। वहां स्थानीय स्तर पर निर्मित शेरी के मुझे दर्शन हुए। एक बोतल खरीद ले आया। वाराणसी लौटकर उसका भी सेवन किया दो-चार दिन थोड़ा-थोड़ा करके।

इसके बाद का अनुभव मेरा इंग्लैंड का है जहां मैं दो वर्ष के लिए शोधवृत्ति पर गया था (१९८३-१९८५)। शुरुआत के कुछएक माह मैंने पाकिस्तानी मूल के किसी पंजाबी खान साहब के मकान में किराये पर रहकर बिताए। वे खुद सड़क के पार अपने दूसरे मकान में रहते थे। वे यदाकदा गपशप मारने मेरे पास चले आते थे। उस इलाके में हिंदी-उर्दू बोलने वाला उनको शायद अकेला मैं ही मिला था। वे कभी-कभी “पब” (मयखाना) में बियर पीने की पेशकश करते थे और अपनी वैन से ले चलते थे। मैं एकदम-से मना नहीं करता था और उनकी पेश की हुई एक बियर-गिलास पी लेता था। वे स्वयं दो-तीन गिलास पी जाते थे। सच कहूं तो मुझे कोई मजा नहीं आता था। लेकिन उनका साथ दे देता था। मुझसे एक प्रकार की दोस्ती हो गई थी उनकी।

यह था बियर पीने का मेरा अनुभव। छः-सात माह महीने बाद जब मेरा परिवार भारत से पहुंचा तो मुझे बड़ा आवास किराये पर लेना पड़ा। तब खान साहब का साथ छूट गया और उसी के साथ बियर पीने के मौके भी छूटे।

यूरोपीय समाज तथा वाइन

यूरोपीय देशों में भोजन के समय वाइन (अंगूर से बनी मदिरा) का सेवन आम बात है। मैंने सुना था कि पहले कभी इंग्लैंड जैसे देशों में पानी पीने का चलन नहीं था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। जब विश्वविद्यालय के मेरे शैक्षिक विभाग में भोज का कार्यक्रम होता था जैसे क्रिसमस के मौके पर तो उसमें शराब (वाइन),  कृत्रिम-पेय (सॉफ्ट-ड्रिंक), फलों का रस (फ्रूट-जूस), तथा सादा पानी, सभी उपलब्ध रहते थे। मैं वाइन न लेकर फल-रस पीता था। मुझे याद नहीं कि इंग्लैंड में अपने शेष प्रवास के दौरान मैंने वाइन कभी पी थी या नहीं। भारत लौटने पर शराब जैसी हर चीज से मैंने तौबा कर ली। बस अब चाय-काफी की आदत रह गई।

मैंने लंबे अरसे तक कोई व्यसन नहीं पाला सिवाय सिगरेट के और वह भी साल भर से कम। मैंने किसी में भी वह आकर्षण नहीं पाया जो मुझे उससे जोड़े रखता। जब कोई कहता है कि वह अपनी लत नहीं छोड़ सकता तो मेरा कहना होता कि वह कमजोर आत्मसंयम का व्यक्ति है और सार्थक संकल्प नहीं ले सकता है। – योगेंद्र जोशी