साइकिल में गुन बहुत हैं …

साइकिल में गुन बहुत हैं सदा राखिए संग।

पेट्रोल की जहमत नहीं बदलें जीने का ढंग॥

साइकिल के “गुन-अवगुनों” की बात करने से पहले में यह बताना चाहूंगा कि साइकिल से मेरा रिश्ता कब और कैसे स्थापित हुआ।

पर्वतीय पृष्ठभूमि

मेरा जन्म उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) के सुदूर पर्वतीय क्षेत्र के छोटे-से गांव में तब हुआ था, जब अपना देश भारत (यानी इंडिया) बस स्वतंत्र ही हुआ था। उस काल में वहां सड़कों का जाल नहीं था। निकटतम बस अड्डा पैदल मार्ग से लगभग १७ मील (करीब ३२ कि.मी.) दूर हुआ करता था। वह समय था जब शेर-छटांक, गज-फुट, मील, सोलह आने (६४ पैसे) के अंग्रेजी काल के माप-तौल की इकाइयां चलन में थीं। आज के बच्चे-युवा इनका नाम भी नहीं जानते हों तो ताज्जुब नहीं। मेरे जीवन के शुरुआती १३-१४ वर्ष गांव के माहौल में ही बीते थे। कक्षा ५ तक की आरंभिक शिक्षा भी गांव की ही पाठशाला में हुई थी। हम लोग प्राइमरी स्कूल या प्रारंभिक विद्यालय नहीं कहते थे, भले ही इन संबोधनों से परिचित थे। बिजली, टेलीफोन, रेलगाड़ी, बस, साइकिल, आदि शब्द हम बच्चे सुनते तो थे किंतु ये सब क्या होते होंगे की सही कल्पना नहीं कर पाते थे। उस पर्वतीय क्षेत्र की चढ़ाई-ढलान वाली पगडंडियों पर साइकिल का कोई काम नहीं था। कहीँ-कहीं ३-४ फुट चौडे रास्ते भी होते थे जिन पर खच्चर/घोड़े से सामान या सवारी ढोने का कार्य लिया था। यह सब कहने का तात्पर्य यह है कि आरंभिक किशोरावस्था तक साइकिल का साक्षात्कार मैंने नहीं किया था।

छात्रजीवन और साइकिल

जब गांव से ८-१० कि.मी. दूर के विद्यालय से हाई-स्कूल (१०वीं) की परीक्षा उत्तीर्ण करके जब कानपुर पहुंचा आगे की शिक्षा के लिए तब मेरा साइकिल से असल परिचय हुआ। परिचय ही नहीं विद्यालय आने-जाने के लिए गिरते-पड़ते उसे सीखा भी। और फिर वह अपनी सवारी बन गयी अभी तक के जीवन भार के लिए। अभी तक के जीवन भर के लिए इसलिए कह रहा हूं क्योंकि कल किसी ने देखा नहीं, शारीरिक सामर्थ्य कितनी रहेगी कोई बता नहीं सकता।

यह बताना भी समीचीन होगा कि उस जमाने में तांगा, रिक्शा, बस, और साइकिल ही शहरी आवागमन के साधन होते थे, या फिर पैदल ही रास्ता नापा जाता था। स्कूटर, बाइक और कारें किस्मत वालों के पास देखने को मिलते थे। इनकी उपलब्धता भी बेहद कम थी। शहरों में जाम की समस्या शायद ही कहीं सुनने को मिलती होगी। यही साइकिल मेरे और मेरे सहपाठियों के आवागमन का साधन बना रह एक लंबे समय तक। विश्वविद्यालय तक की शिक्षा लेने और उसके बाद शोधछात्र के तौर पर और २-४ साल बाद विश्वविद्यालय में भौतिकी (physics) के शिक्षक के तौर पर कार्यरत होने के बाद भी मेरा साइकिल चलाना वैसे ही चलता था जैसे मेरे अन्य संगीसाथियों का। विकल्प भी कहां थे? वह काल था जब स्कूटर ब्लैक में मिलते थे, विशेषतः वेस्पा मॉडल, दुगुने-डेड़ गुने दाम पर। मुझे याद है यह सुना हुआ कि मेरे एक-दो वरिष्ठ शिक्षक जब कभी विदेश जाते थे तो वहां से मिले डॉलरों से स्कूटर खरीदते थे और कालांतर में उसे ब्लैक में बेच देते थे। सन् १९७० के दशक में सरकारों ने सीमित संख्या में स्कूटर-निर्माण की छूट निर्माताओं को दी और वे लोगों को उपलब्ध होने लगे। मेरे संगी साथियों ने भी अपनी जमा-पूंजी से स्कूटर खरीदे, और फिर उनमें से कुछ की साइकिल की आदत धीरे-धीरे छूट ही गयी। बढ़ती संपन्नता के साथ साइकिल की जगह पहले स्कूटर ने और बाद में कार ने ली।

साइकिल और स्कूटर साथ-साथ

मैंने भी १९८१ में एक स्कूटर खरीदा, किंतु साइकिल छोड़ी नहीं। विश्वविद्यालय या अन्यत्र जाने पर कोई एक इस्तेमाल कर लेता था। जहां किसी और को साथ ले चलना होता, या शीघ्रता से कहीं पहुंचना होता अथवा अधिक दूर जाना होता तो स्कूटर ही प्रयोग में लेता था। अन्यथा कभी साइकिल तो कभी स्कूटर। मेरे शहर वाराणसी की दुर्व्यवस्थित यातायात व्यवस्था वाली सड़कों ने स्कूटर चलाने की मेरी हिम्मत वर्षों पहले छीन ली थी। जीवन के ७३ वसंत पार कर चुका मैं अब स्कूटर नहीं चलाता। बस एकमात्र साइकिल ही मेरा निजी वाहन है। मैं आवश्यकतानुसार पैडल-रिक्शा, ऑटोरिक्शा, अथवा टैक्सी का इस्तेमाल कर लेता हूं।

जैसा कह चुका हूं मेरे परिचितों, संगी-साथियों और सहकर्मियों में से कई ने कारें ले लीं और साइकिलें छोड़ दीं। एक बार जब विश्वविद्यालय कर्मचारियों का वेतन-पुनरीक्षण एवं वेतन-वृद्धि हुई तो मुझे साथियों ने सलाह दी थी कि मैं भी कार खरीद लूं। कार चलाना तो मैंने कभी सीखी नहीं। और मेरे शहर वाराणसी की बेतरतीब तथा जाम से ग्रस्त यातायात व्यवस्था में मुझे उसकी कोई उपयोगी नहीं दिखी। इसलिए मैं ‘बे’कार ही रहा।

अब मैं इस लेख के शीर्षक में व्यक्त असली मुद्दे पर आता हूं। जब मैंने करीब २० साल पहले पर्यावरण (environment), प्रदूषण (pollution), पारिस्थितिकी (ecology) एवं प्राकृतिक संसाधनों (natural resources) जैसे मुद्दों पर जिज्ञासावश जानकारी जुटानी शुरू की तो मुझे एहसास हुआ कि वस्तुस्थिति काफी गंभीर है। लगभग वही समय था जब मेरे हृदयरोग का निदान भी हुआ और डाक्टरी सलाह पर दवाइयों के सेवन के साथ मैंने तेज गति से टहलना (brisk walking) भी आरंभ किया। आज हूं तो हृद्रोगी, लेकिन खुद को हृद्रोगी के रूप में नहीं देखता। इस रोग के होते हुए भी मैं १००-५० नहीं १०००-१२०० सीढ़ियां आराम से चढ़ लेता हूं।

उसी समय मुझे शारीरिक श्रम तथा साइकिल की उपयोगिता विशेष तौर पर समझ में आने लगी। तब की अनुभूति ने मुझे अधिकाधिक पैदल चलने और साइकिल चलाने के लिए प्रेरित किया। साइकिल की उपयोगिता के दूसरे पहलू भी मुझे समझ मैं आने लगे। आगे उसी सब का संक्षेप में उल्लेख कर रहा हूं।

साइकिल में गुन बहुत

किसी वस्तु अथवा कार्य से क्या लाभ हैं इसका आकलन हर व्यक्ति अपनी प्राथमिकताओं और पसंदगी के आधार पर तय करता है। बहुत संभव है कि जिसे में लाभ कहूं उसे आप कोई लाभ नहीं कहकर खारिज कर दें। स्पष्ट है कि मैं अपनी सोच के अनुसार साइकिल के लाभ गिनाउंगा।

(२) यह ऐसा साधन है जिसके इस्तेमाल करने पर शारीरिक व्यायाम भी होता है। आजकल लोग शारीरिक श्रम से परहेज करते हैं और शिकायत करते हैं कि उन्हें हृदरोग जैसी शिकायत है। शारीरिक श्रम के अभाव में रोगी बनने की संभावना बढ़ जाती है यह चिकित्सक भी कहते हैं। साइकिल का प्रयोग करने पर जिम जाने की जरूरत नहीं। वृद्धावस्था में साइकिल चलाना या टहलना ही बेहतर व्यायाम है।

(१) साइकिल यातायात का एक सस्ता साधन है। इंधन-चालित वाहनों की तुलना में उसकी कीमत काफी कम रहती है। उसका रखरखाव का खर्चा भी कुछ खास नहीं होता है। इंधन-आधारित न होने के कारण उसके रोजमर्रा इस्तेमाल पर भी कोई खर्चा भी नहीं होता।

(३) साइकिल पर्यावरण के लिए हितकर है। न कार्बन प्रदूषण, न ध्वनि प्रदूषण, न सड़क पर जाम का खास कारण बनता है। जाम की स्थिति पर जहां अन्य वाहनों को रुकना पड़ता है वहीं साइकिल-चालक बगल-बगल से निकलने में भी सफल हो सकता है। सड़कों पर अन्य वाहन दुर्घटना के कारण बन सकते हैं लेकिन साइकिल शायद ही कभी कारण होगा।

(४) अन्य वाहनों को खड़ा करने के लिए भी जगह चाहिए। आजकल शहरों में वाहनों की “आबादी” पर कोई रोक नहीं किंतु उनकी “पार्किंग” के लिए पर्याप्त स्थान कम ही उपलब्ध है। मेरे शहर, वाराणासी, में तो हालात इतने खराब हैं कि कभी-कभी बेतरतीब खड़े वाहनों के कारण पैदल चलना भी दूभर हो जाता है। साइकिल को खड़ा करना रिहायशी कमरे में भी संभव है और सड़क के किसी कोने-किनारे पर भी।

अवगुन भी तो हैं

(१) साइकिल की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि इससे चलाने वाले की प्रतिष्ठा पर बट्टा लग जाता है। आप संपन्न हों तो आपसे उम्मीद की जाती है कि आप कार से नीचे किसी वाहन को नहीं चलाएंगे। कुछ नहीं तो बाइक आपके पास होनी चाहिए। साइकिल तब आपकी प्रतिष्ठा के अनुरूप हो सक्ती है जब आपकी इतनी ख्याति हो कि आपकी संपन्नता से लोग सुपरिचित हों और वे जानते हों कि आप स्वास्थ्य के प्रति सचेत होने से साइकिल चलाते हैं।

(२) आम तौर पर साइकिल एक सवारी के लिए बनी रहती। इसलिए दो या अधिक सवारियों के लिए हरएक के लिए साइकिल की जरूरत होती है। साइकिल की यह कमी गंभीर तो है ही। वैसे कभी-कभार दो-दो तीन-तीन सवरियां ढोते हुए भी लोग दिख जाते हैं।

(३) साइकिल के इस्तेमाल का मतलब है शारीरिक श्रम और उसका मतलब है आराम की जिन्दगी को छोड़ना। आम तौर पर मनुष्य सुखसुविधा से जीना चाहता है। आधुनिक तकनीकी का विकास जीवन को अधिकाधिक आरामदेह बनाना भी है। कष्टकर जीवनशैली को भला कौन चुनना चाहेगा?

अन्त में निजी रुचि

     अभी साइकिल के लाभहानि की उक्त बातें ही मेरे मस्तिष्क में आ रही है। इनके अतितिक्त भी लाभ या हानि की अन्य बातें हो सकती हैं। लेख का समापन करूं इससे पहले यह भी बताना चाहूंगा कि मेरी उम्र ७३+ हो चुकी है, फिर भी पैदल चलना मेरी पहली पसंद है। डेड़-दो कि.मी. दूर के गतव्य के लिए पैदल चलना मुझे स्वीकार्य है। पांचएक कि.मी. की दूरी तक साइकिल से आना-जाना मुझे कठिन नहीं लगता है। अधिक दूरी के लिए ऑटोरिक्शा या अन्य साधनों का सहारा लेना पड़ता है। पहले कभी स्कूटर चलाता था, लेकिन अब नहीं। वाराणसी की दुर्व्यवस्थित यातायात में स्कूटर से चलना मेरे लिए संभव नहीं। – योगेन्द्र जोशी

जाने कहां गये साइकिल के वो दिन … बनाम पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती कीमत

जाने कहां गये वे दिन

सड़कों पर जब साइकिलें चलती थीं।

बच्चा हो या बूढ़ा या जवान

सबको साइकिलें प्यारी लगती थीं।

ठीक हाल में रहती थी हरदम

तभी स्कूल-कालेज पहुंचाती थीं।

अस्पताल जाना हो या ऑफिस

साइकिलें सबकी सवारी होती थीं।

पेट्रोल पंप पर लगे अब भीड़

तब हवा भराकर ही वो चलती थीं।

आयेंगे क्या लौट के वो दिन 

साइकिलें जब सड़क पर दिखती थीं।

पेट्रोल-डीज़ल – बढ़ती कीमतें

पिछले कुछ दिनों से पेट्रोल-डीज़ल के दाम प्रायः हर रोज बढ़ रहे हैं और देश की आम जनता बढ़ती कीमत से त्रस्त है। जिसको देखो वह इस मुद्दे पर मोदी सरकार की आलोचना कर रहा है। सरकार कहती कि अंताराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और देश की तेल कंपनियां उसी से मेल खाती कीमतें तय कर रही है। अब खबर यह है कि दाम कुछ घट रहे हैं  कहा यह भी जा रहा है कि यदि पेट्रोल-डीज़ल को भी जीएसटी (GST) के दायरे लाया जाए तो कीमत घट सकती हैं। किंतु इन पर जीएसटी लगाए जाने के पक्ष में कई राज्य नहीं, कारण कि वे इस पर लगे टैक्स से राज्य की कमाई करती हैं। कहा जाता है कि अपने देश में इन पर भांति-भांति के टैक्स भी बहुत हैं जिससे उनके दाम पहले से ही काफी रहे हैं।

जिस भी कारण से पेट्रोल-डीज़ल के मूल्य बढ़ रहे हों, उससे होनी वाली दिक्कत सभी महसूस कर रहे हैं। आज भौतिक प्रगति के उस मुक़ाम पर हम (मानव समाज) पहुंच चुके हैं जहां इन जीवास्म इंधनों के बिना जीवन सुचारु रूप से जीने की सोची नहीं जा सकती है। इन इंधनों पर हमारी निर्भरता समय के साथ कैसे बढ़ती गई है इस बात को समझने के लिए मैं पिछले करीब  46 वर्षों के  अपने निजी अनुभवों का जिक्र करता हूं।

निजी अनुभव

मैंने सन् 1972 में वाराणसी नगर के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) में बतौर एक शिक्षक के कार्य करना शुरू किया था। वे दिन थे जब इस नगर में पेट्रोल/डीज़ल-चालित वाहन आज की तुलना में नगण्य थे। जैसा मुझे अब याद है कि मेरे भौतिकी (फिज़िक्स) विभाग में कुल दो कारें (एक अंबेसेडर और दूसरी फ़िएट) करीब 40 शिक्षकों में से 2 के पास थीं। और शायद तीन या चार स्कूटर भी कुछ के पास थीं। विभाग में एक लेंब्रेटा, एक वेस्पा और एक फैंटाबुलस देखे की याद है मुझे। फैंटाबुलस स्कूटर का नाम कम ही लोगों ने सुना होगा और उसे कभी शायद देखा भी न हो। वह बाज़ार से बहुत पहले ही गायब हो गयी थी। अब तो स्कूटरों की जगह बाइकों ने ले ली है।

उस काल में स्कूटर खरीदना भी आसान नहीं था; कारण दो थे:

(1) पहला कारण यह कि उनकी कीमतें सामान्य संपन्नता वाले व्यक्ति के लिए भी हैसियत के बाहर होती थीं। इसका अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि तब मेरा मासिक वेतन लगभग 650 रुपये था जब कि स्कूटर की कीमत करीब 3000 रुपये होती थी। मतलब यह कि 5-6 महीने की कुल तनख्वाह बचाने पर ही मैं स्कूटर खरीद सकता था। आज विश्वविद्यालय का समकक्ष शिक्षक एक महीने के वेतन से ही बाइक/स्कूटी खरीद सकता है।

(2) दूसरा कारण वास्तव में अधिक गंभीर था। कारण यह था कि स्कूटरों-बाइकों-कारों का उत्पादन देश में बहुत कम था, शायद डेड़-दो लाख से अधिक नहीं। पैसा पास होने और शौक होने के वाबजूद लोगों को स्कूटर की उपलब्धता नहीं थी, कारों की तो बात ही छोड़िए।

वह काल था जब मेरे शहर वाराणसी में साइकिल अथवा रिक्शा से आवागमन होता था। शहर में सरकारी बस-सेवा भी उपलब्ध थी लेकिन ऑटोरिक्शा नहीं थे। जनसंख्या भी तब आज की तुलना में एक-तिहाई/एक-चौथाई रही होगी। वह समय था जब वाहनों द्वारा पैदा धूल-धुएं का प्रदूषण खास न था, न उनका शोर-शराबा था, और सड़कों पर न ही आज के जैसा जाम।

1970 के बाद माहौल बदला जिसके तहत कई प्रांतों में स्कूटरों का उत्पादन आरंभ हुआ, नीजी कंपनियों या सरकारी उद्यमों के द्वारा, जैसे उत्तर प्रदेश में तब ‘स्कूटर्ज़ इंडिया’ स्थापना हुई थी जो अब थ्री-व्हीलर वाहन बनाती है। मुझे याद आता है कि उसी दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कनिष्ठ पुत्र संजय गांधी ने ‘मारुति’ कार का उद्योग स्थापित किया जो उनकी असामयिक मृत्यु के बाद ‘मारुति-सुजुकी’ उद्योग बना। सीमित संख्या में कारें, जैसे ‘अंबेसडर’, ‘फ़िएट, एवं शायद ‘स्टैंडर्ड’ देश में बन रही थीं, लेकिन उनकी संख्या इस विशाल देश के लिए ’अपर्याप्त’ थीं।

मेरा ख्याल है कि 1990 का दशक आते-आते देश में कार-निर्माण एवं बाइक-निर्माण उद्योग को बढ़ावा मिला। और सड़कों पर कारों-बाइकों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी।

सड़कों पर वाहनों की बढ़ती भीड़

आज स्थिति यह है कि मध्यम वर्ग के अधिकांश लोगों की आमदनी इतनी है कि वे कारें खरीद सकते हैं। इस हेतु बैंकों से भी आमदनी के अनुरूप आसान किस्तों में ऋण या कर्ज मिल जाता है। आज से 45-50 साल पहले तक कर्ज का जुगाड़ करना आसान नहीं था। लोगों की प्राथमिकताएं भी भिन्न थीं। लोग निजी मकान, बाल-बच्चों की पढ़ाई, उनकी शादी-ब्याह के लिए पैसे की बचत की अधिक सोचते थे। आजकल मध्यम वर्ग में परिवार छोटे हो गये हैं और शादी-ब्याह भी विलंब से होते हैं। प्राथमिकताएं भी बदल चुकी हैं। परिणाम यह है कि नयी पीढ़ी के युवा कार-बाइक की व्यवस्था की पहले सोचने लगे हैं और अन्य बातों की चिंता बाद करते हैं।

जहां तक बाइकों का सवाल है इसने साइकिलों की जगह ले ली है। अब समाज के अपेक्षया कमजोर तबके के लोगों के पास भी बाइक दिखने लगी है।

अमेरिका जैसे विकसित देशों में निजी वाहन एक आवश्यकता बन चुकी है। और हमारा देश भी उसी संस्कृति की ओर बढ़ रहा है। गौर करें कि अपने यहां प्रति व्यक्ति औसत आय अमेरिका की तुलना में 4-6 गुना कम है और पेट्रोल-डीज़ल की कीमतें वहां से अधिक। फिर भी निजी वाहनों पर जोर अधिक है और सरकारें आर्थिक विकास पाने के चक्कर में लोगों को इस दिशा में ही प्रेरित कर रही हैं। वे साइकिलों के प्रयोग को बढ़ावा देने के बजाय बाइकों-कारों को प्रोत्साहित कर रही हैं। निजी वाहन यहां ‘झूठी’ सामाजिक प्रतिष्ठा के द्योतक बन चुके हैं।

आरंभ में मैंने अपने विश्वविद्यालयीय विभाग में कारों/स्कूटरों की नगण्य संख्या की बात कही थी। आज उस विभाग में प्रायः हर शिक्षक के पास कार है। शहर में भी धनाड्यों/नवधनाड्यों की संख्या बहुत बढ़ गई है। अतः सर्वत्र कारों की भीड़ नजर आती है। साइकिलों की जगह बाइकों ने ले ली है। जो लोग पहले साइकिलों से चलते थे वे अब साइकिल चलाना भी भूल चुके हैं और उनके घरों से साइकिलें ग़ायब हो चुकी हैं। पहले 10-15 किमी की दूरी साइकिल से तय करना आम बात थी। लेकिन अब स्कूली बच्चे साइकिल से कम ही जाते हैं और स्कूटर-बाइक-कारों से अधिक!

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि आज के लोग सुविधाभोगी तथा आरामतलब हो चुके हैं। साइकिल एवं रिक्शा आर्थिक रूप से अपेक्षया कमजोर लोगों की चीजें रह गई हैं। अपेक्षया संपन्न वर्ग के लिए आवागमन हेतु पेट्रोल-डीज़ल निहायत जरूरी उपभोक्ता वस्तुएं बन चुके हैं। इनकी कीमतों में तनिक भी उछाल आने पर या इनकी उपलब्धता कम हो जाने पर हाहाकार मच जाता है।

कोई विकल्प नहीं क्या?

हाल के दिनों में जो मूल्यवृद्धि हुई वह परोक्ष रूप से सभी को प्रभावित करती है इसे औरों की तरह मैं भी स्वीकार करता हूं। यातायात, मालढुलाई, कृषिकार्य आदि जैसे सामुदायिक महत्व के कामों की पेट्रोल-डीज़ल पर निर्भरता को नकारा नहीं जा सकता। व्यक्तिगत तौर पर शायद ही कुछ किया जा सकता है। किंतु यह सवाल तो पूछा ही जा सकता है कि हम न्यूनाधिक शारीरिक श्रम करके अपने बजट को नियंत्रित नहीं कर सकते क्या? एक-डेड़ किलोमीटर दूर जाना हो तो कार-बाइकों का सहारा न लेकर पैदल नहीं जा सकते? साइकिल का यथासंभव उपयोग क्या नहीं किया जा सकता? बच्चों को पैदल या साइकिल से स्कूल-कालेज जाने को प्रेरित नहीं कर सकते?

साइकिल चलाने के अपने लाभ हैं: (1) साइकिल खुद में सस्ता वाहन है; (2) शारीरिक श्रम का अवसर प्रदान कर स्वास्थ्य-लाभ देती है; (3) न पेट्रोल का  खर्चा और न ही रखरखाव में कठिनाई; (4) पार्किंग में कम जगह घेरती है; और (4) प्रदूषक न होने के कारण पर्यावरण के लिए हितकर।

निजी वाहनों का एक विकल्प भी है। सरकारें सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था करके भी लोगों के पेट्रोल खर्च को घटा सकती हैं। इस संदर्भ में सिंगापुर का उदाहरण दिया जा सकता है। वहां सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था उत्कृष्ट श्रेणी की बताई जाती है और खर्चीले निजी वाहन रखने की तुलना में सुविधाजनक भी है। दुर्भाग्य से हमारे यहां की व्यवस्था घटिया दर्जे की और अपर्याप्त है। यह व्यवस्था अपेक्षया कम संपन्न लोगों तक सीमित देखी गयी है। इसके प्रयोग में मिथ्या प्रतिष्ठा भी आड़े आती है।

कुल मिलाकर यह कहना चाहूंगा कि हमें सुविधाभोगी न बनकर शारीरिक श्रम की आदत डालनी चाहिए। – योगेन्द्र जोशी