शिक्षक दिवस (5 सितंबर): शिक्षा के गिरते स्तर और समाज में व्याप्त दायित्वहीनता पर टिप्पणी

आज शिक्षक दिवस है, 5 सितंबर, भारत के दूसरे राष्ट्रपति डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्मदिन । देश के शिक्षकों के प्रति अभिनंदन एवं शुभाकांक्षाएं।

डा. राधाकृष्णन  मूलतः एक शिक्षक थे, ‘बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी’ के दर्शन विभाग में कार्यरत प्रोफेसर, जो बाद में उस संस्था के कुलपति (वाइस-चांसलर) भी रहे । इस दिवस को शिक्षक दिवस कहे जाने का यही औचित्य रहा है ।

‘बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी’ को लोग संक्षेप में बी.एच.यू. के नाम से जानते हैं । कम ही लोगों को मालूम होगा कि हिन्दी में इसे ‘काशी हिन्दू विश्वविद्यालय’ नाम दिया गया है ।

संयोग से मैं उक्त विश्वविद्यालय के भौतिकी (फिजिक्स) विभाग में शिक्षक (संप्रति सेवानिवृत्त) रह चुका हूं ।

आज ही मेरी नजर पूर्वाह्न में शिक्षक दिवस के उपलक्ष पर आयोजित और दूरदर्शन टेलीविजन चैनल पर प्रसारित हो रहे एक कार्यक्रम पर पड़ी । प्रसंग में संकेत देश के मौजूदा प्रधानमंत्री के छात्र-छात्राओं के साथ हो रहे वार्तालाप भी था । उसी प्रसारण ने मुझे अपने ब्लाग पर इस दिवस की अर्थवत्ता पर अपने विचार लिखने को प्रेरित किया ।

जब भी शिक्षा पर बहस होती है तो जानकार लोग ऊंची-ऊंची आदर्शमूलक बातें कहने में देरी नहीं करते हैं । अधिकांश विशेषज्ञ मानते है कि प्राथमिक शिक्षा बच्चों की क्षेत्रीय भाषा (जो प्रायः राज्य की भाषा और बहुधा मातृभाषा होती है) में होनी चाहिए । इस विषय पर सर्वाधिक विस्तृत अध्ययन 1964-66 के ‘कोठारी कमिशन’  ने किया जिसमें अंताराट्रीय विशेषज्ञ भी शामिल थे । आयोग (कमिशन) की प्रमुख अनुशंसाओं में से एक थी कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दी जानी चाहिए । उसके बाद शिक्षा में जितने भी आयोग बिठाए गये उन सभी ने मातृभाषा के महत्व को रेखांकित किया है । लेकिन आज तक हुआ क्या है ?

स्तरीय शिक्षा तो अंगरेजी में ही संभव है यह धारणा दिनबदिन बलवती होती जा रही है । जिस अंगरेजी से मुक्त होने का संकल्प देश ने आरंभ में लिया था आज वही अपरिहार्य माने जानी लगी है । देश की सार्वजनिक तथा नागरिकों की वेयक्तिक प्रगति का माध्यम अब अंगरेजी को ही मान लिया गया है । देश में लगभग समस्त कार्य-व्यापार अंगरेजी में ही हो रहा है, भले ही अंगरेजी अभी तक जनभाषा नहीं बन पाई हो । भारतीय भाषाएं अंगरेजी के सापेक्ष हासिए पर खिसकती जा रही हैं और उनकी अहमियत बोलचाल तक सिमट रही है । क्यों है ऐसा ?

ऐसा नहीं कि क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा नहीं दी जा रही है । सभी राज्य सरकारों की शिक्षा व्यवस्था राज्य की भाषा को माध्यम चुनती आई है । किंतु क्या है हाल राज्य सरकारों द्वारा व्यवस्थित शिक्षा के स्तर का ? सामाजिक संस्थाओं द्वारा किए गए अध्ययन बताते हैं कि प्राइमरी पास बच्चों में से कई तो अपना नाम तक ठीक से नहीं लिख सकते । करीब 30 फीसदी बच्चे जोड़-घटाना भी नहीं जानते । सामान्य ज्ञान का हाल यह है कि छात्र देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का नाम भी नहीं बता सकते । राष्ट्रगान एवं राष्ट्रगीत की जानकारी तो कई शिक्षकों तक में नहीं पाई गई है ।

इन विद्यालयों की हालत हर दृष्टि से खस्ता है । मीडिया ऐसे विद्यालयों का उल्लेख करता है जहां कोई भवन ही नहीं; खुले में पढ़ाई होती है । तब शौचालयों का तो सवाल ही नहीं उठता । ऐसे विद्यालयों की कमी नहीं है जहां एक ही अध्यापक पांचों (पहली से पांचवीं तक) कक्षाओं को पढ़ाता है । कैसी पढ़ाई होती होगी यह सोच पाना भी मुश्किल है । जहां एकाधिक शिक्षक हैं भी तो उनमें से कुछ गायब ही रहते हैं । यह भी सुनने में आता है कि कई शिक्षक अपने वेतन का एक अंश किसी बेरोजगार को देकर उससे कक्षाकार्य करवाते हैं और स्वयं किसी और धंधे में लगे रहते हैं ।

इस शिक्षक दिवस की अहमियत क्या है ? इसे समझने के लिए मैं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) की बात करता हूं जिससे डा. राधाकृष्णन का घनिष्ट संबंध रहा हैं जैसा आरंभ में कहा गया है । वि.वि. में इस दिन प्रतिवर्ष सेवानिवृत्त होने वाले शिक्षकों का सम्मान किया जाता है । उन्हें वि.वि. के प्रेक्षागृह ‘स्वतंत्रता भवन’ में आमंत्रित किया जाता है, जहां वि.वि. के प्रति उनके योगदान की प्रशंसात्मक प्रस्तुति सेवारत शिक्षकों की उपस्थिति में किया जाता है । इसके अतिरिक्त उन्हें उत्तरीय (शाल) भेंट करके सम्मानित किया जाता है । कुछ और भी भेंट किया जाता हो तो उसकी जानकारी मुझे नहीं है । (संयोग से मुझे यह आमंत्रण पाने का सौभाग्य सेवानिवृत्ति के बाद आज तक नहीं मिला; कारण वि.वि. ही जानता होगा !) ।

इस दिन वि.वि. में कोई अन्य सार्थक कार्यक्रम शायद नहीं होते हैं । वि.वि. की शैक्षिक स्थिति, उसके उन्नयन की प्रयासों, शोध के स्तर को सुधारने के उपायों, आदि पर चर्चा होती हो यह मेरे देखने में कभी नहीं आया । चर्चा हो भी तो दूसरे दिन से वि.वि. का कामकाज पूर्ववत चलता रहता है ।

जब डा. राधाकृष्णन से जुड़े उक्त शैक्षणिक संस्था में कुछ विशेष नहीं होता है तो अन्य संस्थाओं में कितना कुछ होता होगा इसका अंदाजा लगाया जा सकता है । प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में कुछ कार्यक्रम अवश्य होते हैं, जिनमें शिक्षक एवं छात्र सम्मिलित तौर पर भाग लेते है । इन सबसे शिक्षा की दशा-दिशा पर कोई फर्क नहीं पड़ता ।

इस बार देश के राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री ने छात्र समुदाय से रूबरू होकर अपनी बातें कहीं । मैंने पहले कभी ऐसा होते नहीं देखा । बस देश के शिक्षकों को बधाई दी जाती है और कुछ को पुरस्कृत किया जाता है । किंतु क्या राष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री के कुछ कह देने से कोई फर्क पड़ सकता है ?

अपने देश में (और दुनिया में) तमाम दिवस मनाए जाते हैं । हर मौके पर भाषणबाजी के अलावा क्या होता है ? देश और विश्व में अहिंसा दिवस (2 अक्टूबर) मनाया जाता है; क्या लोगों में व्याप्त हिंसा की प्रवृत्ति घटी है ? 11 जुलाई को जनसंख्या दिवस मनाया जाता है; कितने लोग इस दिवस के नाम से जनसंख्या नियंत्रण के लिए प्रेरित हुए होंगे ? और कितने राजनेताओं की नींद देश की निरंतर बढ़ रही आबादी से खराब हुई होगी ? किसी के मुख पर चिंता की लकीर नहीं दिखती । इसी प्रकार पर्यावरण दिवस (5 जून) कितना सार्थक सिद्ध हुआ है ?

दिवस मनाएं या न, जो गंभीर होता है वह समाज के और स्वयं के हितों के बीच संतुलन बिठाता है, केवल इसी चिन्ता में नहीं रहता है कि कैसे अपने को मिले अवसर का वह भरपूर लाभ उठाए, वह अपना कार्य यथासंभव निष्ठापूर्वक करता रहता है ।  जिसको केवल अपने हितों से मतलब रहता है, वह स्वेच्छया दायित्व स्वीकरने के बाद भी उन्हें निभाने के छोटे रास्ते खोजता है । दुर्भाग्य से वर्तमान समाज में दूसरी श्रेणी के लोग अधिक हैं । इसी कारण शिक्षा व्यवस्था की गिरावट जिम्मेदार लोगों को खिन्न एवं उद्वेलित नहीं करती । अपने दायित्व को न निभा पाने पर उन्हें आत्मग्लानि नहीं होती ।

मेरी दृष्टि में शिक्षक दिवस उपदेश देने का दिन मात्र बनकर रह गया है । कौन नहीं जानता कि देश में शिक्षा की क्या स्थिति है ? कौन नहीं जानता है क्या किया जाना चाहिए ? क्या शिक्षकों को नहीं मालूम उनके क्या कर्तव्य हैं ? क्या शिक्षा की व्यवस्था से जुड़े प्रशासनिक अधिकारियों को नहीं मालूम कि उनके क्या दायित्व हैं ? क्या शासन चला रहे राजनेताओं को अपने राज्य की शिक्षा की दयनीय स्थिति की जानकारी नहीं रहती ? यदि नहीं तो कैसे शासक हैं वे जिनको वस्तुस्थिति का ज्ञान ही न हो ? और जानते हुए भी वह स्थिति को यथावत छोड़ देते हैं तो किससे क्या कहा जाए ? किसको दोष दिया जाये ?

इस समय अपना देश चारित्रिक संकट के दौर से गुजर रहा है । स्थिति कितनी गंभीर है इसका अंदाजा उत्तर प्रदेश एवं बिहार की शैक्षणिक हालात से लग सकता है । परीक्षाकाल में कई शैक्षणिक संस्थाओं में नकल का खेल खेला जाता है जिनकी खबर मीडिया में आती हैं । खबरें यदि सच न होतीं तो राज्य सरकारें उनका खंडन करतीं; वे ऐसा न करके जांच की बात कहकर बात टाल जाती हैं । नकल के ‘पुनीत’ कार्य में छात्र, अभिभावक, शिक्षक और पुलिस दल, सभी शामिल पाए जाते हैं । क्या ये सब इतने निरीह हैं कि उनको सही-गलत का ज्ञान ही न हो । नहीं, ऐसा नहीं होता; स्वार्थलिप्सा इस कदर छाई हुई है कि उचितानुचित का कोई अर्थ उनके लिए नहीं रह जाता है ।

जहां स्थिति इतनी तयनीय हो वहां शिक्षक दिवस का अर्थ ही क्या रह जाता है ? – योगेन्द्र जोशी

 

https://indiaversusbharat.wordpress.com/2015/09/05/