2 अक्टूबर, गांधी एवं शास्त्री जयंती – अहिंसा से आगे बहुत कुछ और भी

Gandhi-Shastriआज 2 अक्टूबर है, बापू यानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी (2 अक्टूबर, 1869 – 30 जनवरी, 1948) और देश के दूसरे प्रधानमंत्री स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री (2 अक्टूबर, 1904 – 11 जनवरी, 1966) की जन्मतिथि । दोनों का स्मरण करने और दोनों से किंचित् प्रेरणा लेने का दिन, हो सके तो ।

जहां तक शास्त्रीजी का सवाल है उन्हें उनकी निष्ठा, देशभक्ति और सादगी के लिए याद किया जाता है, भले ही वैयक्तिक स्तर पर कम ही लोगों के लिए ये बातें आज सार्थक रह गयी हैं । प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की काबिना के एक ईमानदार मंत्री के तौर पर उनकी पहचान अवश्य रही है । किंतु प्रधानमंत्री के रूप में उनका कार्यकाल संक्षिप्त ही रहा, अतः उस भूमिका में वे कितना सफल रहे होते कह पाना आसान नहीं ।

महात्मा गांधी की बात कुछ और ही रही है । उन्हें विश्व में अहिंसा के पुजारी के तौर पर जाना जाता है । संयुक्त राष्ट्र संगठन (UNO) ने तो आज के दिन (2 अक्टूबर) को ‘अहिंसा दिवस’ (Non-Violence Day) घोषित कर रखा है ।

मैं समझ नहीं पाता कि गांधीजी के विचारों को केवल अहिंसा के संदर्भ में ही क्यों महत्त्व दिया जाता है । क्या इसलिए कि आज के समय में जब चारों ओर हिंसात्मक घटनाएं नजर आ रही हैं, हर कोई अपने को असुरक्षित अनुभव कर रहा है ? यूं भौतिक (दैहिक तथा पदार्थगत) स्तर की हिंसा मानव समाज में सदा से ही रही है, परिवार के भीतर, परिवार-परिवार के बीच, विभिन्न समुदायों के बीच, और देशों के बीच । किंतु आतंकवाद के रूप में एक नये प्रकार की हिंसा का उदय हालिया वर्षों में हुआ है, जिससे हर कोई डरा-सहमा-सा दिखता है । जिस प्रकार की हिंसा आज देखने को मिल रही है वह अमीर-गरीब, राजनेता, उच्चपदस्थ प्रशासनिक अधिकारी, और आम आदमी सभी में असुरक्षा की भावना पैदा कर रही है । ऐसी स्थिति में हिंसात्मक घटनाओं की निंदा और अहिंसा की अहमियत पर जोर डालना ‘फैशनेबल’ बात बन गयी है । अन्यथा क्या मानव समाज के समक्ष अन्य प्रकार की अनेकों समस्याएं नहीं हैं, जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए और जिनके संदर्भ में गांधीजी के विचारों की चर्चा की जानी चाहिए ?
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इंडिया बनाम भारत (शेष): और क्या है भारत?

कल की पोस्ट (१६ दिसंबर) में इंडिया, जैसा मैं उसे देखता हूं, की बात मैंने कही थी । अब भारत की बात । भारत मूलतः देहातों में बसता है, या फिर महानगरों के झोंपड़ी-झुग्गियों में अथवा अतिसामान्य कामचलाऊ घरों में । जहां इंडिया आधुनिक सुखसुविधाओं के लैस ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं में रहता है, भारतीय सड़क के दूसरी ओर के जनसुविधाओं के वंचित टूटे-फूटे मकानों या झोपड़ियों में । किंतु असल अंतर संपन्नता से नहीं है और थोड़ी बहुत संपन्नता के बावजूद भी व्यक्ति इंडिया के बजाय भारत में हो सकता है । जैसा मैंने पहले कहा है, इंडिया एवं भारत के बीच भेद बहुत स्पष्ट नहीं है; उनके मध्य चौड़ी तथा धुंधली विभाजक रेखा है । अधिकांश देशवासी अभी इसी विभाजक रेखा पर हैं । वे जहां इंडिया में प्रवेश करने को आतुर हैं वहीं वे कई परंपराओं को छोड़ पाने में हिचक रहे हैं । लिहाजा वे अभी ‘खिचड़ी’ अवस्था में हैं, और कल वे नहीं तो उनके आगे की पहली या दूसरी पीढ़ी इंडिया में शामिल हो चुकेगी । परिवर्तन एकतरफा और धीमा अवश्य है, किंतु निर्बाध चल रहा है । आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें >>

इंडिया बनाम भारत (शेष): क्या है इंडिया?

इंडिया बनाम भारत की हफ्तों पहले (ब्लॉग पोस्टः अक्टूबर ६) आरंभ की गयी चर्चा अधूरी छूट गयी थी । उन पोस्टों में मैंने इस बात की ओर पाठकों का ध्यान खींचा था कि अपना देश वस्तुतः दो देशों में विभक्त है: इंडिया तथा भारत (बी.बी.सी की भाषा में, जिसके उल्लेख के साथ पहला आलेख लिखा गया था)। इस विभाजन को एक वास्तविकता के रूप में स्वीकारा जाने लगा है यह भी बाद के लेखों (पोस्ट; अक्टूबर १३ एवं १७) में स्पष्ट किया गया था । मैं दो देश के बदले दो संसार कहना अधिक सार्थक समझता हूं । कहने का तात्पर्य है कि देश या राष्ट्र तो एक ही है, किंतु पूरी सामाजिक स्थिति कुछ ऐसी बन गयी है कि वहां दो संसारों, दो दुनियाओं या दो ‘वर्ल्ड्‌ज’ का अस्तित्व साफ नजर आता है । क्या हैं ये दो संसार और दोनों के मध्य भेद कैसे नजर आता है इसी बात को स्पष्ट करने की आवश्यकता है । आगे पढ़ने के लिए क्लिक करें >>