शिंदे ने सच ही तो बोलाः जैसे लोग बोफोर्स भूल गए वैसे ही ‘कोल-गेट’ भी भूलेंगे

अपने देश के राजनेता जो मुंह में आया उसे ‘बकने’ में झिझकते नहीं हैं । उनकी बकबास की जब चारों ओर आलोचना होने लगती है तो अपने बचाव में चिरपरिचित कुतर्क पेश कर देते हैं, “मीडिया ने मेरे बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया ।” हाल में केन्द्र सरकार के गृहमंत्री ने कहा था, “जैसे लोग बोफोर्स भूल गए वैसे ही कोयला खदान आबंटन घोटाला भी भूल जाएंगे ।” आलोचना होने पर उन्होंने मीडिया को दोष न देकर निरीह भाव से कह दिया, “मैंने तो वह बात मजाक में कही थी ।” श्री शिंदे महोदय ने समझदारी दिखा दी ।

बेचारे शिंदे !! मजाक में कहा या गंभीर होकर, कहा तो उन्होंने सच ही । मैं समझता हूं कि बात को थोड़ा स्पष्ट करते हुए वे कह सकते थे, “जनता को भला लगे या अच्छा, बात तो सच है ।” सो कैसे ? हो सकता है वे अपना तर्क पेश करने में घबड़ा गए हों और बात को वहीं खत्म करने के चक्कर में “ये मजाक में कहा” कह बैठे हों । वे बात पर टिके रहकर अपना बचाव बखूबी कर सकते थे । सो कैसे बताता हूं:

किसी भी सामान्य आदमी को बचपन से लेकर बुढ़ापे तक की तमाम घटनाओं की याद रहती है (बशर्ते कि वह डिमेंशिया या अल्जीमर रोग से पीड़ित न हो) । लेकिन वे घटनाएं स्मृतिपटल पर अंकित भर रहती हैं, और उन पर कभी-कभार चर्चा भी छिड़ जाती है । लेकिन रोजमर्रा की अपनी जिंदगी में आदमी सामान्य तरीके से ही जीता है । अगर कोई घटना निजी तौर पर किसी के लिए अति दुःखद एवं असामान्य रही हो तभी वह उस मनुष्य के व्यवहार को प्रभावित करती है । अन्यथा बात आई-गई ही होती है । आम आदमी के जीवन में बोफोर्स कांड भी इसी श्रेणी की घटना है । आदमी के लिए ऐसी घटनाएं इतिहास के पन्नों में दर्ज बातें होती हैं । वह उनके बारे में सोच-सोच कर जिंदगी नहीं बिताता है । ये बात तब भी माने रखती है जब चुनाव होते हैं । जिसको जिसे वोट देना होता है देता है, कोई घटना हुई हो या नहीं, खास तौर पर तब जब घटना बासी हो चली हो ।

सरकारी खजाने की लूट और साधिकार भ्रष्टाचार का हर मामला कुछ समय तक तो ताजा-ताजा रहता है, वह भी हर किसी के दिमाग में नहीं । और अंत में बासी पड़कर इतिहास के पन्नों में दब जाता है । बोफोर्स के साथ ही नहीं बल्कि हर मामले में यही हुआ है । हाल की जितनी ऐसी घटनाएं हुई हैं उन सबका हाल यही होना है । कुछ दिन मीडिया में जोरशोर से चर्चा और फिर उनकी जगह अन्य घटनाएं ले लेती हैं । चाहे कोयला घोटाला हो, टू-जी घोटाला, या कॉमन-वेल्थ गेम्ज घोटाला, या कोई और घोटाला सब एक न दिन भुला दिये जाने हैं । और इसी तथ्य को शिंदे महोदय ने अपने मुखारविंद से कह डाला । आखिर झूठ तो बोला नहीं । पता नहीं क्यों उनकी आलोचना होने लगी ।

सच तो यह है कि ऐसी किसी भी घटना का असर उन पर भी नहीं पड़ता है जो उस घटना में संलिप्त रहते हैं । आज तक किसी का कुछ बिगड़ा है क्या ? किसी को दंडित होना पड़ा है क्या ? मेरी याददास्त में तो कोई मामला नहीं है । जब उन संलिप्त लोगों के लिए भी घटना भुलाने की चीज हो, तब आम आदमी के लिए उसका मतलब ही क्या रह जाता है ?

मैं तो यह भी कल्पना कर बैठता हूं कि समय बीतने के साथ घटना के सक्रिय पात्र अपने नाती-पोतों को अपनी बहादुरी के किस्से सुनाते होंगे कि देश की जनता को ऐसा चकमा दिया कि किसी को पता ही नहीं चला । जैसे मोहल्ले के बच्चे खेल-खेल में किसी की खिड़की का शीशा तोड़ डालते हैं और उस बेचारे भुक्तभोगी को पता ही नहीं चल पाता कि कारस्तानी असल में किसकी रही, ठीक वैसा ही हमारे देश के घोटालों के मामले में होता है । घोटाला हुआ भी क्या, अगर हुआ तो किसने किया, ये बातें दशकों तक पता ही नहीं चलतीं । और जनता को घटना की याद ताजा करने के लिए इतिहास के पन्नों पर लौटना पड़ता है । – योगेन्द्र जोशी