राहुल गांधी का प्रधानमंत्री बनना देशहित में होगा या …?

राहुल का इंदौर भाषण २०१३

 

आलोचना राहुल गांधी की

यदि मैं राहुल गांधी पर कोई नकारात्मक या आलोचनात्मक टिप्पणी करूं तो कांग्रेसजन आगबबूला हो जाएंगे । चूंकि प्रायः सभी लोग कहते हैं कि इस देश में अपनी बात कहने का सबको हक है, इसलिए मैं भी कुछ कहने की हिम्मत कर रहा हूं । शायद दो-चार ऐसे लोग मिल जाएं जो मुझसे सहमत हों । तब यह समझूंगा कि मेरी बात सौ फीसद मिथ्या नहीं मानी जा रही, अन्यथा खुद के खयालात पर शक होने लगेगा ।

मेरी नजर में राहुल गांधी राजनैतिक दृष्टि से नितांत अपरिपक्व हैं । वे नहीं जानते कि उन्हें क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं । लगता है उन्हें ऐतिहासिक तथ्यों की भी जानकारी नहीं । अपने भाषणों में वे अपने एवं अपने परिवार की बातें जरूरत से अधिक करते है, परिवार के तथाकथित त्याग की चर्चा करते हैं, गोया कि लोग, यानी आगामी चुनावों के मतदाता, अपने समस्त कष्टों को भूलकर उनकी पार्टी को सत्ता सोंप देंगे ।

आगामी (2014) केंद्रीय सरकार का प्रधानमंत्री

कह नहीं सकता कि अगली सरकार कांग्रेस की अगुवाई में बनेगी या नहीं । मुझे नहीं लगता कि इस पार्टी को खास सफलता मिलेगी । उनके नाम उपलब्धियों की तुलना में विफलताएं कहीं अधिक हैं । जनता शायद उन्हें वोट देना पसंद न करे । तीसरा मोर्चा बनेगा या नहीं बनेगा, यदि बनेगा तो कैसे ये सवाल अभी पूर्णतः अनुत्तरित हैं । जिसका जन्म अभी हुआ नहीं उस तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी इसकी संभावना मेरे मत में क्षीण है । हो सकता है भाजपा अधिक सीटें ले जाए, लेकिन अपर्याप्त । मुझे डर है कि वह सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या में समर्थन जुटाने में असफल रहेगी । क्या पता अन्य दल तथाकथित “सेक्युलरिज्म” के नाम पर उसे रोकने की कोशिश में एकजुट हो जाएं । इस देश में सेक्युलरिज्म का फेबिकॉल दुश्मनों को भी आपस में जोड़ सकता है । इसलिए अंततः घूमफिर के कांग्रेस के हाथ में ही कमान आ जाए, किंतु उसकी स्थिति इस बार काफी कमजोर रहेगी ।

अगर जोड़तोड़ करके कांग्रेस ने सत्ता संभाल ही ली तो उसका प्रधानमंत्री कौन बनेगा यह बात फिलहाल भविष्य के गर्त में ही छिपी है । मेरा मानना है राहुल गांधी इस पद को स्वीकार नहीं करेंगे । मैं उन्हें मूर्ख तो मानता हूं (क्षमा करें यदि आपको बुरा लगे तो), लेकिन वे महामूर्ख नहीं हैं कि इस समय खाहमखाह जोखिम उठाएं और अपना भविष्य दांव पर लगाएं । परिस्थितियां कांग्रेस के अनुकूल नहीं हैं, भले ही कांग्रेस-नीत सरकार बन जाए ।

यह याद रखना चाहिए कि कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार ही सभी निर्णय लेता है । वह परिवार ही अंततोगत्वा बताएगा कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा । राहुल गांधी को यह जन्मसिद्ध विशेषाधिकार प्राप्त है कि वे “हां” या “न” कहें । अन्य लोगों को यह अधिकार नहीं है । अतः जिसे यह परिवार कहेगा उसे प्रधानमंत्री का पद सम्हालना ही पड़ेगा ।  और इस कार्य के लिए अपने मनमोहन जी से बेहतर कौन हो सकता है ? उन जैसा समर्पित व्यक्ति भला कौन हो सकता है । कांग्रेसजन लाख कहें कि उनकी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र है और प्रधानमंत्री का चयन चुनाव जीतकर आए सांसद करते हैं, हकीकत में ऐसा है नहीं ।

आन्तरिक लोकतंत्र का अभाव

दरअसल भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है देश के अधिकांश दल किसी न किसी व्यक्ति या परिवार की बपौती बनकर रह गये हैं, जहां संपूर्ण अधिकार मुखिया या उसके परिवार में निहित रहते हैं । कांग्रेस ही में यह नहीं है, कश्मीर से कन्याकुमारी तक यही कहानी है प्रायः सभी दलों की है । एनसीपी के फारूख अब्दुला, अकाली दल का बादल परिवार, लोकदल के अजीत सिंह, सपा के मुलायम सिंह, बसपा की मायावती, राजद के लालू यादव, लोजपा के रामविलास पासवान, त्रिणमूल की ममता, बीजद के बीजू पटनायक, टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू, शिवसेना के उद्धव ठाकरे, एमएनएस के राज ठाकरे, डीएमके के करुणानिधि, एआईएडीएमके की जयललिता, तथा अन्य कई दलों की यही कहानी है । इन दलों में आंतरिक लोकतंत्र नाम की चीज ही नहीं है, लेकिन वे लोकतंत्र की बात करते अवश्य हैं । खैर, मेरे कहने से क्या होता है !

मैंने कहा कि मैं राहुल गांधी को कुछ हद तक मूर्ख मानता हूं, क्योंकि वे कई मौकों पर बेसिरपैर की बातें कर जाते हैं । कांग्रेसजनों की खूबी यह है कि वे हर हाल में उनकी बातें सही ठहराते हैं । राहुल भला कैसे गलत हो सकते हैं ? वे हमारे नेता हैं जो भी कहते है सही कहते है, दूसरे लोग ही गलत समझते हैं । वाह रे राजनैतिक दर्शन ! किसी लोकतांत्रिक दल में यह हो ही नहीं सकता कि किसी एक सदस्य की सभी बातों को समवेत स्वर में सही कहा जा सके । किसी विशिष्ट व्यक्ति के साथ अन्य सदस्यों की यदाकदा असहमति हो यह किसी भी लोकतांत्रिक दल के लिए स्वाभाविक है । राहुल गांधी की गलतियों को कांग्रेसजन कभी भी सहजतया क्यों नहीं स्वीकारते ?

तथ्यहीन उद्गार

मेरा राहुल गांधी के प्रति जो नजरिया है उसके कारण स्पष्ट करना चाहूंगा । हाल में इंदौर की रैली में उन्होंने कुछ बातें कहीं जो हास्यास्पद अथवा आपत्तिजनक, और उनकी अपर्याप्त जानकारी के द्योतक मानी जा सकती हैं । मैं उदाहरण पेश करता हूं:

(1) राहुल गांधी भाजपा का नाम नहीं लेते हैं, किंतु जब वे सांप्रदायिक ताकतों की बात करते हैं तो इशारा भाजपा की ओर ही रहता है । उनकी बातों से लगता है कि देश में सभी दंगे भाजपा ही कराती है । क्या कभी यह बातें प्रमाणित हुई हैं ? इन दंगों के दौरान केंद्र सरकार ओैर राज्य सरकारें कहां सोई रहती हैं ? और जब शिया-सुन्नी दंगे होते हैं तो क्या वे भी भाजपा-प्रायोजित होते हैं ? देश के तथाकथित “सेक्युलरवादी दल” सभी दंगों के लिए आंतरिक कारणों के तौर पर भाजपा और बाह्य कारणों के तौर पर पाकिस्तान की “आई.एस.आाई.” को जिम्मेदार मानते हैं बिना असंदिग्ध प्रमाणों के ।

(2) राहुल गांधी दंगों के संदर्भ में बिना नाम लिए भाजपा को समुदायों के बीच वैमनस्य पैदा करने और मारकाट मचाने वाली पार्टी कहते हैं । उसी रौ में वह अनर्गल बोल जाते हैं: “इन लोगों ने मेरी दादी को मारा, मेरे पिता को मारा, और अब मुझे भी मार डालेंगे ।” कौन हैं उनके वक्तव्य के “ये लोग” ? किसकी ओर इशारा है उनका ? क्या उनको यह मालूम नहीं कि उनके दादी-पिता किसी दंगे के शिकार नहीं हुए । वे कुछ हद तक अपनी ही गलतियों से मारे गये । कैसे ? क्या वे इस हकीकत को नहीं जानते कि उनकी दादी, इंदिरा गांधी, ने सेना को अमृतसर के स्वर्णमंदिर में घुसकर भिंडरावाले का सफाया करने का आदेश दिया था ? सिखों की दृष्टि में यह मंदिर को अपवित्र करने की घटना थी । इससे दो-चार सिख उनकी जान के दुश्मन बन गये थे । कहा जाता है कि उनकी दादी को अपनी सुरक्षा में समुचित तबदीली की सलाह दी गयी थी जो उन्होंने नहीं मानी । उसी तंत्र से एक सिख ने गुस्से में उनकी जान ले ली थी ? कौन जिम्मेदार था ? इसी प्रकार श्रीलंका में तमिल उग्रवाद के विरुद्ध वहां की सरकार को उनके पिता, राजीव गांधी, ने भारतीय सेना की टुकड़ी भेजी थी । कई तमिलों की नजर में यह उनके तमिल-बंधुओं के विरुद्ध कदम था । और उन्हीं में से एक ने मानव-बम बनकर उनकी जान ले ली ? भाषण हेतु मंच पर वे लोग पहुंचे कैसे ? किसकी गलती थी ?

(3) मुजफ्फरपुर के हालिया दंगों के सिलसिले में जो बात राहुल गांधी ने कही उसे मैं अक्षम्य और आपत्तिजनक मानता हूं । क्या कहा यह आरंभ में दिए न्यूज-क्लिप से स्पष्ट है । राहुल गांधी को किस खुफिया अधिकारी ने कथित बातें बताईं और किस हैसियत से ? क्या खुफिया अधिकारी इतने मूर्ख होते हैं कि सरकार का हिस्सा न होते हुए भी राहुल गांधी को खुफिया जानकारी दें ? इसके अलावा उसने अपने उच्चाधिकारियों को समुचित रिपोर्ट दी ? नहीं ! इसके अलावा यह कहना कि पाकिस्तान की “आई.एस.आाई.” वहां के 10-15 नौजवानों के संपर्क में है कहां तक सही है ? क्या वे सच बोल रहे हैं या जनता को महज मूर्ख बना रहे हैं ? देश में अनेक जन उनको भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं । तब क्या उन्हें सोच-समझकर नहीं बोलना चाहिए ?

राहुल गांधी: प्रधानमंत्री बन गये तो?

मुझे लगता है कि राहुल गांधी यदि सचमुच में प्रधानमंत्री बन गये तो इस देश का बंटाधार ही होगा ! जो व्यक्ति ऐतिहासिक तथ्यों को न जानता हो, जो भावनाओं में बह जाता हो तथा अपने परिवार का गुणगान करने लगता हो, और शब्दों को नापतौलकर न बोल पाता हो, वह क्या सफल प्रधानमंत्री हो सकेगा ? ऐसे व्यक्ति को समुचित सलाह देने वाले साथ हों तो समस्या नहीं होगी । लेकिन आज की कांग्रेस की यह परंपरा बन चुकी है कि राहुल गांधी कुछ गलत भी बोल जाएं तो उसका भी कांग्रेसजन एक सुर से समर्थन करते हैं । उनकी कोई भी बात न काटी जाए यह उस दल की नीति बन चुकी है । तात्पर्य यह है कि तब उस दल में कौन होगा जो सही सलाह दे ?

मैं भाजपा का पक्षधर नहीं हूं । उसे मैं वोट नहीं देता । दरअसल मैं पिछले 10-12 सालों से किसी भी दल के प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करता । मेरी दृष्टि में सब एक ही थैली के चट्टेबट्टे हैं । जब मौका मिले आपस में गले लग जाते हैं, और जरूरत पड़े तो एक-दूसरे के विरुद्ध अनापशनाप बोल जाते हैं । येनकेन प्रकारेण सत्ता हथियाना उन सभी का लक्ष्य बन चुका है । भाजपा सत्ता में आ जाए तो भी कोई मौलिक शासकीय परिवर्तन नहीं होने का ।

मेरी ये बातें भाजपा का पक्ष लेकर नहीं कहीं गई हैं । मैं तो राहुल गांधी की अनर्गल बातों की आलोचना कर रहा हूं । – योगेन्द्र जोशी

बोधगया की आतंकी घटना और राजनैतिक दलों का रवैया

Buddha Statue Bodhgayaराजनेताओं का रवैया

         आतंकवाद को लेकर अपने देश के राजनेताओं का रवैया बेहद हास्यास्पद रहा है । उनका एकमात्र उद्येश्य शासन पर कब्जा करके और उस पर येनकेन प्रकारेण चिपके रहकर सत्तासुख भोगना है । किसी राजनेता के दिलोदिमाग में देश की तस्वीर भविष्य में क्या होगी इसे लेकर कोई चिंता नहीं होती । उन्हें तो अपनी पांचसाला सत्ता बचाये रहना और अगले पांचसाला सत्ता को हथियाने की चिंता सताती है । और इस प्रयोजन के लिए हर प्रकार का समझौता करना उन्हें जायज लगता है । राजनैतिक सिद्धांत जैसी भी कोई चीज होती है यह उन्हें मालूम ही नहीं । देश की दीर्घकालिक नीतियां क्या हों इस पर उनका ध्यान कभी नहीं जाता है । अरे भई, देश के सामने कई समस्याएं ऐसी हैं जिन पर हर व्यक्ति को चिंतित होना चाहिए, खासकर उनको जो सत्ता पर कब्जा जमाए हों ।

आतंकवाद उन समस्याओं में से एक है । देशसेवा का ढिढोरा पीटने वाले नेताओं को तो ऐसी समस्याओं पर एकमत होना चाहिए और एक ही दिशा में कारगर कदम उठाने के लिए संकल्प लेना चाहिए । लेकिन देखिए कि वे आपस में ही एक-दूसरे पर तरह-तरह के लांछन लगाना शुरू कर देते हैं । उनके रवैये को देख आतंकी भी खुश होते होंगे और सोचते होंगे कि कैसा देश है यह कि नेता आपस में ही लड़ते रहतेे हैं । वे कहते होंगे कि इस देश में हमारे लिए डरने की कोई बात नहीं है । अरे भई, जिस किसी ने भी गलती की हो उसे लेकर आप ऊलजलूल तो नहीं बोलिए । देश के खातिर कुछ तो एकता दिखाइए । वैसे इतिहास गवाह है कि आपस में लड़कर हम बाहरी लोगों के लिए उपजाऊ जमीन तैयार करते रहे हैं । सदियों की गुलामी परस्पर के इसी झगड़ने की आदत का नतीजा रही है । और आज भी हम झगड़ने की आदत से बाज नहीं आ रहे हैं । अरे भई, कम से कम एकता नहीं तो एकता का नाटक तो कर सकते हैं । लेकिन नहीं, उनका दिमाग तो यह सोचने में लग जाता है कि क्या यह मुद्दा आगे सत्ता कब्जियाने में मदद करेगा या नहीं । मेरे मन में ऐसे राजनेताओं के प्रति कोई सम्मान नहीं । मैं सोचता हूं कि इनमें कोई नहीं जो मेरे वोट का हकदार हो ।

राजनेताओं को चिंता कहां

         आतंकी घटना राजनेताओं के लिए कोई माने नहीं रखती है । उन्होंने तो अपनी सुरक्षा का ऐसा इंतिजाम कर रखा है कि आतंकी उन्हें छू नहीं सकते हैं । ऐसी घटना में तो आम आदमी मारा जाता है, या अधिक से अधिक कोई सरकारी मुलाजिम । जानमाल का नुकसान भी आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है । भारत की गरीब जनता की जुबान भुक्तभोगियों को दो-चार लाख की मदद देकर बंद करने की कला हमारी सरकारें बखूबी जानती हैं । यह पैसा उन्हें वास्तव में मिलता भी है मुझे तो इसमें भी शंका होती है । भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे सरकारी तंत्र में गरीब के पैसे पर भी लार टपकाने वालों की कमी थोड़े ही है ।

हमारे नेताओं में सामूहिक विचारणा का नितांत अभाव है । वे यह विचार नहीं करते कि ऐसी घटनाएं रुकें कैसे । जब घटना हो जाती है तो बस जांच शुरू हो जाती है । ठीक हैं जांच होनी चाहिए, पर जांच से क्या कोई सबक लिया जाता है ? घटना के लिए कौन जिम्मेदार है यह भी पता चल जाए, वह पकड़ में भी आ जाए, उसे सजा भी हो जाए, पर इस सब से भविष्य की घटनाएं रुक जाएंगी क्या ? आगे क्या किया जाना चाहिए यह बात जांच से न सीखी जाए तो उसका महत्व ही क्या रह जाता है ? जो होना था वह हो गया, सबक तो भविष्य के लिए सीखा जाता है । सरकारें अभी तक सीख पाई हैं ? कुछ दिनों के हल्लेगुल्ले के बाद सब शांत हो जाता है ।

अवांछित हस्तक्षेप

इस समय हर सरकारी तंत्र राजनैतिक हस्तक्षेप का शिकार है । सूचना तंत्र एवं जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने नहीं दिया जाता है । कांग्रेस के दिग्विजय सिंह जैसे नेता तो अपने अनुमान को ऐसे पेश करते हैं जैसे कि वे घटना के चस्मदीद गवाह हों । अरे जांच एजेंसियों को नतीजे तक पहुंचने तो दीजिए । लेकिन अपनी बेहूदी आदत से मजबूर जो हैं । आज तक नहीं सुधर सके तो अब क्या सुधरेंगे । मुझे लगता है कि राजनेताओं के मौजूदा रवैये से क्षुब्ध होकर सूचना एवं जांच एजेंसियां भी अपने कार्य में ढिलाई बरतने लगी हैं । किसी की जवाबदेही भी तो कभी तय नहीं होती है ।

हमारी राज्य सरकारों ने भी कसम खा रखी है कि केंद्र सरकार के साथ मिलकर आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई नहीं लड़नी है । हर राजनैतिक दल अपने दलीय नफे-नुकसान का हिसाब लगाकर आगे के कदम उठाता है । देशहित उनके लिए दोयम दर्जा रखता है । जिस लोकतंत्र में नेतागण इतने स्वार्थी हों वह कभी सफल नहीं हो सकता ।

सेक्युलरिज्म का राजनैतिक रोग

एक बात और ध्यान देने की है । अपने अधिकतर राजनैतिक दल “सेक्युलरिज्म” के गंभीर रोग से पीड़ित हैं । मैं उनके इस रोग को ऑब्सेसिव कंपल्सिव सिंड्रोम (obsessive compulsive syndrome) कहता हूं । वे आतंकी घटनाओं को भी बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के विभाजन से जोड़कर देखने लगते हैं । ये याद रखें कि आतंकवाद दुनिया भर में है, अलग-अलग कारणों से है । अधिकतर कारण स्थानीय अथवा क्षेत्रीय स्तर पर संसाधनों एवं शासकीय व्यवस्था को लेकर लोगों के बीच पनप रहे असंतोष से जुड़े हैं । इसलिए संबंधित आतंकी घटनाओं का महत्व अंताराष्ट्रीय न होकर केवल राष्ट्रीय होकर रह जाता है ।

लेकिन जेहादी आतंकवाद सही अर्थों में अंताराष्ट्रीय प्रकृति का है और “इस्लाम खतरे में है” के नारे के साथ चल रहा है । जब ऐसी आतंकी घटना हो तो उसे सेक्युलरिज्म के हिमायती होने का दावा करते हुए हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए । किंतु कई दल राजनैतिक लाभ पाने के चक्कर में वहां भी सेक्युलरिज्म का नारा बुलंद करने से नहीं हिचकते हैं । वे यह दावा भी कर बैठते हैं अल्पसंख्यकों को फ़ंसाया जा रहा है । यह कितना सच है इसका निर्णय ईमानदार नेता जांच पर छोड़ेगा । लगता है जांच एजेंसियां भी राजनीति में रंग चुकी हैं । ऐसे में भगवान ही मालिक है । – योगेन्द्र जोशी