भौतिक भोगवाद की अमेरिकी जीवनशैली, जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में

भौतिक सुविधा से लैस आधुनिक अमेरिकी जीवन पद्धति को मेरी दृष्टि में कार-क्रेडिटकार्ड संस्कृति कहा जाना चाहिए ।

क्रेडिटकार्ड संस्कृति

पहले क्रेडिटकार्ड की बात । कहा जाता है कि आधुनिक क्रेडिटकार्ड का जन्म अमेरिकी धरती पर ही सन् 1920 में हुआ था, जब व्यावसायिक संस्थाओं द्वारा अपने ग्राहकों को सामान एवं ‘सेवा’ उधार बेचे जाने लगे (क्लिक करें http://inventors…) । उन्होंने ग्राहकों के साथ लेनदेन हेतु अपने-अपने कार्ड (क्रेडिटकार्ड अर्थात् उधारी के लिए कार्ड) वितरित किये । बाद में दो दशक के भीतर उन्होंने एक-दूसरे के कार्डों को भी मान्यता देना शुरु कर दिया । इस विनिमय व्यवस्था के तहत ‘क्रेडिटकार्ड-कंपनियां’ अपने कार्ड-धारक के द्वारा की गयी खरीद-फरोख्त के पैसे की जिम्मेदारी स्वयं उठाती हैं, जिसका भुगतान धारक बाद में निर्धारित नियम-शर्तों के अनुसार उन्हें बाद में करता है । आपकी जेब में किसी पल खर्चे के लिए पैसा न हो तो कोई बात नहीं, कार्ड आपकी मदद करेगा । उधार चुकता होता रहेगा । आज क्रेडिटकार्ड अमेरिकी जीवन का अभिन्न हिस्सा है, जिसके बिना वहां जीना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल अवश्य है । यह व्यवस्था अब विश्व के विकसित-अर्धविकसित क्षेत्रों में अपने पांव पसार चुकी है । इस क्रेडिटकार्ड संस्कृति के पीछे मुझे एक संदेश छिपा दिखता हैः “पैसा पास नहीं तो क्या, कल की आमदनी आज खर्च कर डाल”, जिसे “ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्‌” की चार्वाक-सम्मत धारणा का आधुनिक अमेरिकी संस्करण कह सकते हैं । मुझे लगता है कि ‘ऋणं कृत्वा’ की यह नीति प्राकृतिक संसाधनों के मामले में भी अपनाई जा रही है

कार संस्कृति

और अब कार संस्कृति की बात । इस ‘कार’ शब्द को मैं भौतिक सुख-सुविधा के लिए प्रयोग में लिए जा रहे आधुनिक मशीनी व्यवस्था के प्रतीक के रूप में प्रयोग में ले रहा हूं । इंग्लैंड में जन्मी और पिछले दो-ढाई सौ वर्षों से निरंतर प्रगतिशील औद्योगिकी ने वैश्विक स्तर पर चामत्कारिक सांस्कृतिक परिवर्तन कर डाले हैं । सर्वप्रथम एवं सर्वाधिक बदलाव यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका में देखने को मिले हैं, जहां औद्योगिक क्रांति और उससे अर्जित संपन्नता के फलस्वरूप लोगों का दैनिक जीवन मशीनों पर निर्भर हो चुका है । मैं उन मशीनों की बात कर रहा हूं जो ऊर्जा के किसी न किसी स्रोत की मांग करते हैं और जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव का कारण बने हैं । वस्तुतः विभिन्न मशीनों का आविष्कार इसी उद्येश्य से किया गया कि मानव जीवन को हर प्रकार के शारीरिक श्रम से मुक्त किया जा सके और उसे भौतिक कष्टों से छुटकारा दिलाया जा सके । अमेरिका मशीनों पर निर्भरता के मामले में कदाचित् सबसे आगे रहा है । वास्तव में वह अन्य सभी देशों के लिए एक मानक बन चुका है । फलतः हर देश अमेरिका की तरह भौतिक सुख-सुविधा के साधनों से संपन्न होने की चाहत के साथ विकसित होने में लगा है । विकास का मतलब ही है अमेरिका जैसा बनना । मैं अमेरिका का नाम सबसे पहले ले रहा हूं क्योंकि यह रोजमर्रा की जिंदगी में आधुनिक मशीनों के प्रयोग में कदाचित् सबसे आगे है । अन्यथा सभी संपन्न देश कमोबेश समान हैं और विकसित हो रहे देशों के लिए ‘आदर्श’ बने हुए हैं ।

अगर आप आज के अमेरिका पर नजर डालें तो पायेंगे कि वहां लगभग हर कार्य बिजली या पेट्रॉल/गैस जैसे इंधन से चलने वाली मशीनों से किया जाता है । स्वयं बिजली भी अधिकांशतः कोयला/पेट्रॉलियम/गैस से प्राप्त की जा रही है (80 फीसदी से अधिक) । अतः कहा जाना चाहिए कि ये मशीनें प्रत्यक्षतः अथवा परोक्षतः जीवाश्म इंधन पर निर्भर करती हैं और तदनुसार वायुमंडलीय कार्बन प्रदूषण का कारण हैं

मशीनों की बातें करने पर मेरे ध्यान में सबसे पहले कारें आती हैं, जो अमेरिका के लोगों के जीवन का अनिवार्य अंग बन चुकी हैं । बिना कार के वहां जीवन नामुमकिन नहीं तो मुश्किल अवश्य है, क्योंकि अमेरिका में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था कारगर नहीं है । न्यू-यार्क जैसे घने बसे शहरों को अपवाद रूप में देखा जाना चाहिए । अनुमान है कि अमेरिका में इस समय 10 करोड़ से अधिक कारें हैं, जब कि उसकी आबादी करीब 31 करोड़ है । (क्लिक करें http://www.census…) कैलिफोर्निया, जो अमेरिका का सर्वाधिक संपन्न राज्य है, में प्रति परिवार औसतन डेड़-दो कारें आंकी जाती हैं । अमेरिका में कारें परिवहन का सबसे सस्ता माध्यम बन चुकी हैं । इसे एक उदाहरण से समझ सकते हैं । सान-होजे से सान-फ्रांसिस्को (दोनों बड़े शहर) तक रेलगाड़ी से आने-जाने में जो खर्च आता है उससे कम में कार से वह सफर तय हो सकता है । ऐसा क्यों न हो भला, जब वहां तीन-सवातीन डालर में एक गैलन पेट्रॉल मिल जाता है (और उसे भी महंगा बताया जाता है), अर्थात् करीब 40 रुपये में एक लीटर, अपने हिंदुस्तान से सस्ता ! (बता दूं कि 1 अमेरिकी गैलन = 3.8 लीटर और 1 डालर = 46-47 रुपये) यह कीमत वाकई कितनी कम है इसे समझने के लिए यह जानना काफी होगा कि एक अमेरिकी की औसत सालाना आमदनी एक भारतीय से करीब 13 गुना अधिक है, अर्थात् वह भारतीय से 13 गुना अधिक धन व्यय कर सकता है । यह भी देखें कि कार के साथ एक अतिरिक्त लाभ यह कि उसके प्रयोग में लचीलापन है – अपनी सुविधा से जब चाहें जहां चाहें जा सकते हैं ।

इस सब का मतलब है हर अमेरिकी परिवार में कम से कम एक कार का होना । यदि कार नहीं है तो माली हैसियत जरूर कमजोर होगी, किंतु ऐसे कमजोर लोगों की तादाद मेरे अंदाज से कुल जनसंख्या के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी । आप सड़कों पर सर्वत्र कारों को दौड़ते पायेंगे, शायद अर्धरात्रि से सुबह तक कुछ सन्नाटा रहता होगा । फुटपाथों पर कभी इक्का-दुक्का आदमी पैदल दिखेंगे, संभव है टहलने निकले हों । कभी-कभी साइकिल के दर्शन भी हो सकते हैं । शाम के वक्त ऊंची जगह से किसी ‘फ्री वे’ पर नजर डालेंगे तो आपको पेट्रॉल-डीजल चालित वाहनों की रोशनी का सैलाब सड़क पर बहते हुए दिखेगा । इतना ही नहीं, आप देखते हैं सड़क किनारे की रात्रिकालीन जगमग रोशनी, केवल निर्जन क्षेत्रों को छोड़कर सर्वत्र ।

इतनी बड़ी संख्या में कारों और अन्य वाहनों के लिए शहरी इलाकों में लंबी-चीैड़ी सड़कों का जाल बिछा हुआ है, तो छोटे-बड़े शहरों को जोड़ने के लिए अधिकतर जगहों में 6-6 या 8-8 लेनों वाली ‘फ्री-वे’ का जाल है, ताकि वाहन निर्धारित गति (जो अधिकतर क्षेत्रों में 70 मील करीब यानी 113 किलोमीटर प्रति घंटा रहती है) से चल सकें । कहीं कोई रुकावट न झेलनी पड़े इस उद्येश्य से वे क्रासिंग-मुक्त होते हैं । फ्लाई-ओवरों का जाल सर्वत्र बिछा हुआ है ताकि हर मार्ग की कोई ‘लेन’ दूसरे के बगल से समांतर जुड़ जाये ।

मैं कह चुका हूं कि अमेरिका में ‘पब्लिक ट्रांसपोर्ट’ (सार्वजनिक परिवहन) की स्थिति उत्साहवर्धक नहीं है, क्योंकि निजी कारें सस्ती तथा सुविधाजनक सिद्ध होती हैं । इस ‘कार-कल्चर’ के अनुरूप किराये के कारों का चलन वहां काफी है, या फिर जरूरी हुआ तो निजी कार का वैकल्पिक अवतार, टैक्सी । जो लंबी दूरी कार से न तय करना चाहते हैं, वे रेल या हवाई सफर से गंतव्य को जाते हैं और वहां किराये के कार का प्रयोग करते हैं । क्षेत्रफल की दृष्टि से अमेरिका अपने देश से करीब 3 गुना बड़ा है । वहां पूर्वी तट से पश्चिमी तट तक की हवाई यात्रा 5-6 घंटे ले लेती है – दिल्ली से सिंगापुर तक का हवाई समय समझिए । ऐसे में रेल-यात्रा लोकप्रिय नहीं है । यह बात विचारणीय है कि जापान-फ्रांस की भांति अमेरिका में तेज रफ्तार ट्रेनें विकसित नहीं हुई हैं । अतः दूरस्थ स्थानों के लिए हवाई यात्रा ही प्रचलन में है । किसी बड़े हवाई अड्डे पर प्रति मिनट दो-एक वायुयानों को उड़ना-उतरना आम बात है । इस सब का अर्थ है पेट्रॉल की खपत ।

मशीनें, सर्वत्र मशीनें

ऊर्जा की खपत मुख्यतः कारों-वायुयानों तक ही सीमित हो ऐसा नहीं है । आज के अमेरिका में प्रायः हर कार्य मशीनों द्वारा होता है । शारीरिक श्रम इन मशीनों को चलाने/नियंत्रित करने तक सीमित है, या उन कार्यों में प्रयुक्त होती हैं जिनके लिए उपयुक्त साधन अभी विकसित नहीं हुए हैं, जैसे ग्रॉसरी-स्टोर से सामान खरीदकर कार तक लाना, किचन में भोजन तैयार कर परोसना और खाना, अथवा डाक्टरी सलाह पर व्यायाम करना, इत्यादि । अन्यथा श्रम-आधारित अधिकांश कार्य बिजली की खपत वाले उपस्कर करते हैं । कपड़े धोने-निचोड़ने-सुखाने के लिए ‘वाशिंग-कम-ड्राइंग’ मशीन, खाने-पीने की वस्तुओं को दिनों-दिनों संरक्षित रखने के लिए बड़े-सा फ्रिज, ‘कार्पेट-क्लीनिंग’ के लिए ‘वैक्यूम-क्लीनर’, बर्तनों के लिए ‘डिश-वॉशर’ इत्यादि । इतना ही नहीं, घर भर को पानी की आपूर्ति के लिए पानी गर्म करने का उपस्कर । घरों के तापमान को अपने अनुकूल रखने के लिए ‘एसी’ तथा ‘हीटर’ । कंप्यूटर ओर इंटरनेट सुविधा भी करीब-करीब सबके पास । इन सबके साथ-साथ प्रायः हर उपकरण को नियंत्रित करने के लिए ‘स्टैंड-बाई’ विधा से लैस ‘रिमोट कंट्रोल’ सुविधा । बिजली-पानी की आपूर्ति तो चौबीसों घंटे रहनी ही है ।

यह तो हुई घरों की बात । घर के बाहर की दुनिया भी उतनी ही आकर्षक । बाजार का मतलब भी अपने यहां से कुछ अलग ही । मेरा अनुमान है कि अमेरिका में अब छोटे-मोटे उद्योग-धंधे भी नहीं रह गये हैं, क्योंकि छोटी-मोटी रोजमर्रा की चीजें आयातित की गईं नजर आती हैं, अधिकतर चीन से । मुझे लगता है कि सभी उद्योग ‘कॉर्पोरेट हाउसेज’ के हाथ में जा चुके हैं, और बाजार भी उनमें से एक है । उपभोक्ता वस्तुएं के लिए ‘डिपार्टमेंटल स्टोरों’ की शृंखलाएं नजर आती हैं या बड़े-बड़े ‘मॉल’ जहां या तो व्यक्तिगत छोटी-मोटी दुकानें सजी रहती हैं, या फिर खास उपभोक्ता वस्तुओं के लिए चेन-स्टोर । ये सभी स्थान पूर्णतः वातानुकूलित । जमाना ‘फ्रोजन-फूड’ का है और उनके लिए इन स्थानों पर अलग से अधिक ठंडे भंडारण कक्ष । मॉल तथा स्टोर बिजली से जगमग, रात-दिन, जैसा मेरा अनुभव रहा है । मेरा अनुमान है कि इन स्टोरों की बत्तियां कभी बुझाई नहीं जाती हैं । इन सभी जगहों पर एक मंजिल से दूसरे पर जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ने की जरूरत नहीं रहती, ‘इस्केलेटर’ जो रहते हैं इस काम के लिए, या फिर ‘एलिवेटर’ (ब्रिटिश अंग्रेजी में ‘लिफ्ट’) । इतना ही नहीं, अधिकांश स्टोरों के प्रवेश-द्वारों के कपाट तक प्रायः स्वचालित रहते हैं; आप निकट पहुंचे नहीं कि वे स्वयं ही खुल जाते हैं ।

मैंने कहा कि करीब-करीब सभी घरों में आधुनिक सुविधा के साधन उपलब्ध रहते हैं । इनमें से एक, वैक्यूम क्लीनर, ने घरों/स्टोरों से निकलकर सड़कों एवं आवासीय परिसरों में भी जगह पा ली है । इन स्थलों की सफाई हाथ के झाड़ू से नहीं बल्कि इन्हीं वैक्यूम क्लीनरों से की जाती है, जो सफाई वाली गाड़ियों/ट्रॉलियों में लगे रहते हैं, या फिर हाथ के छोटे क्लीनरों को पेट्रॉल-इंजन/बैटरी से चलाते हुए इस्तेमाल किया जाता है । हर हाल में थोड़ा शारीरिक श्रम तो है, किंतु न्यूनतम संभव । जिंदगी आरामदेह है अमेरिका में । जिसके पास पर्याप्त धन नहीं उसे तो वहां भी कष्ट रहते हैं । किंतु इतनी निर्धनता वाले लोगों की संख्या 10 प्रतिशत से कम ही होगी ऐसा मेरा विश्वास है ।

संक्षिप्त कामचलाउ शब्दों में खींची तस्वीर है यह मशीनों पर निर्भर अमेरिका की । वस्तुतः कमोबेश यही तस्वीर है सभी विकसित देशों की और इसी सब का ख्वाब देख रहे हैं विकासशील देश । लेकिन जिस सुख-सुविधा की बात कही है वह ऐसे ही नहीं मिलती है; उसके लिए ऊर्जा चाहिए, जो घूम-फिर कर जीवाश्म इंधन से ही मुख्यतया प्राप्त की जा रही है (80 फीसदी से अधिक), और बदले में पैदा होती है वायुमंडल में घुल रही कार्बन डाई-ऑक्साइड (कार्बन उत्सर्जन) । प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन में अमेरिका अग्रणी है, आस्ट्रेलिया के ठीक पीछे, यहां बताई गयी जीवनशैली के कारण । (क्लिक करें http://www.ucsusa…)

आजकल जिस जलवायु परिवर्तन की बात की जा रही है उसके मूल में है जीवाश्म इंधनों का अतिशय प्रयोग, जो स्वयं में उपर्युल्लिखित अमेरिकी में विकसित आधुनिक जीवन शैली के कारण हो रहा है । तब क्या यह समझना कठिन है कि समस्या के निराकरण के लिए इस जीवनशैली से कम से कम अंशतः मुक्त हुआ जाए ? लेकिन यह हो नहीं सकता; कौन भला अधिकाधिक सुख-सुविधाएं नहीं चाहता ? धन से समर्थ हो फिर भी उन पर कम निर्भर हो ? – योगेन्द्र जोशी

लाइलाज जलवायु परिवर्तन, कोपनहेगन शिखर सम्मेलन, तथा विस्तार अमेरिकी जीवनशैली का

संप्रति सारा विश्व तरह-तरह की समस्याओं से जूझ रहा है, किंतु जो समस्या सर्वाधिक महत्त्व की मानी जा रही है, और जिसे हर देश के लिए चिंता का विषय बताया जा रहा है वह है जलवायु परिवर्तन की बात । पिछले दो-तीन दशकों से वैज्ञानिक दावा करते आ रहे हैं कि मानव-सक्रियता के कारण धरती की सतह पर आवरण रूप में स्थिर वायुमंडल शनैःशनैः गरमाता जा रहा है और उसके फलस्वरूप जलवायु का वैश्विक प्रतिमान (पैटर्न) बदल रहा है । उनके अनुसार आने वाले समय में कई समस्याओं से मानव जाति को जूझना पड़ेगा, और यदि समय रहते समुचित कदम न उठाए गये तो स्थिति बेकाबू हो सकती है । और तब संभव है कि मानव जाति के लिए अपना अस्तित्व ही बचा पाना कठिन हो जाए ।

अपनी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि का उपयोग करते हुए मैं स्वयं पिछले तीन-चार सालों से इस विषय का अध्ययन कर रहा हूं । विज्ञानियों के द्वारा दिए जा रहे तर्क, उपलब्ध आंकड़ों की उनके द्वारा की जा रही समीक्षा और प्रस्तुत किये जा रहे निष्कर्षों को समझ पाना मेरे लिए स्वाभाविक रूप से सरल है । मैं उनकी समीक्षा-विधि में विश्वास करता हूं और मानता हूं कि जानबूझ कर विषय के साथ छेड़छाड़ करके भ्रम फैलाने का वे प्रयास नहीं कर रहे हैं । मुझे यह भी ज्ञात है कि विज्ञानियों और आम लोगों में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इस जलवायु परिवर्तन की बात को सिरे से खारिज करते हैं । काश, उनका मानना सच हो जाता और मानव जाति सुख से विकास की राह पर चलती रहती । विषय की जो समझ मैंने इस बीच हासिल की है उसके आधर पर मैं यही महसूस करता हूं कि मुद्दा गंभीर है, वैश्विक तापमान बढ़ रहा है, और जलवायु प्रतिमान (पैटर्न) वाकई बदल रहा है, जो कालांतर में पूरे प्राणिजगत् के लिए घातक सिद्ध हो सकता है ।

जलवायु परिवर्तनः ग्रीन-हाउस गैसें

मेरा इरादा इस स्थल पर जलवायु परिवर्तन के कारणों तथा उस पर नियत्रण पाने के तरीकों की व्यापक चर्चा करने का नहीं है । मुझे उन कुछ ज्ञातव्य तथ्यों का जिक्र करना है जिनकी ओर सामान्यतः ध्यान नहीं जाता है, या जिन्हें हल्के-फुल्के में लेकर भुला दिया जाता है । वांछित समाधान खोजते वक्त इन तथ्यों पर भी नजर डालनी चाहिए ऐसा मेरा मत है । अपनी बातें मैं यह कहते हुए आरंभ करता हूं कि कथित जलवायु परिवर्तन के लिए ‘ग्रीन-हाउस गैसें’ जिम्मेदार हैं, जिनमें ‘कार्बन डाई-ऑक्साइड’ प्रमुख है । दरअसल अभी पूरी जिम्मेदारी इसी पर थोपी जा रही है । वस्तुतः इस गैस से कहीं अधिक प्रभाविता वाली गैसें हैं ‘मीथेन’, ‘नाइट्रस ऑक्साइड’, ‘क्लोरोफ्लोरोकार्बन या संक्षेप में सीएफसी’, एवं ‘ओजोन’ । किंतु इनकी मात्रा वायुमंडल में अपेक्षया काफी कम है, उस मात्रा में बीतते समय के साथ कोई विशेष वृद्धि नहीं देखी जा रही है, और ये काफी हद तक वायुमंडल में एक प्रकार से संतुलन की अवस्था में हैं । इसके विपरीत करीब 200 वर्ष पहले आरंभ हुई औद्योगिक क्रांति के बाद से वायुमंडलीय कार्बन डाई-ऑक्साइड की मात्रा में लगातार वृद्धि देखी गयी है । इसकी मात्रा प्राग्-औद्योगिक काल से अब तक तीस-पैंतीस प्रतिशत बढ़ चुकी है (पहले के 280 पीपीएम से इस समय के 387 पीपीएम तक; पीपीएम माने पार्ट्स पर मिलियन, अर्थात् समस्त वायुमंडलीय गैसों के 10 लाख हिस्सों में कितने हिस्से इस बात की माप) । इस वृद्धि के मूल में है जीवाश्म इंधनों (कोयला, पेट्रोलियम, एवं ‘नैचतल गैस’) का मनमाना प्रयोग, जिन पर मानव जाति अपनी प्रायः संपूर्ण ऊर्जा जरूरतों के लिए आश्रित है और जो इस्तेमाल किये जाने पर वायुमंडल में कार्बन डाई-ऑक्साइड का उत्सर्जन करते हैं । अन्य ऊर्जा-स्रोतों का उपयोग वैश्विक स्तर पर बमुश्किल करीब पंद्रह प्रतिशत है । कार्बन डाई-ऑक्साइड के उत्सर्जन को संक्षेप में ‘कार्बन उत्सर्जन’ (carbon emission) नाम भी दिया गया है ।

इतना और बता दूं कि वैज्ञानिकों के अनुमान के अनुसार यदि इस शताब्दि के अंत तक ‘कार्बन प्रदूषण’ यानी कार्बन डाई-ऑक्साइड प्रदूषण की वृद्धि 480 पीपीएम तक सीमित रहे तो भी कथित तापमान में करीब 2 डिग्री का इजाफा होगा । बढ़ रहे इस तापमान से जुड़े हैं सागरों के जलस्तर का ऊपर उठना, जिसका मतलब है तटीय क्षेत्रों की भूमि का जलप्लावित होना तथा छोटे द्वीपों का सागरों में समा जाना । बढ़ते तापमान के साथ नदियों के स्रोत ग्लेशियरों का पिघलकर सिमटना या लुप्त हो जाना । तब विश्व की कई नदियां करीब-करीब सूख जायेंगी । इसके अतिरिक्त जलवर्षा का स्वरूप भी बदलना, कहीं अतिवर्षण तो कहीं सूखे की स्थिति, आंधी-तूफानों की संख्या एवं उनकी तीव्रता में भी इजाफा । इसी प्रकार के कई प्रभाव देखने को मिलेंगे । उम्मीद की जाती है कि दो डिग्री की तापमान वृद्धि तक हालात संभल सकते हैं, किंतु उसके आगे संभव है कि स्थिति नियंत्रण से बाहर ही हो जाए ।

कोपनहेगन शिखर बैठक

इस कार्बन प्रदूषण की समस्या का समाधान खोजने में अब विश्व के वैज्ञानिक तथा राजनेता जुट गये हैं, किंतु राजनेताओं की एकजुटता संदेहास्पद है । समाधान खोजने का औपचारिक प्रयास 1997 के ‘क्योटो नयाचार या प्रोटोकॉल’ से आरंभ हुआ और बीच में समय-समय पर आयोजित विभिन्न बैठकों/सम्मेलनों के पश्चात् ‘कोपनहेगन शिखर सम्मेलन’ (COP 15, Dec 7-18) के रूप में आजकल देखने को मिल रहा है ।

विश्व के विभिन्न देश कार्बन प्रदूषण कम करने के लिए सार्थक जिम्मेदारी उठाने के लिए राजी होवें इस आशय से उक्त शिखर-सम्मेलन आयोजित किया गया है । कौन कितना प्रदूषण कम करे इस पर बहस चल रही है । अलग-अलग गुटों में बंटे ये देश अलग-अलग कार्यसूची यानी एजेंडा पेश कर रहे हैं । प्रदूषण की अधिकतम सीमा क्या हो इस पर भी मतभेद है । जहां विकासशील देश 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल के मद्देनजर इस बात पर जोर दे रहे हैं कि विकसित देश प्रदूषण में सर्वाधिक कटौती की जिम्मेदारी लें, क्योंकि वे ही आज के चिंताजनक हालात के लिए उत्तरदायी हैं, वहीं विकसित देश, खासकर अमेरिका, सभी के लिए लगभग समान जिम्मेदारी की बात कर रहे हैं । कई जानकार लोगों को शंका है कि यह सम्मेलन अपने उद्येश्य में सफल नहीं हो पायेगा । अंततोगत्वा क्या होने जा रहा है इसके लिए कल यानी 18 तारीख तक इंतजार करना पड़ेगा ।

जब मुझसे कोई पूछता है कि यह समस्या सुलझ पायेगी कि नहीं, तब मेरा उत्तर साफ ‘नहीं’ रहता है । बहुत कुछ किया जा सकता है, किंतु करेगा कौन ? सिद्धांततः जो हो सकता है मैं उसकी बात करना बेमानी समझता हूं । जिन तरीकों को दुनिया अमल में लाने को तैयार ही न हो उन तरीकों की बात ही क्यों की जाये ? जलवायु परिवर्तन की समस्या को सुलझाना उतना ही कठिन है जितना अपने देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को मिटाना । यह समस्या उतनी ही लाइलाज है जितना किसी रुग्ण शराबी का इलाज करना जो शराब छोड़ने को ही राजी न हो पर जिसे बारबार शराब छोड़ने की सलाह दी जा रही हो । मैं पूछता हूं कि क्या आप अपनी कार/बाइक कबाड़खाने में पटककर पैदल या बाइसिकिल से चलने-फिरने को राजी हैं ? यदि नहीं, तो समस्या या कोई हल नहीं है । मेरी बात आपकी समझ में आ जाएगी जब आप अधोलिखित बात पर गौर करें ।

विसंगतिः कोसना अमेरिका को और अपनाना उसकी जीवन शैली

वायुमंडल में व्याप्त कार्बन प्रदूषण के लिए सबसे अधिक अमेरिका, यानी दुनिया का सर्वाधिक ताकतवर देश यू.एस.ए., को ठहराया जाता है । बात भी सही है । तीन-चार साल पहले तक अमेरिका कार्बन उत्सर्जन के मामले में पहले स्थान पर था और उसके विश्व भर के उत्सर्जन का एक-तिहाई के लिए वही जिम्मेदार था । एक वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार अब चीन ने ‘बाजी’ मार ली है और दोनों देश मिलकर विश्व के कुल उत्सर्जन का करीब पचास प्रतिशत उत्सर्जन कर रहे हैं (देखें अलग-अलग देशों के कार्बन उत्सर्जन के आंकड़े) । प्रति व्यक्ति उत्सर्जन की अगर बात करें तो अमेरिका अभी भी आस्ट्रेलिया के बाद शीर्ष पर है और चीन की तुलना में उसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन करीब 4 गुना अधिक है और भारत से करीब 17 गुना अधिक । धान दें कि चीन की जनसंख्या अमेरिका से करीब 4.5 गुना अधिक है, अतः उसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन कम ठहरता है । दरअसल मौजूदा कार्बन प्रदूषण के लिए अमेरिका तथा उसके साथ-साथ अन्य विकसित राष्ट्र जिम्मेदार रहे हैं, जिन्होंने ऐसी जीवन शैली अपना डाली जो जीवाश्म इंधनों की अंधाधुंध खपत पर आधारित रही है । अमेरिका ने विकास का एक ऐसा मॉडल दुनिया के सामने रख दिया जिसकी चकाचौंध सबको अंधा कर गई और सभी उस माडल को अपनाकर ‘अमेरिका जैसा’ बनने निकल पड़े । अब जब उस विकास के कुप्रभाव नजर आने लगे हैं तो सभी किंकर्तव्यविमूढ़-से हो चले हैं ।

विडंबना यह है कि जिस अमेरिका की भोगवादी संस्कृति की आलोचना की जाती है और जिस अमेरिका में रोजमर्रा की जिंदगी में ऊर्जाखाऊ मशीनों का ही बोलबाला है, उसी अमेरिका के जैसा बनने की चाहत में सभी देश प्रयत्नशील हैं । विकासशील देश चाहते हैं कि उनके यहां भी आठ-आठ लेन की सड़कें हों, उन सड़कों पर दौड़ाने के लिए हर व्यक्ति के पास अपनी निजी कार हो, सभी के लिए हवाई यात्रा करना सुलभ हो, हर व्यक्ति वातानुकूलित घर में रहे, हर घर में कपड़े धोने-सुखाने तथा बर्तन मांजने की मशीनें लगी हों, हर घर में हफ्ते-हफ्ते भर के लिए ‘फ्रोजन-फूड’ एवं अन्य भोज्य पदार्थ भंडारित करने के लिए भारी-भरकम फ्रिज हो, असीमित खर्चें के लिए बिजली की चौबीसों घंटे की निर्बाध आपूर्ति हो, इत्यादि-इत्यादि । ‘लिस्ट’ लंबी है । अमेरिकी जीवन-शैली का सार्थक वर्णन दो-चार वाक्यों में संभव नहीं है । इस बारे में अलग से फिर लिखूंगा । इतना सब कहना आवश्यक है यह बताने के लिए जिस अमेरिकी जीवन-शैली को विकासशील देश अपनाना चाहते हैं वह सब बिना जीवाश्म इंधनों के अभी संभव नहीं है । ऊर्जा के अन्य स्रोत अभी पर्याप्त मात्रा में जुटा पाना आसान नहीं है । इस बारे में अतिआशावाद दिखाना मूर्खता होगी । अतः अगर विकसित देश अपनी जीवन-शैली बदलने को तैयार नहीं और विकासशील देश उसी जीवन-शैली के पीछे भाग रहे हों, तो कार्बन उत्सर्जन तो होते ही रहना है । विकसित होना हो, और वह भी तेजी से, तो उत्सर्जन की चिंता छोड़नी पड़ेगी । तब भला समाधान कहां है ?

जीवन-शैली बदलने की बात खुलकर और पूरे जोर से कोई नहीं कर रहा है । सर्वत्र वैकल्पिक विधियों और अधिक उन्नत दर्जे की तकनीकी विकसित करने की बातें की जा रही हैं । क्या वाकई में वह सब कर पाना सरल और फलदायी होगा ? इस विषय पर अधिक चर्चा अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी