मध्यम वर्ग की बढ़ती संपन्नता का अभिशाप – बीजिंग में कारें और यातायात एवं प्रदूषण समस्या

चंद रोज पहले मेरी नजर बीबीसी की एक खबर पर पड़ी, जिसका विवरण इस वेब-पेज पर उपलब्ध  है: http://www.bbc.co.uk/hindi/business/2010/12/101224_beijing_car_pp.shtml चीन की राजधानी बीजिंग में कारों की बढ़ती आबादी और तज्जन्य यातायात की गंभीर होती जा रही समस्या के बारे में थी वह खबर । मेरी नजर में खबर रोचक ही नहीं बल्कि चिंतनीय  भी थी, क्योंकि उसके निहितार्थ गंभीर हैं । महानगरीय यातायात (ट्रैफिक) की समस्या तो विकसित हो रहे सभी देशों में देखने को मिल रही है, और यह बात कोई नयी खबर अब रह नहीं गयी है । संदर्भगत खबर मेरे लिए इसलिए अहम थी, क्योंकि बीजिंग के राजमार्ग की तस्वीर कुछ हद तक मेरी कल्पना से परे की थी । मैं अभी तक चीन को विकास के संदर्भ में अमेरिका के नजदीक नहीं समझता था और नहीं सोचता था कि सड़क के फ्लाइओवरों के इतने लंबे-चौढ़े जाल वहां भी विकसित हो चुके होंगे और यह भी कि रात के प्रथम प्रहर – समय यही रहा होगा – उन पर कारों की इतनी जबर्दस्त भीड़ दौड़ रही होगी, जैसा खबर के साथ की तस्वीर में दिख रहा था ।
खबर का असल मुद्दा बीजिंग की गंभीर होती यातायात समस्या थी । यह बताया गया है कि बीजिंग की सड़कों पर कारों का बोझ तेजी से न बढ़े इसके उपाय खोजे जा रहे हैं । इस दिशा में अपनाया गया पहला और कारगर उपाय है कारों की विक्री पर आंशिक रोक । नगर प्रशासन ने घोषित किया है कि बीजिंग के बाशिंदों को 2011 में केवल 2 लाख 40 कारें खरीदने की अनुमति होगी । यह संख्या पिछले साल खरीदी गयीं तकरीबन 7 लाख कारों के मुकाबले लगभग एक-तिहाई है । उक्त सरकारी निर्णय से जनता और निवेशक, दोनों, नाखुश हैं – जनता इसलिए कि उसकी निजी कार रखने की ख्वाहिश पर अड़ंगा लगता है, और निवेशक इसलिए कि उनके लाभ कमाने के अवसर घटते हैं । इस समय कार-डीलरों के पास भीड़ लगी हुई है, ताकि लोग प्रतिबंध के प्रभावी होने से पहले ही अपने अरमान पूरे कर सकें ।

संप्रति बीजिंग यातायात एवं प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है । सड़कें तेजी से बढ़ती कारों की संख्या को किस हद तक बरदास्त कर सकेंगी यह एक कठिन सवाल उठ चुका है । सड़कों का चौड़ीकरण और फ्लाईओवरों का जाल भी एक सीमा से अधिक संभव नहीं है । इसलिए कारों की संख्या अंधाधुंध न बढ़ने पाए इसके लिए प्रयास तो होने ही चाहिए । यही वहां का नगर प्रशासन करने जा रहा है । यह तो गनीमत है कि चीन में लोकतांत्रिक शासन प्रणाली नहीं है, अन्यथा इस प्रकार का कथित प्रतिबंध संभव न होता । अपने देश में तो ऐसे प्रतिबंध का स्वागत धरना, प्रदर्शन, तोड़फोड़ तथा आगजनी के द्वारा होता, लेकिन बीजिंग में यह सब संभव नहीं है ।

इस संदर्भ में यह ज्ञातव्य है कि बीते दो-ढाई शताब्दियों में परवान चढ़ी औद्योगिक प्रगति का सीधा-सा परिणाम यह रहा कि पूरी दुनिया में एक नई वैश्विक संस्कृति ने जन्म लिया । वे जीवन मूल्य जो सदियों से अलग-अलग क्षेत्रों एवं समाजों में आदर पा रहे थे एक-एककर धराशायी हो गये । उसके साथ ही विश्व में सर्वत्र भोगवादी जीवनशैली ने अपने पांव पसारे । आज सर्वत्र अधिकाधिक तेजी से आर्थिक विकास की होड़ लगी है जिसके केंद्र में है उत्तरोत्तर आगे बढ़ता उपभोक्तावाद । आर्थिक प्रगति का मतलब ही है कि उपभोग्य वस्तुओं का अधिकाधिक उत्पादन हो । उनका उत्पादन बढ़े इसके लिए आवश्यक है कि उनकी खपत बढ़े और विशाल से विशालतर आकार लेता एक ऐसा संपन्न वर्ग समाज में पैदा होवे जो उन वस्तुओं का उपभोग करे । आज के युग में इस उद्येश्य से औद्योगिक संस्थाएं लगातार इस प्रयास में लगी हुई हैं कि नित नये आकर्षक उत्पाद बाजार में उतारे जाएं । इतना ही नहीं, कारों की भांति जो वस्तुएं टिकाऊ प्रकृति की हों उनके नये-नये मॉडल उपभोक्ता के समक्ष ‘परोसे’ जाएं । संस्थाओं द्वारा खपत बढ़ाने के लिए मति ‘मूड़’ सकने वाले विज्ञापनों को सहारा लिया जाता है और लोगों को उधार या कर्ज जैसी तात्कालिक मदद उपलब्ध कराते हुए भोगवाद को आगे बढ़ाया जा रहा है । इस दिशा में किए जा रहे सभी प्रयत्न सफल हो रहे हैं । लोगों की संपन्नता बढ़ रही है और उसके साथ वे सुविधाभोग के आदी होते जा रहे हैं । कुल मिलाकर उपभोक्तावाद सफल हो चला है । यह बात अलग है कि जहां एक ओर संपन्न वर्ग का आकार बढ़ रहा है तो वहीं विपन्न लोगों की संख्या भी कम नहीं हो रही है । कम से कम भारत जैसे देश के तो यही हालात हैं । शायद चीन में भी गरीबों की संख्या बहुत नहीं घट रही होगी । असल बात तो यह है कि वहां के असली हालातों की सटीक खबर कम ही मिल पाती है ।

अस्तु, इस समय सभी विकासशील देशों में निजी कारों की ललक तेजी से बढ़ रही है । इन देशों की ऊंची विकास दर के फलस्वरूप आर्थिक रूप से जो संपन्न मध्यम वर्ग उभर कर आ रहा है वह सुखसुविधाओं के तमाम साधन जुटाने में लगा है और उन साधनों में कारें प्रमुख हैं । दिलचस्प बात यह है कि कार जैसे तमाम आधुनिक साधन सुखसुविधा के लिए ही नहीं जुटाये जाते हैं, बल्कि ये सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रबल आधार भी बन चुके हैं । लोग कारें केवल इसलिए नहीं खरीदते हैं कि ये उनके दैनिक जीवन में सुविधाजनक सिद्ध होते हैं । वे तो इस बात से भी पे्ररित होते हैं कि उनके पड़ोसी, सहयोगी अथवा नाते-रिश्तेदार के पास कार है । हर कोई बराबरी ही नहीं बल्कि इन तमाम लोगों के आगे निकलना चाहता है संपन्नता में और फिर उसके प्रदर्शन में । शायद ही कोई तुलना किए बिना स्वयं में संतुष्ट रहने की कला सीखना चाहता होगा । सर्वत्र आगे निकल जाने की होड़ मची है और कारें उसका एक परिणाम है ।

वैसे भी संपन्नता खुद में एक सामाजिक समस्या है । जी हां, क्योंकि आप यदि संपन्न है तो करेंगे क्या अपनी संपन्नता का ? कोई भी दान करने के लिए धन नहीं कमाता है । हां अपने अर्जित धन का एक छोटा हिस्सा दान में दे जरूर सकता है, किंतु ऐसे मामले नियम नहीं, अपवाद होते हैं । संपन्नता है तो धन का उपभोग व्यक्ति करेगा ही, सुविधाएं जुटाएगा ही, कार खरीदेगा ही । और तब पैदा होती हैं तरह-तरह की समस्याएं । जहां व्यक्ति श्रमहीनता के जीवन के कारण रोगी बन जाता है, वहीं वह प्रदूषण जैसी समस्याएं पैदा करता है, कार का उपभोग करते हुए ट्रैफिक-जाम के प्रति योगदान करता है । याद रहे अपने लिए सुख-साधन जुटाते वक्त शायद ही कोई व्यक्ति इस बात पर विचार करता होगा कि कहीं इस सबसे अन्य लोगों को असुविधा तो नहीं होगी । “समस्या पैदा हों तो हों मुझसे क्या मतलब” यह आम जीवन दर्शन है । इस संदर्भ में मेरी प्रार्थना है, “सर्वे भद्राणि पश्यन्तु” । – योगेन्द्र जोशी

जलवायु परिवर्तन की समस्या – रोचक एवं चिंतनीय तथ्य विज्ञान पत्रिका ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ से

दिसंबर 17 की पोस्ट में मैंने वैश्विक जलवायु परिवर्तन के संबंध में संपन्न कोपनहेगन बैठक का जिक्र करते हुए अपनी कुछ टिप्पणियां प्रस्तुत की थीं । उसके बाद दिनांक 23-12-2009 की पोस्ट में उस मुद्दे से घनिष्ठ रूप से जुड़े अमेरिका-प्रेरित आधुनिक जीवन शैली का संक्षिप्त खाका पेश किया था । जलवायु परिवर्तन की समस्या के समाधान हेतु जिन प्रयासों की चर्चा जल रही है उनके बारे में भी कुछ कहने का मेरे मन में तब से विचार है । लेकिन इस बीच अमेरिकी विज्ञान पत्रिका ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ में छपा एक लेख मेरे देखने में आ गया, जिसमें जलवायु परिवर्तन के मूल कारण, यानी विकसित देशों में ऊर्जा की बेतहासा खपत, से संबंधित कुछ रोचक एवं चिंतनीय आंकड़े प्रस्तुत किये गये हैं । मैं इस आलेख में उनकी चर्चा करता हूं; अपनी बातें आगामी पोस्ट में । (स्रोतः साइंटिफिक अमेरिकन में डेविड बियलो, David Biello, का लेख ‘Environmental ills? It’s consumerism, stupid’ शीर्षक पर क्लिक करें ।)

(1) एक औसत बांग्लादेशी नागरिक के सालाना खर्चे से अधिक खर्चा यूरोप एवं अमेरिका में ‘जर्मन शेफर्ड’ प्रजाति के दो पालतू कुत्तों पर किया जाता है ।

(2) विश्व की प्रदूषण समस्या की गंभीरता के पीछे के कारणों में से एक अहम कारण है दुनिया की निरंतर बढ़ती जा रही जनसंख्या, जो इस सदी के मध्य (2050) तक अनुमानतः 9 अरब, यानी 900 करोड़, पार कर जायेगी । (अभी जनसंख्या करीब 675 करोड़ है, और उसमें चीन तथा भारत का सम्मिलित ‘योगदान’? – लगभग 250 करोड़ – एक तिहाई से भी अधिक है !) पिछले 50 वर्षों में वैश्विक जनसंख्या दुगुना हुई है, किंतु प्राकृतिक संसाधनों की खपत चौगुनी हो गयी ।

(3) हिसाब लगाया गया है कि कोपनहेगन की पिछली बैठक (विगत दिसंबर) में 40000 (चालीस हजार) से अधिक प्रतिभागियों के कारण मात्र दो सप्ताह के भीतर उत्सर्जित ‘ग्रीनहाउस गैसों’ की मात्रा 600000 (छः लाख) इथिओपियावासियों के साल भर के कुल उत्सर्जन से अधिक थी ।

(4) दुनिया के 50 करोड़ संपन्नतम लोगों (कुल आबादी का 7.5%) के द्वारा समस्त कार्बन प्रदूषण (कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन) का 50% फैलाया जाता है, जब कि 300 करोड़ (कुल आबादी के आधी से थोड़ा कम) सबसे गरीब लोगों के कारण मात्र 6% प्रदूषण होता है ।

(5) संयुक्त राष्ट्र संघ की 2005 की एक रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों का दोहन इतना अधिक हो रहा है कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए कुछ बच पायेगा यह संदेहास्पद है ।

(6) ‘वर्डवॉच इंस्टिट्यूट’ नामक संस्था के अध्यक्ष क्रिस्टोफर फ्लाविन (Christopher Flavin) के अनुसार “उपभोगवाद की आधुनिक संस्कृति ने पर्यावरण को बुरी तरह प्रभावित किया है, लेकिन बदले में उससे मानव जीवन सुखी हुआ ही हो ऐसा नहीं माना जा सकता है ।” (टिप्पणीः स्थाई संतोष और सुख का भ्रम अलग-अलग बातें हैं । सीमित भौतिक साधनों वाला व्यक्ति संपन्न व्यक्ति से अधिक आत्मसंतुष्ट हो सकता है ! किंतु आधुनिक युग में मनुष्य में बाह्य प्रदर्शन तथा भौतिक साधनों के द्वारा सुखानुभूति पाने में ही जीवन व्यतीत कर रहा है । उदाहरणार्थ, कभी लोग परोपकार करने में सुख पाते थे, तो अब येनकेन प्रकारेण धनोपार्जन ही लक्ष्य रह गया है ।)

(7) उक्त संस्था की एक रिपोर्ट के प्रमुख लेखक एरिक एसडूरिन (Erik Assadourian) के कथनानुसार हमें पिछले दो शतकों में विकसित भोगवाद की संस्कृति को बदलना होगा, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण सच तो यह है कि भोगवाद विकसित देशों तक सीमित न रहकर विकसित हो रहे देशों तक को अपने चपेटे में तेजी से ले रहा है ।

(8) “पहले अमेरिका प्रदूषण का उत्सर्जन करता था, लेकिन अब चीन उससे आगे निकल चुका है । चीन तो अब कारों की खपत में विश्व का सबसे बड़ा बाजार बन चुका है ।” — एसडूरिन का कथन ।

(9) वर्डवाच ने Ecuador देश का भी हवाला दिया है, जहां के बाशिंदों ने धरती माता (Mother Earth) की पूजा का व्रत ले रखा है और वे इस बात पर जोर दे रहे हैं कि उपभोग के जो तत्त्व मां धरती बारबार नहीं दे सकती उन पर आधारित भोगवाद को हम बढ़ावा नहीं दे सकते । हमें चिरस्थायित्च की दिशा में बढ़ना है, अर्थात् उन वस्तुओं को उपभोग में लेना है जिनको प्रकृति दुबार-तिबारा हमें दे सकती है । (इस प्रकार के चिरस्थायी भोगवाद में, उदाहरणार्थ, पारंपरिक विधि की कृषि शामिल है ।)

(10) और अंत में, वर्डवाच की उक्त बातों की चर्चा के बाद ‘साइंटिफिक अमेरिकन’ पत्रिका की अपनी टिप्पणी देखिएः
“Of course, at the same time, Worldwatch would like you to spend $19.95 for a paperback version of its report, or $9.95 for a PDF or electronic document for your (yet another gadget) Kindle. Switching away from a capitalist ethic of consumerism continues to be easier said than done.” (अवश्य ही इतने सब के बाद वर्डवाच आपसे अपेक्षा करता है कि आप 19.95 डालर देकर उसकी रिपोर्ट का पेपरबैक संस्करण खरीदें, अथवा अपने ‘किंडल’ (एक उपकरण यह भी) के लिए 9.97 डालर से उसकी पीडीएफ या इलेक्ट्रॉनिक प्रति खरीदें । दरअसल पूंजीवाद की भोगवादिता से हटने की बात करना जितना आसान है उससे कहीं अधिक कठिन उस पर अमल करता है ! कथनी और करनी में फर्क तो मानव स्वभाव का स्थाई अंग है; पर्यावरण की बात करने वालों ने खुद कौन सी ऊर्जा-खाऊ सुविधाएं त्याग दी हैं ?)
– योगेन्द्र जोशी