शिंदे ने सच ही तो बोलाः जैसे लोग बोफोर्स भूल गए वैसे ही ‘कोल-गेट’ भी भूलेंगे

अपने देश के राजनेता जो मुंह में आया उसे ‘बकने’ में झिझकते नहीं हैं । उनकी बकबास की जब चारों ओर आलोचना होने लगती है तो अपने बचाव में चिरपरिचित कुतर्क पेश कर देते हैं, “मीडिया ने मेरे बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया ।” हाल में केन्द्र सरकार के गृहमंत्री ने कहा था, “जैसे लोग बोफोर्स भूल गए वैसे ही कोयला खदान आबंटन घोटाला भी भूल जाएंगे ।” आलोचना होने पर उन्होंने मीडिया को दोष न देकर निरीह भाव से कह दिया, “मैंने तो वह बात मजाक में कही थी ।” श्री शिंदे महोदय ने समझदारी दिखा दी ।

बेचारे शिंदे !! मजाक में कहा या गंभीर होकर, कहा तो उन्होंने सच ही । मैं समझता हूं कि बात को थोड़ा स्पष्ट करते हुए वे कह सकते थे, “जनता को भला लगे या अच्छा, बात तो सच है ।” सो कैसे ? हो सकता है वे अपना तर्क पेश करने में घबड़ा गए हों और बात को वहीं खत्म करने के चक्कर में “ये मजाक में कहा” कह बैठे हों । वे बात पर टिके रहकर अपना बचाव बखूबी कर सकते थे । सो कैसे बताता हूं:

किसी भी सामान्य आदमी को बचपन से लेकर बुढ़ापे तक की तमाम घटनाओं की याद रहती है (बशर्ते कि वह डिमेंशिया या अल्जीमर रोग से पीड़ित न हो) । लेकिन वे घटनाएं स्मृतिपटल पर अंकित भर रहती हैं, और उन पर कभी-कभार चर्चा भी छिड़ जाती है । लेकिन रोजमर्रा की अपनी जिंदगी में आदमी सामान्य तरीके से ही जीता है । अगर कोई घटना निजी तौर पर किसी के लिए अति दुःखद एवं असामान्य रही हो तभी वह उस मनुष्य के व्यवहार को प्रभावित करती है । अन्यथा बात आई-गई ही होती है । आम आदमी के जीवन में बोफोर्स कांड भी इसी श्रेणी की घटना है । आदमी के लिए ऐसी घटनाएं इतिहास के पन्नों में दर्ज बातें होती हैं । वह उनके बारे में सोच-सोच कर जिंदगी नहीं बिताता है । ये बात तब भी माने रखती है जब चुनाव होते हैं । जिसको जिसे वोट देना होता है देता है, कोई घटना हुई हो या नहीं, खास तौर पर तब जब घटना बासी हो चली हो ।

सरकारी खजाने की लूट और साधिकार भ्रष्टाचार का हर मामला कुछ समय तक तो ताजा-ताजा रहता है, वह भी हर किसी के दिमाग में नहीं । और अंत में बासी पड़कर इतिहास के पन्नों में दब जाता है । बोफोर्स के साथ ही नहीं बल्कि हर मामले में यही हुआ है । हाल की जितनी ऐसी घटनाएं हुई हैं उन सबका हाल यही होना है । कुछ दिन मीडिया में जोरशोर से चर्चा और फिर उनकी जगह अन्य घटनाएं ले लेती हैं । चाहे कोयला घोटाला हो, टू-जी घोटाला, या कॉमन-वेल्थ गेम्ज घोटाला, या कोई और घोटाला सब एक न दिन भुला दिये जाने हैं । और इसी तथ्य को शिंदे महोदय ने अपने मुखारविंद से कह डाला । आखिर झूठ तो बोला नहीं । पता नहीं क्यों उनकी आलोचना होने लगी ।

सच तो यह है कि ऐसी किसी भी घटना का असर उन पर भी नहीं पड़ता है जो उस घटना में संलिप्त रहते हैं । आज तक किसी का कुछ बिगड़ा है क्या ? किसी को दंडित होना पड़ा है क्या ? मेरी याददास्त में तो कोई मामला नहीं है । जब उन संलिप्त लोगों के लिए भी घटना भुलाने की चीज हो, तब आम आदमी के लिए उसका मतलब ही क्या रह जाता है ?

मैं तो यह भी कल्पना कर बैठता हूं कि समय बीतने के साथ घटना के सक्रिय पात्र अपने नाती-पोतों को अपनी बहादुरी के किस्से सुनाते होंगे कि देश की जनता को ऐसा चकमा दिया कि किसी को पता ही नहीं चला । जैसे मोहल्ले के बच्चे खेल-खेल में किसी की खिड़की का शीशा तोड़ डालते हैं और उस बेचारे भुक्तभोगी को पता ही नहीं चल पाता कि कारस्तानी असल में किसकी रही, ठीक वैसा ही हमारे देश के घोटालों के मामले में होता है । घोटाला हुआ भी क्या, अगर हुआ तो किसने किया, ये बातें दशकों तक पता ही नहीं चलतीं । और जनता को घटना की याद ताजा करने के लिए इतिहास के पन्नों पर लौटना पड़ता है । – योगेन्द्र जोशी

क्या डा. मनमोहन सिंह भ्रष्टतम प्रधानमंत्री सिद्ध हो रहे हैं?

स्वतंत्र भारत के किसी बड़े स्तर के घोटाले से मेरा परिचय सबसे पहले तब हुआ था जब 1960-65 के दौरान कभी तत्कालीन वित्तमंत्री टी.टी. कृष्णमचारी को चर्चित ‘मुंदड़ा कांड’ के कारण अपना पद छोड़ना पड़ा । तब पंडित नेहरू देश के प्रधानमंत्री (प्रथम) हुआ करते थे । मैं तब हाईस्कूल या इंटर का छात्र हुआ करता था । वित्तीय घोटालों की तब मुझे कोई खास समझ नहीं थी । टेलीविजन तो तब था नहीं, रेडियो और अखबार से ही खबरें मिलती थीं । उसके बाद किसी बहुत बड़े घोटाले का ध्यान मुझे नहीं है । छोटे-मोटे कांड तो पहले भी होते थे, लेकिन काफी हद तक चोरी-छिपे अंदाज में ।

कहीं खो चुकी शर्मोहया

वह भी एक समय था जब कोई मंत्री राष्ट्र के अहित में घटी किसी घटना के लिए अपने को जिम्मेदार मानता था और कुर्सी छोड़ देता था । भ्रष्टाचार उजागर होने पर संबंधित व्यक्ति की नजरें नींची हो जाती थीं और उसके विरुद्ध थू-थू का वातावरण तैयार हो जाता था । किंतु स्वतंत्र भारत में राजनीति ने बड़ी तेजी से करवट बदली, और भ्रष्टाचार सामाजिक जीवन का स्वीकृत अंग बन गया । अब भ्रष्टाचार के आरोपों पर किसी को शर्म नहीं आती है । बल्कि साफ-सुथरे आदमी को स्वयं पर यह सोचकर लज्जा आती है कि मैं किन पाखंडियों के राज में जी रहा हूं । वह समझ नहीं पाता है कि क्या यह वही देश है जिसे धर्मभीरु माना जाता था, जहां नैतिकता की बातें कही जाती थीं, जहां भौतिकवाद को सम्मान से नहीं से देखा जाता था, इत्यादि ।

आज देश भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा पर पहुंच चुका है । राजनीति अपने स्वार्थों को सिद्ध करने का सबसे कारगर रास्ता बन चुका है । सरकारें अब खुल्लमखुल्ला लेन-देन पर आधारित होने लगी हैं । कहीं खुलकर पैसा बंटता है तो कहीं मंत्रीपद बंटते हैं, अथवा कहीं किसी और प्रकार के छिपे लाभों का आश्वासन बंटता है । सरकारें देश के लिए नहीं राजनीतिक दलों के हितों के हिए कार्य करने लगी हैं । भ्रष्टाचार की छूट उनकी विशेषता बन चुकी है । चीजें लगातार गिरावट पर चल रही हैं ।

भ्रष्टतम प्रधानमंत्री कौन?

ऐसे में जब मैं यह समझने की कोशिश करता हूं कि स्वतंत्र इंडिया दैट इज भारत का भ्रष्टतम प्रधानमंत्री किसे कहा जाए, तब काफी सोचने पर मुझे अपने मौजूदा प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ही नंबर एक पर दिखाई देते हैं । ऐसा नहीं है कि पहले के प्रधानमंत्री साफ-सुथरे ही रहे हों । मेरी दृष्टि में लालबहादुर शास्त्री सर्वाधिक ईमानदार थे । पंडित नेहरू के समय तक अवयस्क होने के कारण राजनीति की मेरी समझ काफी कम थी, अतः उनके बारे में अधिक कुछ नहीं कहता । मेरे मत में इंदिरा गांधी तुलनया सभी में सर्वाधिक शक्तिशाली रहीं हैं, किंतु अपनी सत्ता बचाने के लिए उन्होंने भी कुछ हथकंडे अपनाने से परहेज नहीं किया, अतः वे पूरी तरह साफ नहीं थीं । चरणसिंह एवं चंद्रशेखर भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर तिकड़मों से ही पहुंचे थे ऐसा कहा जाता है । देश का कोई प्रधनमंत्री एकदम पाकसाफ रहा हो यह दावा राजनेता ही कर सकते हैं, लेकिन राजनीतिक प्रतिबद्धता से परे आम आदमी शायद ही करे । राजनीति में थोड़ा-सा भ्रष्टाचार का होना राष्ट्र और समाज को खास प्रभावित नहीं करता है । किंतु जब भ्रष्टाचार का खेल खुलकर खेला जाये, शर्मोहया ताक पर रख दी जाये, अपनी सफाई में ‘मेरे विराधियों की साजिश है यह सब’ बोला जाये, और जांच एजेंसियां निकम्मी सिद्ध होने लगें, तो स्थिति गंभीर और खतरनाक हो जाती है । अपने मौजूदा प्रधानमंत्री के कार्यकाल में शासकीय व्यवस्था इसी स्थिति में पहुंच चुकी है ऐसा मेरा मत है । भ्रष्टाचार की कीचड़ दशकों पहले फैलने लग गई थी, और हर सरकार ने उसे पनपने दिया, कुछ ठोस किया नहीं, और अब वह विकराल रूप धारण कर चुकी है ।

डा. मनमोहन सिंहः कुछ खास बातें

मेरी धारणा मौजूदा प्रधानमंत्री, डा. मनमोहन सिंह, के प्रति नकारात्मक है और इसके कारणों को मैं स्पष्ट करता हूं । लेकिन उसके पहले मैं उनके तमाम प्रशंसकों से प्रार्थना करूंगा कि वे मुझे क्षमा करें । मैं उनकी कुछ खासियतों की चर्चा पहले करता हूं । संयोग से वे कभी भी जननेता नहीं रहे । उन्होंने एक बार – जीवन में केवल एक बार – दक्षिण दिल्ली से लोकसभा चुनाव अवश्य लड़ा था किंतु हार गये । इस प्रकार वे जनता द्वारा सीधे चुने गये जनप्रतिनिधियों की लोकसभा के सदस्य कभी नहीं रहे । वे सदैव क्रांग्रेस पार्टी की अनुकंपा से राज्यसभा के सदस्य बने । इस सभा के सदस्यों को सही अर्थ में जनप्रतिनिधि नहीं माना जा सकता । वास्तव में वे सदा ही एक नौकरशाह रहे और उनके जीवन का अधिकांश समय राजनीति से दूर देश के बाहर यू.एन.ओ. (राष्ट्र संघ) आइ.एम.एफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) जैसी संस्थाओं में बीता । बीस-पच्चीस साल पहले वे देश के रिजर्व बैंक के भी गवर्नर बने । मेरा खयाल है कि वे सदा से नेहरू-गांधी परिवार के चहेते रहे हैं, और फलतः क्रांग्रेस के भी प्रियपात्र रहे । (यह तो सभी समझ सकते हैं कि नेहरू-गांधी परिवार को जो पसंद वही क्रांग्रेस को भी पसंद ।) अर्थशास्त्री होने के नाते उन्हें विशेष सम्मान मिलता रहा, और फलतः बिना किसी राजनीतिक अनुभव के वे केंद्र सरकार के वित्तमंत्री और बाद में प्रधानमंत्री बने ।

देश-दुनिया के अनेकों लोग डा. मनमोहन सिंह को एक साफ-सुथरी छवि वाला व्यक्ति एवं सफल अर्थशास्त्री मानते आये हैं । प्रायः हर मौके पर उनके अर्थशास्त्री होने का जिक्र सुनने को मिलता है, गोया कि अर्थशास्त्री या किसी विषय का विशेषज्ञ होना प्रधानमंत्री के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि हो । देश में पहले भी ऐसे प्रधानमंत्री हो चुके हैं जो किसी न किसी विषय के अच्छे जानकार थे, लेकिन उनकी विशेषज्ञता का उल्लेख बारबार इतना खुलकर कभी नहीं हुआ । अर्थशास्त्री होने के नाते डा. सिंह से लगता है कि लोगों ने कुछ जरूरत से अधिक उम्मीदें पाल ली थीं । लोग यह मान बैठे कि उनकी नीतियां देश की आर्थिक तस्वीर ही नहीं बदल डालेगी, बल्कि गरीबी को भी मिटा डालेगी । ऐसा कुछ जादुई अभी तक घटा नहीं । मेरे लिए उनका अर्थशास्त्री होना माने नहीं रखता, क्योंकि विषय-विशेषज्ञ होना किसी का समाज और देश के प्रति समर्पण का प्रमाण नहीं होता । यह मानकर चलना निहायत नादानी होगी कि किसी विषय का अव्वल दर्जे का जानकार समर्पित अध्यापक भी होगा, या चिकित्सा क्षेत्र में महारत वाला अपने मरीजों के प्रति संवेदनशील होगा, कानून का जानकार अपना ज्ञान निरपराध को बचाने और अपराधी को सजा दिलाने में ही करेगा, इत्यादि । ऐसा कुछ भी जरूरी नहीं है । अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री आर्थिक तंत्र को साफ-सुथरा करके ही दम लेगा यह भी मानना मूर्खता है ।

यह बात मुझे दुर्भाग्यपूर्ण एवं विडंबनामय लगती है कि साफ-सुथरे कहे जाने वाले प्रधानमंत्री को भारतीय मीडिया में एक कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर भी पेश किया जाता है । अक्सर यह सुनने को मिलता है वे कोई निर्णय लेने से पहले 10 जनपथ का मुंह ताकते हैं । कई लोग उनको ‘रिमोट-कंट्रोल्ड’ प्रधानमंत्री भी कहते हैं । वैचारिक पराधीनता के द्योतक ऐसे शब्द पहले कभी किसी अन्य प्रधानमंत्री के लिए प्रयोग में नहीं लिए गये थे ।

क्या मतलब है भ्रष्टाचार का?

अब मैं इस बात को स्पष्ट करता हूं कि मैं उन्हें क्यों एक भ्रष्ट प्रधानमंत्री के तौर पर देखता हूं । साफ-सुथरा होने की मेरी परिभाषा कुछ कठोर है । इस प्रयोजन के लिए मेरा मापदंड किसी संस्था के शीर्ष पद पर आसीन व्यक्ति के लिए वही नहीं है जो एक रिक्शावाले, सड़क किनारे के अदना दुकानदार, या दफ्तर के चपरासी के लिए प्रयुक्त हो । रिक्शावाले आदि का आचरण बमुश्किल से दो-एक लोगों को प्रभावित करता है और केवल उनके लिए अहमियत रखता है । व्यापक स्तर पर देश और समाज को उससे कोई संदेश नहीं मिलता और न ही वह चर्चा का विषय बनता है । शीर्षस्थ लोगों का हर कार्य देश और समाज को बना-बिगाड़ सकता है । इसलिए यह कह देना कि कोई साफ-सुथरा है काफी नहीं है, जब तक कि यह स्पष्ट न किया जाए कि उसने देश के अहम मामलों में क्या रवैया अख्तियार किया है । अपनी बात अधिक स्पष्ट करने के लिए मैं चार प्रकार के भ्रष्ट आचरण की बात करता हूं । इन पर ध्यान दें:

(1) पहला भ्रष्टाचार वह है जिसके तहत व्यक्ति प्रत्यक्ष रूप से नाजायज तरीके से अपने तथा अपने परिवार के स्वार्थ साधता है, जैसे घूस लेकर बैंक बैलेंस बढ़ाना और सरकारी गाड़ी को परिवार की सेवा में लगाना ।

(2) दूसरा वह है जिसके तहत व्यक्ति अपने नाते-रिश्तेदारों, मित्र-परिचितों को गलत-सलत तरीके से लाभ पहुंचाता है, जैसे अपने अयोग्य संबंधी को नौकरी दिलाना और परिचित को ठेका दिलाना ।

(3) तीसरी श्रेणी में मैं उस भ्रष्टाचार को रखता हूं जिसमें व्यक्ति सक्षम होने पर भी अपने से संबंद्ध लोगों के भ्रष्टाचार के प्रति आंखें बंद किये रहता है और दायित्व के बावजूद समुचित कदम उठाने से बचता है । देश के प्रशासनिक तंत्र में ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है ।

(4) चौथा वह भ्रष्ट आचरण है जिसके अंतर्गत सक्षम व्यक्ति भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों को बचाने की भरसक कोशिश करता है और उसके लिए जांच एजेंसियों, पुलिस एवं न्यायव्यवस्था पर दवाब डालता है और मामले को वर्षों तक लंबित रखने की कोशिश करता है । अपने देश के शासकीय-प्रशासनिक तंत्र में ऐसा बहुत कुछ प्रत्यक्षतः हो रहा है, और हर बीते दिन के साथ स्थिति बद से बदतर हो रही है ।

मैं तीसरे-चौथे प्रकार के भ्रष्ट आचरण को सबसे गंभीर और खतरनाक मानता हूं, क्योंकि यह देश के शासकीय तंत्र को अविश्वसनीय बना देता है और आम लोगों के मन में यह धारणा पैदा करता है कि कुछ भी कर लो कुछ होना नहीं है । आपराधिक स्वभाव वाले लोगों को कानून का भय नहीं रह जाता है । इन दोनों के चलते पहले-दूसरे प्रकार के भ्रष्ट आचरण पर अंकुश लगने की उम्मीद समाप्त हो जाती है । जब जिम्मेदार व्यक्ति तीसरे-चौथे श्रेणी का भ्रष्ट व्यक्ति हो तो शिकायत किससे करें ?

पहले-दूसरे दर्जे के भ्रष्टाचार से मुक्त होने के बावजूद किसी संस्था के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति की छबि को स्वच्छ कहना सही नहीं होगा, यदि वह ऊपर कहे गये तीसरी-चौथी बात के अनुसार खरा नहीं उतरता । उपर्युक्त बिंदुओं पर विचार करने पर मैं अपने वर्तमान प्रधानमंत्री को स्वच्छ नहीं पाता । निःसंदेह उन्होंने मौके का लाभ उठाकर अपने वैयक्तिक हित न साधे हों, किंतु दूसरों को भ्रष्टाचार की छूट उन्होंने अभी तक दे रखी थी/है ।

मौजूदा प्रधानमंत्री एवं भ्रष्टाचार

दुर्भाग्य से मौजूदा क्रांग्रेस-नीत सरकार के कार्यकाल में रिकार्ड-तोड़ भ्रष्टाचारों की चर्चा हुई है । हाल के कॉमनवेल्थ गेम्ज, टेलीकॉम एवं आदर्श बिल्डिंग सोसाइटी घोटालों ने जैसी सुर्खियां बटोरी हैं वैसी पहले कभी मिडिया में नहीं देखी गईं । संचार मंत्रालय दावा करता है कि सब कुछ नियमानुसार हुआ, फिर भी ए. राजा से इस्तीफा लिया जाता है । क्यों? और वह भी इतने हल्ले-गुल्ले के बाद? आपत्तिजनक यह भी है कि प्रधानमंत्री ने सुब्रह्मण्यम स्वामी की मांग का जवाब लंबे अर्से तक क्यों नही दिया, भले ही वह जवाब ‘न’ में होता? चुप्पी क्यों साधी थी? शायद पहली दफा है कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी प्रधानमंत्री से उसकी निष्क्रियता पर जवाब मांगा है ।

इधर सी.बी.आई. पर आरोप लगते रहे हैं कि वह प्रधानमंत्री के इशारे पर काम करती है, कभी जांच की तेजी का नाटक रचती है तो कभी ढिलाई पर उतर आती है । मामलों को अंजाम तक पहुंचाने में इस संस्था का रिकार्ड संतुष्टिप्रद नहीं रहा है, खासकर केंद्र सरकार से जुड़े मामलों में या देश-प्रदेशों के बड़े घोटालों में । ऐसा लगता है कि सरकार इसका प्रयोग राजनीतिक दलों को डराए रखने में ज्यादा करती है घोटालेबाजों को त्वरित सजा दिलाने में कम । सी.बी.आई. कई बार अदालतों की फटकार सुन चुकी है । इसके अलावा हाल में नेता विपक्ष की गंभीर आपत्ति के बावजूद सी.वी.सी. (चीफ विजिलेंस कमिशनर) के पद पर आरोपों के घेरे में रहे पी.जे. थॉमस की नियुक्ति पर भी सवाल उठे हैं और शीर्ष अदालत ने भी तद्विषयक जानकारी मांगी । मामला गंभीर इसलिए भी है कि यह नियुक्ति तीन-सदस्यीय समिति द्वारा की जाती है जिसमें प्रधानमंत्री, गृहमंत्री एवं नेता विपक्ष शामिल रहते हैं । प्रथम दो की सहमति बहुत माने नहीं रखती है, क्योंकि दोनों ही सरकार की तरफ से होते हैं । आम सहमति को महत्त्व देने वाली सरकार ने इस मौके पर ‘हमारी मर्जी’ वाला रवैया क्यों अपनाया?

आजकल देश की राजनीति में एक नये शब्द, ‘गठबंधन धर्म’, का धड़ल्ले से प्रयोग हो रहा है । किस वेद-पुराण-कुरान-बाइबिल में जिक्र है इसका? सरकार एक दल की हो या मिलकर बहुतों की, उसका मौलिक कर्तव्य है राष्ट्र के हितों को साधना । स्वच्छ शासकीय व्यवस्था प्रदान करना सभी दलों का सामूहिक दायित्व है । सबने मिलकर चलानी होती है सरकार । किंतु गठबंधन के नाम पर इन दलों ने यह तस्वीर पेश की है कि सरकार तो कांग्रेस की है, और जब तक वह हमको मनमानी की छूट दे तब तक उसे चलने देंगे, अन्यथा नहीं । गोया कि सरकार गिरेगी तो कांग्रेस की, उनकी नहीं । कैसा गठबंधन है ये जहां कांग्रेस दल का भयदोहन (ब्लैकमेलिंग) छोटे दलों द्वारा किया जा रहा है । प्रधानमंत्री की गलती/कमजोरी यह है कि उन्होंने भयदोहन की इस अपसंस्कृति को आगे बढ़ने दिया है । वे इतनी हिम्मत नहीं दिखा सके कि देशहित के विरुद्ध मनमर्जी की छूट किसी को नहीं है और सरकार का अस्तित्व बचाए रखना अकेले उनका नहीं सभी की जिम्मेदारी है । उन्होंने दो टूक शब्दों में स्पष्ट कहना चाहिए था कि भयदोहन की राजनीति नहीं चलेगी, भले ही गठबंधन टूट जाय ।

मेरा सोचना है कि भ्रष्टाचार-मुक्त शासन प्रदान करने के मामले में डा. मनमोहन सिंह की दिलचस्पी नहीं रही है । भगवान भरोसे देश चल रहा है यही काफी है ।

कुल मिलाकर मेरी धारणा मौजूदा प्रधानमंत्री के प्रति नकारात्मक है । देश के अंदरूनी हालातों के मामले में वे असफल लगते हैं । प्रधानमंत्री पद पर तो गैरकांग्रेसी नेता भी बैठे, लेकिन उनकी सरकारें बरसाती नालों की तरह अस्तित्व में आईं और गयीं । केंद्र में तो अभी तक अकेले या मिलकर कांग्रेस की सरकारें ही रहीं, सिवा एक बार की बाजपेई सरकार के (1998-2004) । अतः देश के हालातों के लिए कांग्रेस ही मुख्यतः जिम्मेदार कही जाएगी – योगेन्द्र