पुनर्मूषको भव – किन्तु न शक्यं तत्कर्तुम् (विवशता अपराधी के मुठभेड़ की)

देश में अनेक मौकों पर दुर्दांत अपराधियों का मुठभेड़ (इंकाउन्टर) में मारा जाना कोई नई बात है। पुलिसबलों द्वारा ऐसी घटनाओं को अंजाम देना एक प्रकार की विवशता का द्योतक है। अभी हाल में मुठभेड़ की ऐसी ही एक घटना कानपुर के अपराधी विकास दुबे के साथ घटी। उस घटना पर मुझे एक शिक्षाप्रद कथा की याद हो आई जिसे मैंने छात्र-जीवन में अपनी किसी संस्कृत पुस्तक में पढ़ी थी। कथा का शीर्षक थाः “पुनर्मूषको भव”, अर्थात् फिर से मूस (mouse) हो जाओ।

कुख्यात अपराधियों को लेकर अपनी टिप्पणी करने से पहले मैं उक्त कथा का संक्षेप में उल्लेख कर देता हूं।

किसी वन में एक महात्माजी (संन्यासीजी) कुटिया बनाकर रहते थे। वे किसी वनीय प्राणी को भगाते-दौड़ाते नहीं थे। विपरीत उसके वे अपने भिक्षार्जित भोज्य पदार्थ उनको भी खिलाते थे। समय वीतते-वीतते वहां के सभी प्राणी उनके सापेक्ष निर्भिक हो चुके थे। पास के गांव से कुत्ते-बिल्ली भी उनके पास आते-जाते थे।

उनकी कुटिया के निकट एक मूस/चूहा भी बिल बनाकर रहता था। वह भी उनके समीप निडर होकर खेलता-कूदता था। एक बार चूहे ने महात्माजी को अपनी व्यथा सुनाई, “महाराज, आप तो अपने तप के बल पर बहुत-से कार्य सिद्ध कर सकते हैं। मुझे भी एक कष्ट से मुक्ति दिलाइये।”

उदारमना महात्माजी ने जब उसके कष्ट के बारे में जानना चाहा तो चूहे ने कहा, “महाराज, एक बिल्ली अक्सर यहां आती है। वह मुझे मारकर खाना चाहती है। उससे मुझे डर लगता है। क्यों नहीं आप मुझे बिल्ली बना देते हैं ताकि मैं उसका मुकाबला कर सकूं।”

महात्माजी ने उसकी बात मानकर उस पर अभिमंत्रित का सिंचन किया और ‘तथास्तु’ कहते हुए उसे बिल्ली बना दिया। अब बिल्ली बना चूहा खुश था और निर्भीक होकर कुटिया के आसपास घूमने लगा। दिन बीतते गये। एक दिन कोई कुत्ता आकर उस बिल्ली के पीछे दौड़ पड़ा। जब भी कोई कुत्ता आता वह बिल्ली को काटने दौड़ पड़ता। बिल्ली ने महात्माजी से शिकायत करके उसे भी कुत्ता बना देने की प्रार्थना की। महात्माजी ने दया-भाव से उसे कुत्ता बना दिया। उस वन में जंगली जानवर भी रहते थे जो अक्सर कुटिया के आसपास आ जाते थे। महात्माजी उन्हें भी प्यार से पास आने देते। उन्हें देख कुत्ता डर जाता था। एक बाघ उस कुत्ते को शिकार बनाने की फिराक में था। तब उस कुत्ते ने महात्माजी को अपनी परेशानी बताई और उसे भी बाघ बना देने का अनुरोध किया। दयालु महात्माजी ने तथास्तु कहते हुए उसकी यह मुराद भी पूरी कर दी। बाघ की हिंसक प्रकृति के अनुरूप व्यवहार करते हुए वह महात्माजी पर झपटने की सोचने लगा। महात्माजी उसका इरादा भांप गये और “पुनर्मूषको भव” कहते हुए मंत्रों से उसे फिर से चूहा बना दिया।

उक्त कथा प्रतीकात्मक है नीति की बात स्पष्ट करने के लिए। प्राचीन संस्कृत साहित्य में पशु चरित्रों के माध्यम से बहुत ही बातें समझाने की परंपरा रही है। उक्त कथा में चूहे ने कोई अपराध नही किया उसे कोई सजा नहीं दी महात्माजी ने, लेकिन जब बाघ बने उसकी आपराधिक वृत्ति उजागर हुई तो उन्होंने उसे फिर से निर्बल चूहा बना दिया। उसकी औकात उसे दिखा दी।

अब मैं अपराधियों के मुठभेड़ की बात पर लौटता हूं। उपरिलिखित कथा बताती है कि अयोग्य व्यक्ति पर उपकार करना घातक सिद्ध हो सकता है। यानी आपराधिक वारदातों में लिप्त व्यक्ति पर रहम नहीं किया जा सकता है; उसके बचाव में उतरना कालांतर में घातक होता है। जब चीजें बहुत आगे बढ़ जाती हैं तो लौटकर भूल-सुधार की संभावना नहीं रहती। उक्त कथा में महात्माजी चूहे को बाघ योनि तक बढ़ा सके थे और उसको खतरनाक पाने पर पूर्ववर्ती योनि में लौटा सके थे। अपराधों की दुनिया में ऐसी वापसी संभव नहीं। जो अपराध किया जा चुका हो उसे “न हुआ” जैसा नहीं कर सकते। वस्तुस्थिति गंभीर हो इससे पहले ही कारगर कदम उठाना जरूरी होता है।

दुर्भाग्य से हमारी शासकीय व्यवस्था अपराधों को गंभीरता से नहीं लेती और समय रहते समुचित कारगर कदम नहीं उठाती। पुलिस बल अपराधों को रोकने और अपराधियों पर नकेल कसने के लिए बनी है। आम जनता की नुमायंदगी करने वाले राजनेताओं से उम्मीद की जाती है कि वे देखें कि शासकीय व्यवस्था उनके घोषित उद्येश्यों के अनुरूप चल रहा है। ये बातें हो रही हैं क्या? हरगिज नही!

विपरीत उसके अपराधियों के साथ साठगांठ रचने उनको बढ़ावा देने में हमारा पुलिसबल, प्रशासनिक तंत्र और शासकीय व्यवस्था चलाने वाले राजनेता, सभी एकसमान भूमिका निभाते हैं।

एक नागरिक के तौर पर मैं मौजूदा राजनैतिक जमात को सम्मान की दृष्टि से नहीं देख पाता। चाहे, मोदी हों, या योगी, या मुलायम सिंह, मायावती, और अन्य, लोग सभी के दलों में आपराधिक मानसिकता के नेता भरे पड़े हैं। कहा जाता है कि तकरीबन ३०% जनप्रतिनिधि आपराधिक बारदातों में लिप्त लोग हैं। मैं आपसे सवाल पूछता हूं। आप अपने आसपास, चारों तरफ नजर दौड़ाइये, यारदोस्तों-परिचितों से पूछिये कि आम लोगों के बीच किस अनुपात में अपराधी होंगे। १% भी नहीं, या १%, २%, ३%, … मुझे पूरा विश्वास है कोई भी अधिक नही बतायेगा। तो फिर राजनीति में इतने अधिक क्यों हैं? स्पष्ट है कि राजनीति उनकी शरणस्थली बन चुकी है।

सवाल उठता है कि राजनीति में ही इतने अधिक अपराधी क्यों हैं?

उनके बचाव में राजनेताओं की बेहूदी दलील सुनिएः उनके विरुद्ध झूठे मुकदमे दर्ज होते हैं। क्यों होते हैं झूठे मुकदमे? आमजन पर तो ऐसे झूठे मुकदमें सामान्यतः दर्ज नहीं होते तो इनके विरुद्ध ही क्यों? क्यों इनके इतने दुश्मन होते है? इलजाम छोटे-मोटे नहीं। कोई कत्ल का तो कोई बलात्कार का, कोई जमीन-जायदाद हड़पने का। एक औसत आदमी पर तो ऐसे  मुकदमें दर्ज नहीं होते। फिर इन्हीं राजनेताओं पर एक-दो नहीं दर्जनों मुकदमें क्यों दर्ज होते हैं, वह भी हत्या, बलात्कार, लूटपाट, अपहरण जैसे संगीन बारदातों के? आखिर इन ताकतबर लोगों ने इतने दुश्मन क्यों पाले हैं जो उनके विरुद्ध मुकदमे ठोकते हैं। जाहिर है कि मौजूदा राजनीति में अपराधियों का बोलबाला है और हर दल उन्हें संरक्षण देता है, मानें या न मानें।

हर राजनैतिक दल कहता है कि जब तक इन लोगों को अदालत दोषी घोषित नहीं करती इन्हें अपराधी कैसे मान लें? बहुत खूब! यह है “न नौ मन तेल होगा और न राधा नाचेगी” का सटीक उदाहरण अदालत में अपराध सिद्ध करेगा कौन? आपराधिक छवि ये लोग पुलिस में, राजनेताओं के बीच, अपनी पैठ बना लेते हैं। किसकी मजाल है कि जान पर खेलते हुए उनके विरुद्ध गवाही दे। पुलिस तो इतनी ईमानदार है कि परिस्थितिजन्य सभी साक्ष्य मिटा देती है। “कोढ़ में खाज” की स्थिति। न्यायिक व्यवस्था इतनी लचर है कि सालों लग जाते हैं निर्णय आने में। तारीख पर तारीख पर तारीख … यह अदालतों की कार्य-प्रणाली बन चुकी है। हमारी न्यायिक व्यवस्था अपराधी को कैसे बचाया जाये इस बात को महत्व देती हैं न कि भुक्तभोगी को कैसे न्याय दिलाया जाये उसको। कुल मिलाकर किसी का अपराधी सिद्ध होना आसान नहीं होता है।

सवाल उठता है कि किसी की छवि का भी महत्व होना चाहिए कि नहीं? अपने व्यक्तिगत जीवन में हम इसे महत्व देते है। फिर राजनीति में क्यों इसकी अनदेखी होती है? किसी राजनेता को अपने साथ आपराधिक छवि वाले को देख शर्म क्यों नही आती?

इन सवालों को उन राजनेताओं के सामने उठाना बेमानी है जो खुद इसके लिए जिम्मेदार हैं।

पुलिसकर्मी भी राजनेताओं के चहेते अपराधियों के बचाव में आ जाते हैं। कुछ तो उनसे दोस्ती ही कर लेते हैं, तो कुछ मजबूरी में चुप रहते हैं, क्योंकि नेताओं की बात न मानना घाटे का सौदा होता है।

कुल मिलाकर अपराधियों को रोकने वाला कोई नहीं।

लेकिन जब उनकी हरकतें इतनी बढ़ जाती हैं कि उनके संरक्षक या उनको प्रश्रय देने वाले ही खतरा महसूस करने लगें तो वे उनको ठिकाने लगाने की सोचते हैं। कानपुर के विकास दुबे ने जब ८ पुलिसकर्मियों को मार डाला तब सबकी नींद खुली। उसको मृत्युदंड जैसी न्यायसंगत सजा दिलाना संभव नहीं उस पुलिस बल के लिए जो तब तक उसे बचाती आ रही थी। अतः मुठभेड़ के नाम पर उसे यमलोक पहुंचाना उनकी विवशता थी।

इस घटना पर मैंने एक ब्लॉगलेख लिखा है (दिनांक १५ जुलाई २०२०) ।  घटना का वीडियो देख मुझे लगा कि वह तो एक घटिया और बनावटी तरीके से नियोजित इंकाउंटर का खेल था।

जब किसी अपराधी के हौसले इतने बुलंद हो जायें कि वह पुलिसबल के सिर पर चढ़ बैठे तो पुलिस असहाय हो जाती है। इसी बात को रेखांकित करने के लिए मैंने कथा के शीर्षक में यह शब्द जोड़े हैंः “किन्तु न शक्यं तत्कर्तुम्” अर्थात् वैसा करना संभव नहीं जैसा महात्माजी ने किया था कथा में। – योगेन्द्र जोशी

अगस्त 15, 72वां स्वतंत्रता दिवस – बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिए

बर्फ़ की तिरंगी सिल्ली

स्वाधीनता दिवस – एक पर्व

आज 15 अगस्त है देश की स्वातंत्र्य-प्राप्ति का दिन, जिसे पिछले एकहत्तर वर्षों से हम एक उत्सव के तौर पर मनाते आ रहे हैं। इस उपलक्ष्य पर मैं देशवासियों को बधाई देना चाहता हूं और कामना करता हूं कि हर व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने का संकल्प ले, उसे निभाने का प्रयास करे।

     ऊपरी तौर पर देखें तो हर भारतीय इस दिन स्वयं को एक स्वाधीन देश का नागरिक होने का गर्व अनुभव करेगा। किंतु हम स्वाधीन हैं इतना काफी है क्या? या इसके आगे भी कुछ और है? जिन लोगों ने इस स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए संघर्ष किया उन्होंने क्या स्वाधीनता की अर्थवत्ता के बारे में भी कुछ सोचा नहीं होगा? उन्होंने सोचा होगा न कि कैसे हम अपने देशवासियों को ऐसी शासकीय व्यवस्था दे पायेंगे जो उनके बहु-आयामी हितों को साधने का कार्य करेगा? क्या वह कर पाए हैं हम? या उस दिशा में ईमानदारी से बढ़ भी पाए हैं? या सही दिशा में बढ़ने का इरादा भी कर पाए हैं?

हम स्वाधीन हैं और उस स्वाधीनता का “उपभोक्ता” मैं भी हूं। मेरे लिए यह काफी महत्वपूर्ण है, किंतु पर्याप्त नहीं। इसके आगे भी मुझे बहुत कुछ और देखने की इच्छा है। मुझे खुद के लिए कुछ पाने की लालसा नहीं, क्योंकि मेरे पास अपने लिए पर्याप्त है। जितना एक आम आदमी के लिए वांछित हो उतना मुझे मिला ही है, उसके आगे बहुत और मैं पाना नहीं चाहूंगा। उसके विपरीत किसी को अपनी सामर्थ्य से कुछ दे सकूं तो वह अधिक संतोष देगा।

स्वाधीन भारत – उपलब्धियां

अब मैं असली मुद्दे पर आता हूं। मेरा जन्म देश की स्वातंत्र्य प्राप्ति के चंद महीनों पहले उत्तराखंड (तब उ.प्र.) के सुदूर गांव में हुआ था। अर्थात्‍ मैं परतंत्र देश में जन्मा, लेकिन उस काल का कोई अनुभव नहीं मिला। जब से होश संभाला स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस मनते हुए देखता आ रहा हूं। क्या अहमियत है इन दिवसों की? यह सवाल पिछले कुछ वर्षों से समझने की कोशिश कर रहा हूं।

इस में दो राय नहीं है कि एक स्वतंत्र और स्वशासित देश के रूप में हमने भौतिक स्तर पर काफी प्रगति की है। विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में से एक बनने की दिशा में देश अग्रसर है। लोगों की संपन्नता एवं आर्थिक समृद्धि में इजाफा हुआ है। देश अंकीय (डिजिटल) तकनीकी उपयोग करते हुए नई शासकीय व्यवस्था स्थापित कर रहा है। लोगों के हाथ में मोबाइल/ स्मार्टफोन पहुंच चुके हैं। जिन घरों में बिजली का पंखा मुश्किल से दिखता था उनमें “एसी” लग चुके हैं। सुख-सुविधा की तमाम युक्तियां लोगों की पहुंच में आ चुकी हैं। सड़कों पर मोटर बाइकें और कारें दौड़ रही हैं। साइकिल का प्रयोग जो करते थे वे उसे चलाना भी भूल चुके हैं। यह सच है कि इतना सब अभी भी समाज के एक बड़े तबके को मुहैया नही हो पाया है। फिर भी उस दिशा में देश बढ़ रहा है यह स्वीकारा ही जाएगा।

वैज्ञानिकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी काफी हद तक प्रगति हुई ही है। उपग्रह प्रक्षेपण में देश अग्रणी बन चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु देशज मिसाइलें बन चुकी हैं और नाभिकीय आयुधों का भी विकास हो चुका है। राकेट तकनीकी का भी उल्लेखनीय विकास हमारे वैज्ञानिक-अभियंता कर चुके हैं। चंद्रयान की बात पुरानी पड़ चुकी है; अब तो मंगल-यान की बात हो रही है।

यह सब उपलब्धियां कम हैं क्या एकहत्तर वर्ष पहले स्वतंत्र हुए देश के लिए? क्या इन सब पर गर्व नहीं होना चाहिए किसी भारतीय को? अवश्य गर्व होना चाहिए।

निजी अनुभव

इतना सब होते देखने के बाद भी मैं संतोष नहीं कर पाता। मुझे लगता है हमने जितना पाया है उससे अधिक खोया है। वैसे जो पाया और जो खोया उनके मूल्यों की तुलना करना आसान नहीं। हर व्यक्ति अपनी समझ और नजर से वस्तुस्थिति को देखेगा। क्या खोया इसका उल्लेख करने और अपनी निराशा व्यक्त करने से पहले मैं अपने दो-तीन अनुभवों की बात करता हूं:

(1) मैंने सन् 1962 में हाई-स्कूल परीक्षा पास की थी अपने गांव से 7-8 कि.मी. दूर के विद्यालय से। मुझे एक घटना की याद है जब जिले के किसी परीक्षा केन्द्र से खबर आई कि कोई छात्र वहां नकल करते पकड़ा गया। नकल का एक वाकया इलाके में खबर बन गई। नकल करने की कोई हिम्मत कर सकता है यह हम लोग तब सोचते भी नहीं थे। अब क्या है?

(2) अपने बचपन के दिनों में मैं मां-चाची आदि के वार्तालाप में इस प्रकार की बातें सुना करता था: “सुना है फलां आदमी घूस लेने लगा है।” कोई सरकारी कर्मी घूस भी लेता है यह तब खबर बन जाती थी। अब क्या है?

(3) 1972-73 की बात है जब रेल-यात्रा में मेरा बैग गुम हो गया था। उसमें हाई-स्कूल से एम.एससी. तक के प्रमाणपत्र थे। मैंने संबंधित संस्थाओं को प्रमाणपत्रों की द्वितीय प्रतियों हेतु निवेदन किया। मुझे बिना भाग-दौड़ और लेन-देन किए कुछ दिनों के अंतराल पर दस्तावेज मिल गए। मैं सोचता हूं आज वही कार्य इतना आसान न होता।

देश की वर्तमान दशा

मैं कल दोपहर एक टीवी समाचार सुन रहा था। उसमें इधर-उधर की आपराधिक घटनाओं का जिक्र था। दो-चार की बानगी पेश करता हूं:

(1) आगरा (उ.प्र.) में हिन्दू अतिवादियों ने किसी बात पर एक युवक की पिटाई कर दी थाने में ही पुलिस की मौजूदगी में।

(2) मेरठ (उ.प्र.) में किसी एसयूवी कार से आल्टो कार टकराई और एसयूवी के सशस्त्र सवारों ने दूसरी कार के दोनों सवारों की तबियत से पिटाई तो की ही, फिर अपनी कार में बिठाकर अज्ञात जगह ले भागे।

(3) मुरादाबाद (उ.प्र.) में उपद्रवी कांवड़ियों द्वारा सड़क पर किसी बात पर उत्पात मचाने की घटना का भी समाचार टीवी पर सुना।

(4) उन्नाव (उ.प्र.) में एक-तरफा प्यार में पागल शादीशुदा एक युवक ने युवती की मौजूदगी में ही उसके ब्यूटी पार्लर में तोड़फोड़ कर दी।

(5) ग्रेटर नॉयडा (उ.प्र.) में गुंडे-बदमाशों की गोली का शिकार हुआ एक व्यक्ति।

(6) नवी मुम्बई (महा.) में रंगदारी वसूलने के लिए दुकान में घुसे बदमाश दुकानदार पर ताबड़तोड गोली दागकर फरार हो गये।

(7) वैशाली (बिहार) से भी ऐसी ही एक घटना सुनने को मिली।

(यह विवरण याददास्त पर आधारित है; स्थान एवं घटना के स्वरूप बताने में उलटफेर हो गया होगा।)

ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की घटनाएं पहले नहीं होती थीं। तब कभी-कभार देखने-सुनने में आती थीं, लेकिन आजकल घटनाओं की बाढ़-सी आ चुकी है।

सरकारें अपराधियों को सजा देने का दावा करती हैं; कुछ मामलों में सजा भी हो जाती है। किंतु वे यह जानने के प्रयास नहीं करती हैं कि अपराध होते ही क्यों हैं? न सरकारें न ही देश के बुद्धिजीवी ऐसे किसी अध्ययन में रुचि ले रहे हैं। लोगों में आपराधिक प्रवृत्ति न पनपे इसके प्रयास होने चाहिए कि नहीं?

इन सब बातों को देखकर मुझे निराशा होती है। मेरा मत है कि देश विकट चारित्रिक पतन के दौर से गुजर रहा है। विकास एवं आर्थिक प्रगति इस पतन की भरपाई नहीं कर सकते है। एक सभ्य, सुसंस्कृत समाज की रचना महान्‍ देश की पहचान होनी चाहिए।

     मुझे यह देख हैरानी एवं क्षोभ होता है कि देश में अनेक लोग हैं जिनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ है, अनुशासनहीनता, स्वच्छंद आचरण, कायदे-कानूनों का उल्लंघन, इत्यादि। मैंने आरंभ में बताया कि 1962 में नकल को किस नजरिए से देखा जाता था। आज सरकारी स्कूल-कालेजों के छात्र नकल को अपना अधिकार समझते हैं। इतना ही नहीं उनका साथ शिक्षक, अभिभावक, और पुलिस भी दे रही है। सरकारी शिक्षा का स्तर गिर रहा है। यही आज के डाक्टरी पेशे का है जहां अनेक डाक्टर संपन्न होने के बावजूद मरीज के प्रति सहानुभूति नहीं रखते। पुलिस बल को देखकर कई जन घबराते हैं। कोई महिला शिकायत लेकर थाने जाने में डरती है कि वहां कहीं उसी का दुष्कर्म न हो जाए। दुष्कर्म की घटानाएं दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं। राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है ऐसा क्यों कहा जा रहा है? कुछ तो सच्चाई होगी। बिहार के मुजफ़्फ़रपुर और उ.प्र. के बालिका संरक्षण गृहों की घटनाएं आज के आपराधिक मानसिकता के लोगों की देन है जिन्हें राजनेताओं एवं प्रशासन से प्रशय मिल रहा होता है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। उ.प्र. के वाराणसी एवं बस्ती और पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी के निर्माणाधीन फ़्लाई-ओवरों का गिरना इसी भ्रष्टाचार के परिणाम हैं।

     यह विषय लंबी विवेचना चाहता है जिसे इस आलेख में शामिल करना कठिन है। कुल मिलाकर मैं यही मानता हूं कि देश चारित्रिक पतन की राह पर है। – योगेन्द्र जोशी