निर्वाचन आयोग की दोषपूर्ण कार्यशैली और दोहरे मतदान की संभावना

[इस आलेख में उल्लिखित चुनाव संबंधी अनुभव का कथा रूपांतर अन्यत्र प्रस्तुत किया गया है ।]

हाल में संपन्न लोकसभा चुनावों में वाराणसी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र का विशेष महत्व रहा है, क्योंकि यहां से भाजपा के बहुचर्चित प्रत्याशी और देश के भावी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुनाव लड़ रहे थे और उनको चुनौती दे रहे थे आप पार्टी के नवोदित राजनेता अरविंद केजरीवाल, कांग्रेस के अजय राय, सपा के कैलाश चौरसिया, तथा बसपा के विजय जायसवाल । वैसे मैदान में कुल 42प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे थे जिनमें अधिकतर वे थे जिनका नाम पहले कभी न सुना गया था और न चुनाव के बाद ही सुना गया । अज्ञात श्रेणी के ऐसे प्रत्याशी चुनाव क्यों लड़ते होंगे यह मेरी समझ मैं कभी नहीं आया । ऐसे प्रत्याशियों का योगदान चुनाव प्रक्रिया को पेचीदा बनाने के अलावा कुछ भी रचनात्मक रहता होगा यह मैं नहीं सोच सकता । वाराणसी में प्रत्याशियों की इतनी बड़ी संख्या के लिए हर निर्वाचन स्थल पर तीन-तीन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की व्यवस्था करनी पड़ी थी । ज्ञातव्य है कि एक वोटिंग मशीन में केवल 16बटनों का प्रावधान रहता है । मैं समझता हूं कि  मतदाताओं को मशीन पर अपने मनपसंद प्रत्याशी का नाम/चुनाव-चिह्न खोजने में अवश्य दिक्कत हुई होगी ।

सुना जाता है कि चेन्नै में भी 42प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे थे । अवश्य ही ऐसे “फिजूल”के प्रत्याशी चुनाव की गंभीरता का सम्मान नहीं करते और संविधान द्वारा प्रदत्त चुनाव लड़ने की आजादी का मखौल उड़ाते हैं । आयोग और देश की विधायिका को चाहिए कि ऐसे प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने से रोके जाने का रास्ता खोजें, अथवा उन्हें गंभीरता बरतने के लिए प्रेरित करें ।

इस बार “वीआईपी”चुनाव क्षेत्र का रुतवा हासिल कर चुके वाराणसी का मैं तथा मेरी पत्नी दशकों से मतदाता हैं । हम दोनों लंबे अर्से से अपने मतदान का प्रयोग करते आ रहे हैं । पिछले बारह-तेरह वर्षों से मैंने किसी के भी पक्ष में मतदान न करने की नीति अपना रखी है । (पत्नी अपना निर्णय स्वतंत्र रूप से लेती हैं !) मेरा मानना है कि अपने लोकतंत्र में छा चुके तमाम दोषों के लिए अपनी मौजूदा राजनैतिक जमात ही जिम्मेदार है । आप कभी एक को तो कभी दूसरे को मत देकर चुने गए जनप्रतिनिधि तो बदल सकते हैं, किंतु राजनैतिक बिरादरी का स्वरूप नहीं बदल सकते हैं । इसलिए चाहे मोदी आवें, या राहुल अथवा केजरीवाल, वस्तुस्थिति उल्लेखनीय तरीके से बदलने वाली नहीं है । मैं आमूलचूल बदलाव का हिमायती हूं । मुझे “नोटा”बटन में ही उम्मीद दिखती है, इसलिए उसी को इस्तेमाल करता हूं । अब तो नोटा बटन है, पहले उसके बदले एक फार्म (फॉर्म 17ए आयोग के नियम 49-ओ के अंतर्गत) भरना होता था ।

दो-दो मतदाता सूचियां

चुनाव में भाग लेने के लिए मतदान केंद्र पर पहुंचने पर पता चला कि वहां दो परस्पर भिन्न मतदाता सूचियों के अनुसार मतदान हो रहा है । हमें यह देख हैरानी हुई कि एक तरफ इन सूचियों से कुछ मतदाताओं के नाम गायब थे तो दूसरी तरफ कुछ के नाम दोनों में ही मौजूद थे । मतदान की प्रक्रिया दो कमरों संपन्न की जा रही थी – पहले कमरे में एक सूची तो दूसरे में  अगली सूची के अनुसार । साफ जाहिर में कि कुछ मतदाता दो बार मत दे सकते थे, बशर्ते कि वे उंगली पर लगाए गये निशान को मिटा सकें । हम दोनों का ही नाम सही फोटो के साथ दोनों सूचियों में मौजूद थे ।

मैंने तो पहली सूची के अनुसार मत दे दिया, लेकिन मेरी पत्नी को यह कहकर संबंधित मतकर्मियों ने लौटा दिया कि वे कालोनी की मतदाता होती थीं लेकिन स्थान छोड़ देने के कारण अब वह मतदाता नहीं रहीं । इसके लिए उन्होंने “विलोपित”श्रेणी का जिक्र किया । खैर पत्नी महोदया लाइन में लगकर दूसरे कमरे में मतदान कर आईं जहां मैं भी जा सकता था ।

यह हमारी समझ से परे था कि क्यों मेरी पत्नी “विलोपित”हो गईं जब कि मैं “विलोपित”नहीं हुआ । इससे अधिक अहम सवाल यह है कि हूबहू एक ही विवरण के साथ दो सूचियां कैसे बनाई गई थीं और क्यों इस्तेमाल हो रही थीं । मैं स्वयं देख चुका था कि मुझसे संबंधित विवरण दोनों में एकसमान था ।

दोहरा मतदान

मैं कह चुका हूं कि एक ही मतदाता का नाम दो-दो सूचियों में मौजूद होने पर दोहरे मतदान की गुंजाइश बनती है । इस बात का एहसास मुझे दूसरे दिन एक युवक से भेंट होने पर हुआ । उसने मुझे बताया कि वह एक बार पहली सूची के अनुसार वोट डालकर घर लौटा; पपीते की चेप से उसने उंगली पर लगा निशान मिटाया; और फिर दूसरी सूची के अनुसार वोट डाल आया । यह भी बता दूं कि वह किसी और मतदान केंद्र का मतदाता था । इसका मतलब यह हुआ कि दो-दो (या अधिक?) सूचियों का प्रयोग कई मतदान केंद्रों पर हो रहा था ।

मुझे शंका है कि चुनाव उतने साफ-सुथरे नहीं होते है जितना दावा किया जाता है । कहीं मतदाताओं के नाम ही गायब रहते हैं तो कहीं दोहरा मतदान भी कुछ लोग कर लेते हैं । निर्वाचन आयोग को इस संदर्भ में गंभीर कदम उठाने की जरूरत है । – योगेन्द्र जोशी

चुनाव आयोग का राहुल गांधी से सवाल – क्या हो राहुल का जवाब

राहुल का इंदौर भाषण २०१३

 

 

बेचारे राहुल गांधी, कांग्रेस के स्टार प्रचारक और लगभग सर्वेसर्वा । बुलंदशहर के हालिया दंगों को लेकर उन्होंने जो उल्टासीधा बोल दिया वह अब उनके गले की हड्डी बन गया है । (देखें 29 अक्टूबर की पोस्टसमझ में नहीं आता कि उन्होंने जो कुछ कहा वह निहायत नादानी में कह दिया या सोचसमझकर । इस बात को शायद वह भी खुद ठीक से नहीं जानते होंगे । बस जोशोखरोश में मन में कुछ आया और बोल गए, आगा-पीछा देखे बिना ।

राहुल गांधी अभी राजनीति में कच्चे खिलाड़ी हैं । कांग्रेसजन तो उन्हीं को आगे करने में उतावले हैं, और उनकी नजर में वे ही प्रधानमंत्री पद के योग्यतम व्यक्ति हैं, क्योंकि वे जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के वंशज हैं और राजनीति में निपुणता उनको उनसे विरासत में मिली हैं । वे भूल जाते हैं धनसंपदा-जमीन-जायदाद तो कानूनन विरासत में मिलती है, लेकिन किसी विषय में महारत या नैपुण्य नहीं । खैर, होगी क्रांग्रेसजनों की भी कोई मजबूरी !

इन बातों पर लंबी बहस संभव है । मुझे अभी उसमें पड़ने की जरूरत नहीं है । मेरी चिंता तो इस बात को लेकर है कि चुनाव आयोग ने उनसे उनके उपरिकथित दंगों के संदर्भ में स्पष्टीकरण मांग डाला है, जिसका उत्तर वे अभी तक नहीं दे पाए और जिसके लिए उन्होंने हफ्ते भर की मोहलत और मांगी है । जो कहा उसके लिए वे कुछ ऐसी सफाई देना चाहेंगे कि उन्हें शर्मसार न होना पड़े । क्रांग्रेसजन तो अभी तक उनका बचाव करते ही आ रहे हैं । उनकी भी कुछ किरकिरी होनी लाजिमी है । इस मौके पर मेरे दिमाग में एक स्पष्टीकरण सूझ रहा है । काश! कि यह उन तक पहुंच जाए । यों उनके पास तो एक से एक धुरंधर कानूनी सलाहकार होंगे । उन्हीं की पार्टी में अनेकों हैं । फिर भी विधिवेत्ता कभी-कभी चूक कर जाते हैं, जैसे जेठमलानी आत्मविश्वास की अतिशयता में बापू आसाराम को बचाने के चक्कर में बिना किसी प्रमाण के उस नाबालिग को ही दिमागी तौर पर असंयत बता बैठे, जिसने आसाराम पर आरोप लगाए हैं । हां, तो मेरी सफाई कुछ यों है:

“मेरे पास एक आदमी आया था जिसका कहना था कि वह अमुक खुफिया एजेंसी में कार्यरत है । मैं झूठ नहीं बोलूगा; मैंने उस पर भरोसा कर लिया । मुझे लगा कि यह व्यक्ति मुझ तक यों ही नहीं पहुंच गया होगा । उस आदमी को मेरी उच्चतम श्रेणी की सुरक्षा व्यवस्था से गुजरना ही पड़ा होगा । सुरक्षाकर्मियों ने अवश्य ही उसके बारे में पूरी जांच की होगी और उसके दावे को सही पाया होगा । मैं खुद अपने से मिलने वालों की जांच कभी नहीं करता, सो इस बार भी वैसा करने की जरूरत नहीं थी । उस व्यक्ति ने मुझे जो बताया वह सब जगजाहिर है । उसने वह सब मुझे बताना चाहिए था या नहीं इसका ख्याल तो उसे रहा ही होगा । उसे तो अपने खुफिया तंत्र के सर्विस-रूल्स मालूम ही होंगे । उसने जो कुछ बताया वह क्यों बताया, जब इस सवाल पर मैंने गंभीरता से विचार किया तो यही समझ में आया कि दंगों के दुष्परिणामों की हकीकत देश की जनता के सामने आनी चाहिए । लोगों को जानने का हक है इसीलिए तो हम आर.टी.आई. कानून लाए थे । जब देश में कोई आंतकी घटना होती है तो उसे छिपाते नहीं हैं । उसकी चर्चा करते हैं और पाकिस्तानी आई.एस.आई. की भूमिका की बात करते हैं । ठीक उसी तर्ज पर मैंने वे बातें कहीं जिनकी सफाई मुझसे मांगी जा रही है । इसे यदि मेरी गलती मानी जाती है तो मैं इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूं । अगर गलती उस खुफिया-कर्मी की है तो उसकी सफाई वही दे सकता है । और यदि वह व्यक्ति खुफियाकर्मी ही नहीं था तो गलती मेरे सुरक्षकर्मियों की है और वे ही उसकी सफाई दे सकते है ।”

जाहिर में कि पूरा मामला लंबीचौढ़ी जांच का बन जाता है । उसके लिए एक जांच कमिशन होना चाहिए जिसके नतीजे सालों में आएं । अंततः मामला रफादफा हो जाए । मेरी दिली तमन्ना है कि ऐसा ही हो ! – योगेन्द्र जोशी

लोकसभा के 60 वर्ष एवं ‘कार्टून कथा’ – वाकई सफल है अपना लोकतंत्र?

संसद के 60 वर्ष

कल रविवार 13 मई के दिन देश के दोनों सदनों की बैठक चल रही थी । संसद ने ‘सफलता पूर्वक’ 60 वर्ष पूरे कर लिए हैं । इसी उपलक्ष्य पर विशेष बैठक कल के साप्ताहिक अवकाश यानी रविवार के दिन आयोजित हुई थी । चुने गये कुछ सांसदों ने अपने-अपने उद्गार प्रस्तुत किए । दिन भर की कार्यवाही देखने-सुनने में मेरी खास दिलचस्पी नहीं थी । दो-चार सदस्यों के विचार सुन लिए, उतने से ही चर्चा का लुब्बेलुआब समझ में आ गया था । हमारा संविधान उत्कृष्टतम है और हमारा लोकतंत्र सफल है ऐसा मत कमोबेश सभी संसद-सदस्यों का था ऐसा मुझे प्रतीत हो रहा था ।

संसद की कार्यवाही देख मेरे मन में प्रश्न उठता है कि अपना लोकतंत्र क्या वाकई सफल है? सफलता की कैसे व्याख्या की जानी चाहिए? देश की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था किन उद्येश्यों को पूरा करने में सफल हुई है? कुुछ सांसदों ने असफलताओं की ओर भी इशारा किया । फिर भी वे इस बात पर संतुष्ट दिखाई दिए कि तमाम कमियों के बावजूद अपना लोकतंत्र सफल है ।

सफल लोकतंत्र, वाकई?

हां, अपना लोकतंत्र सफल है इस माने में कि मतदाता निर्भीक होकर मतदान में भाग ले सकते हैं । जाति, धर्म, लिंग अथवा क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है; सबको समान अधिकार प्राप्त हैं । हमारे निर्वाचन आयोग ने अपने सांविधानिक अधिकारों और दायित्वों के अनुरूप कार्य करने में काफी हद तक सफलता पाई है । उसकी कार्यप्रणाली में उत्तरोत्तर सुधार हुआ है । अवश्य ही आयोग प्रशंसा एवं शाबाशी का पात्र है । किंतु इस कार्य में राजनेताओं, विशेषकर सांसदों, की रचनात्मक भूमिका रही है ऐसा दावा करना सही नहीं होगा । संसद के माध्यम से जिस प्रकार के सुधारों की वकालत आयोग करता रहा है उनमें सांसदों ने वांछित रुचि नहीं दिखाई है । बल्कि उनका रवैया कुछ हद तक टालने या रोड़ा अटकाने की ही रही है ।

यह भी सच है कि अपना लोकतंत्र अभी तक लड़खड़ाया नहीं है । अभी इस लोकतंत्र के प्रति विद्रोह नहीं दिखाई देता है । किंतु इस संभावना से हम इंकार नहीं कर सकते हैं कि भविष्य में स्थिति बदतर हो सकती है, यदि देश की प्रशासनिक व्यवस्था में कार्यकुशलता, ईमानदारी और दायित्वों के प्रति प्रतिबद्धता लाने के प्रभावी प्रयास नहीं किए जाते हैं ।

लोगों के मतदान में रुचि लेना और निर्वाचन आयोग की सफलता को ही लोकतंत्र की सफलता का मापदंड नहीं माना जा सकता है । निर्वाचन कार्य तो लोकतांत्रिक कार्यसूची का केवल आरंभिक कदम भर होता है । उसके बाद सभी कुछ तो जनप्रतिनिधियों के दायित्व-निर्वाह पर निर्भर करता है । अगर वह संतोषप्रद न हो तब हमें सफलता पर सवाल उठाने चाहिए ।

लोकतंत्र का उद्येश्य केवल यह नहीं है कि जनता संसद में जनप्रतिनिधियों को बिठा दे । मूल आवश्यकता यह है कि वे जन-अपेक्षाओं को पूरा करने में प्रयासरत हों; कि वे जनता की समस्याओं को हल करें; कि वे कुशल, समर्पित एवं संवेदनशील प्रशासन देश को दें; कि वे जनता के समक्ष अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करें; इत्यादि । वस्तुतः इस प्रकार के कई सवाल उठाए जा सकते हैं जिनके सापेक्ष लोकतंत्र की सफलता को आंका जाना चाहिए । कहां खड़ा है हमारा लोकतंत्र? कुछ सवाल हैं मेरे मन में ।

मेरे सवाल-जवाब

प्रश्नः मेरा आरंभिक प्रश्न यह है कि हमारे मौजूदा सांसद (और राज्यों के स्तर पर विधायक) नैतिकता, आचरण, जनहित की चर्चा, आदि की दृष्टि से क्या उन सांसदों से बेहतर सिद्ध हो रहे हैं जो संसद के आरंभिक दौर में उसके सदस्य बने । आम जन से जो सम्मान सांसदों को तब प्राप्त था क्या उसके बराबर सम्मान आज के सांसदों को मिल रहा है? लोकतंत्र की सफलता तो तभी मानी जानी चाहिए, जब संसद बेहतर और बेहतर नजर आने के लिए प्रयत्नशील हो । क्या ऐसा हो रहा है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः क्या संसद में होने वाली बहसों का स्तर पहले की तुलना में बेहतर हुआ है? क्या सांसद हर बात पर हंगामा खड़ा करने के बजाय धैर्यपूर्वक सार्थक चर्चा में भाग लेते हैं, और अपने बातों के प्रति अन्य को सहमत करने के प्रयास करते हैं? क्या वे संसद के भीतर बहुमत को समझते हैं और उसका सम्मान करते हैं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः संसद/विधानसभाओं में आपराधिक छवि एवं वैसी मानसिकता के सदस्यों की संख्या समय के साथ घटी है क्या? हमारे सांसद जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण पेश करते हैं क्या? अपनी सामूहिक छबि के प्रति क्या वे जागरूक दिखाई देते हैं क्या? अपनी ही संसद के बनाए कानूनों का वे सभी सम्मान करते हैं क्या?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः लोकतंत्र की दुहाई देने वाले राजनैतिक दलों में क्या आंतरिेक लोकतंत्र है? कांग्रेस पार्टी अपने 126 साल पुराने इतिहास पर गर्व करती है, किंतु वह भूल जाती है कि उसका चरित्र पिछले 4-5 दशकों में पूरी तरह बदल चुका है । अब यह पूरी तरह गांधी-नेहरु परिवार पर केंद्रित है । उसमें कभी मतभेदों के लिए जगह हुआ करती थी, किंतु आज मुुखिया ने जो कह दिया वह सबके लिए वेदवाक्य बन जाता है । पिछले 4 दशकों में जिन दलों ने जन्म लिया वे अब किसी न किसी नेता की ‘प्राइवेट कंपनी’ बन कर रह गए हैं । उनमें मुखिया की बात शिरोधार्य करना कर्तव्य समझा जाता है । चाहे डीएमके हो या एआइएडीएमके या त्रृृणमूल कांग्रेस, शिवसेना, नैशनल कांफरेंस, बसपा, सपा, राजद आदि आदि, सब इसी रोग के शिकार हैं । जो दल आंतरिक लोकतंत्र से परहेज रखते हैं उनसे सफल लोकतंत्र की उम्मींद नहीं की जा सकती है । क्या मेरी बातें गलत हैं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे जनप्रतिनिधि संसद/विधानसभाओं में अपने-अपने दलों की नीतियों का समर्थन करते हैं न कि लोगों की भावनाओं को व्यक्त करते हैं जिनकी नुमाइंदगी का वे दावा करते हैं । वे दल द्वारा जारी ‘ह्विप’ के अधीन कार्य करते हैं न कि अपने मतदाताओं के मत के अनुसार । लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि को यह विवशता नहीं होनी चाहिए कि दल की नीति का वह समर्थन करे ही भले उसे वह नीति अनुचित लगे । क्या मैं अनुचित कह रहा हूं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे जनप्रतिनिधियों के संसद में उपस्थित रहने और कार्यवाही में सक्रिय तथा सार्थक भागीदारी निभाने की मौजूदा तस्वीर संसद के आरंभिक दिनों की अपेक्षा बेहतर कही जा सकती है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि वे दायित्वों के प्रति ईमानदार, समय पर कार्य निष्पादित करने वाली, और जनता के प्रति संवेदनशील प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित करें । अलावा इसके वे भ्रष्ट, लापरवाह, कार्य टालने वाले प्रशासनिक कर्मियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक/दंडात्मक कार्यवाही करें । लेकिन हम पाते हैं कि प्रशासन में भ्रष्टाचार निरंतर बढ़ता जा रहा है । इस संदर्भ में सरकारें चलाने वाले सांसदों का रवैया क्या संतोषप्रद रहा है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे सांसदों ने कानून तो बहुत बनाए हैं? किंतु क्या उन्होंने कभी इस बात की चिंता की है कि उनका ठीक से पालन नहीं हो रहा है? त्वरित कानूनी कार्यवाही की व्यवस्था क्या बीते 60 सालों में की गयी है?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः इस देश में पुलिस बल सत्तासीन राजनेताओं के इशारे पर उनकी असफलताओं के विरुद्ध आवाज उठाने वालों पर डंडा चलाने का काम करती है । उनकी कार्यप्रणाली ब्रिटिश राज से भी बदतर है और उनके नियम-कानून आज भी अंग्रेजी काल के हैं । आम आदमी पुलिस बल को खौफ के नजरिये से देखता है, उसे एक मित्र संस्था के रूप में नहीं । पुलिस की छबि सुधारने के लिए सांसदों/विधायकों ने कारगर कदम नहीं उठाए हैं । तब भी लोकतंत्र को सफल माना जाए?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः हमारे राजनेता सत्ता पाने और उस पर चिपके रहने के लिए वोटबैंक की राजनीति करते आ रहे हैं । वे जनता की भावनाओं को उभाड़ने के लिए बेतुके और गैरजरूरी मुद्दे उठाने से नहीं हिचकते हैं । संसद में उठा ‘कार्टून’ मुद्दा इसका ताजा उदाहरण है । वे जनभावनाओं के ‘आहत’ होने की बात करते हैं, भले ही जनता को मुद्दे की जानकारी ही न हो और वह उसे तवज्जू ही न दे । ऐसा लगता है कि वे “तुम्हें आहत होना चाहिए” का संदेश फैलाकर जनभावनाओं का शोषण करते हैं और अपना वोट बैंक मजबूत करते हैं । क्या मैं गलत कर रहा हूं?
उत्तरः नहीं ।

प्रश्नः आम जनता में राजनेताओं की साख गिरी है इस बात की ओर वे स्वयं यदाकदा इशारा कर जाते हैं । कौन है जिम्मेदार? गिरती हुई साख क्या सफल लोकतंत्र का संकेतक है?
उत्तरः नहीं ।

निष्कर्ष

मेरे जेहन में अभी ये सवाल उठे हैं । ऐसे तमाम अन्य सवाल पूछे जा सकते हैं, और जिनके सापेक्ष लोकतंत्र की सफलता को आंका जा सकता है । कुल मिलाकर मैं भारतीय लोकतंत्र को सफल नहीं कहूंगा, क्योंकि यह जनाकांक्षाओं की कसौटी पर खरा नहीं उतर पा रहा है । अवश्य ही यह ध्वस्त नहीं हो रहा है । इस बात का श्रेय जनता को जाता है जो धैर्यवान है और लोकतंत्र में आस्था रखती है । – योगेन्द्र जोशी

टिप्पणी

दो-तीन रोज पहले संविधान-लेखन से संबंधित नेहरू-आंबेदकर को लेकर तत्कालीन विख्यात कार्टूनिस्ट शंकर द्वारा 1949 में अंकित एक कार्टून बना हंगामा खड़ा किया था । यह कार्टून एनसीआरटी की 11-12वीं की पुस्तक में शामिल है । और यही विवाद का विषय था । अधिक जानकारी के लिए देखें ‘डेलीन्यूज’ अथवा ‘बीबीसी’, और ‘कार्टून-अकैडेमी’ । मेरी जानकारी में कार्टून यह हैः

और अब ई.वी.एम. (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) पर हमला

एक-डेड़ माह पूर्व संपन्न चुनावों में पराजित दो-एक प्रत्याशियों ने अपनी हार का कारण इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को ठहरा दिया । हुआ यह था कि अहमियत रखने वाले कुछ राजनेता (जैसे माननीय चिदंबरम, श्रीमती मेनका गांधी) हारते-हारते जीत गये । मामूली अंतर से हार रहे इन नेताओं ने जब दुबारा मतगणना की मांग की थी और उनकी मांग मान ली गयी तो ये विजयी घोषित हो गये । परिणामों के इस प्रकार उलट जाने के कारण ही शायद कुछ प्रत्याशियों को ई.वी.एम. के प्रति शंका हो गयी होगी । रोचक तथ्य यह है कि मशीन पर लगाया गये उनके आरोपों को अन्य राजनेताओं ने नजरअंदाज करने के बजाय उस शंका के प्रति समर्थन देना आंरभ कर दिया । भाजपा के श्री आडवाणी और सीपीएम के श्री यचूरी आदि जैसे धुरंधर राजनेताओं ने एक बहस ही छेड़ दी है । क्रांग्रेस ने इस शंका को पूर्णतः निराधार कह दिया है । मुझे लगता है कि चुनाव में जिन प्रत्याशियों या दलों को अच्छे परिणाम मिले हैं वे चुप हैं, और नतीजे जिनके पक्ष में नहीं रहे उन्होंने बेचारे ई.वी.एम. पर ही दोष मढ़ना शुरू कर दिया है । अब सवाल यह है कि क्या ये मशीनें गड़बड़ करती हैं, कर सकती हैं ? मुझे अधोलिखित संभावनाएं नजर आती हैं:

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लोकतंत्र की व्यथाकथा, ग्यारह – निरर्थक अभियान ‘मतदान अवश्य करो’ का

आगामी लोकसभा के लिए आयोजित करीब एक मास के मतदान कार्यक्रम के बाद अंततः चुनाव प्रक्रिया का अंतिम चरण बीते 13 तारीख संपन्न हो ही गया । जनता जितनी भागीदारी निभाने के लिए अधिकृत थी उतनी उसने निभा ली, कुछ ने किसी प्रत्याशी के पक्ष में वोट देकर तो कुछ ने नकारात्मक मत व्यक्त करके । कुछ ने तो खुलकर बहिष्कार भी कर दिखाया और शेष ने उदासीनता व्यक्त करते हुए चुप बैठना ठीक समझा । अब सरकार किसकी बनेगी और कैसे बनेगी यह दो-चार दिनों में पता चल ही जायेगा । हो सकता है सरकार का गठन किसी भी दल के लिए औरों के ‘अवसरवाद-प्रेरित सहयोग’ के बावजूद आसान काम न हो । लेकिन अंत में जोड़-तोड़ में कोई न कोई तो सफल होगा ही ऐसी उम्मींद की जानी चाहिए । हां, इतना अवश्य है कि कोई भी सरकार आवे, वह पुराने घिसे-पिटे ढर्रे पर ही चलेगी, ‘किसी प्रकार से पांच साल खींचो और जैसे देश की गाड़ी आज तक चलती रही है वैसे चलाते रहे’ की तर्ज पर । देश की तस्वीर न कोई बदलने वाला है, और न किसी में वैसा करने का इरादा है, और न ही किसी में काबिलियत ही है । बस कुर्सी पर बैठने वाले चेहरे नये होंगे, ढर्रा नया नहीं होगा । अस्तु, अपने देशवासियों के प्रति मेरी शुभेच्छाएं ।

इस बार के चुनावों का एक दिलचस्प पहलू मेरी नजर में यह था कि मतदाताओं को वोट डालने के लिए प्रेरित करने हेतु विभिन्न संस्थाओं द्वारा अभियान चलाये गये । फिर भी मतदान प्रतिशत सर्वत्र संतोषप्रद रहा यह कहना ठीक नहीं होगा । ये अभियान मतदाताओं को मतकेंद्रों तक खींच ले जाने में किंचित् भी सफल हुए होंगे इसमें मुझे शंका है । मेरी दृष्टि में तो ये अर्थहीन प्रयास थे । मेरे इस विचार के आधार हैं । मैं समझ नहीं पाया कि किसी व्यक्ति को मतदान के दिन क्यों यह स्मरण दिलाना पड़ता है कि उसे वोट डालना है या डालना चाहिए । किसी व्यक्ति को याद कब दिलाना पड़ता है ? तभी न कि जब उसके ध्यान से कोई बात उतर गयी हो ? जैसे बाजार में खरीदारी करते वक्त किसी सामान का ध्यान न रहे । अपने मित्र से मिलने का वादा आपने किया हो और व्यस्तता के कारण ऐन मौके पर उसका खयाल ही न रहे । ऐसे कह कुछ मौके हो सकते हैं जब किसी को याद दिलाना पड़े । किंतु किसी अध्यापक को यह बताने जरूरत पड़े कि उसके छात्र कक्षा में प्रतीक्षारत हैं, या किसी चिकित्सक को ध्यान दिलाना पड़े कि उसे बहिरंग में पहुंचना है, या ऐसे ही किसी मामले में व्यक्ति को याद दिलाने की बात उठे तो ऐसा प्रयास हास्यास्पद कहा जायेगा । अपने दायित्व से बचने के ऐसे तमाम मामलों के पीछे के कारणों की गंभीर समीक्षा की जानी चाहिए । मतदान कार्यक्रम ऐसा नहीं कि कोई मतदान करना ही भूल जाये । टीवी चैनलों और अखबारों के संपर्क में जो हो उसे मतदान का ध्यान ही न रहे ऐसा सोचना बेमानी है । और जिस बेचारे की पहुंच इन माध्यमों तक हो ही न उसके लिए तो ये निःसंदेह निरर्थक कहे जायेंगे । तात्पर्य यह है कि बार-बार याद दिलाने की वाकई कोई अर्थवत्ता नहीं ।

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