अगस्त 15, 72वां स्वतंत्रता दिवस – बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिए

बर्फ़ की तिरंगी सिल्ली

स्वाधीनता दिवस – एक पर्व

आज 15 अगस्त है देश की स्वातंत्र्य-प्राप्ति का दिन, जिसे पिछले एकहत्तर वर्षों से हम एक उत्सव के तौर पर मनाते आ रहे हैं। इस उपलक्ष्य पर मैं देशवासियों को बधाई देना चाहता हूं और कामना करता हूं कि हर व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने का संकल्प ले, उसे निभाने का प्रयास करे।

     ऊपरी तौर पर देखें तो हर भारतीय इस दिन स्वयं को एक स्वाधीन देश का नागरिक होने का गर्व अनुभव करेगा। किंतु हम स्वाधीन हैं इतना काफी है क्या? या इसके आगे भी कुछ और है? जिन लोगों ने इस स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए संघर्ष किया उन्होंने क्या स्वाधीनता की अर्थवत्ता के बारे में भी कुछ सोचा नहीं होगा? उन्होंने सोचा होगा न कि कैसे हम अपने देशवासियों को ऐसी शासकीय व्यवस्था दे पायेंगे जो उनके बहु-आयामी हितों को साधने का कार्य करेगा? क्या वह कर पाए हैं हम? या उस दिशा में ईमानदारी से बढ़ भी पाए हैं? या सही दिशा में बढ़ने का इरादा भी कर पाए हैं?

हम स्वाधीन हैं और उस स्वाधीनता का “उपभोक्ता” मैं भी हूं। मेरे लिए यह काफी महत्वपूर्ण है, किंतु पर्याप्त नहीं। इसके आगे भी मुझे बहुत कुछ और देखने की इच्छा है। मुझे खुद के लिए कुछ पाने की लालसा नहीं, क्योंकि मेरे पास अपने लिए पर्याप्त है। जितना एक आम आदमी के लिए वांछित हो उतना मुझे मिला ही है, उसके आगे बहुत और मैं पाना नहीं चाहूंगा। उसके विपरीत किसी को अपनी सामर्थ्य से कुछ दे सकूं तो वह अधिक संतोष देगा।

स्वाधीन भारत – उपलब्धियां

अब मैं असली मुद्दे पर आता हूं। मेरा जन्म देश की स्वातंत्र्य प्राप्ति के चंद महीनों पहले उत्तराखंड (तब उ.प्र.) के सुदूर गांव में हुआ था। अर्थात्‍ मैं परतंत्र देश में जन्मा, लेकिन उस काल का कोई अनुभव नहीं मिला। जब से होश संभाला स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस मनते हुए देखता आ रहा हूं। क्या अहमियत है इन दिवसों की? यह सवाल पिछले कुछ वर्षों से समझने की कोशिश कर रहा हूं।

इस में दो राय नहीं है कि एक स्वतंत्र और स्वशासित देश के रूप में हमने भौतिक स्तर पर काफी प्रगति की है। विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में से एक बनने की दिशा में देश अग्रसर है। लोगों की संपन्नता एवं आर्थिक समृद्धि में इजाफा हुआ है। देश अंकीय (डिजिटल) तकनीकी उपयोग करते हुए नई शासकीय व्यवस्था स्थापित कर रहा है। लोगों के हाथ में मोबाइल/ स्मार्टफोन पहुंच चुके हैं। जिन घरों में बिजली का पंखा मुश्किल से दिखता था उनमें “एसी” लग चुके हैं। सुख-सुविधा की तमाम युक्तियां लोगों की पहुंच में आ चुकी हैं। सड़कों पर मोटर बाइकें और कारें दौड़ रही हैं। साइकिल का प्रयोग जो करते थे वे उसे चलाना भी भूल चुके हैं। यह सच है कि इतना सब अभी भी समाज के एक बड़े तबके को मुहैया नही हो पाया है। फिर भी उस दिशा में देश बढ़ रहा है यह स्वीकारा ही जाएगा।

वैज्ञानिकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी काफी हद तक प्रगति हुई ही है। उपग्रह प्रक्षेपण में देश अग्रणी बन चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु देशज मिसाइलें बन चुकी हैं और नाभिकीय आयुधों का भी विकास हो चुका है। राकेट तकनीकी का भी उल्लेखनीय विकास हमारे वैज्ञानिक-अभियंता कर चुके हैं। चंद्रयान की बात पुरानी पड़ चुकी है; अब तो मंगल-यान की बात हो रही है।

यह सब उपलब्धियां कम हैं क्या एकहत्तर वर्ष पहले स्वतंत्र हुए देश के लिए? क्या इन सब पर गर्व नहीं होना चाहिए किसी भारतीय को? अवश्य गर्व होना चाहिए।

निजी अनुभव

इतना सब होते देखने के बाद भी मैं संतोष नहीं कर पाता। मुझे लगता है हमने जितना पाया है उससे अधिक खोया है। वैसे जो पाया और जो खोया उनके मूल्यों की तुलना करना आसान नहीं। हर व्यक्ति अपनी समझ और नजर से वस्तुस्थिति को देखेगा। क्या खोया इसका उल्लेख करने और अपनी निराशा व्यक्त करने से पहले मैं अपने दो-तीन अनुभवों की बात करता हूं:

(1) मैंने सन् 1962 में हाई-स्कूल परीक्षा पास की थी अपने गांव से 7-8 कि.मी. दूर के विद्यालय से। मुझे एक घटना की याद है जब जिले के किसी परीक्षा केन्द्र से खबर आई कि कोई छात्र वहां नकल करते पकड़ा गया। नकल का एक वाकया इलाके में खबर बन गई। नकल करने की कोई हिम्मत कर सकता है यह हम लोग तब सोचते भी नहीं थे। अब क्या है?

(2) अपने बचपन के दिनों में मैं मां-चाची आदि के वार्तालाप में इस प्रकार की बातें सुना करता था: “सुना है फलां आदमी घूस लेने लगा है।” कोई सरकारी कर्मी घूस भी लेता है यह तब खबर बन जाती थी। अब क्या है?

(3) 1972-73 की बात है जब रेल-यात्रा में मेरा बैग गुम हो गया था। उसमें हाई-स्कूल से एम.एससी. तक के प्रमाणपत्र थे। मैंने संबंधित संस्थाओं को प्रमाणपत्रों की द्वितीय प्रतियों हेतु निवेदन किया। मुझे बिना भाग-दौड़ और लेन-देन किए कुछ दिनों के अंतराल पर दस्तावेज मिल गए। मैं सोचता हूं आज वही कार्य इतना आसान न होता।

देश की वर्तमान दशा

मैं कल दोपहर एक टीवी समाचार सुन रहा था। उसमें इधर-उधर की आपराधिक घटनाओं का जिक्र था। दो-चार की बानगी पेश करता हूं:

(1) आगरा (उ.प्र.) में हिन्दू अतिवादियों ने किसी बात पर एक युवक की पिटाई कर दी थाने में ही पुलिस की मौजूदगी में।

(2) मेरठ (उ.प्र.) में किसी एसयूवी कार से आल्टो कार टकराई और एसयूवी के सशस्त्र सवारों ने दूसरी कार के दोनों सवारों की तबियत से पिटाई तो की ही, फिर अपनी कार में बिठाकर अज्ञात जगह ले भागे।

(3) मुरादाबाद (उ.प्र.) में उपद्रवी कांवड़ियों द्वारा सड़क पर किसी बात पर उत्पात मचाने की घटना का भी समाचार टीवी पर सुना।

(4) उन्नाव (उ.प्र.) में एक-तरफा प्यार में पागल शादीशुदा एक युवक ने युवती की मौजूदगी में ही उसके ब्यूटी पार्लर में तोड़फोड़ कर दी।

(5) ग्रेटर नॉयडा (उ.प्र.) में गुंडे-बदमाशों की गोली का शिकार हुआ एक व्यक्ति।

(6) नवी मुम्बई (महा.) में रंगदारी वसूलने के लिए दुकान में घुसे बदमाश दुकानदार पर ताबड़तोड गोली दागकर फरार हो गये।

(7) वैशाली (बिहार) से भी ऐसी ही एक घटना सुनने को मिली।

(यह विवरण याददास्त पर आधारित है; स्थान एवं घटना के स्वरूप बताने में उलटफेर हो गया होगा।)

ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की घटनाएं पहले नहीं होती थीं। तब कभी-कभार देखने-सुनने में आती थीं, लेकिन आजकल घटनाओं की बाढ़-सी आ चुकी है।

सरकारें अपराधियों को सजा देने का दावा करती हैं; कुछ मामलों में सजा भी हो जाती है। किंतु वे यह जानने के प्रयास नहीं करती हैं कि अपराध होते ही क्यों हैं? न सरकारें न ही देश के बुद्धिजीवी ऐसे किसी अध्ययन में रुचि ले रहे हैं। लोगों में आपराधिक प्रवृत्ति न पनपे इसके प्रयास होने चाहिए कि नहीं?

इन सब बातों को देखकर मुझे निराशा होती है। मेरा मत है कि देश विकट चारित्रिक पतन के दौर से गुजर रहा है। विकास एवं आर्थिक प्रगति इस पतन की भरपाई नहीं कर सकते है। एक सभ्य, सुसंस्कृत समाज की रचना महान्‍ देश की पहचान होनी चाहिए।

     मुझे यह देख हैरानी एवं क्षोभ होता है कि देश में अनेक लोग हैं जिनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ है, अनुशासनहीनता, स्वच्छंद आचरण, कायदे-कानूनों का उल्लंघन, इत्यादि। मैंने आरंभ में बताया कि 1962 में नकल को किस नजरिए से देखा जाता था। आज सरकारी स्कूल-कालेजों के छात्र नकल को अपना अधिकार समझते हैं। इतना ही नहीं उनका साथ शिक्षक, अभिभावक, और पुलिस भी दे रही है। सरकारी शिक्षा का स्तर गिर रहा है। यही आज के डाक्टरी पेशे का है जहां अनेक डाक्टर संपन्न होने के बावजूद मरीज के प्रति सहानुभूति नहीं रखते। पुलिस बल को देखकर कई जन घबराते हैं। कोई महिला शिकायत लेकर थाने जाने में डरती है कि वहां कहीं उसी का दुष्कर्म न हो जाए। दुष्कर्म की घटानाएं दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं। राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है ऐसा क्यों कहा जा रहा है? कुछ तो सच्चाई होगी। बिहार के मुजफ़्फ़रपुर और उ.प्र. के बालिका संरक्षण गृहों की घटनाएं आज के आपराधिक मानसिकता के लोगों की देन है जिन्हें राजनेताओं एवं प्रशासन से प्रशय मिल रहा होता है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। उ.प्र. के वाराणसी एवं बस्ती और पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी के निर्माणाधीन फ़्लाई-ओवरों का गिरना इसी भ्रष्टाचार के परिणाम हैं।

     यह विषय लंबी विवेचना चाहता है जिसे इस आलेख में शामिल करना कठिन है। कुल मिलाकर मैं यही मानता हूं कि देश चारित्रिक पतन की राह पर है। – योगेन्द्र जोशी

स्वतंत्रता दिवस 2016: देश ने वह नहीं पाया जिसकी उम्मीद थी

सूचनात्मक टिप्पणी

यह आलेख मैंने कल १५ अगस्त के उपलक्ष पर इसी ब्लॉग के लिए लि्खा था। किंतु इसे मैं अपने दूसरे चिट्ठे (http://jindageebasyaheehai.wordpress.com) पर पोस्ट कर बैठा। यह गलती कैसे हुई, मेरा ध्यान कहां था,  मैं कह नहीं सकता। आज नजर आने पर इसे वहां से यहां स्थानांतरित कर रहा हूं। पाठकों से क्षमायाचना।

ΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩΩ

 

“मेरा मन हो स्वदेशी, मेरा तन हो स्वदेशी। मर जाऊं तो भी मेरा होवे कफ़न स्वदेशी।”

– पं राम प्रसाद बिस्मिल

“मेरी जीवनशैली हो विदेशी, मेरी भाषा हो विदेशी। या खुदा मौका मिले जो मुझे खुद बन जाऊं विदेशी।”

ऐसा सोचने वाले भी मिल जायेंगे देश में; कौन और कितने, अंदाजा लगाइये।

अपना देश भारत या इंडिया जो आप ठीक समझें 70वां स्वाधीनता दिवस मना रहा है। मुझसे यह अपेक्षा की जायेगी कि मैं देशवासियों को प्रणाम करूं, बधाई दूं, और भविष्य की मंगलकामना प्रेषित करूं। शुभकामना !

****

15 अगस्त

आज देश को स्वाधीन हुए 69 वर्ष हो रहे हैं। इस दिन सर्वत्र जश्न मनाया जा रहा है। शीर्षस्थ पदों पर विराजमान राजनेता, उच्च प्रशासनिक अधिकारी, अपनी-अपनी संस्थाओं में ध्वजोत्तोलन करने, देश की उपलब्धियों का बढ़चढ़कर बखान करने, और उपदेश देने के कार्य में लगे हैं।

क्या कोई उपलब्धियों का निष्पक्ष एवं वस्तुनिष्ठ आकलन करने को तैयार है? क्या उसके बारे में सुनने को भी तैयार है? या हकीकत जानने के बाद भी उसकी अनदेखी करके खुश होना चाहता है?

मेरी दृष्टि में हमने इस काल में बहुत कुछ खोया है। और पाया है वह इतना कम है कि उसे खोये हुए की भरपाई मानना उचित नहीं होगा। मेरे लेख से विचलित होकर कुछ लोग मुझे बुरा-भला भी कहेंगे। लेकिन यह कोई स्पष्ट नहीं करेगा कि मैं गलत कहां पर हूं।

चलिए मैं अपनी बात कहता हूं। यही स्वतंत्रता तो मुझे मिली है कि मैं अपने खयालात पेश करूं। जिसे नापसंद हो बह कान बंद कर लेगा। इस स्वतंत्र देश में लोग एक दूसरे के साथ गाली-गलौज कर सकते हैं। मैं तो यथासंभव शिष्ट भाषा में अपने बातें कहने की सोच रहा हूं।

उपलब्धियां

क्या हैं उपलब्धियां? हमारे राजनेता सीना तानकर कहने लगेंगे कि हमने नाभिकीय विस्फोट करके अपने को “न्यूक्लियर-पावर-संपन्न” देशों में शामिल किया है। अपनी मिसाइलें बनाकर दुनिया को अपनी ताकत का एहसास कराया है। चंद्रमा में चन्द्रयान भेजकर अपने वैज्ञानिक सामर्थ्य का प्रदर्शन किया है। मंगलयान की बात हमारे अंतरिक्ष अध्ययन/अभियान की योजना का अंग है। इस्रो (ISRO) जैसी हमारी संस्था उत्कृष्ट कार्य करके विश्व के कई देशों के कृत्रिम उपग्रहों को अंतरिक्ष में छोड़ रही है। ओएनजीसी (ONGC) खनिज तेल की खोज अपने दम पर देश एवं विदेश में कर रही है। सेना को आधुनिकतम हथियारों से लैस किया जा रहा है।

अन्न उत्पादन के क्षेत्र में हम आत्मनिर्भर बन चुके हैं। स्वातंत्र्य पूर्व हमारी स्थिति दयनीय थी। उस समय एवं उसके बाद भी कुछ समय तक अमेरिकी घटिया गेहूं (पीएल 480 योजना के तहत) पर हम निर्भर थे। आज देश में भोजन की कमी नहीं है।

शासकीय-प्रशासकीय तंत्र में अंकीय तकनीकी (digital technology) का प्रयोग बढ़ रहा है। बहुत से स्थलों पर कंप्यूटरीकृत वातावरण में कार्य हो रहा है। चिकित्सा के क्षेत्र में आधुनिकतम तकनीकी के साथ रोग-निदान एवं रोगोपचार किया जा रहा है। यह देश के लिए क्या गर्व की बात नहीं है कि विदेशी भी चिकित्सा के लिए यहां आ रहे हैं? अवश्य है, लेकिन …

आज़ाद भारत (इंडिया?) में लोगों की संपन्नता बढ़ी है। लोगों के लिए अब सुख-सुविधा के साधन प्राप्त करना संभव हो गया है। सड़कों पर अनेक जन कारें दौड़ा रहे हैं यह क्या कभी सोचा भी जाता था? सड़कें फ़ोर-लेन, सिक्स-लेन की बन रही हैं और फ़्लाइ-ओवरों का जाल बिछ रहा है। घर-घर में टीवी, फ़्रिज, धुलाई मशीन पहुंच रहे हैं। हर हाथ में अब स्मार्टफोन पहुंच रहा है। इस प्रकार न जाने कितनी उपलब्धियां गिनाई जा सकती हैं।

लेकिन सवाल है इन उपलब्धियों का लाभ किसको पूरा-पूरा या अधिकांशतः मिल रहा है? इस प्रश्न पर भी विचार होना चाहिए।

उपर्युक्त और तत्सदृश जिन अन्य उपलब्धियों को राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी एवं बुद्धिजीवी गिना सकते हैं उनमें से अधिकतर स्वाभाविक रूप से होने ही थे। उनको होने देना एक प्रकार की विवशता ही थी। जब दुनिया भर में कंप्यूटरों एवं डिजिटल तकनीकी का प्रयोग होने लगा तो हम उससे कैसे अछूते रह सकते थे? जब उस तकनीक के माध्यम से विश्व में संपर्क-साधन हो रहा हो और उसके बिना व्यावसायिक कार्यकलाप असंभव-से होते जा रहे हों तो उसका हमारी भी आवश्यकता बनना स्वाभाविक ही था। समाज के सबसे आम आदमी का भला होगा इस विचार से इनको अपनाया गया होगा यह मैं नहीं मानता। हो सकता है गरीब व्यक्ति तक लाभ पहुंच रहा हो। तब उसे मैं “बिल्ली के भाग से छींका टूटने” के समान मानता हूं।

मैं दावा नहीं करता कि पूरे देश की स्थिति का मुझे पूर्ण ज्ञान है। मेरा अनुभव अधिकांशतः उत्तर प्रदेश और उसके भीतर वाराणसी की दुर्व्यवस्था पर आधारित है जहां मैं रहता हूं। देश के अन्य शहरों से भी मैं कुछ हद तक वाकिफ़ हूं, क्योंकि मैं यदा-कदा देशाटन पर निकल पड़ता हूं। आजकल तो समाचार माध्यम तमाम तरह की जानकारी आम जन तक पहुंचा रहे हैं। इसलिए ध्यान देने वाले के लिए बहुत कुछ जानना आसान है।

इन उपलब्धियां का सीधा लाभ समाज के संपन्न वर्ग को हुआ है और उन्हीं के लिए बहुत कुछ हुआ है ऐसा मेरा मानना है। कार संस्कृति उन्हीं के लिए तो है। उन्हीं के लिए कार-उद्योग हैं। और जब कारें सड़क पर दौड़ें तो फ़ोर-लेन, सिक्स-लेन सड़कें और फ़्लाई-ओवर बनने ही हैं। वे आम जनों की समस्या सुलझाने के लिए नहीं बनी हैं। यदि आम जन का हित हमारे देश के शासकों, नीतिनिर्धारकों के जेहन में होता तो सड़क के किनारे फ़ुटपाथ बन रहे होते, और सड़क पर पैदल चलने वालों का अधिकार पहले होता, उसके बाद वाहनों का जैसा कि विकसित देशों में होता है। वाराणसी में जितनी सड़कें पिछले तीनएक दशकों में बनी हैं उनके किनारे फ़ुटपाथ हैं ही नहीं।

चंद्रयान, मंगल-अभियान जैसी योजनाओं का आम जन के लिए कोई महत्व नहीं। एक वैज्ञानिक होने के बावजूद मैं इनको प्राथमिकता में निम्न स्तर पर रखना चाहूंगा। इनसे कहीं अधिक महत्व की समस्याएं देश के सामने हैं। इसलिए आम जन के सापेक्ष इनको उपलब्धि मानता अनुचित होगा।

अवश्य ही अनाज उत्पादन में हुई प्रगति प्रशंसनीय कही जायेगी। अन्यथा दुनिया भर में हो रहे व्यावसायिक परिवर्तन हमारे देश में होने ही थे। परिवर्तन न करते तो क्या करते? कैसे विश्व के सामने टिकते? वैश्विक परिवर्तन का प्रभाव हमारे ऊपर पड़ना स्वाभाविक था।

मेरी निराशा

मेरी निराशा के मूल में उक्त उपलब्धियों की अर्थवत्ता कम या अधिक होना नहीं है। मैं स्वतंत्रता का आकलन उन बिन्दुओं के सापेक्ष करना चाहूंगा जिनको ध्यान में रखते हुए शासकीय व्यवस्था को उत्तरोत्तर बेहतर बनाने के संकल्प के साथ स्वतंत्रता अर्जित की गयी थी। तब न डिजिटल टेक्नॉलॉजी थी, न उसको लेकर देश का कोई संकल्प। जिस उम्मीद को लेकर चले थे वह थी उत्तरोत्तर बेहतर शासकीय व्यवस्था की स्थापना। क्या हमारी व्यवस्था में सुधार हुआ है? कुल मिलाकर इस प्रश्न का क्या जवाब होगा?

जवाब आप स्वयं समझ लीजिए। मैं वस्तुनिष्ठ कुछ तथ्यों को आपके समक्ष रख रहा हूं।

जनसंख्या वृद्धि

     मेरी दृष्टि में देश की विकटतम समस्या निरंतर हो रही जनसंख्या वृद्धि है। उम्रदराज देशवासियों को याद होगा 1960 के दशक का समय जब उत्साह एवं गंभीरता से जनसंख्या पर अंकुश लगाने और परिवार-नियोजन के प्रयास किये गये थे। उसके परिणाम कितने अच्छे रहे होते यदि वे प्रयास यथावत चलते रहते? दुर्भाग्य था 1970 के दशक के पूर्वार्ध में संजय गांधी का असंवैधानिक शक्ति के रूप में अवतरित होना। उस व्यक्ति ने ऐसा सख्त रवैया अपनाया कि कार्यक्रम पटरी से उतर गया और राजनैतिक भूचाल आया आपात्काल के रूप में। जनसंख्या के मुद्दे से राजनेताओं/नौकरशाही ने मुख मोड़ लिया। तब से आज तक जनसंख्या दोगुनी हो चुकी है, किंतु प्रयास बेमन से हो रहे हैं। आज तमिलनाडु एवं केरल जैसे राज्यों ने अवश्य प्रगति की है, लेकिन पहले से ही बहुत बड़ी आबादी वाले उत्तर प्रदेश, बिहार की आबादी पर कोई अंकुश नहीं लग रहा है।

हमारे शासक यह भूल जाते हैं कि हमारे संसाधन इतने नहीं कि बढ़ती आबादी को झेल सकें। हम मौजूदा नागरिकों को ही शिक्षित नहीं कर पा रहे, उनके स्वास्थ्य के लिए न पर्याप्त अस्पताल हैं और न डॉक्टर, कुपोषण अपनी जगह है, युवाओं के लिए रोजगार नहीं, रेल-बस सुविधा अपर्याप्त हैं, सबके लिए बिजली-पानी मुहैया नहीं करा सकते, इत्यादि। फिर भी जनसंख्या वृद्धि के प्रति लापरवाह हैं। यही हाल रहा तो अगले 10-15 सालों में हम चीन से आगे निकल जायेंगे। यही हमारी उपलब्धि होगी क्या?

इस विषय पर यह विचारणीय है कि जो संपन्न दंपती हैं उनके एक या अधिक से अधिक दो बच्चे हो रहे हैं। कुछ ने तो कोई बच्चा नहीं की नीति अपना ली है। लेकिन जो गरीब हैं, अशिक्षित हैं, उनके 4-4, 6-6 बच्चे हो रहे। गरीबी और बढ़ती आबादी में गहरा संबंध है। आगे आप खुद सोचिए क्या होगा।

अनुशासनहीनता

      यह देश का दुर्भाग्य है कि अधिकांश देशवासियों के लिए स्वतंत्रता के माने हैं अनुशासनहीनता, स्वच्छंदता, उच्छृंखलता, निरंकुशता, आदि। कायदे-कानूनों को न मानना देशवासियों का शगल बन चुका है। वाराणसी में रहते मैं यही कहूंगा। अहिष्णुता इसी निरंकुशता की देन है। अंध-आस्था इसमें घी का कार्य करती है। धार्मिक स्वतंत्रता के अर्थ लिए जाते हैं: “मेरी आस्था पहले, दूसरों का हित बाद में। आस्था के प्रदर्शन में कोई रुकावट न डाले चाहे उसकी जान चली जाये।” यह भावना यहां व्याप्त है। राजनीति अंकुश लगाने के बदले ऐसी आस्था को बढ़ावा देती है। संविधान के मार्गदर्शक सिद्धांतों मे कहा गया है सरकारें अंधविश्वास समाप्त करने और लोगों में वैज्ञानिक सोच बढ़ाने के प्रयास करेंगी। हुए हैं ऐसे प्रयास?

कायदे-कानूनों का क्या महत्व है यह तो इसी से स्पष्ट है सड़क पर किसी वहन से दुर्घटना हो जाये तो उसे ही नहीं, गुजरने वाले हर वाहन को आग के हवाले कर दिया जाता है। इसमें एक व्यक्ति की नहीं बल्कि पूरी भीड़ की भागीदारी होती है। कोई नहीं कहता कि यह क्या अनर्थ कर रहे हो। किसी पर चोरी का शक हो जाये तो उसे पीट-पीट्कर मारने पर किसी को आतमग्लानि नहीं होती है। ऐसी अनेकों वारदातें प्रकाश में आती हैं। आज तक प्रभावी शासकीय व्यवस्था विकसित नहीं हुई।

इसे भी क्या उपलब्धि कहेंगे?

शिक्षा

मेरी प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 5 तक, 1950-60 के बीच के काल में) अपने गांव (अब उत्तराखंड में) के पास की सरकारी पाठशाला में हुई थी। तीन शिक्षक थे और पाठशाला का पक्का भवन। बहुत सुविधाएं नहीं थीं, फ़िर भी उसी में मैंने और मेरे सहछात्रों ने बहुत कुछ सीखा। कृषि की बातें, मिट्टी के खिलौने बनाना, सुलेख लिखना। आज भी उस समय की पुस्तकों के कुछ चित्र स्मृति पटल पर आ जाते हैं। उस काल में मेरी ही तरह अनेक लोगों ने गांवों में शिक्षा पाई और मेरी तरह विश्वविद्यालय के शिक्षक बने। आज क्या स्थिति है सरकारी स्कूलों की? कहीं, भवन नहीं तो कहीं शिक्षक नहीं, शिक्षक हैं तो स्कूल से नदारद। छात्रों की स्थिति यह हो चुकी है कि पांचवीं पास करने के बाद भी पढ़-लिख नहीं सकते।

आज कोई भी सरकारी स्कूल में बच्चों को नहीं भेजना चाहता। निजी विद्यालयों – तथाकथित अंगरेजी माध्यम स्कूलों – की बाढ़ आ चुकी है। जो गरीब उनकी फ़ीस नहीं चुका सकता वही सरकारी स्कूलों में बच्चों को भेजता है।

जिस समय मैंने हाईस्कूल की परीक्षा दी (1962), मुझे एक दिन सुनने को मिला कि फलां परीक्षा केंद्र पर एक परीक्षार्थी नकल करते पकड़ा गया है। वह भी एक जमाना था नकल की एक भी घटना समाचार बनती थी। नकल करने से सभी डरते थे। आज क्या हाल हैं उत्तर प्रदेश, बिहार में? सामूहिक नकल का बोलबाला है। छात्र ही नहीं उनके अभिभावक, शिक्षक, पुलिस बल सब नकल करवाते देखे-सुने जाते हैं। सरकारें हैं कि नकल-माफ़ियाओं के सामने घुटने टेक देती हैं। जहां छात्र/छात्रा को विषय का ज्ञान तक न होने पर टॉपर बनाया जा सकता है (बिहार राज्य में), उस देश की आने वाली पीढ़ी कैसी होगी?

हमारी सरकारों ने इंडिया और भारत के विभाजन को और पुष्ट किया है। एक तरफ संपन्न लोगों की अंगरेजी-आधारित शिक्षा है तो दूसरी समाज के कमजोर तबके के लिए क्षेत्रीय भाषा की कुव्यवस्थित शिक्षा। किसी को शर्म आती है? हमारी शिक्षा ऐसे ही चलनी चाहिए? यही उपलब्धि है हमारी? सोचें!

जिस अंगरेजी से मुक्त होने की स्वतंत्रता सेनानियों ने सोचा था आज वही अंगरेजी अपरिहार्य बन चुकी है, जीवन का आधार बन चुकी है। विडंबना नहीं है?

चिकित्सा व्यवस्था

देश में डॉक्टरों की कमी है। सरकारी खर्चे पर छात्र डॉक्टर बनते हैं, फिर  विदेशों की राह पकड़ने की कोशिश करते हैं, अन्यथा निजी अस्पतालों के चिकित्सक बनते हैं। सरकारी नौकरी में कम जाते हैं और जो जाते हैं प्राइवेट प्रैक्टिस से धन कमाने में जुट जाते हैं। बहुत कम (शायद ही कोई) होंगे जो ईमानदारी से मरीजों का इलाज करते हों। बहुत से तो महीनों सरकारी अस्पताल से गायब रहते हैं। कहने को सरकारी अस्पतालों में बहुत कुछ है, लेकिन हकीकत एकदम निराशाप्रद! हालात क्या होंगे यह इसी दृष्टांत से समझा जा सकता है कि अभी दो-चार दिन पहले एक गरीब का बच्चा इसलिए चल बसा कि वह परिवार 20 रुपये की घूस नर्स को नहीं दे पाया। कुछ समय पहले एक घटना के बारे में सुना जिसमें एक बच्चे के पैर के घाव का इलाज वार्डब्वॉय ने किया बाद में उस बच्चे का पैर काटना पड़ा। ऐसे मामलों में जांच समिति बैठा दी जाती है मामलों को रफ़ा-दफ़ा करने के लिए। किसी कर्मचारी/डॉक्टर को दंडित किया जाता हो सुनने में नहीं आता है।

एक समय था जब सरकारी खर्चे पर सरकारी मुलाजिम का इलाज सरकारी अस्पताल में ही अनुमत था। तब सरकारी अस्पतालों की हालत कुछ बेहतर थी। जब से निजी अस्पतालों की सुविधा मुलाजिमों को मिलने लगी, स्थिति बदतर हो गयी।

डॉक्टरों ने धन कमाई का नायाब तरीका अपना लिया है। वे अनावश्यक जांच करवाते हैं और वह भी अपने “बंधे हुए” जांच-केंद्र पर। सरकारी अस्पतालों में व्यवस्था होने पर भी वहां भी यह होता है। जांच केंद्र से डॉक्टरों को रकम मिल जाती है। वाह क्या चरित्र है और हिपोक्रेटीज़ शपथ (Hippocratic oath) का सम्मान। स्थिति इतनी निराशाजनक पहले नहीं थी।

सड़क दुर्घटना एवं वाहन-चालन लाइसेंस

अपने देश में सड़क दुर्घटनाओं की संख्या कितनी भयावह है इसके आंकड़े अंतरजाल पर आसानी से मिल जायेंगे। यातायात के नियमों का पालन होता है कहीं? क्या पालन होगा जब नियम ही लोगों को मालूम नहीं हों। और मालूम भी हो तो उनके प्रति सम्मान किसके मन में है? नियमों का उल्लंघन अधिकांश लोग करते हैं। ट्वूह्वीलर वाहनों के लिए हेल्मेट का नियम है, कितने लोग उसे पहनते हैं? वाराणसी में तो अपवाद-स्वरूप ही पहनते हैं। पूछने पर न पहनने वाला कहता है “कोई देखता थोड़े है?” कारों में सीटबेल्ट का प्रावधान है, उसे भी चालक नहीं पहनते हैं, उत्तर वही। मतलब यह कि देखने वाला कोई न हो तो इनकी जरूरत नहीं।

यह हमारे लोगों का कायदे-कानूनों का सम्मान न करने की मानसिकता का द्योतक है।

आगे देखिए वाराणसी की सड़कों पर 12-14 वर्ष की आयु के बच्चे मोटर-वाहन चलाते दिख जायेंगे? उनके माता-पिता के लिए यह उपलब्धि होती है, वे इसमें अपनी प्रतिष्ठा देखते हैं, यह उनकी हैसियत का परिचायक होता है। नियमों को तोड़ना किसी की भी नजर में बुरा नहीं होता। ऐसी सोच के लिए जिम्मेदार कौन? कोई तो जिम्मेदार होगा?

हमारे यहां ड्राइविंग लाइसेंस आलू-प्याज की तरह खरीदे बेचे-खरीदे जाते हैं। अपने बनारस में तो मैंने ऐसा ही देखा। मेरा स्कूटर वाला लाइसेंस खत्म हो चुका है, अब जरूरत नहीं समझता। इसलिए आज की हालत क्या है मालूम नहीं। पर जब मैंने पहली बार लाइसेंस लिया तो न कोई लिखित और न कोई सड़क पर वाहन-चालन का परीक्षण। गये, लाइसेंस मांगा और मिल गया। कुछ पैसा मांगा मैंने दे दिया, गलत कहें या सही। तब मुझे लगा कि अंधा-लूला-बहरा, हर कोई लाइसेंस पा सकता है। दलाल को पैसा दीजिए साइसेंस आपके हाथ। मैं समझता हूं कि आज भी दलालों काम यथावत चल रहा होगा। क्या यही हमारी शासकीय व्यवस्था होनी चाहिए? फिर रोइये कि देश में सड़क हादसे बहुत होते हैं। अभी हाल में मेरे बेटे ने कनाडा में लाइसेंस लेना चाहा। वह प्रशिक्षण में एक-डेड़ लाख खर्च कर चुका था। वाहन चालन परीक्षण में असफल हो गया। गलती यह कि पार्किंग करने में सफेद रेखा को अगला पहिया छू गया। एक-दो ऐसी ही छोटी-मोटी गलतियां! बस इतना काफी था। यहां कोई सोच सकता है कि ऐसा भी कहीं होता है?

प्रशासनिक कुव्यवस्था

देश जब आज़ाद हुआ तो यह उम्मीद थी हम साफ-सुथरी एवं जनता के प्रति जवाबदेह शासकीय व्यवस्था विकसित करेंगे। किंतु ऐसा हुआ क्या? हमारी नौकरशाही जनता के सेवक रूप में खुद को नहीं देखती, बल्कि वह अपने को उनका मालिक समझती है। काम के प्रति लापरवाही, टालमटोल, घटिया काम और कदाचार को वह अपना अधिकार मानती है। आये दिन नये-नये घोटालों का खुलासा होता है, पर क्या मजाल कि किसी को जिम्मेदार ठहराया जाता हो, दंडित किया जाता हो। अधिक से अधिक कुछ दिनों के लिए किसी को निलंबित करके शासन जनता की आंख में धूल झोंकता है। याद रहे निलंबन सजा नहीं होता है। यह तो जांच-पड़ताल की प्रक्रिया का एक हिस्सा होता है। दंडित करने का काम तो न्यायालय करता है जहां मामला जाता ही नहीं और गया भी तो वर्षों तक कोई निर्णय नहीं होता है। उस बीच आरोपित कभी-कभी स्वर्ग (नरक?) भी सिधार जाता है।

सरकारी तंत्र में खूसखोरी आम बात है। मुझे ऐसे लोग मिलते है जो कहते है कि अधिकारियों को देने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसा नही था इसलिए वह सरकारी नौकरी नहीं पा सका। नियुक्ति-पत्र तक तभी मिलता है जब आप पैसा खर्च करते हैं। सालों पहले में एक बार ट्रेजरी कार्यालय गया। वहां शरीर से कमजोर उम्रदराज पेंशनरों को बीस-बीस रुपये पेंशन-बुक में रखकर देते हुए देखा था। आज वह रेट 200-250 रुपये होगा। पिकेट-ड्यूटी पर लगे पुलिस-मैन को प्रतिबंधित गाड़ी आगे बढ़ने देने के लिए पैसे लेते हुए देखा है। लोग बताते हैं कि जब वे स्वयं 100-50 हजार की घूस देकर नौकरी पाये हैं तो उसकी भरपाई उन्हें ऐसी वसूली से ही करनी होती है।

कितना साफ-सुथरा शासन-तंत्र विकसित किया है आज के शासकों ने? पहले घूस लेना चोरी-छिपे होता है और अब खुलकर होता है। घूस के भी रेट बने हैं। मुझे कभी एक बुजुर्ग एंजीनियर ने बताया कि बेईमानी तो पहले भी होती थी पर इतनी नहीं। वे बताते थे कि किसी कार्य के खर्चे का आकलन (एस्टिमेट) बढ़ा-चढ़कर पेश किया जाता था जैसे 100 की जगह 120 रुपये। तब 100 का कार्य हो जाता था और 20 रुपया जेबों में जाता था। कार्य की गुणवत्ता बनी रहती थी। आजकल एस्टिमेट तो 120 रुपये का बनेगा और खर्चा केवल 50, शेष 70 जेबों में। कार्य की गुणवत्ता कैसी होगी सोच सकते हैं। यह वाराणसी की सड़कें देखकर समझ में आ जयेगा जो पहली बरसात को झेल जायें तो समझिए कि चमत्कार हो गया।

विदेश यात्रा को जीते-जी स्वर्ग यात्रा के समान देखने वाले हमारी प्रशासनिक अधिकारी मौके खोजते हैं कि किस बहाने विदेश जाया जाये। कभी वे वहां की कानून-व्यवस्था का अध्ययन करते हैं तो कभी वहां के प्रशासन का अनुभव पाने, कभी खेल-आयोजन कैसे करते हैं इसे सीखने और कभी यातायत व्यवस्था की जानकारी लेने। कोई भी बहाना चलेगा, बस विदेश भ्रमण करने से मतलब। अब देखिए कल-परसों अपने प्रदेश के खेल मंत्री गये हैं ओलंपिक स्थल रियो द जनीरो कुश्ती खिलाड़ी नरसिंह यादव की हौसला आफ़जाई करने। विदेश भ्रमण का बहाना। सरकारी खर्चे पर इकनॉमी क्लास में तो वे जायेंगे नहीं, एक्जेक्टिव क्लास में जायेंगे। अपनी जेब से तो कुछ लगना नहीं। प्रदेश के खजाने की परवाह किसे? वाह!

इस प्रकार के अनेक उदाहरण आपको यत्रतत्र मिलेंगे। सब इसे जानते हैं, परंतु हर कोई आश्वस्त रहता है कि सुधार होना नहीं है।

यही उपलब्धि है न स्वतंत्र भारत की?

पुलिस तंत्र

स्वतंत्र भारत का शासकीय तंत्र सुधारने के प्रति आज के शासक कितने गंभीर हैं इसे समझना कठिन नहीं। वर्षों से प्रशासनिक सुधारों की बातें की जा रही है। लेकिन आज तक कुछ किया नहीं गया। पुलिस तंत्र में सुधार की बातें भी होती रही हैं, उसे भी टाला जा रहा है। उच्चतम न्यायालय इस बारे में बार-बार याद दिलाता आ रहा है, लेकिन शासक वर्ग को कोई रुचि नहीं। तो क्या देश के शासक अंगरेजों की भांति डंडे से जनता पर राज करना चाहते हैं? जी हां, वे सुधार नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि जहां जनता से उन्हें असुविधा लगे उन पर डंडा बरसाकर चुप करा दो। प्रशासनिक तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार रोकने के कोई कारगर उपाय आज तक नहीं हुए। नित नये कानून बनाकर जनता को मूर्ख बनाते आ रहे हैं वे। कानूनों का कार्यान्वयन प्रभावी न हो इसका भी वह साथ में इंतजाम करते हैं। जब किसी अधिकारी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगे तो न्यायिक प्रक्रिया की अनुमति वे टालते हैं, महीनों, वर्षों तक। त्वरित निर्णय का तो सवाल ही नहीं।

लचर न्यायिक व्यवस्था यथावत बनाये रखना भी शासकों का इरादा रहा है। दो रोज पूर्व ही उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से पूछा है कि पिछले छः माह से न्यायालयों की नियुक्ति क्यों टाली जा रही है। सुधारों को टालना सरकारों की नीयत रही है।

राजनेतओं की साख

क्षमा करें यदि मैं यह कहूं आज के किसी राजनेता के प्रति मेरे मन में सम्मान नहीं है। यह सोचने की स्वतंत्रता मुझे है। मैं किसी को अपशब्द नहीं कहूंगा, मिलने पर सामान्य शिष्टाचार भी निभाऊंगा। लेकिन मेरे मन में उनके प्रति सम्मान हो इसकी बाध्यता कहीं नहीं है।

स्वतंत्रता के आरंभिक काल के राजनेताओं की तुलना में आज के राजनेताओं को किस स्तर पर रखेंगे आप? आकलन करते समय क्या आप सोचेंगे कि वे कितने अनुशासित हैं, देशहित के प्रति समर्पित हैं, सत्तालोलुपता कितनी है, आपराधिक वृत्ति के नेताओं के प्रति उनका क्या रवैया है, इत्यादि। मेरे अपने उत्तर हैं “निराश करने वाले”।

स्वार्थलिप्सा और सत्तालोलुपता हमारे राजनेताओं के चरित्र का अपरिहार्य अंग बन चुका है। सत्ता हथियाने के लिए सभी हथकंडे सभी दलों के नेता अपनाते हैं। देश के ज्वलंत मुद्दों की अनदेखी करके सभी जातीयता, धार्मिकता, क्षेत्रियता की भावना उभाड़कर वोटबैंक बनाने में जुटे हुए हैं। है कोई राजनैतिक दल जो आपराधिक छबि वाले से परहेज करता हो,जो बाहुबल एवं धनबल का सहारा न लेता हो, जो तरह-तरह से मतदाताओं को न लुभाता हो (जैसे शराब पिलाना, पैसे की घूस देना)। जिन्हें आप साफ-सुथरे कहेंगे वे कैसे इस अनर्थ को सहते हैं।

राजनीति में सिद्धांतहीनता व्याप्त है। सुबह तक जो कम्युनल हो वह शाम तक सेक्युलर हो जाता है। कल तक जो समाजवादी हो वह आज दक्षिणपंथी बन जाता है। सिद्धांत बस एक है: जहां बेहतर अवसर दिखें वहां चल पड़ो। आप ऐसे सिद्धांतहीनों से क्या उम्मीद रखते हैं?

आज़ादी के 69 वर्ष बीतते-बीतते हमारे अधिकतर राजनैतिक दल किसी न किसी व्यक्ति अथवा परिवार की निजी व्यावसायिक संस्था बन चुके हैं। एक बेहद घटिया परंपरा इस क्षेत्र में स्थापित हो चुकी है। मुलायम सिंह, लालू यादव, मायावती, ममता बनर्जी, करुणानिधि आदि सब उदाहरण हैं। अपने समय में ये लोग बाप-दादों के बल पर नेता नहीं बने थे, पर अब अपने परिवारी जनों को को राजनेता बनाने की परंपरा स्थापित कर रहे हैं, पूरी बेशर्मी के साथ। कार्यकर्ताओं की हैसियत बंधुआ मजदूर की बन चुकी है। कभी कांग्रेस इस श्रेणी में नहीं थी लेकिन अब वह सोनिया-राहुल-प्रियंका की निजी संपदा बन गयी है। क्या मजाल कि दल के मुखिया से कोई असहमत हो। जो असहमत हो वह दल से निकाला जायेगा या निकल जायेगा। दलों में न आंतरिक लोकतंत्र है और न वैकल्पिक नेतृत्व पनपने देने की परंपरा। इसमें आपको विरोधाभास नहीं दिखता कि आंतरिक लोकतंत्र के विरोधी देश का लोकतंत्र चला रहे हैं?

राजनीति में उत्तरोत्तर सुधार के बदले गिरावट आ रही है यह मेरी धारणा है।

वर्ष 1950 के आगे-पीछे चीन को भारत की तुलना में पिछड़ा एवं गरीब माना जाता था। आज वह हमसे मीलों आगे निकल चुका है, हर क्षेत्र में। उसकी “प्रति व्यक्ति (औसत) आय” (per capita income) हमारी (लगभग $1600) तुलना में करीब पांच गुना अधिक है| स्वतंत्रता के समय एक रुपया एक डॉलर के लगभग था। आज वह घटते-घटते $0.015 के बराबर हो चुका है। इस प्रकार की घटनाएं क्यों हुईं? हमारी शासकीय व्यवस्था में कहीं खोट रहा होगा न?

अंततः

     मैं उन देशवासियों को बधाई देता हूं जिनको विगत उपलब्धियां संतोशप्रद, आशाजनक लगती हैं। मुझे उनसे ईर्ष्या है कि काश मुझे भी ऐसा ही लगा होता।

लेख अपेक्षा से अधिक लंबा हो चला है। कहने को बहुत कुछ है, किंतु कहीं न कहीं तो इसका अंत होना ही चाहिए। अतः पटाक्षेप।

आप पाठकों को पुन: बधाई, शुभेच्छाएं। शान्तिः सर्वत्र प्रसरेत् । – योगेन्द्र जोशी

भारतीय स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर

Untitled

इस दिवस पर देशवासियों के प्रति शुभकामना व्यक्त करने की परंपरा का निर्वाह करना मेरा भी कर्तव्य बनता है । तदनुरूप उक्त संदेश सभी को स्वीकार्य होवे । किंतु इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त करने और देश के भविष्य के प्रति आशान्वित होने का कोई विश्वसनीय आधार मुझे कहीं नहीं दिखता । देश की जो निराशाप्रद स्थिति मुझे वर्षों से दिखती आ रही है, उसकी ओर मेरा ध्यान इस मौके पर कुछ अधिक ही चला जाता है । मुझे लगता है कि आंख मूंदकर खुश होने के बजाय देशवासियों को तनिक गंभीरता से अपनी राजनैतिक उपलब्धियों पर विचार करना चाहिए । उन्हें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या साड़ेछः दशक पूर्व हासिल की गयी स्वाधीनता का उपयोग हम एक स्वस्थ एवं जनहित पर केंद्रित लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था स्थापित करने में कर पाये ? इस अवसर पर कई प्रश्न मेरे मन में उठते हैं जिनके उत्तर मुझे नकारात्मक ही मिलते हैं । मेरी बातें सुन मुझ पर पूर्वाग्रह-ग्रस्त होने का आरोप लग सकता है । क्या मैं वाकई गलत हूं; मेरी बातों में कोई सार नहीं; मैं निराशावादी हूं ?

भारतीय संविधान कहता है:

WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved constitute India into a SOVEREIGN  SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens

JUSTICE …

LIBERTY …

EQUALITY …

FRATERNITY …

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this 26th day of November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT, AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION.

(SECULAR ‘kCn 1976 ds 42osa la’kks/ku esa tksM+k x;k A)

मैं इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाबत कुछ प्रश्न उठाता हूं । हमारी तत्संबंधित उपलब्धियां क्या हैं ? परमाणु परीक्षण, मिसाइल तकनीकी, उपग्रह प्रक्षेपण, और चंद्रयान अभियान या अन्य विकास कार्यों को मैं लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बेहतरी के संकेतक नहीं मानता । ऐसे विकास कार्य तो राजशाही, तानाशाही, लोकशाही अथवा किसी भी अन्य शासकीय तंत्र में होते ही रहते हैं । हर एक तंत्र में शासक अपने को मजबूत करने में लगा ही रहता है । चीन इसका उदाहरण है जो इन सब मामलों में हमसे कहीं आगे है । मेरे सवाल सीधे-सीधे अपने लोकतंत्र से जुड़े हैं कि क्या उसकी गुणवत्ता उत्तरोत्तर बढ़ी है; क्या वह आम जन की आकांक्षाओं के अनुरूप है, आदि । चलिए एक-एक सवाल पर विचार करें:

कहां है लोकतंत्र ? मूल भावना का अभाव

हमने बहुदलीय शासन पद्धति स्वीकारी है, जिसके अनुसार व्यवस्था चलाने की जिम्मेदारी राजनैतिक दलों को प्राप्त हुई है । उनसे अपेक्षा रही है कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृड़ ही नहीं करेंगे, बल्कि उसकी मर्यादाओं का पूर्णतः सम्मान करेंगे । लेकिन जिन दलों में आंतरिक लोकतंत्र नहीं उन्होंने ही लोकतांत्रिक प्रणाली का दायित्व संभाल रखा है । क्या इसमें विरोधाभास नहीं है ? आज के प्रमुख दलों में कितने हैं जो शपथ लेकर कह सकें कि उनके यहां आंतरिक लोकतंत्र है ? प्रायः हरएक दल किसी न किसी व्यक्ति अथवा उसके परिवार की निजी राजनैतिक जागीर बना हुआ है और उसके कार्यकर्ता तोते की भांति मुखिया के कथनों को उच्चारित करना अपना धर्म मानते हैं ।

कहां है लोकतंत्र ? सत्ता हथियाने की होड़

सत्ता हथियाना ही सभी दलों का एकमेव लक्ष बन चुका है । सत्ता क्यों चाहिए ? देश का स्वरूप आने वाले 20-30 सालों में क्या होगा इसके चिंतन से प्रेरित होकर सत्ता नहीं पाना चाहते । देश की कोई भावी तस्वीर उनके मन में नहीं उभरती है, बल्कि उनकी नजर पांचसाला सत्ता पर रहती है कि कैसे वे भरपूर सत्तासुख भोगें और और सत्ता से तमाम सही-गलत लाभ बटोर सकें । यही वजह है कि उनके पास देश के लिए कोई दीर्घकालिक नीतियां नहीं हैं, और न ही वे किसी सिद्धांत पर टिके रहते हैं । चुनाव में जिसका विरोध करें उसी से हाथ मिलाकर सत्ता पर बैठने से कोई नहीं हिचकता है । हर प्रकार का समझौता, हर प्रकार का गठबंधन उन्हें स्वीकार्य है, बशर्ते कि वह उनके निजी हित में हो, देशहित दरकिनार करते हुए ।

कहां है लोकतंत्र ? क्षेत्रीय दलों का उदय

जोड़तोड़ से सत्ता में भागीदारी पाने, और अपनी शर्तों पर दूसरे दलों से मोलभाव करने की क्षमता बटोरनेे के लिए क्षेत्रीय दलों का तेजी से उदय हुआ है । स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक ऐसे दलों का जन्म नहीं  हुआ था ऐसा मैं समझता हूं । कदाचित डीएमके पहला ऐसा दल था जो क्षेत्रीय दल के रूप में हिंदीविरोध के साथ जन्मा था । अन्य दल बाद में ही उभरे जब नेताओं को लगने लगा कि इस रास्ते से उनकी कीमत बढ़ जाएगी । इन दलों ने केंद्र की सत्ता को कमजोर ही किया । हाल के समय में गठबंधन-धर्म जैसा शब्द गढ़ा गया और राष्ट्रधर्म को दरकिनार कर इस धर्म को अहमियत मिलने लगी । इन दलों ने कुछ भी करने की छूट की शर्त पर गठबंधन बनाए रखने की घातक परंपरा को जन्म दिया है । क्या यही स्वस्थ लोकतंत्र है ?

अहंकारग्रस्त सांसद-विधायक

जनता के द्वारा बतौर प्रतिनिधि के चुन लिए जाने के बाद हमारे राजनेता स्वयं को पांच-साला राजा समझने लगते हैं । विनम्रता तो उनमें मुश्किल से ही मिलेगी । वे किसी भी विषय पर जनता की राय जानने के लिए क्षेत्र में नहीं जाते हैं, बल्कि दल एवं मुखिया की बात ही उनके लिए माने रखती है । जब वे अपने हितों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाते हैं और जनता विरोध करती है तो अहंकार के साथ कह देते हैं कि हम चुनकर आए हैं । हिम्मत हो तो आप भी चुनकर आओ हमें रोक लो । मतलब यह कि हम अब राजा हैं और अपनी मरजी से चलेंगे । नेताओं की ऐसी सोच कभी भी लोकतंत्र के अनुरूप नहीं कही जा सकती है । हिम्मत तो उन्हें होनी चाहिए कि अपने मतदाताओं के बीच जाकर उनके विचार जानें । ऐसा वे कभी नहीं करते । कहना ही पड़ेगा कि मेरे मन में उनके प्रति सम्मान नहीं उपज पाता है ।

सेक्यूलरिज्म का ढिंढोरा

सेक्यूलरिज्म, जिसे हिंदी में धर्मनिरपेक्षता कहा गया है, के अर्थ क्या होते हैं यह शायद ही किसी राजनेता को मालूम हो । यह शब्द वे तोते की तरह बिना सोचे-समझे कही भी बोल देते हैं । उन्हें मालूम होना चाहिए कि यह शब्द यूरोपीय देशों में गढ़ा गया जहां शासकीय व्यवस्था को ईसाई धर्म के प्रभाव के मुक्त करने का अभियान चला था । फलतः वहां इस विचारधारा ने जन्म लिया कि लोकतंत्र में धर्म का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं, और शासन के नियम-कानून में देश और समाज के समग्र हित के अनुसार बनने चाहिए न कि किसी धर्म के मतानुसार । जब नेहरू-आंबेडकर ने हिन्दू भावना के विरुद्ध हिन्दू कोड बिल पारित करवाया तो उनकी सोच यही थी कि कालांतर मे कॉमन सिवल कोड देश में स्थापित किया जाऐगा । लेकिन ऐसा हो न सका और अब संविधान के दिशानिर्देशक सिद्धांतों के होते हुए भी यह कभी होगा नहीं । हमने ‘सेक्युलर’ शब्द का आयात का तो कर लिया, किंतु उसकी भावना अपनाई नहीं । वस्तुत यह देश मल्टीरिलीजस या बहुधर्मी है न कि धर्मनिरपेक्ष, क्योंकि हमारे कुछ कानून धर्मसापेक्ष ही हैं । फिर कैसे हम स्वयं को सेक्युलर कहें । यह आत्मप्रवंचना है ।

अल्पसंख्यकवाद

इस देश में सेक्युलर का व्यावहारिक अर्थ अल्पसंख्यक हितों की बात करना हो चुका है । बहुसंख्यकों की चर्चा करना सेक्युलर न होना समझा जाता है । और दिलचस्प बात तो यह है कि जब भी अल्पसंख्यक शब्द राजनेताओं के मुख से निकलता है तो उनका इशारा प्रायः मुसलिम समुदाय से ही होता है । देश में सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी भी अल्पसंख्यक हैं, जिनमें से तो कुछ सही अर्थ में अल्पसंख्यक हैं । परंतु उनकी बात शायद ही कभी कोई राजनेता करता है । दरअसल सबसे कमजोर आर्थिक एवं शैक्षिक दशा में होने के बावजूद मुसलिम समुदाय चुनावी नजर से अत्यधिक अहम समुदाय है, क्योंकि वह चुनाव परिणामों में उलटफेर कर सकता है । उनकी इसी ताकत को देखते हुए हमारे कई राजनैतिक दलों की नीति उनके हितों की जबरन बातें करना रही है । उनको अपने पक्ष में करने के लिए वे हर चारा उनके सामने डालते आ रहे हैं, और उन्हें वोट बैंक के रूप में देखते हैं । उनके वास्तविक हितों में शायद ही किसी की दिलचस्पी होगी । मुझे तो पूरा संदेह है कि ये लोग कभी नहीं चाहेंगे कि वे कभी ऊपर उठें और प्रलोभनों से मुक्त हो पाएं । इस प्रकार का घटिया अल्पसंख्यकवाद मेरी नजर में लोकतंत्र के विरुद्ध है ।

नेतागण – अनुकरणीय दृष्टांतों का अभाव

हमारे राजनेताओं का अहंकार तब खुलकर सामने आता है जब वे कानूनों का उल्लंघन करने से नहीं हिचकते हैं । वे अदालतों के आदेशों/निर्देशों की अवहेलना करने से भी नहीं चूकते है । वे भले ही मुख से न बोलें, किंतु उनका इशारा इस ओर सदैव रहता है कि उन्हें कानूनों के ऊपर होने का ‘विशेषाधिकार’ होना चाहिए, क्योंकि वे राजा से कम नहीं हैं । इस प्रकार का रवैया स्वतंत्र भारत के आरंभिक दिनों में देखने को नहीं मिलता था । तब के नेता नैतिक स्तर पर कहीं अधिक ऊपर थे । कहने का अर्थ है कि इस क्षेत्र में भी गिरावट ही आई है । होना तो यह चाहिए था कि नेता जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण पेश करें, वे अपने संयत व्यवहार से उन्हें प्रेरित करें । यही सब बातें हैं जिससे जनता में उनके प्रति सम्मानभाव घटता जा रहा है, जो लोकतंत्र के हित में नहीं हैं । क्या वे इन बातों को समझ पाएंगे ।

बढ़ता भ्रष्टाचार और लचर न्याय प्रणाली

कोई यह दावा कर सकता है कि समय बीतने के साथ देश में भ्रष्टाचार घटा है ? जो इसका उत्तर हां में दें मैं उनसे माफी ही मांग सकता हूं । शायद ही कोई सरकारी विभाग हो जहां उल्टे-सीधे काम न होते हों, लेकिन दंडित कोई नहीं होता । यह राजनेताओं समेत सभी मानते हैं कि भ्रष्टाचार बढ़ा है, लेकिन तमाशा देखिए कि भ्रष्टाचारी कोई सिद्ध नहीं होता है, गोया कि यह भी कोई दैवी चमत्कार हो । दरअसल हमारी न्यायप्रणाली है ही ऐसी कि आरोपी को बचाने के लिए उसने तमाम रास्ते दिए हैं । रसूखदार व्यक्ति किसी न किसी बहाने मामले को सालों लटका लेता है और दंड से बच जाता है । क्या यही अपने लोकतंत्र से अपेक्षित था ?

लोकपाल, आरटीआई, एवं आपराधिक राजनीति

हमारे देश के मौजूदा राजनेता भ्रष्टाचार के प्रति कितने संजीदा हैं यह उनके लोकपाल के मामले को टालने एवं आरटीआई से अपने दलों को मुक्त रखने के इरादे से स्पष्ट है । इसी प्रकार वे राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध भी कारगर उपाय नहीं अपनाना चाहते हैं । जिन आपराधिक छवि के नेताओं के बल पर वे सत्ता हासिल करते आ रहे हैं आज उन्हें वे बचाने की जुगत में लगे हैं । मेरा विश्वास है कि शुरुवाती दौर में राजनीति इतनी अस्वच्छ नहीं थी । समय के साथ आपराधिक छवि के लागों की पैठ जो शुरू हुई तो आज संसद तथा विधानसभाओं में उनका बोलबाला दिखाई देता है । जब ऐसे नेता और उनको बचाने वाले नेता संसद में तो अपराधमुक्त राजनीति कहां से आएगी ? इसे देश का दुर्भाग्य न कहें तो क्या कहें ?

चुनावी एवं प्रशासनिक सुधार

मुझे अब विश्वास हो चला है कि हमारे नेता ऐसे कोई उपाय नहीं करना चाहते हैं जो लोकतंत्र को मजबूत करे पर उनकी मनमर्जी पर अंकुश लगाए । मैं अब मानता हूं कि उनमे परस्पर यह मुक सहमति बनी है कि ऐसे किसी भी कानून का हममें कोई न कोई किसी न किसी बहाने विरोध करता रहेगा ताकि वह कानून पास न हो सके । ऊंची-ऊंची बातें होती रहती हैं लेकिन ठोस कुछ किसी को नहीं करना है । यही वजह है कि चुनाव, न्याय-व्यवस्था, सामान्य प्रशासन, तथा पुलिस तंत्र में सुधार आज तक नहीं हुए हैं और न आगे होने हैं । यही हमारी उपलब्धि है क्या ?

इंडिया बनाम भारत

स्वतंत्र हिंतुस्तान की सबसे त्रासद और दुःखद घटना है इस देश का इंडिया एवं भारत में बंटवारा । ये देश की चिंताजनक प्रगति है कि यहां दो समांतर व्यवस्थाएं साथ-साथ चल रही हैं । एक व्यवस्था है देश के समर्थ एवं संपन्न वर्ग के लिए और दूसरी है बचेखुचे कमजोर लोगों के लिए । चाहे शिक्षा हो, चिकित्सा हो, यातायात हो या कुछ और, दोनों के लिए असमान व्यवस्था कायम हुई हैं । तर्क दिया जाता है कि लोकतंत्र में तो लोगों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार सर्वोत्तम पाने का अधिकार है । संविधान में जिस EQUALITY की बात कही गई हैं उसके निहितार्थ क्या हैं यह मैं समझ नहीं पाता ।

स्वतंत्रता यानी अनुशासनहीनता

अंत में । क्या ऐसी स्वतंत्रता स्वीकार्य हो सकती है जिसमें व्यक्तियों पर किसी प्रकार का प्रतिबंध न हो, जहां मर्यादाएं न हों ? लेकिन बहुत से लोगों के लिए स्वतंत्रता के अर्थ हैं अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता, जो मर्जी वह करने का अधिकार, कानूनों का उल्लंघन, आदि । हमारा लोकतंत्र लोगों को दायित्यों का एहसास दिलाने का कार्य नहीं कर सका है । लोगों को कार्य-संस्कृति, दूसरों के प्रति संवेदना, देश-समाज के प्रति कर्तव्य का पाठ कोई नहीं पड़ा सका है । सभी को खुली छूट जैसे मिली हो ।

ऐसे ही अनेकों प्रश्न उठते हैं । ये सब बातें व्यापक बहस के विषय के हैं, किंतु इनसे इतना तो स्पष्ट होता ही है कि यह देश सही दिशा में नहीं जा रहा है ।

मेरी दृष्टि में चंद्रमा पर यान उतार देना उतना महत्व नहीं रखता जितना सड़क पर कूड़ा बीनने वाले को उस दशा से मुक्त करना । – योगेन्द्र जोशी

स्वाधीनता दिवस, 15 अगस्त, बधाई !! लेकिन …

आज 15 अगस्त है, स्वाधीन राष्ट्र इंडिया दैट इज भारत का 64वां स्वतंत्रता दिवस ।

इस अवसर पर देशवासियों को मेरी ओर से बहुशः बधाइयां और ढेर सारी शुभकामनाएं ।

– योगेन्द्र जोशी

बधाई एवं मंगलकामनाएं प्रेषित करना मेरे लिए एक औपचारिकता है ।

ऐसे अवसरों पर शुभ-शुभ बोलना चाहिए, बुजुर्गों की यही सलाह रही है । हकीकत कुछ भी हो, मुंह के शब्द शुभ ही होने चाहिए । लेकिन …

लेकिन एक सवाल पिछले कुछ सालों से मेरे मन में हर ऐसे मौके पर उठने लगा है । इन ‘दिवसों’ की क्या वाकई कोई अहमियत है ? क्या मकसद पूरा होता है इन दिवसों को मनाने से ? 15 अगस्त के संदर्भ में तो यह सवाल और भी अहम हो जाता है । अपने देशवासियों को यह बताना क्यों जरूरी है कि यह देश कभी फिरंगियों का गुलाम रहा ? सच पूछें तो उससे पहले भी गुलाम रहता आया है । और कई मानों में तो आज भी गुलाम है ! इतिहास के छात्र के लिए तो यह सब जानना मजबूरी है; उसे तो वस्तुनिष्ठ तथ्यों को जानना ही होता है, चाहे वे सुखद हों अथवा पीड़ाप्रद । लेकिन स्वतंत्रता दिवस मनाकर किसी को भी इस तथ्य की याद दिलाना जरूरी क्यों है ?

आप कहेंगे कि इस दिन ‘जश्न’ मनाकर हम देशवासियों को प्रेरित करते हैं कि हम अपने कर्तव्यों का निर्वाह करें, देश पर गर्व करें, उसे प्रगतिपथ पर ले चलें, कुछ ऐसा न कर बैठें कि वापस उस बीती गुलामी के हालतों पर वापस पहुंच जाएं, इत्यादि । यह सब कहना और सुनना आसान है और तर्कसम्मत भी लगता है । लेकिन क्या वाकई यह मकसद पूरा हो पाया है कभी ? क्या यह मकसद आगे भी पूरा हो पाएगा कभी ? क्या इस दिन जो कुछ कहा जाता है वह सब विशुद्ध औपचारिकता से अधिक कुछ और भी होता है ?

मंच से आदर्श भरी बातें कह देना वक्ताओं का और उसे सुन लेना श्रोताओं का फर्ज होता है । कई हिंदू परिवारों में श्रीसत्यनारायण कराई जाती है । न बांचने वाला एकाग्रचित्त एवं गंभीर होता है और न ही वे समस्त लोग जो कथा सुनने का स्वांग भर रहे होते हैं । कुछ वैसा ही इस दिवस पर भी होते हुए दिखता है मुझे । दोनों के कर्तव्य क्रमशः मंच के ऊपर और नीचे आंरभ होते हैं और वहीं समाप्त हो जाते हैं । उसके बाद अन्य 363 (कभी-कभी 364) दिनों की भांति यह दिन भी गुजर जाता है । ध्वजारोहण देख लिया, राष्ट्रगान गा-सुन लिया, ‘माननीय’ वक्ता की सतही देशभक्ति के उद्गार सुन लिये, और फिर देश को भूल अपने-अपने हितों को येनकेन प्रकारेण साधने को लौट पड़े । दूसरे दिन अपने-अपने कार्यक्षेत्र में पहुंचने पर न वक्ता को यह स्मरण रह जाता है और न श्रोता को ही कि बीते दिवस उसने देश के नाम पर कितनी कसमें खिलाईं या खाईं । अगर याद रहता होता तो इतनी दुर्व्यवस्था चारों ओर देखने को न मिलती ।

दावा किया जाता है कि स्वतंत्रता के बाद देश ने पर्याप्त तेजी से प्रगति की है । आज कहा जा सकता है कि देशवासियों के घरों में टेलीविजन, फ्रिज पहुंच चुके हैं, बहुतों के घरों में कारें आ चुकी हैं, अनेक हाथों में मोबाइल फोन पहुंच चुके हैं, इत्यादि । इन सब का होना बड़ी उपलब्धि नहीं है । यह सब तो देश पराधीन रहता तो भी होता ही । ऐसी प्रगति के पीछे व्यावसायिक संस्थाओं का हाथ होता है । अपने कारोबार को विश्व भर में फैलाना और जन-जन के हाथ में उनको पहुंचाकर मुनाफा कमाना उनका उद्येश्य होता है । देश की पराधीनता से उसका सीधा संबंध नहीं है । अंग्रेजों के जमाने में कुछ भी प्रगति नहीं हो रही थी, यह कहना गलत है । रेलें बिछाना, सड़कें बनाना, स्कूल-कालेज खोलना, अस्पताल बनाना आदि कार्य तो तब भी हो रहे थे । यह ठीक है कि हमने उस को कुछ गति दी । यह कहना कि देश ने परमाणु विस्फोट करके दुनिया को अपनी ताकत दिखा दी है, हम अब चंद्रमा पर पहुंचने को तैयार हैं, देश 8-9 प्रतिशत की आर्थिक प्रगति कर रहा है, इत्यादि, भी बहुत माने नहीं रखते हैं, क्योंकि स्वाधीनता संघर्ष जिन उद्येश्यों को लेकर चला था वह सब यह नहीं । यह सब अवश्य तब अधिक सार्थक होता यदि हम मूल उद्येश्यों से भटक न गये होते ।

मूल उद्येश्य ? क्या थे वे ? मैं अपनी समझ को स्पष्ट करता हूं । कदाचित् आप सहमत न हों । सहमत न होने में ही भलाई है, तब किसी प्रकार की पीड़ा मन में नहीं उपजती है । लेकिन मेरे लिए इन विचारों से मुक्त रह पाना संभव नहीं, क्योंकि वे स्वतःस्फूर्त हैं, न चाहते हुए भी मन में न जाने कहां से प्रवेश कर जाते हैं । हां तो उद्येश्य ? देश में गरीब-अमीर के बीच की खाई को पाटना, हर नागरिक को साक्षर ही नहीं अपितु सुशिक्षित बनाना, उन्हें समाज एवं देश प्रति कर्तव्यनिष्ठ बनाना, अंधविश्वासों में जी रहे लोगों में तार्किक/वैज्ञानिक चिंतन-सामर्थ्य जगाना, जनता को स्वच्छता एवं प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जागरूक बनाना, समाज में व्याप्त जातीय-धार्मिक-क्षेत्रीय भेदभाव मिटाना, स्वस्थ-सुदृण-त्वरित न्यायिक व्यवस्था स्थापित करना, शासन-प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त एवं भ्रष्टाचार-विमुक्त बनाना, इत्यादि, वे सभी बातें जिनकी चर्चा होने पर आम नागरिक का सिर आत्मविश्वास के साथ ऊपर उठ सके, न कि वह बचाव में बगलें झांकने लगे ।

लेकिन यह सब हो पाया है ? क्या हमारा लोकतंत्र सही दिशा में अग्रसर हो सका है ? मुझे उत्तर नहीं में ही मिलता है । काश, मैं भी उन भाग्यशालियों में होता जो देश की प्रगति के भ्रम में बखूबी जी रहे हैं !

हम ‘स्वतंत्रता दिवस’ मनाते जरूर हैं, किंतु इसके अर्थ कभी के भूल चुके हैं । आज देश के जो हालात हैं उनसे मैं यही निष्कर्ष निकाल पाया हूं कि अब स्वतंत्रता के अर्थ हैं मर्यादाओं से विमुक्त स्वेच्छाचारिता, जिसमें
अनुशासनहीनता है,
निरंकुशता है,
उच्छृंखलता है,
स्वार्थपूर्ति की खुली छूट है,
कायदे-कानूनों की अनदेखी है
और कार्यसंस्कृति का अभाव है ।
वस्तुतः इसके आगे भी ऐसा ही बहुत कुछ और, जिसे आप सोच सकते हैं

तीन रोज पहले मुझे अपने प्रातःकालीन अखबार में एक बुजुर्ग के उद्गार पढ़ने को मिले थे । शब्द थेः
“… आज के हालात का पता होता तो शायद बापू भी देश की आजादी के पक्ष में न होते । …”
(स्वाधीनता संघर्ष के साक्षी रह चुके वयोवृद्ध श्री सूबेदार मिश्र, अमर उजाला, 12 अगस्त 2010, पृष्ठ 5)

मुझे बचपन में अपनी स्वर्गीया मां से सुनीं कुछ बातें अब याद आती हैं । देश स्वतंत्र हो चुका है इसे कहने के साथ-साथ वह विक्टोरिया-राज की प्रशंसा करना भी नहीं भूलती थीं । इस विषय पर अतिरिक्त बातें अगली पोस्ट में लिखूंगा ।

चलते-चलते यह भी:
“The value of a man should be seen in what he gives and not in what he receives.”
– Albert Einstein (Ideas and Opinions, Rupa, 1992, p 62)
(व्यक्ति क्या देता है इससे उसकी महत्ता आंकी जानी चाहिए न कि वह क्या पाता है इससे । – आल्बर्त आइन्स्ताइन)

और एक तस्वीर भी:

– योगेन्द्र जोशी

राष्ट्रीय पर्व पंद्रह अगस्त – रस्मअदायगी तक सिमटा अहमियत खोता हुआ एक दिवस (2)

आज (15 अगस्त) की पहली पोस्ट के आगे ।

मेरे मतानुसार जिन मुद्दों को देश में नजरअंदाज किया जा रहा है उनमें से कुछ ये हैं:

1. जनसंख्या – मेरी नजर में बेतहासा बढ़ रही जनसंख्या देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है । हमारे समस्त संसाधन, प्रशासनिक व्यवस्था, भोजन-स्वास्थ-शिक्षा के इंतजामात, विकास कार्यों के परिणाम मौजूदा जनसंख्या के लिए ही अपर्याप्त हैं । लेकिन देश का दुर्भाग्य देखिये कि कोई राजनीतिक दल इसके बारे में एक शब्द तक नहीं बोलता है । हर किसी को वोट बैंक की चिंता है और हर कोई इसकी चर्चा करना सत्ता के रास्ते का अड़ंगा मानता है । हर किसी को उस दिन की प्रतीक्षा है, जब आधा-आधा दर्जन बच्चे पैदा करने वालों के मस्तिष्क में नियोजित परिवार की सद्बुद्धि का उदय हो । हम यह भूल करते आ रहे हैं कि जनसंख्या किसी दल-विशेष का मुद्दा नहीं है । यह देश का मुद्दा है और सभी दलों को मिलकर एक सुविचारित नीति अपनानी चाहिए । पर ऐसी सन्मति उन्हें आये तब न ?

2. भ्रष्टाचार – भ्रष्टाचार अब इस देश के सामाजिक जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है । देश के इस ‘संक्रामक सामाजिक रोग’ के सैद्धांतिक विरोध में बड़ी-बड़ी बातें राष्ट्रपति से लेकर अदना कार्यालय चपरासी तक करता है, किंतु उससे मुक्ति हेतु कोई भी एक कदम नहीं उठाना चाहता है । मैंने अब तक के जीवन में कई सरकारें देखी हैं, पर कभी किसी सरकार को भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कृतसंकल्प नहीं पाया । आज कोई सरकारी महकमा नहीं जहां अवसरों के होते हुए भी भ्रष्टाचार न हो । जहां अवसर ही न हों वहां की ईमानदारी का दृष्टांत देना माने नहीं रखता है । कहीं भ्रष्टाचार खुलेआम जनता की नजर के सामने है, तो कहीं परदे के पीछे । ईश्वर सर्वव्यापी हो या न हो, भ्रष्टाचार तो सर्वत्र है, प्रायः सबके हृदय में बस चुका है । चाहे पुलिस भरती हो या सैनिक भरती, चाहे ‘बीपीएल’ कार्ड हो या ‘नरेगा’ के तहत काम, चाहे सरकारी संस्थाओं को खाद्य आपूर्ति का मामला हो या अस्पतालों में दवा खरीद का, कोई जगह बची नहीं है । देश के शीर्षस्थ पदों पर बैठे सभी को सब कुछ पता है, पर उन्हें कुछ करना नहीं होता । स्थिति तो यह है कि यदि कोई कभी भूले-भटके पकड़ में आ जाता है तो उसको सजा दिलाने वालों से कहीं अधिक बचाने वाले बीच में आ पड़ते हैं – राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी, कर्मचारी संगठन, वकालत पेशे के नामी-गिरामी नाम, आदि । तब फिर उम्मीद क्या की जाये ?

3. शिक्षा – एक शिक्षाविद् के नाते मैं महसूस करता आ रहा हूं कि हालात चिंताजनक हैं । सबसे दुःखद पहलू यह है कि सरकारों ने दोहरी शिक्षा नीति को बढ़ावा दिया है । ‘एरिया स्कूलों’ की अवधारणा कई विकसित देशों में प्रचलित है, किंतु अपने देश में लोकतांत्रिक स्वतंत्रता के नाम पर लोगों को पूरी छूट है कि वे अपने बच्चों को जहां चाहें पढ़ाएं । फलतः एक तरफ व्यावसायिक लाभ कमाने में लिप्त निजी ‘पब्लिक स्कूल’ समाज के अपेक्षया संपन्न वर्ग को स्तरीय शिक्षा दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ वे सरकारी स्कूल हैं जहां की व्यवस्था घ्वस्तप्राय है, जहां न समुचित संसाधन हैं, न पर्याप्त संख्या में अध्यापक और कार्य-संस्कृति का तो नितांत अभाव है । प्रशासन के जिन लोगों पर उनकी व्ववस्था का दायित्व है उनके अपने स्वयं के बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं, कतिपय अपवादों को छोड़कर । लिहाजा वहां के हालात पर उनको कोई चिंता नहीं रहती है । आज हालात यह हैं कि देश भर के इन सरकारी स्कूलों के करीब एक-तिहाई बच्चे ‘प्राइमरी’ पास करने के बाद भी अपना नाम लिख-पढ़ नहीं सकते हैं । (‘प्रथम’ नाम की गैरसरकारी संस्था के एक सर्वेक्षण से कभी मैंने यह जाना ।) ऐसे बच्चों को साक्षर कहा जा सकता है क्या ? हां, यदि आप स्वयं को भ्रम में रखना पसंद करें तो, अन्यथा वे निरक्षर ही कहे जायेंगे । इस देश ने झूठे आंकड़ों से संतोष पाने की आदत पाल ली है । कहां से आयेगी साक्षरता देश में ?

4. स्वास्थ्य – शिक्षा की तरह सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का हाल भी कष्टप्रद है । संपन्न वर्ग के लिए निजी अस्पताल हैं, किंतु गरीबों के लिए तो सरकारी ही हैं, जहां सुविधाओं का अभाव आम बात है । कभी डाक्टर नहीं तो कभी नर्स नहीं । सरकार दावा करती है मुफ्त दवा देने की, पर वहां दवा होगी नहीं, यदि हो तो ‘इस्पायर्ड’ ! जांच के नाम पर मशीनें काम नहीं कर रही हैं की घोषणा । पैसा देकर बाहर जांच कराइये, जहां से डाक्टरों-कर्मियों को कमिशन मिलता है । देश में डाक्टरों का अभाव है, और जो हैं निजी प्रैक्टिस से धन कमाने को अधिक तवज्जू देते हैं । सरकारी नौकरी कर तो लेंगे लेकिन प्राइवेट प्रैक्टिस करते रहेंगे, भले ही उसका भत्ता पाते हों । देश डाक्टर-इंजिनियर पैदा करके उनका ‘निर्यात’ करने में गर्व अनुभव करता है, पर भूल जाता है कि उनकी आवश्यकता तो यहां की जनता को है । समस्या का कोई समाधान है क्या ?

5. पुलिस – मुझे सबसे अधिक कष्ट होता है यहां की पुलिसिया तंत्र से । पुलिस का रवैया वही है जो अंगरेजों के जमाने में रहा होगा । सत्तासीन राजनेताओं की सेवा करना उसका धर्म है । उनके आदेश पर जनता पर जब चाहा जहां चाहा डंडे बरसाना उनका कर्तव्य बनता है । जो सत्ता पा गये वे खुद को नियम कानूनों से ऊपर शासक और जनता को शासित प्रजा के रूप में देखते हैं । अपने जनप्रतिनिधि होने का ध्यान उन्हें नहीं रहता है । जनता ने कहीं असंतोष व्यक्त किया नहीं कि डंडे से उन्हें काबू में लाने हेतु उनकी पुलिस है, न कि जनता के कष्टों को सुनने के लिए । आजकल रोज कहीं न कहीं से पुलिसिया तांडव की घटनाएं सुनने को मिल जाती हैं । पुलिस बल है कि निरपराध-निरीह के सामने तो शेर बनती है, और पैसा, राजनीतिक पहुंच, और प्रशासनिक रसूख वालों के सामने घुटने टेक देती है । ज्यादतियों की शिकायत लेकर आम आदमी किसकी शरण में जाये ?

6. आर्थिक विकास – विगत कुछ समय से सरकारें आठ-नौ प्रतिशत की आर्थिक विकास का ढिंढोरा पीटती आ रही हैं । क्या है इस आर्थिक विकास का राज और निहितार्थ ? ऐसा लगता है कि जैसे ये आर्थिक प्रगति एक जादुई डंडा है, जिससे देश की समस्त समस्याएं सुलझ जायेंगी । जिन समस्याओं का मैंने उल्लेख किया है और जिनका जिक्र नहीं किया है, क्या उनसे मुक्ति मिल जायेगी ? क्या इस आर्थिक प्रगति से भूखे को भोजन मिल जायेगा, रोगी को दवा मिल जायेगी, अथवा गरीब को उचित शिक्षा मिल जायेगी ? जी नहीं, आज जो आर्थिक प्रगति हो रही है वह संपन्न वर्ग के आर्थिक निवेश पर आधारित है, जिससे पैदा होने वाली संपदा अधिकांशतः संबंधित गिने-चुने संपन्न लोगों में ही बंट जानी है । उससे न किसी रिक्शा वाले को कुछ मिलने का, न खेत के मजदूर को और न ही ईंटा ढोने वाले श्रमिक को । मौजूदा आर्थिक तंत्र बड़े-बड़े उद्योग-धधों को बढ़ावा देने वाला है, जिसके खिलाड़ी भी बड़े होते हैं । समाज के निचले तबके का भला तो तब होगा, जब उसके हितों से प्रत्यक्षतः जुड़े छोटे-मोटे धंधों को आगे बढ़ावा मिले । ऐसे धंधे किसी को खरबपति नहीं बना सकते, लेकिन जो भी संपदा अर्जित होगी वह बहुत न होकर भी सभी गरीबों को थोड़ा-थोड़ा अवश्य मिलेगा; उन्हें राहत तो मिलेगी । केवल सरकारें ही यह काम कर सकती हैं । क्या कभी इस विषय पर ईमानदारी से सोचेगा कोई ?

7. राजनेता – यूं तो जिन समस्याओं पर मेरा ध्यान जाता है वे कई हैं । यहां मैं उदाहरण रूप में कुछएक का जिक्र कर रहा हूं । मेरी दृष्टि में सभी के मूल में है हमारी विकारग्रस्त हो रही बहुदलीय लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था । यह शिकायत तो स्वयं राजनेता भी करने लगे हैं कि राजनीतिक दलों का अपराधीकरण हो चुका है । विडंबना देखिये कि सुधार तथा परिष्कार करने से सभी बच रहे हैं, कारण सामूहिक संकल्प का अभाव । प्रायः सभी दलों में ऐसे तत्व हैं जो खुद को नियम-कानूनों से परे मानते हैं । हमारे नेता उनका उल्लंघन अथवा उनकी अवहेलना करना अपनी ताकत का द्योतक मानते हैं । वे सोचते हैं कि अगर नियम-कानूनों से वे भी वैसे ही बंधे रहंे जैसे आम आदमी, तो फिर वे ‘विशेष’ कहां रह जायेंगे ? लोकतंत्र है पर सामंती सोच बरकरार है । यह तो है हकीकत का एक पहलू । दूसरा है मनमरजी का तंत्र । अपने यहां यह प्रथा चल चुकी है कि सत्ता पर कब्जा पाने के बाद हर दल नीति संबंधी अपने किस्म के प्रयोग आरंभ कर देता है, बिना इस पर ध्यान दिये कि उसकी नीतियां सत्ता परिवर्तन के बाद मान्य रहेंगी कि नहीं । मैं अपनी बात समझाने के लिए उत्तर प्रदेश का उदाहरण देता हूं । आजकल प्रदेश की मुख्यमंत्री महोदया उच्च प्राथमिकता के साथ ‘गरीबों के सामाजिक उत्थान के लिए’ पार्क बनवाने तथा मूर्तियां लगवाने में जुटी हैं । इन मूर्तियों को बसपा के चुनावचिह्न से जोड़कर देखा जा रहा है । अगर भविष्य में ‘सपा’ सत्ता में आई तो संभव है कि वे मूर्तियों को ही तोड़ डालें । अगर नहीं, तो वे पार्कों और मूर्तियों के रखरखाव के लिए तो धन आबंटित करने से रहे । रखरखाव के अभाव में वे खुदबखुद ध्वस्त होने लगेंगी । सोचिये कि करोड़ों रुपये खर्च करके आज जो किया जा रहा है वह उचित है, जब उसे आदरभाव से नहीं देखा ही नहीं जा रहा है । कैसा लोकतंत्र है यह जिसमें ‘मेरी मरजी’ के सिद्धांत से शासन चल रहा हो । लोग क्या चाहते हैं इस पर विचार हो रहा है कहीं ? हमारी प्राथमिकताएं ऐसे ही तय होने लगें तो देश रसातल को नहीं जायेगा क्या ?

बहुत कुछ और कहा जा सकता है । अंत नहीं बातों का । पर बानगी के तौर पर इतना कुछ ही बहुत है । देश की तस्वीर इसी में काफी झलक जाती है ।

कुछ भी हो ‘स्वतंत्रता दिवस’ की दुबारा शुभेच्छाएं । क्या पता देश में शनैः-शनैः सन्मति का उदय हो और तस्वीर बदले । यही उम्मीद पाल लेता हूं । आमीन ! – योगेन्द्र जोशी

राष्ट्रीय पर्व पंद्रह अगस्त – रस्मअदायगी तक सिमटा अहमियत खोता हुआ एक दिवस (1)

आज पंद्रह अगस्त है, देश की स्वतंत्रता की याद दिलाने वाला एक राष्ट्रीय पर्व । एक ऐसा दिवस, जब स्कूल-कालेजों में मिठाई बंटती है, जिसका इंतजार बच्चों को रहता है – बच्चे जो अपने प्रधानाध्यापकों की उपदेशात्मक बातों के अर्थ और महत्त्व को शायद ही समझ पाते हों । एक ऐसा दिवस, जब सरकारी कार्यालयों-संस्थानों में शीर्षस्थ अधिकारी द्वारा अधीनस्थ मुलाजिमों को देश के प्रति उनके कर्तव्यों की याद दिलाई जाती है, गोया कि वे इतने नादान और नासमझ हों कि याद न दिलाने पर उचित आचरण और कर्तव्य-निर्वाह का उन्हें ध्यान ही न रहे । मैं आज तक नहीं समझ पाया कि लच्छेदार भाषा में आदर्शों की बातें क्या वाकई में किसी के दिल में गहरे उतरती है ? यह ऐसा दिवस है जिसकी पूर्वसंध्या पर राष्ट्रपति आम जनता को ‘उनकी भाषा’ में आशावाद का संचार करने वाली देश की लुभावनी तस्वीर पेश करता/करती है । ऐसा दिवस, जब लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री देश को उन योजनाओं का संदेश देते हैं, जो आम जन को सुखद भविष्य का दिलासा देते हैं, लेकिन जिनका क्रियान्वयन महज कागजी बनकर रह जाता है, हकीकत से कोसों दूर । राष्ट्रीय स्तर के उन संबोधनों को सुनकर एकबारगी आम आदमी को भी यह लगने लगता है कि अब उसकी किस्मत बदलने वाली है, किंतु उसका मोहभंग होने में कोई देर नहीं लगती ।

अस्तु, यह दिन है जश्न मनाने का, परस्पर बधाई देने का और देश के सफल भविष्य के सपने (पूर्वराष्ट्रपति डा. कलाम के शब्दों में) देखने का । मेरा भी कर्तव्य बनता है कि देश के नागरिकों को बधाई दूं और उनके सपनों के साकार होने की कामना करूं ।परंतु ऐसा करते समय दिल के कोने में शंका जगती है कि जो होना ही नहीं उसकी कामना करने का तुक ही क्या ? सवाल सिद्धांततः क्या हो सकता है का नहीं है; सवाल है कि परिस्थितियों की वास्तविकता किस संभावना की ओर संकेत करती है ? जो देश ‘स्वतंत्रता’ के माने भूल चुका हो, जहां स्वतंत्रता के अर्थ स्वच्छंदता, निरंकुशता, अनुशासनहीनता, उच्छृंखता, मनमरजी, और न जाने क्या-क्या लिया जाने लगा हो, वहां क्या और कितनी उम्मींद की जा सकती है ?

इस पर्व के प्रति मैं एक वयस्क के नाते बहुत उत्साहित कभी नहीं रहा । किशोरावस्था में अवश्य ही कुछ जोश रहा होगा, पर अब याद नहीं । किंतु पिछले कुछ वर्षों से उत्साह नाम की चीज ही गायब हो चुकी है । मेरे लिए यह अन्य आम दिनों की तरह एक साधारण दिन बनकर रह गया है, क्योंकि यह अपनी अर्थवत्ता खो चुका है । चूंकि बासठ (या इकसठ?) साल पहले एक परंपरा चल पड़ी, सो उसे हम सब अब बस निभाते चले आ रहे हैं । आगे भी निभाएंगे, परंतु कोई मकसद रह नहीं गया है ऐसा मुझे लगने लगा है । शायद मेरी आंखें ही धुंधली हो चुकी हैं कि मुझे मकसद दिखता नहीं ! मैं इस दिवस को दीपावली/ईद आदि जैसे धार्मिक उत्सव अथवा नानकजयंती/बुद्धपूर्णिमा आदि की तरह स्मरणीय दिवस के रूप में नहीं देखता । मेरी दृष्टि में ‘स्वतंत्रता दिवस’ और ‘गणतंत्र दिवस’ मिठाई बांटकर तथा भाषण के कुछ शब्द सुनाकर और ‘जन गण …’ के बोल गाकर रस्मअदायगी हेतु मनाये जाने के लिए नहीं है । मेरी नजर में तो ये दिन वैयक्तिक स्तर पर आत्म-चिंतन और दायित्व-निर्वाह के आकलन के लिए हैं और सामूहिक तथा सामुदायिक स्तर पर यह जांचने-परखने के लिए हैं कि देश कहां जा रहा है, हमारा शासनतंत्र आम आदमी की आकांक्षाओं की पूर्ति कर पा रहा है क्या, हमारी प्राथमिकताएं समाज के सबसे निचले तबके के हितों से जुड़ी हैं क्या ? आदि आदि ।

जब में गंभीर समीक्षा करता हूं तो देखता हूं सब उल्टा-पुल्टा चल रहा है । बस देश चल रहा है, भगवान् भरोसे । संतोष करने को कम और चिंतित होने के लिए बहुत कुछ दिखाई देता है । स्वाधीनता-संघर्ष में जिन्होंने देश के प्रति बहुत कुछ न्यौछावर किया, जीवन दांव पर लगाया, सुख-सुविधाएं त्यागीं, उन्होंने स्वतंत्र राष्ट्र की जो तस्वीर खींची वह, मुझे लगता है, कहीं मिट गयी और उसकी जगह उभर आयी एकदम अलग और निराशाप्रद तस्वीर । देश चलाने वालों ने उन मूल समस्याओं की ही अनदेखी कर दी, जिन पर प्राथमिकता के आधार पर विचार होना चाहिए था । क्या हैं वे समस्याएं जो मेरी नजर में माने रखती हैं ? उनकी सूची प्रस्तुत करने से पहले यह टिप्पणी कर लूं कि आज दुर्योग से देश अनायास एक नहीं, दो नहीं, कई-कई आपदाओं से घिरा है । तथाकथित आतंकवाद से तो देश लंबे अरसे से जूझ ही रहा है । उसके साथ ही तमाम अन्य घटनाएं भी आज देश को आतंकित कर रही हैं । नक्सलवाद खतरनाक रूप लेने की तैयारी में है । उसके ऊपर से इस बार की विकट अनावृष्टि अपना कहर ढा रही है, जिससे कृषि-उपज तो प्रभावित होनी है । पानी का अकाल सन्निकिट है, क्योंकि भूजल स्तर खतरनाक हालत को पहुंच रहा है । रही सही कसर ‘स्वाइन फ्लू’ का प्रकोप पूरा कर रहा है । देश क नौजवान बेरोजगारी का दंश झेलने को मजबूर हैं । समाज के एक बहुत बड़े किंतु तिरस्कृत तबके को भरपेट भोजन तक नसीब नहीं, उनके जीवन की अन्य आवश्यकताओं की बात करना ही फिजूल है । अमीर और गरीब के बीच की आर्थिक खाई निरंतर बढ़ रही है, जो देर-सबेर विकराल सामाजिक संघर्ष का रूप धारण कर सकती है । वस्तुतः ‘छिद्रेषु अनर्था बहुलीभवन्ति’ की उक्ति मौजूदा हालात पर लागू होती है । तब जश्न मनाने के हालात कहां हैं ?

मेरा इरादा उन कुछएक समस्याओं का जिक्र करना है, जिन्हें अरसे से नजरअंदाज किया जा रहा है, जब कि उनका त्वरित समाधान खोजा जाना चाहिए । इनका जिक्र बस इसे पोस्ट के चंद मिनटों या घंटा-डेड़-घंटे के बाद की पास्ट में । – योगेन्द्र जोशी