अगस्त 15, 72वां स्वतंत्रता दिवस – बहुत कुछ ऐसा है जो नहीं होना चाहिए

बर्फ़ की तिरंगी सिल्ली

स्वाधीनता दिवस – एक पर्व

आज 15 अगस्त है देश की स्वातंत्र्य-प्राप्ति का दिन, जिसे पिछले एकहत्तर वर्षों से हम एक उत्सव के तौर पर मनाते आ रहे हैं। इस उपलक्ष्य पर मैं देशवासियों को बधाई देना चाहता हूं और कामना करता हूं कि हर व्यक्ति अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने का संकल्प ले, उसे निभाने का प्रयास करे।

     ऊपरी तौर पर देखें तो हर भारतीय इस दिन स्वयं को एक स्वाधीन देश का नागरिक होने का गर्व अनुभव करेगा। किंतु हम स्वाधीन हैं इतना काफी है क्या? या इसके आगे भी कुछ और है? जिन लोगों ने इस स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए संघर्ष किया उन्होंने क्या स्वाधीनता की अर्थवत्ता के बारे में भी कुछ सोचा नहीं होगा? उन्होंने सोचा होगा न कि कैसे हम अपने देशवासियों को ऐसी शासकीय व्यवस्था दे पायेंगे जो उनके बहु-आयामी हितों को साधने का कार्य करेगा? क्या वह कर पाए हैं हम? या उस दिशा में ईमानदारी से बढ़ भी पाए हैं? या सही दिशा में बढ़ने का इरादा भी कर पाए हैं?

हम स्वाधीन हैं और उस स्वाधीनता का “उपभोक्ता” मैं भी हूं। मेरे लिए यह काफी महत्वपूर्ण है, किंतु पर्याप्त नहीं। इसके आगे भी मुझे बहुत कुछ और देखने की इच्छा है। मुझे खुद के लिए कुछ पाने की लालसा नहीं, क्योंकि मेरे पास अपने लिए पर्याप्त है। जितना एक आम आदमी के लिए वांछित हो उतना मुझे मिला ही है, उसके आगे बहुत और मैं पाना नहीं चाहूंगा। उसके विपरीत किसी को अपनी सामर्थ्य से कुछ दे सकूं तो वह अधिक संतोष देगा।

स्वाधीन भारत – उपलब्धियां

अब मैं असली मुद्दे पर आता हूं। मेरा जन्म देश की स्वातंत्र्य प्राप्ति के चंद महीनों पहले उत्तराखंड (तब उ.प्र.) के सुदूर गांव में हुआ था। अर्थात्‍ मैं परतंत्र देश में जन्मा, लेकिन उस काल का कोई अनुभव नहीं मिला। जब से होश संभाला स्वतंत्रता दिवस एवं गणतंत्र दिवस मनते हुए देखता आ रहा हूं। क्या अहमियत है इन दिवसों की? यह सवाल पिछले कुछ वर्षों से समझने की कोशिश कर रहा हूं।

इस में दो राय नहीं है कि एक स्वतंत्र और स्वशासित देश के रूप में हमने भौतिक स्तर पर काफी प्रगति की है। विश्व की प्रमुख आर्थिक शक्तियों में से एक बनने की दिशा में देश अग्रसर है। लोगों की संपन्नता एवं आर्थिक समृद्धि में इजाफा हुआ है। देश अंकीय (डिजिटल) तकनीकी उपयोग करते हुए नई शासकीय व्यवस्था स्थापित कर रहा है। लोगों के हाथ में मोबाइल/ स्मार्टफोन पहुंच चुके हैं। जिन घरों में बिजली का पंखा मुश्किल से दिखता था उनमें “एसी” लग चुके हैं। सुख-सुविधा की तमाम युक्तियां लोगों की पहुंच में आ चुकी हैं। सड़कों पर मोटर बाइकें और कारें दौड़ रही हैं। साइकिल का प्रयोग जो करते थे वे उसे चलाना भी भूल चुके हैं। यह सच है कि इतना सब अभी भी समाज के एक बड़े तबके को मुहैया नही हो पाया है। फिर भी उस दिशा में देश बढ़ रहा है यह स्वीकारा ही जाएगा।

वैज्ञानिकी एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी काफी हद तक प्रगति हुई ही है। उपग्रह प्रक्षेपण में देश अग्रणी बन चुका है। राष्ट्रीय सुरक्षा हेतु देशज मिसाइलें बन चुकी हैं और नाभिकीय आयुधों का भी विकास हो चुका है। राकेट तकनीकी का भी उल्लेखनीय विकास हमारे वैज्ञानिक-अभियंता कर चुके हैं। चंद्रयान की बात पुरानी पड़ चुकी है; अब तो मंगल-यान की बात हो रही है।

यह सब उपलब्धियां कम हैं क्या एकहत्तर वर्ष पहले स्वतंत्र हुए देश के लिए? क्या इन सब पर गर्व नहीं होना चाहिए किसी भारतीय को? अवश्य गर्व होना चाहिए।

निजी अनुभव

इतना सब होते देखने के बाद भी मैं संतोष नहीं कर पाता। मुझे लगता है हमने जितना पाया है उससे अधिक खोया है। वैसे जो पाया और जो खोया उनके मूल्यों की तुलना करना आसान नहीं। हर व्यक्ति अपनी समझ और नजर से वस्तुस्थिति को देखेगा। क्या खोया इसका उल्लेख करने और अपनी निराशा व्यक्त करने से पहले मैं अपने दो-तीन अनुभवों की बात करता हूं:

(1) मैंने सन् 1962 में हाई-स्कूल परीक्षा पास की थी अपने गांव से 7-8 कि.मी. दूर के विद्यालय से। मुझे एक घटना की याद है जब जिले के किसी परीक्षा केन्द्र से खबर आई कि कोई छात्र वहां नकल करते पकड़ा गया। नकल का एक वाकया इलाके में खबर बन गई। नकल करने की कोई हिम्मत कर सकता है यह हम लोग तब सोचते भी नहीं थे। अब क्या है?

(2) अपने बचपन के दिनों में मैं मां-चाची आदि के वार्तालाप में इस प्रकार की बातें सुना करता था: “सुना है फलां आदमी घूस लेने लगा है।” कोई सरकारी कर्मी घूस भी लेता है यह तब खबर बन जाती थी। अब क्या है?

(3) 1972-73 की बात है जब रेल-यात्रा में मेरा बैग गुम हो गया था। उसमें हाई-स्कूल से एम.एससी. तक के प्रमाणपत्र थे। मैंने संबंधित संस्थाओं को प्रमाणपत्रों की द्वितीय प्रतियों हेतु निवेदन किया। मुझे बिना भाग-दौड़ और लेन-देन किए कुछ दिनों के अंतराल पर दस्तावेज मिल गए। मैं सोचता हूं आज वही कार्य इतना आसान न होता।

देश की वर्तमान दशा

मैं कल दोपहर एक टीवी समाचार सुन रहा था। उसमें इधर-उधर की आपराधिक घटनाओं का जिक्र था। दो-चार की बानगी पेश करता हूं:

(1) आगरा (उ.प्र.) में हिन्दू अतिवादियों ने किसी बात पर एक युवक की पिटाई कर दी थाने में ही पुलिस की मौजूदगी में।

(2) मेरठ (उ.प्र.) में किसी एसयूवी कार से आल्टो कार टकराई और एसयूवी के सशस्त्र सवारों ने दूसरी कार के दोनों सवारों की तबियत से पिटाई तो की ही, फिर अपनी कार में बिठाकर अज्ञात जगह ले भागे।

(3) मुरादाबाद (उ.प्र.) में उपद्रवी कांवड़ियों द्वारा सड़क पर किसी बात पर उत्पात मचाने की घटना का भी समाचार टीवी पर सुना।

(4) उन्नाव (उ.प्र.) में एक-तरफा प्यार में पागल शादीशुदा एक युवक ने युवती की मौजूदगी में ही उसके ब्यूटी पार्लर में तोड़फोड़ कर दी।

(5) ग्रेटर नॉयडा (उ.प्र.) में गुंडे-बदमाशों की गोली का शिकार हुआ एक व्यक्ति।

(6) नवी मुम्बई (महा.) में रंगदारी वसूलने के लिए दुकान में घुसे बदमाश दुकानदार पर ताबड़तोड गोली दागकर फरार हो गये।

(7) वैशाली (बिहार) से भी ऐसी ही एक घटना सुनने को मिली।

(यह विवरण याददास्त पर आधारित है; स्थान एवं घटना के स्वरूप बताने में उलटफेर हो गया होगा।)

ऐसा नहीं है कि इस प्रकार की घटनाएं पहले नहीं होती थीं। तब कभी-कभार देखने-सुनने में आती थीं, लेकिन आजकल घटनाओं की बाढ़-सी आ चुकी है।

सरकारें अपराधियों को सजा देने का दावा करती हैं; कुछ मामलों में सजा भी हो जाती है। किंतु वे यह जानने के प्रयास नहीं करती हैं कि अपराध होते ही क्यों हैं? न सरकारें न ही देश के बुद्धिजीवी ऐसे किसी अध्ययन में रुचि ले रहे हैं। लोगों में आपराधिक प्रवृत्ति न पनपे इसके प्रयास होने चाहिए कि नहीं?

इन सब बातों को देखकर मुझे निराशा होती है। मेरा मत है कि देश विकट चारित्रिक पतन के दौर से गुजर रहा है। विकास एवं आर्थिक प्रगति इस पतन की भरपाई नहीं कर सकते है। एक सभ्य, सुसंस्कृत समाज की रचना महान्‍ देश की पहचान होनी चाहिए।

     मुझे यह देख हैरानी एवं क्षोभ होता है कि देश में अनेक लोग हैं जिनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ है, अनुशासनहीनता, स्वच्छंद आचरण, कायदे-कानूनों का उल्लंघन, इत्यादि। मैंने आरंभ में बताया कि 1962 में नकल को किस नजरिए से देखा जाता था। आज सरकारी स्कूल-कालेजों के छात्र नकल को अपना अधिकार समझते हैं। इतना ही नहीं उनका साथ शिक्षक, अभिभावक, और पुलिस भी दे रही है। सरकारी शिक्षा का स्तर गिर रहा है। यही आज के डाक्टरी पेशे का है जहां अनेक डाक्टर संपन्न होने के बावजूद मरीज के प्रति सहानुभूति नहीं रखते। पुलिस बल को देखकर कई जन घबराते हैं। कोई महिला शिकायत लेकर थाने जाने में डरती है कि वहां कहीं उसी का दुष्कर्म न हो जाए। दुष्कर्म की घटानाएं दिन-ब-दिन बढ़ रही हैं। राजनीति का अपराधीकरण हो चुका है ऐसा क्यों कहा जा रहा है? कुछ तो सच्चाई होगी। बिहार के मुजफ़्फ़रपुर और उ.प्र. के बालिका संरक्षण गृहों की घटनाएं आज के आपराधिक मानसिकता के लोगों की देन है जिन्हें राजनेताओं एवं प्रशासन से प्रशय मिल रहा होता है। प्रशासनिक भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। उ.प्र. के वाराणसी एवं बस्ती और पश्चिम बंगाल के सिलिगुड़ी के निर्माणाधीन फ़्लाई-ओवरों का गिरना इसी भ्रष्टाचार के परिणाम हैं।

     यह विषय लंबी विवेचना चाहता है जिसे इस आलेख में शामिल करना कठिन है। कुल मिलाकर मैं यही मानता हूं कि देश चारित्रिक पतन की राह पर है। – योगेन्द्र जोशी

असहिष्णुता पर निरर्थक बहस

अहिष्णुता मानव समाज के लिए कोई नयी बात नहीं है। यह तो मानव स्वभाव का अपरिहार्य हिस्सा रही है। कोई समाज और कोई काल नहीं रहा जब असहिष्णूता नहीं रही है। उसके स्वरूप और मात्रा में अवश्य ही उतार-चढ़ाव होते रहे हैं। हमारे पौराणिक ग्रंथों में राक्षसों का जिक्र मिलता है जो उसी असहिष्णुता का द्योतक है। सभ्य समाज में इस पर काफी हद तक आत्मनियंत्रण रखते आये हैं लोग। फिर भी कुछ अपवाद बने गिने-चुने लोगों की दूसरे लोगों के प्रति घृणा असहिष्णुता के रूप में यदा-कदा प्रदर्शित हो ही जाती है। जिस देश में 120-25 करोड़ लोग रहते हों वहां ऐसे सिरफिरे हजारों में हों तो आश्चर्य नहीं।

इधर अहिष्णुता की बात जिस तरह की जा रही है वह हैरान करने वाली है, गोया कि उसमें अप्रत्याशित तौर पर इजाफा हो गया हो। कितनी नयी घटनाएं हो गयी हैं कि कहा जाये कि ऐसा अनर्थ पहले से नहीं होता आया है? बेमतलब की इस बहस में लोगों को कूदते देख मुझे समझ नहीं आता कि ये बुद्धिजीवी हैं या उधमी जन।

मुझे अब, इन दो-चार दिनों में, लगने लगा है कि मोदी – मेरी दृष्टि में बेचारे मोदी – को निशाना बना रहे हैं ये सब, मानो कि सब मोदी ही करवा रहा है। दोष देना ही है तो राज्य सरकारों को भी दोष क्यों नहीं देते जहां वारदातें होती हैं? गुजरात में हुई 2002 की घटना ने बेचारे मोदी को ऐसा बदनाम कर दिया कि अब वे ही हर असामाजिक घटना के लिए जिम्मेदार माने जा रहे हैं।

ठीक है; पर मोदी से क्या उम्मीद कर रहे हैं ये लोग? साफ-साफ बतायें कि मोदी ऐसी बातों पर नियंत्रण कैसे करें? क्या वे रोज चीखते हुए कहें कि बस अब ये सब बंद करो? क्या आपराधिक सोच वाले को उपदेश देकर रोका जा सकता है? इस देश में तो ऐसे उपदेशकों की सदा से भरमार रही है, फिर भी क्या लोग सुधर पाये हैं?

आप अपराध कर चुके व्यक्ति को सजा दे सकते है, किंतु उस व्यक्ति को कैसे रोक सकते हैं जो मन में अपराध का इरादा पाले बैठा हो – मंशा जो उजागर न हुई हो? क्या आप मानव-बम बनने को तैयार व्यक्ति को अपना इरादा छोड़ने को कह सकते हैं? इस देश से आईएसआईएस में शामिल होने गये युवाओं को अग्रिम तौर पर पहचान सके आप?

मुझे लगने लगा है कि कुछ बुद्धिजीवी मोदीफोबिया से ग्रस्त हैं और उन्हें केवल मोदी और उनकी टीम के लोगों में ही दोष दिखते हैं। मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले एक लेखक ने कह दिया था कि मोदी प्र.मं. बने तो वे देश छोड़ देंगे। दुराग्रह से पीड़ित व्यक्ति के बोल सहिष्णुता के द्योतक हैं क्या? क्या यह माना जाये कि वे सब विकृत सोच के लोग थे जिन्होंने मोदी को कुर्सी पर पहुंचाया, और यह कि केवल उक्त लेखक महोदय ऐसी विद्वता रखते थे कि किसी की योग्यता का आकलन केवल वही सही-सही कर सक्ते हैं? बाद में वे बोले कि वे भावुकतावश वह सब कह बैठे। क्या असहिष्णुता की जोर-शोर से की जा रही बात भी उसी भावुकता का द्योतक नहीं हो सकता? क्या जो बातें कही जा रही  हैं वे वस्तुनिष्ठ है या महज वैयक्तिक भावुकताजनित?

इन लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि आये दिन देश में तमाम असामाजिक घटनाएं होती आ रही हैं। कही कोई किसी का कत्ल कर दे रहा है शत्रुतावश या लूटपाट या रंगदारी में, कहीं अपहरण की घटनाएं हो रही हैं, आये दिन स्त्रीजाति का दुष्कर्म हो रहा है, कहीं पुलिस ज्यादती में लोग प्राण खो रहे हैं, कहीं कोई दबंग कमजोर को दबा रहा है, राह चलते छोटी-मोटी बात पर ही लोगों की जान ले ली जा रही है, आदि-आदि। लेकिन ये सब घटनाएं उनको सह्य नजर आती हैं; किंतु दो-तीन अन्य अप्रिय घटनाएं हो गयीं तो देश असहिष्णु हो गया। कमाल करते हैं ये बुद्धिजीवी।

और समाचार माध्यमों का रवैया देखिए कि किसी घटना की चर्चा घंटों या दिनों तक होती है और किसी घटना का जिक्र तक नहीं होता है। लगता है कि वे चुन-चुन कर जनता के सामने पेश करते हैं घटनाओं को। ऐसी पत्रकारिता को निष्पक्ष कहें क्या? पत्रकारिता से जुड़े लोगों पर तो पेड-न्यूज़ का आरोप भी लगता आया है। देश के सामने जो गंभीर समस्याएं हैं उन पर चर्चा क्यों नहीं करते हैं ये लोग? पेरिस में जलवायु परिवर्तन पर बहस हो रही है। यह विश्व के समक्ष गंभीर समस्या है। इस मुद्दे पर अच्छी-खासी कारगर बहस क्यों नहीं हो रही है? मुद्दे एक नहीं अनेक मिलेंगे, पर सनसनीखेज समाचार नहीं बनेंगे। मीडिया उनमें दिलचस्पी नहीं लेता है।

जब कोई बात हिन्दुओं की मान्यताओं के विरुद्ध की जाये तो उसे चुपचाप सुन लिया जाना चाहिए ऐसा सहिष्णुता के पक्षधर मानते हैं; किंतु जब अन्य धर्मावलंबियों के मान्यताओं के विरुद्ध हो तो उसे बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए।

देश के सामने अनेकों गंभीर समस्याएं मुंह बांये खड़ी हैं, यथा अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि, करोड़ों लोगों की गरीबी, 45-50% बच्चों का कुपोषण, बदहाल सरकारी स्कूल, अस्पताल जहां गरीबों को इलाज नसीब नहीं होता, आदि-आदि। बुद्धिजीवियों को इन पर बहस करनी चाहिए और उसके लिए अभियान छेड़ना चाहिए। किंतु उनका पेट तो भरा रहता है। उन्हें इन समस्याओं से नहीं जूझना पड़ता है, उनके काम तो हो ही जाते हैं। उनकी समस्या केवल असुरक्षा है जिसका सामना उन्हें करना पड़ सकता है। लगता है कि मामला निहित स्वार्थ से प्रेरित है।

कुछ भी हो वे बतायें कि अगर वे मोदी की जगह होते तो कौन-सा जादुई डंडा घुमाते कि सर्वत्र सहिष्णुता का राज हो जाता? अच्छा होगा कि वे उस रास्ते की सलाह मोदी को दें जिसे वे खुद अपनाते। सुस्पष्ट कार्ययोजना की प्रस्तुति होनी चाहिए। कोई अपराध न कर सके यह कैसे हो यह स्पष्ट बताया जाना चाहिए । महज ये नहीं होना चाहिए, वह होना चाहिए जैसी बातों से काम नहीं चलेगा। – योगेन्द्र जोशी

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