“मेरा भारत महान्” – तथाकथित संत-महात्माओं के लिए उपजाऊ भूक्षेत्र

२५ अप्रैल २०१८. जोधपुर की एक निचली अदालत ने स्वघोषित “संत” आसाराम को उम्रकैद की सजा सुना दी।

आसाराम के हजारों अनुयायियों के लिए यह समाचार बेहद तकलीफदेह एवं अविश्वसनीय रहा है। उन्होंने आसाराम को दोषी मानने से ही इंकार कर दिया।

मेरा मन इस विषय पर बहुत कुछ कहने को हो रहा है। लेकिन बहुत कुछ नहीं लिख सकता। मन में आने वाले विचार स्वतःस्फूर्त एवं तीव्रगति के होते हैं, किंतु उन्हें शब्दों में बांधकर दूसरों के समक्ष प्रस्तुत करना एक धीमी प्रक्रिया होती है खासकर मुझ जैसे अकुशल लेखक के लिए।

अपने इस आलेख का आरंभ में महाभारत में वर्णित एक प्रकरण से करता हूं: उक्त ग्रंथ के शान्तिपर्व में कौरव-पांडव युद्ध की समाप्ति के बाद की स्थितियों का वर्णन है। युद्ध के दुःखद परिणामों से विचलित होकर राजा युधिष्ठिर राजकाज छोड़कर संन्यास ग्रहण करने का विचार अपने भाइयों के समक्ष रखते हैं । द्रौपदी समेत सभी भाई उन्हें सलाह देते हैं कि उन्हें जनता के हित में राजकाज चलाना चाहिए। वार्तालाप के सिलसिले में अर्जुन गेरुआवस्त्रधारी तथाकथित साधुओं की कटु आलोचना भी कर डालते हैं । वे कहते हैं कि ऐसे कई लोग ढोंगी होते हैं और आम जन को मूर्ख बनाकर अपनी जीविका चलाते हैं । तत्संबंधित दो कथन आगे प्रस्तुत हैं:

परिव्रजन्ति दानार्थं मुण्डाः काषायवाससः ।

सिता बहुविधैः पाशैः सञ्चिन्वन्तो वृथामिषम् ॥32

(महाभारत, शान्तिपर्व, राजधर्मानुशासनपर्व, अध्याय 18)

अनिष्कषाये काषायमीहार्थमिति विद्धि तम् ।

धर्मध्वजानां मुण्डानां वृत्त्यर्थमिति मे मतम् ॥34

(यथोपर्युक्त)

पहले श्लोक के अनुसार अनेक जन गेरुआ वस्त्र धारण करके घूमते रहते हैं। वे लोग अनेक बंधनों से बंधे हुए मिथ्या ही दूसरों से दान पाकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति कर रहे होते हैं।

यहां स्पष्ट कर दूं कि गेरुआ वस्त्र प्रतीक है उन तौर-तरीकों का जो ये लोग अपनाते हैं। वे तरह-तरह से पहन-ओढ़ कर और स्वांग रचते हुए असामान्य दिखने का प्रयास करते हैं ताकि आम जन उन्हें अलौकिक ज्ञान एवं सामर्थ्य के साधु-महात्मा-संत के तौर पर स्वीकारने लगें। अगले श्लोक में वस्तुस्थिति अधिक स्पष्ट है:

दूसरा श्लोक बताता है कि दूषित (काषाय) मन के साथ गेरुआ/केसरिया चोला पहनना स्वार्थसिद्धि का साधन समझा जाना चाहिए । ऐसे नरमुंडों का मिथ्या  धर्म के नाम का झंडा उठाकर चलना वस्तुतः जीविका चलाने का धंधा है।

दूषित मन यानी जिस में मैल हो, खोट हो, दूसरों को मूर्ख बनाने की लालसा हो।

मैंने संन्यास धर्म को लेकर चार लेखों की एक शृंखला २०१६ में लिखी थी अपने अन्य ब्लॉग में। उनमें ये बातें विस्तार से स्पष्ट की गई हैं।

ये बातें महाभारत काल की हैं। कदाचित् तब झूठ और फरेब का इतना बोलबाला नहीं रहा होगा। अधिकांश जन धर्म के नाम पर लोगों को मूर्ख बनाने से डरते होंगे। परंतु आज कलियुग है कलियुग ! धर्म के नाम पर ठगी आम बात हो चली है। लोगों के मन में पाप छिपा रहता है, लेकिन वे इस प्रकार व्यवहार करते है कि जैसे उन जैसा संत पुरुष मिलना मुश्किल है। और यही पर आज की कहानी शुरू होती है। अनेक प्रश्न मेरे मन में उठते हैं।

संत कहलाने का अधिकारी कौन?

प्रथम प्रश्न जो मेरे मन में उठता है वह है कि संत-महात्मा कौन होते हैं। क्या वह व्यक्ति संत-महात्मा कहलाने का अधिकारी हो सकता है जो आम जनों की कमजोरी का लाभ उठाते हुए अपना “आध्यात्मिक” साम्राज्य खड़ा कर लेते हैं और भौतिक संसार के आधुनिकतम सुख-सुविधाओं का भोग करते हैं? जरा याद करिए ४००-६०० वर्ष पूर्व के उन उपदेशकों को जिन्हें आज भी लोग संत-महात्मा के नाम पर स्मरण करते हैं और पूजते हैं। गुरु नानकजी, संत रविदासजी, संत कबीर आदि क्या थे? क्या उन्होंने आज के इन आध्यात्मिक “गुरुओं” की भांति अपनी जागीरें खड़ी की थीं? रविदासजी/रैदासजी जूते बनाते/मरम्मत करते थे। संत कबीरदासजी जुलाहे का कार्य करते थे। अपना कार्य वे सामान्य आदमी की तरह करते रहते थे और साथ ही ईश्वर-भक्ति एवं ज्ञान की बातें करते थे जो लोगों को प्रभावित करती थीं। उनका जीवन सरल एवं सादगी से भरा रहता था।

लेकिन आज के इन अध्यात्म के ठेकेदारों को देखिए कि कैसे ऐशोआराम की जिन्दगी जीते हैं, एकदम बेशर्मी के साथ।

विवेकशून्य लोगों का “बाबा-प्रेम”

दूसरा प्रश्न है कि वे क्या बातें हैं जिनके लिए लोग इन “बाबाओं” की शरण में पहुंचते हैं और खुद की सोचने-समझने की बुद्धि खो बैठते है। इसमें बिल्कुल भी संशय नहीं है कि इन बाबाओं को सम्मोहित करने की कला आती है। वे अपने हावभाव एवं भांति-भाति के नाटकीय व्यवहार से कइयों को आकर्षित करने में सफल होते हैं। लेकिन जनता यह क्यों नहीं समझ पाती जो व्यक्ति इस संसार के भोगविलास में लिप्त हो और स्वयं आध्यात्मिक मार्ग से भटक चुका हो दूसरों को कैसे आध्यात्मिक मार्ग दिखा सकता है? जो व्यक्ति पूरी बेशर्मी से स्वयं को भगवत्‍-अवतार घोषित किए बैठा हो कितना पुण्यात्मा होगा वह?

मुझे अक्सर आम लोगों की नादानी पर दुःख होता है और उन पर तरस भी आता है कि परमात्मा ने उनको इतनी सामान्य बुद्धि भी नहीं दे रखी है वे समझ सकें ऐसे ढोंगी बाबा स्वयं सुख भोगने के लिए उनकी मूर्खता का लाभ उठा रहे हैं। यों अपने समाज में दूसरों को तरह-तरह से मूर्ख बनाने वालों की कमी नहीं है। राजनेता सब्जबाग दिखाकर लोकतंत्र के नाम पर सत्तासुख भोगता है। कुछ लोग जनता के धन को माह-दोमाह में ही दूना-तिगुना करने का दावा करके लूटते हैं। प्रशासनिक तंत्र में जनता को लूटने का भ्रष्टाचार का खेल चलता ही है। बहुत से मौकों पर हम असहाय हो सकते हैं और कुछ कर न पायें। किंतु इन बाबाओं के चंगुल में फंसने की विवशता क्योंकर होती है?

स्त्रीजाति के प्रति विशेष लगाव?

तीसरी बात जो सर्वाधिक महत्व की है और जिस पर स्त्रीजाति को विशेष ध्यान देना चाहिए वह है कि अनेक मौकों पर स्त्री पुरुष के पतन का कारण बनती है। जासूसी क्षेत्र में यह सुविख्यात है कि पुरुषों को कर्तव्यच्युत करने के लिए स्त्रियों का भरपूर सहारा लिया जाता है। प्राचीन चिंतकों ने धर्मभ्रष्ट न हों इसके लिए पुरुषों को स्त्रियों के सान्निध्य से बचने की सलाह दी है। अनेक पौराणिक कथाएं पढ़ने को मिलती हैं जिसमें पुरुषों का तप भंग करने के लिए स्त्रियों की मदद ली गई हो। मेरे कहने का तात्पर्य बहुत स्पष्ट है। ये बाबा इन तथ्यों को क्या जानते नहीं हैं? तो फिर क्यों स्त्री-अनुयायियों की फौज खड़ी करते हैं? और स्त्रियां स्वयं इन बातों को क्यों नहीं समझ पातीं? साफ जाहिर है कि इन बाबाओं के असल उद्येश्य ही यौन-सुख भोगना होता है और उनकी पूरी योजना ही उसी के लिए ढली रहती है। लेकिन दुःख तब होता है जब in अनुयायी-स्त्रियों में कुछएक स्वयं को अपने “भगवान्” बाबा भोगने के लिए समर्पित कर देती हैं और शेष बाबा को  निर्दोष कहने में देर नहीं करतीं। क्या यह नहीं समझ में आता है कि कोई भी व्यक्ति दूसरे के २४ घंटों की चर्या पर नजर नहीं रख सकता? परोक्ष में कोई क्या कर रहा है कोई बता ही नहीं सकता। मां-बाप अपनी संतान के क्रियाकलापों के बारे में आश्वस्त नहीं हो सकते। पति-पत्नी भी एक दूसरे के चरित्र की गारंटी नही ले सकते। किसी के अपराधों का लेखा-जोखा रखना सामान्य व्यक्ति के लिए संभव ही नहीं। इसलिए किसी बाबा के निर्दोष होने का आश्वासन कोई अनुयायी भला कैसे दे सकता है? इस बात को याद रखना चाहिए।

राजनेताओं एवं प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका

चौथी बात जिसका उल्लेख करना आवश्यक है वह है कि जब बाबा लोग अनुयायियों की ऐसी फौज खड़ी करते हैं जिसकी अपनी कोई स्वतंत्र सोच रह ही नहीं जाती है तब चुनावों में इन बाबाओं की भूमिका अहम हो जाती है। यह गौर करने की बात है कि चुनावों के मौसम में राजनेता अथवा उनके दल के मुखिया का इन बाबाओं की शरण में पहुंचने लगते हैं ताकि उनके समर्थकों के वोट पाए जा सकें। बाबाओं के प्रति राजनैतिक दलों का इस प्रकार का रवैया उनको स्थापित करने में मदद करता है। बाबाओं और राजनेता का ऐसा गठजोड़ दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन भारतीय लोकतंत्र में सत्ता कैसे हथियाई जाए यही सबसे महत्व की चीज बन चुकी है। यह देशहित में होगा क्या यह प्रश्न कोई भी स्वयं से नही पूछता।

जब बाबाओं से राजनेता उपकृत होते हैं तो बदले में बाबा भी उनसे बहुत कुछ पाने की अपेक्षा करते हैं। उनको सस्ते में जमीन दी जा सकती है ताकि आश्रम स्थापित हो सकें। उनके कुकर्मों पर शासन पर्दा डाल सके यह भी एक दुष्परिणाम होता है। इतना ही नहीं प्रशासनिक अधिकारी भी उनकी शरण में पहुंचने लगते हैं ताकि वे बाबाओं के माध्यम से शासकों से प्रोन्नति में लाभ ले सकें अथवा मुंहमांगा कार्यस्थल पा सकें। इस प्रकार बाबाओं, राजनेताओं, एवं प्रशसनिक अधिकारियों का ऐसा गठजोड़ तैयार होता है जो देश के लिए घातक होता है। इस गठजोड़ के सभी घटक परस्पर एक-दूसरे को बचाते हैं। यही इस देश में होता आ रहा है।

मैं आज तक समझ नहीं पाया हूं कि धर्म एवं अध्यात्म के नाम पर इतने बाबाओं का अवतरण इसी देश में क्यों हुआ है। अन्य देशों की स्थिति इतनी दयनीय नहीं है। आस्था के नाम पर अंधविश्वास हमारे समाज में जड़े जमा चुका है।

अंत में एक वाकये का जिक्र भी लगे हाथ कर लेता हूं।

अपने विश्वविद्यालय में मेरे एक सहकर्मी शिक्षक हुआ करते थे, लगभग मेरे हमउम्र। कुछ वर्षों पूर्व वे सेवानिवृत्त हो गये। (मैंने पहले ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले थी।) वे जब कार्यरत थे तभी ओशो (आरंभ में भगवान्‍?) रजनीश के अनुयायी बन गए और कत्थई (maroon) रंग के वस्त्र पहनने लगे थे। वि.वि. में ये परिधान शायद नहीं पहनते होंगे। वे अपने “अध्यात्मिक” कार्यक्रमों में मुझे भी अक्सर आमंत्रित करते थे। बिल्कुल दिलचस्पी न होते हुए भी मैं कभी-कभार शिष्टाचार या सदाशयता के नाते उनके कार्यक्रमों में चला जाता था।

जब ओशो रजनीश का देहावसान हो गया और उनका सामाज्य विवादों में घिर गया तो वे हरियाणा के यमुनानगर के किसी “गुरु” की शरण में पहुंच गये। मुझे भी अनुयायी बनने के लिए प्रेरित करते रहते थे। मेरे घर पर अपने गुरु के गुणगान की पत्रिकाएं देते रहते थे। मैं पत्रिकाएं स्वीकार तो कर लेता था लेकिन पढ़ता नहीं था। (मैं किसी भी बाबा/गुरु को सम्मान की दृष्टि से नहीं देख पाता !) पिछले कुछ समय से उनसे मेरी मुलाकात नहीं हुई है। पता चला कि सेवानिवृत्ति के बाद वे अपने गुरु के “पूर्णकालिक” भक्त हो गए। यह भी पता चला कि अपनी पेंशन भी गुरु को समर्पित कर दिए हैं। सुनने में आया कि उनकी पत्नी बेटे की शादी करने का अनुरोध करती रहीं, लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें अब कोई दिलचस्पी नहीं। जिस पत्नी के साथ उन्होंने जीवन के ४०-४५ वर्ष बिताए उसकी भी उन्हें परवाह नहीं रही; बच्चों की बात छोड़िए।

यह घटना है वि.वि. स्तर के एक उच्चशिक्षित व्यक्ति के गुरु-शरण में जाने की, उस गुरु की जो स्वयं गार्हस्थ्य जीवन जी रहे हैं, दूसरों की कमाई के बल पर। जब ऐसा व्यक्ति भ्रमित हो सकता है तो आम आदमी कैसे बच सकता है? – योगेन्द्र जोशी