Cartoonist Aseem Trivedi is arrested under Article 124 A (Non-bailable) of Indian Penal Code.

I do not remember of having heard in the past about the nearly-25-year-old Sri Aseem Trivedi of Kanpur working in Mumbai. His cartoons did not come to my notice through the newspaper media or otherwise. It may have been my ignorance, or maybe he was a low-profile cartoonist in the process of establishing himself. It was only day before yesterday when the TV channels telecast the news of his arrest by Mumbai Police, booking him allegedly for sedition, for showing disrespect to the constitution and the country’s icons of democracy, etc. The police claims to have made thorough inquiries during the past several months before arresting him.

Now there is a fresh news that the sedition case does not actually hold and that he would be soon released.

Aseem has been associated with the sociopolitical movement named India Against Corruption. He was active during Anna’s nonviolent agitation, demanding enactment of the Lokpal Bill and action against the corrupt politicians and bureaucracy of the so called biggest democracy on earth, India. Aseem had been expressing his feelings of anguish in terms of satirical cartoons depicting mostly corrupt political class of India. His boldness in doing all that appears to be the root cause of his arrest.

India is a democracy with its numerous problems which our politicians have miserably failed to solve. There has been unabated deterioration in our political system, and no one other than the political class has been responsible for that. Born with the freedom of the country and subsequent democratic system of governance, I have been a witness to that deterioration. Corruption is now rampant everywhere. Persons with criminal background or dubious character have succeeded in getting ‘honourable’ entry in to all political parties and are playing their active part in the governmental system. Bureaucrats are insensitive to the peoples’ problems, and have been enjoying non-accountability for decisions and general behaviour, and are very rarely penalized for their wrong-doings. And the most deplorable and agonizing fact is that Indian political parties have ashamedly been creating vote banks, by dividing the society on the basis of religion, caste, regionalism and language, ignoring the dangers ensuing therefrom.

The Indian people have started getting disillusioned with the current political milieu. And people are expressing their resentment in different ways. Cartoonists have been doing their job. In democratic regimes, they have always painted politicians in their cartoons satirically. A cartoon often contains a message that only a detailed verbal depiction could convey. Unfortunately our politicians have become intolerant to such messages. Bengal’s iron lady Ms. Mamata Banerji is an ideal example of an intolerant politician.

The role of the police force is also worth noting.

Indian police has never been committed to serve the people. They are there to suppress the poor peoples’ voice, when that seems to be inconvenient to those in powers. Resorting to lathi-charge wherever people protest with justifiable reasons against government policies and decisions is regarded by them to be their sacred duty

The present breed of politicians have lost peoples’ respect and trust. They should correct themselves rather than correcting cartoonists and other activists. People have the right not to respect them when they do not deserve that. Their arrogant remark that they are “peoples’ elected representatives” cannot necessarily earn them respect.

भारत के अभी तक के प्रधानमंत्रियों में भ्रष्टतम कौन?

‘फ्रीडम आफ एक्सप्रेशन’

दुनिया की सबसे बड़ी डिमॉक्रसी या लोकतंत्र कहलाने वाले अपने देश इंडिया दैट इज भारत का नागरिक होने का एक अविवादित लाभ यह है कि आप यहां पूरी तरह स्वतंत्र है । आपको अमर्यादित स्वछंदता हासिल है कि आप जो चाहे कर लें । भ्रष्टाचार के नाले में जब चाहें जितना चाहें नहाने की छूट यदि आपको मिली हो, तो भला सच-झूट, सार्थक-निरर्थक, मीठा-कड़ुआ, कुछ भी बोलने का अधिकार तो मिलना ही है न ? आपको खाने को मिले या न मिले, पास में पहनने-ओड़ने को कुछ रहे या न रहे, खुले आसमान के नीचे रात गुजारनी पड़े या नहीं, लेकिन कुछ भी बोलने की छूट तो हर किसी को मिली ही है । बोलने की छूट ही नहीं,  बोलने पर ‘मैंने ऐसा नहीं कहा’ कहने की भी छूट आपको प्राप्त है । ऐसी ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ अर्थात् ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ अपने नागरिकों को मिली है । इस जीवन में भला कुछ और क्या चाहिए ? इसी ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ का लाभ लेते हुए मैं कुछ कहने जा रहा हूं । क्षमा करें यदि आप ‘ऑफेंडेड’ या आहत हों । ‘फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन’ नामक अधिकार का ही तो प्रयोग कर रहा हूं, क्या गलत कर रहा हूं?

मैं अपनी बात विशेष अवसर पर कर रहा हूं । बीते कल सुप्रतिष्ठित समाजसेवी माननीय अन्ना हजारे आमरण अनशन पर बैठे चुके हैं । उन्होंने यह कदम देश में निरंतर बढ़ रहे भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज के तौर पर उठाया है । उनकी मांग है कि सरकार प्रभावी लोकपाल बिल पास कराए और भ्रष्टाचार के विरुद्ध कारगर कदम उठाए । उनको अनेकों सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों का समर्थन मिल रहा है । क्या वजह है कि उन्हें यह कदम उठाना पड़ा है? क्या वजह है कि सरकार खुदबखुद उसके नाक के नीचे घट रहे भ्रष्टाचार पर नजर नहीं डालती है? क्या वजह है कि वे भ्रष्ट व्यक्तियों के विरुद्ध तब तक कदम नहीं उठाती है, जब तक कि जनता सड़क पर नहीं उतरती और उच्चतम न्यायालय घटनाओं को संज्ञान में लेते हुए समुचित आदेश नहीं देती?

मेरी नजर में यह सब इसलिए है क्योंकि इस देश की बागडोर इस समय आज तक के सबसे भ्रष्ट प्रधानमंत्री के हाथ में है । दुर्भाग्य से राजकाज ऐसे व्यक्ति के हाथ में है जो साफ-सुथरी छवि का मुखौटा पहने हुए भ्रष्टाचार को अपने पांव फैलाने दे रहा है । जी हां, मौजूदा प्रधानमंत्री को मैं अभी तक के सभी प्रधानमंत्रियों में भ्रष्टतम मानता हूं । मेरे अपने तर्क हैं । आपको उन तर्कों को सिरे से नकारने की स्वतंत्रता है, ठीक वैसे ही जैसे मुझे उन्हें पेश करने की । यदि आप मेरी बात से आहत हों तो यहीं थमकर आगे की बात पढ़ना बंद कर दें ।  अपनी बात कहना शुरु करूं इसके पहले मैं अभी तक के सभी प्रधानमंत्रियों की सूची प्रस्तुत करता हूं:

भारत के अभी तक के प्रधानमंत्री (अगस्त 1947 – मार्च 2011)

1. पंडित जवाहरलाल नेहरू, 15 अगस्त 1947 – 27 मई 1964, करीब 15 साल 9 महीने [Pundit  Jawaharlal Nehru, 15 Aug. 1947 – 27 May 1964, 15 years 9 months]
*** श्री गुलजारीलाल नंदा, 27 मई 1964 – 9 जून 1964, 14 दिन [Sri Guljarilal Nanda, 27 May 1964 – 9 June 1964, 14 days]
2. श्री लालबहादुर शास्त्री, 9 जून 1964 – 11 जन. 1966, करीब 1 साल 7 महीने [Sri Lal Bahadur Shastri, 9 June 1964 – 11 Jan. 1966, about 1 year 7 months]
*** श्री गुलजारीलाल नंदा, 11 जन. 1966 – 24 जन. 1966, 14 दिन [Sri Guljarilal Nanda, 11 Jan. 1966 – 24 Jan. 1966, 1 4 days]
3. श्रीमती इंदिरा गांधी, 24 जन. 1966 – 24 मार्च 1977, करीब 11 साल 2 महीने [Srimati Indira Gandhi, 24 Jan. 1966 – 24 March 1977, about 11 years 2 months]
4. श्री मोरारजी देसाई, 24 मार्च 1977 – 28 जुलाई 1979, करीब 2 साल 4 महीने [Sri Morarjee Desai, 24 March 1977 – 28 July 1979, about 2 years 4 months]
5. श्री चरण सिंह, 28-7-1979 – 14 जन. 1980, करीब 6 महीने [Sri Charan Singh, 28 July 1979 – 14 Jan. 1980, about 6 months]
3. श्रीमती इंदिरा गांधी, 14 जन. 1980 – 31 अक्टू. 1984, करीब 4 साल 10 महीने [Srimati Indira Gandhi, 14 Jan. 1980 – 31 Oct. 1984, about 4 years 10 months]
6. श्री राजीव गांधी, 31 अक्टू. 1984 – 2 दिस. 1989, करीब 5 साल 1 महीना [Sri Raajiv Gandhi, 31 Oct. 1984 – 2 Dec. 1989, about 5 years 1 month]
7. श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, 2 दिस. 1989 – 10 नव. 1990, करीब 11 महीने [Sri Vishwanath Pratap Singh, 2 Dec. 1989 – 10 Nov. 1990, about 11 months]
8. श्री चंद्रशेखर, 10 नव. 1990 – 21 जून 1991, करीब 7 महीने [Sri Chandrasekhar Singh, 10 Nov. 1990 – 21 June 1991, about 7 months]
9. श्री पी. वी. नरसिम्हाराव, 21 जून 1991 – 16 मई 1996, करीब 4 साल 11 महीने [Sri P. V. Narsimharao, 21 June 1991 – 16 May 1996, about 4 years 11 months]
10. श्री अटल बिहारी बाजपाई, 16 मई 1996 – 1 जून 1996, करीब 17 दिन [Sri Atal Bihari Bajpayee, 16 May 1996 – 1 June 1996, 17 days]
11. श्री एच. डी. देवगौढा 1 जून 1996 – 21 अप्रैल 1997, करीब 11 महीने [Sri H. D. Deve Gauda 1 June 1996 – 21 April 1997, about 11 months]
12. श्री इंदर कुमार गुजराल, 21 अप्रैल 1997 – 19 मार्च 1998, करीब 11 महीने [Sri Inder Kumar Gujral, 21 April 1997 – 19 March 1998, about 11 months]
10. श्री अटल बिहारी बाजपाई, 19-3-1998 – 22 मई 2004, करीब 6 साल 2 महीने [Sri Atal Bihari Bajpayee, 19 March 1998 – 22 May 2004, about 6 years 2 months]
13. श्री मनमोहन सिंह, 22 मई 2004 से पद पर, करीब 6 साल 9 महीने [Sri Manmohan Singh, 22 May 2004 onward, 6 years 9 months completed]

अभी तक कुल 13 प्रधानमंत्रियों का कार्यकाल इस देश ने देखा है । इसके अतिरिक्त श्री गुलजारीलाल नंदा भी इस कुर्सी पर बैठ चुके हैं, किंतु दुर्भाग्य से वे तात्कालिक अवश्यकताओं के कारण दो बार केवल कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर टिक पाए, पहली बार जब पंडित नेहरू का देहावसान हुआ, और दूसरी बार जब शास्त्रीजी की ताशकंद (तत्कालीन सोवियत रूस) में आकस्मिक मृत्यु हुई । दोनों बार वरिष्ठतम राजनेता होने के बावजूद प्रधानमंत्री पद के औपचारिक चुनाव के बाद उन्हें चयनित व्यक्ति के लिए पद छोड़ना पड़ा । इसलिए उन्हें असल प्रधानमंत्रियों की सूची में नहीं गिना जाता है ।

अगर यह सवाल उठे कि इस देश के आज तक के सभी प्रधानमंत्री क्या पूर्णतः ईमानदार रहे हैं, तो मेरा उत्तर ‘नहीं’ में होगा । (आप यदि ऐसा नहीं मानते तो आपको मैं एक सौभाग्यशाली व्यक्ति कहूंगा, क्योंकि ऐसा भ्रम पालकर सुखी रह पाना हर किसी के नसीब में नहीं हो सकता ।) उदाहरण के तौर पर यदि श्रीमती इंदिरा गांधी साफ-सुथरी ही मानी गयी होतीं, तो जयप्रकाशजी को उनके विरुद्ध आंदोलन न छेड़ना पड़ता, उन्हें अपनी गद्दी बचाए रखने के लिए आपात्काल घोषित न करना पड़ता, और कालांतर में (1977 में) कांग्रेस के बदले जनता पार्टी केंद्रीय सत्ता पर काबिज न होती, इत्यादि । यदि उक्त सभी को इमानदारों की श्रेणी में माना जाएं, तब कम भ्रष्ट एवं अधिक भ्रष्ट का सवाल ही नहीं रह जाता है । उसके आगे तुलना में कुछ कहने को रह ही क्या जाता है?

ईमानदार कौन?

‘बेचारे’ गुलजारीलाल जी सही माने में प्रधानमंत्री नहीं बन सके, अन्यथा वे शायद सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री माने जाते । मैं यह बात इस आधार पर कह रहा हूं कि एक कांग्रेसी राजनेता के तौर वे बेहद ईमानदार व्यक्ति कहे जाते थे, सही अर्थों में गांधीवादी और पूरी सादगी के साथ जीवनयापन करने वाले । (उन दिनों मैं कालेज/विश्वविद्यालय स्तर का छात्र हुआ करता था, इसलिए राजनीति की बातों को समझने लगा था ।)

विगत प्रधानमंत्रियों की ईमानदारी के संदर्भ में परस्पर तुलना तभी सार्थक हो सकती है जब उनके कार्यकालों की अवधि पर भी विचार हो । गौर करें कि केंद्र की सत्ता पर लंबे अरसे तक कांग्रेस का ही कब्जा रहा है । कांग्रेस से संबद्ध सभी प्रधानमंत्रियों (क्रमशः पंडित नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी, श्री राजीव गांधी, श्री नरसिम्हाराव, डा. सिंह) ने करीब 5 साल या उससे कहीं अधिक समय तक कुर्सी संभाली है । इतने लंबे अंतराल के प्रधानमंत्रित्व का गैरकांग्रेसी अपवाद एकमात्र बाजपाईजी रहे हैं ।

श्री शास्त्रीजी एवं श्री देसाईजी का कार्यकाल भी बमुश्किल ढाई साल या उससे भी कम रहा है । शेष अर्थात् सर्वश्री चरण सिंह, विश्वनाथ सिंह, चंद्रशेखर, देवगौढा, गुजराल तो साल-साल भर भी नहीं टिक पाए । इन लोगों का कार्यकाल जोड़तोड़ तथा मौके के फायदे से कुर्सी हथियाने और उस पर टिकने की रही है, किंतु सफल कोई नहीं रहा । इनका कार्यकाल इतना छोटा रहा कि उसके आधार पर उनकी ईमानदारी आंकना ही बेमानी है । इनके राजकाज में भ्रष्टाचार की बातें कम रहीं और ‘अब किसकी बारी है, कौन कब लुड़केगा, कौन किसे लंगड़ी मारेगा’ आदि के लिए अधिक जाना जाएगा । अतः भ्रष्टाचार विषयक तुलना के लिए इनके नामों पर विचार का अर्थ नहीं है ।

शास्त्री भी एक ईमानदार व्यक्ति माने जाते थे । ताशकंद में चली ‘भारत-पाक’ समझौते की बैठक में न जाने क्या हुआ कि उनका निधन वहीं हो गया । उनकी मृत्यु रहस्यमयी ही रही है । बेचारे अगर जीवित रहते तो शायद अच्छे प्रधानमंत्री सिद्ध होते । जितना कुछ मुझे याद पड़ता है, उसके अनुसार उन पर शायद ही अंगुली उठाई गयी हो ।

देसाईजी के प्रति मुझे सहानुभूति है । 1977 में जनता दल की सरकार तो बन गयी, किंतु बतौर प्रधानमंत्री देसाईजी टिकाऊ नहीं सिद्ध नहीं हो सके । दरअसल तब चौधरी चरण सिंह और श्री जगजीवन राम असंतुष्ट बने रहे । नेताओं में कुर्सी हथियाने की लालसा परोक्ष रूप से कार्यशील रही और अंत में श्री चरण सिंह ने श्रीमती गांधी की मदद से पद पा लिया, जिस पर श्रीमती गांधी ने उन्हें अधिक दिनों तक टिकने नहीं दिया (श्रीमती गांधी की ईमानदारी!)। बेचारे देसाईजी इतना समय ही न पा सके कि देश का भला-बुरा कुछ कर पाते । बहरहाल यही कह सकता हूं कि वे भ्रष्ट नहीं माने जाते थे ।

भ्रष्टतम प्रधानमंत्री?

अतः भ्रष्टतम का निर्धारण करने के लिए आपके सामने बाजपाई जी के अलावा केवल कांग्रेससंबद्ध प्रधानमंत्री रह जाते हैं । इनमें से किसी को भी पूरी तरह पाकसाफ कहना अनुचित होगा । नेहरू जी के समय भी घोटाले हुए थे ऐसा मेरे ध्यान में है । तब भी वे बदनाम नहीं हुए । श्रीमती गांधी राजनीतिक रूप से साफ नहीं रही हैं, परंतु उनके होते हुए गंभीर आर्थिक घोटाले हुए हों ऐसा शायद ही कोई कहेगा । श्री राजीव गांधी पर घोटाले का दाग सुविख्यात है, और उसी के बल पर श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह कुर्सी पा सके । अपनी कुर्सी बचाने के लिए हथकंडे अपनाने के लिए श्री नरसिम्हाराव भी बदनाम रह चुके हैं । अपने चहेतों को लाभ पहुंचाने के आरोप बाजपाईजी पर भी लगे ही हैं ।

इतना सब होने पर भी एक-से-बढ़कर-एक आर्थिक घोटालों की बात इन सबके कार्यकाल के संदर्भ में नहीं कही जाती है (बोफोर्स घोटाले को छोड़ दें तो) । लेकिन अब डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल की जो तस्वीर साफ हो रही है वह अवश्य ही घबड़ाहट एवं निराशा पैदा करने वाली है । और इसीलिए मैं उन्हें भ्रष्टतम प्रधानमंत्री कहता हूं ।

अपनी बात स्पष्ट करने के लिए मैं अपनी इस मान्यता पर जोर डालना जरूरी समझता हूं कि प्रधानमंत्री की ईमानदारी के लिए वही मापदंड नहीं अपनाए जा सकते हैं जो किसी रिक्शे वाले या सड़क किनारे ठेले पर सामान बेचने वाले या आफिस के चपरासी जैसे आम जनों पर लागू किए जाएं । यह कहना कि मौजूदा प्रधानमंत्री ‘व्यक्तिगत तौर पर’ एक साफ-सुथरे व्यक्ति हैं निरर्थक/बेमानी बात है । ऐसे वक्तव्य शिष्टाचार के नाते दिये जाते हैं । उच्च पदस्थ व्यक्ति के मामले में उसके पद की गरिमा का विचार भी ऐसे में बहुत कुछ कहने से हमें रोकता है ।

डा. मनमोहन सिंह बतौर प्रधानमंत्री

याद रखें कि प्रधानमंत्री पूरे देश के राजकाज को करीने से चलाने के लिए होता है । अगर वह बेईमान लोगों को साथ लेकर चल रहा हो, उनको जो जी में आए उसे करने की छूट देता हो, उनके क्रियाकलापों की समीक्षा करने से कतराता हो, तो उसे साफ नहीं कहा जा सकता है । कोई भी ईमानदार व्यक्ति बेईमान लोगों की शर्तों पर राजकाज चलाने को तैयार नहीं हो सकता है । भ्रष्टाचार बढ़ता जाए, लोग ‘त्राहि माम’ कहने लगें फिर भी प्रधानमंत्री ‘गठबंधन धर्म’ जैसे भ्रामक शब्द बोलकर अपने असली दायित्व से बचते रहें, तब उन्हें ‘स्वच्छ छवि वाला’ कहना निहायत बचकानी बात होगी । क्या होता है ये गठबंधन धर्म? किस धर्मग्रंथ में है इसका जिक्र? किस राजनीतिशास्त्र में लिखा है कि सरकार चलाने के लिए, अपनी कुर्सी बचाए रखने के लिए, हर समझौता स्वीकारा जाना चाहिए? क्या सरकार चलाने का मौलिक उद्येश्य देश के हित साधना है, या राजनीतिक दलों के सिद्धांतहीन गठजोड़ को बनाए रखना, भले ही देश रसातल को चला जाए? एक ईमानदार व्यक्ति अपने दायित्वों के मामले में ढुलमुल रवैया नहीं अपना सकता । लेकिन डा. मनमोहन सिंह का रवैया ऐसा ही अवांछित है ।

मौजूदा प्रधानमंत्री के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के सभी रिकार्ड टूटे हैं, और वे चुप्पी साधे रहे हैं । “ मैं क्या करूं”, “मुझे नहीं मालूम” जैसी बचकानी बातें करके अपना बचाव करते आए हैं । प्रधानमंत्री लाचार तो देश का क्या होगा?

कभी-कभी मुझे लगता है कि डा. सिंह महात्मा गांधी के अनुयायी तो नहीं हैं, परंतु गांधीजी के ‘तीन बंदरों’ के अनुयायी अवश्य हैं । उन बंदरों की तरह भ्रष्टाचार के बारे में वे “न कुछ देखते हैं”, “न कुछ सुनते हैं”, और “न कुछ बोलते हैं” । चुप्पी लगा लो और समय के साथ सब शांत हो जाएगा के सिद्धांत पर वे चलते हैं ।

डा. सिंह कितने ईमानदार हैं इसकी सर्वोत्तम बानगी उनके द्वारा की गयी चीफ विजिलेंस कमिश्नर (सीवीसी) की नियुक्ति का मामला है । जिसकी नियुक्ति हुई उस व्यक्ति पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं और न्यायालय में मामला विचाराधीन है । प्रधानमंत्री लंबे अर्से तक नियुक्ति को उचित ठहराते रहे, जब तक कि उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्ति अवैध घोषित न हो गयी । अब वे गले से न उतरने वाला तर्क देते हैं कि संबंधित अधिकारियों ने उन्हें अंधेरे में रखा । यह तो हास्यास्पद है कि उन्हीं के अधीनस्थों की यह हिम्मत कि उन्हें धोखा दें । ऐसे अधिकारियों को घंटों के भीतर निकाल बाहर किया जाना चाहिए, लेकिन वाह रे अपने लाचार प्रधानमंत्री । किंतु समझ से परे तो यह वाकया है कि नियुक्ति समिति की सदस्या, श्रीमती सुषमा स्वराज (नेता विपक्ष), ने जब मामले की गंभीरता की ओर उनका घ्यान खींचा तो वस्तुस्थिति को ठीक-से जांचने के लिए 24 घंटे का भी समय नहीं लगाया । इसके विपरीत आनन-फानन में नेता विपक्ष को नजरअंदाज करते हुए उन्होंने गलत निर्णय ले ही लिया । आप उसे गलती नहीं कह सकते, क्योंकि उनको गलती का एहसास दिलाया जा रहा था । ऐसा आनन-फानन का निर्णय एक भ्रष्ट व्यक्ति ही ले सकता है

ऊपर का उदाहरण अकेला नहीं हैं । हाल के महीनों में मौजूदा प्रधानमंत्री के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के अनेकों मामले उजागर हुए हैं, और हर मामले में उनकी चुप्पी रहस्यमय रही है । पूर्व संचारमंत्री ए. राजा का ही मामला ले लीजिए, जिनकी शिकायतें उन्हें मिलती रहीं, और वे राजा का बचाव तब तक करते रहे जब तक संभव था । एक ईमानदार प्रधानमंत्री क्या ऐसा कर सकता है ?

देश का दुर्भाग्य है कि इसका शासन एक मूलतः नौकरशाह के हाथ में है । डा. सिंह कि खासियत यह है कि वे कभी जननेता नहीं रहे हैं, उनकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं रही है, वे कभी भी एक सक्रिय नेता की भांति आम लोगों के बीच नहीं रहे हैं, उन्होंने कभी भी आम लोगों की लड़ाई नहीं लड़ी है, और मेरा मानना है कि उनकी प्रतिबद्धता आम लोगों के प्रति कम और नेहरू-गांधी परिवार के प्रति अधिक है । मेरे मत में उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि नौकरशाहों की बिरादरी के प्रति वे अति उदार हैं । वे नहीं चाहेंगे कि कोई नौकरशाह कभी सजा पाए, चाहे वह कितना ही भ्रष्ट हो !

माननीय अन्ना हजारे अनशन पर बैठे हैं । आगे क्या होगा यह कोई ज्योतिषी नहीं बता सकता है । लेकिन यह सुनिश्चित है कि अपने प्रधानमंत्री एड़ी-चोटी का जोर लगायेंगे कि ऐसा लोकपाल बिल पास होवे जो निष्प्रभावी एवं निर्बल हो, ताकि न कोई राजनेता और न ही कोई नौकरशाह जीते-जी दंडित हो सके । वाह, क्या ईमानदारी है ।

भगवान् भरोसे है यह देश ! – योगेन्द्र