चमत्कार-संपन्न देश में सुश्री मायावती की संपदा और गिरेबां में झांकने की बात

राजनेताओं से संबंधित खबरों में एक अहम खबर आजकल सुनने-पढ़ने में आ रही है । खबर है कि उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री एवं ‘दलित-मसीहा’ सुश्री मायावती ने विधान परिषद् के नामांकन के संदर्भ में लगभग 88 करोड़ रुपये की निजी संपदा घोषित की है । इसके पहले 2007 के उपचुनाव के समय उन्होंने 52 करोड़ की संपदा घोषित की थी । (अधिक जानकारी के लिए देखें वेबदुनिया समाचार और यह भी खबर एनडीटीवी) । निःसंदेह ‘सर्वजन समाज की बहिन’ मायावती के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि है । मैं उन्हें बहुशः बधाई देना चाहूंगा । पिछले तीन बर्षों में अपनी संपदा को 52 करोड़ से 88 करोड़ पर पहुंचाने का कार्य हर कोई नहीं कर सकता है, वह भी तब जब दुनिया मंदी के दौर से गुजरी हो और कई लोग अमीरी से कंगाली की ओर लुड़के हों ।

लेकिन कई राजनेता मायावतीजी की इस ‘महान्’ उपलब्धि से चिढ़े हुए हैं और कहते फिर रहे हैं कि उन्होंने यह संपदा गलत-सलत तरीकों से अर्जित की है । मुझे चिढ़ने के दो कारण दिखते हैं: एक तो यह कि वे खुद ‘बहिनजी’ की तरह अपनी संपदा आगे नहीं बढ़ा सके हों; दूसरा यह कि एक दलित का आगे बढ़ना उन्हें जैसे बर्दास्त ही नहीं हो पाता है । अभी हाल ही में ‘टेलीकॉम’ के मामले में अपने केंद्रीय मंत्री ए. राजा पर घोटाले के आरोप लगे तो तमिलनाडु के माननीय (?) मुख्यमंत्री तिरु करुणानिधि ने स्पष्टतः कहा था कि ए. राजा पर आरोप इसलिए लग रहे हैं कि वे एक दलित समाज के व्यक्ति हैं । अपने ‘अति साफ-सुथरे’ प्रधानमंत्री डा. श्री मनमोहन सिंह ने भी सीधे मान लिया कि ए. राजा जैसा ‘क्लीन’ व्यक्ति तो केवल दलितों में ही बचे रह गये हैं । तब मायावती जी पर भी आरोप लग रहे हैं तो इसीलिए न कि वे भी दलित हैं ? और आरोप लगाने वालों में आगे कौन है ? कभी ‘मौलाना’ उपाधि से विभूषित अपने माननीय मुलायम सिंह जी – बहिनजी के धुर विरोधी । ऐसा विरोधी उन पर झूठे आरोप लगाने के अतिरिक्त और कर ही क्या सकता है ?

सुश्री मायावती ने अपनी संपदा का राज भी स्पष्ट किया है । वे सदा से कहती आई हैं कि उन्हें अपनी गरीब जनता से उपहार मिलते रहे हैं । भले ही हरेक का उपहार नगण्य हो, फिर भी सबके उपहार मिलकर करोड़ क्या अरब की राशि बना सकते हैं । बूंद-बूंद से घड़ा भरता है । अगर एक गरीब भी अपने ‘चहेते’ राजनेता को 10 रुपये की भेंट चढ़ाये (जैसे मंदिरों में चढ़ाते हैं), तो 5 करोड़ लोग मिलकर ‘चहेते’ को 50 करोड़ का मालिक बना ही सकते हैं । उत्तर प्रदेश जैसे देश के विशालतम राज्य, जिसकी जनसंख्या 17-18 अठारह करोड़ हो वहां ‘बहिनजी’ को चाहने वाले क्या 5 करोड़ गरीब भी नहीं होंगे क्या ? आखिर उन्हीं लोगों के नाम पर तो उनकी ‘बसपा’ प्रदेश पर सुशासन (कुशासन?) चला रही है । यह भी सोचें कि भला आज के जमाने में 10 रुपया होता ही क्या है – 700 ग्राम आटे की कीमत । एक गरीब भी 10 रुपये के बजाय 20 रुपया देना चाहेगा; उसकी भी तो कुछ इज्जत है, शायद उन राजनेताओं से अधिक जो उनको भूखा मरते देख सकते हैं, लेकिन अपनी तिजोरी भरने से बाज नहीं आ सकते हैं । आखिर राजनीति में कोई आता ही क्यों है ? समाजसेवा के लिए या आत्मसेवा के लिए ? आप यह भी पूछेंगे कि संपन्न राजनेता को भेंट क्यों चढ़ाएगा कोई ? उत्तर आप ही दीजिए, सर्वप्रकारेण समर्थ एवं संपन्न देवी-देवताओं को भेंट क्यों चढ़ाता है कोई ?

मायावतीजी दावा करती है कि उनकी तिजोरी में साफ-सुथरा धन है । फिर भी वे चुनौती देती हैं अपने विरोधियों को । (देखें इस स्थल पर) वे कुछ यों कहती हैं, “आप अपने गिरेबां में झांकिये । क्या आपकी कमाई दागदार नहीं है ? और अगर मेरी कमाई में भी कुछ खोब् हो – दाग हरगिज नहीं है, फिर भी यदि किसी को दाग दिखे – तो गलत क्या है ? उन लोगों ने ही संपदा कौन-से साफ-सुथरे तरीके से कमाई है ?” उनका आशय साफ है, राजनीति में आने के बाद गरीबी से अमीरी के पायदान चढ़ने वाले लोग तरह-तरह के हथकंडे अपनाते रहे हैं, और अगर उन्होंने भी कोई ‘तरीका’ अपनाया हो तो बुराई क्या है ? हर कोई तो धन कमाता है, कोई ईंटा ढोकर, तो कोई कमिशन खाकर, और कोई स्वयं अपने ही लिए मोटी तनख्वाह और भत्तों की मंजूरी का इंतजाम करके ।

मुझे सुश्री मायावती से पूरी सहानुभूति है । उन्हें खाहमखाह बदनाम किया जा रहा है । मैं तो यह मानता हूं इस देश में हर किसी का अकूत धन जायज ही होता है । अगर ऐसा न होता तो आज तक आयकर विभाग या सीबीआई जैसी सरकारी संस्थाएं इन लोगों को आर्थिक अपराधी घोषित कर चुकी होतीं । ये संस्थाएं वर्षों माथापच्ची करती हैं, फिर भी किसी का भी अर्जित धन गलत नहीं पाती हैं । तब फिर आरोप क्यों लगाया जाता है किसी पर ?

जहां तो उपार्जित धन के स्रोत का सवाल है उसकी जानकारी कोई भला कैसे दे सकता है ? अगर किसी के घर में ईश्वर छप्पर फाड़कर धनवर्षा कर दें तो उसे कैसे गलत कहा जाएगा ? अपना ‘महान्’ देश चमत्कारों का देश है । कोई नहीं कह सकता कि यहां कब दैवी शक्तियां खुश होकर आपको मालामाल कर दें और कब कुपित होकर कंगाल बना दें । यहां कोई हवा से भभूत खींच के पेश कर सकता है, तो कोई सोने की घड़ी ला सकता है; कोई मरणासन्न केंसर-रोगी को सेकंड में चंगा कर सकता है, तो कोई आपके जेब के नोटों को दूना कर सकता है । यहां मूर्तियां कभी आंसू बहाती हैं और कभी दूध पी जाती हैं ।

ऐसे चमत्कारमय देश में कोई कब अमीर हो जाय और कब गरीब भला कौन जाने । कल्पना कीजिए कि कोई अपने खाली मकान पर ताले लटकाकर बाहर चला जाए और लौटने पर अपने घर को नोटों और सोने-जवाहरात से भरा पाए तो उसका भला क्या दोष ? मुझे याद आते हैं हिमाचल प्रदेश के एक कांग्रेसी राजनेता, माननीय श्री सुखराम जी, जिनके घर कई साल पहले 4 करोड़ रुपया किसी जांच एजेंसी को मिला था । स्रोत के बारे में नेताजी का कहना था कि पता नहीं वह पैसा उनके घर में कहां से आ गया । अवश्य ही वह दैवी घटना रही होगी, क्योंकि कोई मरणशील मानव अपना पैसा दूसरे के घर में जादुई तरीके से नहीं रख सकता । जांच एजेंसी ने उस पैसे के प्रति अज्ञानता के उनके स्पष्टीकरण को आराम से स्वीकार भी कर लिया था । भला दैवी चमत्कारों पर किसका बस चल सकता है ?

दैवी चमत्कारों का इस देश पर अकल्पनीय प्रभाव है ऐसा मुझे लगता है । एक वैज्ञानिक के नाते मैं इन चमत्कारों में विश्वास नहीं करता, किंतु देशवासियों की आस्था अटूट है इसे तो महसूस करता ही हूं । यही कारण है कि यहां सब कुछ चामत्कारिक तरीके से घटित होता है । यहां अपराध होते हैं, लेकिन कोई राजनेता अपराधी सिद्ध नहीं होता । बड़े हादसे होते हैं, किंतु कोई उच्चपदस्थ अधिकारी जिम्मेदार नहीं पाया जाता । बड़े-बड़े आर्थिक घोटाले होते हैं, किंतु शासन-प्रशासन में कोई जिम्मेवार नहीं ठहराया जाता । आखिर यह सब चमत्कार ही तो है ! किसी नेता को चुनाव में जीत हासिल करनी हो तो वह ‘कामाक्षा’ मंदिर में बकरे की वलि देता है, या ‘विंध्यवासिनी’ मंदिर में देवी पूजा करवाता है, अथवा घर पर हवन-यज्ञ करता है । क्यों ? इसी उम्मीद में न कि उसका प्रयोजन सिद्ध होगा ? यह बात क्रिकेट-जगत् पर भी लागू होती है; वर्ल्ड-कप हासिल करने के लिए भी पूजा-पाठ का सहारा लिया जाता है । इम्तिहान में असफल होने के डर से पीड़ित छात्र भी दैवी शक्तियों की शरण में चला जाता है । चमत्कार घटने की उम्मीद प्रायः सभी को रहती है ।

और इन्हीं विचारों के अनुरूप मुझे सुश्री मायावती तथा श्री मुलायम सिंह सरीखे अनगिनत राजनेताओं, डा. केतन देसाई जैसे उच्चपदस्थ निदेशकों, कुलपतियों, केंद्र/राज्य सचिवों आदि की अकूत धनसंपदा के पीछे दैवी चमत्कार ही कारण समझ में आता है । उन पर सवाल उठाना ही फिजूल है ।

इन दैवी चमत्कारों के बावजूद दो बातें मेरी समझ से परे हैं:-

1) स्वयं को दलितों एवं गरीबों की रहनुमा बताने वाली मायावतीजी, उनसे उपहार लेकर अपनी तिजोरी भरने की इच्छा क्यों रखती आई हैं ? और अगर उनसे कुछ ले भी लिया तो क्यों नहीं वे उन गरीबों के भले पर ही उस धन को खर्च करके उदारता का परिचय देती हैं ?

2) दूसरी अधिक अहम बात यह है कि सुश्री मायावती भगवान् बुद्ध में अतुलनीय आस्था का दावा करती हैं । बुद्ध के नाम पर वह अनेकों योजनाओं की बातें करती हैं । लेकिन यह कैसे भूल जाती हैं कि बुद्ध ने येनकेन प्रकारेण सत्ता हथियाने और मुख्यमंत्री की कुर्सी से उछलकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पाने का उपदेश कभी भी नहीं दिया था । अधिकाधिक धनसंपदा जमा करने का विचार तो बुद्ध-अनुयायी के लिए वर्जित है । बुद्धभक्त से तो यही अपेक्षा रहती है कि सबको अपने समान देखे और स्वयं को उनके ऊपर देखने का पाप न करे । बुद्ध के किन उपदेशों को बहिनजी ने अपने जीवन में अपनाया है ?

मानव व्यवहार प्रायः विसंगतियों से ग्रस्त होता है । इसीलिए यहां उल्टा-सीधा सब कुछ देखने को मिलता है । ऐसे में गिरेबां में झांकने की बात बेमानी है ।योगेन्द्र जोशी