क्या नेरेन्द्र मोदी फिर से प्रधान मंत्री बनेंगे? लगता तो ऐसा ही है!  

आगे बढ़ने से पहले एक बात स्पष्ट कर दूं —

मैं वाराणसी का वरिष्ठ (उम्र 70+) मतदाता हूं। मतदान छोड़ता नहीं किंतु किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करता, मोदीजी के पक्ष में भी नहीं। दरअसल मैं नोटा का प्रबल पक्षधर हूं और उसकी वकालत करता हूं। मैंने एक वयस्क नागरिक के रूप में 1969 और उसके बाद के चुनाव देखे हैं और पिछले दो-तीन दशकों से लोकतांत्रिक प्रणाली में गंभीर और तेजी से गिरावट महसूस करने लगा हूं। फलतः लोकतंत्र के मौजूदा मॉडल से मेरा मोहभंग हो चुका है। किस-किस तरीके की गिरावट देख रहा हूं इसका विवरण मैं यहां नहीं दे सकता, क्योंकि इस आलेख का विषय वह नहीं है।

मैंने पिछले कुछ दिनों जिज्ञासावश यह जानने-समझने की कोशिश की कि मोदीजी के सत्ता में लौटने की संभावना कितनी है। मेरा अनुमान या आकलन अलग-अलग मौकों तथा स्थानों पर आम लोगों से हुई बातों पर आधारित है। मेरी बात बमुश्किल 10-15 लोगों से हुई होगी, जो सांख्यिकीय (statistical) दृष्टि से अपर्याप्त है। फिर भी मुझे जो लगा वह कुछ हद तक माने तो रखता ही है।

मैं अपने अनुभवों को कालक्रमबद्ध (chronological order) तरीके से पेश कर रहा हूं —

(1)

दो-ढाई महीने पहले मेरे पड़ोस में एक सज्जन ने अपने नये मकान में प्रवेश किया। उस अवसर पर उन्होंने गृह-प्रवेश के पारंपरिक पूजा-सह-भोज का आयोजन किया था, जिसमें मुझे भी आमंत्रित किया गया था। उस मौके पर उनके परिवारी जनों के अलावा गांव से भी कुछ लोग आये हुए थे। उनके यहां बैठे हुए कुछ लोगों के बीच राजनीति और आगामी लोकसभा चुनावों की चर्चा हो रही थी। मैं उन लोगों की बातों को ध्यान से सुन रहा था। सभी एक बात पर सहमत दिखे, वह यह कि लोग (यानी विपक्ष के लोग) बिलावजह मोदीजी के पीछे पड़े हैं। मोदीजी को चुनाव जीतना चाहिए। मैंने सुनिश्चित करने के लिए किसी एक से पूछ लिया, “लगता है आप लोग मोदीजी को वोट देने की सोच रहे हैं। आपके गांव में क्या मोदीजी के पक्ष में माहौल है?”

उत्तर था, “हां लगभग सभी इसी मत के हैं”। उन लोगों से बातें तो काफी विस्तार से हुईं किंतु उतना सब मुझे न याद है और न उतना सब प्रस्तुत करने की जरूरत है।

(2)

विगत जनवरी के अंतिम सप्ताह में मेरी पत्नी एवं मैं लखनऊ गए थे एक वैवाहिक समारोह में सम्मिलित होने के लिए। पहले दिन वैवाहिक कार्यक्रम-स्थल पर रेलवे स्टेशन से जाने और दूसरे दिन वापस स्टेशन आने के लिए हमने ऊबर (Uber) टैक्सी-सेवा का प्रयोग किया था। रास्ते की एकरसता से बचने के लिए दोनों बार हमने संबंधित टैक्सी-चालक से बातचीत की और स्वाभाविक तौर पर प्रासंगिक विषय – चुनावों – की चर्चा की। चर्चा मोदीजी के दुबारा प्रधानमंत्री बनने परकेंद्रित थी। वे दोनों मोदीजी के प्रबल समर्थक निकले। वे कह रहे थे “मोदीजी जो कर रहे ठीक कर रहे हैं। उनकी योजनाओं का लाभ तुरंत लोगों को मिले यह हो नहीं सकता, कुछ समय लगेगा ही। लोगों को धैर्य रखना चाहिए।”

वे मोदीजी की ईमानदारी एवं नीयत के क़ायल थे। इस बात पर दोनों का ही जोर था कि मोदीजी अपने घर-परिवार के लिए तो वह सब नहीं कर रहे हैं जो कि आजकल सभी दलों के मुखिया कर रहे हैं।

दिलचस्प बात यह रही कि रात्रि द्वीतीय प्रहर में जब हम वाराणसी वापस पहुंचे और ऑटो-रिक्शा से अपने घर वापस आने लगे तो ऑटो-चालक की मोदीजी के बारे में कमोबेश वही राय थी जो लखनऊ के टैक्सी चालकों की थी। उनके विचार रखने और शब्दों के चयन में फर्क स्वाभाविक था। कुल मिलाकर हमें लगा कि वे मोदीजी की कार्यप्रणाली ठीक बता रहे थे और उनकी सत्ता में वापसी के प्रति आश्वस्त थे।

(3)

(वाराणसी) उक्त घटना के दो-तीन रोज के बाद मैं अपने दर्जी के पास से कपड़े लेने गया। दर्जी महोदय उस समय खास व्यस्त नहीं थे और कोई अन्य ग्राहक उस समय वहां नहीं था। ऐसे मौकों पर मैं दुकानदार से थोड़ी-बहुत गपशप भी कर लेता हूं। उसी रौ में मैंने दर्जी से चुनाव की बात छेड़ी और पूछा, “इस बार किसको जिता रहे हैं वाराणसी से?” (मोदीजी का निर्वाचन क्षेत्र था 2014 में; और इस बार भी रहेगा ऐसी उम्मीद है।)

जवाब सीधा एवं सपाट था, “मोदीजी जीतेंगे और फिर से प्रधान मंत्री बनेंगे।”

“लेकिन मोदीजी पर विपक्ष बुरी तरह हमलावर है जो कहता है कि नोटबंदी तथा जीएसटी (GST) ने व्यापार चौपट कर दिया और श्रमिक बेरोजगार हो गए, इत्यादि-इत्यादि।” मैंने विपक्ष का तर्क सामने रखा।

“देखिए आरोप लगाना तो विपक्ष की मजबूरी है। लेकिन नोटबंदी एवं जीएसटी से कुछ समय परेशानी अवश्य हुई होगी। परंतु यह भी समझिए कि दीर्घकालिक देशहित के लिए कष्ट तो सहना ही पड़ेगा। … सबसे बड़ी बात यह है कि मोदीजी यह सब अपने परिवार के लिए, भाई-बंधुओं के लिए नहीं कर रहे न? उनके परिवारीजन अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं और मोदीजी से किसी प्रकार का लाभ लेने की नहीं सोचते हैं। ये राजनेता तो सबसे पहले अपना घर भरते हैं। देखिए कुछ तो विधानसभा, लोकसभा में सबसे पहले अपने भाई-बहनों, चाचा-भतीजों को ही पहुंचाते हैं। ठीक है क्या? मोदी ऐसा तो नहीं करते न?”

दर्जी महोदय राजनीतिक तौर पर काफी सजग थे और वस्तुस्थिति का ठीक-ठीक आकलन करने की कोशिश कर रहे थे।

(4)

फ़रवरी माह के अंतिम और मार्च के प्रथम सप्ताह हम राजस्थान भ्रमण पर निकले थे। हम दोनों को मिलाकर कुल छ: जने थे, सब के सब वरिष्ठ नागरिक। चुनाव की बात करना हम वहां भी नहीं भूले। जैसलमेर में मेरी पत्नी और मैं मिठाई की एक दुकान में गये। जैसा मुझे याद है दुकान के बोर्ड पर लिखा था “पालीवाल मिष्ठान्न”. खरीद-फरोख्त के साथ थोड़ी-बहुत बात भी हो गई। “इस बार केन्द्र में किसकी सरकार बनवा रहे हैं?” हमने सवाल पूछा।

दुकान के मालिक का त्वरित उत्तर था, “मोदीजी वापस आएंगे। और भला है ही कौन? ये लोग मिलकर सरकार चला पाएंगे?”

“लगता है आप मोदी के प्रबल समर्थक हैं।” हमने टिप्पणी की।

उन सज्जन का सीधा उत्तर था “हम तो भाजपा वाले हैं, वोट उसी को देंगे।”

बातचीत के बाद हम आगे बढ़ गए। एक फल वाले के ठेले पर हम रुक गए कुछ फल खरीदने के लिए। फल वाले से यों ही पूछ लिया, “कुछ ही दिनों में देश में चुनाव होने हैं। चुनाव में दिलचस्पी लेते हैं कि नहीं?”

फल वाले ने कहा, “दिलचस्पी क्यों नहीं लेंगे भला? वोट भी डालेंगे; देश के भविष्य से जुड़ा है चुनाव तो।”

“आप लोगों ने तो पिछले प्रादेशिक चुनावों में कांग्रेस के पक्ष में वोट डाला था। इस बार भी कांग्रेस के प्रत्याशी को वोट देंगे न?” हमने टिप्पणी की।

“तब वसुंधराजी से नाखुशी थी प्रदेशवासियों को, किंतु मोदीजी से नहीं। इस बार उन्हीं के पक्ष में वोट पड़ेंगे।

(5)

राजस्थान पर्यटन के दौरान हम जोधपुर भी गये थे। वहां मैं इस विषय पर अधिक लोगों से बातचीत नहीं कर पाया। परंतु एक व्यक्ति, जो कपड़ों की सिलाई की दुकान चला रहे थे, और उनके साथी से बातें अवश्य हुईं। उनकी दुकान स्टेशन के सामने की सड़क पर 300-400 मीटर की दूरी पर थी। वहां मुझे ऐसे सज्जन मिले जो मोदीजी के घोर विरोधी थे। नोटबंदी एवं जीएसटी (GST) को लेकर वे गुस्से में थे और कह रहे थे कि मोदी ने गरीबों की रोजी-रोटी छीन दी। ऐसा इलजाम विपक्ष लगाता ही रहा है।

उन सज्जन ने मुझसे मेरा परिचय जानना चाहा । बदले में मैंने भी उनसे उनका परिचय ले लिया। संयोग की रही कि उनका जातिनाम भी मोदी ही था। मेरी आम धारणा यह रही है कि अधिकतर भारतीय अपनी जाति के लोगों के प्रति कोमल भाव रखते हैं। लेकिन यहां पर उल्टा ही हो रहा था।

जैसलमेर एवं जोधपुर में हम लोगों को मरुभूमि के रेतीले टीलों (sand dunes) पर जीप से घूमने का मौका मिला (वहां का प्रमुख आकर्षण)। दोनों ही बार हमें मोदी-विरोध सुनने को मिला। उन जीप-चालकों से अधिक बातें करने पर पता चला कि वे मुस्लिम समुदाय से हैं। हमने महसूस किया कि धार्मिक पृष्ठ्भूमि मोदीजी के संदर्भ में अहमियत रखती है। ऐसा अनुभव अन्यत्र भी हमें हुआ।

(6)

हम लोग जयपुर भी घूमने गए थे। वहां मुझे चुनावों के बारे में किसी से बातें करने का मौका नहीं मिला। जयपुर के दर्शनीय स्थलों को दिखाने वाले टैक्सी-चालक से अवश्य बातें हुईं। उसने बताया कि मिर्जापुर (या सोनभद्र, याद नहीं) में उसकी ससुराल है और वाराणसी से खास लगाव रखता है। उसने मोदीजी के पक्ष में ही अपनी राय रखी। संयोग से वह हिन्दू निकला।

(7)

(वापस वाराणसी) एक दिन मैं वाराणसी में अपने घर से बमुश्किल तीन-चार सौ मीटर दूर  प्रातः से दोपहर तक लगने वाली सट्टी में फल-सब्जी खरीदने गया। (सट्टी = थोक एवं फुटकर फलों एवं सब्जियों का बाजार।) मैं वर्षों से हफ़्ते में दो-तीन बार इस कार्य के लिए जाया करता हूं। कुछ फुटकर विक्रेताओं से मेरा अच्छा-खासा परिचय है और मैं उनसे आम ग्राहकों की तरह पेश नहीं आता, बल्कि उनसे थोड़ी-बहुत गुफ्तगू भी कर लेता हूं। उन्हीं में से एक से मैंने पूछ लिया, “कहिए, आपके ’मोदीजी’ के क्या हाल हैं? इस बार भी सरकार बना पाएंगे क्या?”

प्रत्युत्तर में उसने मुझसे ही सवाल कर दिया, ” आप ही बताइए किसको वोट दें? विकल्प कहां है? विपक्ष के नेता मिलकर सरकार बना पाएंगे क्या? बना भी लें तो चला पाएंगे? कितनी टिकाऊ होगी उनकी सरकार? सबके आपने-अपने स्वार्थ हैं।”

सब्जी विक्रेता की बातों में स्पष्ट संकेत था। मोदीजी को वोट न दें तो किसे दें?

निष्कर्ष –

अब चुनाव घोषित हो चुके हैं, दलों की घोषणाएं मतदाताओं को सुनने को मिल रही हैं। कांग्रेस गरीबों को 72 हजार रुपये सालाना देने का वादा कर रही है। ऐसे वादे मरदाताओं के विचार बदल सकते हैं। परिस्थितियां बदलने पर चुनाव के परिणाम भी बदलेंगे ही।

फिर भी मुझे लगता है कि कांग्रेस पार्टी पर्याप्त सीटें नहीं जीत पाएगी। कोई चमत्कार हो जाए तो बात अलग है। अन्य दलों का देशव्यापी जनाधार है नहीं। प्रायः सभी क्षेत्रीय (या एक प्रकार से क्षेत्रीय) दल हैं। उनमें परस्पर स्थायी सहमति एवं एकता दिखाई नहीं देती। भविष्य में सहमति बन पाएगी क्या? मुझे लगता है मोदीजी सत्ता में लौटेंगे। हो सकता है रा.लो.ग. (NDA) को बहुमत न मिले, फिर भी जोड़तोड़ करके सरकार बना ली जाएगी।

अवश्य ही मोदीजी की सत्ता में वापसी को कुछ लोग देश का दुर्भाग्य कहेंगे। – योगेन्द्र जोशी

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सावधान, महाराजाधिराज पधार रहे हैं! तीन बार स्थगित हो चुका प्रधानमंत्री का वाराणसी आगमन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी बीते 16 जुलाई अपने संसदीय क्षेत्र (अर्थात मेरे नगर) वाराणसी आने वाले थे । ऐन वक्त पर उनका आगमन निरस्त हो गया । कारण बताया जाता है कि रेलवे की औद्यागिक संस्था डी.एल.डब्ल्यू. (डीजल लोकोमोटिव वर्क्स) यानी डि.रे.का. (डीजल रेल कारखाना) में मोदीजी के संबोधन के लिए बनाए गए विशाल पंडाल की सजावट में लगे किसी श्रमिक की दुर्घटनावश मृत्यु हो गई । शायद यह वास्तविक कारण रहा हो । कुछ ऐसी ही एक दुर्घटना दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल की रैली में पहले कभी हुई थी । रैली चलती रही और बाद में केजरीवाल की काफी आलोचना हुई थी । ऐसे मातमी माहौल में भाषणबाजी करने पर मोदीजी की भी आलोचना होती अवश्य । मोदी जी के दौरों के बारे में जानकारी यहां और यहां प्राप्य है ।

मोदी जी विगत कुछ महीनों से वाराणसी नहीं आ पा रहे हैं । उन्हें विगत 16 जुलाई अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी आना था । इस बार प्रस्तावित उनके विविध कार्यक्रमों में से एक था काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बी.एच.यू.) चिकित्सा संस्थान के नियंत्रण में चलने वाले ‘ट्रॉमा सेंटर’ का उद्घाटन । आधुनिक एवं उन्नत दर्जे का यह ‘अभिघात केंद्र’ पूर्वी उत्तर प्रदेश में अपने किस्म की प्रथम चिकित्सकीय व्यवस्था है । मोदी जी को अपने गोद लिए गांव, जयापुर, भी जाना था । संयोग कहिए या दुर्योग, कि उक्त तारीख की पूर्व रात्रि जो बारिश आंरभ हुई वह अगले दिन (16 तारीख) डेड़-दो बजे तक चलती रही । इस बारिश की बजह से डीएलडब्ल्यु परिसर में बनाये गए विशाल पंडाल की स्थिति दयनीय हो गई । मोदी जी को सुनने के लिए कीचड़मय पंडाल के नीचे भीड जुट भी पायेगी इसमें शंका होने के कारण मोदी जी का वाराणसी दौरा निरस्त कर दिया गया । लेकिन कहा यही जाता है पानी से भीगे पंडाल में बिजली का कंरेंट लगने से वहां कार्य कर रहे एक मजदूर की मृत्यु हो गयी । असली कारण क्या रहा होगा यह प्रशासन ही बता सकती है ।

असल में मोदी जी को पिछले माह 28 जून को वाराणसी आना था । तब भी ऐन मौके पर अतिवृष्टि के कारएा उनका वाराणसी दौरा रद किया गया था । इस माह के 16 जुलाई का दौरा उसी रद दौरे के ऐवज में था, और वह भी फलित नहीं हो सका । अब फिर भविष्य में किसी दिन उनके आने का कार्यक्रम होगा । इस पावस ऋतु में उनका भावी दौरा फिर से निरस्त हो जाए तो आश्चर्य नहीं होगा । दोनों ही तारीखों पर अतिवृष्टि के कारण उनके दौरे निरस्त करने पड़े थे । संयोग देखिए उक्त तारीखों के आगे-पीछे कोई खास बारिश नहीं हुई । असल में 16 तारीख की दोपहर बारह-एक बजे तक पानी बरसना बंद हो चुका था, लेकिन तब तक उनका कार्यक्रम निरस्त घोषित हो चुका था । कल 22 तारीख थी और मेरे इलाके में 16 के बाद तब तक  पानी ही नहीं बरसा । शहर में हो सकता है कहीं थोड़े-बहुत छीटे पड़े होंगे ।

यह भी उल्लेखनीय है कि 12 अक्टूबर 2014 को भी मोदी जी का दौरा होना था । तब देश के पूर्वी समुद्र तट पर आए हुदहुद तूफान के कारण यहां का मौसम खराब हो गया था और उनका आगमन नहीं हो पाया । इस प्रकार हाल में उनके तीन प्रस्तावित वाराणसी-दौरे निरस्त हुए । इस अंतराल में वे 11 नवंबर एवं 25 दिसंबर को वाराणसी आए थे लेकिन तब तक बी.एच.यू. स्थित अभिघात केंद्र (ट्रॉमा सेंटर) का कार्य पूरा नहीं हो सका था ।

अखबार में छपी खबर के अनुसार जिन निरस्त दौरों का जिक्र ऊपर किमोदी के वाराणसी दौरेया गया है उन पर 30-35 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं । बात सही होनी चाहिए । कहा जा रहा है कि डी.एल.डब्ल्यू में विशाल पंडाल खड़ा करने में 9 करोड़ की लागत आई । उस पंडाल में विदेशी वाटरप्रूफ कनात-शामियाना इस्तेमाल हुआ था ऐसा सुना जाता है ।

मैं समझ नहीं पाता कि मोदी जी के दौरे पर इतनी विशाल राशि खर्चने की क्यों आवश्यकता है । यह सब उस मोदी जी के लिए जो दावा करते हैं कि उन्होंने गरीबी देखी है, वे गरीब परिवार में पले-बढ़े हैं । क्या बचपन की गरीबी के कारण अब वे शानोशौकत, दिखावा, तामझाम के शौकीन हो चले हैं । उनकी सुरक्षा मात्र पर तो यह राशि खर्च नहीं हो रही होगी ऐसा मेरा सोचना है । अगर सुरक्षा का इतना बड़ा सवाल है तो उन्हें वाराणसी आना ही नहीं चाहिए । बरसात के मौसम में जलजमाव होना सामान्य बात है । ऐसे में यह दौरा बरसात में रखा भी नहीं जाना चाहिए था ।

गरीबी और गरीबों की बात करने वाले मोदी जी को समझना चाहिए कि इतनी बड़ी राशि में कई गरीबों का भला हो सकता है । उन्होंने अपना दौरा सादगी के संदेश के साथ संपन्न करना चाहिए था । लेकिन अब वे गरीब कहां जो उसका दर्द समझें ।

मोदी जी के दौरे पर धन का अपव्यय तो होता ही है, साथ में आम जनता को दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं । दिक्कतों का अनुभव स्वयं मुझे हुआ है । बीते नवंबर में मेरे एक मित्र सपत्नीक भोपाल से आए थे । संयोग से उनके रेलगाड़ी से लौटने की तारीख वही थी जब मोदी जी का यहां कार्यक्रम चल रहा था । मेरे घर के पास के मुख्य मार्ग, बी.एच.यू.-डी.एल.डब्ल्यू. सड़क, पर वाहनों का आवागमन ठप था । आटोरिक्शा की दिक्कत हो सकती है इसका अंदाजा मुझे था । मैंने प्रातःकाल ही पास के चौराहे पर जाकर आटोरिक्शा वालों से समाधान पुछा था । तब उन्होंने बताया कि मुख्य मार्ग पर तो वाहन खड़े मिलेंगे नहीं, परंतु गलीकूचों के भीतर जरूर खड़े रहेंगे और आपको कोई न कोई मिल ही जाएगा । उस दिन स्टेशन जाने के लिए मैंने कोई छेड़-दो घंटे का अतिरिक्त समय निर्धारित कर रखा था । जब समय आने पर मैंने आटोरिक्शे खोजे जो कहीं कोई नहीं दिखा । इससे तनाव बढ़ा कि 10 कि.मी. दूर स्टेशन कैसे जाया जाए । तभी ध्यान में आया कि मेरे पासपड़ोस में रहने वाले और आटोट्रॉली से सामान ढोने का धंधा करने वाले कुछ मदद कर सकेंगे । संयोग से उस समय एक नौजवान घर पर मिल गया । उसकी मदद से मित्र को गली-कूचों से होते हुए स्टेशन तक छोड़ पाना संभव हो सका ।

दूसरा अनुभव बीते दिसंबर माह के 25 तारीख का है जब मेरे बेटा-बहू विदेश से वाराणसी आए हुए थे । वे मात्र 5-6 दिन के संक्षिप्त अंतराल के लिए यहां आए थे और अपना कार्यक्रम पहले से तय किए हुए थे । उस दिन आटोरिक्शा से उन्हें कहीं निकलना था । वाहन न मिलने के कारण उन्हें पैदल ही गंतव्य तक जाना पड़ा ।

और तीसरा अनुभव बीते 15 तारीख का है जब मोदी के 16 तारीख के आगमन की तैयारी चल रही थी । मुझे उस दिन कार्यवशात् लंका जाना पड़ा था । बी.एच.यू. प्रवेशद्वार के आसपास का इलाका लंका कहलाता है । यहीं से बी.एच.यू.-डी.एल.डब्ल्यू. मार्ग आरंभ होता है । मैं लंका पहुंच तो गया, किंतु कालांतर में जब लौटने लगा तो देखा कि विश्वविद्यालय प्रवेशद्वार के आसपास जबरदस्त जाम लगा है । जाम की समस्या तो वाराणसी में रहती ही है, लेकिन यह जाम पुलिस के 20-30 जीपों के कारण था जो अगले दिन मोदी जी की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम के चक्कर में नगरवासियों के लिए आफत पैदा किए हुए थे । गनीमत थी कि मैं साइकिल से गया था । उस जाम से साइकिल घसीटते हुए अगल-अगल के गली-कूचों से होकर मैं किसी तरह बी.एच.यू. परिसर में पहुंचा और वहां से लंबा रास्ता लेते हुए घर पहुंचा । लंका से आने में सामान्यतः जहां दसएक मिनट लगते हैं वहां इस बार आधे घंटे से अधिक का समय मुझे लगा ।

लोग लोकतंत्र के प्रशंसा-गीत गाते रहते हैं कि इसमें सभी नागरिक बराबर होते हैं । अवश्य ही मतदान के समय सभी बराबर होते हैं । सभी लाइन में लगते हैं और नंबर आने पर ही मत डालते हैं । मेरी जानकारी में विशिष्ट/अतिविशिष्ट जन भी उसी लाइन में लगते हैं । किंतु वोट डालने के बाद गैरबराबरी वापस लौट आती है । चुने गये राजनेता आम आदमी नहीं रह जाते हैं । उनके लिए सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ विशेष होता है जिनको पाने का सपना भी आम आदमी नहीं देख सकता ।

मैं अपने देश के लोकतंत्र को निर्वाचित राजशाही कहता हूं । लंबे अरसे से चले आ रही राजशाही विश्व में अब कम ही रह गए हैं । लगभग सभी प्रतीकात्मक रह गए हैं जिसमें राजा/रानी  की सक्रियता नहीं के बराबर होती है । वे सामान्यतः वंशानुगत होते थे, अर्थात राजा/रानी के बाद उनके बेटे-बेटियां सत्ता संभालती थीं/हैं । हमारे देश में ऐसा राजतंत्र अब रहा नहीं । लेकिन इस देश में लोकतंत्र ने जो स्वरूप धारण किया हुआ है वह राजशाही का ही बदला स्वरूप है, नया अवतार है । इस नये राजतंत्र में राजा जनता के मतों के आधार पर चुना जाता है, एक बार में केवल 5 साल के लिए । जो चुनकर गद्दी हासिल कर लेता है वह राजा हो जाता है विशेष अधिकारों से सुसंपन्न । एक प्रकार से देखा जाए तो वह मनमरजी से राजकाज कर सकता है । पूरी व्यवस्था उसके हाथ में होती है । अगर वह अपनी पुलिस को कहे कि अपराधी को पकड़ो तो वह पकड़ेगी, अगर कहे कि उसे छूना मत तो नहीं छुएगी । वह निरपराध को जेल में डाल सकता है, जिसे यह भ्रम हो सकता है कि कानून उसे बचाएगा, यह भूलते हुए कि पूरा शासकीय तंत्र तो लोकतंत्र के उस राजा के हाथ में रहेगा । उसे निरपराध सिद्ध कौन करेगा ? उस 5 साल में राजा बहुत कुछ कर सकता है, जो चाहे वह । प्रशासनिक तंत्र इस राजा के चेहरे के भाव पढ़कर कार्य करता है । पुलिस-प्रशासन जनता की समस्याओं की चिंता कम राजा की चिंता अधिक करता है ।

सरकार चलाने वालों को मैं तीन वर्गों में बांटता हूंः

(1) प्रथम महाराजाधिराज जिसमें राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री शामिल किए जा सकते हैं ।

(2) द्वितीय महाराजा जिसमें राज्यपाल, मुख्यमंत्री सरीखे राजनेता सम्मिलित किए जा सकते हैं ।

(3) तृतीय वर्ग राजाओं का जिसमें मंत्रियों को गिना जा सकता है ।

अन्य जनप्रतिनिधियों में से कुछ को मैं दरवारी कहता हूं जो राजा की कृपा पाने में प्रयासरत रहते हैं । उन्हें राजा का साथ देना होता है, बदले में राजा उन्हें विविध तरीकों से उपकृत करता है । उनके लिए राजा का विरोध करना वर्जित रहता है । जो दरवारी नहीं बन पाते हैं उन्हें अगली बार के राजा की प्रतीक्षा रहती है ।

इनको मैं राजा-महाराजा क्यों कहता हूं ? इसलिए कि वे राजा-महाराजाओं वाली सुख-सुविधाओं के हकदार होते हैं । सुरक्षा के नाम पर इनके लिए इंतजामात देखिए । पुलिसबल की पूरी ताकत इनके लिए तैनात रहती है । मरणासन्न मरीज का एंबुलेंस तक उनके रास्ते में नहीं आ सकता है । उनके रोगों के इलाज के लिए सर्वोत्तम अस्पताल/चिकित्सक रातदिन उपलब्ध रहते हैं । इलाज भी मुफ्त में । वे जब चाहें विदेश जा सकते हैं, अपनी गांठ का धेला खर्च किए बिना । मुफ्त का मकान, विजली-पानी चौबीसों घंटे । लोकतंत्र के ऐसे राजा-महाराजा जब अपनी दौरे पर निकलते हैं तो रातोंरात सड़कें समतल हो जाती हैं, सड़कों से कूड़ा गायब हो जाता है, बदबदाती नालियां साफ हो जाती है, और न जाने क्या-क्या नहीं हो जाता है । एक व्यक्ति के लिए इतना सब प्रजा के लिए क्यों नहीं ? आम आदमी सोच सकता है ऐसे विशेषाधिकार की ? इन्हें राजा न कहूं तो क्या कहूं ?

ऐसी राजकीय व्यवस्था में मोदी जी के वाराणसी आगमन की तैयारी पर करोड़ो खर्च हो जाए तो किसे कोफ्त होगी । कहते है डी.एल.डब्ल्यू के क्रीडांगन (स्पोर्ट्स ग्राउंड) की जमीन पंडाल की बजह से खराब हालत में हैं । सरकारी धन की बरबादी से इस देश में किसी को कचोटन नहीं होती है; अपनी जेब से थोड़े ही जा रहा हैं !

जीवन के आरंभ में गरीबी झेल चुके लोग जब कुरसी पर बैठते हैं तो वे अपने अतीत की चर्चा वोट बटोरने के लिए करते हैं,  न कि अतीत को याद करके जनता की सेवा के लिए । बीते समय की अपनी गरीबी को भी वोट बटोरने के लिए इस्तेमाल करते हैं, और जनता उनके सम्मोहन में फंस जाती है । क्या करें, कुरसी की तासीर ही कुछ ऐसी होती है ! – योगेन्द्र जोशी

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गांधी जयंती के अवसर पर जननेता मोदी का स्वच्छता आह्वान (2)

मोदी तथा स्वच्छता अभियान

इस विषय पर एक आलेख मैंने गांधी जयंती यानी 2 अक्टूबर को लिखा था ।

उसमें मैंने गांधी-चिंतन की कुछ बातों पर टिप्पणी करते हुए मोदी के स्वच्छता अभियान का जिक्र किया था और इस अभियान की सफलता पर शंका जताई थी । मैं अपनी शंका के कारण स्पष्ट करता हूं ।

मैं मोदी या अन्य किसी राजनेता का समर्थक नहीं रहा हूं, किंतु मोदी का फिलहाल प्रशंसक अवश्य हूं । कारण सीधा-सा यह है कि मोदी के कथनों तथा कार्यप्रणाली में मौलिकता है ओर वह घिसे-पिटे ढर्रे पर चलने वाले राजनेता एवं प्रधानमंत्री नहीं लगते हैं । मुझे लगता है कि वे सिंगापुर के पूर्व प्रधानमंत्री ली कुआन यू (Lee Kuan Yew) और फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति चार्ल्स द गॉल (Charles de Gaulle) की जैसी भूमिका निभाना चाहते हैं, जिन्होंने कुछ हद तक डिक्टेटरों सदृश व्यवहार करते हुए अपने-अपने देशों की आरंभिक प्रगति में महती भूमिका निभाई थी । मोदी स्पष्टतः दिखाई देने वाले नयेपन के साथ देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं और देश का स्वरूप बदलना चाहते हैं । उनकी विभिन्न योजनाएं और चंद रोज पहले घोषित स्वच्छता अभियान कितने सफल होंगे यह अभी कोई नहीं बता सकता । मैं इतना जरूर कहूंगा कि यदि सफलता मिली तो श्रेय मोदी को देना ही होगा, और यदि विफलता मिली तो दोष हमारी शासकीय व्यवस्था, प्रशासनिक तंत्र एवं आम जनों का कहा जाएगा, जो वांछित दायित्व न निभा पाए हों और जिन पर प्रधानमंत्री होने के बावजूद मोदी का अतिसीमित नियंत्रण है ।

स्वच्छता अभियानः चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात

मामला स्वच्छता का हो या किसी और बात का, अभियान स्वयं में उद्येश्य की प्राप्ति नहीं करते । अभियानों का मुख्य मकसद लोगों को मुद्दे के प्रति सचेत करना और उन्हें समुचित दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना है । यदि मकसद पूरा हो सका और समस्या को लेकर कुछ कर पाने की संभावना लोगों में निहित हो जाए तो अभियान की सार्थकता सिद्ध हो जाती है । अन्यथा अभियान अभियान मात्र बन कर रह जाता है । आप प्रतिदिन अभियान नहीं चला सकते और न ही आम जन उसमें रोज-रोज भागीदारी निभा सकते हैं । चूंकि इस अभियान में सामान्य लोगों के अलावा कई गण्यमान्य जन भी जुड़ते नजर आ रहे हैं, इसलिए थोड़ी उम्मीद बनती जरूर है कि कुछ सार्थक परिणाम निकलेंगे । लेकिन कुछ समय पश्चात मौजूदा आरंभिक जोश ठंडा पड़ जाये तो आश्चर्य नहीं होगा । ऐसा प्रायः सभी अभियानों एवं आंदोलनों के साथ देखने को मिलता है । तब “चार दिनों की…”

जहां तक स्वच्छता का मामला है मैं समझ नहीं पाता कि अपनी तरफ से सफाई बरतने के लिए लोगों से अनुरोध क्यों करना पड़ता है । यह बात उनके जेहन में खुद-ब-खुद क्यों नहीं आती ? अपने परिवेश को स्वच्छ रखें इस आशय के संदेश कई स्थलों पर लिखे दिखते हैं, जैसे रेलवे प्लेटफार्मों पर और रेल के डिब्बे के भीतर, अथवा चौराहों पर अपने शहर को स्वच्छ रखें के संदेश । फिर भी गंदगी फैलाने वाले गंदगी फैलाते रहते हैं । संदेशों का कोई असर क्यों नहीं पड़ता ? सड़क के किनारे दीवारों पर अक्सर लिखा रहता है “यहां मूत्रत्याग या पेशाब न करें” फिर भी पेशाब करने वालों की कमी नहीं रहती । क्या अभियानों का असर वास्तव में पड़ता है ? शायद नहीं; कइयों को ये नौटंकियों सदृश लगते हैं, तमाशे के माफिक ! मैं इस समय मुम्बई, पश्चिम भांडुप, में हूं । मुझे तो यहां इस अभियान के संकेत तक नहीं दिखे । पता नहीं देश के किस-किस कोने में कुछ हुआ हो, मीडिया में छपी तस्वीरों से अधिक ।

फिर भी मैं मान लेता हूं कि मौजूदा जिस अभियान की शुरुआत मोदी ने की है, और जिसे जनसमर्थन मिल रहा है, वह लोगों को प्रेरित करेगा । तब सवाल है कि उसके अनुसार आम आदमी से क्या अपेक्षा की जाती है ? यही न कि लोग सड़कों, सार्वजनिक स्थलों, आदि पर गंदगी न फैलाएं । वे सड़कों पर पान की पीक नहीं थूकें, उनके किनारे खड़े होकर पेशाब नहीं करें, जहां-तहां कूड़ा नहीं फैंकें, नालियों में प्लास्टिक की थैलियां नहीं डालें, रेलगाड़ी के डिब्बों के फर्श पर मूंगफली के छिलके, बिस्कुट के रैपर नहीं गिराएं, इत्यादि । ऐसे तमाम कार्य करने के लिए आम जन, विशेषकर नौजवान, किशोरवय,  बालक-बालिकाएं प्रेरित की जा सकती हैं, किंतु नागरिकों का व्यक्तिगत योगदान पर्याप्त है क्या ?

प्रशासन की भूमिका

वस्तुतः सफाई कार्यक्रम में प्रमुखतया दो पक्षों की भागीदारी रहती हैः (1) पहले में जन-सामान्य हैं जिनके व्यक्तिगत योगदान की बात ऊपर की गई है, और (2) दूसरा संस्थाएं हैं जिनका दायित्व सार्वजनिक क्षेत्रों की साफ-सफाई की व्यवस्था करना है । घरों और व्यावसायिक कार्य-स्थलों से निकलने वाले कूड़े-कचरे के निस्तारण का दायित्व इन्हीं संस्थाओं का होता है । सड़कों, नालों, एवं पार्क जैसे सार्वजनिक स्थलों को समय-समय पर साफ करना संस्थाओं की जिम्मेदारी होती है । आम जन के उपयोग के लिए सार्वजनिक सुविधाओं का निर्माण भी संस्थाओं का ही कार्य होता है, न कि निजी तौर पर किसी व्यक्ति का ।

हमारे देश में ये संस्थाएं सामान्यतः प्रशासनिक तंत्र का हिस्सा होती हैं । लेकिन वे गैरसरकारी स्वैच्छिक संस्थाएं भी हो सकती है जिन्हें शासकीय नियमों के अनुरूप कार्य करने की अनुमति रहती है । “सुलभ इंटरनैशनल” ऐसी ही एक प्रतिष्ठित संस्था है जो सार्वजनिक उपयोग हेतु शौचालयों का निर्माण कराती आ रही है । जब कोई व्यक्ति जनहित में ऐसा ही कोई कार्य करे तो वह भी एक गैरसरकारी संस्था की तरह कार्य कर रहा होता है । उसका कार्य समाज के प्रति उदारता का परिचायक कहा जाएगा । किंतु यह स्वीकारा जाना चाहिए कि मूलतः सार्वजनिक सफाई प्रशासन की ही जिम्मेदारी होती है, भले ही वह अपने दम पर यह करे अथवा गैरसरकारी संस्थाओं से सहयोग लेकर चले ।

मैं देश के कई हिस्सों में बतौर पर्यटक के घूम-फिर चुका हूं । यह सभी जानते हैं कि हमारा देश विधिधताओं से भरा है । खानपान, पहनावा, स्थानीय रीतिरिवाज, भाषा-बोली, आदि में विविधता पाई जाती है । फिर भी मुझे यह देखना बेहद दिलचस्प लगा कि एक माने में सभी देशवासियों में समानता है, वह है स्वच्छता के प्रति उदासीनता या बेपरवाही । इस माने में संस्थाओं में भी काफी हद तक एकरूपता देखने को मिलती है । अवश्य ही कुछ जगहों पर मैंने पर्याप्त प्रशासनिक चुस्ती देखी है तो अन्यत्र उसकी सुस्ती ही सुस्ती । तदनुसार सड़कों, सार्वजनिक स्थलों में प्राप्य गंदगी की मात्रा में थोड़ा-बहुत अंतर जरूर रहता है, फिर भी गंदगी तो रहती ही है । उदाहरणार्थ देश में प्रायः सभी शहरों में जहां-तहां प्लास्टिक थैलियों का बिखरा होना, सड़कों के किनारे कूड़े के ढेर लगे रहना, दुर्गंध फैलाती बदबदाती नालियों की मौजूदगी, आदि आम बातें हैं । ये बातें प्रशासनिक उदासीनता के प्रमाण होते हैं । इसी प्रकार आम जनता का सफाई के प्रति रवैया भी कमोबेश एक जैसा ही है । यह है भारत की विविधता में एकता

वाराणसी का उदाहरण

मैं पिछले करीब 42 सालों से वाराणसी मैं रह रहा हूं । मैंने इस शहर को शनैः-शनैः दुर्व्यवस्था का शिकार होते देखा है । पहले सड़कें अधिक चौढ़ी नहीं थीं, फिर भी जाम की स्थिति नहीं पैदा होती थी । आज सड़कें दोहरी या अधिक चौढ़ी हैं, किंतु हर समय जाम की स्थिति बनी रहती है । पहले कारें नहीं के बराबर थीं, आज इतनी हैं कि सर्वत्र धुआं-ध्वनि प्रदूषण फैल रहा है । पहले सड़कें 5-7 साल चल जाती थीं, अब 2-4 माह में ही उखड़ने लगती हैं । पहले कागज के थैले इस्तेमाल होते थे, अब उनकी जगह गंदगी के कारक प्लास्टिक की थैलियों ने ले ली है ।

मेरा मानना है कि वाराणसी में प्रशासन वस्तुस्थिति के प्रति उदासीन, निष्क्रिय, या बेपरवाह रहता है । संसाधनों तथा कार्यबल का अभाव उसे और पंगु बना देता है । अतः मुझे उससे उम्मीद नहीं है । न ही मैं आम जनता से कोई उम्मीद रखता हूं, जो “बनारस की मस्ती” के नाम पर अनुशासनहीनता बरतती है और नागरिक दायित्वों से बेखबर रहती है । ऐसे में अहम स्थलों में स्वच्छता के विभिन्न टापू उभर सकते हैं जहां निजी संस्थाएं अथवा प्रशासनिक तंत्र विशेष तौर पर प्रयासरत हों, किंतु वृहत्तर स्तर पर स्थिति दयनीय ही रहनी है ।

कुल मिलाकर मुझे लगता नहीं कि वाराणसी में प्रशासन और आम जनता से स्वच्छता की आशा की जा सकती है । देश में अन्यत्र भी स्थिति विशेष आशाप्रद होगी यह मैं नहीं सोच पाता । मैं ऐसा क्यों सोचता हूं इसे अपने निजी अनुभवों पर आधारित दो-एक उदाहरणों से स्पष्ट करूंगा अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी

 

2 अक्टूबरः गांधी जयंती एवं अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस और जननेता मोदी का स्वच्छता आह्वान (1)

स्वच्छता अभियान

 

 

 

 

गांधी-शास्त्री जयंती

2 अक्टूबर गांधी जयंती है । प्रायः सभी देशवासी इस दिन से सुपरिचित रहे हैं, क्योंकि प्रथमतः इस दिन सार्वजनिक अवकाश रहता है और द्वितीयतः गांधी के नाम को दुनिया में अहिंसक आंदोलन से जोड़कर देखा जाता है, जिसके कारण इस दिन को विश्व अहिंसा दिवस के तौर पर घोषित किया गया है । कदाचित कम ही लोगों को यह याद रहता होगा कि “जय जवान जय किसान” का नारा देने वाले तथा सोमवार को सामूहिक उपवास रखने की अपील करने वाले देश के दूसरे प्रधानमंत्री स्व. लालबहादुर शास्त्री जी का जन्म भी इसी दिन हुआ था ।

मैं देश की स्वाधीनता का श्रेय गांधी को उतना नहीं देता जितना आम तौर पर दिया जाता है । अवश्य ही उनकी भूमिका महत्वपूर्ण थी, किंतु स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लेने वाले अनेकों स्मरणीय जननेताओं का योगदान कम नहीं रहा । वस्तुतः द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटिश सामाज्य की स्थिति इतनी कमजोर हो चुकी थी कि उन्हें अपना सामाज्य संभालना कठिन लगने लगा था और एक-एक करके उन्हें तमाम बड़े देशों को स्वतंत्रता प्रदान करनी पड़ी थी । यह मेरा मत है जिसे लोग शायद स्वीकार न करें । मेरा यह आलेख स्वाधीनता के मुद्दे पर केंद्रित न होकर गांधी से जुड़े अन्य बातों पर केंद्रित है ।

गांधी और अहिंसा

निःसंदेह गांधी अहिंसा के पक्षधर थे, लेकिन कदाचित कायरता के पक्षधर नहीं थे । वे कठिन परिस्थिति में अपनी सुरक्षा के लिए हिंसक मार्ग अपनाने से हिचकने की सलाह देते रहे हों मैं ऐसा नहीं समझता । अस्तु, अहिंसा को केवल गांधी से जोड़कर ही क्यों देखा जाता है ? अनेक ऐसे महापुरुष हो चुके हैं जिन्होंने हिंसा का मार्ग त्यागने की सलाह दी है । यह ठीक है कि सभी समान रूप से सुविख्यात नहीं रहे हैं, पर उनको भुलाया नहीं जा सकता । भगवान महावीर, महात्मा बुद्ध, एवं प्रभु यीशु को तो दुनिया जानती ही है । वे सभी तो अहिंसा का उपदेश देते रहे । अवश्य ही उन्हें अहिंसक आदोलन चलाने की आवश्यकता नहीं रही, क्योंकि उनके काल में राजनैतिक परिस्थियां आधुनिक काल की सी नहीं रहीं । वस्तुतः गांधी स्वयं इन महापुरुषों से प्रेरित रहे हैं ।

सवाल है कि गांधी की चर्चा अहिंसा के संदर्भ में ही सर्वाधिक क्यों की जाती है । उन्होंने तमाम अन्य बातों पर भी जोर डाला था जिनको अपनाने की सलाह उन्होंने लोगों को दी थी । किंतु उन बातों की चर्चा आम तौर पर जोरशोर से नहीं की जाती है । मैं समझता हूं कि गांधी के अहिंसा की बात को सारी दुनिया इसलिए महत्व देती है क्योंकि हिंसा से प्रायः हर मनुष्य डरता है । हो सकता है कि आंतकवादी और उनके विरुद्ध लड़ने का दायित्व निभाने वाले सुरक्षकर्मी न डरते हों । अथवा स्वीकारे गए दायित्य के कारण उन्हें कदाचित निडरता बरतनी पड़ती हो । अतः अधिकांशतः सभी चाहेंगे हि मानव समाज हिंसामुक्त हो । मैं इस भावना को मनुष्य के स्वार्थ की प्रवृत्ति से जोड़कर देखता हूं, अर्थात उसकी इस अपेक्षा से कि अन्य जन उसको हानि न पहुंचाएं । गांधी की अन्य बातें मनुष्य के स्वार्थ के अनुरूप नहीं हैं, अतः उन बातों का पक्ष लेने और उन्हें जीवन में अपनाने में उन्हें असुविधा अधिक और व्यक्तिगत लाभ कम दिखता है ऐसा मैं मानता हूं । इसलिए लोग उन बातों को तवज्जू नहीं देते हैं । मैं अपने उक्त मत को सप्ष्ट करता हूं:

गांधी के विषय में व्यापक एवं शोधपरक अध्ययन मैंने नहीं किया है । अतः उनके बारे में बहुत कुछ तथा वह भी सही-सही जानता हूं यह दावा नहीं कर सकता । जितना मैं समझ पाया हूं उसके अनुसार वे अहिंसा के अतिरिक्त अधोलिखित बातों को महत्व देते थे और उन पर स्वयं अमल करते थे, न कि दूसरों को महज उपदेश भर देते थे:

गांधी – अहिंसा से आगे कुछ और भी

(1) स्वच्छता – गांधी का स्वच्छता पर विशेष ध्यान था । वे मानते थे कि हर व्यक्ति को स्वयं अपने हाथ से साफ-सफाई करनी चाहिए । यदि दूसरों का शौच आदि उठाने की जरूरत पड़े तो उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए । स्वच्छता से उनका ताप्तर्य दूसरों से सफाई करवाना नहीं था, बल्कि उसमें स्वयं भागीदारी निभाना था ।

(2) शारीरिक श्रम – गांधी शारीरिक श्रम के पक्षधर थे और यह विचार रखते थे कि मनुष्य को अपना कार्ययथासंभव अपने शारीरिक श्रम के संपन्न करना चाहिए । मशीनों पर निर्भरता कम से कम होना चाहिए । उन्हें किस स्थिति में इस्तेमाल करना चाहिए इस पर विवेकपूर्ण विचार होना चाहिए । मात्र आलस्य अथवा सुविधाभोग के लिए हमें अपने शारीरिक श्रम से नहीं बचना चाहिए । श्रम करने के लाभ क्या-क्या हैं यह तो लोग समझते हैं, किंतु उससे फिर भी बचते हैं । गांधी की नजर में व्यावसायिक तौर पर शारीरिक श्रम करने वालांे को हेय दर्जा देना अक्षम्य माना जाना चाहिए ।

(3) सादा जीवन – वे सादगी भरे जीवन के पक्षधर थे । शानो-शौकत और दिखावे का जीवन उनके विचारों के प्रतिकूल था । उनके मतानुसार व्यक्ति की श्रेष्ठता उसके विचारों से आंकी जानी चाहिए न कि उसकी भौतिक सपन्नता से । आज के युग में गांधी के कितने प्रशंसक होंगे जो अपनी आर्थिक संपन्नता के बावजूद सादा जीवन जीते हों । आज तो व्यक्ति ही संपन्नता ही उसकी सामाजिक श्रेष्ठता का आधार बन चुका है ।

(4) सामाजिक समानता – गांधी का मत था कि सभी मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए, सबको सम्मान दिया जाना चाहिए । यह सच है कि प्रकृति ने सबको समान नहीं बनाया है । परंतु  सभ्य समाज वही कहला सकता है जिसमें इस अंतर को भेदभाव का आधार न बनाया जाता हो । शारीरिक अथवा बौद्धिक स्तर पर कोई अधिक समर्थ होता है तो कोई कम । तदनुसार लोग अपना-अपना व्यावसायिक क्षेत्र चुनते हैं, परंतु उस क्षेत्र के आधार पर उन्हें ऊंचनीच की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए । धर्म, नस्ल, जाति, क्षेत्रीयता के आधार पर तो भेदभाव किया ही नहीं जा सकता, क्योंकि ये कृत्रिम आधार हैं – समाज में घर कर गईं विकृतियां । छुआछूत गांधी की दृष्टि में हिंदू समाज पर एक कलंक है ।

(5) कमजोर का शोषण न हो – अपेक्षया कमजोर व्यक्ति का शोषण विश्व के हर समाज में सदा से ही होता रहा है । गांधी चाहते थे कि हमें शोषण की प्रवृत्ति से स्वयं को मुक्त करना चाहिए । किंतु देखने में आता है कि समाज में कमजोर व्यक्ति से तरह-तरह से लाभ उटाये जाते हैं । कमजोर व्यक्ति से कम से कम पारिश्रमिक देकर अधिक से अधिक कार्य लेना आम बात है । दूसरों का हक छीनने में भी बहुतों को कोई संकोच नहीं होता है । वास्तव में देखा जाय तो समाज में फैले कदाचार का संबंध शोषण की प्रवृत्ति से ही है । वस्तुस्थिति का अपने हक में लाभ उठाना और दूसरों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में हानि पहुंचाना आम प्रवृत्ति है ।

(6) आर्थिक विषमता कम हो

कहा जा चुका है कि प्रकृति ने सबको समान नहीं बनाया है । अतः अर्थोपार्जन की क्षमताएं असमान है । अपने बौद्धिक कौशल से कोई असीमित संपन्नता अर्जित कर लेता है तो कोई अपनी सीमित क्षमताओं के कारण जीवन-यापन के लिए पर्याप्त साधन तक नहीं जुटा पाता है । फलतः समाज में आर्थिक विषमता स्वाभाविक तौर पर बढ़ती जाती है । गांधी का मत था कि सब असमान जन्म लेेते हैं के तर्क के साथ इस असमानता का औचित्य नहीं ठहराया जाना चाहिए । वे चाहते थे कि हमें ऐसी सामाजिक एवं शासकीय व्यवस्था अपनानी चाहिए जिससे यह अंतर कम से कम हो । इसका सीधा तात्पर्य यह है कि समाज में यह प्रवृत्ति पैदा की जानी चाहिए कि संपन्न वर्ग किंचित त्याग के लिए प्रस्तुत हो और कमजोर वर्ग को ऊठाने में योगदान दे ।

ये वे कुछ बातें हैं जो इस समय मेरे विचार में आ रही हैं । ऐसी अन्य बातें भी होंगी जो गांधी के चिंतन में रही हों । गौर करें तो देखेंगे कि ये बातें मनुष्य के विविध स्वार्थों के प्रतिकूल हैं – स्वार्थ जिनमें सुविधा भोगना, संपन्नता अर्जित करना, दूसरों पर वर्चस्व पाना, दायित्वों से बचना, आदि शामिल हैं ।

स्वच्छता अभियान

गांधी-चिंतन में जिस स्वच्छता को महत्व दिया गया है उसे आज मौजूदा प्रधानमंत्री मोंदी ने अपने स्वच्छता व्भियान का आधार बना लिया है । मोदी ने भविष्य में सतत चलने वाले इस अभियान के लिए गांधी जयंती को चुना है । देखने पर मोदी के इरादे सराहनीय लगते हैं । साथ में मेरे मन में ये सवाल भी उठते हैं:

(1) वे और उनके दल के लोग इस विषय पर कितने गंभीर होंगे ?

(2) उनकी खुद की सरकार तथा राज्यों की सरकारों की प्रतिवद्धता किस स्तर की होगी ?

(3) इस कार्य के लिए कैसे पर्याप्त संसाधन जुटाए जाएंगे ?

और (4) आम जन का कितना सहयोग उन्हें मिलेगा ?

ऐसे और भी प्रश्न हैं । इन प्रश्नों के उत्तर स्वयं मोदी के पास होंगे इसमें मुझे शंका है । उम्मीद पर दुनिया टिकी है, सो हमें सफलता की आशा करनी चाहिए । इस बारे में कुछ अधिक कहने से पहले मैं कांग्रेस पार्टी पर संक्षिप्त टिप्पणी करना चाहता हूं ।

कांग्रेस पार्टी गांधी पर अपना “कॉपीराइट” जताती है, जब कि गांधी स्वातंत्र्योत्तर भारत के किसी दल के नेता नहीं थे । वे पूर्व में एक जननायक थे और वही अंत तक रहे । कांग्रेस यह भूल जाती है कि वे उस कांग्रेस के नेता थे जो देश के स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत थी । और उन्होंने स्वतंत्र भारत में चुनाव लड़ने के लिए बने राजनैतिक दल के तौर पर कांग्रेस को नहीं स्वीकारा । वे उससे नाता तोड़ चुके थे । ऐसे में कांग्रेसियों का उन्हें अपने दल से जुड़ा होना कहना नितांत गलत है । वैसे भी कितने कांग्रेसी हैं जिन्होंने गांधी की जीवन शैली अपनाई हो ?  गांधी को अपना कहने वाले कांग्रेस के किसी नेता ने ऐसा अभियान क्यों नहीं चलाया ? क्यों नहीं स्वयं मनमोहन सिंह के दिमाग में स्वच्छता अभियान का खयाल आया ? अस्तु, गांधी के नाम पर किए जाने वाले मोदी के अभियान को कांग्रेस तथा अन्य दलों ने सहयोग देना चाहिए, न कि उस पर कोई टिप्पणी करनी चाहिए ।

शंकाएं

मैंने इस अभियान के संदर्भ में ऊपर कुछ सवाल उठाऐ हैं । अभियान किस हद तक सफल होगा और क्या अड़चनें मोदी के समक्ष होंगी इस पर मैं अपनी टिप्पणियां इस ब्लॉग की अगली पोस्ट में करूंगा । – योगेन्द्र जोशी

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