राहुल गांधी का प्रधानमंत्री बनना देशहित में होगा या …?

राहुल का इंदौर भाषण २०१३

 

आलोचना राहुल गांधी की

यदि मैं राहुल गांधी पर कोई नकारात्मक या आलोचनात्मक टिप्पणी करूं तो कांग्रेसजन आगबबूला हो जाएंगे । चूंकि प्रायः सभी लोग कहते हैं कि इस देश में अपनी बात कहने का सबको हक है, इसलिए मैं भी कुछ कहने की हिम्मत कर रहा हूं । शायद दो-चार ऐसे लोग मिल जाएं जो मुझसे सहमत हों । तब यह समझूंगा कि मेरी बात सौ फीसद मिथ्या नहीं मानी जा रही, अन्यथा खुद के खयालात पर शक होने लगेगा ।

मेरी नजर में राहुल गांधी राजनैतिक दृष्टि से नितांत अपरिपक्व हैं । वे नहीं जानते कि उन्हें क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं । लगता है उन्हें ऐतिहासिक तथ्यों की भी जानकारी नहीं । अपने भाषणों में वे अपने एवं अपने परिवार की बातें जरूरत से अधिक करते है, परिवार के तथाकथित त्याग की चर्चा करते हैं, गोया कि लोग, यानी आगामी चुनावों के मतदाता, अपने समस्त कष्टों को भूलकर उनकी पार्टी को सत्ता सोंप देंगे ।

आगामी (2014) केंद्रीय सरकार का प्रधानमंत्री

कह नहीं सकता कि अगली सरकार कांग्रेस की अगुवाई में बनेगी या नहीं । मुझे नहीं लगता कि इस पार्टी को खास सफलता मिलेगी । उनके नाम उपलब्धियों की तुलना में विफलताएं कहीं अधिक हैं । जनता शायद उन्हें वोट देना पसंद न करे । तीसरा मोर्चा बनेगा या नहीं बनेगा, यदि बनेगा तो कैसे ये सवाल अभी पूर्णतः अनुत्तरित हैं । जिसका जन्म अभी हुआ नहीं उस तीसरे मोर्चे की सरकार बनेगी इसकी संभावना मेरे मत में क्षीण है । हो सकता है भाजपा अधिक सीटें ले जाए, लेकिन अपर्याप्त । मुझे डर है कि वह सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या में समर्थन जुटाने में असफल रहेगी । क्या पता अन्य दल तथाकथित “सेक्युलरिज्म” के नाम पर उसे रोकने की कोशिश में एकजुट हो जाएं । इस देश में सेक्युलरिज्म का फेबिकॉल दुश्मनों को भी आपस में जोड़ सकता है । इसलिए अंततः घूमफिर के कांग्रेस के हाथ में ही कमान आ जाए, किंतु उसकी स्थिति इस बार काफी कमजोर रहेगी ।

अगर जोड़तोड़ करके कांग्रेस ने सत्ता संभाल ही ली तो उसका प्रधानमंत्री कौन बनेगा यह बात फिलहाल भविष्य के गर्त में ही छिपी है । मेरा मानना है राहुल गांधी इस पद को स्वीकार नहीं करेंगे । मैं उन्हें मूर्ख तो मानता हूं (क्षमा करें यदि आपको बुरा लगे तो), लेकिन वे महामूर्ख नहीं हैं कि इस समय खाहमखाह जोखिम उठाएं और अपना भविष्य दांव पर लगाएं । परिस्थितियां कांग्रेस के अनुकूल नहीं हैं, भले ही कांग्रेस-नीत सरकार बन जाए ।

यह याद रखना चाहिए कि कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार ही सभी निर्णय लेता है । वह परिवार ही अंततोगत्वा बताएगा कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा । राहुल गांधी को यह जन्मसिद्ध विशेषाधिकार प्राप्त है कि वे “हां” या “न” कहें । अन्य लोगों को यह अधिकार नहीं है । अतः जिसे यह परिवार कहेगा उसे प्रधानमंत्री का पद सम्हालना ही पड़ेगा ।  और इस कार्य के लिए अपने मनमोहन जी से बेहतर कौन हो सकता है ? उन जैसा समर्पित व्यक्ति भला कौन हो सकता है । कांग्रेसजन लाख कहें कि उनकी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र है और प्रधानमंत्री का चयन चुनाव जीतकर आए सांसद करते हैं, हकीकत में ऐसा है नहीं ।

आन्तरिक लोकतंत्र का अभाव

दरअसल भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यही है देश के अधिकांश दल किसी न किसी व्यक्ति या परिवार की बपौती बनकर रह गये हैं, जहां संपूर्ण अधिकार मुखिया या उसके परिवार में निहित रहते हैं । कांग्रेस ही में यह नहीं है, कश्मीर से कन्याकुमारी तक यही कहानी है प्रायः सभी दलों की है । एनसीपी के फारूख अब्दुला, अकाली दल का बादल परिवार, लोकदल के अजीत सिंह, सपा के मुलायम सिंह, बसपा की मायावती, राजद के लालू यादव, लोजपा के रामविलास पासवान, त्रिणमूल की ममता, बीजद के बीजू पटनायक, टीडीपी के चंद्रबाबू नायडू, शिवसेना के उद्धव ठाकरे, एमएनएस के राज ठाकरे, डीएमके के करुणानिधि, एआईएडीएमके की जयललिता, तथा अन्य कई दलों की यही कहानी है । इन दलों में आंतरिक लोकतंत्र नाम की चीज ही नहीं है, लेकिन वे लोकतंत्र की बात करते अवश्य हैं । खैर, मेरे कहने से क्या होता है !

मैंने कहा कि मैं राहुल गांधी को कुछ हद तक मूर्ख मानता हूं, क्योंकि वे कई मौकों पर बेसिरपैर की बातें कर जाते हैं । कांग्रेसजनों की खूबी यह है कि वे हर हाल में उनकी बातें सही ठहराते हैं । राहुल भला कैसे गलत हो सकते हैं ? वे हमारे नेता हैं जो भी कहते है सही कहते है, दूसरे लोग ही गलत समझते हैं । वाह रे राजनैतिक दर्शन ! किसी लोकतांत्रिक दल में यह हो ही नहीं सकता कि किसी एक सदस्य की सभी बातों को समवेत स्वर में सही कहा जा सके । किसी विशिष्ट व्यक्ति के साथ अन्य सदस्यों की यदाकदा असहमति हो यह किसी भी लोकतांत्रिक दल के लिए स्वाभाविक है । राहुल गांधी की गलतियों को कांग्रेसजन कभी भी सहजतया क्यों नहीं स्वीकारते ?

तथ्यहीन उद्गार

मेरा राहुल गांधी के प्रति जो नजरिया है उसके कारण स्पष्ट करना चाहूंगा । हाल में इंदौर की रैली में उन्होंने कुछ बातें कहीं जो हास्यास्पद अथवा आपत्तिजनक, और उनकी अपर्याप्त जानकारी के द्योतक मानी जा सकती हैं । मैं उदाहरण पेश करता हूं:

(1) राहुल गांधी भाजपा का नाम नहीं लेते हैं, किंतु जब वे सांप्रदायिक ताकतों की बात करते हैं तो इशारा भाजपा की ओर ही रहता है । उनकी बातों से लगता है कि देश में सभी दंगे भाजपा ही कराती है । क्या कभी यह बातें प्रमाणित हुई हैं ? इन दंगों के दौरान केंद्र सरकार ओैर राज्य सरकारें कहां सोई रहती हैं ? और जब शिया-सुन्नी दंगे होते हैं तो क्या वे भी भाजपा-प्रायोजित होते हैं ? देश के तथाकथित “सेक्युलरवादी दल” सभी दंगों के लिए आंतरिक कारणों के तौर पर भाजपा और बाह्य कारणों के तौर पर पाकिस्तान की “आई.एस.आाई.” को जिम्मेदार मानते हैं बिना असंदिग्ध प्रमाणों के ।

(2) राहुल गांधी दंगों के संदर्भ में बिना नाम लिए भाजपा को समुदायों के बीच वैमनस्य पैदा करने और मारकाट मचाने वाली पार्टी कहते हैं । उसी रौ में वह अनर्गल बोल जाते हैं: “इन लोगों ने मेरी दादी को मारा, मेरे पिता को मारा, और अब मुझे भी मार डालेंगे ।” कौन हैं उनके वक्तव्य के “ये लोग” ? किसकी ओर इशारा है उनका ? क्या उनको यह मालूम नहीं कि उनके दादी-पिता किसी दंगे के शिकार नहीं हुए । वे कुछ हद तक अपनी ही गलतियों से मारे गये । कैसे ? क्या वे इस हकीकत को नहीं जानते कि उनकी दादी, इंदिरा गांधी, ने सेना को अमृतसर के स्वर्णमंदिर में घुसकर भिंडरावाले का सफाया करने का आदेश दिया था ? सिखों की दृष्टि में यह मंदिर को अपवित्र करने की घटना थी । इससे दो-चार सिख उनकी जान के दुश्मन बन गये थे । कहा जाता है कि उनकी दादी को अपनी सुरक्षा में समुचित तबदीली की सलाह दी गयी थी जो उन्होंने नहीं मानी । उसी तंत्र से एक सिख ने गुस्से में उनकी जान ले ली थी ? कौन जिम्मेदार था ? इसी प्रकार श्रीलंका में तमिल उग्रवाद के विरुद्ध वहां की सरकार को उनके पिता, राजीव गांधी, ने भारतीय सेना की टुकड़ी भेजी थी । कई तमिलों की नजर में यह उनके तमिल-बंधुओं के विरुद्ध कदम था । और उन्हीं में से एक ने मानव-बम बनकर उनकी जान ले ली ? भाषण हेतु मंच पर वे लोग पहुंचे कैसे ? किसकी गलती थी ?

(3) मुजफ्फरपुर के हालिया दंगों के सिलसिले में जो बात राहुल गांधी ने कही उसे मैं अक्षम्य और आपत्तिजनक मानता हूं । क्या कहा यह आरंभ में दिए न्यूज-क्लिप से स्पष्ट है । राहुल गांधी को किस खुफिया अधिकारी ने कथित बातें बताईं और किस हैसियत से ? क्या खुफिया अधिकारी इतने मूर्ख होते हैं कि सरकार का हिस्सा न होते हुए भी राहुल गांधी को खुफिया जानकारी दें ? इसके अलावा उसने अपने उच्चाधिकारियों को समुचित रिपोर्ट दी ? नहीं ! इसके अलावा यह कहना कि पाकिस्तान की “आई.एस.आाई.” वहां के 10-15 नौजवानों के संपर्क में है कहां तक सही है ? क्या वे सच बोल रहे हैं या जनता को महज मूर्ख बना रहे हैं ? देश में अनेक जन उनको भावी प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं । तब क्या उन्हें सोच-समझकर नहीं बोलना चाहिए ?

राहुल गांधी: प्रधानमंत्री बन गये तो?

मुझे लगता है कि राहुल गांधी यदि सचमुच में प्रधानमंत्री बन गये तो इस देश का बंटाधार ही होगा ! जो व्यक्ति ऐतिहासिक तथ्यों को न जानता हो, जो भावनाओं में बह जाता हो तथा अपने परिवार का गुणगान करने लगता हो, और शब्दों को नापतौलकर न बोल पाता हो, वह क्या सफल प्रधानमंत्री हो सकेगा ? ऐसे व्यक्ति को समुचित सलाह देने वाले साथ हों तो समस्या नहीं होगी । लेकिन आज की कांग्रेस की यह परंपरा बन चुकी है कि राहुल गांधी कुछ गलत भी बोल जाएं तो उसका भी कांग्रेसजन एक सुर से समर्थन करते हैं । उनकी कोई भी बात न काटी जाए यह उस दल की नीति बन चुकी है । तात्पर्य यह है कि तब उस दल में कौन होगा जो सही सलाह दे ?

मैं भाजपा का पक्षधर नहीं हूं । उसे मैं वोट नहीं देता । दरअसल मैं पिछले 10-12 सालों से किसी भी दल के प्रत्याशी के पक्ष में मतदान नहीं करता । मेरी दृष्टि में सब एक ही थैली के चट्टेबट्टे हैं । जब मौका मिले आपस में गले लग जाते हैं, और जरूरत पड़े तो एक-दूसरे के विरुद्ध अनापशनाप बोल जाते हैं । येनकेन प्रकारेण सत्ता हथियाना उन सभी का लक्ष्य बन चुका है । भाजपा सत्ता में आ जाए तो भी कोई मौलिक शासकीय परिवर्तन नहीं होने का ।

मेरी ये बातें भाजपा का पक्ष लेकर नहीं कहीं गई हैं । मैं तो राहुल गांधी की अनर्गल बातों की आलोचना कर रहा हूं । – योगेन्द्र जोशी

भारतीय स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर

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इस दिवस पर देशवासियों के प्रति शुभकामना व्यक्त करने की परंपरा का निर्वाह करना मेरा भी कर्तव्य बनता है । तदनुरूप उक्त संदेश सभी को स्वीकार्य होवे । किंतु इस अवसर पर प्रसन्नता व्यक्त करने और देश के भविष्य के प्रति आशान्वित होने का कोई विश्वसनीय आधार मुझे कहीं नहीं दिखता । देश की जो निराशाप्रद स्थिति मुझे वर्षों से दिखती आ रही है, उसकी ओर मेरा ध्यान इस मौके पर कुछ अधिक ही चला जाता है । मुझे लगता है कि आंख मूंदकर खुश होने के बजाय देशवासियों को तनिक गंभीरता से अपनी राजनैतिक उपलब्धियों पर विचार करना चाहिए । उन्हें स्वयं से पूछना चाहिए कि क्या साड़ेछः दशक पूर्व हासिल की गयी स्वाधीनता का उपयोग हम एक स्वस्थ एवं जनहित पर केंद्रित लोकतांत्रिक शासकीय व्यवस्था स्थापित करने में कर पाये ? इस अवसर पर कई प्रश्न मेरे मन में उठते हैं जिनके उत्तर मुझे नकारात्मक ही मिलते हैं । मेरी बातें सुन मुझ पर पूर्वाग्रह-ग्रस्त होने का आरोप लग सकता है । क्या मैं वाकई गलत हूं; मेरी बातों में कोई सार नहीं; मैं निराशावादी हूं ?

भारतीय संविधान कहता है:

WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly resolved constitute India into a SOVEREIGN  SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC and to secure to all its citizens

JUSTICE …

LIBERTY …

EQUALITY …

FRATERNITY …

IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY this 26th day of November, 1949, do HEREBY ADOPT, ENACT, AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION.

(SECULAR ‘kCn 1976 ds 42osa la’kks/ku esa tksM+k x;k A)

मैं इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के बाबत कुछ प्रश्न उठाता हूं । हमारी तत्संबंधित उपलब्धियां क्या हैं ? परमाणु परीक्षण, मिसाइल तकनीकी, उपग्रह प्रक्षेपण, और चंद्रयान अभियान या अन्य विकास कार्यों को मैं लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बेहतरी के संकेतक नहीं मानता । ऐसे विकास कार्य तो राजशाही, तानाशाही, लोकशाही अथवा किसी भी अन्य शासकीय तंत्र में होते ही रहते हैं । हर एक तंत्र में शासक अपने को मजबूत करने में लगा ही रहता है । चीन इसका उदाहरण है जो इन सब मामलों में हमसे कहीं आगे है । मेरे सवाल सीधे-सीधे अपने लोकतंत्र से जुड़े हैं कि क्या उसकी गुणवत्ता उत्तरोत्तर बढ़ी है; क्या वह आम जन की आकांक्षाओं के अनुरूप है, आदि । चलिए एक-एक सवाल पर विचार करें:

कहां है लोकतंत्र ? मूल भावना का अभाव

हमने बहुदलीय शासन पद्धति स्वीकारी है, जिसके अनुसार व्यवस्था चलाने की जिम्मेदारी राजनैतिक दलों को प्राप्त हुई है । उनसे अपेक्षा रही है कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृड़ ही नहीं करेंगे, बल्कि उसकी मर्यादाओं का पूर्णतः सम्मान करेंगे । लेकिन जिन दलों में आंतरिक लोकतंत्र नहीं उन्होंने ही लोकतांत्रिक प्रणाली का दायित्व संभाल रखा है । क्या इसमें विरोधाभास नहीं है ? आज के प्रमुख दलों में कितने हैं जो शपथ लेकर कह सकें कि उनके यहां आंतरिक लोकतंत्र है ? प्रायः हरएक दल किसी न किसी व्यक्ति अथवा उसके परिवार की निजी राजनैतिक जागीर बना हुआ है और उसके कार्यकर्ता तोते की भांति मुखिया के कथनों को उच्चारित करना अपना धर्म मानते हैं ।

कहां है लोकतंत्र ? सत्ता हथियाने की होड़

सत्ता हथियाना ही सभी दलों का एकमेव लक्ष बन चुका है । सत्ता क्यों चाहिए ? देश का स्वरूप आने वाले 20-30 सालों में क्या होगा इसके चिंतन से प्रेरित होकर सत्ता नहीं पाना चाहते । देश की कोई भावी तस्वीर उनके मन में नहीं उभरती है, बल्कि उनकी नजर पांचसाला सत्ता पर रहती है कि कैसे वे भरपूर सत्तासुख भोगें और और सत्ता से तमाम सही-गलत लाभ बटोर सकें । यही वजह है कि उनके पास देश के लिए कोई दीर्घकालिक नीतियां नहीं हैं, और न ही वे किसी सिद्धांत पर टिके रहते हैं । चुनाव में जिसका विरोध करें उसी से हाथ मिलाकर सत्ता पर बैठने से कोई नहीं हिचकता है । हर प्रकार का समझौता, हर प्रकार का गठबंधन उन्हें स्वीकार्य है, बशर्ते कि वह उनके निजी हित में हो, देशहित दरकिनार करते हुए ।

कहां है लोकतंत्र ? क्षेत्रीय दलों का उदय

जोड़तोड़ से सत्ता में भागीदारी पाने, और अपनी शर्तों पर दूसरे दलों से मोलभाव करने की क्षमता बटोरनेे के लिए क्षेत्रीय दलों का तेजी से उदय हुआ है । स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक ऐसे दलों का जन्म नहीं  हुआ था ऐसा मैं समझता हूं । कदाचित डीएमके पहला ऐसा दल था जो क्षेत्रीय दल के रूप में हिंदीविरोध के साथ जन्मा था । अन्य दल बाद में ही उभरे जब नेताओं को लगने लगा कि इस रास्ते से उनकी कीमत बढ़ जाएगी । इन दलों ने केंद्र की सत्ता को कमजोर ही किया । हाल के समय में गठबंधन-धर्म जैसा शब्द गढ़ा गया और राष्ट्रधर्म को दरकिनार कर इस धर्म को अहमियत मिलने लगी । इन दलों ने कुछ भी करने की छूट की शर्त पर गठबंधन बनाए रखने की घातक परंपरा को जन्म दिया है । क्या यही स्वस्थ लोकतंत्र है ?

अहंकारग्रस्त सांसद-विधायक

जनता के द्वारा बतौर प्रतिनिधि के चुन लिए जाने के बाद हमारे राजनेता स्वयं को पांच-साला राजा समझने लगते हैं । विनम्रता तो उनमें मुश्किल से ही मिलेगी । वे किसी भी विषय पर जनता की राय जानने के लिए क्षेत्र में नहीं जाते हैं, बल्कि दल एवं मुखिया की बात ही उनके लिए माने रखती है । जब वे अपने हितों को ध्यान में रखकर नीतियां बनाते हैं और जनता विरोध करती है तो अहंकार के साथ कह देते हैं कि हम चुनकर आए हैं । हिम्मत हो तो आप भी चुनकर आओ हमें रोक लो । मतलब यह कि हम अब राजा हैं और अपनी मरजी से चलेंगे । नेताओं की ऐसी सोच कभी भी लोकतंत्र के अनुरूप नहीं कही जा सकती है । हिम्मत तो उन्हें होनी चाहिए कि अपने मतदाताओं के बीच जाकर उनके विचार जानें । ऐसा वे कभी नहीं करते । कहना ही पड़ेगा कि मेरे मन में उनके प्रति सम्मान नहीं उपज पाता है ।

सेक्यूलरिज्म का ढिंढोरा

सेक्यूलरिज्म, जिसे हिंदी में धर्मनिरपेक्षता कहा गया है, के अर्थ क्या होते हैं यह शायद ही किसी राजनेता को मालूम हो । यह शब्द वे तोते की तरह बिना सोचे-समझे कही भी बोल देते हैं । उन्हें मालूम होना चाहिए कि यह शब्द यूरोपीय देशों में गढ़ा गया जहां शासकीय व्यवस्था को ईसाई धर्म के प्रभाव के मुक्त करने का अभियान चला था । फलतः वहां इस विचारधारा ने जन्म लिया कि लोकतंत्र में धर्म का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं, और शासन के नियम-कानून में देश और समाज के समग्र हित के अनुसार बनने चाहिए न कि किसी धर्म के मतानुसार । जब नेहरू-आंबेडकर ने हिन्दू भावना के विरुद्ध हिन्दू कोड बिल पारित करवाया तो उनकी सोच यही थी कि कालांतर मे कॉमन सिवल कोड देश में स्थापित किया जाऐगा । लेकिन ऐसा हो न सका और अब संविधान के दिशानिर्देशक सिद्धांतों के होते हुए भी यह कभी होगा नहीं । हमने ‘सेक्युलर’ शब्द का आयात का तो कर लिया, किंतु उसकी भावना अपनाई नहीं । वस्तुत यह देश मल्टीरिलीजस या बहुधर्मी है न कि धर्मनिरपेक्ष, क्योंकि हमारे कुछ कानून धर्मसापेक्ष ही हैं । फिर कैसे हम स्वयं को सेक्युलर कहें । यह आत्मप्रवंचना है ।

अल्पसंख्यकवाद

इस देश में सेक्युलर का व्यावहारिक अर्थ अल्पसंख्यक हितों की बात करना हो चुका है । बहुसंख्यकों की चर्चा करना सेक्युलर न होना समझा जाता है । और दिलचस्प बात तो यह है कि जब भी अल्पसंख्यक शब्द राजनेताओं के मुख से निकलता है तो उनका इशारा प्रायः मुसलिम समुदाय से ही होता है । देश में सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, पारसी, यहूदी भी अल्पसंख्यक हैं, जिनमें से तो कुछ सही अर्थ में अल्पसंख्यक हैं । परंतु उनकी बात शायद ही कभी कोई राजनेता करता है । दरअसल सबसे कमजोर आर्थिक एवं शैक्षिक दशा में होने के बावजूद मुसलिम समुदाय चुनावी नजर से अत्यधिक अहम समुदाय है, क्योंकि वह चुनाव परिणामों में उलटफेर कर सकता है । उनकी इसी ताकत को देखते हुए हमारे कई राजनैतिक दलों की नीति उनके हितों की जबरन बातें करना रही है । उनको अपने पक्ष में करने के लिए वे हर चारा उनके सामने डालते आ रहे हैं, और उन्हें वोट बैंक के रूप में देखते हैं । उनके वास्तविक हितों में शायद ही किसी की दिलचस्पी होगी । मुझे तो पूरा संदेह है कि ये लोग कभी नहीं चाहेंगे कि वे कभी ऊपर उठें और प्रलोभनों से मुक्त हो पाएं । इस प्रकार का घटिया अल्पसंख्यकवाद मेरी नजर में लोकतंत्र के विरुद्ध है ।

नेतागण – अनुकरणीय दृष्टांतों का अभाव

हमारे राजनेताओं का अहंकार तब खुलकर सामने आता है जब वे कानूनों का उल्लंघन करने से नहीं हिचकते हैं । वे अदालतों के आदेशों/निर्देशों की अवहेलना करने से भी नहीं चूकते है । वे भले ही मुख से न बोलें, किंतु उनका इशारा इस ओर सदैव रहता है कि उन्हें कानूनों के ऊपर होने का ‘विशेषाधिकार’ होना चाहिए, क्योंकि वे राजा से कम नहीं हैं । इस प्रकार का रवैया स्वतंत्र भारत के आरंभिक दिनों में देखने को नहीं मिलता था । तब के नेता नैतिक स्तर पर कहीं अधिक ऊपर थे । कहने का अर्थ है कि इस क्षेत्र में भी गिरावट ही आई है । होना तो यह चाहिए था कि नेता जनता के सामने अनुकरणीय उदाहरण पेश करें, वे अपने संयत व्यवहार से उन्हें प्रेरित करें । यही सब बातें हैं जिससे जनता में उनके प्रति सम्मानभाव घटता जा रहा है, जो लोकतंत्र के हित में नहीं हैं । क्या वे इन बातों को समझ पाएंगे ।

बढ़ता भ्रष्टाचार और लचर न्याय प्रणाली

कोई यह दावा कर सकता है कि समय बीतने के साथ देश में भ्रष्टाचार घटा है ? जो इसका उत्तर हां में दें मैं उनसे माफी ही मांग सकता हूं । शायद ही कोई सरकारी विभाग हो जहां उल्टे-सीधे काम न होते हों, लेकिन दंडित कोई नहीं होता । यह राजनेताओं समेत सभी मानते हैं कि भ्रष्टाचार बढ़ा है, लेकिन तमाशा देखिए कि भ्रष्टाचारी कोई सिद्ध नहीं होता है, गोया कि यह भी कोई दैवी चमत्कार हो । दरअसल हमारी न्यायप्रणाली है ही ऐसी कि आरोपी को बचाने के लिए उसने तमाम रास्ते दिए हैं । रसूखदार व्यक्ति किसी न किसी बहाने मामले को सालों लटका लेता है और दंड से बच जाता है । क्या यही अपने लोकतंत्र से अपेक्षित था ?

लोकपाल, आरटीआई, एवं आपराधिक राजनीति

हमारे देश के मौजूदा राजनेता भ्रष्टाचार के प्रति कितने संजीदा हैं यह उनके लोकपाल के मामले को टालने एवं आरटीआई से अपने दलों को मुक्त रखने के इरादे से स्पष्ट है । इसी प्रकार वे राजनीति के अपराधीकरण के विरुद्ध भी कारगर उपाय नहीं अपनाना चाहते हैं । जिन आपराधिक छवि के नेताओं के बल पर वे सत्ता हासिल करते आ रहे हैं आज उन्हें वे बचाने की जुगत में लगे हैं । मेरा विश्वास है कि शुरुवाती दौर में राजनीति इतनी अस्वच्छ नहीं थी । समय के साथ आपराधिक छवि के लागों की पैठ जो शुरू हुई तो आज संसद तथा विधानसभाओं में उनका बोलबाला दिखाई देता है । जब ऐसे नेता और उनको बचाने वाले नेता संसद में तो अपराधमुक्त राजनीति कहां से आएगी ? इसे देश का दुर्भाग्य न कहें तो क्या कहें ?

चुनावी एवं प्रशासनिक सुधार

मुझे अब विश्वास हो चला है कि हमारे नेता ऐसे कोई उपाय नहीं करना चाहते हैं जो लोकतंत्र को मजबूत करे पर उनकी मनमर्जी पर अंकुश लगाए । मैं अब मानता हूं कि उनमे परस्पर यह मुक सहमति बनी है कि ऐसे किसी भी कानून का हममें कोई न कोई किसी न किसी बहाने विरोध करता रहेगा ताकि वह कानून पास न हो सके । ऊंची-ऊंची बातें होती रहती हैं लेकिन ठोस कुछ किसी को नहीं करना है । यही वजह है कि चुनाव, न्याय-व्यवस्था, सामान्य प्रशासन, तथा पुलिस तंत्र में सुधार आज तक नहीं हुए हैं और न आगे होने हैं । यही हमारी उपलब्धि है क्या ?

इंडिया बनाम भारत

स्वतंत्र हिंतुस्तान की सबसे त्रासद और दुःखद घटना है इस देश का इंडिया एवं भारत में बंटवारा । ये देश की चिंताजनक प्रगति है कि यहां दो समांतर व्यवस्थाएं साथ-साथ चल रही हैं । एक व्यवस्था है देश के समर्थ एवं संपन्न वर्ग के लिए और दूसरी है बचेखुचे कमजोर लोगों के लिए । चाहे शिक्षा हो, चिकित्सा हो, यातायात हो या कुछ और, दोनों के लिए असमान व्यवस्था कायम हुई हैं । तर्क दिया जाता है कि लोकतंत्र में तो लोगों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार सर्वोत्तम पाने का अधिकार है । संविधान में जिस EQUALITY की बात कही गई हैं उसके निहितार्थ क्या हैं यह मैं समझ नहीं पाता ।

स्वतंत्रता यानी अनुशासनहीनता

अंत में । क्या ऐसी स्वतंत्रता स्वीकार्य हो सकती है जिसमें व्यक्तियों पर किसी प्रकार का प्रतिबंध न हो, जहां मर्यादाएं न हों ? लेकिन बहुत से लोगों के लिए स्वतंत्रता के अर्थ हैं अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता, जो मर्जी वह करने का अधिकार, कानूनों का उल्लंघन, आदि । हमारा लोकतंत्र लोगों को दायित्यों का एहसास दिलाने का कार्य नहीं कर सका है । लोगों को कार्य-संस्कृति, दूसरों के प्रति संवेदना, देश-समाज के प्रति कर्तव्य का पाठ कोई नहीं पड़ा सका है । सभी को खुली छूट जैसे मिली हो ।

ऐसे ही अनेकों प्रश्न उठते हैं । ये सब बातें व्यापक बहस के विषय के हैं, किंतु इनसे इतना तो स्पष्ट होता ही है कि यह देश सही दिशा में नहीं जा रहा है ।

मेरी दृष्टि में चंद्रमा पर यान उतार देना उतना महत्व नहीं रखता जितना सड़क पर कूड़ा बीनने वाले को उस दशा से मुक्त करना । – योगेन्द्र जोशी

बोधगया की आतंकी घटना और राजनैतिक दलों का रवैया

Buddha Statue Bodhgayaराजनेताओं का रवैया

         आतंकवाद को लेकर अपने देश के राजनेताओं का रवैया बेहद हास्यास्पद रहा है । उनका एकमात्र उद्येश्य शासन पर कब्जा करके और उस पर येनकेन प्रकारेण चिपके रहकर सत्तासुख भोगना है । किसी राजनेता के दिलोदिमाग में देश की तस्वीर भविष्य में क्या होगी इसे लेकर कोई चिंता नहीं होती । उन्हें तो अपनी पांचसाला सत्ता बचाये रहना और अगले पांचसाला सत्ता को हथियाने की चिंता सताती है । और इस प्रयोजन के लिए हर प्रकार का समझौता करना उन्हें जायज लगता है । राजनैतिक सिद्धांत जैसी भी कोई चीज होती है यह उन्हें मालूम ही नहीं । देश की दीर्घकालिक नीतियां क्या हों इस पर उनका ध्यान कभी नहीं जाता है । अरे भई, देश के सामने कई समस्याएं ऐसी हैं जिन पर हर व्यक्ति को चिंतित होना चाहिए, खासकर उनको जो सत्ता पर कब्जा जमाए हों ।

आतंकवाद उन समस्याओं में से एक है । देशसेवा का ढिढोरा पीटने वाले नेताओं को तो ऐसी समस्याओं पर एकमत होना चाहिए और एक ही दिशा में कारगर कदम उठाने के लिए संकल्प लेना चाहिए । लेकिन देखिए कि वे आपस में ही एक-दूसरे पर तरह-तरह के लांछन लगाना शुरू कर देते हैं । उनके रवैये को देख आतंकी भी खुश होते होंगे और सोचते होंगे कि कैसा देश है यह कि नेता आपस में ही लड़ते रहतेे हैं । वे कहते होंगे कि इस देश में हमारे लिए डरने की कोई बात नहीं है । अरे भई, जिस किसी ने भी गलती की हो उसे लेकर आप ऊलजलूल तो नहीं बोलिए । देश के खातिर कुछ तो एकता दिखाइए । वैसे इतिहास गवाह है कि आपस में लड़कर हम बाहरी लोगों के लिए उपजाऊ जमीन तैयार करते रहे हैं । सदियों की गुलामी परस्पर के इसी झगड़ने की आदत का नतीजा रही है । और आज भी हम झगड़ने की आदत से बाज नहीं आ रहे हैं । अरे भई, कम से कम एकता नहीं तो एकता का नाटक तो कर सकते हैं । लेकिन नहीं, उनका दिमाग तो यह सोचने में लग जाता है कि क्या यह मुद्दा आगे सत्ता कब्जियाने में मदद करेगा या नहीं । मेरे मन में ऐसे राजनेताओं के प्रति कोई सम्मान नहीं । मैं सोचता हूं कि इनमें कोई नहीं जो मेरे वोट का हकदार हो ।

राजनेताओं को चिंता कहां

         आतंकी घटना राजनेताओं के लिए कोई माने नहीं रखती है । उन्होंने तो अपनी सुरक्षा का ऐसा इंतिजाम कर रखा है कि आतंकी उन्हें छू नहीं सकते हैं । ऐसी घटना में तो आम आदमी मारा जाता है, या अधिक से अधिक कोई सरकारी मुलाजिम । जानमाल का नुकसान भी आम आदमी को ही भुगतना पड़ता है । भारत की गरीब जनता की जुबान भुक्तभोगियों को दो-चार लाख की मदद देकर बंद करने की कला हमारी सरकारें बखूबी जानती हैं । यह पैसा उन्हें वास्तव में मिलता भी है मुझे तो इसमें भी शंका होती है । भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे सरकारी तंत्र में गरीब के पैसे पर भी लार टपकाने वालों की कमी थोड़े ही है ।

हमारे नेताओं में सामूहिक विचारणा का नितांत अभाव है । वे यह विचार नहीं करते कि ऐसी घटनाएं रुकें कैसे । जब घटना हो जाती है तो बस जांच शुरू हो जाती है । ठीक हैं जांच होनी चाहिए, पर जांच से क्या कोई सबक लिया जाता है ? घटना के लिए कौन जिम्मेदार है यह भी पता चल जाए, वह पकड़ में भी आ जाए, उसे सजा भी हो जाए, पर इस सब से भविष्य की घटनाएं रुक जाएंगी क्या ? आगे क्या किया जाना चाहिए यह बात जांच से न सीखी जाए तो उसका महत्व ही क्या रह जाता है ? जो होना था वह हो गया, सबक तो भविष्य के लिए सीखा जाता है । सरकारें अभी तक सीख पाई हैं ? कुछ दिनों के हल्लेगुल्ले के बाद सब शांत हो जाता है ।

अवांछित हस्तक्षेप

इस समय हर सरकारी तंत्र राजनैतिक हस्तक्षेप का शिकार है । सूचना तंत्र एवं जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने नहीं दिया जाता है । कांग्रेस के दिग्विजय सिंह जैसे नेता तो अपने अनुमान को ऐसे पेश करते हैं जैसे कि वे घटना के चस्मदीद गवाह हों । अरे जांच एजेंसियों को नतीजे तक पहुंचने तो दीजिए । लेकिन अपनी बेहूदी आदत से मजबूर जो हैं । आज तक नहीं सुधर सके तो अब क्या सुधरेंगे । मुझे लगता है कि राजनेताओं के मौजूदा रवैये से क्षुब्ध होकर सूचना एवं जांच एजेंसियां भी अपने कार्य में ढिलाई बरतने लगी हैं । किसी की जवाबदेही भी तो कभी तय नहीं होती है ।

हमारी राज्य सरकारों ने भी कसम खा रखी है कि केंद्र सरकार के साथ मिलकर आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई नहीं लड़नी है । हर राजनैतिक दल अपने दलीय नफे-नुकसान का हिसाब लगाकर आगे के कदम उठाता है । देशहित उनके लिए दोयम दर्जा रखता है । जिस लोकतंत्र में नेतागण इतने स्वार्थी हों वह कभी सफल नहीं हो सकता ।

सेक्युलरिज्म का राजनैतिक रोग

एक बात और ध्यान देने की है । अपने अधिकतर राजनैतिक दल “सेक्युलरिज्म” के गंभीर रोग से पीड़ित हैं । मैं उनके इस रोग को ऑब्सेसिव कंपल्सिव सिंड्रोम (obsessive compulsive syndrome) कहता हूं । वे आतंकी घटनाओं को भी बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के विभाजन से जोड़कर देखने लगते हैं । ये याद रखें कि आतंकवाद दुनिया भर में है, अलग-अलग कारणों से है । अधिकतर कारण स्थानीय अथवा क्षेत्रीय स्तर पर संसाधनों एवं शासकीय व्यवस्था को लेकर लोगों के बीच पनप रहे असंतोष से जुड़े हैं । इसलिए संबंधित आतंकी घटनाओं का महत्व अंताराष्ट्रीय न होकर केवल राष्ट्रीय होकर रह जाता है ।

लेकिन जेहादी आतंकवाद सही अर्थों में अंताराष्ट्रीय प्रकृति का है और “इस्लाम खतरे में है” के नारे के साथ चल रहा है । जब ऐसी आतंकी घटना हो तो उसे सेक्युलरिज्म के हिमायती होने का दावा करते हुए हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए । किंतु कई दल राजनैतिक लाभ पाने के चक्कर में वहां भी सेक्युलरिज्म का नारा बुलंद करने से नहीं हिचकते हैं । वे यह दावा भी कर बैठते हैं अल्पसंख्यकों को फ़ंसाया जा रहा है । यह कितना सच है इसका निर्णय ईमानदार नेता जांच पर छोड़ेगा । लगता है जांच एजेंसियां भी राजनीति में रंग चुकी हैं । ऐसे में भगवान ही मालिक है । – योगेन्द्र जोशी